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	<title>डोल यात्रा &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
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	<title>डोल यात्रा &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>मुनि श्री प्रशम सागर जी महाराज का यम संल्लेखना पूर्वक समाधिमरण : रत्नत्रय भवन से डोल यात्रा निकली, उमड़े श्रद्धालु और मुनि भक्त </title>
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		<pubDate>Mon, 17 Mar 2025 20:04:32 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मुनि श्री प्रशम सागर जी महाराज का यम संल्लेखना पूर्वक समाधिमरण सोमवार को हुआ।मुनिश्री का दोपहर 2.50 बजे श्री चंद्रप्रभ दिगंबर जैन मंदिर के रत्नत्रय भवन में समाधिमरण हुआ। बैंडबाजों के जुलूस के साथ शाम 4.30 बजे बाद रत्नत्रय भवन से डोल यात्रा निकली। डोलयात्रा में धरियावद के साथ उदयपुर, भींडर, कूण, खूंता, मूंगाणा, पारसोला [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>मुनि श्री प्रशम सागर जी महाराज का यम संल्लेखना पूर्वक समाधिमरण सोमवार को हुआ।मुनिश्री का दोपहर 2.50 बजे श्री चंद्रप्रभ दिगंबर जैन मंदिर के रत्नत्रय भवन में समाधिमरण हुआ। बैंडबाजों के जुलूस के साथ शाम 4.30 बजे बाद रत्नत्रय भवन से डोल यात्रा निकली। डोलयात्रा में धरियावद के साथ उदयपुर, भींडर, कूण, खूंता, मूंगाणा, पारसोला समेत देश-प्रदेश के बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे। <span style="color: #ff0000">धरियावद से पढ़िए अशोक कुमार जेतावत की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>धरियावद</strong>। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज के शिष्य मुनि श्री प्रशम सागर जी महाराज का यम संल्लेखना पूर्वक समाधिमरण सोमवार को हुआ। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज और मुनि श्री पुण्य सागर जी महाराज के णमोकार महामंत्र एवं धर्मोपदेश श्रवण के साथ मुनिश्री का दोपहर 2.50 बजे श्री चंद्रप्रभ दिगंबर जैन मंदिर के रत्नत्रय भवन में समाधिमरण हुआ। दिगंबर जैन नरसिंहपुरा समाज के गौरव मुनि श्री प्रशम सागर जी महाराज की पार्थिव देह को सुसज्जित काष्ट निर्मित विमान में विराजमान कर बैंडबाजों के जुलूस के साथ शाम 4.30 बजे बाद रत्नत्रय भवन से डोल यात्रा निकली। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी और मुनि श्री पुण्य सागर जी महाराज के मुनि-आर्यिका संघ सहित बड़ी संख्या में श्रावकों का सैलाब समाधिस्थ मुनि श्री के अंतिम दर्शन के लिए उमड़ पड़ा। श्रद्धालुओं ने मुनिश्री को श्रीफल भेंटकर अंतिम श्रद्धांजलि अर्पित की। जुलूस धरियावद नगर के प्रमुख मार्गों से होते हुए सुकली नदी के किनारे स्थित समाज के समाधि स्थल पर पहुंचा। डोलयात्रा में धरियावद के साथ उदयपुर, भींडर, कूण, खूंता, मूंगाणा, पारसोला समेत देश-प्रदेश के बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे।</p>
<p><strong>विधिविधान से हुआ अंतिम संस्कार</strong></p>
<p>इसके पूर्व मुनि श्री हितेंद्र सागर जी महाराज एवं मुनि श्री मुमुक्षु सागर जी महाराज ने समाधि स्थल का निरीक्षण कर आवश्यक दिशा निर्देश दिए। पंडित हंसमुख जैन के निर्देशन में पंडित भागचंद जैन, गजेंद्र पटवा, बाल ब्रह्मचारी गज्जू भैया, विकास भैया, नमन भैया एवं अन्य त्यागी व्रती भैया बहनों और विद्वानों की उपस्थिति में विधि-विधान पूर्वक मुनिश्री का अंतिम संस्कार किया गया।</p>
<p><strong>अंतिम संस्कार का लाभ गृहस्थ अवस्था के परिवारजनों ने लिया</strong></p>
<p>दिगंबर जैन समाज के अशोक कुमार जेतावत ने बताया कि मुनि श्री प्रशम सागर जी महाराज ने रविवार को चारों तरह के आहार त्यागकर आचार्य श्री वर्धमान सागर जी से यम संल्लेखना ग्रहण की थी। मुनि श्री का स्वास्थ्य बीते 4-5 दिनों से खराब चल रहा था। उनके अंतिम संस्कार की समस्त क्रियाओं का लाभ प्रशम सागर जी महाराज के गृहस्थ अवस्था के परिवारजन ने लिया। विमान को कंधा देने, भूमि शुद्धि, मुनि श्री की पंचामृत अभिषेक, पूजा और अग्नि संस्कार आदि समस्त विधि मुनि श्री की गृहस्थ अवस्था के पुत्र एवं पुत्र वधु देवेंद्र कुमार-मीनाक्षी, राजकुमार-संध्या, पौत्र ऋषिराज, नयन, पौत्री नीलम, अनुश्री, आयुषी अदिति एवं समस्त बोहरा परिवार के साथ ही पुत्री सीमा, रेखा एवं तिलक, दौहित्र सिद्धार्थ, रवि और पवित्र ने संपन्न की।</p>
<p><strong>मुनि श्री का जीवन परिचय-</strong></p>
<p>मुनि श्री श्री प्रशम सागर जी महाराज का गृहस्थ अवस्था का नाम चांदमल बोहरा था। उनका जन्म 6 दिसंबर 1937 में माता मैना सुंदर एवं पिता छगनलाल के घर भींडर (राजस्थान) में हुआ था। इनके भाई जमनालाल, शांतिलाल एवं एक बहन राजू बाई थी। चांदमल जी ने शैक्षणिक योग्यता प्राप्त कर राजकीय चिकित्सा सेवा में कंपाउंडर पद पर कार्यरत रहते हुए उदयपुर अस्पताल से सेवानिवृति ली। आपका विवाह अंबा बाई बोहरा से हुआ था। आपके दो पुत्र और तीन पुत्रियों के साथ ही दो पौत्र एवं चार पौत्रियां हैं। आप राजकीय सेवानिवृत्ति के बाद अध्यात्म के मार्ग पर अग्रसर हुए और संयम धारण किया। 6 दिसंबर 2011 को तीर्थराज श्री सम्मेद शिखर जी में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज के सिद्ध हस्त कर कमलों से जैनेश्वरी दीक्षा धारण की और चांदमल बोहरा से मुनि श्री प्रशम सागर महाराज बन गए। तब से लेकर विगत 14 वर्षों तक संयम, तप, जप की कठोर साधना के साथ मुनि चर्या का पालन करते रहे।</p>
<p><strong>यह संयोग ही है</strong></p>
<p>आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के शिष्य एवं जैन दरसिंहपुरा समाज के गौरव रहे मुनि श्री पद्मकीर्ति सागर जी महाराज की समाधि जहां 17 मई को हुई, वहीं मुनि श्री श्रेयस सागर जी महाराज की 17 अप्रैल और अब मुनि श्री प्रशम सागर जी महाराज का समाधिमरण 17 मार्च हुआ। तीनों मुनिराजों की समाधि 17 तारीख को हुई। यह एक संयोग है।</p>
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		<title>गणाचार्य विरागसागरजी की अभूतपूर्व समाधि अवसर पर विशेष लेख : दिगम्बरत्व की अनुपम यात्रा के समाधि शिखर संत आचार्य विरागसागरजी </title>
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		<pubDate>Wed, 10 Jul 2024 08:07:34 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जन्मनाम अरविंद यानी कमल, जन्म से ही संसार रूपी समुद्र में कमल सम जीवन जीने वाले व्यक्तित्व ने अपनी 41 वर्षीय दिगम्बरत्व की अनुपम यात्रा का शिखर आरोहण अभूतपूर्व, अनुपम अविस्मरणीय समाधि से कर दिगम्बर जैन जगत के सामने अपनी सरलता, सहजता, संस्कार, समर्पण, शुचिता के साथ सम्यक्त्व का ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया जो युगों-युगों [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जन्मनाम अरविंद यानी कमल, जन्म से ही संसार रूपी समुद्र में कमल सम जीवन जीने वाले व्यक्तित्व ने अपनी 41 वर्षीय दिगम्बरत्व की अनुपम यात्रा का शिखर आरोहण अभूतपूर्व, अनुपम अविस्मरणीय समाधि से कर दिगम्बर जैन जगत के सामने अपनी सरलता, सहजता, संस्कार, समर्पण, शुचिता के साथ सम्यक्त्व का ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया जो युगों-युगों तक जयवंत होकर दिगम्बरत्व की ध्वज पताका को कायम रखेगा। <span style="color: #ff0000">पढ़िए राजेन्द्र जैन &#8216;महावीर&#8217; का विशेष लेख</span></strong></p>
