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	<title>जन्मजयंती &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
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	<title>जन्मजयंती &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी के सानिध्य में आयोजन: भगवान ऋषभदेव जन्मजयंती हर्षोल्लासपूर्वक सम्पन्न </title>
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		<pubDate>Fri, 20 Mar 2026 08:38:01 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[भगवान ऋषभदेव की जन्मजयंती हर्षोल्लासपूर्वक एवं प्रभावना के साथ सम्पन्न की गई। शाश्वत तीर्थ अयोध्या में गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी के सानिध्य में यह भव्य कार्यक्रम आयोजित हुआ। अयोध्या स्थित श्री दिगम्बर जैन मंदिर, रायगंज में प्रातःकाल ऐरावत हाथी पर सौधर्म इन्द्र के रूप में अध्यात्म जैन, अर्पिता जैन एवं सम्यक जैन (लखनऊ) द्वारा भगवान [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>भगवान ऋषभदेव की जन्मजयंती हर्षोल्लासपूर्वक एवं प्रभावना के साथ सम्पन्न की गई। शाश्वत तीर्थ अयोध्या में गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी के सानिध्य में यह भव्य कार्यक्रम आयोजित हुआ। अयोध्या स्थित श्री दिगम्बर जैन मंदिर, रायगंज में प्रातःकाल ऐरावत हाथी पर सौधर्म इन्द्र के रूप में अध्यात्म जैन, अर्पिता जैन एवं सम्यक जैन (लखनऊ) द्वारा भगवान के जन्मकल्याणक को पाण्डुक शिला पर अभिषेक कर मनाया गया। <span style="color: #ff0000">पढ़िए अभिषेक अशोक पाटील की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>अयोध्या।</strong> भगवान ऋषभदेव की जन्मजयंती हर्षोल्लासपूर्वक एवं प्रभावना के साथ सम्पन्न की गई। शाश्वत तीर्थ अयोध्या में गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी के सानिध्य में यह भव्य कार्यक्रम आयोजित हुआ। अयोध्या स्थित श्री दिगम्बर जैन मंदिर, रायगंज में प्रातःकाल ऐरावत हाथी पर सौधर्म इन्द्र के रूप में अध्यात्म जैन, अर्पिता जैन एवं सम्यक जैन (लखनऊ) द्वारा भगवान के जन्मकल्याणक को पाण्डुक शिला पर अभिषेक कर मनाया गया। परम पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ससंघ के सानिध्य एवं आचार्य श्री भद्रबाहू सागर जी महाराज ससंघ के मार्गदर्शन में भगवान ऋषभदेव एवं चक्रवर्ती भरत स्वामी की जन्मजयंती का कार्यक्रम अत्यंत भावनापूर्वक सम्पन्न हुआ।</p>
<p><strong>हुआ भव्य विधान</strong></p>
<p>कार्यक्रम के अंतर्गत प्रातःकाल रायगंज मंदिर स्थित पाण्डुक शिला पर भगवान का पंचामृत अभिषेक एवं भगवान ऋषभदेव विधान सम्पन्न किया गया। इसके पश्चात विशाल रथयात्रा अयोध्या तीर्थ के मुख्य मार्गों से होती हुई भगवान ऋषभदेव की जन्मस्थान टोंक पर पहुँची, जहाँ भगवान का पंचामृत अभिषेक सम्पन्न हुआ। जन्मस्थान पर स्थित भगवान के प्राचीन चरणों का भी अभिषेक किया गया।</p>
<p><strong>निकाली गई रथयात्रा</strong></p>
<p>रथयात्रा में ऐरावत हाथी, अवध प्रांत के विभिन्न जैन मंदिरों से विराजमान भगवंतों की झांकियाँ, रथ-बग्गियाँ, साधुगण, मंगल कलश लिए महिलाएँ एवं पुरुष वर्ग पूजन वेशभूषा में बैंड-बाजों के साथ भगवान के अहिंसामयी सिद्धांतों का शंखनाद करते हुए सम्मिलित हुए। रथयात्रा में भगवान को लेकर बैठने का सौभाग्य श्री सुभाषचंद सुयश जैन (लखनऊ, टिकेटनगर) को प्राप्त हुआ, जबकि सारथी के रूप में श्री विनोद कुमार शकुंतला जैन (उत्तमनगर, दिल्ली) रहे। भगवान भरत को लेकर परमेन्द्र जैन परिवार (टिकेटनगर) ने सहभागिता की। धनकुबेर सिद्धार्थ जैन एवं दीप्ति जैन (लखनऊ) भी रथयात्रा में सम्मिलित हुए।</p>
<p>रथयात्रा रामपथ होते हुए तुलसी उद्यान, स्वर्गद्वार स्थित जन्मस्थान टोंक पहुँची। मार्ग में भगवान के जन्मकल्याणक के उपलक्ष्य में नगरवासियों को लड्डू-मिष्ठान का वितरण किया गया तथा पूजन-अभिषेक सम्पन्न हुआ।</p>
<p><strong>इन्हें मिला सौभाग्य</strong></p>
<p>मध्याह्न में रायगंज दिगम्बर जैन मंदिर में भगवान ऋषभदेव की 31 फुट ऊँची विशाल प्रतिमा का परम्परागत मस्तकाभिषेक अनेक द्रव्यों से किया गया। सर्वप्रथम कलश करने का सौभाग्य सुभाषचंद शुभम जैन (फैजाबाद) को प्राप्त हुआ। द्वितीय कलश डॉ. राधा जैन एवं दिनेश जैन (लखनऊ), तृतीय कलश श्री राजकुमार जैन (पटना) द्वारा सम्पन्न किया गया।</p>
<p><strong> इसके अतिरिक्त विभिन्न द्रव्यों से अभिषेक इस प्रकार सम्पन्न हुआ&#8230;</strong></p>
