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	<title>जिनशासन &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>युगनायक भंडारी पदमचंद्र मसा का भावपूर्ण स्मरण : आचार्य हितेशचंद्र सूरीश्वर के सान्निध्य में कार्यक्रम </title>
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		<pubDate>Sat, 02 May 2026 12:46:10 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री हितेशचंद्र सूरीश्वर जी मसा के सान्निध्य में धर्मसभा में दादा गुरुदेव भंडारी श्री पदमचंद्र मसा के दिव्य जीवन और योगदान का भावपूर्ण स्मरण किया गया। मात्र 17 वर्ष की आयु में दीक्षा ग्रहण कर उन्होंने तप, त्याग, ज्ञान, ध्यान और सेवा के माध्यम से जन-जन के हृदय में श्रद्धा का केंद्र स्थापित किया। [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य श्री हितेशचंद्र सूरीश्वर जी मसा के सान्निध्य में धर्मसभा में दादा गुरुदेव भंडारी श्री पदमचंद्र मसा के दिव्य जीवन और योगदान का भावपूर्ण स्मरण किया गया। मात्र 17 वर्ष की आयु में दीक्षा ग्रहण कर उन्होंने तप, त्याग, ज्ञान, ध्यान और सेवा के माध्यम से जन-जन के हृदय में श्रद्धा का केंद्र स्थापित किया। <span style="color: #ff0000">पढ़िए, इंदौर की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> आचार्य श्री हितेशचंद्र सूरीश्वर जी मसा के सान्निध्य में धर्मसभा में दादा गुरुदेव भंडारी श्री पदमचंद्र मसा के दिव्य जीवन और योगदान का भावपूर्ण स्मरण किया गया। मात्र 17 वर्ष की आयु में दीक्षा ग्रहण कर उन्होंने तप, त्याग, ज्ञान, ध्यान और सेवा के माध्यम से जन-जन के हृदय में श्रद्धा का केंद्र स्थापित किया। श्रमण संघ के प्रथम आचार्य श्री आत्माराम मसा के प्रिय शिष्य रहे भंडारी जी महाराज को उनकी उत्कृष्ट सेवाओं के लिए भंडारी की उपाधि प्रदान की गई, जो आगे चलकर उनकी पहचान बनी।</p>
<p><strong>108 मुमुक्षुओं को दीक्षा, जिनशासन की प्रभावना</strong></p>
<p>उनके आशीर्वाद से असंख्य श्रद्धालुओं के जीवन में सुख-शांति का संचार हुआ तथा उनकी प्रेरणा से 108 मुमुक्षु आत्माओं ने जैन दीक्षा ग्रहण कर जिनशासन की प्रभावना की। इनमें आचार्य डॉ. श्री शिव मुनि म.सा. का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। धर्मसभा को संबोधित करते हुए आचार्य विश्वरत्न सागर जी महाराज ने कहा कि गुणी संतों के गुणों का स्मरण करना पुण्य जागृत करने वाला होता है और जीवन को दिशा प्रदान करता है।</p>
<p><strong>पंकज मुनि व वरुण मुनि को अलंकरण</strong></p>
<p>आचार्य श्री हितेशचंद्र सूरीश्वर जी म.सा. ने भंडारी पदमचंद्र जी महाराज के व्यक्तित्व का वर्णन करते हुए उप प्रवर्तक श्री पंकज मुनि जी महाराज को दक्षिण भारत धर्म प्रभावक तथा श्री वरुण मुनि जी महाराज को “शासन सूर्य” की पदवी से अलंकृत किया।</p>
<p><strong>शिक्षा, चिकित्सा व समाजसेवा में योगदान</strong></p>
<p>उन्होंने बताया कि गुरुदेव की प्रेरणा से प्रवर्तक श्री अमर मुनि जी म.सा. ने जैनागम प्रकाशन का ऐतिहासिक कार्य किया तथा उनके मार्गदर्शन में देशभर में शिक्षा, चिकित्सा और समाजसेवा से जुड़ी अनेक संस्थाओं की स्थापना हुई, जो आज भी मानव सेवा में समर्पित हैं।</p>
