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	<title>जिन सहस्रनाम मंत्राभिषेक &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>प्रथम समाधि दिवस पर गुरु मंदिर का लोकार्पण: गुरु के उपकार को हम सदियों तक भी नहीं चुका सकते- आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज  </title>
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		<pubDate>Fri, 04 Jul 2025 12:20:11 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री विराग सागर महाराज के प्रथम समाधि दिवस पर 13 फीट गुरु मंदिर का लोकार्पण हुआ। जिसका सौभाग्य संतोष कुमार नितिन कुमार सबदरा परिवार को प्राप्त हुआ। आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज सानिध्य में मुनिश्री प्रांजल सागर महाराज के निर्देशन में लोकार्पण हुआ। रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर&#8230; रामगंजमंडी। आचार्य [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य श्री विराग सागर महाराज के प्रथम समाधि दिवस पर 13 फीट गुरु मंदिर का लोकार्पण हुआ। जिसका सौभाग्य संतोष कुमार नितिन कुमार सबदरा परिवार को प्राप्त हुआ। आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज सानिध्य में मुनिश्री प्रांजल सागर महाराज के निर्देशन में लोकार्पण हुआ। <span style="color: #ff0000">रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>रामगंजमंडी।</strong> आचार्य श्री विराग सागर महाराज के प्रथम समाधि दिवस पर 13 फीट गुरु मंदिर का लोकार्पण हुआ। जिसका सौभाग्य संतोष कुमार नितिन कुमार सबदरा परिवार को प्राप्त हुआ। आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज सानिध्य में मुनिश्री प्रांजल सागर महाराज के निर्देशन में लोकार्पण हुआ, जो बहुत ही भव्य अलौकिक यह मंदिर लगभग 13 फीट का है। जिसे योगेश जैन जबलपुर के निर्देशन में तैयार किया गया है। इसमें लगभग 20 कारीगरों ने मिलकर तैयार किया है। इसे बनाने में डेढ़ महीने का समय लगा। योगेश जैन ने बताया कि आचार्य श्री के आशीर्वाद एवं मुनि श्री प्रांजल सागर महाराज की प्रेरणा से इसका निर्माण किया गया है। इसमें क्रिस्टल और अमेरिकन डायमंड का उपयोग किया गया है।</p>
<p>लोकार्पण से पूर्व सर्वप्रथम आचार्य श्री विराग सागर महाराज के प्रथम समाधि दिवस को आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज के सानिध्य में मनाया गया। सर्वप्रथम मूलनायक शांतिनाथ भगवान के समक्ष श्रीजी का अभिषेक एवं शांति धारा की गई। इसके उपरांत जिनसहस्त्र नाम के 1008 कलश से अभिषेक किया गया। शांतिधारा का सौभाग्य सुरेशकुमार सिद्धार्थ कुमार बाबरिया परिवार रामगंजमंडी एवं सुनील कुमार विवान सुरलाया परिवार को प्राप्त हुआ।</p>
<p><strong> गुरु पूजा के लिए बनाया गया आकर्षक मांडना </strong></p>
<p>अभिषेक शांतिधारा उपरांत विशेष थाल सजाकर आचार्य श्री विराग सागर का पूजन किया गया जिसे संगीत लहरियों के बीच मुनिश्री प्रांजल सागर महाराज ने कराया। जो भक्ति से ओतप्रोत रही। सभी का उत्साह भरपूर था पूजन के शुभारंभ से पूर्व मुनि श्री प्रांजल सागर महाराज ने मंगलाचरण किया। इसके उपरांत विशेष थाल सजाकर सभी समूह बच्चों ने क्रम से भक्ति नृत्य करते हुए भाव विभोर होकर अष्ट द्रव्य समर्पित किए। पूजन के लिए बनाया गया मांडना बहुत ही आकर्षक था। इस अवसर पर आचार्य श्री के पद प्रक्षालन का सौभाग्य दिलीप कुमार अरुण कुमार विनायका परिवार को प्राप्त हुआ।</p>
<p><strong>तीर्थंकर कहते हैं कि मरण के लिए पुरुषार्थ समाधि है</strong></p>
