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	<title>जैन तीर्थ कुंडलपुर &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>गुरुदेव ने आत्मानुशासन से वह कार्य कर दिखाया कि देखती रह गई दुनिया मुनिराजों का मनाया गया दीक्षा दिवस </title>
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					<description><![CDATA[सुप्रसिद्ध सिद्ध क्षेत्र ,जैन तीर्थ कुंडलपुर में युग श्रेष्ठ संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के प्रभावक शिष्य पूज्य आचार्य श्री समय सागर जी महाराज के मंगल आशीर्वाद से निर्यापक मुनि श्री संभव सागर जी महाराज ने मुनि दीक्षा दिवस के अवसर पर प्रवचन देते हुए कहा कि देखो आज का दिवस ऐसा है [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>सुप्रसिद्ध सिद्ध क्षेत्र ,जैन तीर्थ कुंडलपुर में युग श्रेष्ठ संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के प्रभावक शिष्य पूज्य आचार्य श्री समय सागर जी महाराज के मंगल आशीर्वाद से निर्यापक मुनि श्री संभव सागर जी महाराज ने मुनि दीक्षा दिवस के अवसर पर प्रवचन देते हुए कहा कि देखो आज का दिवस ऐसा है कि सूरज की तपन कुछ कम है। उस दिन 22 अप्रैल 1999 वैशाख शुक्ल सप्तमी के दिन सूर्य सुबह से ही इतना तप रहा था कि शायद वह सबसे ज्यादा लालायित हो कि गुरुदेव आचार्य भगवान पहली बार दीक्षा नहीं दे रहे थे। <span style="color: #ff0000">पढि़ए राजीव सिंघई मोनू की रिपोर्ट ……</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>कुंडलपुर ।</strong> सुप्रसिद्ध सिद्ध क्षेत्र ,जैन तीर्थ कुंडलपुर में युग श्रेष्ठ संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के प्रभावक शिष्य पूज्य आचार्य श्री समय सागर जी महाराज के मंगल आशीर्वाद से निर्यापक मुनि श्री संभव सागर जी महाराज ने मुनि दीक्षा दिवस के अवसर पर प्रवचन देते हुए कहा कि देखो आज का दिवस ऐसा है कि सूरज की तपन कुछ कम है। उस दिन 22 अप्रैल 1999 वैशाख शुक्ल सप्तमी के दिन सूर्य सुबह से ही इतना तप रहा था कि शायद वह सबसे ज्यादा लालायित हो कि गुरुदेव आचार्य भगवान पहली बार दीक्षा नहीं दे रहे थे। सिद्ध क्षेत्र में 23 मुनियों को दीक्षा प्रदान की हैं, गुरुदेव ने करकमलों से। सर्वप्रथम दीक्षा द्रौणगिर सिद्ध क्षेत्र में पहली दीक्षा जेष्ठ- श्रेष्ठ वर्तमान में आचार्य श्री समय सागर जी महाराज को दीक्षा प्रदान की गई थी। मुनि श्री योग सागर जी महाराज परसों सुना रहे थे, कि दीक्षा कैसे हुई ।आचार्य श्री स्वयं बाहर आकर बोले, यह तख्त कहां लगाना है। हम लोगों ने तख्त पाटा लगाया। दर्शक भी ऐसा कोई नहीं सुनने वाला ।उस समय की सोचों जब आचार्य महाराज ने समय सागर जी महाराज को दीक्षा प्रदान की ।योगसागर महाराज बता रहे थे ।हम लोगों ने खड़े-खड़े दीक्षा देखी। पाटा लगाया, पाटा पर चौकी लगाई। आचार्य भगवान बैठ गए।समय सागर जी को बिठाया और दीक्षा के संस्कार शुरू हो गए। थोड़ी देर में दीक्षा पूर्ण हो गई। उस दीक्षा ने इतने विशाल संघ में एक नींव के पत्थर का कार्य किया। उस नींव के पत्थर पर इस विशाल संघ की आधारशिला रखी गई। यूं तो गुरुदेव ने चार क्षुल्लक दीक्षा दी थी। पर जब तक कोई आचार्य मुनि दीक्षा नहीं देता। तब तक उसका वह पद सुशोभित नहीं होता ।योग सागर जी बोलते हैं कि हम शहर वासी हैं ,उनकी दीक्षा सागर में मोराजी में हुई। दो कदम चलकर गुरुदेव ने मुनि श्री योग सागर जी एवं नियम सागर जी को मुनि दीक्षा प्रदान की ।गुरुदेव ने और कदम बढ़ाए 2,5,8 दीक्षा प्रदान की ।इकाई का अंक था। सिद्धोदय सिद्ध क्षेत्र में पहली बार दहाई के अंक में दीक्षा प्रदान की गई। 10 दीक्षा प्रदान की गई शरद पूर्णिमा के दिन। कुछ समय गुजरा नहीं कि 9 मुनिराज की दीक्षा मुक्तागिरी सिद्ध क्षेत्र में हुई ।वहां गुरुदेव ने अचानक शाम को बताया, दीक्षा के विषय में। नेमावर सिद्ध क्षेत्र में वैशाख शुक्ल सप्तमी को 47 डिग्री तापमान पर 23 मुनियों को दीक्षा प्रदान की गई। जबलपुर में 25 दीक्षाएं दी । गुरुदेव ने जिनधर्म की प्रभावना करते हुए रामटेक में 24 दीक्षाएं दी। गुरुदेव ने एक-एक ,दो-दो घंटे में दीक्षा संपन्न की है। शीतल धाम विदिशा में शीतल सागर जी आदि मुनिराज को4 दीक्षा दी ।बीनाबारहा में तीन दीक्षाएं दी ।ललितपुर में दीक्षा दी। अंतिम दीक्षा दी वो उत्कृष्ट दीक्षा दी। अच्छा बेस्ट मैन वह होता जो हर बाल पर रन बनाए। गुरुदेव ने लिखा है कि बड़े बाबा ने बड़ी कृपा की है। मुझे आशीष देकर ।गुरुदेव ने कुंडलपुर में 84 आर्यिका दीक्षा प्रदान की है ।एक भी मुनि दीक्षा नहीं दी है ।</p>
<p><strong>आगे के कार्य करने का करना है शंखनाद</strong></p>
<p>आचार्य पदारोहण समारोह यहां पर हुआ। हम लोग चंद्रगिरी से चलकर आए। मुनि दीक्षा से शुरुआत हो, बड़े बाबा के पादमूल में। आर्यिका दीक्षा भी यहां बड़े बाबा के पादमूल में हो ,ऐसी भावना है ।ऐसी संयोजना हो ,बड़े बाबा तो बड़े बाबा हैं ,उनके बारे में क्या कहा जाए ।यहां कोई भी कार्य असंभव नहीं है। करीब से देखा है, पूरी जैन समाज सशंकित थी, संघ के सदस्य भी सशंकित थे ।यह कार्य कैसे होगा, गुरुदेव ने ठान लिया और पुरातत्व ,शासन, प्रशासन सबके ऊपर हावी था। आत्म अनुशासन और गुरुदेव ने आत्मानुशासन से वह कार्य कर दिखाया कि दुनिया देखती रह गई। पुरातत्व ,शासन, प्रशासन ,न्यायपालिका कह रही थी। यह कार्य हो नहीं सकता ।उसी सर्वोच्च न्यायपालिका ने अपनी मोहर लगा दी कि यह कार्य ठीक हुआ ।यह कार्य गुरुदेव की दूरगामी सोच है ।2006 का वह वृतांत है ।सब लोगों के सामने प्रश्न चिन्ह था। कार्य कैसे होगा। जिन शासन की ध्वजा को आगे ले गए गुरुदेव ।इस प्रभावना को बढ़ाना है । गुरुदेव ऊपर विराजमान है ।स्वर्ग से देख रहे होंगे। संघ की इस धरोहर को अपनी आखिरी पीढ़ी को सौंपा था। वह संघ को गति दे रहे । संघ फल -फूल रहा है ।आगे के कार्य करने का शंखनाद करना है ।हम सब मिलजुल कर अपने नूतन आचार्य समय सागर जी से निवेदन कर रहे हैं कि अपनी बात पुरजोर तरीके से रखेंगे।</p>
