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	<title>जन्म एवं तप कल्याणक &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>भक्ति और वैराग्य का अनुपम संगम: भगवान मुनिसुव्रतनाथ जी के जन्म एवं तप कल्याणक 12 अप्रैल को </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shree Phal News]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 11 Apr 2026 14:22:28 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[तीर्थंकर मुनिसुव्रतनाथ स्वामी जैन धर्म के 20वें तीर्थंकर हैं। चैत्र शुक्ल दशमी का यह पावन दिन जैन जगत के लिए दोहरी खुशियों और आध्यात्मिक चेतना का अवसर लेकर आता है। चैत्र शुक्ल दशमी के दिन भगवान के जन्म और तप कल्याणक मनाया जाता है। इस बार यह 12 अप्रैल को आ रहा है। श्रीफल जैन [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>तीर्थंकर मुनिसुव्रतनाथ स्वामी जैन धर्म के 20वें तीर्थंकर हैं। चैत्र शुक्ल दशमी का यह पावन दिन जैन जगत के लिए दोहरी खुशियों और आध्यात्मिक चेतना का अवसर लेकर आता है। चैत्र शुक्ल दशमी के दिन भगवान के जन्म और तप कल्याणक मनाया जाता है। इस बार यह 12 अप्रैल को आ रहा है। <span style="color: #ff0000">श्रीफल जैन न्यूज की विशेष शृंखला में आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह संकलित, संयोजित और संपादित प्रस्तुति&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> तीर्थंकर मुनिसुव्रतनाथ स्वामी जैन धर्म के 20वें तीर्थंकर हैं। चैत्र शुक्ल दशमी का यह पावन दिन जैन जगत के लिए दोहरी खुशियों और आध्यात्मिक चेतना का अवसर लेकर आता है। आज ही के दिन प्रभु का जन्म कल्याणक और दीक्षा (तप) कल्याणक मनाया जाता है। यह दिन हमें सिखाता है कि कैसे राजसी सुखों के बीच रहकर भी आत्मा को परमात्मा बनाने की यात्रा शुरू की जाती है। भगवान मुनिसुव्रतनाथ जी का जन्म मगध देश की प्रसिद्ध नगरी राजगृह में हुआ था। इनके पिता राजा सुमित्र और माता रानी पद्मावती थीं।</p>
<p>अद्भुत आभा: प्रभु के शरीर का वर्ण ‘नीलमणि’ के समान श्यामल (नीला) था।</p>
<p>चिह्न: उनका लक्षण ’कछुआ (कूर्म)’ है, जो हमें अपनी इंद्रियों को समेटकर अंतर्मुखी होने का संदेश देता है।</p>
<p>अनुशासन का प्रतीक: मुनिसुव्रतनाथ जी के काल में मर्यादा पुरुषोत्तम राम का भी अस्तित्व माना जाता है, जिससे यह काल नैतिकता और अनुशासन के चरमोत्कर्ष का प्रतीक है। जब प्रभु का जन्म हुआ, तब इंद्रों ने सुमेरु पर्वत पर उनका जन्माभिषेक किया और संपूर्ण विश्व में सुख-शांति की लहर दौड़ गई।</p>
<p><strong>वैराग्य की ओर कदम: तप कल्याणक का संदेश</strong></p>
<p>भोग से योग की ओर संक्रमण ही जैन धर्म का मूल है। भगवान मुनिसुव्रतनाथ ने हजारों वर्षों तक राज्य संचालन किया, लेकिन उनके भीतर वैराग्य की लौ सदैव प्रज्वलित रही। जैसे कमल जल में रहकर भी उससे अछूता रहता है, वैसे ही प्रभु राजसी वैभव में रहकर भी विरक्त रहे।</p>
<p>चैत्र शुक्ल दशमी के दिन ही उन्होंने दीक्षा ग्रहण की। प्रभु ने सांसरिक मोह-माया का त्याग कर ‘नील’ नामक वन में जाकर जैनेश्वरी दीक्षा धारण की। उनके साथ हजारों राजाओं ने भी आत्म-कल्याण का मार्ग चुना। यह तप कल्याणक हमें याद दिलाता है कि वास्तविक शक्ति बाहरी विजय में नहीं, बल्कि अपनी इंद्रियों और इच्छाओं पर विजय प्राप्त करने में है।</p>
<p><strong>आज के दिन कैसे बढ़ाएं भक्ति प्रभावना?</strong></p>
<p>इस विशेष अवसर पर श्रावक-श्राविकाओं को अपनी आध्यात्मिक ऊर्जा बढ़ाने के लिए यह क्रियाएँ करनी चाहिए।</p>
<p>अभिषेक एवं शांतिधारा: प्रातः काल जिनालय जाकर प्रभु का केसरिया जल से अभिषेक करें।</p>
<p>पूजन और अर्घ्य: मुनिसुव्रतनाथ पूजन के माध्यम से उनके गुणों का स्तवन करें और विशेष अर्घ्य समर्पित करें।</p>
<p>सामायिक और ध्यान: कम से कम 48 मिनट का मौन रखकर प्रभु के स्वरूप का ध्यान करें।</p>
<p>शनि दोष निवारण: जैन परंपरा में मान्यता है कि भगवान मुनिसुव्रतनाथ की भक्ति करने से शनि ग्रह के अशुभ प्रभाव दूर होते हैं, क्योंकि वे न्याय और अनुशासन के स्वामी हैं।</p>
<p><strong>निष्कर्ष: प्रभु का मार्ग ही सच्चा मार्ग</strong></p>
<p>भगवान मुनिसुव्रतनाथ जी का जीवन हमें ‘व्रत’ की महिमा सिखाता है। उनके नाम में ही ‘मुनि’ और ‘सुव्रत’ (श्रेष्ठ व्रत) समाहित है। आज के इस आपाधापी भरे युग में प्रभु का संयम और तप हमें मानसिक शांति और सही दिशा प्रदान कर सकता है। आइए, इस चैत्र शुक्ल दशमी पर हम संकल्प लें कि हम भी प्रभु के बताए मार्ग पर चलते हुए अपने जीवन में अल्प मात्रा में ही सही, पर ‘व्रत’ और ‘नियम’ को स्थान देंगे।</p>
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		<title>जैन युग प्रवर्तक प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ जी का जन्म एवं तप कल्याणक 12 मार्च को : तिथि के अनुसार चैत्र कृष्ण नवमी को मनाया जाएगा </title>