<hr />
<p>जन्मनाम अरविंद यानी कमल, जन्म से ही संसार रूपी समुद्र में कमल सम जीवन जीने वाले व्यक्तित्व ने अपनी 41 वर्षीय दिगम्बरत्व की अनुपम यात्रा का शिखर आरोहण अभूतपूर्व, अनुपम अविस्मरणीय समाधि से कर दिगम्बर जैन जगत के सामने अपनी सरलता, सहजता, संस्कार, समर्पण, शुचिता के साथ सम्यक्त्व का ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया जो युगों-युगों तक जयवंत होकर दिगम्बरत्व की ध्वज पताका को कायम रखेगा।</p>
<p><strong>कौन कहता है आसमान में सुराख नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबियत से उछालों यारों</strong></p>
<p>ऐसा ही सांसारिक लोगों के बीच चमत्कार दिखाया है गणाचार्य विरागसागरजी महाराज ने उन्होंने जो समाधि पूर्व अपना वीडियो रिकार्ड कराया वह उनके अध्ययन की स्पष्टता आगम के प्रति उनके बहुमान को प्रदर्शित करता है। वैसे तो जैन जगत में दीक्षा ली ही इसलिए जाती है कि समाधि संल्लेखना को धारण कर आत्म पथिक बने। 350 दीक्षाओं के प्रदाता होने का सौभाग्य हासिल करने वाले गणाचार्य विरागसागरजी महाराज ने अपने आपको उस दौर में स्थापित किया जिस दौर में उनका विरोध भी हुआ। अपने विरोधियों को बौना साबित करते हुए गणाचार्य श्री विरागसागरजी ने अपने संघ को ऐसा मजबूत बनाया जहां से दिगम्बरत्व का सच्चा दिग्दर्शन करने में उनके शिष्य प्रशिष्यों ने कोई कसर नहीं छोड़ी ।</p>
<p>दिन-रात आत्मा का चिंतन मृदु संभाषण में वहीं कथन</p>
<p>निर्वस्त्र दिगम्बर काया में भी, प्रकट हो रहा अन्तर्मन</p>
<p>&#8230;. पंक्तियों को चरितार्थ करते हुए वे एक ऐसे आचार्य बने जिन्होंने देश के ललाट पर एक ऐसी चमक बिखेरी जिससे जैन धर्म में उत्तर-दक्षिण की दुरियां मिटी साथ ही पंथवाद की बेड़ियों में जकड़ा समाज भी अपने आपमें महसूस करने लगा कि दिगम्बरत्व एक ऐसा देश है जिसे पालन करने वाला जीवन जीने की कला के साथ मृत्यु को प्राप्त करने की कला भी सीखता है ।</p>
<p><strong><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-63228" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/07/IMG-20240710-WA0015.jpg" alt="" width="1078" height="464" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/07/IMG-20240710-WA0015.jpg 1078w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/07/IMG-20240710-WA0015-300x129.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/07/IMG-20240710-WA0015-1024x441.jpg 1024w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/07/IMG-20240710-WA0015-768x331.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/07/IMG-20240710-WA0015-990x426.jpg 990w" sizes="(max-width: 1078px) 100vw, 1078px" />संल्लेखना की पवित्रता के पोषक बने गणाचार्य विरागसागरजी</strong></p>
<p>जब व्यक्ति जन्म लेता है उसी दिन से मृत्यु की यात्रा प्रारंभ हो जाती है । जीवन और मृत्यु के दो पृष्ठ के बीच जीवन की पुस्तक में मनुष्य का वह सब कुछ अंकित होता है जो उसे अजर-अमर बनाता है। गणाचार्य विरागसागरजी महाराज ने अपना संयमी जीवन महत 16 वर्ष की आयु में प्रारंभ कर दिया था। जिस आयु में हम अपना जीवन खेलकूद में व्यतीत करते है । उस आयु में आपने अपने हाथों से पिच्छी धारण कर तपस्वी सम्राट आचार्य श्री सन्मतिसागरजी महाराज से क्षुल्लक दीक्षा ले ली थी । लौकिक शिक्षा पाँचवी तक अलौकिक पंच महाव्रत में अंतिम समय तक दृढ़ रहे गणाचार्य</p>
<p>यदि हम लौकिक शिक्षा की बात करें तो वे केवल पांचवी तक ही पढ़े, शांति निकेतन कटनी में आपने मध्यमा (इन्टर) तक शिक्षा लेकर अपने आपको अलौकिक बनाने का उपक्रम कर लिया । वात्सल्य रत्नाकर आचार्य श्री विमलसागरजी महाराज के विश्वास पर खरे उतरे क्षुल्लक पूर्ण सागर को पूर्ण दिगम्बर बनाने वाले आचार्यश्री विमलसागरजी महाराज ने अपने वात्सल्य से पांचवी पास एक युवा को जीवन की कठिनतम शिक्षा की दीक्षा प्रदान करते हुए पूर्ण दिगम्बरत्व प्रदान किया । महाराष्ट्र का औरंगाबाद धन्य हुआ और नामकरण हो गया मुनिश्री विरागसागरजी महाराज ।</p>
<p>गुरुमुख से निकले &#8216;विराग&#8217; नाम को सार्थक करने निकले मुनि विरागसागरजी महाराज ने अपने तप त्याग &#8211; अध्ययन-मनन- चिंतन-स्वाध्याय के साथ अपनी चर्या का साम्य स्थापित करते हुए अनेक आयाम स्थापित किये । अपने आपको स्थापित करते हुए आपने अपने आपको इतना सक्षम बनाया कि 8 नवम्बर 1992 को सिद्धक्षेत्र द्रोणगिरि में गुरु आज्ञा से आपको जैन दर्शन के 36 मूलगुण धारी आचार्य पद पर प्रतिष्ठित किया । आचार्य पद प्रतिष्ठापन अवसर पर अपनी निस्पृहता प्रदर्शित करते हुए आपने कहा &#8216;गुरु बना नहीं जाता, बना दिया जाता है और शिष्य बनाये नहीं जाते, बन जाते है ।&#8217;</p>
<p><strong><img decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-63229" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/07/IMG-20240710-WA0014.jpg" alt="" width="1500" height="1125" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/07/IMG-20240710-WA0014.jpg 1500w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/07/IMG-20240710-WA0014-300x225.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/07/IMG-20240710-WA0014-1024x768.jpg 1024w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/07/IMG-20240710-WA0014-768x576.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/07/IMG-20240710-WA0014-74x55.jpg 74w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/07/IMG-20240710-WA0014-111x83.jpg 111w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/07/IMG-20240710-WA0014-215x161.jpg 215w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/07/IMG-20240710-WA0014-990x743.jpg 990w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/07/IMG-20240710-WA0014-1320x990.jpg 1320w" sizes="(max-width: 1500px) 100vw, 1500px" />गुरु के विश्वास पर खरे उतरे शिष्यों की लग गई कतारें</strong></p>
<p>आचार्य श्री विरागसागरजी महाराज ने पद पर प्रतिष्ठित होने के बाद एवं समर्थ व सक्षम आचार्य के रूप में अपने आपको स्थापित किया उनके वाक्य शिष्य बनाये नहीं जाते बन जाते है का ऐसा असर हुआ कि शिष्यों की कतारे लग गई । आपने आचार्य, उपाध्याय, मुनि, आर्यिका, ऐलक, क्षुल्लक के रूप में 350 दीक्षाएं प्रदान की । आपने अपने शिष्यों में से आचार्य बनाये और उन्हें स्वतंत्रता देकर दिगम्बर धर्म को प्रभावी बनाने का आदेश दिया। देखते-देखते उनके शिष्यों ने सैकड़ों प्रशिष्य तैयार कर दिए जो आज संपूर्ण देश में अपना डंका बजा रहे है । उन्हीं में से एक श्रमणाचार्य 108 विशुद्धसागरजी महाराज को अपनी समाधि के कुछ घण्टे पहले अपना उत्तराधिकारी घोषित करने वाले आचार्यश्री विरागसागरजी महाराज ने जो अपना चेतनामयी विडियो बनवाया व उसमें जिस निस्पृहता से अपना निर्भीक, निराकुल कथन किया वह युगों-युगों तक गणाचार्य विरागसागरजी महाराज को अमरत्व प्रदान कर गया ।</p>
