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	<title>ज्येष्ठ शुक्ल चतुर्थी &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>15वें तीर्थंकर भगवान धर्मनाथ जी का मोक्षकल्याणक 18 जून को : तिथि के अनुसार ज्येष्ठ शुक्ल चतुर्थी को आता है, इंदौर सहित देशभर के मंदिरों में छाया उल्लास  </title>
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		<pubDate>Wed, 17 Jun 2026 08:21:14 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[इंदौर सहित देशभर में जैन समाज के लिए 18 जून का दिन बेहद पावन और आध्यात्मिक ऊर्जा से भरा होने वाला है, क्योंकि इस दिन जैन धर्म के 15वें तीर्थंकर, शांति और अहिंसा के प्रतिमूर्ति भगवान धर्मनाथ जी का मोक्ष कल्याणक अत्यंत श्रद्धा, भक्ति और हर्षाेल्लास के साथ मनाया जाएगा। तिथि के अनुसार भगवान धर्मनाथ [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>इंदौर सहित देशभर में जैन समाज के लिए 18 जून का दिन बेहद पावन और आध्यात्मिक ऊर्जा से भरा होने वाला है, क्योंकि इस दिन जैन धर्म के 15वें तीर्थंकर, शांति और अहिंसा के प्रतिमूर्ति भगवान धर्मनाथ जी का मोक्ष कल्याणक अत्यंत श्रद्धा, भक्ति और हर्षाेल्लास के साथ मनाया जाएगा। तिथि के अनुसार भगवान धर्मनाथ जी का मोक्षकल्याणक ज्येष्ठ शुक्ल चतुर्थी के दिन बड़ी श्रद्धा और भक्ति वात्सल्य के साथ मनाया जाता है। <span style="color: #ff0000">श्रीफल जैन न्यूज की विशेष प्रस्तुति में आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल का यह संकलित और संपादित आलेख&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> इंदौर सहित देशभर में जैन समाज के लिए 18 जून का दिन बेहद पावन और आध्यात्मिक ऊर्जा से भरा होने वाला है, क्योंकि इस दिन जैन धर्म के 15वें तीर्थंकर, शांति और अहिंसा के प्रतिमूर्ति भगवान धर्मनाथ जी का मोक्ष कल्याणक अत्यंत श्रद्धा, भक्ति और हर्षाेल्लास के साथ मनाया जाएगा। तिथि के अनुसार भगवान धर्मनाथ जी का मोक्षकल्याणक ज्येष्ठ शुक्ल चतुर्थी के दिन बड़ी श्रद्धा और भक्ति वात्सल्य के साथ मनाया जाता है। अहिल्या नगरी इंदौर, जो अपनी अनूठी जैन संस्कृति, भव्य कांच मंदिर और चैत्यालयों के लिए प्रसिद्ध है, उसके सहित संपूर्ण भारतवर्ष के दिगंबर जैन मंदिरों में इस दिन भक्ति का अनूठा सैलाब उमड़ेगा। जैन पुराणों के अनुसार भगवान धर्मनाथ जी का जन्म इक्शवाकु वंश के राजा भानु और माता सुव्रता के यहां रत्नपुरी में माघ शुक्ल त्रयोदशी को हुआ था, जिनका वर्ण कंचन के समान दैदीप्यमान था और जिनका चिह्न ‘वज्रदंड’ है।</p>
<p><strong> मोक्ष का अर्थ आत्मा का समस्त कर्मों के बंधन से पूर्णतः मुक्त होना है</strong></p>
