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	<title>ज्येष्ठ कृष्ण षष्ठी &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
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		<title>कल्याण और आत्मिक शांति का मार्ग: भगवान श्रेयांसनाथ गर्भ कल्याणक महोत्सव 8 मई को  </title>
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		<pubDate>Thu, 07 May 2026 07:59:01 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन धर्म के 11वें तीर्थंकर भगवान श्रेयांसनाथ का गर्भ कल्याणक ज्येष्ठ कृष्ण षष्ठी को मनाया जाता है। इस बार यह पावन दिन 8 मई को आ रहा है। श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्रृंखला के तहत आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह संकलित और संपादित प्रस्तुति&#8230; इंदौर। जैन धर्म के 11वें तीर्थंकर भगवान श्रेयांसनाथ [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जैन धर्म के 11वें तीर्थंकर भगवान श्रेयांसनाथ का गर्भ कल्याणक ज्येष्ठ कृष्ण षष्ठी को मनाया जाता है। इस बार यह पावन दिन 8 मई को आ रहा है। <span style="color: #ff0000">श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्रृंखला के तहत आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह संकलित और संपादित प्रस्तुति&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> जैन धर्म के 11वें तीर्थंकर भगवान श्रेयांसनाथ का गर्भ कल्याणक ज्येष्ठ कृष्ण षष्ठी को मनाया जाता है। इस बार यह पावन दिन 8 मई को आ रहा है। यह हमें याद दिलाता है कि एक महान आत्मा का आगमन केवल एक भौतिक घटना नहीं, बल्कि संपूर्ण जगत के कल्याण (श्रेय) का सूचक है। इंदौर सहित देश भर के दिगंबर जैन मंदिरों में इस अवसर पर भगवान का अभिषेक, शांतिधारा और विशेष पूजन जैसे अनुष्ठान श्रद्धापूर्वक किए जाते हैं।</p>
<p><strong>गर्भ कल्याणक की कथा</strong></p>
<p>जैन ग्रंथों के अनुसार भगवान श्रेयांसनाथ का जीव अपने पूर्व जन्म में पुष्करवर द्वीप के पूर्व विदेह क्षेत्र में राजा नलिनगुल्म था। वहां कठिन तपस्या और आत्म-साधना के माध्यम से उन्होंने ‘तीर्थंकर नाम कर्म’ का संचय किया। इसके पश्चात वे अच्युत स्वर्ग में इंद्र बने। ज्येष्ठ कृष्ण षष्ठी के दिन उस महान आत्मा ने वाराणसी के निकट सिंहपुरी नगरी (वर्तमान सारनाथ) के राजा विष्णुराज और रानी सुनंदा (विष्णुदेवी) के घर गर्भ में प्रवेश किया। उनके गर्भ में आने से 6 माह पूर्व से ही देवराज इंद्र की आज्ञा से कुबेर ने सिंहपुरी में रत्नों की वर्षा शुरू कर दी थी। रानी ने गर्भ धारण करते समय 16 शुभ स्वप्न देखे जो एक तीर्थंकर के अवतरण का संकेत थे।</p>
<p><strong>नामकरण और ‘श्रेय’ का संदेश</strong></p>
<p>भगवान के जन्म के बाद राजा विष्णु का राज्य और प्रजा अत्यंत समृद्ध और सुखी हो गई। चारों ओर ‘श्रेय’ (कल्याण) का वातावरण निर्मित होने के कारण इंद्र ने उनका नाम ‘श्रेयांसनाथ’ रखा। उनका प्रतीक चिह्न ‘गैंडा’ है, जो शक्ति और अडिगता का परिचायक है।</p>
<p><strong>भगवान श्रेयांसनाथ के मुख्य संदेश और उपदेश</strong></p>
<p>भगवान श्रेयांसनाथ का संपूर्ण जीवन और उनकी दिव्य देशना हमें आत्म-उत्थान के कई सूत्र देती है।</p>
<p>-कल्याण का मार्ग: भगवान का नाम ही ‘श्रेय’ (कल्याण) से जुड़ा है। उन्होंने सिखाया कि वास्तविक कल्याण बाहरी वैभव में नहीं, बल्कि अपनी आत्मा के शुद्धिकरण में है।</p>
<p>-अहिंसा और करुणा: उन्होंने समस्त जीवमात्र के प्रति दया भाव रखने और मन-वचन-काय से किसी को कष्ट न पहुंचाने का उपदेश दिया।</p>
<p>-सांसारिक क्षणभंगुरता: राजसी सुखों के बीच रहने के बावजूद उन्होंने ऋतु परिवर्तन को देखकर वैराग्य धारण किया। यह संदेश देता है कि संसार के सभी भोग अनित्य हैं और केवल धर्म ही शाश्वत साथी है।</p>
<p>-इंद्रिय संयम और अपरिग्रह: उन्होंने अनावश्यक संग्रह (अपरिग्रह) को छोड़ने और अपनी इंद्रियों पर विजय प्राप्त करने पर बल दिया।</p>
<p><strong>वर्तमान प्रासंगिकता</strong></p>