<p>नारियल जल से नितीश कुमार चौक (लखनऊ), इक्षुरस से श्री पुखराज पाण्डया (गोरखपुर), घी से अभिषेक श्री चन्द्रशेखर कासलीवाल, दूध से अभिषेक श्री नितीश जैन (लखनऊ), दही से अभिषेक प्रदीप कुमार एवं अभिषेक जैन (बहराइच), सर्वोषधि से अभिषेक संजय जैन एवं निधेश जैन (टिकेटनगर), हरिद्रा से अभिषेक अनुज जैन एवं अरिहंत जैन (फैजाबाद), लाल चंदन से अभिषेक भरत जैन एवं वर्धमान जैन (टिकेटनगर), चतुष्कोण कलश से अभिषेक अनुज, सोमिल, नीशू एवं रोमा जैन (लखनऊ), विजय कुमार एवं रश्मि जैन (लखनऊ)। मंगल आरती अनिल शरत बाकलीवाल द्वारा सम्पन्न की गई। केसर से अभिषेक योगेश जैन एवं जितेन्द्र जैन (लल्ला भैया, फतेहपुर महमूदाबाद) द्वारा किया गया। पूर्णकलश का सौभाग्य सुरेशचंद जैन (खंडवा) को प्राप्त हुआ। अंत में शांतिधारा जितेन्द्र जैन एवं वैशाली जैन (लल्ला भैया, फतेहपुर) द्वारा सम्पन्न की गई। इसी क्रम में भगवान भरत स्वामी की 31 फुट ऊँची प्रतिमा का सम्पूर्ण पंचामृत अभिषेक नितीश जैन एवं शालिनी जैन (लखनऊ) द्वारा किया गया। सायंकाल 1008 दीपकों द्वारा आरती सम्पन्न की गई तथा भगवान का पालना झुलाने का सौभाग्य अवध प्रांत से आए सभी भक्तों को प्राप्त हुआ। सम्पूर्ण कार्यक्रम प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका श्री चंदनामती के मार्गदर्शन में तथा पीठाधीश स्वस्तिश्री रवीन्द्रकीर्ति स्वामीजी के कुशल नेतृत्व में सम्पन्न हुआ।</p>
<p><strong>ये भी रहे मौजूद</strong></p>
<p>इस अवसर पर श्री अमरचंद जैन, विजय कुमार जैन, डॉ. जीवन प्रकाश जैन, तेजकुमार जैन, अंकुर जैन (बाराबंकी), टिकेटनगर से अतुल जैन, राजन जैन, निधेश जैन, पारस जैन सहित अवध प्रांत, दिल्ली, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, लखनऊ, कानपुर आदि स्थानों से आए अनेक भक्तगण उपस्थित रहे।</p>
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		<title>चारूकीर्ति स्वामी की 75वीं जन्मजयंती के उपलक्ष्य में विशेष श्रृंखला-3 : श्रमण संस्कृति के प्रहरी थी चारूकीर्ति भट्टारक महास्वामीजी- मुनि श्री सुधासागरजी महाराज </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 06 Sep 2024 09:26:01 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[श्रवणबेलगोला के समाधिस्थ बड़े स्वामी जी चारूकीर्ति भट्टारक जी को सामाजिक और धार्मिक योगदान के लिए जाना जाता है। उन्होंने समाज में नैतिकता, आध्यात्मिकता और अहिंसा के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने अपने जीवन को जैन धर्म के सिद्धांतों के पालन और शिक्षा में समर्पित कर दिया। स्वामी जी ने अपने प्रवचनों के [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>श्रवणबेलगोला के समाधिस्थ बड़े स्वामी जी चारूकीर्ति भट्टारक जी को सामाजिक और धार्मिक योगदान के लिए जाना जाता है। उन्होंने समाज में नैतिकता, आध्यात्मिकता और अहिंसा के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने अपने जीवन को जैन धर्म के सिद्धांतों के पालन और शिक्षा में समर्पित कर दिया। स्वामी जी ने अपने प्रवचनों के माध्यम से समाज में नैतिकता और अहिंसा के प्रति जागरूकता फैलाने का कार्य किया। उनका जीवन और कार्य न केवल जैन समुदाय के लिए, बल्कि संपूर्ण समाज के लिए प्रेरणादायक है। विभिन्न विद्वानों ने समय-समय पर स्वामी के बारे में बहुत कुछ लिखा है। स्वामी जी की 75वीं जन्मजयंती के उपलक्ष्य में उन सभी आलेखों का प्रकाशन श्रृंखलाबद्ध रूप में श्रीफल जैन न्यूज पर किया जा रहा है। <span style="color: #ff0000">इसकी तीसरी कड़ी में आज पढ़िए मुनि श्री सुधासागर जी महाराज का आलेख&#8230;.</span></strong></p>
<hr />
<p>चारुकीर्ति जी स्वामी श्रवणबेलगोला इस युग के सबसे आदर्श भट्टारक थे। श्रेष्ठ भट्टारक थे। आचार और विचारों में भट्टारकों में सबसे श्रेष्ठ थे। अचार भी उनका श्रेष्ठ था, विचारों में तो वे बहुत-बहुत महान् थे। उनको सत्य की पहचान थी। वे श्रमण संस्कृति के सबसे बड़े सम्पोषक थे। श्रवणबेलगोला को जो आज ऊंचाइयां मिली हैं, वे चारूकीर्ति भट्टारक ने ही दी हैं। सन् 1967 से महामस्तकाभिषेक हो रहे हैं, दक्षिण और उत्तर भारत को एक करने का श्रेय जाता है तो चारूकीर्ति भट्टारक को जाता है। हमारे यहां एक युग था जब उत्तर भारत और दक्षिण भारत दो भागों में बंट चुका था, दोनों के सम्पर्क टूट चुके थे, दोनों अलग थे लेकिन उत्तर भारत और दक्षिण भारत की जैन समाज को एक अखण्ड रूप में स्थापित करने में चारूकीर्ति जी का योगदान रहा है। चारूकीर्ति जी भट्टारक आदर्श भट्टारक थे। गोम्टेश बाहुबली के माध्यम से दक्षिण और उत्तर भारत को एक किया, यह बहुत बड़ा प्रशंसनीय कार्य था। चारूकीर्ति के निदेशन में श्रवणबेलगोला में जो कार्यक्रम हुए, वे बहुत बढ़िया रहे। दूसरी बात जैनधर्म को राजनैतिक स्तर प्रदान कराने में सर्वश्रेष्ठ काम है चारूकीर्ति भट्टारक का। उन्होंने जैन धर्म को राष्ट्रीय संरक्षण दिलवाया।</p>
