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	<title>जैन रत्न &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
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	<title>जैन रत्न &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>डॉ.आरके जैन को महासभा ने दी जैन रत्न की उपाधि : दिगंबर जैन तीर्थ संरक्षिणी महासभा में किया सम्मान </title>
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		<pubDate>Sun, 23 Feb 2025 08:48:35 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[कोटा में दिगंबर जैन तीर्थ संरक्षिणी महासभा ने शनिवार की मीटिंग में डॉ.आरके जैन को महासभा ने &#8220;जैन रत्न&#8221; की उपाधि से सम्मानित किया। राष्ट्रीय महामंत्री राजकुमार सेठी का सम्मान किया गया। पढ़िए कोटा से यह खबर&#8230; कोटा। दिगंबर जैन तीर्थ संरक्षिणी महासभा के राष्ट्रीय महामंत्री राजकुमार सेठी का शनिवार को कोटा में सकल दिगंबर [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>कोटा में दिगंबर जैन तीर्थ संरक्षिणी महासभा ने शनिवार की मीटिंग में डॉ.आरके जैन को महासभा ने &#8220;जैन रत्न&#8221; की उपाधि से सम्मानित किया। राष्ट्रीय महामंत्री राजकुमार सेठी का सम्मान किया गया। <span style="color: #ff0000">पढ़िए कोटा से यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>कोटा।</strong> दिगंबर जैन तीर्थ संरक्षिणी महासभा के राष्ट्रीय महामंत्री राजकुमार सेठी का शनिवार को कोटा में सकल दिगंबर समाज एवं विज्ञान नगर जैन समाज ने भव्य स्वागत एवं सम्मान किया। सेठी ने बताया कि हमारी संस्था जीर्ण-शीर्ण हो रहे मंदिरों, तीर्थों, प्रतिमाओं की सार संभाल करके जीर्णोद्धार करवाती है। साथ ही समाज में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के उत्थान के लिए कार्य कर रही है। उन्होंने बताया कि जैन समाज दान करने में पूरे देश में प्रथम स्थान पर है पर उसका बहुत बड़ा हिस्सा केवल दिखावे एवं मान सम्मान पर खर्च हो रहा है। यह बहुत बड़ी सोचनीय और विचारणीय है।</p>
<p><strong> सिद्ध क्षेत्र के जीर्णोद्धार की आवश्यकता </strong></p>
<p>आज संपूर्ण भारत वर्ष में जितने भी प्राचीन जैन तीर्थ अतिशय क्षेत्र सिद्ध क्षेत्र हैं। इनके जीर्णोद्धार की आवश्यकता है। ग्रामीण क्षेत्र से समाज शहरों की तरफ बढ़ रहा है। वहां के मंदिर खाली हो गए हैं। उन मंदिरों का रखरखाव की परम आवश्यकता है।</p>
<p><strong>मीटिंग में इनका भी किया गया सम्मान</strong></p>
<p>राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी पारस जैन पार्श्वमणि ने बताया कि शनिवार की मीटिंग में डॉ.आरके जैन को महासभा ने &#8220;जैन रत्न&#8221; की उपाधि से सम्मानित किया। पार्श्वमणि ने बताया कि मीटिंग को सकल समाज के अध्यक्ष विमल जैन नांता, राजमल पाटौदी ने भी संबोधित किया। मीटिंग में गुल्लक योजना में श्रेष्ठ कार्य करने वाले अनिल ठौरा, राजेंद्र मंडाना, अशोक पहाड़िया, राकेश चपलमन, नरेश पांडे का शॉल ओढ़ाकर सम्मान किया गया। कार्यक्रम में राकेश जैन चपलमन ने आभार माना। संचालन अनिल ठौरा ने किया।</p>