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		<title>प्रतिकूलताओं में ही परिणामों की होती है परीक्षा परिणामों को परिवर्तित करने का नाम ही हैं मोक्ष मार्ग </title>
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		<pubDate>Mon, 13 May 2024 15:55:06 +0000</pubDate>
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<p><strong>सुप्रसिद्ध सिद्ध क्षेत्र, जैन तीर्थ कुंडलपुर में युग श्रेष्ठ संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य परम पूज्य आचार्य श्री समय सागर जी महाराज के मंगल आशीर्वाद से पूज्य मुनि श्री महासागर जी महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा कि जब तक स्वयं के चित्त में मुक्ति की अवधारणा जागृत नहीं होगी तब तक मुक्ति का लाभ आत्मा को नहीं मिल सकता।परिणामों को परिवर्तित करने का नाम ही मोक्ष मार्ग है। <span style="color: #ff0000">पढि़ए राजीव सिंघई मोनू रिपोर्ट की ……</span></strong></p>
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<p><strong>कुंडलपुर।</strong> सुप्रसिद्ध सिद्ध क्षेत्र, जैन तीर्थ कुंडलपुर में युग श्रेष्ठ संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य परम पूज्य आचार्य श्री समय सागर जी महाराज के मंगल आशीर्वाद से पूज्य मुनि श्री महासागर जी महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा कि जब तक स्वयं के चित्त में मुक्ति की अवधारणा जागृत नहीं होगी तब तक मुक्ति का लाभ आत्मा को नहीं मिल सकता। उनका कहने का तात्पर्य है कि तुमको मोक्ष पुरुषार्थ के लिए स्वयं अपनी अवधारणा को बदलना होगा। तुम्हें मुक्ति को प्राप्त करने के लिए स्वयं उस मार्ग पर चलना होगा। तभी उस मुक्ति का लाभ आपको मिल पाएगा ।</p>
<p>कर्मबंधन से मुक्ति के लिए हमें अपने परिणामों को बदलना होगा। हमारे यहां देव शास्त्र गुरु को निमित्त कहा गया है। उस निमित्त को देखकर के, उस निमित्त को समझ करके, उपादान को जागृत करना है। कर्म बंधन से मुक्त हो सकता है ।समो शरण में दिव्य ध्वनि दिन में चार बार खिरती है। गुरु महाराज कहते हैं कि दिव्य ध्वनि तो आज भी खिर रही है उस दिव्यध्वनि की वर्गणायें आज भी हमारे पास आ रही हैं। जो वर्गणायें हैं ,वह यहां तक आज भी आ रही है, लेकिन उन दिव्य ध्वनि की वर्गणाओं का लाभ हम आज भी नही ले पाए। क्यों नहीं ले पाए, हम उपयोग अन्य जगह लगा रहे हैं ।उपयोग को वहां लगा नहीं पा रहे हैं ।</p>
<p><strong>अच्छे विचारों के लिए करना पड़ता है पुरुषार्थ</strong></p>
<p>गुरु महाराज कहते हैं कि उन गुण स्थानों पर चल नहीं सकते, पर उन गुण स्थानों को छू तो सकते हैं। परिभाषाओं के माध्यम से उन परिणामों को वहां लेकर तो जाओ ,अगर यह प्रयोग नहीं करते तो यह तुम्हारा प्रमाद कहलाएगा। तुम्हारी भूल कहलाएगी। हम भले ही उन गुण स्थान तक नहीं पहुंच पा रहे है, पर ध्यान प्रयोग के माध्यम से उस गुणस्थान को छूने का पुरुषार्थ करना चाहिए ।गुण स्थान तक पहुंचाने का पुरुषार्थ करना चाहिए। भले अनुभूति ना हो हमें, लेकिन परिणामों के माध्यम से सामने तो आना चाहिए। लक्ष्य क्या है बंदे, तद गुण लब्धे। हम वंदन क्यों कर रहे हैं ।मोक्ष मार्ग की जितनी क्रियाएं होती हैं, श्रावक की हो या श्रमण की हो, कोई फर्क नहीं पड़ता। आप श्रावक हो या श्रमण हो, दोनों की क्रिया का जो लक्ष्य हुआ करता है ,वह एक हुआ करता है ।कर्म क्षय सम्यक दृष्टि श्रावक भी जो क्रिया करता है। कोई बिना लक्ष्य यात्रा करता है तो उसे यात्रा कहेंगे या भटकाव कहेंगे बोलो। भटकाव कहोगे। पर यात्रा तो लक्ष्य को लेकर चलती है ।सम्यक दृष्टि चाहे चतुर्थ गुणस्थान का हो या कहीं का हो, वह लक्ष्य तो आत्म उपलब्धि हुआ करती है ।</p>
<p>उस लक्ष्य के बिना उस मंजिल को प्राप्त कर ही नहीं सकते। गुरुदेव हमेशा हम लोगों को यह उपदेश देते थे ।सभी बैठे हुए थे ।मैंने पूछ लिया गुरुदेव मोक्ष मार्ग के लिए कोई सरल साधना बता दें ,अध्यात्म को जानता नहीं ,सिद्धांत का ज्ञान नहीं ,कम पढ़ा लिखा हूं। यहां आप ले आए ।आगे मार्ग अवरूद्ध न हो ,आगे बढ़ता जाऊं, कोई सरल उपाय बता दें ।गुरुदेव तो गुरुदेव है वह कभी निराश नहीं करते उन्होंने बोला, बहुत अच्छा प्रश्न किया तुमने ,सुनो उत्तर भी अच्छा देता हूं। मोक्ष मार्ग में आगे कैसे बढ़ें। कर्म के आश्रव बंध से कैसे छूटे ।इसके लिए कुछ नहीं करना है। देखो बुरे परिणामों के लिए किसी भी प्रकार का पुरुषार्थ नहीं करना पड़ता है ।यह पूर्व कर्म की एक छाया जैसी छाप, पूर्व संस्कार के लिए आपको किसी प्रकार का पुरुषार्थ नहीं करना पड़ता। विचार अर्हत यंत्र की तरह आते रहते हैं, चलते रहते हैं, अच्छे विचारों के लिए पुरुषार्थ करना पड़ता है ।परिणाम को परिवर्तित करने का नाम ही मोक्ष मार्ग है। अच्छे विचारों को पढ़ना है, यही स्वाध्याय है ,अपने विचारों को परिवर्तित करना है।यही त्याग है,यही स्वाध्याय है ।योगी योग लगाते उनका यही लक्ष्य है ।स्वयं के परिणाम का चौकीदार स्वयं बनना है ।कुछ ना कुछ परिवर्तन अपने अंदर आना चाहिए। प्रतिकूलताओं में ही परिणामों की परीक्षा होती है अनुकूलता में नहीं।</p>
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		<title>हथकरघा प्रशिक्षण केंद्र कुंडलपुर के हुए 8 वर्ष पूर्ण 108 श्री समयसागर जी महाराज के सानिध्य में 6 नए हथकरघा किए वितरित </title>
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		<pubDate>Sun, 12 May 2024 08:44:56 +0000</pubDate>