<p>मेरे पास भी उनके बहुत समाचार आए कि महाराज जी एक बार आप दक्षिण भारत की तरफ आइए। पूज्य गुरु देव (आचार्य श्री विद्यासागरजी) के पास तो भट्टारक स्वयं आए, लेकिन आचार्यश्री तो श्रवणबेलगोला नहीं पहुंच पाए लेकिन भट्टारक जी ने श्रवणबेलगोला में आचार्यश्री के स्वर्ण जयंती पर भारत का सर्वश्रेष्ठ कीर्ति स्तंभ बनवाया। चारूकीर्ति भट्टारक ने वस्तुतः जैनधर्म की, जैन शास्त्रों की और जैन श्रमण संस्कृति की रक्षा की, भले ही परंपरा में नहीं थे लेकिन परंपरा के पहरी थे।</p>
<p>वे विचारों में बहुत निर्मल थे। बताते हैं कि वे चातुर्मास आदि में इधर-उधर नहीं जाते थे। उत्तर भारत से जब भी साधु श्रवणबेलगोला जाते थे तो उन सभी साधुओं के लिए बहुत आदर के साथ सम्मान देते थे। उन्होंने कभी भी किसी का अनादर नहीं किया। उनके जाने से एक बहुत बड़ी क्षति हुई है। श्रमण संस्कृति की रक्षा करने वाला एक पहरी हमारे बीच से चला गया। दिवंगत आत्मा के लिए बहुत-बहुत आशीर्वाद। मेरी भावना है कि इस बार उन्होंने भट्टारक पद निभाया है, अगली बार मुनि पद का निर्वाह करें।</p>
<p>श्रृंखला-1</p>
<blockquote class="wp-embedded-content" data-secret="BkUWISELHw"><p><a href="https://www.shreephaljainnews.com/charukeerti_swami_had_started_his_sadhana_since_long_ago_acharya_shri_vardhaman_sagar_maharaj/">चारूकीर्ति स्वामी जी ने बहुत पहले से अपनी साधना को शुरू कर रखा था &#8211; आचार्य श्री वर्धमानसागर जी महाराज</a></p></blockquote>
<p><iframe class="wp-embedded-content" sandbox="allow-scripts" security="restricted"  title="&#8220;चारूकीर्ति स्वामी जी ने बहुत पहले से अपनी साधना को शुरू कर रखा था &#8211; आचार्य श्री वर्धमानसागर जी महाराज&#8221; &#8212; श्रीफल जैन न्यूज़" src="https://www.shreephaljainnews.com/charukeerti_swami_had_started_his_sadhana_since_long_ago_acharya_shri_vardhaman_sagar_maharaj/embed/#?secret=bYgZcIVrPa#?secret=BkUWISELHw" data-secret="BkUWISELHw" width="600" height="338" frameborder="0" marginwidth="0" marginheight="0" scrolling="no"></iframe></p>
<p>श्रृंखला-2</p>
<blockquote class="wp-embedded-content" data-secret="d9OUueFoIw"><p><a href="https://www.shreephaljainnews.com/the_greatest_decoration_of_charukeerti_personality_is_ajatshatruta_acharya_shri_suvidhisagar_maharaj/">चारुकीर्ति जी के व्यक्तित्व का सबसे बड़ा अलंकरण &#8216;अजातशत्रुता&#8217; -आचार्य श्री सुविधिसागर महाराज</a></p></blockquote>
<p><iframe class="wp-embedded-content" sandbox="allow-scripts" security="restricted"  title="&#8220;चारुकीर्ति जी के व्यक्तित्व का सबसे बड़ा अलंकरण &#8216;अजातशत्रुता&#8217; -आचार्य श्री सुविधिसागर महाराज&#8221; &#8212; श्रीफल जैन न्यूज़" src="https://www.shreephaljainnews.com/the_greatest_decoration_of_charukeerti_personality_is_ajatshatruta_acharya_shri_suvidhisagar_maharaj/embed/#?secret=9Qy0E7kN1H#?secret=d9OUueFoIw" data-secret="d9OUueFoIw" width="600" height="338" frameborder="0" marginwidth="0" marginheight="0" scrolling="no"></iframe></p>
<p>&nbsp;</p>
<p>&nbsp;</p>
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		<title>चारूकीर्ति स्वामी की 75वीं जन्मजयंती के उपलक्ष्य में विशेष श्रृंखला-2 : चारुकीर्ति जी के व्यक्तित्व का सबसे बड़ा अलंकरण &#8216;अजातशत्रुता&#8217; -आचार्य श्री सुविधिसागर महाराज </title>
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		<pubDate>Thu, 05 Sep 2024 07:41:50 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[श्रवणबेलगोला के समाधिस्थ बड़े स्वामी जी चारूकीर्ति भट्टारक जी को सामाजिक और धार्मिक योगदान के लिए जाना जाता है। उन्होंने समाज में नैतिकता, आध्यात्मिकता और अहिंसा के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने अपने जीवन को जैन धर्म के सिद्धांतों के पालन और शिक्षा में समर्पित कर दिया। स्वामी जी ने अपने प्रवचनों के [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>श्रवणबेलगोला के समाधिस्थ बड़े स्वामी जी चारूकीर्ति भट्टारक जी को सामाजिक और धार्मिक योगदान के लिए जाना जाता है। उन्होंने समाज में नैतिकता, आध्यात्मिकता और अहिंसा के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने अपने जीवन को जैन धर्म के सिद्धांतों के पालन और शिक्षा में समर्पित कर दिया। स्वामी जी ने अपने प्रवचनों के माध्यम से समाज में नैतिकता और अहिंसा के प्रति जागरूकता फैलाने का कार्य किया। उनका जीवन और कार्य न केवल जैन समुदाय के लिए, बल्कि संपूर्ण समाज के लिए प्रेरणादायक है। विभिन्न विद्वानों ने समय-समय पर स्वामी के बारे में बहुत कुछ लिखा है। स्वामी जी की 75वीं जन्मजयंती के उपलक्ष्य में उन सभी आलेखों का प्रकाशन श्रृंखलाबद्ध रूप में श्रीफल जैन न्यूज पर किया जा रहा है।<span style="color: #ff0000"> इसकी दूसरी कड़ी में आज पढ़िए आचार्य श्री सुविधिसागर महाराज का आलेख&#8230;.</span></strong></p>