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		<title>हम टाइम पास के लिए पूजा करते हैं, पूजा के लिए टाइम पास नहीं करते : साध्वी श्री मुक्ति दर्शना का चातुर्मासिक प्रवचन  </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 05 Aug 2023 13:29:41 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[हम प्रतिदिन क्रिया पूर्ण करने के उद्देश्य से पूजा करते हैं अनुष्ठान पूरा करने के उद्देश्य से पूजा नहीं करते हैं अगर हम अनुष्ठान पूरा करने के उद्देश्य से पूजा करेंगे तो हमें उल्लास आएगा आनंद आएगा और हमारे कर्मों का नाश होगा। पढ़िए जीवन जैन की रिपोर्ट&#8230; नागदा। स्थानीय पार्श्व प्रधान पाठशाला में चातुर्मास [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>हम प्रतिदिन क्रिया पूर्ण करने के उद्देश्य से पूजा करते हैं अनुष्ठान पूरा करने के उद्देश्य से पूजा नहीं करते हैं अगर हम अनुष्ठान पूरा करने के उद्देश्य से पूजा करेंगे तो हमें उल्लास आएगा आनंद आएगा और हमारे कर्मों का नाश होगा। <span style="color: #ff0000;">पढ़िए जीवन जैन की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>नागदा।</strong> स्थानीय पार्श्व प्रधान पाठशाला में चातुर्मास की आराधना के दौरान विराजित साध्वी श्री मुक्ति दर्शना श्रीजी मरासा ने बताया कि जिनालय जी में जब हम पूजा करने जाते हैं तो हमें बहुत जल्दी रहती है इसलिए हम घीसी हुई केसर का उपयोग कर लेते हैं जबकि घीसी हुई केसर का उपयोग करने का प्रावधान शास्त्रों में सक्षम व्यक्ति के लिए बताया है।</p>
<p><strong>हमारा धर्म भाव प्रधान है</strong></p>
<p>हम प्रतिदिन क्रिया पूर्ण करने के उद्देश्य से पूजा करते हैं अनुष्ठान पूरा करने के उद्देश्य से पूजा नहीं करते हैं अगर हम अनुष्ठान पूरा करने के उद्देश्य से पूजा करेंगे तो हमें उल्लास आएगा आनंद आएगा और हमारे कर्मों का नाश  होगा। यही आनंद श्रीपाल मेयना  की जो कहानी हम साल में दो बार सुनते हैं उसमें भी मेयना रानी द्वारा प्रभु की पूजा में पुष्प जो अर्पण किए थे उससे श्रीपाल राजा को आनंद की अनुभूति हुई थी। और उससे श्रीपाल राजा के कर्म कटे थे और श्रीपाल राजा को उच्च भाव प्राप्त हुए थे। हमारा धर्म भाव प्रधान है। क्रियाएं तो साधन मात्र है।</p>
<p>लेकिन हमने बहुत ज्यादा क्रियाओं को महत्व देना शुरू कर दिया है। हमारा उद्देश्य किसी भी तरह पूजा की क्रिया हो जानी चाहिए। लेकिन अनुष्ठान के अनुरूप पूजा करने का प्रयास नहीं किया जाता है। हम टाइम पास के लिए पूजा करते हैं। पूजा के लिए टाइम पास नहीं करते हैं। हमें पूजा करने की व्यवस्था की चिंता है। हमें पूजा की चिंता नहीं है। हम तीन  हजार पांच सौ चढ़ाव चढ़कर शत्रुंजय महातीर्थ में दादा के दर्शन करने जाते हैं। लेकिन हम जैन धर्म में जैन तीर्थ पर जाते हैं और जैन धर्म के सिद्धांत का पालन नहीं करते हैं।</p>
<p>हम तीर्थ यात्रा पर हमारे कर्मों का क्षय  करने के लिए जाते हैं लेकिन जिन शासन के निर्देशों का पालन नहीं करते हुए रात्रि भोज एवं होटल एवं लारी का खाना बंद नहीं करके हम अपने पाप कर्म का बैलेंस बढ़कर आ जाते। इस अवसर पर शमशान का उदाहरण देते हुए महाराज साहब ने बताया कि मरे हुए को जलने के लिए शमशान है ना कि शमशान के लिए लोग मरते हैं इसी तरह बाजार में होटल एवं लारिया है उसका उपयोग करना तीर्थ यात्रा के दौरान जिन धर्म के नियमों के अनुकूल नहीं है।</p>
<p><strong>ईर्ष्यालु व्यक्ति अपनी आत्मा को बिगाड़ देता है</strong></p>