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<p><strong>सुप्रसिद्ध सिद्ध क्षेत्र,जैन तीर्थ कुंडलपुर में सन् 2016 में परम पूज्य संत शिरोमणि आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज के आशीर्वाद एवं मंगल प्रेरणा से अक्षय तृतीया के दिन प्रारंभ हुए हथकरघा प्रशिक्षण केंद्र कुण्डलपुर के 8 वर्ष पूर्ण हुए।आचार्य श्री समयसागर जी महाराज के सानिध्य में 6 नए प्रशिक्षार्थियों को घर पर हथकरघा वितरित किए ग‌ए।<span style="color: #ff0000">पढि़ए राजीव सिंघई मोनू की रिपोर्ट ……</span></strong></p>
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<p><strong>कुंडलपुर।</strong>सुप्रसिद्ध सिद्ध क्षेत्र,जैन तीर्थ कुंडलपुर में सन् 2016 में परम पूज्य संत शिरोमणि आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज के आशीर्वाद एवं मंगल प्रेरणा से अक्षय तृतीया के दिन प्रारंभ हुए हथकरघा प्रशिक्षण केंद्र कुण्डलपुर के 8 वर्ष पूर्ण हुए ।इन 8 वर्षो में लगभग 500 से अधिक लोग प्रशिक्षण प्राप्त कर चुके है।<img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-60441" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/05/IMG-20240512-WA0022.jpg" alt="" width="1600" height="1066" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/05/IMG-20240512-WA0022.jpg 1600w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/05/IMG-20240512-WA0022-300x200.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/05/IMG-20240512-WA0022-1024x682.jpg 1024w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/05/IMG-20240512-WA0022-768x512.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/05/IMG-20240512-WA0022-1536x1023.jpg 1536w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/05/IMG-20240512-WA0022-414x276.jpg 414w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/05/IMG-20240512-WA0022-470x313.jpg 470w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/05/IMG-20240512-WA0022-640x426.jpg 640w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/05/IMG-20240512-WA0022-130x86.jpg 130w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/05/IMG-20240512-WA0022-187x124.jpg 187w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/05/IMG-20240512-WA0022-990x660.jpg 990w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/05/IMG-20240512-WA0022-1320x879.jpg 1320w" sizes="(max-width: 1600px) 100vw, 1600px" /></p>
<p>जिनमे से 40 गाँव में 300 लोग अपने घर पर हथकरघा लगाकर अहिंसक, स्वाबलंबी जीवन यापन कर रहे है। इसबार अक्षय तृतीया के दिन 6 नए प्रशिक्षार्थियों को घर पर हथकरघा, नवाचार्य 108श्री समयसागर जी महाराज के मंगल सानिध्य में वितरित किये गये।</p>
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		<title>मां से बढ़कर कोई मुहूर्त नहीं-- निर्यापक मुनि श्री संभव सागर जी महाराज गुरू अपने शिष्य को सिखाते हैं मोक्ष मार्ग पर चलना </title>
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		<pubDate>Sun, 12 May 2024 08:42:13 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[सुप्रसिद्ध सिद्ध क्षेत्र जैन तीर्थ कुंडलपुर में युग श्रेष्ठ आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य आचार्य श्री समय सागर जी महाराज के आशीर्वाद से निर्यापक श्रमण मुनि श्री संभव सागर जी महाराज ने मातृत्व दिवस पर मंगल प्रवचन देते हुए कहा कि मुझे अचानक यहां मंच पर भेज दिया गया, क्योंकि कहा [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>सुप्रसिद्ध सिद्ध क्षेत्र जैन तीर्थ कुंडलपुर में युग श्रेष्ठ आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य आचार्य श्री समय सागर जी महाराज के आशीर्वाद से निर्यापक श्रमण मुनि श्री संभव सागर जी महाराज ने मातृत्व दिवस पर मंगल प्रवचन देते हुए कहा कि मुझे अचानक यहां मंच पर भेज दिया गया, क्योंकि कहा भी है की सेना को हमेशा तैयार रहना चाहिए। हमेशा मुस्तैद रहना चाहिए। और यह भी नहीं कहूंगा कि कोई सोता हो तो उसको सुलाओ। <span style="color: #ff0000">पढि़ए राजीव सिंघई मोनू की रिपोर्ट ……</span></strong></p>
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<p><strong>कुंडलपुर।</strong>सुप्रसिद्ध सिद्ध क्षेत्र जैन तीर्थ कुंडलपुर में युग श्रेष्ठ आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य आचार्य श्री समय सागर जी महाराज के आशीर्वाद से निर्यापक श्रमण मुनि श्री संभव सागर जी महाराज ने मातृत्व दिवस पर मंगल प्रवचन देते हुए कहा कि मुझे अचानक यहां मंच पर भेज दिया गया, क्योंकि कहा भी है की सेना को हमेशा तैयार रहना चाहिए। हमेशा मुस्तैद रहना चाहिए। और यह भी नहीं कहूंगा कि कोई सोता हो तो उसको सुलाओ। क्योंकि हमारे जेष्ठ श्रेष्ठ निर्यापक मुनि योग सागर जी महाराज इस बारे में एक प्रसंग सुनाते हैं ।वह कहते हैं कि एक बार की बात थी।</p>
<p>किसी शहर में किसी विषय पर बहुत बड़ा व्याख्यान होना था। उस विषय का विशिष्ट वक्ता बुलाया गया ।समय पर सब कुछ संयोजना हो गई। आयोजक बुलाने उसके स्थान पर पहुंचे ।उस विशेषज्ञ ने कहा यह तो बताओ कितने श्रोता है तब हम सभा में जाएंगे । आयोजक यहां वहां अगल-बगल झांकने लगे ।वह वक्ता समझ गया कोई ज्यादा श्रोता नहीं है । उन आयोजकों ने कहा श्रोता तो कम है। तब उस वक्ता ने कहा, हम इतने लोगों में नहीं बोलते हैं ।वह आयोजक भी बहुत कुशल थे ।वे बोले क्या गौशाला में एक ही गाय होगी तो क्या सानी नहीं डालोगे। उनको समझ में आ गया। वक्ता महोदय सभा में पहुंचे गिनती के लोग थे ।उन्होंने अपना भाषण शुरू किया ।नॉनस्टॉप बोलते जा रहे थे ।एक घंटा से ज्यादा बोले। अब आयोजक पहुंचे और बोले क्या इन्हीं दो-तीन को गौशाला की पूरी सानी खिला दोगे ।कोई बात नहीं।</p>