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		<pubDate>Wed, 11 Mar 2026 08:11:27 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन धर्म में युग प्रवर्तक के रूप में पूज्य और आराध्य प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ जी का जन्म एवं तप कल्याणक 12 मार्च को समूचे विश्व में दिगंबर जैन मंदिरों में असीम भक्ति, पूर्ण श्रद्धा, अनुपम आस्था के साथ मनाया जाएगा। श्रीफल न्यूज की विशेष श्रृंखला में आज पढ़िए, उप संपादक प्रीतम लखवाल की यह [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जैन धर्म में युग प्रवर्तक के रूप में पूज्य और आराध्य प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ जी का जन्म एवं तप कल्याणक 12 मार्च को समूचे विश्व में दिगंबर जैन मंदिरों में असीम भक्ति, पूर्ण श्रद्धा, अनुपम आस्था के साथ मनाया जाएगा। <span style="color: #ff0000">श्रीफल न्यूज की विशेष श्रृंखला में आज पढ़िए, उप संपादक प्रीतम लखवाल की यह संकलित और संपादित प्रस्तुति&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> जैन धर्म में युग प्रवर्तक के रूप में पूज्य और आराध्य प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ जी का जन्म एवं तप कल्याणक 12 मार्च को समूचे विश्व में दिगंबर जैन मंदिरों में असीम भक्ति, पूर्ण श्रद्धा, अनुपम आस्था के साथ मनाया जाएगा। इंदौर सहित देश के हर शहर, कस्बे, नगर में विशेष पूजन और अर्चना का दौर रहेगा। जैन धर्म के विशिष्ट ग्रंथों और शाश्वत इतिहास में प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ (ऋषभदेव) का व्यक्तित्व एक युग प्रवर्तक का है। वे केवल एक धर्मगुरु नहीं, बल्कि सभ्यता के शिल्पकार थे। जिन्होंने मानव जाति को &#8216;असि, मसि और कृषि&#8217; का पाठ पढ़ाया। यहाँ उनके जन्म (च्यवन-जन्म) और तप कल्याणक पर आधारित एक विस्तृत और भावपूर्ण कथा के अनुसार हजारों वर्ष पूर्व, जब यह युग (अवसर्पिणी काल) अपने शैशव काल में था और कल्पवृक्षों का प्रभाव समाप्त हो रहा था, तब अयोध्या के राजा नाभिराय और माता मरुदेवी के आँगन में एक अलौकिक घटना घटी।</p>
<p><strong>16 स्वप्न और देवों का आगमन</strong></p>
<p>माता मरुदेवी ने रात्रि के अंतिम प्रहर में 16 शुभ स्वप्न देखे—गज, वृषभ, सिंह, लक्ष्मी और अग्निपुंज। ये स्वप्न इस बात का संकेत थे कि एक तीर्थंकर का आगमन होने वाला है। स्वर्ग के इंद्र का आसन डोल उठा और क्षण भर में ही पूरी अयोध्या नगरी देवों द्वारा रचित दिव्य वैभव से जगमगा उठी।</p>
<p><strong>जन्म का वह पावन और अलौकिक क्षण</strong></p>
<p>चैत्र कृष्ण नवमी के दिन भगवान का जन्म हुआ। पुराणों के अनुसार उस समय दिशाएं निर्मल हो गईं और तीनों लोकों में सुखद वातावरण छा गया। सौधर्म इंद्र ने बालक को सुमेरु पर्वत पर ले जाकर क्षीरसागर के जल से अभिषेक किया और उनका नाम &#8216;ऋषभ&#8217; रखा। उनके चरणों में &#8216;बैल&#8217; (वृषभ) का चिह्न था, जो उनकी शक्ति और शांति का प्रतीक बना। उन्होंने ही समाज को विवाह संस्कार, कला और आजीविका के साधन सिखाए।</p>
<p><strong>वैराग्य की ओर नीलांजना का नृत्य</strong></p>
<p>भगवान ऋषभदेव ने हजारों वर्षों तक न्यायपूर्वक राज्य किया। उन्होंने अपनी पुत्रियों ब्राह्मी और सुंदरी को लिपि और अंक विद्या सिखाई, और पुत्र भरत एवं बाहुबली को राज्य संचालन लेकिन, नियति ने उनके वैराग्य के लिए एक निमित्त चुना। एक दिन राजदरबार में सुप्रसिद्ध नर्तकी नीलांजना नृत्य कर रही थी। नृत्य अपने चरम पर था कि अचानक नीलांजना की आयु समाप्त हो गई और वह मंच पर ही निष्प्राण होकर गिर पड़ी। इंद्र ने तुरंत दूसरी नर्तकी खड़ी कर दी ताकि नृत्य में बाधा न आए, लेकिन ऋषभदेव की पैनी दृष्टि ने सत्य को देख लिया।उन्होंने सोचा कि यह संसार क्षणभंगुर है। जैसे बिजली चमक कर लुप्त हो जाती है, वैसे ही यह जीवन और वैभव भी नश्वर है।</p>
<p><strong>तप कल्याणक साधना का महापथ</strong></p>
<p>चैत्र कृष्ण नवमी के ही दिन, भगवान ने राजसी वस्त्रों का त्याग किया। उन्होंने अपने हाथों से अपने केशों का लुंचन किया और &#8216;ॐ नमः सिद्धेभ्यः&#8217; कहकर दिगंबर दीक्षा धारण कर ली। उनके साथ 4 हजार अन्य राजाओं ने भी दीक्षा ली लेकिन, कठोर तप देख वे विचलित हो गए।</p>
<p><strong>मौन साधना और 6 माह का उपवास</strong></p>
<p>भगवान ऋषभदेव ने पूर्ण मौन धारण कर लिया। वे वन-वन भटकने लगे, जहाँ न कोई परिचय था, न कोई चाह। उन्होंने लगातार 6 महीने तक निराहार रहकर आत्म-चिंतन किया। जब वे आहार हेतु नगरी में निकलते तो लोग उन्हें राजा समझकर स्वर्ण, रत्न और हाथी-घोड़े भेंट करते क्योंकि, उस समय तक किसी को &#8216;मुनि चर्या&#8217; (भोजन देने की विधि) का ज्ञान नहीं था।</p>
