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	<title>ज्योतिषाचार्य डॉ. हुकुमचंद जैन &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>अक्षय तृतीया एवं परशुराम जयंती 19 अप्रैल को : तीर्थंकर ऋषभदेव आहार दिवस मनाया जाएगा  </title>
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		<pubDate>Tue, 14 Apr 2026 06:22:12 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[अक्षय का अर्थ पूर्णता से है, न तो वो मिटता है, न हटता है, न ही बिखरता है अर्थात पूर्ण फल प्राप्ति होती हैं। ऐसी तिथि वर्ष में केवल एक बार ही आती है। उसे अक्षय तृतीया के नाम से जाना जाता है। वरिष्ठ ज्योतिषाचार्य डॉ. हुकुमचंद जैन ने बताया कि वैशाख माह शुक्ल पक्ष [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>अक्षय का अर्थ पूर्णता से है, न तो वो मिटता है, न हटता है, न ही बिखरता है अर्थात पूर्ण फल प्राप्ति होती हैं। ऐसी तिथि वर्ष में केवल एक बार ही आती है। उसे अक्षय तृतीया के नाम से जाना जाता है। वरिष्ठ ज्योतिषाचार्य डॉ. हुकुमचंद जैन ने बताया कि वैशाख माह शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को ही अक्षय तृतीया तिथि नाम से जाना जाता है। <span style="color: #ff0000">मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना।</strong> अक्षय का अर्थ पूर्णता से है, न तो वो मिटता है, न हटता है, न ही बिखरता है अर्थात पूर्ण फल प्राप्ति होती हैं। ऐसी तिथि वर्ष में केवल एक बार ही आती है। उसे अक्षय तृतीया के नाम से जाना जाता है। वरिष्ठ ज्योतिषाचार्य डॉ. हुकुमचंद जैन ने बताया कि वैशाख माह शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को ही अक्षय तृतीया तिथि नाम से जाना जाता है। यह इस बार 19 अप्रैल रविवार के दिन है। इस बार तृतीया तिथि का प्रारंभ 19 अप्रैल को सुबह 10.49 बजे होगा। इसका समापन 20 अप्रैल को प्रातः 7.27 बजे होगा। इसी दिन परशुराम जयंती एवं जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभ देव जी का आहार दिवस भी पारंपरिक श्रद्धा और भक्ति से मनाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि श्री परशुराम जी का जन्म प्रदोष काल में वैशाख तृतीया तिथि में हुआ था। प्रदोष काल युक्त तृतीया 19 अप्रैल रविवार को ही है। अक्षय तृतीया का पूजा मुहूर्त इस बार रविवार सुबह 10.49 से प्रारंभ होकर 12.20 बजे तक रहेगा।</p>
<p>जैन ने बताया कि इस दिन का किया हुआ तप, दान अक्षय फलदायक होता हैं। वैदिक ज्योतिष में भी अक्षय तृतीया को सभी अशुभ प्रभावों से मुक्त एक शुभ दिन मानते हैं। पंचांग के अनुसार विवाह, गृह प्रवेश, भूमि पूजन, वाहन, प्रॉपर्टी, मकान, सोना, चांदी आदि खरीदने के लिए इस दिन किसी प्रकार के मुहूर्त की जरूरत नहीं होती। इस लिए किसी भी कार्य के आरंभ के लिए यह दिन अबूझ मुहूर्त कहलाता है अर्थात किसी से पंचांग से मुहूर्त पूछ ने की जरूरत नहीं होती।</p>
<p><strong>अक्षय तृतीया पर दान का अक्षय महत्व </strong></p>
<p>अक्षय तृतीया को पंखा, चावल, नमक, घी, चीनी, सब्जी, फल, इमली एवं वस्त्रों का वृतार्थी को दान अवश्य करना चाहिए। इस दिन बद्रीनाथ मंदिर के पट भी खुलते हैं। कुछ श्रद्धालु इस दिन पवित्र नदी या गंगा जी में स्नान करके गेहूं, चने, सत्तू, दही-चावल, गन्ने का रस, मिष्ठान्न आदि दान करते हैं। जैन धर्म में भी अक्षय तृतीया का विशेष महत्व है। जैन शास्त्रों के अनुसार जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभ देव जी को दीक्षा लेने के बाद 6 माह तक नवधा भक्तिपूर्वक आहार की विधि नहीं मिल सकी थी। तब हस्तिनापुर के राजा श्रेयांश को रात्रि स्वप्न आया तब राजा श्रेयांश कुमार ने गन्ने के रस का प्रथम आहार वैशाख शुक्ल तृतीया के दिन भगवान ऋषभ देव जी को इसी दिन दिया था। तब से इस दिन को जैन धर्मावलंबी बड़े धूमधाम से मनाते हैं।</p>
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		<title>जानिए क्या कहते हैं सितारे : वर्ष विक्रम संवत् 2083 का देश-दुनिया पर पड़ेगा बड़ा असर </title>
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		<pubDate>Fri, 20 Mar 2026 08:50:09 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[किसी भी वर्ष का फल नव संवत्सर के दशाधिकारियों की स्थिति, वर्ष के चार स्तंभ, वर्ष लग्न प्रवेश आदि के आधार पर जाना जा सकता है। वरिष्ठ ज्योतिषाचार्य डॉ. हुकुमचंद जैन ने बताया कि इस वर्ष विक्रम संवत्सर का नाम ‘रौद्र’ है। रौद्र संवत्सर में अनेक देशों के प्रमुखों के बीच आपसी क्लेश, क्षोभ एवं [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>किसी भी वर्ष का फल नव संवत्सर के दशाधिकारियों की स्थिति, वर्ष के चार स्तंभ, वर्ष लग्न प्रवेश आदि के आधार पर जाना जा सकता है। वरिष्ठ ज्योतिषाचार्य डॉ. हुकुमचंद जैन ने बताया कि इस वर्ष विक्रम संवत्सर का नाम ‘रौद्र’ है। रौद्र संवत्सर में अनेक देशों के प्रमुखों के बीच आपसी क्लेश, क्षोभ एवं समस्त प्राणियों में आपसी तनाव बना रहता है। <span style="color: #ff0000">पढ़िए मनोज जैन नायक की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना (मनोज जैन नायक)</strong>। किसी भी वर्ष का फल नव संवत्सर के दशाधिकारियों की स्थिति, वर्ष के चार स्तंभ, वर्ष लग्न प्रवेश आदि के आधार पर जाना जा सकता है।</p>