<p>भगवान श्रेयांसनाथ का गर्भ कल्याणक हमें यह सिखाता है कि हम अपने जीवन में ‘श्रेय’ (जो हितकारी हो) को चुनें, न कि केवल ‘प्रेय’ (जो केवल देखने में प्रिय हो) को। आज के भौतिकवादी युग में उनकी शिक्षाएं हमें आंतरिक शांति और संतोष का मार्ग दिखाती हैं। श्रद्धालुओं द्वारा किया जाने वाला पाठ और विधान केवल परंपरा नहीं, बल्कि उनके गुणों को अपने भीतर उतारने का संकल्प है।</p>
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		<title>भगवान श्रेयांसनाथ जी का गर्भ कल्याणक 18 मई को: तिथि के अनुसार ज्येष्ठ कृष्ण षष्ठी के दिन आता है गर्भ कल्याणक  </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 17 May 2025 14:01:06 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन धर्म के 11वें तीर्थंकर भगवान श्रेयांसनाथ का गर्भ कल्याणक इस वर्ष 18 मई को आ रहा है। इस दिन भगवान के मंदिरों में विशेष पूजन, अभिषेक तथा शांतिधारा आदि के कार्यक्रम किए जाएंगे। भगवान श्रेयांसनाथ का गर्भ कल्याण तिथि के अनुसार ज्येष्ठ कृष्ण षष्ठी के दिन आता है। इस दिन को लेकर जैन समाज [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जैन धर्म के 11वें तीर्थंकर भगवान श्रेयांसनाथ का गर्भ कल्याणक इस वर्ष 18 मई को आ रहा है। इस दिन भगवान के मंदिरों में विशेष पूजन, अभिषेक तथा शांतिधारा आदि के कार्यक्रम किए जाएंगे। भगवान श्रेयांसनाथ का गर्भ कल्याण तिथि के अनुसार ज्येष्ठ कृष्ण षष्ठी के दिन आता है। इस दिन को लेकर जैन समाज में उत्साह का माहौल है। <span style="color: #ff0000">श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्रृंखला के तहत आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह प्रस्तुति&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> जैन धर्म के 11वें तीर्थंकर भगवान श्रेयांसनाथ का गर्भ कल्याणक इस वर्ष 18 मई को आ रहा है। इस दिन भगवान के मंदिरों में विशेष पूजन, अभिषेक तथा शांतिधारा आदि के कार्यक्रम किए जाएंगे। पुराणों के अनुसार ग्यारहवें तीर्थंकर जंबूद्वीप के भरत क्षेत्र में सिंहपुर नगर के इक्ष्वाकुवंशी राजा विष्णु और रानी नंदा के पुत्र थे। ये ज्येष्ठ कृष्ण षष्ठी श्रवण नक्षत्र में प्रातःकाल रानी नंदा के गर्भ में आए। इस अवसर पर सकल संसार में सुखद अनुभूति हुई। गर्भ में आने के बाद फाल्गुन कृष्ण एकादशी के दिन विष्णुयोग में इनका जन्म हुआ। जन्म के समय रोगी निरोग हो गए थे। चारों निकाय के देवों ने आकर इनका जन्माभिषेक किया था। सौधर्मेंद्र ने जन्माभिषेक के बाद आभूषण आदि पहनाकर इनका श्रेयांस नाम रखा था। इनका जन्म शीतलनाथ के मोक्ष जाने के बाद सौ सागर, छियासठ लाख और छब्बीस हजार वर्ष कम एक करोड़ सागर प्रमाण अंतराल बीत जाने पर हुआ था। इनकी आयु चौरासी लाख वर्ष की थी। शरीर सोने की कांति के समान था।</p>
<p>ऊंचाई अस्सी धनुष थी। कुमारावस्था के इक्कीस लाख वर्ष बीत जाने पर इन्हें राज्य मिला था। इन्होंने 42 वर्ष तक राज्य किया। वसंत के परिवर्तन को देखकर इन्हें वैराग्य जागा। लौकांतिक देवों ने आकर इनकी स्तुति की। इन्होंने राज्य श्रेयस्कर पुत्र को दिया तथा विमलप्रभा पालकी में बैठकर ये मनोहर नामक वन में पहुंच गए। वहां इन्होंने दो दिन के आहार का त्याग कर फाल्गुन कृष्ण एकादशी के दिन प्रातः बेला और श्रवण नक्षत्र में एक हजार राजाओं के साथ संयम धारण किया। इसी समय इन्हें मनरूपर्ययज्ञान हुआ। इन्हें सिद्धार्थ नगर में राजा नंद ने आहार देकर पंचाश्चर्य प्राप्त किए थे। छदमस्थ अवस्था के दो वर्ष बाद ही मनोहर उद्यान में तुंबुर वृक्ष के नीचे माघ कृष्ण अमावस्या के दिन श्रवण नक्षत्र में इन्हें केवलज्ञान हुआ। इनके संघ में कुंथु आदि 77 गणधर 13 सौ पूर्वधारी, 48 हजार 200 शिक्षक, 6 हजार अवधिज्ञानी, 6 हजार 500 केवलज्ञानी, 11 हजार विकियाऋद्धिधारी, 6 हजार मनरूपर्ययज्ञानी और 5 हजार वादी मुनि तथा एक लाख बीस हजार धारणा आदि आर्यिकाएं थीं। सम्मेदशिखर पर इन्होंने एक हजार मुनियों के साथ प्रतिमायोग धारण किया था। श्रावण शुक्ल पौर्णमासी के दिन सायंकाल के समय घनिष्ठा नक्षत्र में शेष कर्मों का क्षय करके येकृ‘अ इ उ ऋ लृ’ इन 5 लघु अक्षरों के उच्चारण में जितना समय लगता है। उतने समय में मुक्त हुए।</p>
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