<p><strong>इक्षु रस का प्रथम आहार</strong></p>
<p>तपस्या के एक वर्ष (13 महीने) बीत जाने के बाद, वे हस्तिनापुर पहुँचे। वहाँ राजा श्रेयांस को अपने पूर्व जन्म के स्मरण से मुनि को आहार देने की विधि याद आई। उन्होंने भगवान को इक्षु (गन्ने) का रस भेंट किया। यह दिन &#8216;अक्षय तृतीया&#8217; के रूप में अमर हो गया।</p>
<p><strong> आदिनाथ से सिद्ध तक</strong></p>
<p>भगवान आदिनाथ का तप केवल शरीर को कष्ट देना नहीं था, बल्कि आत्मा पर जमी कर्मों की धूल को हटाना था। उनकी साधना ने यह सिद्ध किया कि मोक्ष का मार्ग वैभव में नहीं, बल्कि स्वयं के भीतर उतरने में है।</p>
<p>भगवान आदिनाथ के जीवन से सीख:</p>
<p>परिवर्तन को स्वीकार करना (राजा से रंक/मुनि बनना)।</p>
<p>धैर्य और मौन की शक्ति।</p>
<p>समाज को केवल उपदेश नहीं, बल्कि जीने की कला (असि, मसि, कृषि) देना।</p>
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		<title>कालानीनगर में श्री ऋषभदेव का जन्म एवं तप कल्याणक 12 मार्च को : भव्याति भव्य रथयात्रा का होगा आयोजन </title>
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		<pubDate>Fri, 06 Mar 2026 16:36:37 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[शहर के पश्चिम क्षेत्र में प्रथम बार प्रथम तीर्थंकर श्री आदिनाथ जी के जन्म कल्याणक के अवसर पर शोभायात्रा का आयोजन किया जाएगा। प्रथम तीर्थंकर श्री ऋषभदेव जन्म तब कल्याणक महोत्सव को लेकर यहां पर उत्साह का माहौल है। इंदौर से पढ़िए, यह खबर&#8230; इंदौर। शहर के पश्चिम क्षेत्र में प्रथम बार प्रथम तीर्थंकर श्री [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>शहर के पश्चिम क्षेत्र में प्रथम बार प्रथम तीर्थंकर श्री आदिनाथ जी के जन्म कल्याणक के अवसर पर शोभायात्रा का आयोजन किया जाएगा। प्रथम तीर्थंकर श्री ऋषभदेव जन्म तब कल्याणक महोत्सव को लेकर यहां पर उत्साह का माहौल है। <span style="color: #ff0000">इंदौर से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> शहर के पश्चिम क्षेत्र में प्रथम बार प्रथम तीर्थंकर श्री आदिनाथ जी के जन्म कल्याणक के अवसर पर शोभायात्रा का आयोजन किया जाएगा। प्रथम तीर्थंकर श्री ऋषभदेव जन्म तब कल्याणक महोत्सव को लेकर यहां पर उत्साह का माहौल है। आयोजन की तैयारी को लेकर समाज जुटे हुए हैं। कलानी नगर स्थित श्री आदिनाथ दिगंबर जैन चैत्यालय, गुप्ति सदन आदिनाथ मार्ग पर 12 मार्च को यह आयोजन उपाध्यक्ष श्री गुप्तिसागर जी महामुनि राज की प्रेरणा और अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज के और गणिनी आर्यिका यशस्विनी माताजी के आयोजन के पावन आशीर्वाद से यह धार्मिक अनुष्ठान होगा। इसमें मुनि श्री सिद्धांत सागर जी महाराज का सानिध्य प्राप्त होगा। कार्यक्रम में प्रेरणा और मार्गदर्शन ब्रह्मचारी रंजन दीदी का मिलेगा। इस अवसर पर भव्याति भव्य रथयात्रा का भी आयोजन किया जाएगा। श्री आदिनाथ दिगंबर जैन चैत्यालय गुप्ति सदन में 12 मार्च को सुबह 8 बजे से कार्यक्रम शुरू होंगे।</p>
<p>परिवारों में श्रीजी विराजमान कर्ता राजेंद्र अपूर्व रांवका, रथ के महारथी आशीष जैन नाभिराय परिवार, सारथी नीरज निधि जैन, सनत कुमार इंद्र सचिन प्रियंका जैन, महेंद्र इंद्र वीरेन सौरभ जैन, सौधर्म मनोज मोदी, कुबेर इंद्र कमलेश सुनीता गंगवाल शांति मेडिकोज, ईशान इंद्र जिनेंद्र संगीता जैन तेल वाले, यज्ञ नायक अशोक अभिषेक जैन अभिषेक मेडिकल,नाभिराय मरुदेवी ऋषभ खुशबू अजमेरा, भारत बाहुबली बीसी जैन, ब्राह्मी सुंदरी राजेश जैन, नंदा सुनंदा मोहनलाल निलेश जैन, वेशभूषा प्रदाता विनय संगीता छाबड़ा रहेंगे। कार्यक्रम का आयोजन सकल जैन समाज कॉलोनी नगर की ओर से किया जा रहा है तथा रथ यात्रा के संयोजक शांति धारा परिवार कॉलोनी नगर हैं। साथ ही जुलूस संयोजक दिगंबर जैन महिला संगठन है।</p>
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		<title>आदिनाथ भगवान का जन्म एवं तप कल्याणक 12 मार्च को : 151 मंडलीय 48 दीपों के साथ भक्तामर महा अर्चना होगी </title>