<p>2 जुलाई 2024 को गंभीर हार्टअटैक, समाज एवं चिकित्सकों को दृढता पूर्वक इलाज से इन्कार, पंच महाव्रतों के प्रति अभूतपूर्व दृढ़ता और 3 जुलाई 2024 को स्व संवेदन के साथ आहार चर्या करना फिर स्व-प्रेरणा से अपना विवेकपूर्ण वीडियो संदेश देना, उसमें भी सबसे क्षमा सबको क्षमा और यह कहना कि आज बोल रहे है कल न बोल पाए, आज ध्यान है कल ध्यान न रहे । मैंने पूरा विडियो कई बार सुना उनका हर शब्द न केवल स्पष्ट है बल्कि संसार के प्रति वैराग्य भाव के चरमोत्कर्ष को दर्शाता है। किसी साधक की साधना का नवनीत समाधि के प्रति ललक को प्रदर्शित करता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि जैन दर्शन में सारे पद भार रूप है जिन्हें छोड़ना होता है पद मोक्षमार्ग में बाधक है। इस भावना के साथ उन्होंने अपने पद को छोड़ा और 4 जुलाई 2024 की प्रातःकालीन ब्रह्मबेला के पूर्व 2.27 बजे इस नश्वर देह का त्याग पूर्ण विवेक व प्रतिक्रमण सामायिक के उपरांत किया जो उन्हें एक ऐसा तपस्वी निरूपित करता है जो जैन दर्शन में समाधि की नजीर के रूप में स्थापित करेगा ।</p>
<p><strong>वर्तमान काल में युग प्रतिक्रमण के जनक थे गणाचार्य</strong></p>
<p>हम सबने प्रतिक्रमण खूब सुना लेकिन युग प्रतिक्रमण की चर्चा गणाचार्य विरागसागरजी के मुख से सुनी व देखी । अपने संघ के प्रत्येक साधु के इस निमित्त बुलाकर जैनत्व में प्रभावना का संदेश देकर उन्होंने युग प्रतिक्रमण को जीवंत किया ।</p>
<p>विद्वानों के प्रति अपूर्व स्नेह रखने वाले गणाचार्यजी ने अनेक सम्मेलन कराये, प्रतिभाओं को आगे बढ़ाने का कार्य किया, साहित्य सृजन किया, जीवंत कृतिया तैयार की। उनकी सरलता की सुगंध इतनी फैली थी कि उनसे दीक्षा लेने की लंबी कतार थी । उनकी पारखी नजर ने हमें ऐसे अनेक हीरे दिये जो दिगम्बरत्व के क्षितिज पर अपनी उत्कृष्टता को प्रदर्शित कर रहे है। आचार्य विशुद्धसागरजी, आचार्य विमर्शसागरजी, आचार्य विनम्रसागरजी, आचार्य विनिश्चयसागरजी, आचार्य विभवसागरजी सहित अनेक शिष्य-प्रशिष्य साहित्य सरोवर के राजहंस बनकर जिनागम की सेवा कर रहे है ।</p>
<p><strong>&#8216;वि&#8217; से प्रारंभ शिष्य परम्परा जैन दर्शन की विराग परम्परा</strong></p>
<p>आचार्य विमलसागरजी महाराज से विरागसागर नाम पाकर अपने शिष्यों के नाम में उन्होंने &#8216;वि&#8217; अवश्य जोड़ा जो उनकी एक विशिष्ट पहचान बनी संपूर्ण देश में &#8216;वि&#8217; से प्रारंभ होने वाले अधिकांश नामों को यह माना जा सकता है कि वे गणाचार्य विरागसागरजी महाराज के शिष्य है। मुझे उनका चरण सान्निध्य जुलाई 2013 पावागिरि ऊन से सिद्धवरकूट &#8211; इन्दौर यात्रा के दौरान मिला । सिद्धवरकूट कमेटी के तत्कालीन अध्यक्ष स्व.श्री प्रदीपकुमारसिंहजी कासलीवाल इन्दौर ने मुझे ( राजेन्द्र जैन महावीर ) व श्री आशीष चौधरी, मुकेश न पेप्सी सनावद को यात्रा की जिम्मेदारी सौंपी, उस दौरान लगभग 1 माह तक हम आचार्यश्री के चरण सान्निध्य में रहे । 09 जुलाई 2013 को आचार्य वर्धमानसागरजी महाराज की जन्मभूमि सनावद में उनका अभूतपूर्व प्रवेश हुआ, उनकी सरलता, सहजता देखकर मन प्रसन्नता से भर जाता रहा । ऐसे महान तपस्वी संत जिन्होंने अपने शरीर की आयु के 61 वर्ष में से 41 वर्ष दिगम्बरत्व की सेवा में लगाए व दिगम्बरत्व के नवनीत संलेखना समाधि को श्रेष्ठतम ऊंचाईयों प्रदान की ऐसे महान गुरुवर के चरणों में अपनी विनम्र विनयांजलि समर्पित करता हूँ ।</p>
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		<title>विनयांजलि सभा में भक्तों ने व्यक्त किए उद्गार : आचार्य विरागसागर इस सदी के महान संत थे </title>
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		<pubDate>Mon, 08 Jul 2024 10:58:27 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[ दिगम्बराचार्य श्री विरागसागर जी महाराज इस सदी के महानतम संत थे। वह अपने गुरु आचार्य श्री विमलसागर महाराज की तरह ही मृदुभाषी और शास्त्रज्ञ थे। आप अपने भक्तों के साथ ही सभी श्रावकों से बहुत ही स्नेह के साथ मिलते थे। मुरैना नगर में पूज्यश्री का लगभग चार-पांच बार आगमन हुआ। पढ़िए मनोज जैन नायक [&#8230;]]]></description>
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<p><strong> दिगम्बराचार्य श्री विरागसागर जी महाराज इस सदी के महानतम संत थे। वह अपने गुरु आचार्य श्री विमलसागर महाराज की तरह ही मृदुभाषी और शास्त्रज्ञ थे। आप अपने भक्तों के साथ ही सभी श्रावकों से बहुत ही स्नेह के साथ मिलते थे। मुरैना नगर में पूज्यश्री का लगभग चार-पांच बार आगमन हुआ। <span style="color: #ff0000">पढ़िए मनोज जैन नायक की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना।</strong> दिगम्बराचार्य श्री विरागसागर जी महाराज इस सदी के महानतम संत थे। वह अपने गुरु आचार्य श्री विमलसागर महाराज की तरह ही मृदुभाषी और शास्त्रज्ञ थे। आप अपने भक्तों के साथ ही सभी श्रावकों से बहुत ही स्नेह के साथ मिलते थे। मुरैना नगर में पूज्यश्री का लगभग चार-पांच बार आगमन हुआ। आपने दया, अहिंसा और शाकाहार का प्रचार प्रसार करते हुए जैन धर्म के सिद्धांतों का प्रचार प्रसार किया। अपने संयम काल में आपने 400 से अधिक दीक्षाएं प्रदान कीं। वर्तमान में सम्पूर्ण भारतवर्ष में आपके शिष्य जैन धर्म के सिद्धांतों का प्रचार- प्रसार कर रहे हैं।</p>
<p>उक्त उद्गार श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन पंचायती बड़ा जैन मंदिर में आयोजित गणाचार्य विरागसागर जी महाराज की विन्यांजलि सभा में पुज्यश्री के भक्तों द्वारा व्यक्त किए गए। ज्ञातव्य हो कि जैन धर्म के निमित्त ज्ञानी आचार्य श्री विमलसागर जी महाराज के परम प्रभाव शिष्य विरागसागर महाराज की 04 जुलाई 2024 को संलेखना पूर्वक समाधि हो गई है। विगत दिवस बड़ा जैन मंदिर मुरैना में पूज्य क्षुल्लिका अक्षतमति माताजी, क्षुल्लिका क्षयोपसममति माताजी, क्षुल्लिका आप्तमति माताजी के सान्निध्य में विनयांजलि सभा का आयोजन किया गया ।</p>
<p><img decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-63129" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/07/IMG-20240708-WA0028.jpg" alt="" width="1599" height="899" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/07/IMG-20240708-WA0028.jpg 1599w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/07/IMG-20240708-WA0028-300x168.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/07/IMG-20240708-WA0028-1024x576.jpg 1024w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/07/IMG-20240708-WA0028-768x432.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/07/IMG-20240708-WA0028-1536x864.jpg 1536w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/07/IMG-20240708-WA0028-990x557.jpg 990w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/07/IMG-20240708-WA0028-1320x742.jpg 1320w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/07/IMG-20240708-WA0028-470x264.jpg 470w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/07/IMG-20240708-WA0028-640x360.jpg 640w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/07/IMG-20240708-WA0028-215x120.jpg 215w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/07/IMG-20240708-WA0028-414x232.jpg 414w" sizes="(max-width: 1599px) 100vw, 1599px" /> सभा से पूर्व पूज्य आचार्य श्री विरागसागर जी महाराज के चित्र के समक्ष गुरुभक्त प्राचार्य अनिल जैन, जवाहरलाल बरैया, एडवोकेट धर्मेंद्र जैन, मनोज जैन नायक, वीरेंद्र जैन, अजय जैन खबरोली, ने दीप प्रज्वलित किया । सभा का संचालन विद्वत नवनीत शास्त्री ने किया। मंचासीन क्षुल्लिका माताजी सहित भाजपा के वरिष्ठ नेता देवीराम उपाध्याय, जवाहरलाल बरैया, प्रतिष्ठाचार्य संजय शास्त्री, राजेंद्र भंडारी, एडवोकेट धर्मेंद्र जैन, शेखर जैन, नवनीत शास्त्री, अनूप भंडारी ने बुंदेलखंड के प्रथम दिगम्बराचार्य विरागसागर महाराज के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर प्रकाश डालते हुए अनेकों संस्मरण बताएं।</p>
