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	<title>चारूकीर्ति भट्टारक महास्वामी &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<title>चारूकीर्ति भट्टारक महास्वामी &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>चारूकीर्ति स्वामी की 75वीं जन्मजयंती के उपलक्ष्य में विशेष श्रृंखला-3 : श्रमण संस्कृति के प्रहरी थी चारूकीर्ति भट्टारक महास्वामीजी- मुनि श्री सुधासागरजी महाराज </title>
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		<pubDate>Fri, 06 Sep 2024 09:26:01 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[श्रवणबेलगोला के समाधिस्थ बड़े स्वामी जी चारूकीर्ति भट्टारक जी को सामाजिक और धार्मिक योगदान के लिए जाना जाता है। उन्होंने समाज में नैतिकता, आध्यात्मिकता और अहिंसा के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने अपने जीवन को जैन धर्म के सिद्धांतों के पालन और शिक्षा में समर्पित कर दिया। स्वामी जी ने अपने प्रवचनों के [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>श्रवणबेलगोला के समाधिस्थ बड़े स्वामी जी चारूकीर्ति भट्टारक जी को सामाजिक और धार्मिक योगदान के लिए जाना जाता है। उन्होंने समाज में नैतिकता, आध्यात्मिकता और अहिंसा के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने अपने जीवन को जैन धर्म के सिद्धांतों के पालन और शिक्षा में समर्पित कर दिया। स्वामी जी ने अपने प्रवचनों के माध्यम से समाज में नैतिकता और अहिंसा के प्रति जागरूकता फैलाने का कार्य किया। उनका जीवन और कार्य न केवल जैन समुदाय के लिए, बल्कि संपूर्ण समाज के लिए प्रेरणादायक है। विभिन्न विद्वानों ने समय-समय पर स्वामी के बारे में बहुत कुछ लिखा है। स्वामी जी की 75वीं जन्मजयंती के उपलक्ष्य में उन सभी आलेखों का प्रकाशन श्रृंखलाबद्ध रूप में श्रीफल जैन न्यूज पर किया जा रहा है। <span style="color: #ff0000">इसकी तीसरी कड़ी में आज पढ़िए मुनि श्री सुधासागर जी महाराज का आलेख&#8230;.</span></strong></p>
<hr />
<p>चारुकीर्ति जी स्वामी श्रवणबेलगोला इस युग के सबसे आदर्श भट्टारक थे। श्रेष्ठ भट्टारक थे। आचार और विचारों में भट्टारकों में सबसे श्रेष्ठ थे। अचार भी उनका श्रेष्ठ था, विचारों में तो वे बहुत-बहुत महान् थे। उनको सत्य की पहचान थी। वे श्रमण संस्कृति के सबसे बड़े सम्पोषक थे। श्रवणबेलगोला को जो आज ऊंचाइयां मिली हैं, वे चारूकीर्ति भट्टारक ने ही दी हैं। सन् 1967 से महामस्तकाभिषेक हो रहे हैं, दक्षिण और उत्तर भारत को एक करने का श्रेय जाता है तो चारूकीर्ति भट्टारक को जाता है। हमारे यहां एक युग था जब उत्तर भारत और दक्षिण भारत दो भागों में बंट चुका था, दोनों के सम्पर्क टूट चुके थे, दोनों अलग थे लेकिन उत्तर भारत और दक्षिण भारत की जैन समाज को एक अखण्ड रूप में स्थापित करने में चारूकीर्ति जी का योगदान रहा है। चारूकीर्ति जी भट्टारक आदर्श भट्टारक थे। गोम्टेश बाहुबली के माध्यम से दक्षिण और उत्तर भारत को एक किया, यह बहुत बड़ा प्रशंसनीय कार्य था। चारूकीर्ति के निदेशन में श्रवणबेलगोला में जो कार्यक्रम हुए, वे बहुत बढ़िया रहे। दूसरी बात जैनधर्म को राजनैतिक स्तर प्रदान कराने में सर्वश्रेष्ठ काम है चारूकीर्ति भट्टारक का। उन्होंने जैन धर्म को राष्ट्रीय संरक्षण दिलवाया।</p>