<p>वरिष्ठ ज्योतिषाचार्य डॉ. हुकुमचंद जैन ने बताया कि इस वर्ष विक्रम संवत्सर का नाम ‘रौद्र’ है। रौद्र संवत्सर में अनेक देशों के प्रमुखों के बीच आपसी क्लेश, क्षोभ एवं समस्त प्राणियों में आपसी तनाव बना रहता है। वर्षा मध्यम होती है। रौद्र वर्ष के स्वामी चंद्र हैं, जिससे बीमारियाँ अधिक होती हैं और अधिकारी वर्ग भी परेशान रहता है। आषाढ़ एवं श्रावण मास में अल्प वर्षा, भाद्र मास में अधिक वर्षा तथा बाढ़ से जन-धन की हानि होने की संभावना रहती है।</p>
<p><strong>दशाधिकारियों के फल</strong></p>
<p>वर्ष का राजा गुरु होने से समाज में लोग धर्म कार्यों में संलग्न रहेंगे, महिलाओं का वर्चस्व बढ़ेगा तथा ब्राह्मण वर्ग यज्ञादि धार्मिक कार्यों में सक्रिय रहेगा। विश्व शांति की दिशा में सार्थक प्रयास होंगे।</p>
<p>मंत्री मंगल का फल—शासक एवं उच्च अधिकारी वर्ग की हठधर्मिता के कारण प्रजा में अशांति, धरना-प्रदर्शन, अग्निकांड एवं हिंसा की घटनाएँ बढ़ेंगी।</p>
<p>सस्येश गुरु का फल—सस्येश गुरु होने से अन्न, रस, दूध आदि की प्रचुरता रहेगी।</p>
<p>धान्येश बुध का फल—सिंध एवं पंजाब को छोड़कर वर्षा अच्छी होगी, जिससे कृषि उत्पादन बेहतर रहेगा। गेहूं, जौ, चना, सरसों, राई, अरहर आदि का उत्पादन अधिक होगा।</p>
<p>मेघेश चंद्रमा का फल—वर्षा अच्छी होने से तालाब, बांध आदि जलमग्न रहेंगे। अनाज, फल-फूल का उत्पादन अच्छा होगा तथा उद्योग-धंधों का विकास होगा।</p>
<p>रसेश शनि का फल—रसेश शनि होने से रस पदार्थों की कमी रहेगी। संसद के वर्षाकालीन सत्र में नेतागण आरोप-प्रत्यारोप में उलझे रहेंगे।</p>
<p>नीरसेश गुरु का फल—नीरसेश गुरु होने से हल्दी, चना, हरी सब्जियाँ, हरी-पीली दालें तथा पीले रंग की धातुओं एवं वस्तुओं में मंदी रहेगी।</p>
<p>फलेश चंद्र का फल—वृक्षों में फल-फूल की अच्छी उत्पत्ति होगी।</p>
<p>धनेश गुरु का फल—प्रजा को धन लाभ होगा तथा व्यापारी वर्ग अच्छा मुनाफा कमाएगा।</p>
<p>दुर्गेश चंद्र का फल—यात्री यात्रा के दौरान स्वयं को असुरक्षित महसूस करेंगे। गुंडों एवं चोरों के उपद्रव से जनता में असुरक्षा की भावना रहेगी।</p>
<p>गुड़, शक्कर, दूध, घी आदि के व्यापार से अच्छा लाभ होगा।</p>
<p><strong>वर्ष के चार स्तंभ से फल</strong></p>
<p>चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को रेवती नक्षत्र का योग 4 प्रतिशत है, अतः वर्षा कम और अनियमित होगी। समयानुकूल वर्षा नहीं होने से भूजल स्तर गिरेगा और कृषि उपज को नुकसान होगा।</p>
<p>वैशाख शुक्ल प्रतिपदा को भरणी नक्षत्र का योग 22 प्रतिशत है, अतः घास कम उत्पन्न होगी, जिससे पशुपालकों को कष्ट होगा। ज्येष्ठ शुक्ल प्रतिपदा को मृगशिरा नक्षत्र का योग 53 प्रतिशत होने से वायु स्तंभ सामान्य रहेगा, किंतु आंधी-तूफान से जन-धन की हानि हो सकती है।</p>
<p>आषाढ़ शुक्ल प्रतिपदा को पुनर्वसु नक्षत्र का योग 43 प्रतिशत है, अतः अन्न स्तंभ मध्यम रहेगा और खाद्य पदार्थों के मूल्य बढ़ सकते हैं।</p>
<p>जैन ने कहा कि आर्षमान पर विचार के अनुसार अक्षय तृतीया को रोहिणी नक्षत्र का योग 14 प्रतिशत है, पौष अमावस्या को मूल नक्षत्र का योग 26 प्रतिशत है। श्रावण पूर्णिमा को श्रवण नक्षत्र का अभाव है तथा कार्तिक पूर्णिमा को कृतिका नक्षत्र 81 प्रतिशत है। कुल मिलाकर देश की आंतरिक सुरक्षा के प्रति सतर्कता आवश्यक है।</p>
<p>ज्योतिषाचार्य डॉ. हुकुमचंद जैन ने अपनी ज्योतिषीय ग्रह गणना करते हुए भविष्यवाणी में कहा कि देश की आंतरिक सुरक्षा इसलिए भी आवश्यक है, क्योंकि 19 मार्च को नव विक्रम संवत् 2083 का आरंभ प्रातः 06:53 बजे चंद्रमान से हुआ। उस समय मीन लग्न उदित था और लग्न में सूर्य, चंद्र, शुक्र, शनि स्थित थे, जिनकी मंगल एवं राहु की अशुभ युति से द्वादश भाव में अशुभ योग बना हुआ है।</p>
<p>यह योग पश्चिमी देशों में हिंसा, अशांति, युद्ध तथा जन-धन की हानि का कारण बन सकता है। किसी देश में सत्ता परिवर्तन की भी संभावना है। भारत में भी हिंसा, उपद्रव एवं धार्मिक कट्टरता के कारण वर्ग संघर्ष बढ़ सकता है। विश्व स्तर पर कुछ अप्रत्याशित एवं विनाशकारी घटनाओं से अशांति और युद्ध के बादल मंडराते रहेंगे।</p>