<hr />
<p>भट्टारक प्रवर धवलकीर्तिजी ने बताया कि आज से कुछ दिनों पूर्व पूज्य गुरुवर्य चारुकीर्ति स्वामीजी ने मुझे बुलाया, चूंकि मैं 15 माह से यहां हूं, इसलिए एक-एक घटना मुझे पता है। अचानक चारुकीर्ति जी महाराज का संदेश आता है कि आप तत्काल यहां आइये। जाने के बाद चारुकीर्ति महाराज ने कहा कि आप मुझे निवेदन पत्र लिखिए। जैसा कि भट्टारक परम्परा का नियम है कि आप अपने पद पर किसी को आरूढ़ करें। इन्होंने निवेदन पत्र लिखा। उसके बाद कनकगिरि के भट्टारक भुवन कीर्ति जी महाराज को बुलाया। उनको बुलाकर कहा कि आप इस पर अनुदमोना पत्र लिखें। उसके बाद कमंडल, पिच्छी और दंड को बाहर रखकर पूरी व्यवस्था कर ताले लगवाए। विचार पट्ट पर आगम कीर्ति जी महाराज को स्थापित किया। उसके बाद जिस दिन उनकी संल्लेखना हुई, सुबह जिनालय से आकर वंदना कर कुछ लोगों को बुलाया। उनमें से चार लोगों को खड़ा किया और आगम कीर्ति जी महाराज को चाबी देकर कहा कि मेरी जवाबदारी पूरी हुई।</p>
<p><strong>णमोकार मंत्र सुनते हुए प्राण ज्योति का विलय</strong></p>
<p>उनके पैरों में जो 2018 से अब तक दर्द था. न उन्होंने चिकित्सा कराई न किसी तरह का शिथिलाचार किया। बल्कि अन्न का त्याग कर तपस्या कर रहे थे। ऐसी परिस्थिति में मंदिर से आते समय जैसे ही उनका पैर मुड़ा और थोड़ी चोट लगी तो उन्होंने सबसे पहले णमोकार मंत्र बोलते हुए अपने वस्त्र निकाल दिया, केवल अधोवस्त्र पास रखा। कहने का तात्पर्य है कि हमारे यहां अहलक अवस्था की व्यवस्था है, उसे दीक्षा नहीं कहेंगे क्योंकि वह गुरु के व्रत संस्कार के बाद होती है। जिस प्रकार के जीवन की उन्होंने कल्पना की कि मेरे द्वारा मुनि पद धारण करने के बाद ही संल्लेखना हो, लेकिन जब उन्होंने देखा कि अब समयावली शेष नहीं है तो उन्होंने अपने वस्त्र निकालने के बाद वहां खड़े लोगों को णमोकार मंत्र सुनाने को कहा। णमोकार मंत्र सुनते हुए उन्होंने सुबह के समय अपनी प्राण ज्योति का विलय किया। भट्टारक परम्परा में इस प्रकार की संल्लेखना अद्भुत है।</p>
<p><strong>उनके काम सभी संघों का करेंगे मार्गदर्शन</strong></p>
<p>उनके माध्यम से 48 मंदिरों का संचालन होता था। प्रतिदिन 48 मंदिरों को गाजे-बाजे के साथ द्रव्य जाना और त्रिकाल पूजा होना उनके माध्यम से होता था। शास्त्र की बात करें तो अक्षरा-अभिषेक के नाम पर 108 ग्रंथ प्रकाशित हुए। उसके अतिरिक्त धवला का पूर्ण प्रकाशन उन्होंने कन्नड़ में किया और सभी संघों में पहुंचा। कई ग्रंथों का प्रकाशन किया। उसके बाद गुरुओं की बात करें तो भारत का एक भी संघ ऐसा नहीं है जो यह कहे कि चारुकीर्ति स्वामी जी ने हमारे संघ की सेवा नहीं की। राष्ट्रीय बात करें तो भगवान् बाहुबली के अभिषेक के बाद सैनिक कोष में दान राशि दी। 2019 में कर्नाटक में जब बाढ़ आई तो लोगों के खाने व रहने की व्यवस्था अपने मठ के माध्यम से की। औषधालय, गुरुकुल हर क्षेत्र में उन्होंने उल्लेखनीय कार्य किए हैं। उनके आदर्श समस्त संघों के लिए मार्गदर्शन करें। अजातशत्रुता उनके व्यक्तित्व का सबसे बड़ा अलंकरण रहा। मेरे ध्यान में 100-150 वर्ष के अंतराल में पूज्य चारुकीर्ति भट्टारक एक ऐसे पिच्छीधारी हैं जिनकी समाधि के उपरांत राष्ट्र की ओर से सम्मान करते हुए सलामी दी गई। इस प्रकार के गौरव को उन्होंने प्राप्त किया।</p>
<p>चारूकीर्ति स्वामी की 75वीं जन्मजयंती के उपलक्ष्य में विशेष श्रृंखला-1 : चारूकीर्ति स्वामी जी ने बहुत पहले से अपनी साधना को शुरू कर रखा था – आचार्य श्री वर्धमानसागर जी महाराज <a href="https://www.shreephaljainnews.com/charukeerti_swami_had_started_his_sadhana_since_long_ago_acharya_shri_vardhaman_sagar_maharaj/">https://www.shreephaljainnews.com/charukeerti_swami_had_started_his_sadhana_since_long_ago_acharya_shri_vardhaman_sagar_maharaj/</a></p>
