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	<title>चतुर्विध संघ &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>मेरठ से जुड़ा एक और स्वर्णिम इतिहास : राजधानी दिल्ली के प्रतिष्ठित जैन परिवार की बच्ची ने किया विमर्श गुरुकुलम् में आत्म समर्पण </title>
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		<pubDate>Tue, 07 Apr 2026 06:00:49 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री विमर्श सागर जी के विशाल चतुर्विध संघ में एक और वैरागी आत्मा ने आत्म समर्पण किया। राजधानी दिल्ली के कृष्णानगर में निवास करने वाले एक प्रतिष्ठित परिवार में बड़े ही नाजों से पली-बढ़ी अविका जैन आचार्य संघ से जुड़ीं। मेरठ से पढ़िए, सोनल जैन की यह रिपोर्ट&#8230; मेरठ। आचार्य श्री विमर्श सागर जी [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य श्री विमर्श सागर जी के विशाल चतुर्विध संघ में एक और वैरागी आत्मा ने आत्म समर्पण किया। राजधानी दिल्ली के कृष्णानगर में निवास करने वाले एक प्रतिष्ठित परिवार में बड़े ही नाजों से पली-बढ़ी अविका जैन आचार्य संघ से जुड़ीं। <span style="color: #ff0000">मेरठ से पढ़िए, सोनल जैन की यह रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मेरठ।</strong> आचार्य श्री विमर्श सागर जी के विशाल चतुर्विध संघ में एक और वैरागी आत्मा ने आत्म समर्पण किया। राजधानी दिल्ली के कृष्णानगर में निवास करने वाले एक प्रतिष्ठित परिवार में बड़े ही नाजों से पली-बढ़ी अविका जैन जिन‌का जन्म दादा नथमलदास, वीरेन्द्र जैन की पौत्री एवं पिता आशु जैन-माता निधि जैन की पुत्री के रूप में 19 जुलाई 2004 को हुआ था। धार्मिक संस्कारों के साथ अविका जैन ने अपनी लौकिक शिक्षा बीएससी केमेस्ट्री विषय के साथ पूर्ण की। राजधानी दिल्ली में वर्ष 2015 का चातुर्मास भव्यात्माओं के लिए एक स्वर्णिम अवसर बनकर आया। आज से पहले आचार्य प्रवर के संघ में राजधानी से ही तीन वैरागी भव्य जीवों ने घर-परिवार का मोह त्यागकर वैराग्य पंथ अंगीकार कर गुरु चरणों में आत्म समर्पण किया था।</p>
<p><strong>मोक्षमार्ग की मार्गदर्शिका बनेगी</strong></p>
<p>रविवार को श्री 1008 समवसरण महामंडल विधान के समापन अवसर पर राजधानी दिल्ली से अविका जैन को उनके पूरे कुटुम्ब ने उत्साह-उल्लास के साथ आचार्य श्री के चरणों गुरु संघ में समर्पित किया। इस वैरागी बहन के परिवारी जनों ने अपनी भावना रखते हुए कहा- हमारे परिवार का बड़ा ही सौभाग्य है, जो हमारे परिवार में एक ऐसी संतान ने जन्म लिया, जो गुरु संघ में समर्पित होकर आत्म कल्याण करेगी, साथ ही हम सभी के लिए भी मोक्षमार्ग की मार्गदर्शिका बनेगी। बहन के दादाजी ने कहा-हम सब संसारी प्राणी हैं, मोह से ग्रसित रहते हैं, हम सबने बिटिया को रोकने का 2 साल तक बहुत प्रयास किया किन्तु इसकी श्रद्धा और भक्ति ने हम सबको झुकने के लिए मजबूर कर दिया। बेटी के वैराग्य को देखकर हमारा पूरा परिवार ही अपने परिवार के एक पुष्प को गुरु चरणों में समर्पित करने आए हैं।</p>
<p><strong>समवसरण महामंडल विधान संपन्न</strong></p>