<p>गर्भकाल से ही लोक में धार्मिक प्रवृत्तियों और दया भाव में अभूतपूर्व वृद्धि करने वाले भगवान धर्मनाथ जी ने संसार के भोगों को नश्वर मानकर दिगंबर दीक्षा धारण की थी और घोर तपस्या के पश्चात केवलज्ञान प्राप्त कर समवशरण के माध्यम से भव्य जीवों को मोक्ष मार्ग का उपदेश दिया था। जैन दर्शन में मोक्ष का अर्थ आत्मा का समस्त कर्मों के बंधन से पूर्णतः मुक्त हो जाना है और भगवान धर्मनाथ जी ने अपनी आयु के अंत में सम्मेद शिखरजी के पावन पर्वत से मौन ध्यान धारण कर आत्मिक विशुद्धि प्राप्त करते हुए सिद्धपद प्राप्त किया था। जो हर श्रावक को यह याद दिलाता है कि मानव जीवन का परम लक्ष्य सांसारिक वैभव नहीं बल्कि अपनी आत्मा को शुद्ध बनाना है।</p>
<p><strong>समृद्धि की कामना के साथ महाशांतिधारा होगी</strong></p>
<p>इस पावन अवसर पर 18 जून को अल सुबह से ही जैन मंदिरों में पूरा वातावरण धर्ममय हो उठेगा। मंदिरों में वेदी पर विराजमान भगवान धर्मनाथ जी की प्रतिमा का जल से भव्य अभिषेक किया जाएगा तथा विश्व शांति, प्राणिमात्र के कल्याण और राष्ट्र की समृद्धि की कामना के साथ महाशांतिधारा होगी। इस दिन सामूहिक रूप से भगवान धर्मनाथ मोक्ष कल्याणक विधानश् का आयोजन होगा, जिसमें श्रावक सुरम्य भजनों और ढोल-मंजीरों की थाप पर नृत्य करते हुए अर्घ्य समर्पित करेंगे और भगवान धर्मनाथ के ‘चालीसा’ व ‘निर्वाण कांड’ का पाठ करेंगे।</p>
<p><strong>आत्मा भी सिद्धत्व की मिठास को प्राप्त करे</strong></p>
<p>इस पूरे उत्सव का सबसे मुख्य और अनूठा आकर्षण ‘निर्वाण लाडू’ चढ़ाना होता है, जिसमें शुद्ध घी, सूखे मेवों और बूंदी से निर्मित बड़े आकार के मोदक को केसर से रंजित कर, अर्घावली पढ़ते हुए भगवान के चरणों में इस भावना के साथ समर्पित किया जाता है कि जैसे बूंदी के कण मिलकर मीठा मोदक बनते हैं, वैसे ही हमारी आत्मा भी सिद्धत्व की मिठास को प्राप्त करे।</p>
<p><strong>मंदिरों में तैयारियों का दौर</strong></p>
<p>मालवा का ‘जैन गढ़’ कहे जाने वाले इंदौर शहर के रेसकोर्स रोड, क्लॉथ मार्केट, कनाड़िया, विजय नगर और प्रसिद्ध कांच मंदिर सहित सैकड़ों दिगंबर जैन मंदिरों में समाज के युवा संगठन और महिला मंडल रंगोली सजाने, महाआरती का प्रबंधन करने और लाडू वितरण की तैयारियों में जुटे हैं। कई स्थानों पर रात्रि में भक्ति संध्या और भगवान धर्मनाथ के जीवन पर आधारित नाटिकाओं का मंचन भी होगा। चारों ओर धार्मिक उल्लास का माहौल दिखाई दे रहा है।</p>
<p><strong>संयम के मार्ग को अपने जीवन में उतारने का महापर्व </strong></p>
<p>वास्तव में भगवान धर्मनाथ जी का मोक्ष कल्याणक केवल एक ऐतिहासिक घटना की स्मृति नहीं है, बल्कि आज के अशांत और भागदौड़ भरे युग में उनके द्वारा बताए गए अहिंसा, सत्य, दया और संयम के मार्ग को अपने जीवन में उतारने का महापर्व है।</p>
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		<title>भगवान धर्मनाथ जी का मोक्ष कल्याणक 30 मई को: तिथि अनुरूप ज्येष्ठ शुक्ल चतुर्थी को आता है 15वें तीर्थंकर का मोक्ष कल्याणक  </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 30 May 2025 07:11:50 +0000</pubDate>