<p><strong>कार्यक्रम में भक्ति व सामाजिक सेवा का समावेश</strong></p>
<p>कार्यक्रम का शुभारंभ मंगलाचरण से हुआ। संघ के महामंत्री रमेश भंडारी ने स्वागत उद्बोधन दिया, जबकि महासती श्री रश्मि जी एवं महासती श्री विजया जी सुमन ने भी अपने विचार व्यक्त किए। अभिग्रहधारी श्री राजेश मुनि जी महाराज ने गुरु गुणगान प्रस्तुत किया तथा आदर्श ज्योति बहु मंडल द्वारा स्वागत गीत एवं रोहन जैन द्वारा गुरु भक्ति गीत प्रस्तुत किया गया। संचालन श्री रुपेश मुनि जी महाराज एवं प्रकाश भटेवरा ने किया। इस अवसर पर अनेक श्रद्धालु उपस्थित रहे तथा मानव सेवा के उद्देश्य से अस्पताल को एक दंत चिकित्सा मशीन भेंट की गई।</p>
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		<title>जो सब कुछ त्याग देते हैं, वहीं परम शांति पाते हैं : आचार्य विशुद्ध सागर जी ने उत्तम त्याग धर्म पर दी मंगल देशना  </title>
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		<pubDate>Thu, 04 Sep 2025 14:33:19 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य विशुद्ध सागर महाराज जी ससंघ का मंगल चातुर्मास विरागोदय तीर्थ में चल रहा है। वैभव बडामलहारा जी ने बताया कि विरागोदय तीर्थ में आचार्य विशुद्ध सागर जी ने धर्मसभा में संबोधन करते हुए कहा कि त्याग उत्थान का सोपान है, त्याग सुख और मुक्ति का स्थान है। पथरिया से पढ़िए, अभिषेक अशोक पाटिल की [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य विशुद्ध सागर महाराज जी ससंघ का मंगल चातुर्मास विरागोदय तीर्थ में चल रहा है। वैभव बडामलहारा जी ने बताया कि विरागोदय तीर्थ में आचार्य विशुद्ध सागर जी ने धर्मसभा में संबोधन करते हुए कहा कि त्याग उत्थान का सोपान है, त्याग सुख और मुक्ति का स्थान है। <span style="color: #ff0000">पथरिया से पढ़िए, अभिषेक अशोक पाटिल की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>पथरिया।</strong> आचार्य विशुद्ध सागर महाराज जी ससंघ का मंगल चातुर्मास विरागोदय तीर्थ में चल रहा है। वैभव बडामलहारा जी ने बताया कि विरागोदय तीर्थ में आचार्य विशुद्ध सागर जी ने धर्मसभा में संबोधन करते हुए कहा कि त्याग उत्थान का सोपान है, त्याग सुख और मुक्ति का स्थान है। त्याग प्रकृति का नियम है। त्याग श्रेष्ठ धर्म है। त्याग शांति का उपाय है। त्याग साधना है। त्याग में आनंद है। त्याग स्वर्ग का सोपान है। त्याग सिद्धि का साधन है। त्याग कर्म क्षय का हेतु है। त्याग सज्जनों की कुल विद्या है। त्याग मुक्ति का उपाय है। निर्वाण के लिए त्याग आवश्यक है।</p>
<p><strong>त्याग दुःख से छूटने का उपाय है</strong></p>
<p>उन्होंने कहा कि संपूर्ण मोह का त्याग करके मन-वचन-काय से निर्वेग-भावना को भाते हैं। उनको त्याग धर्म होता है। मिष्ट भोजन, राग-द्वेष को उत्पन्न करने वाले उपकरण तथा ममत्म-भाव को उत्पन्न होने में निमित्त वसतिका को छोड़ देता है। उसी त्यागी को त्याग धर्म होता है। त्याग दुःख से छूटने का उपाय है। जो सबकुछ त्याग देते हैं। वहीं परम शांति को प्राप्त कर सकता है। जितना-जितना त्याग होगा, उतनी उतनी पूज्यता प्राप्त होती है। दुःख के कारणों को शीघ्र छोड़ना भी त्याग है।</p>