<p>इस अवसर पर आचार्य श्री ने आचार्य श्री विराग सागर महाराज के प्रति अपनी भावांजली दी। उन्होंने उन्होंने समाधि के विषय को समझाते हुए कहा कि मरण को मिटाने को समाधि कहते हैं। उन्होंने इसका विशेष रूप से इसका भावार्थ बताते हुए कहा कि तीर्थंकर कहते हैं कि मरण के लिए पुरुषार्थ समाधि है। समाधि का अर्थ लक्ष्य तक पहुंचना है। उन्होंने कहा हम बार-बार मर चुके हैं लेकिन, एक बार भी समाधि नहीं हुई अगर अवसर मिले समझने का तो निर्णय करना चाहिए। जैन दर्शन कहता है कि भगवान प्राप्त किसी को नहीं होते मार्ग है भगवान बनने का कि हम अपनी समाधि करें।</p>
<p><strong>समाधि की यह अवस्था दुर्लभ एवं मुश्किल होती है</strong></p>
<p>मुनिश्री ने कहा कि आचार्य श्री ने अनेकों समाधि कराई है। आचार्य श्री मोह से हटाकर त्याग में प्रवेश कराकर कुशलता से समाधि कराते थे। उनकी समाधि के समय नियति ने उन्हें पूरा अवसर दिया संपूर्ण जागृत अवस्था में उन्होंने समाधि की यह अवस्था दुर्लभ एवं मुश्किल होती है। उन्होंने भगवती आराधना का पालन किया निर्णय किया और अपने पद त्याग दिया और अपना पद दूसरों को दिया यह निर्णय कठिन होता है। उन्होंने पद का त्याग ही नहीं किया व्यवस्था भी बना दी की पद को कौन संभालेगा।</p>
<p><strong>हम धर्म का आचरण करने को तैयार हैं</strong></p>
<p>मुनिश्री ने कहा कि गुरु के लिए सब बराबर होते हैं लेकिन, एक को चुनना होता है। गुरुदेव हम सबको एक साथ रहना सिखाया है। आचार्य श्री ने बहुत कुछ दिया। इसी कारण पंचम काल में हम निर्बाध रूप से हम धर्म का आचरण करने को तैयार हैं। जो धर्म की गहराई से नहीं जुड़ सकता वह समाधि से नहीं जुड़ सकता त्याग आपको धर्म से जोड़ता है और सुख से जोड़ता है।</p>
<p><strong>गुरु गुरु होते हैं वह शिष्य को बहुत कुछ दे जाते हैं </strong></p>
<p>गुरु गुरु होते हैं वह शिष्य को बहुत कुछ दे जाते हैं लेकिन शिष्य गुरु को कुछ भी नहीं दे पाता है। गुरुदेव ने मुझे सिखाया समझाया गुरुदेव ने हमें बनाने में बहुत मेहनत की। गुरुवर ने इतना संभाला इतना संभाला वह ज्ञान देते गए हम लेते गए और चार महीने में ही गुरुदेव ने हाथ में पिच्छि दे दी। गुरु के उपकार को हम सदियों तक भी नहीं चुका सकते उनकी शिक्षा और उनकी स्मृति जीवन में उतारी जा सकती है।</p>
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		<title>आचार्य श्री विराग सागर का प्रथम समाधि दिवस मनाया: 1008जिन सहस्रनाम मंत्राभिषेक किया गया  </title>
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		<pubDate>Fri, 04 Jul 2025 08:04:59 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री विरागसागर महाराज का प्रथम समाधि दिवस आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज संघ सानिध्य में शुक्रवार को मनाया गया। इसमें प्रातः बेला में श्रीजी का अभिषेक शांतिधारा उपरान्त 1008 जिन सहस्रनाम मंत्राभिषेक किया गया। रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर&#8230; रामगंजमंडी। आचार्य श्री विरागसागर महाराज का प्रथम समाधि दिवस आचार्य श्री [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य श्री विरागसागर महाराज का प्रथम समाधि दिवस आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज संघ सानिध्य में शुक्रवार को मनाया गया। इसमें प्रातः बेला में श्रीजी का अभिषेक शांतिधारा उपरान्त 1008 जिन सहस्रनाम मंत्राभिषेक किया गया। <span style="color: #ff0000">रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>रामगंजमंडी।