<p>सभा के आरंभ में सामूहिक नमोकर महामंत्र का पाठ किया गया । उपस्थित सभी गुरुभक्तों ने दीप अर्पित कर अपने श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए विनयांजलि दी। इस अवसर पर प्रेमचंद जैन बंदना, राजकुमार जैन राजू, विजय जैन मंत्री, महावीर प्रसाद जैन, आशीष जैन सोनू, ब्रजेश जैन दादा, अनिल नायक, पंकज जैन मेडिकल, कुशल जैन, नरेश जैन टिल्लू, रविंद्र जैन, नागेंद्र जैन दद्दू, सुभाष जैन, अशोक जैन मेडिकल, मुकेश जैन, अजय जैन, राकेश जैन, प्रदीप वरैया, जितेंद्र जैन, जैन छात्रावास के समस्त छात्रों सहित सैकड़ों की संख्या में गुरुभक्त बंधुवर, माताएं-बहिनें उपस्थित थे ।</p>
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		<title>श्री चंद्रप्रभ दिगम्बर जैन जिनालय का हुआ शिलान्यास : विनयांजलि सभा में गणाचार्य श्री विराग सागर को दी भावभीनी श्रद्धांजलि </title>
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		<pubDate>Mon, 08 Jul 2024 06:54:19 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[निकटवर्ती ग्राम अमरमऊ के श्री पारसनाथ दिगंबर जैन मंदिर जी के विशाल परिसर में सेठ नाथूराम एवं उनकी धर्मपत्नी श्रीमती शांतिबाई की पुण्य स्मृति में सेठ देवपाल श्रीमती कमलेश , सेठ हरिश्चंद्र, ममता, सेठ हुकम चंद्र (सरपंच), सुनीता , सेठ नरेंद्र कुमार झल्लू, नीता , अमरमऊ फुसकेले सेठ परिवार द्वारा श्री चंद्रप्रभ दिगम्बर जैन जिनालय [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>निकटवर्ती ग्राम अमरमऊ के श्री पारसनाथ दिगंबर जैन मंदिर जी के विशाल परिसर में सेठ नाथूराम एवं उनकी धर्मपत्नी श्रीमती शांतिबाई की पुण्य स्मृति में सेठ देवपाल श्रीमती कमलेश , सेठ हरिश्चंद्र, ममता, सेठ हुकम चंद्र (सरपंच), सुनीता , सेठ नरेंद्र कुमार झल्लू, नीता , अमरमऊ फुसकेले सेठ परिवार द्वारा श्री चंद्रप्रभ दिगम्बर जैन जिनालय का नवनिर्माण के शुभ भाव होने पर दो दिवसीय विविध धार्मिक अनुष्ठान कार्यक्रम समारोह का आयोजन किया गया। <span style="color: #ff0000">पढ़िए राजेश रागी की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>बकस्वाहा।</strong> निकटवर्ती ग्राम अमरमऊ के श्री पारसनाथ दिगंबर जैन मंदिर जी के विशाल परिसर में सेठ नाथूराम एवं उनकी धर्मपत्नी श्रीमती शांतिबाई की पुण्य स्मृति में सेठ देवपाल श्रीमती कमलेश , सेठ हरिश्चंद्र, ममता, सेठ हुकम चंद्र (सरपंच), सुनीता , सेठ नरेंद्र कुमार झल्लू, नीता , अमरमऊ फुसकेले सेठ परिवार द्वारा श्री चंद्रप्रभ दिगम्बर जैन जिनालय का नवनिर्माण के शुभ भाव होने पर दो दिवसीय विविध धार्मिक अनुष्ठान कार्यक्रम समारोह का आयोजन किया गया। जिसमें रविवार को शिलान्यास की विविध क्रियाओं को सम्पन्न कराया गया। शिलान्यास समारोह के प्रातः अभिषेक ,शांतिधारा पूजन उपरांत शिखर चंद चमेली जैन सागर के द्वारा ध्वजारोहण तथा विजय कुमार-द्रोपती जैन सागर व पवन कुमार-सावित्री सागर तथा अनिल कुमार सरोज जैन बासां तारखेडा, निलय-किरण जैन गढ़ाकोटा ने श्रीजी के चित्रों का अनावरण कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-63112" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/07/IMG-20240708-WA0015.jpg" alt="" width="1080" height="1353" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/07/IMG-20240708-WA0015.jpg 1080w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/07/IMG-20240708-WA0015-239x300.jpg 239w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/07/IMG-20240708-WA0015-817x1024.jpg 817w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/07/IMG-20240708-WA0015-768x962.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/07/IMG-20240708-WA0015-990x1240.jpg 990w" sizes="auto, (max-width: 1080px) 100vw, 1080px" />इस मौके पर संदीप मयंक सेठ अमरमऊ, संतोष कुमार, सिद्धार्थ कुमार सिद्धार्थ प्रेस बड़ामलहरा, निलय कुमार निष्कर्ष गढ़ाकोटा, विजय कुमार प्रदीप शास्त्री सागर, राजेंद्र मंडी बड़ामलहरा, निर्मल कुमार नितेश कुमार तेजगढ़, शिखर चंद्र चक्रेश कुमार मुकेश कुमार गंज वाले बड़ामलहरा, केसरबाई रमेश चंद बांसा तारखेडा, उत्तम चंद शुभम शास्त्री गंज वाले सिद्धार्थ प्रेस बड़ामलहरा, विजय कुमार अशोक कुमार शाहगढ़, मा.भागचंद्र शैलेश कुमार निवार, पवन मड़ावरा सागर सहित सैकड़ों बन्धुओं ने स्वर्ण रजत ताम्र शिलाओं को रखकर पुण्यार्जन किया। मुख्य शिला रखने के पूर्व सम्मेद शिखरजी, नैनागिरि, द्रोणगिरि, आहर, कुण्डलपुर सहित अनेक सिद्धक्षेत्रों की मिट्टी तथा श्रीजी का गंधोदक,दीपक क्लश आदि रखकर नमन किया। संपूर्ण कार्यक्रम का धार्मिक विधि विधान क्रियाओं के साथ पं. मनोज कुमार शास्त्री बगरोही वालों के द्वारा संपन्न करायी गई।</p>
<p>इस मौके पर शाहगढ़ हीरापुर, तिगोडा ,नरवां, घुवारा, बकस्वाहा, बड़ामलहरा,बण्डा, दलपतपुर ,बीला, दमोह,सागर गढ़ाकोटा, बम्हौरी, सुनवाहा, निवार, बांसा, भगवां आदि ग्राम नगरों की क्षेत्रीय समाज ने भाग लिया। शिलान्यास समारोह के पूर्व बुन्देलखण्ड के प्रथमाचार्य गणाचार्य श्री विराग सागर जी महामुनिराज की समतापूर्वक महासमाधि होने पर विनयांजलि सभा में उपस्थित महानुभावों ने णमोकार महामंत्र का जापकर भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की।</p>
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		<title>गणाचार्य श्री विराग सागर जी महाराज के समाधि मरण पर विनयांजलि : धर्म की रक्षा के लिए, रत्नत्रय की रक्षा के लिए संल्लेखना ली जाती है- आचार्य श्री समयसागर जी महाराज </title>
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		<pubDate>Mon, 08 Jul 2024 06:16:57 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[कुंडलपुर में परम पूज्य गणाचार्य श्री विरागसागर जी महाराज के समाधिमरण पर एक विनजलि सभा का आयोजन किया गया। विनयांजलि सभा में परम पूज्य आचार्य श्री समय सागर जी महाराज ने विनयांजलि व्यक्त करते हुए कहा सर्वविदित है कि जिसका जन्म होता है उसका अनिवार्य रूप से मरण हुआ करता है और यह जन्म और [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>कुंडलपुर में परम पूज्य गणाचार्य श्री विरागसागर जी महाराज के समाधिमरण पर एक विनजलि सभा का आयोजन किया गया। विनयांजलि सभा में परम पूज्य आचार्य श्री समय सागर जी महाराज ने विनयांजलि व्यक्त करते हुए कहा सर्वविदित है कि जिसका जन्म होता है उसका अनिवार्य रूप से मरण हुआ करता है और यह जन्म और मरण की परंपरा आज की नहीं है अनंत कालीन परंपरा चली आ रही है। <span style="color: #ff0000">पढ़िए राजीव सिंघई मोनू की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>कुंडलपुर (दमोह)।</strong>सुप्रसिद्ध सिद्ध क्षेत्र कुंडलपुर में परम पूज्य गणाचार्य श्री विरागसागर जी महाराज के समाधिमरण पर एक विनजलि सभा का आयोजन किया गया। विनयांजलि सभा में परम पूज्य आचार्य श्री समय सागर जी महाराज ने विनयांजलि व्यक्त करते हुए कहा सर्वविदित है कि जिसका जन्म होता है उसका अनिवार्य रूप से मरण हुआ करता है और यह जन्म और मरण की परंपरा आज की नहीं है अनंत कालीन परंपरा चली आ रही है। बीज और वृक्ष की जो परंपरा है उसी प्रकार जन्म और मरण की परंपरा चल रही है। कर्म के अधीन होने के कारण बार-बार संसारी प्राणी जन्म लेता है वह मरण को प्राप्त करता है। किंतु उस मरण से और जन्म से ऊपर उठने के लिए आगमकारों ने बहुत बड़ा उपकार किया है जिनेंद्र भगवान की वाणी को सुरक्षित रखने का पुरुषार्थ किया है ।और सर्वप्रथम आगम की जो रचना होती है ग्रंथ की अपेक्षा से गणधर परमेष्ठी के द्वारा ही आगम की रचना होती है ।वह भी दिव्य ध्वनि का आलंबन लेकर आगम की रचना करते हैं।</p>