<p>इन सबके बावजूद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रभाव बढ़ेगा। सत्तारूढ़ पार्टी के विरुद्ध विपक्ष आक्रामक बना रहेगा, फिर भी सत्तादल देश की अर्थव्यवस्था और विकास दर बढ़ाने में सफल रहेगा।</p>
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		<title>जैन पंचांग कैलेंडर का किया विमोचन: उपाध्यायश्री विहसंत सागर के सान्निध्य में हुआ सारस्वत आयोजन  </title>
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		<pubDate>Wed, 08 Oct 2025 11:50:40 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[नववर्ष के जैन पंचांग एवं कैलेंडर का विमोचन मुनिश्री विहसंत सागर महाराज के पावन सान्निध्य में हुआ। वरिष्ठ ज्योतिषाचार्य डॉ. हुकुमचंद जैन द्वारा संपादित संपूर्ण भविष्य पॉकेट पंचांग एवं कैलेंडर सन् 2025- 2026-2027 का विमोचन रजत सरस्वती महाअर्चना के अवसर रविवार को हुआ। मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230; मुरैना/भिंड। नववर्ष के [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>नववर्ष के जैन पंचांग एवं कैलेंडर का विमोचन मुनिश्री विहसंत सागर महाराज के पावन सान्निध्य में हुआ। वरिष्ठ ज्योतिषाचार्य डॉ. हुकुमचंद जैन द्वारा संपादित संपूर्ण भविष्य पॉकेट पंचांग एवं कैलेंडर सन् 2025- 2026-2027 का विमोचन रजत सरस्वती महाअर्चना के अवसर रविवार को हुआ। <span style="color: #ff0000">मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना/भिंड।</strong> नववर्ष के जैन पंचांग एवं कैलेंडर का विमोचन जैन संत विहसंत सागर महाराज के पावन सान्निध्य में हुआ। वरिष्ठ ज्योतिषाचार्य डॉ. हुकुमचंद जैन द्वारा संपादित संपूर्ण भविष्य पॉकेट पंचांग एवं कैलेंडर सन् 2025- 2026-2027 का विमोचन रजत सरस्वती महाअर्चना के अवसर रविवार को उपाध्याय श्री विहसंत सागर महाराज के सान्निध्य में मेला ग्राउंड भिंड में हजारों लोगों की उपस्थिति में हुआ। इस अवसर पर मुनिश्री ने कहा कि ज्योतिषाचार्य डॉ.हुकुमचंद जैन किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। जैन ज्योतिष के क्षेत्र में एक ऐसी जानी मानी हस्ती हैं, जिन्होंने समाज को अपने ज्ञान से निरंतर लाभान्वित किया है। इनकी अनेकों भविष्यवाणियां सत्य सिद्ध होती रही है। यह सुंदर संपूर्ण भविष्य पॉकेट पंचांग और कैलेंडर हर जन सामान्य के लिए उपयोगी सिद्ध होगा।</p>
<p>पंचांग के रचनाकार ज्योतिषाचार्य डॉ. हुकुमचंद जैन ने बताया कि इस पंचांग में है दीपावली पूजन मुहूर्त, वर्ष की भविष्यवाणी, व्यापारिक वस्तुओं की तेजी मंदी, ग्रहों का राशि नक्षत्र भ्रमण, सर्वार्थ सिद्धि, अमृत सिद्धि, रवि योग, द्विपुष्कर योग, त्रिपुष्कर योग, रवि पुष्य, गुरु पुष्य आदि योग, प्रत्येक राशि का राशिफल, सटीक पाक्षिक पंचांग, विवाह, सगाई, नींव, भूमि पूजन, नव गृह प्रवेश, जीर्ण गृह प्रवेश व्यापार, वाहन ,संपत्ति परचेज, पंचकल्याणक, देवप्रतिष्ठा आदि सभी प्रकार के शुद्ध मुहूर्त उनके समय के साथ दिए गए हैं। जो आमजन के लिए अत्यंत उपयोगी साबित होंगे।</p>
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		<title>सभी राशियों पर पड़ेगा असर : चार दिनों में चार ग्रहों ने बदली चाल, लंबे समय तक रहेगा प्रभाव   </title>
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		<pubDate>Mon, 19 May 2025 06:43:21 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[चार दिनों में ग्रहों के राजा सूर्य ने 15 मई की रात को मेष राशि से वृष राशि में प्रवेश किया। ग्रहों में सबसे अधिक ज्ञान, ध्यान, शिक्षा, और दीक्षा के कारक गुरु ने 14 मई की रात वृष से मिथुन में प्रवेश किया। अब 18 मई को शाम 7:20 बजे राहु मीन राशि से [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>चार दिनों में ग्रहों के राजा सूर्य ने 15 मई की रात को मेष राशि से वृष राशि में प्रवेश किया। ग्रहों में सबसे अधिक ज्ञान, ध्यान, शिक्षा, और दीक्षा के कारक गुरु ने 14 मई की रात वृष से मिथुन में प्रवेश किया। अब 18 मई को शाम 7:20 बजे राहु मीन राशि से कुंभ में, और इसी समय केतु कन्या राशि से सिंह राशि में प्रवेश कर रहे हैं। <span style="color: #ff0000">पढ़िए मनोज जैन नायक की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना।</strong> कहते हैं, ग्रह ही राज्य देते हैं और ग्रह ही राज्य हर लेते हैं। सभी चराचर ग्रहों के अधीन हैं। चार दिनों में ग्रहों के राजा सूर्य ने 15 मई की रात को मेष राशि से वृष राशि में प्रवेश किया। ग्रहों में सबसे अधिक ज्ञान, ध्यान, शिक्षा, और दीक्षा के कारक गुरु ने 14 मई की रात वृष से मिथुन में प्रवेश किया। अब 18 मई को शाम 7:20 बजे राहु मीन राशि से कुंभ में, और इसी समय केतु कन्या राशि से सिंह राशि में प्रवेश कर रहे हैं।</p>