<p>महानगर मेरठ में प्रथम बार पधारे विशाल चतुर्विध संघ के सानिध्य में हुआ। श्री 1008 समवसरण महामंडल विधान रविवार को पूर्ण हुआ। महा-अनुष्ठान के आयोजक मेरठ जैन समाज के अध्यक्ष सुरेश जैन, ऋतुराज ने आत्म भावना व्यक्त करते हुए कहा -सच कहूँ &#8211; सर्वप्रथम तो वृहद् संघ को देखकर ही मन घबरा रहा था किन्तु आचार्य श्री और ससंघ की सरलता और वात्सल्य देखकर मैं क्या छोटी से छोटी समाज भी आचार्य श्री ससंघ को ले जाने के लिए तैयार हो जाते हैं। रविवार को आचार्य संघ (35 पिच्छी) शारदा रोड जैन मंदिर से पद‌विहार करते हुए मेरठ के आनंदपुरी जैन मंदिर में पहुंचे।</p>
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		<title>सत्संगति से मिलती है सद्‌गति : आचार्य श्री विमर्श सागर जी ससंघ के आगमन से मेरठ बना सत्संग स्थल </title>
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		<pubDate>Thu, 26 Mar 2026 08:29:19 +0000</pubDate>
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<p><strong>धर्मनगरी मेरठ में सत्संग गंगा बह रही है। आचार्य श्री विमर्शसागर जी अपने विशाल चतुर्विध संघ 35 पिच्छीधारी संयमी साधक-साधिकाओं के साथ वात्सल्य, दया, करुणा, अहिंसा और धर्म के अद्‌भुत मोती लुटा रहें हैं। <span style="color: #ff0000">मेरठ से पढ़िए, सोनल जैन की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मेरठ</strong>। धर्मनगरी मेरठ में सत्संग गंगा बह रही है। आचार्य श्री विमर्शसागर जी अपने विशाल चतुर्विध संघ 35 पिच्छीधारी संयमी साधक-साधिकाओं के साथ वात्सल्य, दया, करुणा, अहिंसा और धर्म के अद्‌भुत मोती लुटा रहें हैं। जिन्हें प्राप्त कर मेरठ नगर का हर नागरिक अंतरंग धर्म रूपी धन से धनवान होता जा रहा है। मंगलवार को प्रातः बेला में महावीर जयंती भवन शारा रोड से मेरठ की साधु सेवा समिति आचार्य श्री ससंघ से आग्रह-निवेदन कर एवं गाजे-बाजे के साथ हर्षोल्लाह के साथ अगवानी करते हुए कमला नगर के दिगम्बर जैन मंदिर आए। मेरठ जैन समाज के यशस्वी अध्यक्ष सुरेश जैन&#8217; &#8216;ऋतुराज&#8217; ने धर्मसभा के मध्य आचार्य श्री को श्रीफल अर्पित कर कहा कि विगत 15 दिनों से आचार्य श्री ससंघ हमारे मेरठ शहर में विराजमान हैं। मुझे सुखद आश्चर्य है कि इतने विशाल संघ के साथ भी आचार्यश्री अत्यंत सरल-सहज और निर्विकल्प बने रहते हैं। सच कहूँ कि आचार्य गुरुवर हमें अंतरंग शाश्वत धन से धनवान बनाने आए हैं। जिसे जितना धनवान बनना है वह गुरुवर के चरणों आए और अपना एवं सबका हित है। धर्मसभा में उपस्थित धर्मालुओं को संबोधित करते हुये आचार्य प्रवर ने कहा कि किसी ने पूछा -गुरुवर</p>
<p>अच्छी गति कैसे प्राप्त होगी? मैंने कहा- यदि चाहिए आपको अच्छी गति तो करनी होगी अवश्य ही सत्संगति। आपको सच्चे देव-शास्त्र-गुरु की संगति करना होगी। उनकी निकटता प्राप्त करना होगी। फिर पूछा क्या केवल निकटता प्राप्त करना ही सत्संगति है? मैंने कहा प्रथम तो निकटता ही प्राप्त करना चाहिए पुनः सद्‌गुरु की निकटता से जो सीखा हो उसे अपने जीवन में स्वीकार करना, उसे अपना आचरण बनाना, बस यही सत्संगति है। बन्धुओं, आज तक जितने पुरुष महापुरुष बने हैं, वे एकमात्र सत्संगति से ही बने हैं। क्योंकि यदि गलियों का गंदा पानी भी गंगाजल में मिल जाये तो वह भी पवित्रता को प्राप्त हो जाता है। ध्यान रखना, जीवन में क्षणभर की सत्संगति भी पूरे जीवन को सार्थक कर देती है। जीवन के अन्तिम क्षण में भी यदि सद्‌गुरु के दो वचन भी आपके कान में पड़ जायें और आप उन्हें श्रद्धाা से श्रवण कर लें तो भी जीवन भर में किये पाप भी पलायन कर जाते हैं। आप सत्संगति करें और सद्‌गति प्राप्त करें।</p>