<p>गणधर परमेष्ठी और वहां से यह प्रभु की वाणी जिनवाणी जिसे बोलते वहां से प्रवाहित होते हुए आज तक यहां पर आई है। उस आगम के अनुसार ही हम कुछ विचार यहां रख रहे हैं जो प्रासंगिक हैं कि संलेखना ली जाती है सल्लेखना दी नहीं जातीऔर उमा स्वामी महाराज ने ऐसा कहा है संलेखना जो ली जाती है उसके लिए बहुत सारे कारण है एक तो उपसर्ग आ जाए अकाल पड़ जाए वृद्धावस्था आ जाए भयानक कोई रोग आ जाए तो उस समय धर्म की रक्षा के लिए ,रत्नात्रय की रक्षा के लिए अथवा व्रत की रक्षा के लिए यह संलेखना ली जाती है ।जब तक शरीर में क्षमता रहती है शरीर साथ देता है जब तक रत्नात्रय की रक्षा अथवा धर्म की आराधना की जाती है। और यथायोग जो साधक होते हैं वृती होते हैं अवृति हो सारे के सारे अपना जीवन व्यतीत करते हैं ज्यो ही शरीर अपना काम करना बंद कर देता है उस समय शरीर के प्रति ममत्व का त्याग करके धर्म की रक्षा करने के लिए संलेखना को अंगीकार करता है साधक ।</p>
<p>इस प्रकार संक्षिप्त रूप से भी संलेखना होती प्रत्याख्यान जिसको बोलते वृहद रूप से भी हो सकता है तत्काल शरीर के प्रति जो ममत्व भाव था उसको छोड़ करके प्रतिज्ञा कर लेता है संघ के प्रति भी जो लगाव है संचालक आदि कर्तव्य के प्रति भाव आते रहते हैं उसका विचार कर लेता है यह विधि संक्षेप मानी जाती है और रोग आदि के आने पर संक्षेप प्रत्याख्यान हीं होता है यदि नहीं है वृद्धावस्था है तो धीरे-धीरे आहार का त्याग करते-करते समाधि संलेखना ली जाती है ।संलेखना भी दो तरह की हुआ करती है एक काय संल्लेखना और कषाय संल्लेखना। संल्लेखना का अर्थ क्रश करना होता है शरीर को धीरे-धीरे क्रश किया जाता है। उसके प्रति जो ममत्व भाव होता है उसका भी परिहार किया जाता है ।इसको कषाय संलेखना के अंतर्गत लेते हैं गुरुदेव ने एक बार कहा था एक बार क्या कई बार कहा स्वाध्याय के दौरान प्रसंग बनाया है वह यह है साधक जिस दिन से दीक्षित होता है या व्रत को अंगीकार करता है उसी दिन से वह कषाय को क्षीण करता चला जाता है तब कहीं जाकर उसकी कषाय संलेखना पूर्ण होती है।</p>
<p>क्योंकि कषाय को राग द्वेष की निवृत्ति को ही चारित्रको अंगीकार किया जाता है ।चारित्र को अंगीकार करने के उपरांत भी यदि राग द्वेष का श्रमण नहीं होता तो काय संल्लेखना नहीं मानी जाती है।इसलिए हमें हमेशा गुरुदेव का कहना है अलर्ट रहना चाहिए जीवन चला जा रहा है एक-एक होते समाप्त होता जा रहा है। इसलिए संल्लेखना का अर्थ मरण होता है। इस अवसर पर कुंडलपुर क्षेत्र कमेटी के पदाधिकारी सदस्यों ने भी विनयांजलि प्रस्तुत की।</p>
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		<title>धर्मसभा में दिए प्रवचन : णमोकार मंत्र का एक पद का भी उच्चारण करते-करते अज्ञान दशा में अर्जित पाप धुल सकता है &#8211; आचार्य श्री समयसागर  </title>
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		<pubDate>Mon, 08 Jul 2024 06:13:53 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[सुप्रसिद्ध सिद्ध क्षेत्र कुंडलपुर में युगश्रेष्ठ संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य पूज्य आचार्य श्री समय सागर जी महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा मोक्ष मार्ग पर चलने वाले साधक हुआ करते हैं। श्रमण हुआ करते हैं वे अपने जीवन में रत्नत्रय की आराधना करते हुए दीर्घकाल व्यतीत करते [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>सुप्रसिद्ध सिद्ध क्षेत्र कुंडलपुर में युगश्रेष्ठ संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य पूज्य आचार्य श्री समय सागर जी महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा मोक्ष मार्ग पर चलने वाले साधक हुआ करते हैं। श्रमण हुआ करते हैं वे अपने जीवन में रत्नत्रय की आराधना करते हुए दीर्घकाल व्यतीत करते है। रत्नत्रय की आराधना के फल स्वरूप उन्हें अनेक प्रकार की ऋद्धियां भी प्राप्त हो जाती हैं। <span style="color: #ff0000">पढ़िए राजीव सिंघई मोनू की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>कुंडलपुर (दमोह) ।</strong> सुप्रसिद्ध सिद्ध क्षेत्र कुंडलपुर में युगश्रेष्ठ संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य पूज्य आचार्य श्री समय सागर जी महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा मोक्ष मार्ग पर चलने वाले साधक हुआ करते हैं। श्रमण हुआ करते हैं वे अपने जीवन में रत्नत्रय की आराधना करते हुए दीर्घकाल व्यतीत करते है। रत्नत्रय की आराधना के फल स्वरूप उन्हें अनेक प्रकार की ऋद्धियां भी प्राप्त हो जाती हैं। अवध ज्ञान भी प्राप्त हो सकता है मन: पर्याय ज्ञान भी प्राप्त हो सकता है उन ऋद्धियों के प्रति अवध ज्ञान, मन: पर्याय ज्ञान आदि जो क्षयोपशम ज्ञान है उनकी दृष्टि नहीं जाती किंतु उनकी दृष्टि मात्र रत्नात्रय की ओर जाती है मोक्ष का जो मार्ग है वह ऋद्धि संपन्न जो श्रमण होते हैं उन्हीं के लिए मोक्ष मार्ग बनता है ऐसा नहीं ।मोक्ष मार्ग में यह सारे के सारे सहायक तत्व नहीं है सहायक कोई है तो रत्नत्रय की आराधना है ।</p>
<p>और वे रत्नत्रय की आराधना करते हुए पंच परमेष्ठी को भूलते नहीं णमोकार मंत्र का उच्चारण उनके मुख से भी निकलता है। आपने प्रथमानुयोग आदि ग्रंथों में प्रसंग सुना होगा एक ग्वाला है ग्वाला गायों का चराने वाले को बोलते ।दिनभर गायों को चराकर दिन अस्त होने को है और घर लौट रहा है ।किंतु समय कौन सा था शीतकालीन वह समय है कड़ाके की ठंड पड़ रही है ठंडी लहर चल रही है और वह घर की ओर लौट रहा है बीच में एक दृश्य देखने को मिल रहा है वह दृश्य कौन है एक मुनि महाराज जो ध्यान में लीन है नदी के किनारे हैं और जंगल में है चारों ओर वहां पेड़ पौधे हैं वह ग्वाला सोच रहा है कंबल भी ओड़ रखा है मैंने इसके उपरांत भी शीत का निवारण नहीं हो पा रहा है और यह साधु खड़े हैं दिगंबर हैं बदन पर वस्त्र नहीं है ।</p>
<p>इसके उपरांत शीत का प्रतिकार कौन कर सकता है कब तक खड़े रहेंगे बैठेंगे क्या कोई अनुमान नहीं है। संभव है रात भर खड़े हो जाए ऐसा सोचकर वह विचार करता है उनके लिए क्या कर सकता हूं। मेरे पास कंबल है उड़ा नहीं सकता हूं साधू है। सूखी लकड़ी है जो जंगल में उनको एकत्रित करके जला दी अग्नि जला दी चारों ओर ।वह सोचता में भी इस अग्नि के माध्यम से शीत का निवारण कर लूं ।रात भर सेवा में है वह ग्वाला सोचता कुछ मिल जाएगा। प्रातः ध्यान से उठेंगे तो हमारे लिए कुछ शब्द सुनने मिलेंगे। हमारे लिए कुछ मार्ग उनके द्वारा प्राप्त हो जाएगा ।वह प्रतीक्षा में है और प्रातः होते ही वह मुनिराज ऋद्धि संपन्न थे चरण रिद्धि प्राप्त थी ।ग्वाले ने कहा हमारे लिए कुछ प्रसाद दे दो मैं भी अपने जीवन का कल्याण कर सकूं अच्छे ढंग से जीवन यापन कर सकूं।</p>