<p>ज्योतिषाचार्य डॉ. हुकुमचंद जैन ने बताया कि इन ग्रहों के परिवर्तन का जिन राशियों पर प्रभाव पड़ेगा, उन्हें बड़ी परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। इसके अलावा, बुध 16 मई से 12 जून तक अतिचारी गति में रहेगा, जिससे राजनेताओं में परस्पर टकराव बढ़ेगा। देश के पश्चिमी उत्तरी क्षेत्रों में हिंसा और दुर्भिक्ष की संभावना रहेगी, और जनता में भय का माहौल बना रहेगा। तेल, तिलहन, काली मिर्च और किराने का सामान में तेजी आएगी। चांदी एक लाख से ऊपर अच्छी तेजी में रहेगी।</p>
<p><strong>राशियों पर प्रभाव:</strong></p>
<p>18 मई को शाम 7:20 बजे राहु अपनी स्वाभाविक वक्री गति से कुंभ राशि में और केतु अपनी वक्री गति से सिंह राशि में प्रवेश करेंगे। इन ग्रहों का गोचर आपके जीवन और राशियों पर किस प्रकार प्रभाव डालेगा, जानिए:</p>
<p>मेष राशि: धन लाभ और मान-सम्मान के अवसर सामने आ सकते हैं।</p>
<p>वृष राशि: परिवार में वृद्धि और धन लाभ के साथ-साथ केतु चौथे घर में रोग और अशांति का कारण बनेगा।</p>
<p>मिथुन राशि: गुरु के कारण कार्यों में विलंब और भय रहेगा। राहु-केतु के गोचर से धार्मिक कार्यों में आपकी रुचि कम हो सकती है, लेकिन जीवनसाथी और संतान का लाभ मिलेगा। छात्रों को प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता मिल सकती है।</p>
<p>कर्क राशि: गुरु से शत्रुओं पर विजय मिलेगी और गुप्त व साहसी कार्य सफल होंगे। राहु-केतु के प्रभाव से स्वास्थ्य संबंधी परेशानियाँ हो सकती हैं।</p>
<p>सिंह राशि: गुरु से नए आर्थिक लाभ और उन्नति के अवसर मिलेंगे। राहु-केतु के प्रभाव से जीवनसाथी से रिश्ते तनावपूर्ण हो सकते हैं।</p>
<p>कन्या राशि: मित्रों से मतभेद और स्थान परिवर्तन की संभावना। राहु-केतु के प्रभाव से व्यर्थ के खर्चों पर नियंत्रण रखना आवश्यक है।</p>
<p>तुला राशि: संतान की उन्नति, धन लाभ और रुके हुए कार्य पूर्ण होंगे। राहु-केतु के प्रभाव से अचानक सफलता प्राप्त होगी।</p>
<p>वृश्चिक राशि: स्वास्थ्य का ध्यान रखना जरूरी है। राहु-केतु के प्रभाव से पारिवारिक सुख में कमी महसूस हो सकती है।</p>
<p>धनु राशि: विवाह, पत्नी सुख और कार्य व्यापार से आर्थिक लाभ का उत्तम समय है। राहु-केतु के प्रभाव से आपको जीवन में लाभ और सफलता मिलेगी।</p>
<p>मकर राशि: पुत्र से मतभेद और पैसों के मामलों में सतर्क रहना जरूरी है। अपने काम की बागडोर अपने हाथ में रखना आपके लिए बेहतर होगा।</p>
<p>कुंभ राशि: गुरु के प्रभाव से तर्क शक्ति और सूझबूझ बढ़ेगी। राहु-केतु के प्रभाव से कार्यों को पूरा करने के लिए ज्यादा मेहनत और लगन की आवश्यकता होगी। ईमानदारी से काम करें।</p>
<p>मीन राशि: गुरु के प्रभाव से परिवार और मित्रों से अशांति हो सकती है, साथ ही स्थान परिवर्तन भी हो सकता है। राहु-केतु के प्रभाव से कभी धन की हानि हो सकती है, तो कभी खर्चों में अचानक वृद्धि हो सकती है।</p>
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		<title>आज से 40 दिनों तक नहीं होंगे शुभ कार्य: होलाष्टक शुरू होलिका दहन पर होंगे खत्म </title>
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		<pubDate>Thu, 06 Mar 2025 06:49:36 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[6 मार्च गुरुवार 10.50 बजे से होलाष्टक प्रारंभ हो जाएंगे। जो होली का दहन के साथ समाप्त हो जाएंगे। इसके साथ ही 14 मार्च शुक्रवार को मीन राशि में सूर्य शाम 6.49 बजे प्रवेश करेंगे, जो 14 अप्रैल रात्रि 3.20 बजे तक रहेंगे। जैन ने कहा इन दिनों में सगाई, विवाह, गृह निर्माण, भूमि पूजन,नए [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>6 मार्च गुरुवार 10.50 बजे से होलाष्टक प्रारंभ हो जाएंगे। जो होली का दहन के साथ समाप्त हो जाएंगे। इसके साथ ही 14 मार्च शुक्रवार को मीन राशि में सूर्य शाम 6.49 बजे प्रवेश करेंगे, जो 14 अप्रैल रात्रि 3.20 बजे तक रहेंगे। जैन ने कहा इन दिनों में सगाई, विवाह, गृह निर्माण, भूमि पूजन,नए घर में प्रवेश, देव प्रतिष्ठा, मुंडन आदि कार्यों को नहीं करना चाहिए। <span style="color: #ff0000">मुरैना से पढ़िए मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना।</strong> कहते हैं किसी शुभ कार्य की शुरुआत शुभ मुहूर्त में करना चाहिए क्योंकि, किसी बड़े कार्य जैसे गृह प्रवेश और विवाह करने में जीवन की पूरी पूंजी लग जाती है और पूरे जीवन भर इन दो चीजों का असर बना रहता है। इसलिए शुभ मुहूर्त का कार्य करने से पहले इंतजार रहता है। वरिष्ठ ज्योतिषाचार्य डॉ. हुकुमचंद जैन ने बताया कि 6 मार्च गुरुवार 10.50 बजे से होलाष्टक प्रारंभ हो जाएंगे। जो होली का दहन के साथ समाप्त हो जाएंगे। इसके साथ ही 14 मार्च शुक्रवार को मीन राशि में सूर्य शाम 6.49 बजे प्रवेश करेंगे, जो 14 अप्रैल रात्रि 3.20 बजे तक रहेंगे। जैन ने कहा इन दिनों में सगाई, विवाह, गृह निर्माण, भूमि पूजन,नए घर में प्रवेश, देव प्रतिष्ठा, मुंडन आदि कार्यों को नहीं करना चाहिए।</p>