<p>अब आगे चलते हैं, प्रसंग पर आते है। देखो वैशाख का महीना चल रहा है। कल ही अक्षय तृतीया पर्व हम सब ने मनाया। राजा श्रेयांश के माध्यम से दान तीर्थ की शुरुआत हुई ।राजा श्रेयांश और आहार दान के विषय में सुना होगा ।यहां बैठे हुए सभी लोग उससे परिचित हैं ,सभी ने बहुत दान दिया है।</p>
<p><strong>मां के पैर छुए और सभी कार्य हो गए</strong></p>
<p>अब आगे चलते हैं। वैशाख शुक्ल सप्तमी को गुरुदेव के करकमलों से मुझे निर्ग्रंथ पद की प्राप्ति हुई ।आज वह प्रसंग नहीं किसी और प्रसंग की बात करते हैं । मई का दूसरा रविवार ,मदर्स डे याने मातृत्व दिवस हमारे सामने उनकी संख्या भी पर्याप्त है ।आज इस विषय पर चलते हैं यहां पर गुरुदेव से दीक्षित पूरा आर्यिका संघ उपस्थित है । सृष्टि की श्रेष्ठ रचना मां को देखने के बाद कोई और मुहूर्त निकालने की जरूरत नहीं ।एक आज्ञाकारी पुत्र कहता है कि मां के पैर छुए और उसके सभी कार्य हो गए। मां से बढ़कर कोई मुहूर्त नहीं ।इसी बात को हम आध्यात्मिक की ओर ले चलते हैं। आगम की ओर ले चलते हैं । माता-पिता तो संसार के नाते होते हैं ।इस और कैसे ले चलते हैं ,यदि आपकी सोच हो तो हर रिश्ते को अपने आप में डाल सकते हैं ।हमारे पंच परमेष्ठी अरहंत परमेष्ठी ,सिद्ध परमेष्ठी ,आचार्य परमेष्ठी, उपाध्याय परमेष्ठी ,साधु परमेष्ठी । अरिहंत परमेष्ठी तो समोशरण में विराजमान है ।</p>
<p>सिद्ध परमेष्ठी सिद्ध लोक में विराजमान रहते ,आचार्य परमेष्ठि जो हमारे बीच माता के समान है ।मां अपने बच्चे की उंगली पकड कर चलना सिखाती है। जब शुरुआत होती है ,कदम रखने की तो पहले थोड़ा-थोड़ा बैठकर खिसकता है। फिर खड़े होने की स्थिति आ जाती है तो एक-एक कदम चलने लगता है। मां एक उंगली पकड़े रहती है,वह धीरे-धीरे चलने लगता, जैसे उसकी स्थिति है, वैसे साधु का दूसरा रूप होता है। मोक्ष मार्ग पर चलने के लिए एक-एक कदम कैसे चलना है। गुरू यह अपने शिष्य को सिखाते हैं ।जब पक्षी के अंडे से चूजा बाहर होता है तो उसके पहले मां ऊष्मा प्रदान करती है,एक दिन अंडे का प्रस्फुटन हो जाता है। चूजा बाहर निकलता है ,उसकी मां दाना चुगाती है, कब यह उड़ने लगे, इसी प्रयास में रहती है ।एक दिन वह उसे ऊंची चट्टान पर ले जाती है,उसे खाई में धकेलती है।उसे सिखाना है कैसे उड़ना है।</p>
<p>मां हृदय में कठोरता धारण करके फिर उसको उड़ना सिखाती है ।उसकी विकास की यात्रा तय करती है ।इसी तरह गुरु भी अपने शिष्य को हर समय ऐसी शिक्षा देते रहते हैं कि तुम्हें स्वयं कल्याण के मार्ग पर चलना है। मेरे अभाव में भी तुम मोक्ष के मार्ग पर दौड़ते रहोगे।</p>
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		<title>धूमधाम से मनाया गया अक्षय तृतीया पर्व ओम शब्द से होती मोक्ष की प्राप्ति– मुनि श्री चंद्रप्रभसागर जी महाराज </title>
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		<pubDate>Fri, 10 May 2024 16:51:47 +0000</pubDate>
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<p><strong>सुप्रसिद्ध सिद्ध क्षेत्र कुंडलपुर में संत शिरोमणि आचार्य गुरुवर विद्यासागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य पूज्य आचार्य श्री समय सागर जी महाराज के चतुर्विध संघ के सानिध्य में अक्षय तृतीया पर्व धूमधाम से मनाया गया ।इस अवसर पर प्रातः भक्तांमर महामंडल विधान, पूज्य बड़े बाबा का अभिषेक, शांति धारा ,पूजन, विधान हुआ। <span style="color: #ff0000">पढि़ए राजीव सिंघई मोनू की रिपोर्ट ……</span></strong></p>
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<p><strong>कुंडलपुर।</strong> सुप्रसिद्ध सिद्ध क्षेत्र कुंडलपुर में संत शिरोमणि आचार्य गुरुवर विद्यासागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य पूज्य आचार्य श्री समय सागर जी महाराज के चतुर्विध संघ के सानिध्य में अक्षय तृतीया पर्व धूमधाम से मनाया गया ।इस अवसर पर प्रातः भक्तांमर महामंडल विधान, पूज्य बड़े बाबा का अभिषेक, शांति धारा ,पूजन, विधान हुआ। ज्ञान साधना केंद्र परिसर के सामने पूज्य आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज एवं आचार्य श्री समय सागर जी महाराज की पूजन हुई। मुनि संघ एवं आर्यिका संघ की आहार चर्या संपन्न हुई ।</p>
<p><strong>जैसे विचार मन में रहते है कार्य होता वैसा </strong></p>
<p>मुनिश्री चंद्रप्रभसागर जी महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा कि हमारा देश धर्म प्रधान देश है ।इसमें अनेक प्रकार के संप्रदाय ,मजहब , पंथ और संस्कृति है ।सभी परंपराओं में चार पुरुषार्थ बताए गए हैं, धर्म ,अर्थ ,काम, मोक्ष। जैसे दिशाएं चार हैं, गति चार हैं उसी प्रकार यह पुरुषार्थ भी चार हैं। चारों पुरुषार्थों में धर्म पुरुषार्थ को प्रधानता दी गई है ।मंगलाचरण में आप बोलते ओमकार ,आचार्य श्री को जो बहुत प्रिय था वह मंगलाचरण बार-बार बोलते थे ।ओंकार बिंदु संयुक्तम आचार्य महाराज बार-बार बोलते थे ।बड़े-बड़े योगी भी ओमकार का ध्यान करते हैं ।अंत समय उंकार निकले तो वह काम में आता है। आचार्य श्री उंकारा नमो नमः बोलते थे। वह हमेशा बोलते थे। ओम शब्द के माध्यम से मोक्ष की प्राप्ति होती ।उसके माध्यम से अंतरंग भाव प्रकट होता। आचार्य श्री बोलते है एक अक्षर बोलो सब कार्य हो जाएगा वह है ओम अक्षर। धर्म से लेकर मोक्ष तक चार पुरुषार्थ है। दो पुरुषार्थ अर्थ और काम ,संसार में भटका देते ।जैसे-जैसे मन में विचार होता है, वैसा-वैसा आचार होता चला जाता ।अंतरंग में शुभ परिणाम रखो, हमेशा अच्छा सोचो ,सोच अच्छी रखो, विचार के माध्यम से प्रचार- प्रसार होता रहता है । जैसे विचार मन में रहते, वैसा कार्य होता। मुनि श्री ने एक लकड़हारा का प्रसंग सुनाते हुए अपने प्रवचन को पूर्ण किया।मुनि श्री निराकुल सागर जी महाराज ने रामचरितमानस के प्रसंग को सुनाते हुए प्रवचन दिया।</p>
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		<title>मुनि श्री प्रसाद सागर जी महाराज ससंघ का कुंडलपुर से मंगल विहार  संभावित विहार दिशा है तेंदूखेड़ा पाटन </title>