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		<title>चारूकीर्ति स्वामी की 75वीं जन्मजयंती के उपलक्ष्य में विशेष श्रृंखला-1 : चारूकीर्ति स्वामी जी ने बहुत पहले से अपनी साधना को शुरू कर रखा था &#8211; आचार्य श्री वर्धमानसागर जी महाराज </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 04 Sep 2024 08:16:41 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[श्रवणबेलगोला के समाधिस्थ बड़े स्वामी जी चारूकीर्ति भट्टारक जी को सामाजिक और धार्मिक योगदान के लिए जाना जाता है। उन्होंने समाज में नैतिकता, आध्यात्मिकता और अहिंसा के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने अपने जीवन को जैन धर्म के सिद्धांतों के पालन और शिक्षा में समर्पित कर दिया। स्वामी जी ने अपने प्रवचनों के [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>श्रवणबेलगोला के समाधिस्थ बड़े स्वामी जी चारूकीर्ति भट्टारक जी को सामाजिक और धार्मिक योगदान के लिए जाना जाता है। उन्होंने समाज में नैतिकता, आध्यात्मिकता और अहिंसा के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने अपने जीवन को जैन धर्म के सिद्धांतों के पालन और शिक्षा में समर्पित कर दिया। स्वामी जी ने अपने प्रवचनों के माध्यम से समाज में नैतिकता और अहिंसा के प्रति जागरूकता फैलाने का कार्य किया। उनका जीवन और कार्य न केवल जैन समुदाय के लिए, बल्कि संपूर्ण समाज के लिए प्रेरणादायक है। विभिन्न विद्वानों ने समय-समय पर स्वामी के बारे में बहुत कुछ लिखा है। स्वामी जी की 75वीं जन्मजयंती के उपलक्ष्य में उन सभी आलेखों का प्रकाशन श्रृंखलाबद्ध रूप में श्रीफल जैन न्यूज पर किया जा रहा है। इसकी पहली कड़ी में आज <span style="color: #ff0000">पढ़िए आचार्य श्री वर्धमानसागर जी महाराज का आलेख&#8230;.</span></strong></p>
<hr />
<p>भट्टारक चारुकीर्ति जी स्वामी श्रवणबेलगोला के अकस्मात् देवलोक गमन होने पर वात्सल्य वारिधि आचार्य श्री वर्धमानसागर जी महाराज ने श्रवणबेलगोला तीर्थ के चारुकीर्ति भट्टारक स्वामी जी के जीवन कृतित्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भगवान् बाहुबली के परम भक्त श्री चारूकीर्ति भट्टारक स्वामी जी का समाधिमरण हो गया है। यह समाचार सुनकर के पूरा पिछला इतिहास स्मृति पटल पर घूमने लगा। चारूकीर्ति भट्टारक जी ने आचार्य शांतिसागर महाराज की परम्परा को बहुत सम्मान दिया। सम्मानपूर्वक उन्होंने 3 महामस्तकाभिषेक 1993, 2006, 2018 को अपने सान्निध्य मे सम्पन्न कराया। उनका अचानक देवलोक गमन होना सारी समाज के लिए दुःखदाई है। 1981 में आचार्य विद्यानंदी जी महाराज के सान्निध्य में सहस्त्र शताब्दी महोत्सव सम्पन्न कराया, यह उनके जीवन की बड़ी भारी उपलब्धि कही जा सकती है। उन्होंने महामस्तकाभिषेक को सम्पन्न कराके जो हर 12 वर्षों में होता है, जिनधर्म की, भगवान् बाहुबली स्वामी की जो प्रभावना की, उसे भुलाया नहीं जा सकता। स्वामीजी सभी को यथोचित सम्मान देते थे, यह उनकी विशेष बात थी। उनके मार्गदर्शन में श्रवणबेलगोला में महामस्तकाभिषेक के अलावा और भी अनेक महत्त्वपूर्ण कार्य हुए हैं जो उन्हें सदैव जीवंत बनाए रखेगें।</p>
<p>स्वामीजी के लिए भगवान् बाहुबली से प्रार्थना करते हैं कि उन्होंने जिस प्रकार से श्रवणबेलगोला तीर्थ को विश्व प्रसिद्ध की ऊंचाइयों तक पहुंचाने का प्रबल पुरुषार्थ किया, इसी प्रकार वे भगवान् बाहुबली के परम भक्त रहे हैं और उनकी भावना भी थी कि मैं दीक्षा लेकर भगवान बाहुबली जैसी साधना कर सकूं, ऐसा मुझे आशीर्वाद दीजिये।</p>
<p>वो संभव नहीं हो सका। लेकिन हमको जहां तक ध्यान है उन्होंने अपनी साधनाओं को बहुत पहले से शुरू कर रखा था। अपने जीवन में वे सदैव सावधान रहे। आज श्रवणबेलगोला जिन ऊंचाइयों को छू रहा है, वह भट्टारक चारूकीर्ति जी स्वामी के प्रबल, अथक पुरुषार्थ के कारण ही संभव हो पाया है। वे महनीय कार्यों के कारण सदैव याद किये जाते रहेंगे।</p>
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		<title>स्वामी जी ने दिया था महामस्तकाभिषेक में मंगलाचरण गाने का मौका : भजन सम्राट रूपेश जैन ने दी स्वामी चारूकीर्ति जी को श्रद्धांजलि </title>
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		<pubDate>Mon, 15 May 2023 11:22:25 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[प्रख्यात जैन भजन गायक रूपेश जैन में स्वस्तिश्री चारुकीर्ति भट्टारक महास्वामीजी के जन्मदिवस पर उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए भावभीना भजन प्रस्तुत किया है। इस मौके पर श्रीफल जैन न्यूज ने उनसे बातचीत की है। प्रस्तुत हैं उसी के कुछ खास अंश&#8230; टीकमगढ़। प्रख्यात जैन भजन गायक रूपेश जैन में स्वस्तिश्री चारुकीर्ति भट्टारक महास्वामीजी के जन्मदिवस [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>प्रख्यात जैन भजन गायक रूपेश जैन में स्वस्तिश्री चारुकीर्ति भट्टारक महास्वामीजी के जन्मदिवस पर उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए भावभीना भजन प्रस्तुत किया है। इस मौके पर श्रीफल जैन न्यूज ने उनसे बातचीत की है। <span style="color: #ff0000;">प्रस्तुत हैं उसी के कुछ खास अंश&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>टीकमगढ़।</strong> प्रख्यात जैन भजन गायक रूपेश जैन में स्वस्तिश्री चारुकीर्ति भट्टारक महास्वामीजी के जन्मदिवस पर उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए भावभीना भजन प्रस्तुत किया है। स्वामीजी के करीबी रहे रूपेश इसे स्वामीजी के प्रति अपनी छोटी सी विनयाजंलि मानते हैं। इस अवसर पर श्रीफल जैन न्यूज ने उनसे बात की है। प्रस्तुत हैं उसी बातचीत के प्रमुख अंश&#8230;.</p>