<p>तो उन्होंने कहा णमो अरहंताणं उच्चारण कर लिया और आकाश मार्ग से अदृश्य हो गए। पूरा णमोकार मंत्र भी नहीं मिला ।वह ग्वाला णमो अरहंताणं का उच्चारण करता रहा और सुनने में आया सुदर्शन सेठ हुआ। इधर हम एक करोड़ जाप कर रहे जाप करते हमारा उपयोग पंच परमेष्ठि में जाना चाहिए यह आस्था का विषय है ज्ञान नहीं है हम ज्ञान की बात करना चाहते समर्पण नहीं है। जो समर्पित हो जाता णमो अरहंताणं एक पद भी पर्याप्त है क्योंकि उसके उच्चारण करते-करते अज्ञान दशा में अर्जित जो पाप है वह धुल सकता है ।भावपूर्ण उच्चारण किया हो तो। इस प्रकार प्रथमानुयोग ग्रन्थो में प्रसंग मिलते हैं ।सुनकर विस्मय होता एक सेकंड नहीं लगता विकास प्रारंभ हो जाता है।</p>
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		<title>एमडी जैन इंटर कॉलेज हरीपर्वत में आयोजन : विनयांजलि सभा में गुरुभक्तों ने किया गणाचार्य श्री को नमन </title>
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		<pubDate>Sun, 07 Jul 2024 09:52:04 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[ राष्ट्रसंत भारत गौरव गणाचार्य, बुन्देलखण्ड के प्रथमाचार्य, युग प्रतिक्रमण प्रवर्तक उपसर्ग विजेता, महासंघगणनायक गणाचार्य श्री विराग सागरजी महामुनिराज की महासमाधि 4 जुलाई गुरुवार (चतुर्दशी) प्रात: 2:30 बजे जालना महाराष्ट्र के नजदीक देवमूर्ति ग्राम हो गयो गणाचार्यश्री के देवलोक गमन से आगरा सकल जैन समाज में शोक का माहौल बना हुआ है। पढ़िए शुभम जैन की [&#8230;]]]></description>
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<p><strong> राष्ट्रसंत भारत गौरव गणाचार्य, बुन्देलखण्ड के प्रथमाचार्य, युग प्रतिक्रमण प्रवर्तक उपसर्ग विजेता, महासंघगणनायक गणाचार्य श्री विराग सागरजी महामुनिराज की महासमाधि 4 जुलाई गुरुवार (चतुर्दशी) प्रात: 2:30 बजे जालना महाराष्ट्र के नजदीक देवमूर्ति ग्राम हो गयो गणाचार्यश्री के देवलोक गमन से आगरा सकल जैन समाज में शोक का माहौल बना हुआ है। <span style="color: #ff0000">पढ़िए शुभम जैन की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>आगरा।</strong> राष्ट्रसंत भारत गौरव गणाचार्य, बुन्देलखण्ड के प्रथमाचार्य, युग प्रतिक्रमण प्रवर्तक उपसर्ग विजेता, महासंघगणनायक गणाचार्य श्री विराग सागरजी महामुनिराज की महासमाधि 4 जुलाई गुरुवार (चतुर्दशी) प्रात: 2:30 बजे जालना महाराष्ट्र के नजदीक देवमूर्ति ग्राम हो गयो गणाचार्यश्री के देवलोक गमन से आगरा सकल जैन समाज में शोक का माहौल बना हुआ है।आचार्य श्री को नमन करने के उद्देश्य से 6 जुलाई को मुनि श्री शिवदत्तसागर जी महाराज एवं मुनिश्री विदम्बरसागर जी महाराज ससंघ के सानिध्य एवं आगरा दिगंबर जैन परिषद एवं श्री दिगंबर जैन शिक्षा समिति,सकल दिगंबर जैन समाज आगरा के तत्वावधान में आगरा के हरी पर्वत स्थित श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर के आचार्य शांतिसागर सभागार में विनयांजलि सभा आयोजित की गई। विनयांजलि सभा का शुभारंभ विमल जैन मारसंस ने समाधिस्थ आचार्य श्री विरागसागर जी महाराज के चित्र के समक्ष दीप प्रज्ज्वलन के साथ किया। विनयांजलि का मंगलाचरण उषा जैन मारसंस ने किया। दीप प्रज्वलन के बाद आगरा जैन समाज के प्रबुद्ध जन ने अपनी ओर से विनयांजलि देते हुए कहा कि आचार्य श्री की समाधि के बाद जैन संस्कृति श्रमण परंपरा का एक और सूर्य अस्त हो गया। विद्या युग के बाद विराग युग का भी अंत हुआ।</p>
<p>सौभाग्य की बात है कि हम व पीढ़ी में जन्मे हैं जिसे आचार्य विद्यासागर जी और गणाचार्य आचार्य श्री विराग सागर जी का स्वर्णिम युग प्राप्त हुआ था। इसके बाद बड़ी संख्या में महिलाओं एवं पुरुषों ने गणाचार्यश्री को शत-शत नमन करते हुए श्रद्धांजलि अर्पित की।</p>
<p><strong><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-63072" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/07/IMG-20240707-WA0032.jpg" alt="" width="1600" height="1066" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/07/IMG-20240707-WA0032.jpg 1600w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/07/IMG-20240707-WA0032-300x200.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/07/IMG-20240707-WA0032-1024x682.jpg 1024w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/07/IMG-20240707-WA0032-768x512.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/07/IMG-20240707-WA0032-1536x1023.jpg 1536w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/07/IMG-20240707-WA0032-414x276.jpg 414w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/07/IMG-20240707-WA0032-470x313.jpg 470w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/07/IMG-20240707-WA0032-640x426.jpg 640w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/07/IMG-20240707-WA0032-130x86.jpg 130w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/07/IMG-20240707-WA0032-187x124.jpg 187w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/07/IMG-20240707-WA0032-990x660.jpg 990w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/07/IMG-20240707-WA0032-1320x879.jpg 1320w" sizes="auto, (max-width: 1600px) 100vw, 1600px" />सामूहिक रूप से किया नमन</strong></p>
<p>इस विनयांजलि सभा में संगीत दीपक जैन ने दिया। विनयांजलि सभा में गुरुवर के चरणों में श्रद्धा सुमन अर्पित करने आये। श्री दिगंबर जैन शिक्षा समिति के अध्यक्ष प्रदीप जैन पीएनसी ने कहा कि गुरुवर इतनी कम उम्र में देवलोक गमन को चले जाएंगे। ऐसा हमने नहीं सोचा था गुरुवर ने अपने जीवन में 500 से ज्यादा मुनियों को दीक्षा दी। आगरा दिगंबर जैन परिषद के अध्यक्ष जगदीश प्रसाद जैन द्वारा विनयांजलि समर्पित करते हुआ कहा की जैन धर्म के सबसे बड़े महासंत गणाचार्यश्री विरागसागर जी महाराज के ब्रह्मलीन होने की खबर न सिर्फ जैन समाज के लिए बल्कि देश और दुनिया के लिए अपूरणीय क्षति है। आचार्य श्री के चरणों में शत शत नमन करता हूं। गणाचार्यश्री के प्रेरणा संदेश सम्पूर्ण मानवजाति के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करते रहेंगे। विनयांजलि सभा में गुरुवर को श्रद्धा सुमन अर्पित कर रहे आगरा दिगंबर जैन परिषद के महामंत्री सुनील जैन ठेकेदार ने कहा कि राष्ट्रसंत गणाचार्य श्री विरागसागर जी महाराज का ताजनगरी मे कई बार आगमन हुआ। ताजनगरी के भक्तों से गुरुवर का काफी लगाव था। प्राप्त जानकारी के अनुसार बुंदेलखंड के प्रथम दिगंबराचार्य विराग सागर महाराज का जन्म मध्य प्रदेश के सागर जिले में ग्राम पथरिया में 02 मई 1963 में श्रावक श्रेष्ठी कपूरचंद श्यामा देवी जैन के परिवार में हुआ था। आपका गृहस्थ अवस्था का नाम अरविंद जैन था। आपकी क्षुल्लक दीक्षा 02 फरवरी 1980 को बुढ़ार जिला शहडोल में आचार्य श्री सन्मति सागर महाराज के करकमलों द्वारा हुई थी। आपको मुनि दीक्षा 09 दिसंबर 1986 को महाराष्ट्र के औरंगाबाद में आचार्य श्री विमलसागर जी महाराज के द्वारा प्रदान की गई।</p>