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		<pubDate>Fri, 10 May 2024 16:47:36 +0000</pubDate>
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<p><strong>निर्यापक श्रमण मुनि श्री प्रसाद सागर जी महाराज ससंघ का कुंडलपुर से मंगल विहार हो गया।संभावना है कि नए उप संघ की विहार दिशा तेंदूखेड़ा पाटन होगी।<span style="color: #ff0000">पढि़ए राजीव सिंघई मोनू की रिपोर्ट ……</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>कुंडलपुर ।</strong>सुप्रसिद्ध सिद्ध क्षेत्र ,जैन तीर्थ कुंडलपुर की पावन धरा से युग श्रेष्ठ संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य पूज्य आचार्य श्री समय सागर जी महाराज के मंगल आशीर्वाद से निर्यापक श्रमण मुनि श्री प्रसाद सागर जी महाराज ,मुनि श्री पदम सागर जी महाराज ,मुनि श्री शीतल सागर जी महाराज नए उप संघ का मंगल विहार कुंडलपुर से हो गया।</p>
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		<title>आचार्य भगवन जन -जन के प्राणी मात्र के भगवान है राम भगवान तो भारत क्या पूरे विश्व के हैं  </title>
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		<pubDate>Mon, 06 May 2024 16:36:44 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[सुप्रसिद्ध सिद्ध क्षेत्र कुंडलपुर में संत शिरोमणि आचार्य गुरुवर विद्यासागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य पूज्य आचार्य श्री समय सागर जी महाराज के मंगल आशीर्वाद से मुनि श्री निष्काम सागर जी महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा कि हमें बोलना नहीं आता ,उतना ज्ञान भी नहीं, परंतु आचार्य महाराज का आदेश हुआ है [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>सुप्रसिद्ध सिद्ध क्षेत्र कुंडलपुर में संत शिरोमणि आचार्य गुरुवर विद्यासागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य पूज्य आचार्य श्री समय सागर जी महाराज के मंगल आशीर्वाद से मुनि श्री निष्काम सागर जी महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा कि हमें बोलना नहीं आता ,उतना ज्ञान भी नहीं, परंतु आचार्य महाराज का आदेश हुआ है कि कुछ बोलना है ।हम अपनी बात आपके सामने रखने का प्रयास कर रहे हैं, जो अच्छा लगे ,आचार्य भगवन का समझ लेना और जो त्रुटि लगे ,अल्पज्ञ समझ कर क्षमा कर देना । <span style="color: #ff0000">पढि़ए विशेष रिपोर्ट …</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>कुंडलपुर ।</strong>सुप्रसिद्ध सिद्ध क्षेत्र कुंडलपुर में संत शिरोमणि आचार्य गुरुवर विद्यासागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य पूज्य आचार्य श्री समय सागर जी महाराज के मंगल आशीर्वाद से मुनि श्री निष्काम सागर जी महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा कि हमें बोलना नहीं आता ,उतना ज्ञान भी नहीं, परंतु आचार्य महाराज का आदेश हुआ है कि कुछ बोलना है ।हम अपनी बात आपके सामने रखने का प्रयास कर रहे हैं, जो अच्छा लगे ,आचार्य भगवन का समझ लेना और जो त्रुटि लगे ,अल्पज्ञ समझ कर क्षमा कर देना ।एक संस्कारी गांव था। एक साधु के आने की जानकारी गांव वालों को लगी। गांव वालों ने सुना,हमारे छोटे से गांव में संत- महात्मा पधार रहे हैं, तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा ।गांव के लोगों ने उनकी आगवानी हेतु भव्य से भव्य तैयारियां की।</p>
<p>गांव वालों ने उनकी भव्य आगवानी की। गांव वालों की आगवानी देखकर उन संत के मुंह से निकल पड़ा।बड़े से बड़े गांव और नगरों में भी हमारी ऐसी आगवानी नहीं हुई, जितनी अच्छी आगवानी छोटे से गांव में हमारे लिए लोगों ने की। हाथी ,घोड़ा ,बैलगाड़ी, बैंड- बाजे ,तोरणद्वार ,रंगोली आदि जो तैयारी थी, सब गांव के लोगों ने की। उनकी आगवानी देखकर संत -महात्मा ने मन बनाया। कुछ दिन इस गांव के लोगों को देना चाहिए। रास्ते में मन बना रहे थे। पहुंचने शाम हो गई तो गांव वालों ने अतिथि सत्कार किया। भोजन आदि की व्यवस्था की । रात में गांव के लोग पहुंचे, महात्मा हमें धर्म के बारे में बताइए।</p>
<p><strong> रामलला का मंदिर भव्य बनना चाहिए </strong></p>
<p>महात्मा ने अपनी योग्यता अनुसार गांव के लोगों को उपदेश देना चालू किया और आश्वासन दिया कि हो सकेगा तो कुछ समय आपके यहां व्यतीत कर सकता हूं ।अब गांव के लोगों ने यथायोग भक्ति दिखाना शुरू कर दी। महात्मा का बहुत अच्छे से समय निकलता रहा, निकलता रहा ।उनका मन थोड़ा चंचल हो गया । कब तक यहां बैठा रहूंगा, गांव में कुछ घूमने- फिरने निकल जाऊं। घूमने निकले एक चौराहे से एक गली की ओर जाने के लिए मुड़ें, जैसे अग्रसर हुए ,गांव के लोगों ने कहा महात्मा उस गाली की ओर न जाएं। महात्मा ने कहा क्यों? हमारा निवेदन है कि महाराज आप उस और ना जाये । जो भी व्यक्ति उस गली में जाता है, लौटकर नहीं आता। काल के गाल में समा जाता है।उन्होंने गांव वालों से प्रश्न किया। आप लोग ऐसा क्यों बोल रहे हैं ,गांव वालों से प्रति प्रश्न किया। आखिर ऐसा क्यों बोल रहे हो ,वहां ऐसा क्या है ।वहां रास्ते में बहुत बड़ा कुंआ है ,कुआं के पास वृक्ष है, वृक्ष में सांप की बहुत बड़ी बांबी बनी हुई है ।उसके अंदर बहुत बड़ा नागराज है ।जो वहां आने वालों की जीवन लीला समाप्त कर देता है ।साधु तो साधु ,उन्होंने मन बना लिया, उधर से ही जाएंगे ।लोगों ने काफी प्रयास किया, नहीं माने साधु हठी हो गए ।कौन रोक सकता हैंउन्हें।</p>
<p>इस रास्ते से जाने का मन बना लिया और आगे जाकर देखते हैं, एक बड़ा नाग राहगीर की राह देख रहा है ।साधु के पहुंचते ही नाग ने देखा ,यह तो संत महात्मा है ,और उन्हें उच्चासन पर बिठाया। संत ने देखा, गांव के लोग कुछ और बोल रहे थे । पर नाग का स्वभाव दूसरा निकला ।दोनों ने आपस में चर्चा की।संत ने कहा ,तुम गांव के लोगों को क्यों परेशान करते हो। आसपास के गांव के लोग काफी गरीब हैं ,यह रास्ता गांव वालों का मुख्य रास्ता है।आपके कारण लोगों का आना-जाना नहीं होता। लोगों का व्यापार ठप्प हो गया है। आपको ऐसा करना शोभा नहीं देता। नागराज ने कहा मैंने कभी लोगों को परेशान नहीं किया ।</p>