<p><strong>छोड़़ने से त्यागने से संकल्प-विकल्प कम होते है</strong></p>
<p>त्याग श्रमणों की परंपरा है। त्याग से ही मोक्ष मार्ग प्रारंभ होता है। त्याग के बिना समाधि संभव नहीं है। आंतरिक भावों से छोड़ना ही त्याग है। जोड़़ने में कष्ट है। छोड़ने में आनंद है। छोड़़ने से त्यागने से संकल्प-विकल्प कम होते हैं। निराकुलता बढ़ती है। घोड़कर चाहना, महापाप है। मुनियों, तपस्वियों की साधना में सहायक आहार, औषध, ज्ञानाराधना हेतु शास्त्र लेखनी एवं ठहरने हेतु भवन में स्थान देना, इसे त्याग जानना।</p>
<p><strong>त्याग पूर्वक दान देना चाहिए</strong></p>
<p>ममत्व छोड़‌ना ही त्याग है। शक्ति अनुसार व्यक्ति को त्याग करना चाहिए। जिससे साधक की साधना बढ़े, तप में वृद्धि हो, परिणाम विशुद्ध हो, मोक्षमार्ग प्रशस्त हो, ऐसे आगमानुकूल साधन (उपकरण) श्रावक द्वारा साधुओं को उपलब्ध कराना चाहिए। स्व पर उपकार हेतु, स्वयं के द्रव्य को, यथायोग्य पात्र को स्व हस्त से देना दान है। विधि, द्रव्य, दाता, पात्र और दान में विशेषता से आती है। त्याग पूर्वक दान देना चाहिए। त्याग पूर्वक दिया गया दान ही भूषण बनता है। दान देते समय किसी प्रकार की आकांक्षा नहीं होना चाहिए। निःकांक्ष भक्ति, निःकांक्ष दान का फल ही सर्वश्रेष्ठ उत्तम होता है। दान देते समय भव्य जीनों को हर्ष होता है।</p>
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		<title>तप में निराकुलता है इससे ही आनंद है : पट्टाचार्य विशुद्ध सागर जी महाराज ने कहा वही तप जिन शासन में श्लाघनीय है, जो आत्मा कल्याण करे  </title>
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		<pubDate>Thu, 04 Sep 2025 09:58:41 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[पट्टाचार्य विशुद्ध सागरजी महाराज ससंघ का मंगल चातुर्मास विरागोदय तीर्थ पथरिया में चल रहा है। यहां पर पर्युषण पर्व के दौरान दसलक्षण महोत्सव के तहत मुनिराजों के प्रवचनों और नित पूजन, अभिषेक, शांतिधारा, भक्ति, आराधना का दौर जारी है। पथरिया से पढ़िए, अभिषेक अशोक पाटिल की यह खबर&#8230; विरागोदय तीर्थ पथरिया। पट्टाचार्य विशुद्ध सागरजी महाराज [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>पट्टाचार्य विशुद्ध सागरजी महाराज ससंघ का मंगल चातुर्मास विरागोदय तीर्थ पथरिया में चल रहा है। यहां पर पर्युषण पर्व के दौरान दसलक्षण महोत्सव के तहत मुनिराजों के प्रवचनों और नित पूजन, अभिषेक, शांतिधारा, भक्ति, आराधना का दौर जारी है। <span style="color: #ff0000">पथरिया से पढ़िए, अभिषेक अशोक पाटिल की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p>विरागोदय तीर्थ पथरिया। पट्टाचार्य विशुद्ध सागरजी महाराज ससंघ का मंगल चातुर्मास विरागोदय तीर्थ पथरिया में चल रहा है। यहां पर पर्युषण पर्व के दौरान दसलक्षण महोत्सव के तहत मुनिराजों के प्रवचनों और नित पूजन, अभिषेक, शांतिधारा, भक्ति, आराधना का दौर जारी है। वैभव बडामलहारा ने बताया की विरागोदय तीर्थ में पट्टाचार्य विशुद्ध सागर जी ने धर्मसभा में कहा कि -वही तप जिनशासन में श्लाघनीय है, जो आत्म-कल्याण के लिए हो।</p>