<p><strong><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-75905" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/03/IMG-20250306-WA0004.jpg" alt="" width="366" height="374" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/03/IMG-20250306-WA0004.jpg 366w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/03/IMG-20250306-WA0004-294x300.jpg 294w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/03/IMG-20250306-WA0004-65x65.jpg 65w" sizes="(max-width: 366px) 100vw, 366px" />आठ रात्रियों में तंत्र, मंत्र, यंत्र की साधना का महत्व</strong></p>
<p>होलाष्टक की आठ रात्रियों में तंत्र, मंत्र, यंत्र की साधना का महत्व माना जाता है। सिद्ध रात्रि, काल रात्रि और मोह रात्रि जैसी रात्रियां अधिक प्रभावशाली होती है। होलिका दहन के साथ फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा को होलाष्टक तो समाप्त हो जाएंगे लेकिन, इस के साथ ही मीन राशिस्थ सूर्य संज्ञक सौर चैत्र मलमास के 30 दिन भी शुभ कार्य में वर्जित होते हैं। शास्त्रों के अनुसार सूर्य जब तक मीन राशि में होता है तो शुभ मांगलिक कार्यों को स्थाई सफल और आनंद दायक नहीं होने देता क्योंकि, सूर्य का तेज इस समय मलीन हो जाता है। यानी मीन राशि में सूर्य के रहते समय तक सूर्य का शुभ प्रभाव कमजोर पड़ जाता हैं। इसलिए इस समय ज्योतिष शास्त्र में शुभ कार्यों को करने के कोई विशेष मुहूर्त नहीं होते।</p>
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		<title>सरस्वती पूजन वसंत पंचमी पर 2 फरवरी को: प्रकृति के बदलाव और वाग्देवी के प्रकटीकरण का दिन </title>
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		<pubDate>Thu, 30 Jan 2025 13:07:59 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[वसंत पंचमी पर प्रकृति के खिल-खिलाने का अवसर है। इस दिन वाग्देवी सरस्वती के प्रकटीकरण का दिन भी है। वे ज्ञान और बुद्धि की देवी है। इस दिन को विशेष माना गया है। इस बारे में वरिष्ठ ज्योतिषाचार्य डॉ. हुकुमचंद जैन ने बताया इस दिन से सर्दी का प्रकोप समाप्त हो जाता है। चारों तरफ [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>वसंत पंचमी पर प्रकृति के खिल-खिलाने का अवसर है। इस दिन वाग्देवी सरस्वती के प्रकटीकरण का दिन भी है। वे ज्ञान और बुद्धि की देवी है। इस दिन को विशेष माना गया है। इस बारे में वरिष्ठ ज्योतिषाचार्य डॉ. हुकुमचंद जैन ने बताया इस दिन से सर्दी का प्रकोप समाप्त हो जाता है। चारों तरफ खेतों में लहलहाती हुई गेहूं की फसल, सरसों के खेतों में चारों तरफ पीले खिले हुए फूल का मनमोहक दृश्य दिखाई देता है। <span style="color: #ff0000">पढ़िए मुरैना से मनोज जैन नायक की खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना।</strong> प्रत्येक माह में दो बार पंचमी तिथि आती है। माघ माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को बच्चे, युवा, वृद्ध सभी ने सुना है क्योंकि, हर किसी के जीवन में कहावत के रूम में भी जुड़ा हुआ शब्द ‘कितने वसंत देख लिए अब तक’ है। वसंत नाम से मन में प्रफुल्ता, उमंग, ज्ञान की धारा अविरल बहने लगती है क्योंकि, यह तिथि ऋतुराज वसंत के आगमन की सूचना देती है। वरिष्ठ ज्योतिषाचार्य डॉ. हुकुमचंद जैन ने बताया इस दिन से सर्दी का प्रकोप समाप्त हो जाता है। चारों तरफ खेतों में लहलहाती हुई गेहूं की फसल, सरसों के खेतों में चारों तरफ पीले खिले हुए फूल का मनमोहक दृश्य दिखाई देता है। इस दिन हर घरों में केशरिया चावल बनाए जाते हैं और प्रातः स्नान के पश्चात पीले परिधान पहनना चाहिए। फिर मां सरस्वती का पूजन करना चाहिए।</p>
<p><strong>&#8230;तो सभी जीवांे को बोलने की शक्ति मिली</strong></p>
<p>कहते है कि प्रजापति ब्रह्मा जी ने विष्णु जी की आज्ञा से सृष्टि की रचना कर दी। पृथ्वी पर आकर देखा तो सन्नाटा किसी के मुंह से शब्द नहीं निकले थे। तब इस उदासी को देखकर ब्रह्मजी ने अपने कमंडल से जल को छिड़का जल कणों से वृक्षों पर एक शक्ति हाथों में वीणा लिए, पुस्तक लिए माला पहने प्रकट हुईं। तब ब्रह्म जी ने उस देवी से वीणा बजाकर उदासी दूर करने कहा। तो सभी जीवांे को बोलने की शक्ति मिली। उस देवी का नाम सरस्वती पड़ा। यह देवी विद्या, वृद्धि, ज्ञान, संगीत, कला, विज्ञान, शिल्प कला की देवी है। जैन ने कहा कि यह दिन सभी शुभ कार्यों के लिए उपयुक्त माना जाता है। इसलिए यह दिन अबूझ मुहूर्त के नाम से प्रसिद्ध है।</p>