<p>गांव के लोग मुझे देखकर पत्थर मारते हैं, मेरे शरीर को जीर्ण-शीर्ण कर देते हैं ,तो मुझे काटना पड़ता है। महात्मा ने कहा एक बार फुकार लगा दोगे,तो सब डर कर भाग जाएंगे, काटने की जरूरत नहीं पड़ेगी। नागराज ने उनकी बात मान ली और बांबी में चले गए ।महात्मा वापस गांव में आए ।लोगों को उनके चेहरे की प्रशंसा देखकर खुशी हुई। गांव वालें महात्मा से पूरा वार्तालाप सुनकर प्रसन्न हुए ।अब नागराज किसी को नहीं कटेगा। सब अपना व्यापार अच्छे से कर सकेंगे ।कुछ समय में संत महात्मा दूसरे गांव चले गए ।कुछ समय निकलने के बाद पुनः महात्मा उसी गांव में आए और उसी रास्ते से कुएं के पास पेड़ के नीचे बांबी के बाहर बैठे नागराज की दशा देखकर, उनकी जीर्ण-शीर्ण हालत देखकर पूछा, यह कैसे हुआ ।नागराज ने बताया गांव के लोग, बच्चे यहां से निकलते हैं, तो मुझे डंडे मारते, पत्थर मारते, मैंने ना काटने का नियम आपसे लिया था ।इस कारण हमारी यह दशा हो रही है। महिलाएं तो मेरे साथ बहुत बुरा बर्ताव करती हैं ।महात्मा ने कहा मैंने काटने को नहीं कहा था ।</p>
<p>पर फुकार देने को बोला था ।तुम भूल गए फुकारना और यह तुम्हारी दशा हुई।जब बुंदेलखंड में धर्म के नाम पर कुछ नहीं था। तब एक साधक ने यहां आकर लोगों को संस्कारित कर दिया । पूरे देश में बुंदेलखंड का नाम कर दिया और तो और कुंडलपुर में जो देखने मिल रहा है, वह सब विद्यासागर जी महाराज की महती कृपा है ।अब बड़े बाबा का दर्शन करने दूर-दूर से लोग आ रहे हैं। 2019 में आचार्य भगवन का चातुर्मास नेमावर में चल रहा था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दूसरे नंबर के महोदय गोपाल कृष्ण को मोहन भागवत ने भेजा था । आचार्य श्री के दर्शन करने जाए और अयोध्या में जो रामलला का मंदिर बन रहा है, उसके बारे में चर्चा करके आए। आचार्य श्री ने उनसे कहा था। राम भगवान तो भारत क्या ,पूरे विश्व के हैं ,उनका मंदिर बड़ा बनना चाहिए। आप कुंडलपुर जाए। वहां का मंदिर देखकर आए और रामलला का जो भव्य मंदिर बना है ।वह बड़े बाबा के मंदिर के अनुरूप निर्माण किया गया। आचार्य भगवन जन जन के प्राणी मात्र के भगवान हैं।</p>
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		<title>भगवान नमीनाथ का मोक्ष कल्याणक महोत्सव 7 मई को  भक्ति भाव पूर्वक चढ़ाया जाएगा निर्वाण लाडू </title>
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		<pubDate>Mon, 06 May 2024 16:00:48 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[सुप्रसिद्ध सिद्ध क्षेत्र जैन तीर्थ कुंडलपुर, में जैन धर्म के 21वें तीर्थंकर भगवान श्री नमीनाथ जी का मोक्ष कल्याणक महोत्सव 7 मई को पूज्य आचार्य श्री समय सागर जी महाराज के चतुर्विध संघ के सानिध्य में धूमधाम से मनाया जाएगा ।पढि़ए राजीव सिंघई मोनू की रिपोर्ट …… कुंडलपुर।सुप्रसिद्ध सिद्ध क्षेत्र जैन तीर्थ कुंडलपुर में जैन [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>सुप्रसिद्ध सिद्ध क्षेत्र जैन तीर्थ कुंडलपुर, में जैन धर्म के 21वें तीर्थंकर भगवान श्री नमीनाथ जी का मोक्ष कल्याणक महोत्सव 7 मई को पूज्य आचार्य श्री समय सागर जी महाराज के चतुर्विध संघ के सानिध्य में धूमधाम से मनाया जाएगा ।<span style="color: #ff0000">पढि़ए राजीव सिंघई मोनू की रिपोर्ट ……</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>कुंडलपुर।</strong>सुप्रसिद्ध सिद्ध क्षेत्र जैन तीर्थ कुंडलपुर में जैन धर्म के 21वें तीर्थंकर भगवान श्री नमीनाथ जी का मोक्ष कल्याणक महोत्सव 7 मई को पूज्य आचार्य श्री समय सागर जी महाराज के चतुर्विध संघ के सानिध्य में धूमधाम से मनाया जाएगा ।इस अवसर पर प्रातः भक्तांमर महामंडल विधान ,पूज्य बड़े बाबा का अभिषेक ,शांति धारा ,पूजन विधान होगा ।</p>
<p>इस अवसर पर अत्यंत भक्ति भाव पूर्वक निर्वाण लाडू चढ़ाया जाएगा ।आचार्य श्री का पूजन ,मुनि श्री के प्रवचन, मुनि संघ एवं आर्यिका संघ की आहार चर्या होगी। सांयकाल भक्तांमर दीप अर्चना एवं पूज्य बड़े बाबा की संगीतमय महा आरती होगी।</p>
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		<title>मुनि श्री निरीहसागर जी ने सुनाएं प्ररेणादायक प्रसंग धीरे कोई काम नहीं होना चाहिए </title>
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		<pubDate>Sun, 05 May 2024 15:38:17 +0000</pubDate>
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<p><strong>सुप्रसिद्ध सिद्ध क्षेत्र, जैन तीर्थ कुंडलपुर में युग श्रेष्ठ संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य आचार्य श्री समय सागर जी महाराज के मंगल आशीर्वाद से मुनिश्री निरीह सागर जी महाराज ने प्रवचन देते हुए कहा कल शाम को आचार्य भक्ति के बाद आचार्य श्री ने मुझे बुलाया ,एक ब्रह्मचारी के माध्यम से और कहा कि कल आपको प्रवचन करना है। हमने कहा हमसे बड़े-बड़े महाराज जी हैं, उन्होंने कहा सब कर चुके हैं ।आपको करना है ।कुछ प्रसंग ऐसे होते हैं ,जो सामान्य लोगों ने कभी नहीं सुने, लेकिन जो ऊपर मंच पर बैठे हुए हैं, उनके सुने हुए हैं, वही बात यहां से सुनेंगे तो उनको कैसा लगेगा।<span style="color: #ff0000">पढि़ए राजीव सिंघई मोनू की रिपोर्ट ……</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>कुंडलपुर।</strong> सुप्रसिद्ध सिद्ध क्षेत्र, जैन तीर्थ कुंडलपुर में युग श्रेष्ठ संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य आचार्य श्री समय सागर जी महाराज के मंगल आशीर्वाद से मुनिश्री निरीह सागर जी महाराज ने प्रवचन देते हुए कहा कल शाम को आचार्य भक्ति के बाद आचार्य श्री ने मुझे बुलाया ,एक ब्रह्मचारी के माध्यम से और कहा कि कल आपको प्रवचन करना है। हमने कहा हमसे बड़े-बड़े महाराज जी हैं, उन्होंने कहा सब कर चुके हैं ।आपको करना है ।कुछ प्रसंग ऐसे होते हैं ,जो सामान्य लोगों ने कभी नहीं सुने, लेकिन जो ऊपर मंच पर बैठे हुए हैं, उनके सुने हुए हैं, वही बात यहां से सुनेंगे तो उनको कैसा लगेगा। सन 1983 की बात है, आचार्य श्री का चातुर्मास ईसरी शिखरजी की तलहटी में हो रहा था ।वहां पर उन्होंने जो प्रवचन में कहा था।</p>