<p>मेरे पास भी उनके बहुत समाचार आए कि महाराज जी एक बार आप दक्षिण भारत की तरफ आइए। पूज्य गुरु देव (आचार्य श्री विद्यासागरजी) के पास तो भट्टारक स्वयं आए, लेकिन आचार्यश्री तो श्रवणबेलगोला नहीं पहुंच पाए लेकिन भट्टारक जी ने श्रवणबेलगोला में आचार्यश्री के स्वर्ण जयंती पर भारत का सर्वश्रेष्ठ कीर्ति स्तंभ बनवाया। चारूकीर्ति भट्टारक ने वस्तुतः जैनधर्म की, जैन शास्त्रों की और जैन श्रमण संस्कृति की रक्षा की, भले ही परंपरा में नहीं थे लेकिन परंपरा के पहरी थे।</p>
<p>वे विचारों में बहुत निर्मल थे। बताते हैं कि वे चातुर्मास आदि में इधर-उधर नहीं जाते थे। उत्तर भारत से जब भी साधु श्रवणबेलगोला जाते थे तो उन सभी साधुओं के लिए बहुत आदर के साथ सम्मान देते थे। उन्होंने कभी भी किसी का अनादर नहीं किया। उनके जाने से एक बहुत बड़ी क्षति हुई है। श्रमण संस्कृति की रक्षा करने वाला एक पहरी हमारे बीच से चला गया। दिवंगत आत्मा के लिए बहुत-बहुत आशीर्वाद। मेरी भावना है कि इस बार उन्होंने भट्टारक पद निभाया है, अगली बार मुनि पद का निर्वाह करें।</p>
<p>श्रृंखला-1</p>
<blockquote class="wp-embedded-content" data-secret="BkUWISELHw"><p><a href="https://www.shreephaljainnews.com/charukeerti_swami_had_started_his_sadhana_since_long_ago_acharya_shri_vardhaman_sagar_maharaj/">चारूकीर्ति स्वामी जी ने बहुत पहले से अपनी साधना को शुरू कर रखा था &#8211; आचार्य श्री वर्धमानसागर जी महाराज</a></p></blockquote>
<p><iframe class="wp-embedded-content" sandbox="allow-scripts" security="restricted"  title="&#8220;चारूकीर्ति स्वामी जी ने बहुत पहले से अपनी साधना को शुरू कर रखा था &#8211; आचार्य श्री वर्धमानसागर जी महाराज&#8221; &#8212; श्रीफल जैन न्यूज़" src="https://www.shreephaljainnews.com/charukeerti_swami_had_started_his_sadhana_since_long_ago_acharya_shri_vardhaman_sagar_maharaj/embed/#?secret=bYgZcIVrPa#?secret=BkUWISELHw" data-secret="BkUWISELHw" width="600" height="338" frameborder="0" marginwidth="0" marginheight="0" scrolling="no"></iframe></p>
<p>श्रृंखला-2</p>
<blockquote class="wp-embedded-content" data-secret="d9OUueFoIw"><p><a href="https://www.shreephaljainnews.com/the_greatest_decoration_of_charukeerti_personality_is_ajatshatruta_acharya_shri_suvidhisagar_maharaj/">चारुकीर्ति जी के व्यक्तित्व का सबसे बड़ा अलंकरण &#8216;अजातशत्रुता&#8217; -आचार्य श्री सुविधिसागर महाराज</a></p></blockquote>
<p><iframe class="wp-embedded-content" sandbox="allow-scripts" security="restricted"  title="&#8220;चारुकीर्ति जी के व्यक्तित्व का सबसे बड़ा अलंकरण &#8216;अजातशत्रुता&#8217; -आचार्य श्री सुविधिसागर महाराज&#8221; &#8212; श्रीफल जैन न्यूज़" src="https://www.shreephaljainnews.com/the_greatest_decoration_of_charukeerti_personality_is_ajatshatruta_acharya_shri_suvidhisagar_maharaj/embed/#?secret=9Qy0E7kN1H#?secret=d9OUueFoIw" data-secret="d9OUueFoIw" width="600" height="338" frameborder="0" marginwidth="0" marginheight="0" scrolling="no"></iframe></p>