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		<title>त्रिलोक तीज मंगलवार को मनाई जाएगी: भाद्रपद शुक्ल तृतीया तिथि को श्रद्धापूर्वक मनाते है यह पर्व  </title>
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		<pubDate>Mon, 25 Aug 2025 11:27:20 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन धर्म में त्रिलोक तीज या रोट तीज का पर्व धार्मिक और सांस्कृतिक दोनों दृष्टियों से बहुत महत्वपूर्ण है। यह पर्व हर वर्ष भाद्रपद शुक्ल तृतीया को मनाया जाता है। इस वर्ष यह 26 अगस्त को मनाई जाएगी। इंदौर से पढ़िए, यह विशेष जानकारी&#8230;सोर्स वेबदुनिया&#8230; इंदौर। जैन धर्म में त्रिलोक तीज या रोट तीज का [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जैन धर्म में त्रिलोक तीज या रोट तीज का पर्व धार्मिक और सांस्कृतिक दोनों दृष्टियों से बहुत महत्वपूर्ण है। यह पर्व हर वर्ष भाद्रपद शुक्ल तृतीया को मनाया जाता है। इस वर्ष यह 26 अगस्त को मनाई जाएगी। <span style="color: #ff0000">इंदौर से पढ़िए, यह विशेष जानकारी&#8230;सोर्स वेबदुनिया&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> जैन धर्म में त्रिलोक तीज या रोट तीज का पर्व धार्मिक और सांस्कृतिक दोनों दृष्टियों से बहुत महत्वपूर्ण है। यह पर्व हर वर्ष भाद्रपद शुक्ल तृतीया को मनाया जाता है। इस वर्ष यह 26 अगस्त को मनाई जाएगी। यह पर्व अक्सर गणेश चतुर्थी से एक दिन पूर्व आता है। रोट तीज का पर्व जैन धर्म के सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांतों, तपस्या, दान और आत्मिक उन्नति को दर्शाता है। त्रिलोक तीज या रोटतीज जैन धर्म का एक विशेष आध्यात्मिक पर्व है, जो न केवल व्रत और पूजा का प्रतीक है, बल्कि जैन दर्शन की त्रिलोक रचना, कर्म सिद्धांत, और आत्मा की मुक्ति के मार्ग को भी श्रद्धापूर्वक याद करने का अवसर है। इस व्रत के दिन उपवास या रस त्याग पूर्वक अपनी शक्तिनुसार एकासन किया जाता है।</p>
<p><strong>व्रत और पूजा की संपूर्ण विधि </strong></p>
<p>त्रिलोक तीज का व्रत तीन, बारह या चौबीस वर्षों तक किया जाता है, जो व्यक्ति की शक्ति और श्रद्धा पर निर्भर करता है। व्रत की विधि इस प्रकार है बताई गई है। व्रत का संकल्प लेने के लिए व्रत वाले दिन सुबह शीघ्र उठकर स्नान किया जाता है और साफ सुथरे वस्त्र पहने जाते हैं। फिर मंदिरजी में जाकर पूजा स्थल पर चौबीस तीर्थंकरों के पूजन की तैयारी की जाती है और हाथ में जल लेकर व्रत का संकल्प लिया जाता है। इस दिन 24 तीर्थंकरों की पूजा की जाती है, जिसे ‘चौबीसी विधान’ भी कहते हैं। तथा पंचपरमेष्ठी विधान किया जाता है। पुरुष वर्ग भगवान की प्रतिमाओं का अभिषेक करते हैं।</p>
<p><strong>रोट का भोग लगाने की परंपरा </strong></p>
<p>घर में बने हुए रोट, खीर और तुरई की सब्जी का भोग अलग निकालकर उसका पूजन करके गाय को खिलाया जाता है। भोग लगाने के बाद, रोट को प्रसाद के रूप में परिवार के सभी सदस्यों और रिश्तेदार खाते हैं। इस व्रत में दिन में केवल एक बार ‘एकासन’ किया जाता है, जिसमें केवल एक ही स्थान पर बैठकर अन्न और पानी ग्रहण किया जाता है। व्रत के दौरान निंदा का त्याग करके धर्म ध्यान में लीन रहते हैं। इस दिन जैन मंदिरों में शास्त्र दान और चतुर्विध संघ (साधु, साध्वी, श्रावक, श्राविका) को चार प्रकार का दान देने का भी विशेष महत्व है। पारंपरिक रूप से ऐसा माना जाता है कि यह व्रत न केवल आत्मिक शुद्धि देता है, बल्कि जीवन में सुख-समृद्धि और शांति भी लाता है।</p>