<p>तप वहीं श्रेष्ठ है, जो कर्म-क्षय के लिए तपा जाए। आत्म भावना पूर्वक विविध प्रकार के काम-क्लेश समता पूर्वक सहन करना तप है। विषय-कषायों का निग्रह करते (हुए, ध्यान- अध्ययन के साथ, आत्म-भावनापूर्वक साधना करना ही तप है। तप से कर्म-निर्जरा होती है। इच्छाओं का शमन, आकांक्षाओं का अभाव ही तप है।</p>
<p>ज्ञान आत्म-बोधक है, तप आत्म शोधक है। अनशन, अवमोदर्य, वृत्ति परिसंख्यान, रस परित्याग, विविक्त शैयाशन, काय-क्लेश ये बाह्य तप हैं और प्रायश्चित्त, विनय, वैयावृत्य स्वाध्याय, व्युत्सर्ग, ध्यान ये अंतरंग तप हैं। सम्यग्दृष्टि वीतरागी-साधुओं के समीचीन-तप से कर्मक्षय होता है तथा शाश्वत-शांति का पथ प्रशस्त होता है। उन्होंने कहा कि उमंग, उत्साह पूर्वक तप करना चाहिए।</p>
<p><strong>आत्मा तप के प्रभाव से कर्म-कलंक से भिन्न होती है</strong></p>
<p>स्वस्थ अवस्था में किया गया तप शीघ्र ही श्सिद्धिश् प्रदान करता है। शरीर स्वस्थ है, इन्द्रियाँ स्वस्थ हैं, तब तक साधना कर लो, नहीं तो अस्वस्थ अवस्था में स्वयं ही नहीं संभलोगे तो साधना कैसे करोगे? कलिकाल में सर्व श्रेष्ठ कोई तप है, तो वह श्स्वाध्यायश् है। स्वर्ण अग्नि में तपाने पर उसकी किट्टिमा भिन्न हो जाती है, स्वर्ण चमकने लगता है, इसी प्रकार आत्मा तप के प्रभाव से कर्म-कलंक से भिन्न होकर शुद्ध हो जाती है।</p>
<p><strong>आत्म रुचि करो, समीचीन तप करो</strong></p>
<p>डरो मत, उराओ मत । तप स्वीकार करो, कर्म कलंक हरो। तप सिद्धि का साधन है। तप से प्रशंसा और प्रसिद्धि मिलती है। तप में निराकुलता है और निराकुलता ही आनंद है। शुद्धि चाहिए, तो विशुद्धि बढ़ाओ। विशुद्धि से ही आत्म-शुद्धि संभव है। शोध चाहिए तो बोध करो, बोध के बिना शोध नहीं। बोध, बोधी से ही शोध और समाधि संभव है। तपोगे, तभी दमकोगे। चमकना है तो तपना सीखो। तप करो, कर्म हरो, सिद्धालय के कंत बनो। जितना तपोगे, उतना चमकोगे। आत्म रुचि करो, समीचीन तप करो।</p>
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		<title>इस पंचम काल में एकल विहार ना करके संघ में रहना-आचार्य श्री विशुद्ध सागरजीः 21 से 25 मार्च तक पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव </title>
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		<pubDate>Wed, 12 Mar 2025 15:24:45 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[श्री विशुद्ध सागरजी ने दीक्षार्थी को जो प्रश्न पूछा वो हृदय को छू गया। एकल विहारी रहोगे क्या ? दीक्षा लेने वाले भैयाजी को दीक्षा के पूर्व सिरसाड पंचकल्याणक में यह प्रश्न आचार्यश्री द्वारा पूछा गया था। अनेक बार प्रवचन में भी अपने शिष्यों को इस पंचम काल में एकल विहार ना करके संघ में [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>श्री विशुद्ध सागरजी ने दीक्षार्थी को जो प्रश्न पूछा वो हृदय को छू गया। एकल विहारी रहोगे क्या ? दीक्षा लेने वाले भैयाजी को दीक्षा के पूर्व सिरसाड पंचकल्याणक में यह प्रश्न आचार्यश्री द्वारा पूछा गया था। अनेक बार प्रवचन में भी अपने शिष्यों को इस पंचम काल में एकल विहार ना करके संघ में रहने का उपदेश देते दिखाई देते हैं। <span style="color: #ff0000">पढ़िए मुंबई की पूरी खबर&#8230;.</span></strong></p>