<p>हम समाज और सब परिवार तीर्थ यात्रा करते हैं इसको हमें धर्म अनुकूल बनाकर तीर्थ यात्रा करना चाहिए। शत्रुंजय महातीर्थ में नवकारसी का पालन करने पर एक उपवास का लाभ होता है. एक साधु को दान देने पर 100000 साधु को दान देने का लाभ होता है. एक उपवास करने पर सौ उपवास  का लाभ होता है। विधि द्वारा क्रिया किए गए कार्य पर ही हमें पूर्ण लाभ प्राप्त होता है लेकिन विधि का उल्लंघन करने पर हमें 100 गुना ज्यादा प्राप्त पाप प्राप्त होता है।</p>
<p>इस संदर्भ में महामंत्री पैठड शाह  के इतिहास के उदाहरण देते हुए बताया कि ब्रह्मचर्य व्यक्ति ने उनको सवा लाख रुपए लागत की पूजा की वस्त्र दिए थे 32 साल की उम्र में प्राप्त पूजा के वस्त्र को एक अलमारी रखकर रोज इसलिए दर्शन करते थे कि वह ब्रह्मचर्य व्रत का पालन नहीं करते हैं। इसलिए इन वस्तुओं का उपयोग नहीं कर सकते हैं और रोज उनके आंखों से आंसू की  धारा बह जाती। पत्नी को जब पता चला तो उसने भी महामंत्री पेथड़ शाह के साथ ब्रह्मचर्य व्रत स्वेच्छा से अंगीकार किया।</p>
<p>जब तक पत्नी ने नहीं पूछा महामंत्री ने अपनी बात बता कर अपना निर्णय जबरन नहीं थोपा। उक्त पूजा के वस्त्रों में इतनी ताकत हो गई थी कि किसी को भी बुखार आता और वह पूजा के वस्त्र  ओड़ा दिए जाते तो बुखार समाप्त हो जाता था। महामंत्री विधि पूर्वक पूजा करते थे इसका ही इतना बड़ा प्रभाव था। आगे यह भी बताया कि जो ईर्ष्या करता है  वह दियासलाई जैसा होता है। दूसरों का वह कुछ बिगाड़ कर  सके या  नहीं बिगाड़ सके। लेकिन स्वयं का बहुत कुछ बिगाड़ लेता है। ईर्ष्या की ताकत बड़ी होती है। वह आप जरूर लगा सकता है लेकिन उस आग में वह स्वयं भी जल जाता है। ईर्ष्यालु व्यक्ति अपनी आत्मा को बिगाड़ देता है यह जानकारी मंच संचालन कर्ता चिराग पावेचा द्वारा दी गई है।</p>
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		<title>नागदा के जीवन जैन इसलिए कहलाते हैं जैन रत्न : रोजाना गरीब बेसहारा लोगों को निशुल्क पिलाते हैं चाय  </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 27 Jul 2023 10:33:12 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[नागदा के रहने वाले जीवन जैन कोरोनाकाल से ही रेलवे स्टेशन पर रह रहे गरीब बेसहारा-बेघर लोगों को रोजाना निशुल्क चाय पिलाते हैं। वे जैन रत्न हैं। खुद किराए के मकान में रहते हैं। दिनभर बाजार में घूम-घूमकर दुकान-दुकान जाकर चाय बेचने का कार्य करते हैं। उससे जो आमदनी होती है। उसमें एक चौथाई हिस्सा [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>नागदा के रहने वाले जीवन जैन कोरोनाकाल से ही रेलवे स्टेशन पर रह रहे गरीब बेसहारा-बेघर लोगों को रोजाना निशुल्क चाय पिलाते हैं। वे जैन रत्न हैं। खुद किराए के मकान में रहते हैं। दिनभर बाजार में घूम-घूमकर दुकान-दुकान जाकर चाय बेचने का कार्य करते हैं। उससे जो आमदनी होती है। उसमें एक चौथाई हिस्सा रोजाना दान कर देते हैं। <span style="color: #ff0000;">पढ़िए एक रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>नागदा।</strong> नागदा के रहने वाले जीवन जैन कोरोनाकाल से ही रेलवे स्टेशन पर रह रहे गरीब बेसहारा-बेघर लोगों को रोजाना निशुल्क चाय पिलाते हैं। वे जैन रत्न हैं। खुद किराए के मकान में रहते हैं। दिनभर बाजार में घूम-घूमकर दुकान-दुकान जाकर चाय बेचने का कार्य करते हैं। उससे जो आमदनी होती है। उसमें एक चौथाई हिस्सा रोजाना दान कर देते हैं।</p>