<p>हमने किसी साधक के मुंह से ही प्रवचन में सुना था ,वह आपके सामने रख रहा हूं। उन्होंने प्रवचन में कहा कि जो छोटा बच्चा होता है, उसकी मां दूध पिलाती है तो वह मचलता बहुत है ,कटोरी में दूध रखा है, चम्मच है ,मां ने गोदी में लिटाया, वह हाथ पैर हिला रहा है ,मुंह भी इधर-उधर कर रहा है ,दूध पीना नहीं चाहता, लेकिन मां समझदार है, बच्चा भूखा है, उसको दूध पिलाना है, जबरदस्ती पिलाना है ,यदि नहीं पिलाया तो काम नहीं करने देगा, बीच में रोएगा। दूध पिलाती है और वह छोटे-छोटे हाथ- पैर चलाता रहता है ,पूरे समय गर्दन भी इधर-उधर होती रहतीहै, तो मां युक्ति से उसके हाथ- पैर को अपने पैरों से दबा लेती है और मुंह को पकड़ लेती, नाक दबा देती ,उसके मुंह में चम्मच से दूध भर देती है, नाक तब तक दबाए रहती, जब तक कि वह गटक नहीं लेता ।ऐसे जबरदस्ती करके दूध पिलाती जाती है। दो-तीन कटोरी दूध वह पी लेता है ।</p>
<p>शरारती बच्चा था ,जबरदस्ती पिलाया ।ज्यादा ही शरारती था तो बाद में दही बनाकर निकाल देता है ।कुछ ऐसे बच्चे भी होते हैं जो दही बनाकर निकाल देते ।आचार्य जी ने कहा मां जबरदस्ती दूध पिलाती है कि वह काम करने नहीं देगा। बाद में रोएगा।</p>
<p><strong>जितना ग्रहण कर सको, वह सामने रख दिया </strong></p>
<p>मैं भी आपको प्रवचन जबरदस्ती पिला रहा हूं ,आप पीना नहीं चाहते आपको पिला रहा हूं ,बाद में आप कहेंगे ,अपनी समस्या रखेंगे ,इसलिए पहले ही सुना रहा हूं। मैंने आचार्य श्री के मुख से साक्षात तो नहीं सुना। किसी साधु के मुख से सुना था, जितना ग्रहण कर पाए ,आपके सामने रख दिया ।ऐसा ही एक प्रसंग 2011 का है, उसमें मुनि प्रसाद सागर जी का ज्यादा है। आप उन्हें जानते हैं, सब कुछ जल्दी-जल्दी कार्य होना चाहिए ।धीरे कोई काम नहीं होना चाहिए। वैसे ही कुछ हुआ।हम लोग विहार कर रहे थे। दक्षिण यात्रा में गए थे ।ब्रह्मचारी अवस्था में थे। आचार्य श्री राजनांदगांव में थे । हम लोगों की बस दुर्ग से राजनांदगांव पहुंची। वहां हम लोग, 36 ब्रह्मचारी पहुंचे ।आचार्य श्री छत्तीसगढ़ में विराजमान थे।36 मूलगुण के धारी ,आचार्य श्री के पास ।उनमें से 18 की मुनि दीक्षा हो चुकी है, कुछ क्षुल्लक बन चुके हैं, कुछ ब्रह्मचारी हैं ।श्रवणबेलागोला पहुंचे ।हम लोगों ने भट्टारक जी से अनुमति चाही, रात के समय वहां 7&#8211;8 बजे बाद अनुमति नहीं थी उनके पास पहुंचे, वहां दो आर्यिका माता बैठी थी। कुछ तत्व चर्चा चल रही थी ।हम लोग जाकर बैठ गए ।उनकी चर्चा समाप्त हुई ,आर्यिका माता उठकर चली गई।</p>
<p>हम लोगों ने अपनी चर्चा की अनुमति उनसे ली, 1 घंटे हमारी बात हुई।हम लोगों ने आर्यिका माता के दर्शन किए ।उन्होंने गवाशन मुद्रा में नमोस्तु किया। हम लोग 36 ब्रह्मचारी थे। आसपास कोई मुनि नहीं, नमोस्तु किसे किया। उन्होंने पूछा आचार्य श्री का स्वास्थ्य कैसा है ।हम लोग सोचने लगे, इन्हें कैसे मालूम हुआ कि हम आचार्य संघ के हैं, उन्होंने कहा ऐसे युवा हीरे उन्हीं के संघ में हो सकते हैं ।</p>
<p><strong>मिल गया पाद प्रक्षालन का अवसर</strong></p>
<p>आचार्य श्री का प्रभाव भी ऐसा था। अब 2018 का प्रसंग आता है ।डिंडोरी में आचार्य श्री थे महावीर जयंती के दूसरे दिन पपोरा जी के लिए विहार हुआ ।महावीर जयंती के समय और बाद में कितनी गर्मी होती है, हमने विहार में कुछ व्यवस्थाएं की, महाराज जी के आशीर्वाद से की ।वैसे हमें कुछ आता नहीं है, प्रवचन नहीं आता ,हम कुछ प्रसंग सुना रहे हैं ,पुराने महाराज थे। ब्रह्मचारी थे।जबलपुर का विहार हो रहा था ।दुर्लभ सागर महाराज ने कहा आपको यह काम करना है, पहले से वह स्थान देखना है, जहां आचार्य श्री को रोकना है ,ठंड है तो ठंड के अनुकूल ,गर्मी है तो गर्मी के हिसाब से व्यवस्था करनी है। हमने वैयावृती कैसी करनी है, तेल- घी तो सभी करते हैं, हमने कहा जो वैयावृती कोई नहीं करता,वह हम करेंगे और हम जहां रुकना,होता था आधे पौन घंटे पहले पहुंच जाते थे। जहां आचार्य श्री को रोकना है, वहां व्यवस्था ठंड- गर्मी के हिसाब से देख लेते थे। सभी महाराज के पाटे लगवा देते थे ।विद्यालय में ही रुकना होता था। वहां आहार होते थे। बहुत बड़ा प्रांगण था। किनारों पर कक्ष बने हुए थे। एक चौके वाले भाई आए और कहा हमें आचार्य श्री का पाद प्रक्षालन करना है ।हमने उन्हें कहा कि इस चबूतरे पर जल कोपर रख दो। सभी चौके वाले किनारे पर बैठ गए। आचार्य श्री आ रहे थे ।मुनि लोग आ रहे थे। संकेत कर दिया यहां आना है ।कोई पैर छूना नहीं, मैंने कह दिया ।आचार्य श्री ने दोनों पैर कोपर में डाल दिए ।आचार्य श्री के आदेश से सभी ने उनके पैर धुलाये ,उन लोगों का पुण्य था ।उन्हें पाद प्रक्षालन का अवसर मिल गया।</p>
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		<title>मुनि श्री समयसागर जी कहा सीखो वंदना करना: दर्शन पाठ की कारिका को करो आत्मसात </title>