<p><strong><img decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-73426" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/01/IMG-20250130-WA0038.jpg" alt="" width="366" height="374" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/01/IMG-20250130-WA0038.jpg 366w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/01/IMG-20250130-WA0038-294x300.jpg 294w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/01/IMG-20250130-WA0038-65x65.jpg 65w" sizes="(max-width: 366px) 100vw, 366px" />अबूझ मुहूर्त पर होते हैं विवाह आदि</strong></p>
<p>इस दिन सभी छात्र-छात्राओं को मां सरस्वती जी का स्नान, ध्यान करके पीले वस्त्र धारण कर विनम्र भाव से पूजन करना चाहिए और जिनको वाणी, वृद्धि, ज्ञान का विकास करना है, उन लोगों को भी। जैन ने बताया कि इस बार बसंत पंचमी को शास्त्र युक्त विवाह मुहूर्त नहीं है। परंपरागत इस दिन लोकाचार की दृष्टि से अबूझ मुहूर्त मानकर ज्यादातर लोग इस दिन विवाह के बंधन में बंध जाना पसंद करते हैं। ध्यान देने वाली बात है।</p>
<p><strong>पूजन का यह है मुहुर्त</strong></p>
<p>इस बार की पंचमी तिथि का क्षय भी है। 2 फरफरी को चतुर्थी का समापन सूर्याेदय के बाद सुबह 9.14 बजे हो रहा है। इसी समय से पंचमी प्रारंभ हो जाएगी जो 3 फरवरी को सूर्याेदय से पूर्व 6.52 बजे तक समाप्त हो जाएगी। इसलिए 2 फरवरी को बसंत पंचमी सरस्वती पूजन प्रातः 7.01 बजे से 12.31 बजे तक रहेगा। पूजन का कुल समय 5 घंटे 30 मिनट है।</p>
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		<title>सुहागिन स्त्रियां अपने पति की दीर्घायु के लिए रखती हैं यह व्रत : रोहिणी नक्षत्र में करवा चौथ व्रत 20 अक्टूबर रविवार को </title>
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		<pubDate>Thu, 17 Oct 2024 09:09:09 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[पूरे वर्षभर महिलाओं को करवा चौथ के व्रत का इंतजार रहता है। सुहागिन स्त्रियां अपने पति की दीर्घायु के लिए यह व्रत रखती हैं, जो आमतौर पर निर्जला होता है। वरिष्ठ ज्योतिषाचार्य डॉ. हुकुमचंद जैन ने बताया कि इस बार तिथियों का असर त्योहारों पर दिखाई दे रहा है। करवा चौथ इस बार सूर्योदय को [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>पूरे वर्षभर महिलाओं को करवा चौथ के व्रत का इंतजार रहता है। सुहागिन स्त्रियां अपने पति की दीर्घायु के लिए यह व्रत रखती हैं, जो आमतौर पर निर्जला होता है। वरिष्ठ ज्योतिषाचार्य डॉ. हुकुमचंद जैन ने बताया कि इस बार तिथियों का असर त्योहारों पर दिखाई दे रहा है। करवा चौथ इस बार सूर्योदय को स्पर्श नहीं कर रही है, न ही दूसरे दिन <span style="color: #ff0000">के सूर्योदय को।</span> पढ़िए मनोज जैन नायक की रिपोर्ट&#8230;</strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना।</strong> पूरे वर्षभर महिलाओं को करवा चौथ के व्रत का इंतजार रहता है। सुहागिन स्त्रियां अपने पति की दीर्घायु के लिए यह व्रत रखती हैं, जो आमतौर पर निर्जला होता है। वरिष्ठ ज्योतिषाचार्य डॉ. हुकुमचंद जैन ने बताया कि इस बार तिथियों का असर त्योहारों पर दिखाई दे रहा है। करवा चौथ इस बार सूर्योदय को स्पर्श नहीं कर रही है, न ही दूसरे दिन के सूर्योदय को। इससे चतुर्थी का क्षय हो गया है। इस बार तृतीया युक्त चतुर्थी तिथि में सुहागिन स्त्रियां करवा चौथ का व्रत रख सकेंगी।</p>
<p>डॉ. जैन ने बताया कि 20 अक्टूबर, रविवार को प्रातः 06:46 बजे चतुर्थी प्रारंभ होगी और यह रात 04:46 बजे समाप्त होगी। इस प्रकार करवा चौथ का व्रत और चंद्र दर्शन 20 अक्टूबर, रविवार को होगा। इस दिन रोहिणी नक्षत्र का संयोग प्रातः 08:31 बजे से चतुर्थी तिथि के साथ होने से शुभ रहेगा। चतुर्थी प्रारंभ होने से पहले प्रातः 06:46 बजे तक भद्रा भी समाप्त हो जाएगी।</p>
<p><strong>पूजा मुहूर्त</strong></p>
<p>इस दिन प्रातः दैनिक चर्या से निवृत्त होकर स्नान आदि कर व्रत रखने का संकल्प 07 बजे से पूर्व करना चाहिए, जो चंद्रोदय तक निर्जला उपवास का संकल्प होगा।</p>
<p><strong>चंद्रोदय का समय</strong></p>
<p>मैदानी क्षेत्रों में रात्रि 08:20 पर और अन्य स्थानों पर रात्रि 08:40 बजे होगा। इससे पूर्व व्रतार्थी महिलाएं मिट्टी के करवे में परंपरागत तरीके से पूजन करेंगी और चंद्रोदय होने पर चंद्रमा को अर्घ देकर अपने तरीके से पूजन करेंगी। इसके बाद पति और सासू मां के पैर छूकर व्रत खोलकर भोजन करेंगी।</p>
<p><strong>किस राशि वालों को किस रंग की साड़ी, चूड़ी और श्रृंगार करना चाहिए</strong></p>