<p>करीब चार सौ से पांच सौ रुपया कमाकर करीब डेढ़ सौ से 200 रुपए की चाय रोजाना दान कर देते हैं जिन्हे कई समाज संस्थाओं द्वारा सम्मानित भी किया गया है। इन्हें नवकार महामंत्र टाइम्स इंदौर द्वारा एनीमल लवर्स अवार्ड से भी सम्मानित किया गया है व कई चैनलों पर इंटरव्यू भी लिए गए हैं। कलकत्ता के ललित सरावगी व उनकी टीम द्वारा सम्मानित किया।</p>
<p><iframe title="रोजाना गरीब बेसहारा लोगों को निशुल्क पिलाते हैं चाय  | shreephal Jain News |" width="1320" height="743" src="https://www.youtube.com/embed/VAnwLbLMhvg?feature=oembed" frameborder="0" allow="accelerometer; autoplay; clipboard-write; encrypted-media; gyroscope; picture-in-picture; web-share" allowfullscreen></iframe></p>
<p>आदिनाथ चैनल पर प्रसारित जैन रत्न सीजन 3, में शॉट फिल्म भी दिखाई गई। महाराष्ट्र महाड़ में भी संघ द्वारा सम्मानित किया गया। अभी हाल ही में मुम्बई में एक दिन में चार जगह सम्मानित होने वाले पहले व्यक्ति बने नाकोड़ा की पुकार इन्दौर में मालवा रत्न से जीवन जैन सम्मानित होंगे।</p>
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		<title>अपने सजग और कर्मठ जीवन से जगत के लिए बने प्रेरणास्त्रोत: जानिए जैन सिद्धान्त के मर्मज्ञ व श्रेष्ठ विद्वान पं. फूलचन्द्र सिद्धांतशास्त्री के बारे में </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/phoolchandra_siddhantshastri_became_an_inspiration_for_the_world/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 12 Apr 2023 07:19:19 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन सिद्धांत के मर्मज्ञ व श्रेष्ठ विद्वान् पं. फूलचन्द्र सिद्धांतशास्त्री वाकई में जैन रत्न रहे। उनका सजग एवं कर्मठ जीवन जगत के लिए प्रेरणा बना। जानिए और सीखिए उनके जीवन से, अपने किन कार्यों की वजह से वे जैन रत्न कहलाए। पढ़िए राजेश जैन दद्दू की विशेष प्रस्तुति  इंदौर। पं. कैलाशचन्द्र का यह कथन कि [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>जैन सिद्धांत के मर्मज्ञ व श्रेष्ठ विद्वान् पं. फूलचन्द्र सिद्धांतशास्त्री वाकई में जैन रत्न रहे। उनका सजग एवं कर्मठ जीवन जगत के लिए प्रेरणा बना। जानिए और सीखिए उनके जीवन से, अपने किन कार्यों की वजह से वे जैन रत्न कहलाए। <span style="color: #ff0000;">पढ़िए राजेश जैन दद्दू की विशेष प्रस्तुति </span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> पं. कैलाशचन्द्र का यह कथन कि &#8216;हम तो उन्हीं के अनुवादों को पढ़कर सिद्धांतग्रन्थों के ज्ञाता बने हैं&#8217; तथा पं. जगनमोहनलाल के ये शब्द &#8216;उम्र में तो वे हमसे चार माह बड़े हैं परन्तु ज्ञान में तो सैकड़ों वर्ष बड़े हैं&#8217; से हमें पं. फूलचन्द्र सिद्धांतशास्त्री के जैन सिद्धान्त के मर्मज्ञ व श्रेष्ठ विद्वान् होने का बोध हो जाता है। पं. फूलचन्द्र सिद्धांतशास्त्री, पं. जगनमोहनलाल शास्त्री और पं. कैलाशचन्द्र सिद्धांताचार्य -ये तीनों रत्नत्रयी के नाम से विख्यात रहे हैं, इन तीनों में ये प्रधान रत्न थे।</p>
<p><strong>जन्म परिचय &#8211; </strong></p>