</strong> आचार्य श्री विरागसागर महाराज का प्रथम समाधि दिवस आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज संघ सानिध्य में शुक्रवार को मनाया गया। इसमें प्रातः बेला में श्रीजी का अभिषेक शांतिधारा उपरान्त 1008 जिन सहस्रनाम मंत्राभिषेक किया गया। इसके उपरांत आचार्य श्री विराग सागर महाराज का गुरु पूजन किया गया। जिसके लिए विशेष गुरु मंदिर बनाया गया। इस कार्यक्रम में विशेष थाल सजाकर अष्ट द्रव्यों से पूजन किया गया। इसी अनुपम बेला में विनयांजलि दी गई।</p>
<p><strong>आचार्य श्री विराग सागर महाराज का परिचय </strong></p>
<p>आचार्य विराग सागर का जन्म 2 मई 1963 को दमोह जिले के पथरिया में हुआ था। बचपन से ही सूर्य की तरह चमक और बुद्धि के धनि बालक अरविंद (बचपन का नाम) ने पथरिया के ही शासकीय प्राथमिक शाला में पांचवीं तक शिक्षा प्राप्त की। इसके बाद 1974 में 11 वर्ष की आयु में ही उन्होंने वैराग्य का रास्ता धारण किया और पिता कपूर चंद और मां श्यामा देवी जैन के आाशीर्वाद पर वह कटनी शांति निकेतन जैन संस्कृत विद्यालय में पढऩे के लिए चले गए। जहां धार्मिक, शास्त्र और लौकिक शिक्षा से मेट्रिक पास की। इसके बाद वह शास्त्री बन गए और साधु, संतों के साथ रहते हुए अरविंद का का ज्ञान और बढ़ता गया। यही समय था कि उन्होंने जिन शासन में अपना योगदान देने का मन बना लिया था। धर्म की राह पर निकले अरविंद ने फिर घर की ओर नहीं देखा। यही वजह थी 1980 में वह समय आया जब उनकी शिक्षा, त्याग और ज्ञान को गुरु का आशीर्वाद मिला। तपस्वी सम्राट आचार्य सन्मति सागर ने मप्र के शहडोल जिले के बुढ़ार में अरविंद शास्त्री को 20 फरवरी 1980 को क्षुल्लक दीक्षा दी। तब अरविंद 17 साल के ही थे। साथ ही उन्हें नई पहचान क्षुल्लक पूर्णसागर के रूप में मिली। गुरू से क्षुल्लक दीक्षा के बाद उनकी तपस्या और बढ़ गई। जिसे देख आचार्य विमलसागर महाराज ने 9 दिसंबर 1983 यानि 20 वर्ष की उम्र में उन्हें मुनि दीक्षा दी और यहीं सें उनका नाम मुनि विराग सागर हुआ। विराग सागर को मुनि दीक्षा महाराष्ट्र के औरंगाबाद में मिली थी। मुनि रहते विरागसागर ने त्याग और तपस्या बढ़ाई। अनेक जगहों पर विहार कर धर्म प्रभावना बढ़ाई। जिसे देख गुरू आचार्य विमलसागर ने 8 नवंबर 1992 को मप्र के छतरपुर जिले के द्रोणागिरी में मुनि विरागसागर को आचार्य पद जैसी बड़ी जिम्मेदारी सौंप दी। तब उनकी उम्र महज 29 वर्ष ही थी।</p>
<p><strong>बुंदेलखंड के प्रथम आचार्य ऐसे बने गणाचार्य</strong></p>
<p>29 की उम्र में ही आचार्य पद की जिम्मेदारी मिलने के बाद विराग सागर ने जैन संस्कृति की धर्म प्रभावना को ऐसा बढ़ाया कि हर युवा उनसे प्रभावित होने लगा। न सिर्फ बुंदलेखंड, मप्र बल्कि उप्र, विहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र सहित अन्य प्रांतों में विहार करते हुए धर्म पताका फहराया। इस दौरान आचार्य विरागसागर ने संघ में 94 मुनियों, 73 आर्यिकाओं, 5 ऐलक, 23 क्षुल्लक, 32 क्षुल्लिका दीक्षाएं देकर युवाओं को मोक्ष मार्ग की और प्रशस्त किया। इस तरह करीब 222 साधु, साध्वियां विराग सागर के बड़े संघ में हैं। इसके अलावा 110 ऐसे वृद्धजनों को दीक्षा देकर संलेखना की ओर ले गए, जिनका जीवन पूरी तरह धर्म में व्यतीत रहा हो। आचार्य विराग सागर ने अपने शिष्यों के ज्ञान की परख करते हुए बीच में ही 9 मुनियों को आचार्य पद दे दिया था। इसीलिए बुंदलेखंड के प्रथम आचार्य विराग सागर को अब गणाचार्य की उपाधि मिल चुकी थी।</p>
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