<p><strong>आपको स्वामीजी पर भजन गाने की प्रेरणा कहां से मिली?</strong></p>
<p>मेरे तो स्वयं के भाव भी यही थे। स्वामीजी का इतना आशीर्वाद मिला है मुझे जीवन में, तो मुझे लगा कि मैं बतौर श्रद्धांजलि कुछ पंक्तियां उनके लिए अर्पित करूं। इसके अलावा सरिता अम्मा की प्रेरणा भी थी, जो श्रवणबेलगोला में दो पंचकल्याणकों में सौधर्म इंद्राणी बनी थीं। वह 2018 में हुए महामस्तकाभिषेक की कमेटी की अध्यक्ष भी थीं। स्वामी जी से जुड़े और आचार्य देव नंदी जी के शिष्य मुनि श्री अमोघ कीर्ति जी का भी आशीर्वाद था।</p>
<p><strong>स्वामीजी के लिए बनाए इस गीत के बोल किसने लिखे हैं, इसे संगीतबद्ध किसने किया है?</strong></p>
<p>इस गीत को लिखा भी मैंने है, इसका संगीत दादू रवींद्र जैन का है। मैंने उनकी धुन इसलिए ली है क्योंकि उनका भी स्वामीजी के साथ बहुत बड़ा जुड़ाव था और स्वामीजी भी उन्हें बहुत मानते थे। मैं चाहता था कि प्रत्यक्ष नहीं, परोक्ष रूप से उनकी भी श्रद्धांजलि स्वामीजी के चरणों में पहुंचे।</p>
<p><strong>स्वामीजी के असमय समाधिलीन होने से जैन समाज को कितनी बड़ी क्षति हुई है?</strong></p>
<p>स्वामीजी को जो भी जरा सा नजदीक से जानता था, वह बता सकता है कि समाज ने क्या खोया है। बहुत बड़े-बड़े संस्थान हैं, जहां से लोग मैनेजमेंट सीखते हैं, लेकिन वह अपने आप में संपूर्ण रूप से एक संस्थान थे, जहां से आप मैनेजमेंट सीख सकते हैं, चरित्र-अनुशासन सीख सकते हैं। आप उनसे धर्म सीख सकते हैं और उसे व्यावहारिक रूप से जीवन में कैसे उतारना है, यह भी सीख सकते हैं। वह कहने को वस्त्रधारी थे लेकिन मुनि चर्या का पालन करते थे। उनकी खासियतें गिनाई नहीं जा सकतीं। कितने ही स्कूल, कॉलेज, चिकित्सालय उनके द्वारा खोले गए, यह उनका समाज के प्रति बहुत बड़ा उपकार है। ऐसे महान व्यक्तित्व का फिर से इस धरती पर आना मुश्किल है।</p>
<p><strong>उनसे जुड़ा कोई संस्मरण जो इस अवसर पर बताना चाहते हैं?</strong></p>
<p>वह एक ऐसा व्यक्तित्व थे, जिनसे मिलने के लिए बड़े-बडे़ मंत्रियों, अधिकारियों को समय लेना पड़ता था लेकिन उनकी मुझ पर विशेष कृपा था। उन्होंने वर्ष 2018 के महामस्तकाभिषेक से पहले मुझे बुलाया और कहा कि इसकी शुरुआत आपके मंगलाचरण से होगी। कर्नाटक सरकार से उन्होंने मेरा वह कार्यक्रम अनुमोदित कराया। मैं उनकी सहजता देखकर हैरान था। उन्होंने महामस्तकाभिषेक के दौरान खुद मेरा परिचय कर्नाटक सरकार के मंत्रियों और वहां मौजूद जानी-मानी हस्तियों से कराया। वह मुझसे हमेशा कहा करते थे कि आप रवींद्र जैन जी के बाद दूसरे कलाकार हैं, जिनका गीत हमारे यहां शहनाई वाले, छोटी-छोटी भजन मंडली वाले सुनाया-बजाया करते हैं।</p>
<p><strong>स्वामीजी के जन्मदिन पर कुछ विशेष संदेश आप देना चाहते हैं?</strong></p>
<p>हम सभी आयु कर्म से जुड़े हुए हैं लेकिन हम चाहते हैं कि स्वामी जी जैसा ही व्यक्तित्व उस बागडोर को संभाले रहे। तो स्वामीजी के बाद नए स्वामीजी बने हैं, मैं चाहता हूं कि आज बड़े स्वामीजी के जन्मदिन पर उनका सारा आशीर्वाद नए चारूकीर्ति स्वामीजी को मिले। और स्वामीजी भी शायद यही चाहते होंगे। उनका ज्ञान और अनुभव भी नए स्वामीजी को मिले सके, यही कामना है। मैं यह भी कहना चाहता हूं कि जब हम श्रवणबेलगोला जाएं तो स्वामीजी के सिद्धांतों का मनन करें। समाज को आगे बढ़ाने में अपना योगदान दें।</p>
<p><strong>भजन में बताया है स्वामीजी को दक्षिण का सूर्य</strong></p>
<p>स्वस्तिश्री चारुकीर्ति भट्टारक महास्वामी के व्यक्तित्व के बारे में गायक रूपेश जैन ने अपने भजन के जरिए गुणगान किया है। उन्होंने स्वस्तिश्री चारुकीर्ति भट्टारक महास्वामी को दक्षिण का सूर्य बताया है जिनकी कीर्ति चारों दिशाओं में फैली। अपने कार्यों से वे जगत में पूजनीय बने। भजन में उनकी महिमा के बारे में बताया है कि वे महातपस्वी, अतुलित ज्ञानी और ऐसे भट्टारक थे जिन्होंने विश्वव्यापी महामस्तकाभिषेक कराया। भक्ति में अपना पूरा जीवन बिताया और प्रभु को अपना सर्वस्व समर्पण किया। उन्होंने शिक्षा, सेवा और संस्कारों से लाखों लोगों का जीवन बदल दिया। अधीर को धीर बनाया।</p>
<p><strong>कौन हैं रूपेश जैन</strong></p>