<p>सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार आचार्य श्री का 2024 का पावन वषार्योग महाराष्ट्र के जालना में होना था|जिसके लिए वे अपने शिष्यों के साथ पद विहार कर रहे।आचार्य श्री विरागसागर जी महाराज ने अपने संयमी जीवनकाल में 350 से अधिक दीक्षाएं प्रदान कीं। आपके दीक्षित मुनि, आर्यिकांए पूरे विश्व में अहिंसा, शाकाहार और जैन धर्म के सिद्धांतो का प्रचार प्रसार कर रहे हैं।आपने अनेकों पुस्तकों का लेखन किया साथ ही अनेकों शास्त्रों की टीकाएं लिखी। मुनिश्री विदम्बर सागर जी महाराज ने कहा कि मेरे आचार्य भगवन ने बहुत पुस्तक लिखी और 150 से ज्यादा समाधि कराई। इसी के साथ संघस्थ मुनिश्री जिनदत्तसागर जी,मुनिश्री पदमदत्त सागर जी महाराज ने अपनी विनयजंलि पूज्य गणाचार्यश्री विरागसागर जी को समर्पित की। विनयांजलि सभा के अंत में सभी गुरुभक्तों ने णमोकार मंत्र का जाप कर सामूहिक रुप से गुरुदेव को नमन किया। विनयांजलि सभा का संचालन आगरा दिगम्बर जैन परिषद के प्रवक्ता मनोज जैन बाकलीवाल ने किया। इस विनयांजलि सभा में आगरा दिगंबर जैन परिषद के अध्यक्ष जगदीश प्रसाद जैन महामंत्री सुनील जैन ठेकेदार अर्थमंत्री राकेश जैन पर्देवाले, प्रदीप जैन पीएनसी, शिखर जैन सिंघई,अनंत कुमार जैन, डॉक्टर जितेंद्र जैन, राजेंद्र जैन एडवोकेट, दिलीप जैन, उपाध्यक्ष महिपाल जैन, सतीश जैन,अशोक जैन, अनिल जैन, प्रवीण जैन नेताजी, पवन जैन, मीडिया प्रभारी शुभम जैन, अमित जैन, राजकुमार गुड्डू, मुकेश जैन रपरिया, सचिन जैन सहित समस्त आगरा सकल जैन समाज के लोग बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।</p>
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		<title>गणाचार्य विरागसागर महाराज का समाधिमरण : विनयांजलि सभा में गुरुदेव के संस्मरण सुना किया भाव विभोर </title>
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		<pubDate>Sat, 06 Jul 2024 03:37:20 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[नेमिनगर जैन कॉलोनी में परम पूज्य गणाचार्य विराग सागर जी महा मुनिराज की समाधि मरण होने पर विनयांजलि आयोजित की गई। सभा का संचालन करते हुए समाज मंत्री गिरीश पाटोदी ने गुरुदेव के संस्मरण सुनाते हुए कहा कि 18 फरवरी को विद्या नामक सूर्य का अस्त हुआ और 4 जुलाई को विराग नामक चन्द्र का [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>नेमिनगर जैन कॉलोनी में परम पूज्य गणाचार्य विराग सागर जी महा मुनिराज की समाधि मरण होने पर विनयांजलि आयोजित की गई। सभा का संचालन करते हुए समाज मंत्री गिरीश पाटोदी ने गुरुदेव के संस्मरण सुनाते हुए कहा कि 18 फरवरी को विद्या नामक सूर्य का अस्त हुआ और 4 जुलाई को विराग नामक चन्द्र का भी विलय हो गया। <span style="color: #ff0000">पढ़िए यह रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> नेमिनगर जैन कॉलोनी में परम पूज्य गणाचार्य विराग सागर जी महा मुनिराज की समाधि मरण होने पर विनयांजलि आयोजित की गई। सभा का संचालन करते हुए समाज मंत्री गिरीश पाटोदी ने गुरुदेव के संस्मरण सुनाते हुए कहा कि 18 फरवरी को विद्या नामक सूर्य का अस्त हुआ और 4 जुलाई को विराग नामक चन्द्र का भी विलय हो गया। एक सूर्य थे तो एक चन्द्र, क्योंकि जिस भांति सूर्य अपने प्रकाश से सबको आलौकित करता है, उसी भांति चन्द्र भी अपने प्रकाश से सबको आन्दोलित करता है&#8230;.</p>
<p><strong>ये कैसा अद्भुत संयोग ??</strong></p>
<p>1. सूर्य का उदय दक्षिण में हुआ तो अस्त उत्तर में और चन्द्र का निलय उत्तर में हुआ तो विलय दक्षिण में हुआ ।</p>
<p>2. दोनों की नाम राशि &#8216;वि&#8217;</p>
<p>3. एक ने अष्टमी को महाप्रयाण किया तो एक ने चतुर्दशी को ! धन्य हैं आप दोनों युगल श्रमण &#8211; जिन्होंने अत्यन्त उत्तम समाधि मरण कर इन दोनों शुभ तिथियों को और भी शुभमय कर दिया ।</p>
<p>4. सूर्य रूपी गुरु का अस्त रवि (सूर्य) के दिन रविवार को अस्त हुआ और चन्द्र रूपी गुरु का अस्त गुरु के दिन गुरुवार को अस्त हुआ ।</p>
<p>5. दोनों ही महान आत्माओं का समाधि मरण रात्रि के 2.30 बजे जे हुआ।</p>
<p>विनयांजलि सभा में कई वक्ताओं ने अपने संस्मरण सुनाए। प्रवीण पाटनी, इन्द्र कुमार सेठी ने गुरुदेव के नेमिनगर प्रवास के वक्त के कई संस्मरण बताये। प्रतिभा अजमेरा, सुनीता पाटनी, मनी अजमेरा, उर्मिला दोषी, रश्मि गांधी, मधु जैन, निर्मला पाटोदी तथा कौशल्या पतंगिया जी ने गुरुदेव के वात्सल्य को विस्तार से बताया।</p>
<p>समाज अध्यक्ष कैलाश लुहाड़िया गुरुदेव के प्रवचन शैली तथा नेमिनगर प्रवास के दौरान आहार आदि की बातें बतायी और कहा कि गुरुदेव जहां भी जाते वहां समवशरण लग जाया करता था। करीब 84 पिच्छी जैन कॉलोनी में विराजित हुई थी। सुदर्शन जटाले, राजेश बज, राजेंद्र जैन, बांझल, सिद्धार्थ नगर, ज्योति जैन, मनाली भूता, प्रमोदिनी जैन, निर्मला जैन, डा संगीता जैन, श्रीमती टोंगिया, सुनीता अजय जैन, कुसुम गंगवाल, ज्योति कोशल जैन, उषा कासलीवाल, शशि बहन, शिरोमणि पाटनी, श्रीमती पहाड़िया, हीरामणि पाटनी, सनत गंगवाल, संदीप गंगवाल, मंजु गुना, कृष्णा टोंगिया, आदि समाज जन उपस्थित थे। अंत में शांति पाठ किया गया।</p>
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		<title>गणाचार्य विरागसागर महाराज का समाधिमरण : समाजजनों ने अपनी विनयांजलि की समर्पित </title>
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		<pubDate>Sat, 06 Jul 2024 03:32:09 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[ जैन धर्म के प्रचार के लिए सदैव धर्म की पताका फहराने वाले आचार्य श्री 108 विराग सागर जी महाराज के समाधि मरण के समाचार ने सम्पूर्ण जैन समाज को स्तब्ध कर दिया। सन्मति जैन काका ने बताया कि इस अवसर पर श्री दिगंबर जैन पार्श्वनाथ बड़ा मंदिर जी में सभी समाजजनों ने मंदिर जी में [&#8230;]]]></description>
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<p><strong> जैन धर्म के प्रचार के लिए सदैव धर्म की पताका फहराने वाले आचार्य श्री 108 विराग सागर जी महाराज के समाधि मरण के समाचार ने सम्पूर्ण जैन समाज को स्तब्ध कर दिया। सन्मति जैन काका ने बताया कि इस अवसर पर श्री दिगंबर जैन पार्श्वनाथ बड़ा मंदिर जी में सभी समाजजनों ने मंदिर जी में णमोकार महामंत्र का जाप किया। <span style="color: #ff0000">पढ़िए सन्मति जैन की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>सनावद।</strong> जैन धर्म के प्रचार के लिए सदैव धर्म की पताका फहराने वाले आचार्य श्री 108 विराग सागर जी महाराज के समाधि मरण के समाचार ने सम्पूर्ण जैन समाज को स्तब्ध कर दिया। सन्मति जैन काका ने बताया कि इस अवसर पर श्री दिगंबर जैन पार्श्वनाथ बड़ा मंदिर जी में सभी समाजजनों ने मंदिर जी में णमोकार महामंत्र का जाप किया। तत्पश्चात भक्तामर जी पाठ किया गया। अंत अनुभव जैन ने आचार्य श्री के प्रति अपनी विनयांजलि प्रकट करते हुुए कहा कि आज 4 माह में जैन जगत के लिए दो बड़ी क्षति हुई हैं।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-63003" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/07/IMG-20240706-WA0001.jpg" alt="" width="1600" height="720" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/07/IMG-20240706-WA0001.jpg 1600w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/07/IMG-20240706-WA0001-300x135.