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		<pubDate>Fri, 06 Mar 2026 00:26:32 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन धर्म में प्रवर्तक या तीर्थ संचालक के रूप में पूजे जाने वाले प्रथम तीर्थंकर श्री 1008 ऋषभ देव जी (आदिनाथ भगवान जी) का जन्म एवं तप कल्याणक महोत्सव 12 मार्च चैत्र कृष्ण नवमी को पूरे भारत में उत्साह पूर्वक मनाया जा रहा है। शिवपुरी से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230; शिवपुरी। जैन [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जैन धर्म में प्रवर्तक या तीर्थ संचालक के रूप में पूजे जाने वाले प्रथम तीर्थंकर श्री 1008 ऋषभ देव जी (आदिनाथ भगवान जी) का जन्म एवं तप कल्याणक महोत्सव 12 मार्च चैत्र कृष्ण नवमी को पूरे भारत में उत्साह पूर्वक मनाया जा रहा है। <span style="color: #ff0000">शिवपुरी से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>शिवपुरी।</strong> जैन धर्म में प्रवर्तक या तीर्थ संचालक के रूप में पूजे जाने वाले प्रथम तीर्थंकर श्री 1008 ऋषभ देव जी (आदिनाथ भगवान जी) का जन्म एवं तप कल्याणक महोत्सव 12 मार्च चैत्र कृष्ण नवमी को पूरे भारत में उत्साह पूर्वक मनाया जा रहा है। चैत्र कृष्ण नवमी को प्रथम तीर्थंकर श्री ऋषभ देव जी (आदिनाथ भगवान जी) का जन्म एवं तप कल्याणक महोत्सव समाधिस्थ आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज, आचार्य श्री 108 समय सागर जी महाराज के मंगल आशीर्वाद एवं मुनि पुंगव श्री सुधा सागर जी महाराज की प्रेरणा एवं आशीर्वाद से किया जा रहा है। जिसमें सबसे पहले श्री आदिनाथ जिनालय में प्रातः काल अभिषेक पूजन के बाद 9 बजे से 2 पहिया वाहनों से धर्म प्रभावना रैली का आयोजन में किया जाएगा।</p>
<p><strong>वाहन रैली से होगी धर्म प्रभावना</strong></p>
<p>महेन्द्र जैन भैयन ने बताया कि यह विशाल दो पहिया वाहन रैली श्री आदिनाथ जिनालय पुराने प्रायवेट बस स्टैंड से शुरू होकर श्री पार्श्वनाथ जिनालय पुरानी शिवपुरी, गुरुद्वारा रोड, श्री छत्री जैन मंदिर, श्री महावीर जिनालय महल कॉलोनी, माधव चौक, गाँधी चौक, भगवान महावीर स्वामी मार्ग, श्री पार्श्वनाथ जिनालय कांच मंदिर, भगवान महावीर स्वामी कीर्ति स्तंभ,कोतवाली रोड, कस्टम गेट, श्री चंद्र प्रभु जिनालय सदर बाजार, गाँधी चौक, माधव चौक, होकर पुनः श्री आदिनाथ जिनालय पहुंचेगी। जहां पर ध्वजारोहण के साथ धर्म प्रभावना रैली का समापन होगा। दोपहर में श्री आदिनाथ जिनालय पर मरुदेवी एवं अन्य सभी महिला मंडलों के द्वारा बधाइयाँ एवं भजनों का कार्यक्रम होगा। यह संपूर्ण कार्यक्रम राष्ट्रीय जिन शासन एकता संघ शिवपुरी के संयोजन में सकल जैन समाज एवं समस्त महिला पुरुष एवं युवा संगठनों के सहयोग से द्वितीय बार विशाल स्तर पर किया जा रहा है।</p>
<p><strong>दीप अर्चना कार्यक्रम में धर्मलाभ प्राप्त करें</strong></p>
<p>गुरुवार 12 मार्च को ही रात्रि में ठीक 7 बजे से श्री आदिनाथ जिनालय में यहां के इतिहास में द्वितीय बार 151 मंडलों पर 48 दीपकों के द्वारा देवादिदेव प्रथम तीर्थंकर श्री 1008 ऋषभ देव जी ( आदिनाथ भगवान) की आराधना भक्तामर पाठ दीप अर्चना से की जाएगी।इस कार्यक्रम को भव्य रूप में आयोजित करने के लिए जैन समाज शिवपुरी एवं राष्ट्रीय जिन शासन एकता संघ शाखा के संयोजक हरिओम जैन, वायके जैन श्री राम कॉलोनी, दिनेश जैन कल्लू भैया, पं. ऋषभ जैन, अतुल जैन चौधरी तंबाकू, ऋषभ जैन एलआईसी के पास जो भी महानुभाव एवं साधर्मीजन दीप अर्चना कार्यक्रम में शामिल होकर धर्मलाभ प्राप्त करना चाहते हैं, उनसे विनम्र निवेदन है कि अपने नाम उक्त लोगों के पास शीघ्र अति शीघ्र लिखा कर या अपनी सहयोग राशि जमा कर आप अपना स्थान सुरक्षित कर सकते हैं। 151 मण्डल पूरे बुक होने पर बुकिंग बंद कर दी जाएगी। आप सभी से आग्रह है कि इस कार्यक्रम की सूचना अधिक से अधिक साधर्मीजनों तक पहुंचाकर उन्हें भी इस कार्यक्रम में शामिल करने के लिए आप सभी प्रयास करें।</p>
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		<title>12वें तीर्थंकर भगवान वासुपूज्य का जन्म एवं तप कल्याणक 16 फरवरी को: तिथि के अनुसार फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को आता है </title>
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		<pubDate>Mon, 16 Feb 2026 09:21:43 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन धर्म के 12वें तीर्थंकर भगवान वासुपूज्य जी का जन्म एवं तप कल्याणक इस बार 16 फरवरी को मनाया जाएगा। इस दिन दिगंबर जैन मंदिरों में भगवान का अभिषेक, शांतिधारा, शांतिपाठ और पूजन सहित अन्यान्य विधि-विधान से आराधना का दौर रहेगा। तिथि के अनुसार भगवान का जन्म कल्याणक और तप कल्याण फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी के [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जैन धर्म के 12वें तीर्थंकर भगवान वासुपूज्य जी का जन्म एवं तप कल्याणक इस बार 16 फरवरी को मनाया जाएगा। इस दिन दिगंबर जैन मंदिरों में भगवान का अभिषेक, शांतिधारा, शांतिपाठ और पूजन सहित अन्यान्य विधि-विधान से आराधना का दौर रहेगा। तिथि के अनुसार भगवान का जन्म कल्याणक और तप कल्याण फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी के दिन मनाया जाता है। <span style="color: #ff0000">श्रीफल जैन न्यूज की विशेष शृंखला में आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह संकलित और संपादित प्रस्तुति&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> जैन