<p>करवा चौथ का निर्जला उपवास कठिन है, लेकिन सुहाग की रक्षा और दीर्घायु के लिए इसे रखने से महिलाओं में शक्ति आती है। अपने राशि के अनुसार रंगों का चयन करने से अधिक उत्साह और उमंग आती है:</p>
<p>मेष, सिंह, वृश्चिक: रेड साड़ी, चूड़ी और श्रृंगार की अधिकता।</p>
<p>वृष, कर्क, तुला: डायमंड, चमकीले रंग-बिरंगे और झिलमिलाते रंगों की अधिकता।</p>
<p>मिथुन, कन्या, मकर, कुंभ: ग्रीन, स्काई ब्लू रंगों की अधिकता।</p>
<p>धनु, मीन: संतरी, ब्राउन, यलो रंगों की अधिकता और मिक्स कलर।</p>
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		<title>शरद पूर्णिमा व्रत भी इसी दिन रखा जायेगा : सोलह को सोलह कलाओं से परिपूर्ण रहेगा चंद्रमा  </title>
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		<pubDate>Mon, 14 Oct 2024 16:50:54 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[इस वर्ष मुख्य त्योहारों के दिन तिथियों के बदलाव के कारण त्योहारों को किस दिन मनाना है, इस पर जनमानस में भ्रम बना हुआ है। विशेष रूप से, शरद पूर्णिमा को लेकर यह सवाल उठ रहा है कि इसे 16 अक्टूबर को मनाना चाहिए या 17 अक्टूबर को। वरिष्ठ ज्योतिषाचार्य डॉ. हुकुमचंद जैन ने बताया [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>इस वर्ष मुख्य त्योहारों के दिन तिथियों के बदलाव के कारण त्योहारों को किस दिन मनाना है, इस पर जनमानस में भ्रम बना हुआ है। विशेष रूप से, शरद पूर्णिमा को लेकर यह सवाल उठ रहा है कि इसे 16 अक्टूबर को मनाना चाहिए या 17 अक्टूबर को। वरिष्ठ ज्योतिषाचार्य डॉ. हुकुमचंद जैन ने बताया कि 16 अक्टूबर, बुधवार को पूर्णिमा तिथि रात्रि 08:40 बजे से प्रारंभ होकर 17 अक्टूबर को शाम 04:55 बजे समाप्त होगी। <span style="color: #ff0000">पढ़िए मनोज जैन नायक की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>मुरैना।</strong> इस वर्ष मुख्य त्योहारों के दिन तिथियों के बदलाव के कारण त्योहारों को किस दिन मनाना है, इस पर जनमानस में भ्रम बना हुआ है। विशेष रूप से, शरद पूर्णिमा को लेकर यह सवाल उठ रहा है कि इसे 16 अक्टूबर को मनाना चाहिए या 17 अक्टूबर को। वरिष्ठ ज्योतिषाचार्य डॉ. हुकुमचंद जैन ने बताया कि 16 अक्टूबर, बुधवार को पूर्णिमा तिथि रात्रि 08:40 बजे से प्रारंभ होकर 17 अक्टूबर को शाम 04:55 बजे समाप्त होगी। इस प्रकार, शरद पूर्णिमा का व्रत 16 अक्टूबर को रखा जाएगा, जब चंद्रोदय शाम 05:02 बजे होगा। जैन ने कहा कि शरद पूर्णिमा सभी पूर्णिमाओं में एक ऐसी पूर्णिमा है जब चंद्रमा सोलह कलाओं से परिपूर्ण होकर निकलता है। सोलह कलाओं से आदर्श व्यक्तित्व का निर्माण होता है, और श्री कृष्ण जी को सोलह कलाओं से परिपूर्ण अवतार माना जाता है।</p>
<p>इस दिन चंद्र देव की पूजा व उपवास किया जाता है, खासकर नव विवाहिता महिलाओं द्वारा। इस दिन चंद्रमा अपनी धवल किरणों के साथ अमृत की वर्षा करता है, जिससे व्यक्ति स्वस्थ और दीर्घायु रहता है। इस रात गाय के दूध की खीर चंद्रमा की रोशनी में मलमल के वस्त्र से ढक कर रखी जाती है, जिससे खीर में औषधि गुण आ जाते हैं। प्रातः काल इस खीर का प्रसाद के रूप में सेवन किया जाता है। ब्रज क्षेत्र में शरद पूर्णिमा को &#8220;रास पूर्णिमा&#8221; के नाम से जाना जाता है। इसी दिन श्री कृष्ण ने आध्यात्मिक प्रेम का नृत्य गोपियों के साथ किया था। इस शरद पूर्णिमा को भारत के विभिन्न क्षेत्रों में &#8220;कोजागरा पूर्णिमा&#8221; के रूप में भी मनाया जाता है, और पूरे दिन उपवास रखा जाता है, जिसे &#8220;कौमुदी व्रत&#8221; भी कहा जाता है। 16 अक्टूबर को पूर्णिमा का चंद्रोदय शाम 05:02 बजे होगा।</p>
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		<title>विजय काल में शमी वृक्ष की पूजा होती है :  सर्वार्थ सिद्धि योग और श्रवण नक्षत्र के संयोग में धूमधाम से मनाया जाएगा दशहरा पर्व </title>
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		<pubDate>Sat, 12 Oct 2024 07:24:11 +0000</pubDate>