<p>मध्यप्रदेश के टीकमगढ़ में जन्मे रूपेश जैन जाने-माने भजन गायक हैं। जाने-माने संगीतकार और गायक रवींद्र जैन के बाद जैन भजन गायकों के बीच इनकी अपनी अलग पहचान है। यूट्यूब पर इनके 45 हजार से ज्यादा सब्सक्राइबर हैं और यूट्यूब हजारों,लाखों बार इनकी रचनाएं सुनी जा चुकी हैं। इनके कई भजनों को एक लाख से ज्यादा व्यूज मिल चुके हैं।</p>
<p><strong>इस भजन को यहां सुनें</strong></p>
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		<title>आर्यिका विजयामती माताजी चलती-फिरती पाठशाला थीं : गुणानुवाद सभा में वक्ताओं ने दिया उद्बोधन </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/speakers_gave_speech_in_gunanuvad_meeting/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 03 May 2023 08:46:42 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[समाचार]]></category>
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					<description><![CDATA[कामां के शान्तिनाथ दिगम्बर जैन दीवान मंदिर में आर्यिका विजयामति माताजी की 95 वीं जन्मजयंती के अवसर पर गुणानुवाद सभा आयोजित की गई। इस अवसर पर अभिषेक-शांतिधारा के कार्यक्रम हुए। उपस्थित लोगों ने माताजी को विनयाजंलि अर्पित की। पढ़िए मनोज नायक की रिपोर्ट&#8230; कामां। यथा नाम तथा गुण वाली कहावत कामां में जन्मीं आर्यिका विजया [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>कामां के शान्तिनाथ दिगम्बर जैन दीवान मंदिर में आर्यिका विजयामति माताजी की 95 वीं जन्मजयंती के अवसर पर गुणानुवाद सभा आयोजित की गई। इस अवसर पर अभिषेक-शांतिधारा के कार्यक्रम हुए। उपस्थित लोगों ने माताजी को विनयाजंलि अर्पित की। <span style="color: #ff0000;">पढ़िए मनोज नायक की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>कामां।</strong> यथा नाम तथा गुण वाली कहावत कामां में जन्मीं आर्यिका विजया मति माताजी पर चरितार्थ होती है। उनका ग्रहस्थ अवस्था का नाम सरस्वतीदेवी था। उनकी वाणी में साक्षात सरस्वती का वास रहता था। आर्यिका दीक्षा उपरांत आचार्य विमल सागर ने विजयामति नाम रखा तो उन्होंने नाम के अनुरूप सम्पूर्ण भारतवर्ष में जैन धर्म की विजयी पताका फहराई। संघ में उन्हें विदुषी होने के कारण चलती-फिरती पाठशाला की संज्ञा दी जाती थी। उक्त कथन कामां के शान्तिनाथ दिगम्बर जैन दीवान मंदिर में आर्यिका विजयामति माताजी की 95 वीं जन्मजयंती के अवसर पर आयोजित गुणानुवाद सभा में वक्ताओं ने व्यक्त किये।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-43358" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/05/IMG-20230503-WA0024.jpg" alt="" width="1152" height="864" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/05/IMG-20230503-WA0024.jpg 1152w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/05/IMG-20230503-WA0024-300x225.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/05/IMG-20230503-WA0024-1024x768.jpg 1024w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/05/IMG-20230503-WA0024-768x576.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/05/IMG-20230503-WA0024-74x55.jpg 74w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/05/IMG-20230503-WA0024-111x83.jpg 111w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/05/IMG-20230503-WA0024-215x161.jpg 215w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/05/IMG-20230503-WA0024-990x743.jpg 990w" sizes="auto, (max-width: 1152px) 100vw, 1152px" /></p>
<p><strong>अर्पित की विनयांजलि</strong></p>
<p>श्री शांतिनाथ मन्दिर समिति कामां के उत्तम जैन व प्रदीप जैन के अनुसार मूलनायक शान्तिनाथ भगवान स्थापना तिथि एवं गणिनी आर्यिका विजयामति माताजी की 95वीं जन्मजयंती पर वैशाख सुदी द्वादशी को प्रातः अभिषेक, शान्तिधारा की गई। अवसर पर राजकुमार, विवेक जैन बड़जात्या को सौधर्म इंद्र बनने का सौभाग्य मिला। शाम को 48 दीपकों से भक्तामर पाठ की महाअर्चना कर विश्व शांति की भावना भाई गयी। गुणानुवाद सभा का प्रारम्भ सुनील जैन पथवारी के मंगलाचरण व माताजी के चित्र पर दीप प्रज्ज्वलन से हुआ। सभा में मन्दिर समिति के महामंत्री संजय जैन बड़जात्या ने कहा कि यह हमारा गौरव है कि आर्यिका विजया मति माताजी का जन्म कामां की धरा पर सेठ सन्तोषीलाल व माता चिरोंजी देवी के आंगन में हुआ। माताजी का ससंघ वर्षायोग वर्ष 1995 में कामां नगरी में हुआ था, तब अनेकों बड़े धार्मिक आयोजनों से समाज में धर्म के संस्कार रोपित हुए। कार्यक्रम में जैन समाज के पूर्व संरक्षक सत्येन्द्र जैन, धर्म जागृति संस्थान के अध्यक्ष संजय सर्राफ, रिंकू बड़जात्या ने भी माताजी के अनेकों संस्मरण सुनाकर अपनी विनयांजलि अर्पित की।</p>