धर्म के 12वें तीर्थंकर भगवान वासुपूज्य जी का जन्म एवं तप कल्याणक इस बार 16 फरवरी को मनाया जाएगा। इस दिन दिगंबर जैन मंदिरों में भगवान का अभिषेक, शांतिधारा, शांतिपाठ और पूजन सहित अन्यान्य विधि-विधान से आराधना का दौर रहेगा। तिथि के अनुसार भगवान का जन्म कल्याणक और तप कल्याण फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी के दिन मनाया जाता है। जैन मान्यताओं और जैन ग्रंथों में वर्णित जानकारी के अनुसार भगवान वासुपूज्य जैन धर्म के 12वें तीर्थंकर हैं, उनका जन्म भागलपुर (चंपापुरी) के इक्ष्वाकु वंश में राजा वासुपूज्य और रानी जयावती के घर फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को हुआ था। वे बाल ब्रह्मचारी थे। जिन्होंने राज्य नहीं किया और फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को ही 676 राजाओं के साथ दीक्षा लेकर एक महीने के भीतर केवल ज्ञान प्राप्त किया। गर्भ में ही इंद्र द्वारा पूजा और वंदना किए जाने के कारण नाम वासुपूज्य पड़ा। भगवान वासुपूज्य जी का जन्म केसरिया रंग का बताया जाता है। बाल ब्रह्मचारी होने के कारण संसार से विरक्त होकर उन्होंने राज्य का मोह नहीं किया। फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी (पुनः उसी तिथि को) चंपापुरी स्थित चंपा वृक्ष (कदंब वृक्ष) के नीचे उन्होंने 600-676 राजाओं के साथ दीक्षा ग्रहण की।</p>
<p>दीक्षा के बाद उन्होंने कठोर तप किया और एक महीने के भीतर ही (एक वर्ष के भीतर तप के अनुसार) केवल ज्ञान प्राप्त किया।</p>
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		<title>11वें तीर्थंकर भगवान श्रेयांसनाथ जी का जन्म एवं तप कल्याणक 13 फरवरी को : तिथि के अनुसार फाल्गुन कृष्ण एकादशी को मनाया जाता है </title>
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		<pubDate>Fri, 13 Feb 2026 09:34:15 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन धर्म के 11वें तीर्थंकर भगवान श्रेयांसनाथ जी का जन्म एवं तप कल्याणक इस बार 13 फरवरी को मनाया जा रहा है। जैन पंचांग में तिथि फाल्गुन कृष्ण एकादशी के दिन दिगंबर जैन मंदिरों में भगवान का जन्म एवं तप कल्याणक महोत्सव के मंगल अवसर पर सकल जैन समाज की ओर से शांतिधारा, अभिषेक, अर्घ्य [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जैन धर्म के 11वें तीर्थंकर भगवान श्रेयांसनाथ जी का जन्म एवं तप कल्याणक इस बार 13 फरवरी को मनाया जा रहा है। जैन पंचांग में तिथि फाल्गुन कृष्ण एकादशी के दिन दिगंबर जैन मंदिरों में भगवान का जन्म एवं तप कल्याणक महोत्सव के मंगल अवसर पर सकल जैन समाज की ओर से शांतिधारा, अभिषेक, अर्घ्य समर्पण, पूजन सहित अन्य धार्मिक क्रियाएं की जाएंगी। इसमें बड़ी संख्या में समाजजन एकत्रित होकर भगवान की आराधना में लीन रहेंगे। <span style="color: #ff0000">श्रीफल जैन न्यूज की विशेष शृंखला में आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की संकलित और संपादित प्रस्तुति&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> जैन धर्म के 11वें तीर्थंकर भगवान श्रेयांसनाथ जी का जन्म एवं तप कल्याणक इस बार 13 फरवरी को मनाया जा रहा है। जैन पंचांग में तिथि फाल्गुन कृष्ण एकादशी के दिन दिगंबर जैन मंदिरों में भगवान का जन्म एवं तप कल्याणक महोत्सव के मंगल अवसर पर सकल जैन समाज की ओर से शांतिधारा, अभिषेक, अर्घ्य समर्पण, पूजन सहित अन्य धार्मिक क्रियाएं की जाएंगी। इसमें बड़ी संख्या में समाजजन एकत्रित होकर भगवान की आराधना में लीन रहेंगे। जैन धर्म के ग्रंथों में वर्णित जानकारी के अनुसार भगवान श्रेयांसनाथ वर्तमान युग के ग्यारहवें जैन तीर्थंकर है। जैन मान्यताओं के अनुसार वे सिद्ध हुए थे। एक ऐसी मुक्त आत्मा, जिसने अपने सभी कर्मों का नाश कर दिया था। भगवान श्रेयांसनाथ का जन्म इक्ष्वाकु वंश में सारनाथ के निकट सिंहपुरी में राजा विष्णु और रानी विष्णु के घर हुआ था। उनका जन्म भारतीय पंचांग के फाल्गुन कृष्ण माह के 11वें दिन हुआ था।</p>
<p><strong> श्रेयांसनाथ की शिक्षाओं में निर्जरा, यानी कर्मों के निर्वहन पर जोर </strong></p>
<p>श्रेयांसनाथ की देशना ने कई लोगों को दीक्षा लेने और केवल-ज्ञान और मोक्ष (मुक्ति) प्राप्त करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कई साधुओं, साध्वियों, श्रावकों और श्राविकाओं के साथ सम्मेद शिखरजी पर्वत से निर्वाण प्राप्त किया। श्रेयांसनाथ की शिक्षाओं में निर्जरा, यानी कर्मों के निर्वहन पर जोर दिया गया। उन्होंने समझाया कि कर्म संचय और निर्वहन के चरणों में होते हैं, जिनमें निर्जरा निर्वहन का चरण है। उन्होंने अकाम निर्जरा (बिना उद्देश्य के निर्वहन) और सकाम निर्जरा (उद्देश्य सहित निर्वहन) में अंतर बताया। आत्म-साक्षात्कार प्राप्त व्यक्ति के लिए सकाम निर्जरा यह सुनिश्चित करता है कि कोई नया कर्म संचय न हो, क्योंकि वे ज्ञाता और द्रष्टा होने की अपनी जागरूकता में सतर्क रहते हैं। श्रेयंसनाथ ने सकाम निर्जरा प्राप्त करने में तपस्या के महत्व पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने तपस्या को दो प्रकारों में वर्गीकृत किया। बाह्य तप (बाह्य तपस्या) और अभ्यंतर तप (आंतरिक तपस्या)।</p>