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		<pubDate>Thu, 11 Apr 2024 16:06:48 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[दमोह जिले के सुप्रसिद्ध जैन तीर्थ कुंडलपुर में विश्व वंदनीय संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के जेष्ठ श्रेष्ठ निर्यापक श्रमण मुनि श्री समय सागर जी महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा कि आप लोगों ने पढ़ा होगा दर्शन पाठ में एक कारिका आती है दर्शनेन जिनेंद्रानाम&#8212;&#8212;-अंजलि बना लूं और उसमें एक-एक बूंद [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>दमोह जिले के सुप्रसिद्ध जैन तीर्थ कुंडलपुर में विश्व वंदनीय संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के जेष्ठ श्रेष्ठ निर्यापक श्रमण मुनि श्री समय सागर जी महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा कि आप लोगों ने पढ़ा होगा दर्शन पाठ में एक कारिका आती है दर्शनेन जिनेंद्रानाम&#8212;&#8212;-अंजलि बना लूं और उसमें एक-एक बूंद जल डाला तो वह रिस जाता है। इसी प्रकार जिनेंद्र भगवान के दर्शन और मुनींद्रों के दर्शन करने से चिर संचित जो पाप हैं एक क्षण में क्षय को प्राप्त हो जाते हैं ।<span style="color: #ff0000">पढ़िए रत्नेश जैन बकस्वाहा की रिपोर्ट …… </span></strong></p>
<hr />
<p><strong>कुंडलपुर ।</strong> दमोह जिले के सुप्रसिद्ध जैन तीर्थ कुंडलपुर में विश्व वंदनीय संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के जेष्ठ श्रेष्ठ निर्यापक श्रमण मुनि श्री समय सागर जी महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा कि आप लोगों ने पढ़ा होगा दर्शन पाठ में एक कारिका आती है दर्शनेन जिनेंद्रानाम&#8212;&#8212;-अंजलि बना लूं और उसमें एक-एक बूंद जल डाला तो वह रिस जाता है। इसी प्रकार जिनेंद्र भगवान के दर्शन और मुनींद्रों के दर्शन करने से चिर संचित जो पाप हैं एक क्षण में क्षय को प्राप्त हो जाते हैं ।दर्शन पाठ की कारिका का यह भाव है हमने कितने बार जिनेंद्र भगवान के दर्शन किए कितने बार मुनींदों के दर्शन किए इस उपरांत भी वह पाप गल क्यों नहीं रहा। वह पाप समाप्त क्यों नहीं हो रहा है ।क्षय को क्यों नहीं प्राप्त हो रहा है ।अब उत्तर क्या मिलेगा ,उत्तर यही मिलेगा उस कारिका को तो पढ़ लिया उसको आत्मसात नहीं कर पाए ।प्रसंग गुरुदेव के मुख से यह सुना की वंदना करना सीखो मैं बैठे-बैठे सुन रहा था मन में विचार आया गुरुदेव ने क्या कहा कि वंदना करना सीखो ।इसका अर्थ है प्रभु के सामने खड़े होने से वंदना नहीं होती मन भी खड़ा होना चाहिए ।हम तो प्रतिमावत खड़े हो गए पर मन हमारा कहां जा रहा मन में कौन-कौन सी अपेक्षाएं उत्पन्न हो रही उन अपेक्षाओं के साथ प्रभु की आराधना है वह आराधना नहीं मानी जाती। समीचीन आराधना हम करते हैं तो मोह कर्म के ऊपर प्रभाव पड़े बिना रह नहीं सकता। गुरुदेव के जो संकेत हैं उस पर हमारा ध्यान जा रहा बंदना करना सीखो हम अब तक नहीं सीख पाए यदि करते तो इस धरती पर नहीं होते ।मोक्ष की यात्रा होती संसार का परिभ्रमण होता है।</p>
<p><strong>भगवान अनंत शक्ति के धारक</strong></p>
<p>हर समय आत्मा में परिणाम उत्पन्न होते रहते हैं और वे परिणाम शुभातमत भी होते हैं और अशुभातमत भी परिणाम होते हैं ।परिणाम का होना अलग वस्तु और परिणाम का कट जाना अलग वस्तु ।गुरुदेव हम लोगों को बार-बार प्रतिदिन प्रसंग बनाकर संबोधित करते थे वे वर्तमान में उपस्थित नहीं है किंतु भावों का तारतम्य बना रहे तो निश्चित रूप से परिणामों में उज्जवलता आ सकती है ।वह परिणाम जो होते हैं उसमें निश्चित रूप से पूर्व में अज्ञान दशा में जो भी पाप का अर्जन किया है उसके प्रतिफल के रूप में जब कर्म उदय में आते है तो उपयोग को प्रभावित कर सकता है ।कर सकता है इसलिए कह रहा हूं यदि अनिवार्य रूप से वह प्रभाव डाले तो फिर कर्मबंध की जो श्रृंखला है या उसकी जो परंपरा है वह कभी भी टूट नहीं सकती है। पुरुषार्थ के माध्यम से उस परंपरा को तोड़ने का पुरुषार्थ किया जा सकता है ।जिसके अंदर कर्मबंध के जो हो रहा है वंध उसको तोड़ने का पुरुषार्थ वह कर लेता है और दूसरी बात यह है कि जिसको कर्मबंध की कोई चिंता नहीं है उसके लिए? जिसको कर्मबंध की कोई चिंता नहीं है भगवान का उपदेश भी प्रभाव डालने वाला नहीं है। हम कह रहे जब भगवान अनंत शक्ति के धारक हैं,</p>
<p><strong>मुमुक्षु</strong> <strong>भव्य जीव जो चाहता है कल्याण</strong></p>
<p>विश्व को जानने वाले हैं उनका ज्ञान अपने आप में क्षायिक ज्ञान माना जाता है। दर्पणाते जिसको आप लोग बोलते हैं उनकी दिव्य ध्वनि में जो बात आती उनकी दिव्य ध्वनि की विराटता को कौन स्पष्ट कर रहे हैं गणधर परमेष्ठी जो द्वादशांग के पाटी माने जाते हैं गणधर पद पर आसीन हैं वे भी प्रभु की आराधना निरंतर करते रहते हैं और जो मुमुक्षु भव्य जीव है वह कल्याण करना चाहता है उसके लिए वह उपदेश देते हैं और उपदेश का प्रभाव भी उसी के ऊपर पड़ता है ।विस्मय सा होता कि अतीत में कितने बार अवसर प्राप्त हुए होंगे किसी को ज्ञात नहीं है कितने बार उपदेश सुने होंगे इसका ज्ञात नहीं किसी को ज्ञात है कितनी बार सुन लिया बार-बार सुनाओ ऐसा बोलते आचार्य महाराज सुना नहीं है क्योंकि कर्तव्य को गौण किया नहीं जा सकता भरी सभा में सब सुन रहे हैं मनोयोग के साथ धर्म की जो आराधना करता है उसके लिए धर्म श्रवण का लाभ मिल सकता है सुनने के लिए कर्णद्रिय है जिसके माध्यम से शब्द को ग्रहण किया जाता है। किंतु जिसके पास मन नहीं है मात्र कानों के द्वारा उस वाणी को ग्रहण कर रहा है, सुन रहा है न वह दूसरे को सुना पाएगा ना वह स्वयं ग्रहण कर पाएगा उसका अर्थ उसको समझने की क्षमता मन के पास है ।मन को जितने भी सुनने को बैठे हैं श्रोतागण, श्रोतागण उनको मान रहा आप समझ ले जो वृति है वह अलग है उनके पीछे जो बैठे हैं उनको मैं श्रोता के रूप में स्वीकार करता हूं। उनको यह उपदेश है जिन्होंने गुरुदेव के उपदेश और आदेश को आत्मसात करके जो साधना में रत हैं यथायोग्य व्रतो का पालन करने के लिए जो निरंतर प्रयास रत है उनको उपदेश नहीं है आप ही लोग बोलते जो सो रहा उसको क्या जगाना जो जाग रहा है उसको क्या सुनाना। आप लोग जागृत हैं जो जागृत है उसके लिए उपदेश काम करता है।</p>
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