<p>पं फूलचंद सिद्धांतशास्त्री का जन्म 11 अप्रैल सन् 1901 को उत्तरप्रदेश के सिलावन (झांसी) में एक सामान्य परिवार में हुआ। दरयावलाल सिंघई इनके पिता एवं जानकीबाई माता का नाम था। वे परवार जाति में उद्भूत हुए थे।</p>
<p><strong>शिक्षा &#8211; </strong></p>
<p>पं. सिद्धांतशास्त्री की आरम्भिक शिक्षा खजुरिया ग्राम में हुई। मौसेरे भाई से तत्त्वार्थसूत्र और बहन से जिनसहस्रनाम तथा भक्तामर वाचन का अभ्यास किया। आगे की शिक्षा के लिए सर सेठ हुकमचन्द दिगम्बर जैन संस्कृत विद्यालय, इन्दौर, श्री दिगम्बर जैन विद्यालय सामल एवं श्री गोपालदास दिगम्बर जैन विद्यालय मुरैना में अध्ययन कर शास्त्री की परीक्षा उत्तीर्ण की।</p>
<p><strong>गृहस्थजीवन &#8211; </strong></p>
<p>पं. सिद्धांतशास्त्री ने पुत्रीबाई से परिणय कर गृहस्थाश्रम में प्रवेश किया। उनके एक पुत्र और तीन पुत्रियां थीं। इनके पुत्र अशोककुमार जैन इंजीनियर हैं।</p>
<p><strong>कर्मक्षेत्र &#8211; </strong></p>
<p>अध्ययन के उपरान्त वे कर्मक्षेत्र में उतरे तो साढूमल विद्यालय, स्याद्वाद महाविद्यालय बनारस और नाभिनन्दन दिगम्बर जैन विद्यालय बीना में अध्यापन का कार्य किया। उसके बाद नातेपुते (महाराष्ट्र) में रहकर छह वर्ष तक साहित्यिक प्रवृत्ति में लीन रहे। जब विदिशा के श्रेष्ठी लक्ष्मीचन्द जैन ने साहित्योद्धारक फण्ड की स्थापना की और षट्खण्डागम के सम्पादन और प्रकाशन की योजना बनाई तो पं. सिद्धांतशास्त्री डॉ. हीरालाल के सहायक बनकर सन् 1937 से 1940 तक अमरावती में रहे। तत्पश्चात् बीना आ गए।</p>
<p><strong>राष्ट्रीय सेवा &#8211; </strong></p>
<p>देश की स्वतन्त्रता के लिए पं. सिद्धांतशास्त्री ने राष्ट्रीय आन्दोलन में भाग लिया और सन् 1941 में जेलयात्रा भी संपन्न की। विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार आन्दोलन में भाग लिया और आजीवन खादी पहनी।</p>
<p><strong>साहित्यसेवा &#8211; </strong></p>
<p>पं. सिद्धांतशास्त्री की यशस्वी लेखनी ने अनेक ग्रन्थ समाज के लिये समर्पित किये। जिनमें हैं &#8211; 1. जैनधर्म और जाति व्यवस्था 2. विश्वशान्ति और अपरिग्रह 3. जैनतत्त्वमीमांसा 4. वर्ण, जाति और धर्म 5. जैन तत्त्व समीक्षा का समाधान 6. अकिंचित्कर एक अनुशीलन 7. जयपुर खानियां तत्त्वचर्चा : भाग 1-2 8. परवार समाज का इतिहास।</p>
<p>सम्पादित, अनूदित एवं टीका ग्रन्थों में 1. प्रमेयरत्नमाला 2. आलापपद्धति 3. पट्खण्डागम का सह सम्पादन एवं अनुवाद 4. महाबन्ध का सम्पादन एवं अनुवाद भाग 27, 5. कषायपाहुड भाग 1-16 का सम्पादन एवं अनुवाद, 6. सप्ततिकाप्रकरण, 7. तत्त्वार्थसूत्र सम्पादन एवं विवेचन 8. सर्वार्थसिद्धि, 9. ज्ञानपीठ पूजांजलि, 10. समयसार कलश भावार्थ सहित सम्पादन 11. श्री कानजी स्वामी अभिनन्दन ग्रन्थ, 12. सम्यग्ज्ञान दीपिका, 13. लब्धिसार क्षपणासार, 14. ज्ञानसमुच्चयसार 15. आत्मानुशासन प. टोडरमल की टीका का संपादन एवं प्रस्तावना।</p>
<p>उनकी सभी अनुवादित एवं सम्पादित कृतियां प्रकाशित हैं। इनके अतिरिक्त उन्होंने सन् 1935-37 तक &#8216;शान्तिसिन्धु&#8217; आचार्य शान्तिसागर सरस्वती भवन नातेपुते सोलापुर तथा सन् 1949–52 तक &#8216;ज्ञानोदय&#8217; भारतीय ज्ञानपीठ वाराणसी जैसी श्रेष्ठ पत्रिकाओं का सम्पादन किया। इसके अलावा आपके लेख तो यदा-कदा प्रकाशित होते ही रहते थे।</p>
<p><strong>संस्थापित संस्थाएं</strong></p>