<p>&nbsp;</p>
<p>&nbsp;</p>
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		<title>चारूकीर्ति स्वामी की 75वीं जन्मजयंती के उपलक्ष्य में विशेष श्रृंखला-2 : चारुकीर्ति जी के व्यक्तित्व का सबसे बड़ा अलंकरण &#8216;अजातशत्रुता&#8217; -आचार्य श्री सुविधिसागर महाराज </title>
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		<pubDate>Thu, 05 Sep 2024 07:41:50 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[श्रवणबेलगोला के समाधिस्थ बड़े स्वामी जी चारूकीर्ति भट्टारक जी को सामाजिक और धार्मिक योगदान के लिए जाना जाता है। उन्होंने समाज में नैतिकता, आध्यात्मिकता और अहिंसा के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने अपने जीवन को जैन धर्म के सिद्धांतों के पालन और शिक्षा में समर्पित कर दिया। स्वामी जी ने अपने प्रवचनों के [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>श्रवणबेलगोला के समाधिस्थ बड़े स्वामी जी चारूकीर्ति भट्टारक जी को सामाजिक और धार्मिक योगदान के लिए जाना जाता है। उन्होंने समाज में नैतिकता, आध्यात्मिकता और अहिंसा के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने अपने जीवन को जैन धर्म के सिद्धांतों के पालन और शिक्षा में समर्पित कर दिया। स्वामी जी ने अपने प्रवचनों के माध्यम से समाज में नैतिकता और अहिंसा के प्रति जागरूकता फैलाने का कार्य किया। उनका जीवन और कार्य न केवल जैन समुदाय के लिए, बल्कि संपूर्ण समाज के लिए प्रेरणादायक है। विभिन्न विद्वानों ने समय-समय पर स्वामी के बारे में बहुत कुछ लिखा है। स्वामी जी की 75वीं जन्मजयंती के उपलक्ष्य में उन सभी आलेखों का प्रकाशन श्रृंखलाबद्ध रूप में श्रीफल जैन न्यूज पर किया जा रहा है।<span style="color: #ff0000"> इसकी दूसरी कड़ी में आज पढ़िए आचार्य श्री सुविधिसागर महाराज का आलेख&#8230;.</span></strong></p>
<hr />
<p>भट्टारक प्रवर धवलकीर्तिजी ने बताया कि आज से कुछ दिनों पूर्व पूज्य गुरुवर्य चारुकीर्ति स्वामीजी ने मुझे बुलाया, चूंकि मैं 15 माह से यहां हूं, इसलिए एक-एक घटना मुझे पता है। अचानक चारुकीर्ति जी महाराज का संदेश आता है कि आप तत्काल यहां आइये। जाने के बाद चारुकीर्ति महाराज ने कहा कि आप मुझे निवेदन पत्र लिखिए। जैसा कि भट्टारक परम्परा का नियम है कि आप अपने पद पर किसी को आरूढ़ करें। इन्होंने निवेदन पत्र लिखा। उसके बाद कनकगिरि के भट्टारक भुवन कीर्ति जी महाराज को बुलाया। उनको बुलाकर कहा कि आप इस पर अनुदमोना पत्र लिखें। उसके बाद कमंडल, पिच्छी और दंड को बाहर रखकर पूरी व्यवस्था कर ताले लगवाए। विचार पट्ट पर आगम कीर्ति जी महाराज को स्थापित किया। उसके बाद जिस दिन उनकी संल्लेखना हुई, सुबह जिनालय से आकर वंदना कर कुछ लोगों को बुलाया। उनमें से चार लोगों को खड़ा किया और आगम कीर्ति जी महाराज को चाबी देकर कहा कि मेरी जवाबदारी पूरी हुई।</p>
<p><strong>णमोकार मंत्र सुनते हुए प्राण ज्योति का विलय</strong></p>