<p><strong>बाह्या तापा-</strong></p>
<p>बाह्य तप के छह प्रकार इस प्रकार हैं-</p>
<p>अनशन (उपवास)</p>
<p>कम खाना (उनोडारी)</p>
<p>वृत्ति संकल्प (इच्छाओं को सीमित करना)</p>
<p>रस त्याग (स्वाद से परहेज करना)</p>
<p>कायोत्सर्ग (ध्यान)</p>
<p>सानलिंटा (विनम्रता)</p>
<p>अभ्यंतर तप</p>
<p><strong>अभ्यंतर तप के छह प्रकार इस प्रकार हैं-</strong></p>
<p>प्रायश्चित (पश्चाताप)</p>
<p>वैयवच (संतों की सेवा)</p>
<p>स्वाध्याय (स्वयं का अध्ययन)</p>
<p>विनय (विनम्रता)</p>
<p>व्युत्सर्ग (त्याग)</p>
<p>ध्यान (मेडिटेशन)</p>
<p>अभ्यंतर तप के माध्यम से सच्चे कर्मों का निवारण होता है। प्रायश्चित जैसी साधनाएं पापों को धोने में सहायक होती हैं। साथ ही समभाव बनाए रखना और दूसरों को निर्दाेष समझना मोक्ष प्राप्ति में सहायक होता है।</p>
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		<title>भगवान श्री अभिनंदननाथ का जन्म एवं तप कल्याणक 30 जनवरी को: तिथि के अनुसार दोनों कल्याणक माघ शुक्ल द्वादशी को है </title>
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		<pubDate>Fri, 30 Jan 2026 07:07:11 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[भगवान श्री अभिनंदननाथ जी जैन धर्म के चौथे तीर्थंकर हैं। उनका जन्म और तप कल्याणक 30 जनवरी को मनाया जा रहा है। इस दिन दिगंबर जैन मंदिरों में भगवान के अभिषेक और शांतिधारा की जाने के अलावा अर्घ्य समर्पण आदि विधान भी विधि अनुसार की जाएगी। श्रीफल जैन न्यूज की विशेष प्रस्तुति में आज पढ़िए, [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>भगवान श्री अभिनंदननाथ जी जैन धर्म के चौथे तीर्थंकर हैं। उनका जन्म और तप कल्याणक 30 जनवरी को मनाया जा रहा है। इस दिन दिगंबर जैन मंदिरों में भगवान के अभिषेक और शांतिधारा की जाने के अलावा अर्घ्य समर्पण आदि विधान भी विधि अनुसार की जाएगी। <span style="color: #ff0000">श्रीफल जैन न्यूज की विशेष प्रस्तुति में आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह संकलित जानकारी&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर</strong>। भगवान श्री अभिनंदननाथ जी जैन धर्म के चौथे तीर्थंकर हैं। उनका जन्म और तप कल्याणक 30 जनवरी को मनाया जा रहा है। इस दिन दिगंबर जैन मंदिरों में भगवान के अभिषेक और शांतिधारा की जाने के अलावा अर्घ्य समर्पण आदि विधान भी विधि अनुसार की जाएगी। जैन धर्मावलंबी इस दिन को पारंपरिक श्रद्धा और भक्तिपूर्वक मनाते हैं। मंदिरों में भगवान के जयकारे गूंजते हैं। जैन ग्रंथों में वर्णित जानकारी के अनुसार जब महाबल ने विजय लोक को त्यागकर अयोध्या के राजा संवर की पत्नी रानी सिद्धार्थ के गर्भ में प्रवेश किया तो रानी ने माघ महीने के शुक्ल पक्ष के द्वादशी के दिन भावी तीर्थंकर को जन्म दिया। पिछले जन्म से विरासत में मिली सरल मनोवृत्ति के परिणामस्वरूप रानी के गर्भ में पल रही आत्मा का बाहरी दुनिया पर सुखदायक और शांत करने वाला प्रभाव पड़ा। राज्य के लोग अचानक विनम्रता और भाईचारे की भावनाओं से भर गए। उम्र, जाति, पंथ और स्थिति की परवाह किए बिना हर कोई एक-दूसरे का अभिवादन और सम्मान करने लगा। शिष्टता और परिष्कृत शिष्टाचार प्रचलन में आ गए। ज्योतिषियों और अन्य विद्वानों ने पुष्टि की कि जैसे एक पवित्र आत्मा की आभा आसपास के सभी लोगों को प्रभावित करती है वैसे ही शिष्टता का यह प्रवाह गर्भ में पल रही आत्मा के कारण हुआ था। चूंकि इस आत्मा का प्रभाव खुले आपसी अभिवादनों में स्पष्ट था, इसलिए राजा ने अपने पुत्र का नाम अभिनंदन (अभिवादन) रखा। अभिनंदन कुमार के बड़े होने पर उनका विवाह विभिन्न क्षेत्रों की कई राजकुमारियों से हुआ। जब भी वे उनके साथ चलते थे तो वे कहते थे कि यह एक जाल है, जिसमें मैं फंसा हुआ हूं।</p>
<p>मैं इससे कैसे निकलूँगा? समय बीतता गया और सब कुछ सुचारू रूप से चल रहा था। एक दिन, पुस्तक पढ़ते समय, राजा संवर को वैराग्य का अनुभव हुआ और उन्होंने राज्य छोड़कर वनवास में जाकर तपस्वी जीवन व्यतीत करने और मोक्ष प्राप्त करने की इच्छा व्यक्त की। उन्होंने अभिनंदन को सिंहासन सौंप दिया और स्वयं तपस्वी बनकर ध्यान करने के लिए वनवास चले गए।</p>
<p><strong>त्याग का मार्ग</strong></p>