<p>1. अखिल भारतवर्षीय दिगम्बर जैन विद्वत्परिषद् के पं. सिद्धान्तशास्त्री अन्यतम संस्थापक तथा कार्यकारी प्रथम संयुक्तमन्त्री हैं।</p>
<p>2. श्री सन्मति जैन निकेतन नरिया, वाराणसी के संस्थापक सदस्य एवं मन्त्री</p>
<p>3. श्री गणेशप्रसाद वर्णी जैन ग्रन्थमाला वाराणसी के संस्थापक संयुक्त मन्त्री एवं ग्रन्थमाला सम्पादक</p>
<p>4. श्री गणेश वर्णी दिगम्बर जैन इंटर कालेज ललितपुर के संस्थापक एवं सदस्य</p>
<p>5. अखिल भारतवर्षीय दिगम्ब जैन विद्वत्परिषद् के द्रोणागिरि अधिवेशन के अध्यक्ष</p>
<p>6. श्री गणेश वर्णी दिगम्बर जैन शोध संस्थान वाराणसी के संस्थापक आदि। इस तरह से पं. जी ने अपने जीवनकाल में कई संस्थाओं को जन्म देकर उनकी उन्नति की है।</p>
<p><strong>सामाजिक क्षेत्र &#8211;</strong></p>
<p>पं. सिद्धान्तशास्त्री आरम्भ से ही सामाजिक क्षेत्रों से जुड़े रहे। उन्होंने सामाजिक आन्दोलनों द्वारा जैन समाज में व्याप्त अनेक कुरीतियों तथा विषमताओं का विरोध किया जिनमें दस्सा मन्दिर प्रवेश, गजरथ के नाम पर अनावश्यक खर्च तथा हरिजन मन्दिर प्रवेश बिल पर व्यापक विरोध किया। तभी पं. जी ने अपनी लेखनी से लिखा कि जैन संस्कृति एवं धर्म को वर्णव्यवस्था स्वीकार ही नहीं है। उन्होंने वर्णी इन्टर कालेज ललितपुर, दिगम्बर जैन गुरुकुल खुरई और अन्तरिक्ष पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन संस्थान शिरपुर तथा अन्य अनेक पारमार्थिक संस्थाओं की कोश वृद्धि में सहयोग प्रदान किया। अनेक विद्यार्थियों को भी आर्थिक सहायता देकर या दिलाकर उनके विद्याध्ययन एवं जीवन निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाई।</p>
<p><strong>सम्मान / पुरस्कार &#8211; </strong></p>
<p>सन् 1962 में जैन सिद्धान्त भवन आरा की हीरक जयन्ती के उपलक्ष्य में बिहार के तत्कालीन राज्यपाल डॉ. अनन्तशयनम् अयंगार द्वारा आप सिद्धान्ताचार्य की उपाधि से विभूषित किए गए। सन् 1974 में वीर निर्वाण भारती द्वारा तत्कालीन उपराष्ट्रपति डॉ. वी. डी. जत्ती के कर कमलों से आपको &#8216;सिद्धान्तरत्न&#8217; की उपाधि प्रदान की गई। सन् 1985 में आचार्य श्री विद्यानन्द जी महाराज के सानिध्य में इन्दौर में आयोजित समारोह में आपको वृहद् अभिनन्दन ग्रन्थ भेंट किया गया। सन् 1987 में अखिल भारतवर्षीय दिगम्बर जैन महासंघ द्वारा श्रीमहावीरजी में चांदी के प्रशस्ति पत्र से सम्मानित किया गया। प्रथम राष्ट्रीय प्राकृत सम्मेलन बैंगलोर में सन् 1990 के अवसर पर प्राकृत ज्ञान भारती पुरस्कार से अलंकृत किए गए। अखिल भारतवर्षीय मुमुक्षु समाज ने जयपुर पंचकल्याणक प्रतिष्ठा 1990 के अवसर पर एक लाख रूपये की राशि से सम्मानित किया।</p>
<p><strong>निधन &#8211; </strong></p>
<p>स्वभाव से सरल, सादगी की प्रतिमूर्ति निरहंकारी उदारप्रकृति, परोपकारी, सहयोग में तत्पर, अनेक संस्थाओं के संस्थापक तथा उन्नयनकर्त्ता, राष्ट्र समाज एवं साहित्य के कर्मठ सेवक एवं श्रेष्ठ वक्ता श्री पं. फूलचन्द्र जी सिद्धान्तशास्त्री ने वृद्धावस्था एवं अस्वस्थता के कारण 31 अगस्त सन् 1991 में इस जगत से विदा ली। अपने सजग एवं कर्मठ जीवन को जगत् को प्रेरणास्तम्भ रूप में स्थापित कर दिया।</p>
<p><strong>&#8211; &#8216;बीसवीं सदी के दिवंगत जैन मनीषी&#8217; से साभार</strong></p>
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