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<p><strong>जैन धर्म के 15वें तीर्थंकर भगवान धर्मनाथ जी का मोक्ष कल्याणक इस वर्ष 30 मई को आ रहा है। तिथि के अनुरूप मोक्ष कल्याणक ज्येष्ठ शुक्ल चतुर्थी के दिन मनाया जाता है। इस दिन दिगंबर जैन मंदिरों में श्रीजी का अभिषेक, शांतिधारा, निर्वाण पाठ, निर्वाण लाडू चढ़ाने के कार्यक्रम किए जाते हैं। भगवान धर्मनाथ जी के मोक्ष कल्याणक को लेकर सकल जैन समाज में धार्मिक उल्लास है। <span style="color: #ff0000">श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्रृंखला में आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह संकलित रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> जैन धर्म के 15वें तीर्थंकर भगवान धर्मनाथ जी का मोक्ष कल्याणक इस वर्ष 30 मई को है। तिथि के अनुरूप मोक्ष कल्याणक ज्येष्ठ शुक्ल चतुर्थी के दिन मनाया जाएगा। इस दिन दिगंबर जैन मंदिरों में श्रीजी का अभिषेक, शांतिधारा, निर्वाण पाठ, निर्वाण लाडू चढ़ाने आदि कार्यक्रम किए जाएंगे। नगर सहित देश के विभिन्न दिगंबर जैन मंदिरों में भगवान धर्मनाथ की भव्य भक्ति आराधना का दौर रहेगा। धर्म के प्रकाश से विश्व को दिव्य प्रकाश प्रदान करने वाले 15वें तीर्थंकर श्री धर्मनाथ जी का जन्म माघ शुक्ल तृतीया के दिन रत्नपुर के राजा भानु की पट्टमहिषी सुव्रतादेवी की रत्न कुक्षी से हुआ। प्रभु के जन्म से इस धतरी पर सर्वत्र हर्ष, आनंद और शांति का प्रार्दुभाव हुआ। पुत्र के युवावस्था मंे प्रवेश करने पर माता-पिता ने अनेक राजकन्याओं के साथ उनका विवाह किया। भारी समारोह रचकर पिता ने धर्मनाथ को राजगद्दी पर प्रतिष्ठित किया। भगवान धर्मनाथ जी के धर्म शासन में अधर्म का अंधकार विलुप्त होकर विलीन हो गया। कालांतर में राज पद का परित्याग कर माघ शुक्ल त्रयोदशी के दिन श्री धर्मनाथ जी ने प्रव्रज्या में प्रवेश किया। प्रभु आत्म साधना में निमग्न होकर कर्म रिपुओं का हनन करने लगे। मात्र दो वर्ष की अवधि में कर्म रिपुआंे को परास्त कर पौष शुक्ल पूर्णिमा के दिन प्रभु केवली बने। धर्मतीर्थ की स्थापना कर तीर्थंकर कहलाए। अरिष्ट आदि 43 प्रमुख शिष्य प्रभु के गणधर थे। प्रभु के धर्म परिवार में 64 हजार श्रमण, 62 हजार 400 श्रमणियां, दो लाख 44 हजार श्रावक एवं 4 लाख 13 हजार श्राविकाएं थीं। पांचवे वासुदेव पुरुष सिंह एवं बलदेव सुदर्शन प्रभु के अनन्य उपासक थे। ज्येष्ठ शुक्ल चतुर्थी के दिन सम्मेद शिखर पर्वत से प्रभु ने निर्वाण प्राप्त किया। तीसरे चक्रवर्ती मघवा एवं चौथे चक्रवर्ती सनतकुमार भी प्रभू धर्मनाथ के शासनकाल में ही हुए।</p>
<p><strong>भगवान के चिन्ह का महत्व</strong></p>
<p>वज्र धर्मनाथ तीर्थंकर का चिन्ह वज्र है। वज्र इंद्र देव का शस्त्र है। इसलिए इंद्र को वज्रपाणि कहा जाता है। वज्र कठोरता का प्रतीक है। वज्र से हमें यह शिक्षा मिलती है कि कष्टों में भी वज्र के समान दृढ़ रहना चाहिए। धर्म पालन में दृढ़ रहना चाहिए। अज्ञान, मोह और मिथ्यात्व पर वज्र प्रहार करने से ही सच्चे धर्म की प्राप्ति होती है। धर्मनाथ भगवान का चिन्ह धर्म-मार्ग पर वज्र की तरह दृढ़ होकर अग्रसर होने की प्रेरणा देता है।</p>
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