<p>समय बीतने के साथ अभिनंदन ने न्यूनतम भोग-विलास के साथ सामान्य सांसारिक जीवन व्यतीत किया। एक दिन ध्यान में लीन राजा अभिनंदन ने अपने सभी पिछले जन्मों और इस जन्म को प्राप्त करने के अपने वास्तविक उद्देश्य को देखा। उन्होंने सब कुछ त्यागकर अपने लक्ष्य यानी पूर्ण मोक्ष की ओर बढ़ने का निश्चय किया। माघ माह में द्वादशी को राजा अभिनंदन ने अपने शरीर से सभी सांसारिक वस्तुओं को त्याग दिया, मुट्ठी से अपने बाल नोच लिए, ‘नमो सिद्धाणम’ कहा और भीड़ में विलीन हो गए। वे एक तपस्वी बन गए और कठोर तपस्या और उच्च आध्यात्मिक साधनाओं में लीन हो गए।</p>
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		<title>भगवान धर्मनाथ जन्म एवं तप कल्याणक 30 जनवरी को: तिथि के अनुसार माघ शुक्ल 12/13 को आता है </title>
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		<pubDate>Fri, 30 Jan 2026 07:06:01 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[भगवान धर्मनाथ जी का जन्म और तप कल्याणक 30 जनवरी को है। इस दिन दिगंबर जैन मंदिरों में भगवान के अभिषेक और शांतिधारा पूर्ण श्रद्धा और भक्ति के साथ की जा रही है। तिथि के अनुसार जन्म एवं तप कल्याणक माघ द्वादशी /त्रयोदशी को मनाया जाता है। श्रीफल जैन न्यूज की विशेष शृंखला में आज [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>भगवान धर्मनाथ जी का जन्म और तप कल्याणक 30 जनवरी को है। इस दिन दिगंबर जैन मंदिरों में भगवान के अभिषेक और शांतिधारा पूर्ण श्रद्धा और भक्ति के साथ की जा रही है। तिथि के अनुसार जन्म एवं तप कल्याणक माघ द्वादशी /त्रयोदशी को मनाया जाता है। <span style="color: #ff0000">श्रीफल जैन न्यूज की विशेष शृंखला में आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह संकलित प्रस्तुति&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> भगवान धर्मनाथ जी जैन धर्म के 15वें तीर्थंकर के रूप में इस जगत में आए और उन्होंने जैन धर्म की ध्वजा, परंपरा और सिद्धांतों को आगे बढ़ाया और सम्यक ज्ञान, सम्यक दर्शन और सम्यक चारित्र सहित अहिंसा, तप और तपस्या का संदेश श्रावक-श्राविकाओं को दिया। इस बार भगवान धर्मनाथ जी का जन्म और तप कल्याणक 30 जनवरी को है। इस दिन दिगंबर जैन मंदिरों में भगवान के अभिषेक और शांतिधारा पूर्ण श्रद्धा और भक्ति के साथ की जा रही है। तिथि के अनुसार जन्म एवं तप कल्याणक माघ द्वादशी /त्रयोदशी को मनाया जाता है। भगवान धर्मनाथ का चिन्ह वज्रदंड है। भगवान के पिता महासेन और माता महादेवी सुव्रता हैं। भगवान का जन्म माघ द्वादशी /त्रयोदशी को रत्नपुर में हुआ। इसी तिथि को भगवान ने दीक्षा प्राप्त कर तपस्या में लीन हो गए। भगवान के शरीर की ऊंचाई 45 धनुष और आयु 10 लाख वर्ष है। सप्तच्छ वृक्ष के नीचे भगवान धर्मनाथ जी ने दीक्षा ली। 1 हजार राजा उनके साथ दीक्षित हुए। भगवान के समवशरण में 43 गणधर, 55 हजार केवली मुनि, 64 हजार मुनि, 62 हजार 400 आर्यिकाएं, दो लाख श्रावक, 4 लाख श्राविकाएं थीं।</p>
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		<title>भगवान शीतलनाथ जी का जन्म एवं तप कल्याणक 15 जनवरी को: तिथि के अनुसार माघ कृष्ण द्वादशी को है </title>
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		<pubDate>Thu, 15 Jan 2026 05:31:12 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[10वें तीर्थकर भगवान शीतलनाथ का जन्म और तप कल्याणक एक ही दिन जैन पंचांग के अनुसार माघ कृष्ण द्वादशी को मनाया जाता है। इस वर्ष भगवान शीतलनाथ का जन्म और तप कल्याणक 15 जनवरी 2026 को मनाया जाएगा। इस दिन दिगंबर जैन मंदिरों में भगवान शीतलनाथ जी की पूजा, अभिषेक, शांतिधारा सहित विधि विधान से [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>10वें तीर्थकर भगवान शीतलनाथ का जन्म और तप कल्याणक एक ही दिन जैन पंचांग के अनुसार माघ कृष्ण द्वादशी को मनाया जाता है। इस वर्ष भगवान शीतलनाथ का जन्म और तप कल्याणक 15 जनवरी 2026 को मनाया जाएगा। इस दिन दिगंबर जैन मंदिरों में भगवान शीतलनाथ जी की पूजा, अभिषेक, शांतिधारा सहित विधि विधान से आराधना की जाएगी। <span style="color: #ff0000">श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्रृंखला में आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह संकलित और संपादित रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> भगवान शीतलनाथ का जन्म और तप कल्याणक एक ही दिन जैन पंचांग के अनुसार माघ कृष्ण द्वादशी को मनाया जाता है। इस वर्ष भगवान शीतलनाथ का जन्म और तप कल्याणक 15 जनवरी 2026 को मनाया जाएगा। किवदंती है कि इसी शुभ तिथि पर पूर्वाषाढ़ नक्षत्र में माता सुनंदा देवी ने भगवान शीतलनाथ को भद्रिलपुर नगर (वर्तमान झारखंड में इटखोरी) में जन्म दिया था और इसी दिन भगवान ने संसार से वैराग्य प्राप्त कर कोल्हुआ पहाड़ (झारखंड में भी) पर एक हजार राजाओं