<p>उनके पैरों में जो 2018 से अब तक दर्द था. न उन्होंने चिकित्सा कराई न किसी तरह का शिथिलाचार किया। बल्कि अन्न का त्याग कर तपस्या कर रहे थे। ऐसी परिस्थिति में मंदिर से आते समय जैसे ही उनका पैर मुड़ा और थोड़ी चोट लगी तो उन्होंने सबसे पहले णमोकार मंत्र बोलते हुए अपने वस्त्र निकाल दिया, केवल अधोवस्त्र पास रखा। कहने का तात्पर्य है कि हमारे यहां अहलक अवस्था की व्यवस्था है, उसे दीक्षा नहीं कहेंगे क्योंकि वह गुरु के व्रत संस्कार के बाद होती है। जिस प्रकार के जीवन की उन्होंने कल्पना की कि मेरे द्वारा मुनि पद धारण करने के बाद ही संल्लेखना हो, लेकिन जब उन्होंने देखा कि अब समयावली शेष नहीं है तो उन्होंने अपने वस्त्र निकालने के बाद वहां खड़े लोगों को णमोकार मंत्र सुनाने को कहा। णमोकार मंत्र सुनते हुए उन्होंने सुबह के समय अपनी प्राण ज्योति का विलय किया। भट्टारक परम्परा में इस प्रकार की संल्लेखना अद्भुत है।</p>
<p><strong>उनके काम सभी संघों का करेंगे मार्गदर्शन</strong></p>
<p>उनके माध्यम से 48 मंदिरों का संचालन होता था। प्रतिदिन 48 मंदिरों को गाजे-बाजे के साथ द्रव्य जाना और त्रिकाल पूजा होना उनके माध्यम से होता था। शास्त्र की बात करें तो अक्षरा-अभिषेक के नाम पर 108 ग्रंथ प्रकाशित हुए। उसके अतिरिक्त धवला का पूर्ण प्रकाशन उन्होंने कन्नड़ में किया और सभी संघों में पहुंचा। कई ग्रंथों का प्रकाशन किया। उसके बाद गुरुओं की बात करें तो भारत का एक भी संघ ऐसा नहीं है जो यह कहे कि चारुकीर्ति स्वामी जी ने हमारे संघ की सेवा नहीं की। राष्ट्रीय बात करें तो भगवान् बाहुबली के अभिषेक के बाद सैनिक कोष में दान राशि दी। 2019 में कर्नाटक में जब बाढ़ आई तो लोगों के खाने व रहने की व्यवस्था अपने मठ के माध्यम से की। औषधालय, गुरुकुल हर क्षेत्र में उन्होंने उल्लेखनीय कार्य किए हैं। उनके आदर्श समस्त संघों के लिए मार्गदर्शन करें। अजातशत्रुता उनके व्यक्तित्व का सबसे बड़ा अलंकरण रहा। मेरे ध्यान में 100-150 वर्ष के अंतराल में पूज्य चारुकीर्ति भट्टारक एक ऐसे पिच्छीधारी हैं जिनकी समाधि के उपरांत राष्ट्र की ओर से सम्मान करते हुए सलामी दी गई। इस प्रकार के गौरव को उन्होंने प्राप्त किया।</p>
<p>चारूकीर्ति स्वामी की 75वीं जन्मजयंती के उपलक्ष्य में विशेष श्रृंखला-1 : चारूकीर्ति स्वामी जी ने बहुत पहले से अपनी साधना को शुरू कर रखा था – आचार्य श्री वर्धमानसागर जी महाराज <a href="https://www.shreephaljainnews.com/charukeerti_swami_had_started_his_sadhana_since_long_ago_acharya_shri_vardhaman_sagar_maharaj/">https://www.shreephaljainnews.com/charukeerti_swami_had_started_his_sadhana_since_long_ago_acharya_shri_vardhaman_sagar_maharaj/</a></p>
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		<title>चारूकीर्ति स्वामी की 75वीं जन्मजयंती के उपलक्ष्य में विशेष श्रृंखला-1 : चारूकीर्ति स्वामी जी ने बहुत पहले से अपनी साधना को शुरू कर रखा था &#8211; आचार्य श्री वर्धमानसागर जी महाराज </title>
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		<pubDate>Wed, 04 Sep 2024 08:16:41 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[श्रवणबेलगोला के समाधिस्थ बड़े स्वामी जी चारूकीर्ति भट्टारक जी को सामाजिक और धार्मिक योगदान के लिए जाना जाता है। उन्होंने समाज में नैतिकता, आध्यात्मिकता और अहिंसा के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने अपने जीवन को जैन धर्म के सिद्धांतों के पालन और शिक्षा में समर्पित