<p><strong>धर्म शास्त्रों का लेखन</strong></p>
<p>ज्ञातव्य हो कि पूज्य गणिनी आर्यिका विजयामती माताजी ने अपने साधनाकाल में 300 से अधिक धर्म शास्त्रों का लेखन किया। उन्हें आचार्य महावीर कीर्ति महाराज द्वारा गणिनी पद प्रदान किया, तब वे प्रथम गणिनी के रूप में विख्यात हुईं। कामां में वर्षायोग के दौरान समाज द्वारा उन्हें समाधि कल्पद्रुम की उपाधि भी प्रदान की गई। इस अवसर पर युवा परिषद, मित्र मंडल, धर्म जागृति संस्थान, ज्ञान विजया महिला मंडल, महिला परिषद, चन्द्रप्रभु महिला मंडल के सदस्यों के साथ साथ सैकड़ों की संख्या में सधर्मी महिला, पुरुष व बच्चे उपस्थित थे।</p>
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		<title>आचार्य श्री प्रसन्न सागर जी का 53वां अवतरण दिवस भक्तिपूर्वक मनाया गया</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 24 Jul 2022 15:12:34 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[समाचार]]></category>
		<category><![CDATA[आचार्य प्रसन्न सागर]]></category>
		<category><![CDATA[उपवास]]></category>
		<category><![CDATA[जन्मजयंती]]></category>
		<category><![CDATA[सम्मेदशिखर]]></category>
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					<description><![CDATA[557 दिन की मौन साधना में हैं प्रसन्न सागर महाराज न्यूज सौजन्य -राज कुमार अजमेरा झुमरी तिलैया (कोडरमा)। स्थानीय जैन मंदिर के प्रांगण में जैन धर्म के महान संत महा-तपस्वी साधना महोदधि आत्महिंतकर 108 अंर्तमना आचार्य श्री प्रसन्न सागर जी महामुनिराज का 53वां अवतरण दिवस बड़े ही धूमधाम के साथ भक्तिपूर्वक मनाया गया। प्रातः गुरुवर [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong><em>557 दिन की मौन साधना में हैं प्रसन्न सागर महाराज</em></strong></p>
<p><span style="color: #ff0000">न्यूज सौजन्य -राज कुमार अजमेरा</span></p>
<p><strong><img loading="lazy" decoding="async" class="aligncenter wp-image-25638" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2022/07/IMG-20220724-WA0136-300x185.jpg" alt="" width="450" height="278" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2022/07/IMG-20220724-WA0136-300x185.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2022/07/IMG-20220724-WA0136.jpg 791w" sizes="auto, (max-width: 450px) 100vw, 450px" /></strong></p>
<p><strong>झुमरी तिलैया (कोडरमा)।</strong> स्थानीय जैन मंदिर के प्रांगण में जैन धर्म के महान संत महा-तपस्वी साधना महोदधि आत्महिंतकर 108 अंर्तमना आचार्य श्री प्रसन्न सागर जी महामुनिराज का 53वां अवतरण दिवस बड़े ही धूमधाम के साथ भक्तिपूर्वक मनाया गया। प्रातः गुरुवर की पूजा अष्ट द्रव्यों से अत्यंत भक्ति भाव से की गई। परमपूज्य मुनि श्री 108 विशल्य सागर जी मुनिराज के ससंघ सान्निध्य में अलका दीदी एवं भारती दीदी के निर्देशन में महाआरती एवं दीप प्रज्जवलन करने का सौभाग्य समाज के मंत्री ललित सेठी, उपाध्यक्ष कमल सेठी, उपमंत्री राज छाबड़ा, पूर्व अध्यक्ष सुशील छाबड़ा, युवा सम्राट सुरेश झाँझरी, संयोजक सुरेन्द्र काला मनीष-सिमा सेठी, राज अजमेरा को प्राप्त हुआ।<br />
मुनिश्री ने कहा कि आज आचार्य प्रसन्न सागर महाराज 557 दिन की मौन साधना में साशवत सम्मेदशिखरजी पर्वतराज पर तपस्या में लीन हैं। आज के इस भौतिक युग में जहां लोग खाने के लिए जीवित हैं वही जैन धर्म के महान संत 557 दिन में केवल 61 दिन मात्र एक ही समय जल और भोजन ग्रहण कर निर्जरा उपवास की उत्कृष्टतम मौन साधना कर रहे हैं। जैन धर्म के सबसे बड़े तीर्थराज सम्मेदशिखर जी पर तपस्या और ध्यान में लीन ऐसे ही संतों के कारण आज पृथ्वी पर धर्म गतिमान है। इस मौके पर विशेष रूप से मीडिया प्रभारी नवीन जैन, राज कुमार अजमेरा, संजय, सुबोध गंगवाल, नरेंद्र, शांतिलाल, राजीव,अजय, नवीन, विकास, अन्नू,शास्वत सेठी, महिला समाज की सीमा सेठी,अंजना,अलका,अंजू ,मीरा प्रदीप, मीरा राज छाबड़ा उषा, रचना, किरण, आदि मौजूद रहीं।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="aligncenter wp-image-25639" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2022/07/FB_IMG_1658675278963-300x240.jpg" alt="" width="450" height="360" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2022/07/FB_IMG_1658675278963-300x240.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2022/07/FB_IMG_1658675278963.jpg 960w" sizes="auto, (max-width: 450px) 100vw, 450px" /></p>
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