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<p><strong>बुराई पर अच्छाई की विजय का पर्व दशहरा का खास महत्व है। इस दिन आश्विन शुक्ल दशमी के दिन श्री राम जी ने रावण नामक राक्षस पर विजय प्राप्त की थी। वरिष्ठ ज्योतिषाचार्य डॉ. हुकुमचंद ने बताया कि 12 अक्टूबर, शनिवार को दशमी तिथि का प्रारंभ सुबह 10:58 बजे से 13 अक्टूबर, रविवार को प्रातः 09:08 बजे तक होगा।<span style="color: #ff0000"> पढ़िए मनोज जैन नायक की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना।</strong> बुराई पर अच्छाई की विजय का पर्व दशहरा का खास महत्व है। इस दिन आश्विन शुक्ल दशमी के दिन श्री राम जी ने रावण नामक राक्षस पर विजय प्राप्त की थी। वरिष्ठ ज्योतिषाचार्य डॉ. हुकुमचंद ने बताया कि 12 अक्टूबर, शनिवार को दशमी तिथि का प्रारंभ सुबह 10:58 बजे से 13 अक्टूबर, रविवार को प्रातः 09:08 बजे तक होगा। इसलिए दशहरा 12 अक्टूबर, शनिवार को मनाने में तिथि के पूजन में कोई भ्रम नहीं है। डॉ. हुकुमचंद ने बताया कि पूरे दिन 12 अक्टूबर को प्रातः 05:24 बजे से श्रवण नक्षत्र प्रारंभ होकर 13 अक्टूबर को रात 04:28 बजे तक रहेगा। इस प्रकार, दशमी तिथि, श्रवण नक्षत्र और सर्वार्थ सिद्धि योग का विशेष योग बना है। ज्योतिष में दशहरे को अबूझ मुहूर्त की संज्ञा दी गई है, अर्थात किसी कार्य को प्रारंभ बिना मुहूर्त पूछे किया जा सकता है।</p>
<p>चाहे वह वाहन खरीदना हो, मकान, दुकान, प्लॉट खरीदना हो, या कारखाना प्रारंभ करना हो—किसी भी कार्य का आरंभ के लिए यह शुभ मुहूर्त माना गया है। इस दिन नील कंठ का दर्शन करना भी शुभ माना जाता है। साथ ही, श्री राम जी का पूजन और रामायण का पाठ अवश्य करना चाहिए। एक बार पार्वती जी ने शिव जी से पूछा कि लोग दशहरे को इतना क्यों मानते हैं। तब शिव जी ने कहा कि इस दिन शायंकाल में तारा उदय होने के समय को विजय काल कहा जाता है, जो सभी मनोरथ पूर्ण करता है। इस समय राजा को अपने शत्रु पर विजय के लिए जाना चाहिए।</p>
<p>यदि श्रवण नक्षत्र का संयोग इस समय आता है, तो यह विशेष शुभ होता है। मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम जी ने लंका पर इसी समय चढ़ाई की थी, इसलिए यह तिथि बहुत पवित्र मानी जाती है और क्षत्रिय लोग इसे अपना प्रमुख त्योहार मानते हैं। शत्रु से युद्ध करने का प्रसंग न होने पर भी राजा को अपनी सीमा से बाहर पूर्व दिशा में निकलना चाहिए और अपने दल-बल के साथ निकलकर पूर्व दिशा की तरफ शमी वृक्ष का पूजन अवश्य करना चाहिए। क्योंकि शमी वृक्ष ने अर्जुन का धनुष धारण किया था, जिससे अर्जुन ने शत्रु पर विजय प्राप्त की थी। इसी प्रकार, श्री राम जी की लंका पर चढ़ाई के समय वृक्ष ने कहा था, &#8220;जाओ, आपकी विजय होगी।&#8221; इसलिए विजय काल में शमी वृक्ष की पूजा होती है। कृष्ण ने भी युधिष्ठिर से कहा था कि जो राजा विजयदशमी के दिन अपने दल-बल के साथ पूर्व दिशा में अपनी सीमा पार करता है, और वास्तु एवं देव पूजन करता है, फिर अपने घर लौटता है, उसकी सदा विजय होती है।</p>
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		<title>त्योहारों को लेकर तिथि भ्रम की स्थिति : 12 को मनाया जाएगा दशहरा </title>
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		<pubDate>Tue, 08 Oct 2024 08:44:19 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[ज्योतिषाचार्य डॉ. हुकुमचंद जैन के अनुसार, अष्टमी तिथि 10 अक्टूबर (गुरुवार) को दोपहर 12:31 बजे प्रारंभ होगी और 11 अक्टूबर (शुक्रवार) को दोपहर 12:06 बजे तक रहेगी। चूंकि 11 अक्टूबर को उदया तिथि रहेगी, इसलिए इस दिन दुर्गाष्टमी और महा अष्टमी का पर्व मनाया जाएगा। पढ़िए मनोज जैन नायक की रिपोर्ट&#8230; मुरैना। वर्तमान समय में [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>ज्योतिषाचार्य डॉ. हुकुमचंद जैन के अनुसार, अष्टमी तिथि 10 अक्टूबर (गुरुवार) को दोपहर 12:31 बजे प्रारंभ होगी और 11 अक्टूबर (शुक्रवार) को दोपहर 12:06 बजे तक रहेगी। चूंकि 11 अक्टूबर को उदया तिथि रहेगी, इसलिए इस दिन दुर्गाष्टमी और महा अष्टमी का पर्व मनाया जाएगा। <span style="color: #ff0000">पढ़िए मनोज जैन नायक की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना।</strong> वर्तमान समय में हर खास त्योहार या तिथि को लेकर आम जनता में भ्रम की स्थिति बनी हुई है। दीपावली पूजन को लेकर विभिन्न पंचांगों और विद्वानों के बीच मतभेद हैं, और अब अष्टमी, नवमी और दशहरा की तिथियों पर भी यही स्थिति देखने को मिल रही है। ज्योतिषाचार्य डॉ. हुकुमचंद जैन के अनुसार, अष्टमी तिथि 10 अक्टूबर (गुरुवार) को दोपहर 12:31 बजे प्रारंभ होगी और 11 अक्टूबर (शुक्रवार) को दोपहर 12:06 बजे तक रहेगी। चूंकि 11 अक्टूबर को उदया तिथि रहेगी, इसलिए इस दिन दुर्गाष्टमी और महा अष्टमी का पर्व मनाया जाएगा।</p>
<p>इसी दिन, 11 अक्टूबर (शुक्रवार) को दोपहर 12:06 बजे से नवमी तिथि प्रारंभ होगी, जो 12 अक्टूबर (शनिवार) को 10:58 बजे तक चलेगी। नवमी तिथि भी उदया रहने के कारण इस दिन मनाई जाएगी। 12 अक्टूबर (शनिवार) को दोपहर 10:58 बजे से दशमी तिथि प्रारंभ होगी, जो 13 अक्टूबर (रविवार) को प्रातः 09:08 बजे तक समाप्त होगी। इस प्रकार, 12 अक्टूबर (शनिवार) को दशहरा मनाया जाएगा, क्योंकि इस दिन का विजया मुहूर्त दोपहर 02:47 बजे से 03:33 बजे तक श्रेष्ठ है।</p>
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