कर दिया। स्वामी जी ने अपने प्रवचनों के [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>श्रवणबेलगोला के समाधिस्थ बड़े स्वामी जी चारूकीर्ति भट्टारक जी को सामाजिक और धार्मिक योगदान के लिए जाना जाता है। उन्होंने समाज में नैतिकता, आध्यात्मिकता और अहिंसा के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने अपने जीवन को जैन धर्म के सिद्धांतों के पालन और शिक्षा में समर्पित कर दिया। स्वामी जी ने अपने प्रवचनों के माध्यम से समाज में नैतिकता और अहिंसा के प्रति जागरूकता फैलाने का कार्य किया। उनका जीवन और कार्य न केवल जैन समुदाय के लिए, बल्कि संपूर्ण समाज के लिए प्रेरणादायक है। विभिन्न विद्वानों ने समय-समय पर स्वामी के बारे में बहुत कुछ लिखा है। स्वामी जी की 75वीं जन्मजयंती के उपलक्ष्य में उन सभी आलेखों का प्रकाशन श्रृंखलाबद्ध रूप में श्रीफल जैन न्यूज पर किया जा रहा है। इसकी पहली कड़ी में आज <span style="color: #ff0000">पढ़िए आचार्य श्री वर्धमानसागर जी महाराज का आलेख&#8230;.</span></strong></p>
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<p>भट्टारक चारुकीर्ति जी स्वामी श्रवणबेलगोला के अकस्मात् देवलोक गमन होने पर वात्सल्य वारिधि आचार्य श्री वर्धमानसागर जी महाराज ने श्रवणबेलगोला तीर्थ के चारुकीर्ति भट्टारक स्वामी जी के जीवन कृतित्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भगवान् बाहुबली के परम भक्त श्री चारूकीर्ति भट्टारक स्वामी जी का समाधिमरण हो गया है। यह समाचार सुनकर के पूरा पिछला इतिहास स्मृति पटल पर घूमने लगा। चारूकीर्ति भट्टारक जी ने आचार्य शांतिसागर महाराज की परम्परा को बहुत सम्मान दिया। सम्मानपूर्वक उन्होंने 3 महामस्तकाभिषेक 1993, 2006, 2018 को अपने सान्निध्य मे सम्पन्न कराया। उनका अचानक देवलोक गमन होना सारी समाज के लिए दुःखदाई है। 1981 में आचार्य विद्यानंदी जी महाराज के सान्निध्य में सहस्त्र शताब्दी महोत्सव सम्पन्न कराया, यह उनके जीवन की बड़ी भारी उपलब्धि कही जा सकती है। उन्होंने महामस्तकाभिषेक को सम्पन्न कराके जो हर 12 वर्षों में होता है, जिनधर्म की, भगवान् बाहुबली स्वामी की जो प्रभावना की, उसे भुलाया नहीं जा सकता। स्वामीजी सभी को यथोचित सम्मान देते थे, यह उनकी विशेष बात थी। उनके मार्गदर्शन में श्रवणबेलगोला में महामस्तकाभिषेक के अलावा और भी अनेक महत्त्वपूर्ण कार्य हुए हैं जो उन्हें सदैव जीवंत बनाए रखेगें।</p>
<p>स्वामीजी के लिए भगवान् बाहुबली से प्रार्थना करते हैं कि उन्होंने जिस प्रकार से श्रवणबेलगोला तीर्थ को विश्व प्रसिद्ध की ऊंचाइयों तक पहुंचाने का प्रबल पुरुषार्थ किया, इसी प्रकार वे भगवान् बाहुबली के परम भक्त रहे हैं और उनकी भावना भी थी कि मैं दीक्षा लेकर भगवान बाहुबली जैसी साधना कर सकूं, ऐसा मुझे आशीर्वाद दीजिये।</p>
<p>वो संभव नहीं हो सका। लेकिन हमको जहां तक ध्यान है उन्होंने अपनी साधनाओं को बहुत पहले से शुरू कर रखा था। अपने जीवन में वे सदैव सावधान रहे। आज श्रवणबेलगोला जिन ऊंचाइयों को छू रहा है, वह भट्टारक चारूकीर्ति जी स्वामी के प्रबल, अथक पुरुषार्थ के कारण ही संभव हो पाया है। वे महनीय कार्यों के कारण सदैव याद किये जाते रहेंगे।</p>
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