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/07/IMG-20240706-WA0001-1024x461.jpg 1024w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/07/IMG-20240706-WA0001-768x346.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/07/IMG-20240706-WA0001-1536x691.jpg 1536w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/07/IMG-20240706-WA0001-990x446.jpg 990w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/07/IMG-20240706-WA0001-1320x594.jpg 1320w" sizes="auto, (max-width: 1600px) 100vw, 1600px" />पहले आचार्य श्री विद्या सागर जी महाराज और अब आचार्य विराग सागर जी महाराज की जालना (महाराष्ट्र)शहर के नजदीक देवमूर्ति ग्राम, सिंदखेडा राजा रोड पर समाधि हुई है। असामायिक समाधि का समाचार समाज के लिए बहुत ही स्तब्ध करने वाला है। प्रशांत जैन अपने भाव प्रकट करते हुए बताया कि सनावद नगरी में आज से 11 वर्ष पूर्व वर्ष 2013 में सब से बड़े महासंघ (78पिच्छी) के साथ आप पावागिरि ऊन से सिद्ध क्षेत्र सिद्धवरकुट की ओर विहार करते समय सनावद में अल्प प्रवास कर के आप ने अपनी ओजस्वी वाणी से सभी को कृतार्थ किया था एवं आहार करवाने का सौभाग्य दिया था।</p>
<p>पंडित अचित्य जैन ने आचार्य श्री के जीवन पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आचार्य श्री बहुत सरल सहज व ज्ञान की खान थे। उन्होंने अनेक ग्रंथो ने रचना की जो के समाज के लिए बहुत ही लाभकारी सिद्ध हो रहे हैं। आप ने अपने जीवन काल में 9 आचार्य पद प्रदान किए। आप के सभी शिष्य आज जैन समाज के लिए धर्म के प्रभावना में सहभागिता कर रहे हैं।</p>
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		<title>सहा नहीं गया गुरु का वियोग, रो पड़ा शिष्यों का हृदय : श्रमण संस्कृति में गुरुवर विरागसागर जी की आदर्श समाधि -आचार्य विमर्शसागर  </title>
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		<pubDate>Fri, 05 Jul 2024 16:23:38 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[देशभर में विराजमान महा संत के 500 शिष्याओं ने अपने गुरुदेव के चरणों में विनयांजलि द्वारा अपने भाव सुमन अर्पित किए गर्णाचार्य श्री के सुयोग शिष्यों में भावलिंगी संत आचार्य श्री विमर्श सागर जी महामुनिराज &#8221; जीवन है पानी की बूंद&#8221; महाकाव्य के मूल रचिता के रूप में विख्यात हैं पढ़िए मनोज जैन नायक की [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>देशभर में विराजमान महा संत के 500 शिष्याओं ने अपने गुरुदेव के चरणों में विनयांजलि द्वारा अपने भाव सुमन अर्पित किए गर्णाचार्य श्री के सुयोग शिष्यों में भावलिंगी संत आचार्य श्री विमर्श सागर जी महामुनिराज &#8221; जीवन है पानी की बूंद&#8221; महाकाव्य के मूल रचिता के रूप में विख्यात हैं <span style="color: #ff0000">पढ़िए मनोज जैन नायक की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>दिल्ली।</strong> सहा नहीं गया गुरु का वियोग रो पड़ा शिष्यों का हृदय ,आंखें हो गई सजल, छलक पड़ी आंखों से अश्व धारा जब विशाल चतुर्विध संघ महानायक 500 से 530 पिच्छी धारी साधु संतों के महागुरु परम पूज्य शुद्धउपयोगी संत श्री गर्णाचार्य सुरिगच्छचार्य गुरुदेव श्री 108 विराग सागर जी महामुनिराज का संल्लेखना समाधि मरण का समाचार सुना। महाराष्ट्र प्रांत के जालना नगर में रात्रि 2:30 पर पूर्णता जागृत एवं सचेत अवस्था में मुनि वृंदों के मध्य महामंत्र णमोकार का स्मरण करते-करते इस युग के महासंघ गर्णाचार्य विराग सागर जी महामुनिराज का देवलोक गमन हुआ। रात्रि में ही यह समाचार संपूर्ण भारतवर्ष हवा की तरह प्रसारित हो गया। प्रात काल का सूर्योदय होते-होते लाखों की संख्या में श्रद्धालु, भक्तगण अंतिम गुरु दर्शन के लिए पहुंचने लगे थे।</p>
<p>4 जुलाई की मध्यान्ह वेला में संपूर्ण जैन विधि विधान के अनुसार महा संत के पार्थिव शरीर को मुखाग्नि दी गई। देशभर में विराजमान महा संत के 500 शिष्याओं ने अपने गुरुदेव के चरणों में विनयांजलि द्वारा अपने भाव सुमन अर्पित किए गर्णाचार्य श्री के सुयोग शिष्यों में भावलिंगी संत आचार्य श्री विमर्श सागर जी महामुनिराज &#8221; जीवन है पानी की बूंद&#8221; महाकाव्य के मूल रचिता के रूप में विख्यात है।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-62998" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/07/IMG-20240705-WA0021.jpg" alt="" width="852" height="1280" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/07/IMG-20240705-WA0021.jpg 852w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/07/IMG-20240705-WA0021-200x300.jpg 200w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/07/IMG-20240705-WA0021-682x1024.jpg 682w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/07/IMG-20240705-WA0021-768x1154.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 852px) 100vw, 852px" /> विहार के दौरान जब आचार्य श्री को अपने गुरुदेव के वियोग का समाचार ज्ञात हुआ, तब आचार्य श्री के संपूर्ण संघ की आंखें नम हो गईं। तत्काल आचार्य श्री ने अपनी संघस्थ शिष्य बाल ब्रह्मचारिणी विशू दीदी सहित सभी त्यागी व्रतियों को अपने गुरुदेव के अंतिम दर्शन के लिए प्रस्थान करवा दिया।</p>
<p><strong>अर्पित किए भाव सुमन</strong></p>
<p>4 जुलाई की प्रातः बेला में आचार्य श्री ससंघ पश्चिमी दिल्ली नफजगड़ में स्थित जैन तीर्थ भरत क्षेत्रम पहुंचे वहां विशाल विनयांजलि सभा में आचार्य श्री विमर्श सागर जी महामुनिराज ने अपने गुरुवर महासंघ गर्णाचार्य श्री विराग सागर जी महामुनिराज के चरणों में भाव श्रद्धा सुमन समर्पित करते हुए कहा कि हमारे गुरुवर एक दूरदर्शी विचारधारा धारण करने वाले महान आचार्य थे गुरुदेव ने अपने साधना काल के प्रत्येक कार्य सोच समझकर एवं आगम आज्ञा पूर्वक संपादित किए हैं। आज जो यह समाचार प्राप्त हुआ है। इस भवितव्यता से भी गुरुदेव पूर्व से ही परिचित थे इसी कारण उन्होंने समय से पूर्वी अपने पद व जिम्मेदारियां को त्याग दिया था वह पूर्णता हल्के होकर उध्वरलोक में गए हैं अतः निश्चित थी उपरिम स्वर्ग में गुरुदेव ने जन्म प्राप्त किया होगा मुझे याद आ रही है वे वात्सल्य भरे छण जो मैंने गुरुदेव के चरणों में उनकी गोद में सिर रखकर बिताए थे गुरुदेव हमारे बीच नहीं रहे लेकिन वह हमारे साथ और हरदम हमारे पास में रहेंगे। जन समुदाय के बीच नफजगढ़ जैन समाज के आग्रह पर आचार्य श्री विमर्श सागर जी ने कहा 4 जुलाई आचार्य श्री विराग सागर जी महाराज का समाधि दिवस &#8220;अहिंसा शाकाहार दिवस&#8221; के रूप में मनाया जाए यही मेरा मंगल आशीर्वाद है।</p>
<p><strong>विशाल विनयांजलि सभा सात को</strong></p>
<p>7 जुलाई को पश्चिमी दिल्ली संभाग के 29 जैन मंदिरों के समस्त पदाधिकारी गणों के आग्रह पर आचार्य श्री विमर्श सागर जी ससंघ सानिध्य में सेक्टर 10 के सभा मंडप में गर्णाचार्य श्री विराग सागर जी महामुनिराज के सर्वोत्तम समाधि मरण के अवसर पर विशाल विन्यांजलि सभा आयोजित की जा रही है 7 जुलाई की प्रातः वेला में जिन मंदिर का शिलान्यास तथा उसी दिन संध्या बेला में विशाल विन्यांजलि सभा में हजारों की संख्या में श्रद्धालु गण आचार्य श्री के चरणों में अपने भाव, श्रद्धा सुमन अर्पित करेंगे। इस अवसर पर उपाध्यक्ष श्री विशोक सागर जी महामुनिराज भी मौजूद रहेंगे।</p>
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