के साथ जिन दीक्षा (तप) ली थी। जैन धर्मग्रंथों के अनुसार नवें तीर्थंकर के निर्वाण के सुदीर्घ काल के बाद 10वें तीर्थकर श्री शीतलनाथ जी का जन्म हुआ। भद्रिलपुर नरेश दृढरथ एवं महारानी सुनंदादेवी ने प्रभु के जनक -जननी होने का सौभाग्य पाया। माघ कृष्ण द्वादशी के दिन प्रभु का जन्म हुआ। प्रभु जब मात्र गर्भ मे थे। तब किसी समय महाराज दृढरथ को दाह ज्वर हुआ था। उनकी देह ताप से जलने लगी थी। समस्त उपचार विफ़ल हो गए। तब महारानी के हाथों के स्पर्श मात्र से महाराज दाह ज्वर से मुक्त हो गए थे। महाराज ने इसे अपनी भावी संतान का ही पुण्य प्रभाव माना। फ़लतः पुत्र के नामकरण के प्रसंग पर इस घट्ना का वर्णन करते हुए महाराज ने अपने पुत्र का नाम शीतलनाथ रखा। युवावस्था मे कई राजकन्याओं से शीतलनाथ जी का पाणिग्रहण हुआ। पिता द्वारा दीक्षा लेने पर उन्होने राजपद पर आरुढ हो अनेक वर्षाें तक प्रजा का पुत्रवत पालन किया।</p>
<p><strong>माघ कृष्ण द्वादशी के दिन शीतलनाथ ने श्रमणी दीक्षा अंगीकार की</strong></p>
<p>भोगावली कर्म जब समाप्त हो गए तब माघ कृष्ण द्वादशी के दिन शीतलनाथ ने श्रमणी दीक्षा अंगीकार की। तप और ध्यान की तीन मास की स्वल्पावधि में ही प्रभु ने चारों घन घाती कर्माें को अशेष कर केवलज्ञान केवलदर्शन प्राप्त किया। देवों और मानवों ने मिलकर प्रभु का कैवल्य महोत्सव आयोजित किया। प्रभु ने उपस्थित विशाल परिषद के समक्ष धर्म देशना दी। अनेक लोगों ने सर्वविरति एवं अनेकों ने देशविरति धर्म अंगीकार किया। इस प्रकार चतुर्विध तीर्थ की स्थापना की। जैन धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान के आनंद आदि 81 गणधर हुए। भगवान के धर्म परिवार में एक लाख साधु, 1 लाख 6 हजार साध्वियां, 2 लाख 89 हजार श्रावक एवं 4 लाख 98 हजार श्राविकाएं थी।</p>
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		<title>भगवान पार्श्वनाथ जी का जन्म एवं तप कल्याणक 15 दिसंबर को: पौष मास के कृष्ण एकादशी का पुण्य दिवस को मनाया जाता है  </title>
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		<pubDate>Sun, 14 Dec 2025 13:56:09 +0000</pubDate>
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										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ जी का जन्म एवं कल्याणक 15 दिसंबर को पौष कृष्ण एकादशी को मनाया जाएगा। भगवान पार्श्वनाथ जी का जन्म वाराणसी के भेलूपुर में हुआ था। <span style="color: #ff0000">श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्रृंखला में आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह संकलित और संपादित प्रस्तुति&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ जी का जन्म एवं कल्याणक 15 दिसंबर को पौष कृष्ण एकादशी को मनाया जाएगा। भगवान पार्श्वनाथ जी का जन्म वाराणसी के भेलूपुर में हुआ था। जैन ग्रंथों के अनुसार वर्तमान में काल चक्र का अवरोही भाग, अवसर्पिणी गतिशील है और इसके चौथे युग में 24 तीर्थंकरों का जन्म हुआ था। तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ का जन्म आज से लगभग 2 हजार 9 सौ वर्ष पूर्व वाराणासी में अश्वसेन नाम के इक्ष्वाकुवंशीय क्षत्रिय राजा और उनकी रानी वामा के यहां पौष कृष्&#x200d;ण एकादशी के दिन महा तेजस्वी पुत्र का जन्म हुआ। इनके शरीर पर सर्पचिह्म था। वामा देवी ने गर्भकाल में एक बार स्वप्न में एक सर्प देखा था, इसलिए पुत्र का नाम पार्श्व रखा गया। उनका प्रारंभिक जीवन राजकुमार के रूप में व्यतीत हुआ। एक दिन पार्श्व ने अपने महल से देखा कि पुरवासी पूजा की सामग्री लिए एक ओर जा रहे हैं। वहां जाकर उन्होंने देखा कि एक तपस्वी जहां पंचाग्नि जला रहा है और अग्नि में एक सर्प का जोड़ा मर रहा है, तब पार्श्व ने कहा कि ‘दयाहीन धर्म किसी काम का नहीं’। तीर्थंकर पार्श्वनाथ ने 30 वर्ष की आयु में घर त्याग दिया था और जैन दीक्षा ली। काशी में 83 दिन की कठोर तपस्या करने के बाद 84वें दिन उन्हें केवल ज्ञान प्राप्त हुआ था। पुंड़्र, ताम्रलिप्त आदि अनेक देशों में उन्होंने भ्रमण किया। ताम्रलिप्त में उनके शिष्य हुए। पार्श्वनाथ ने चतुर्विध संघ की स्थापना की।</p>
<p>इसमें श्रमण, श्रमणी, श्रावक, श्राविका होते हैं और आज भी जैन समाज इसी स्वरुप में है। प्रत्येक गण एक गणधर के तहत कार्य करता था। सभी अनुयायियों, स्त्री हो या पुरुष सभी को समान माना जाता था। सारनाथ जैन-आगम ग्रंथों में सिंहपुर के नाम से प्रसिद्ध है। यहीं पर जैन धर्म के 11वें तीर्थंकर श्रेयांसनाथ जी ने जन्म लिया था और अपने अहिंसा धर्म का प्रचार-प्रसार किया था। केवल ज्ञान के बाद तीर्थंकर पार्श्वनाथ ने जैन धर्म के चार मुख्य व्रत सत्य, अहिंसा, अस्तेय और अपरिग्रह की शिक्षा दी थी।</p>
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