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<p><strong>मुंबई (महाराष्ट्र)</strong> विशुद्धरत्न श्री सिद्धसागर महाराज जी ने बताया कि आचार्य भगवन श्री विशुद्धसागर महाराज जी ने दिक्षार्थी को जो प्रश्न पूछा वो हृदय को छू गया। एकल विहारी रहोगे क्या ? दीक्षा लेने वाले भैयाजी को दीक्षा के पूर्व सिरसाड पंचकल्याणक में यह प्रश्न आचार्य श्री विशुद्ध सागरजी द्वारा पूछा गया था। अनेक बार प्रवचन में भी आचार्यश्री विशुद्ध सागरजी अपने शिष्यों को इस पंचम काल में एकल विहार ना करके संघ में रहने का उपदेश देते दिखाई देते हैं। अवश्य आचार्य श्री विशूद्ध सागरजी को इस संदेश में गंभीरता भाषित हुई होंगी और इसके पालन में जिनशासन कि भलाई समझी होंगी। जरूर इसमें कोई रहस्य होंगा।</p>
<p><strong>संघपति बनने का सौभाग्य </strong></p>
<p>आचार्य विशुद्ध सागरजी ससंघ का मंगल विहार सिरसाड मुंबई से गणाचार्य विराग सागरजी महाराज समाधी स्थली जालना पंचकल्याणक महोत्सव के लिए शुरु है। श्री विशुद्ध सागरजी ससंघ के विहार के लिए संघपति बनने का सौभाग्य सोलापूर निवासी प्रेरणा व राजकुमार अमृतलाल दोशी, निशा व नूतन कुमार कस्तुरचंद गांधी, योगिता व संतोष जयकुमार शाह परिवार को संघपति बनने का परम सौभाग्य मिला।</p>
<p><strong>दोशी, गांधी व शाह सौभाग्यशाली परिवार </strong></p>
<p>अखिल भारतवर्षीय दिगंबर जैन युवा परिषद कोल्हापूर के कार्याध्यक्ष श्री अभिषेक अशोक पाटील ने बताया कि सोलापुर के दोशी, गांधी और शाह परिवार को सौभाग्यशाली परिवार को प.पु. सौम्य सागरजी का मंगल आशीर्वाद प्राप्त हुआ है। 5 मार्च से 26 अप्रैल 2025 तक सोलापुर निवासी दोशी, गांधी और शाह परिवार को मुंबई-जालना-इंदौर तक की पद विहार पावन यात्रा का संघपति बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। भक्ति का महाकुंभ आया है, गुरुदेव की सेवा में डूबने का मौका आया हैं। यह दायित्व उनकी गुरु भक्ति, धार्मिक समर्पण और सेवा भावना का प्रतीक है। उनका आचार्यश्री के प्रति श्रद्धा, समर्पण और गुरू भक्ति निःस्वार्थ और गहरी आस्था से परिपूर्ण है।</p>
<p><strong>21 से 25 मार्च तक भव्य पंचकल्याणक महोत्सव </strong></p>
<p>गणाचार्य विराग सागरजी के जिस धरा पर अपने नश्वर देह का त्याग कर उत्कृष्ट समाधि को प्राप्त किया उसी पावन धरा पर गणाचार्य विराग सागरजी के आचार्य श्री विशुद्ध सागरजी संसघ सानिध्य में अक्षय निर्वाण स्थली पर नव निर्माणाधीन श्री विराग अक्षय समाधि तीर्थ पर भव्य पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव आचार्यश्री विशुद्ध सागरजी ससंघ के सानिध्य में 21 से 25 मार्च 2025 तक प.पु. गणाचार्य श्री 108 विराग सागरजी महामुनिराज समाधि स्थल में भव्य पंचकल्याणक महोत्सव का आयोजन किया हैं। 7 से 12 एप्रिल 2025 तक उन पावापुरी में भव्य पंचकल्याणक महोत्सव दिगंबर जैन सिद्धक्षेत्र श्री उन पावापुरी जि. खरगोन मध्यप्रदेश में आचार्य भगवन श्री विशुद्ध सागरजी महाराज ससंघ के सानिध्य में आयोजित किया हैं। खरगोन में 14 से 16 अप्रैल तक भव्य वेदी शिखर प्रतिष्ठा दिगंबर जैन पोरवाड मंदिर में आचार्य भगवन श्री विशुद्ध सागरजी महाराज ससंघ के सानिध्य में आयोजित किया हैं।</p>
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