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		<title>भगवान पार्श्वनाथ का गर्भ कल्याणक महोत्सव: वैशाख कृष्ण द्वितीया तिथि के अनुसार इस बार यह 15 अप्रैल को </title>
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		<pubDate>Tue, 15 Apr 2025 02:41:17 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन धर्म के तेइसवें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ जी का गर्भ कल्याणक वैशाख कृष्ण द्वितीया को धार्मिक उल्लास के साथ मनाया जाएगा। दिगंबर जैन मंदिरों में अभिषेक, शांतिधारा, विधान आदि के कार्यक्रम पांरपरिक रूप से आयोजित किए जाएंगे। इस बार यह गर्भ कल्याण 15 अप्रैल को मनाया जाएगा। भगवान पार्श्वनाथ के गर्भ कल्याण से जुड़ी जानकारी [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जैन धर्म के तेइसवें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ जी का गर्भ कल्याणक वैशाख कृष्ण द्वितीया को धार्मिक उल्लास के साथ मनाया जाएगा। दिगंबर जैन मंदिरों में अभिषेक, शांतिधारा, विधान आदि के कार्यक्रम पांरपरिक रूप से आयोजित किए जाएंगे। इस बार यह गर्भ कल्याण 15 अप्रैल को मनाया जाएगा। <span style="color: #ff0000">भगवान पार्श्वनाथ के गर्भ कल्याण से जुड़ी जानकारी श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्रंखला में उपसंपादक प्रीतम लखवाल के संयोजन में पढ़िए&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> तेइसवें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ का गर्भ कल्याण इस बार 15 अप्रैल को है। इस दिन वैशाख कृष्ण द्वितीया है। इसी दिन भगवान ने अपनी माता के गर्भ में अवतरण लिया था। इस दिवस को पूरे भारत वर्ष में भगवान पारसनाथ जी के मंदिरों में धूमधाम से बनाया जाएगा। दिगंबर जैन मंदिरों में अभिषेक, शांतिधारा सहित विविध आयोजन कर जैन समाज के श्रावक-श्राविकाएं पुण्यलाभ अर्जित करेंगे। इस दिन दिनभर भगवान की भक्ति आराधना की जाएगी। जैन धर्म ग्रंथों के अनुसार काशी में 83 दिन की कठोर साधना और तप के बाद 84 वें दिन उन्हें केवल ज्ञान मिला था। पुंड़्र, ताम्रलिप्त आदि अनेक देशों में उन्होंने भ्रमण किया। ताम्रलिप्त में उनके शिष्य हुए। पार्श्वनाथ ने चतुर्विध संघ की स्थापना की। इसमें श्रमण, श्रमणी, श्रावक, श्राविका होते हैं और आज भी जैन समाज इसी स्वरूप में है। प्रत्येक गण एक गणधर के तहत कार्य करता था। सभी अनुयायियों, स्त्री हों या पुरुष सभी को समान माना जाता था। तीर्थंकर पार्श्वनाथ ने जैन धर्म के चार मुख्य व्रत सत्य, अहिंसा, अस्तेय और अपरिग्रह की शिक्षा दी थी।</p>
<p><strong>वामादेवी ने गर्भकाल में एक बार स्वप्न में सर्प देखा था</strong></p>
<p>जैन ग्रंथों के अनुसार वर्तमान में काल चक्र का अवरोही भाग, अवसर्पिणी गतिशील है और इसके चौथे युग में 24 तीर्थंकरों का जन्म हुआ था। भगवान् पार्श्वनाथ का जन्म वाराणसी के भेलूपुर में हुआ था। तीर्थंकर पार्श्वनाथ का जन्म लगभग 2 हजार 9 सौ वर्ष पूर्व वाराणसी में हुआ था। वाराणसी में अश्वसेन नाम के इक्ष्वाकु वंशीय क्षत्रिय राजा थे। उनकी रानी वामा ने पौष कृष्ण एकादशी के दिन महा तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया। जिसके शरीर पर सर्प चिन्ह था। वामादेवी ने गर्भकाल में एक बार स्वप्न में सर्प देखा था। इसलिए पुत्र का नाम ‘पार्श्व’ रखा गया। उनका प्रारंभिक जीवन राजकुमार के रूप में बीता। एक दिन पार्श्व ने महल से देखा कि पुरवासी पूजा की सामग्री लिए एक ओर जा रहे हैं। उन्होंने देखा कि एक तपस्वी, जहां पंचाग्नि जला रहा है और अग्नि में एक सर्प का जोड़ा मर रहा है। तब पार्श्वनाथ ने कहा:-‘दयाहीन धर्म किसी काम का नहीं।’ यह देख उनको वैराग्य हुआ और पार्श्वनाथ ने 30 वर्ष की उम्र में घर त्याग दिया और दीक्षा ली। अपना निर्वाणकाल समीप जानकर श्री सम्मेद शिखरजी पहुंचे। जहां श्रावण शुक्ल सप्तमी को उन्हे मोक्ष मिला।</p>
<p>भगवान पार्श्वनाथ की लोक व्यापकता का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि आज भी सभी तीर्थंकरों की मूर्तियों और चिन्हों में पार्श्वनाथ का चिन्ह सबसे ज्यादा है। आज भी पार्श्वनाथ की कई चमत्कारिक मूर्तियां देशभर में विराजित हैं। जिनकी गाथा आज भी पुराने लोग सुनाते हैं। जैन ग्रंथों में तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ के नौ पूर्व जन्मों का वर्णन है। पहले जन्म में ब्राह्मण, दूसरे में हाथी, तीसरे में स्वर्ग के देवता, चौथे में राजा, पांचवें में देव, छठवें जन्म में चक्रवर्ती सम्राट और सातवें जन्म में देवता, आठ में राजा और नौवें जन्म में राजा इंद्र (स्वर्ग) के बाद 10वें जन्म में उन्हें तीर्थंकर बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। पूर्व जन्मों के संचित पुण्यों और 10वें जन्म के तप के फलस्वरूप तीर्थंकर बनें।</p>
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		<title>भगवान पार्श्वनाथ का ज्ञान कल्याणक चैत्र कृष्ण चतुर्थी के दिन: तिथि के अनुसार इस बार यह 18 मार्च को मनाया जाएगा </title>
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		<pubDate>Mon, 17 Mar 2025 10:23:25 +0000</pubDate>
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<p>तेइसवें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ जी का ज्ञान कल्याणक चैत्र कृष्ण चतुर्थी के दिन हुआ था। इस दिन उन्हें कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। इस दिन को पूरे देश में पूरी श्रद्धा भक्ति और आनंद के साथ उनका ज्ञान कल्याणक मनाया जाता है। इस मंदिरों में अभिषेक, शांतिधारा, विधान आदि के कार्यक्रम कर पुण्य अर्जित किया जाता है। <span style="color: #ff0000">श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्रंखला में यह उपसंपादक प्रीतम लखवाल के संयोजन में पढ़िए&#8230;</span></p>
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<p>भगवान पार्श्वनाथ जैन धर्म के तेइसवें तीर्थंकर हैं। भगवान पार्श्वनाथ जी का ज्ञान कल्याणक चैत्र कृष्ण चतुर्थी के दिन हुआ था। इस दिन उन्हें कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। यह घटना उनके जीवन में एक महत्वपूर्ण मोड़ थी, जिसने उन्हें जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर के रूप में स्थापित किया। काशी में 83 दिन की कठोर तपस्या करने के बाद 84 वें दिन उन्हें केवल ज्ञान प्राप्त हुआ था। पुंड़्र, ताम्रलिप्त आदि अनेक देशों में उन्होंने भ्रमण किया। ताम्रलिप्त में उनके शिष्य हुए। पार्श्वनाथ ने चतुर्विध संघ की स्थापना की। इसमें श्रमण, श्रमणी, श्रावक, श्राविका होते हैं और आज भी जैन समाज इसी स्वरूप में है। प्रत्येक गण एक गणधर के तहत कार्य करता था। सभी अनुयायियों, स्त्री हो या पुरुष सभी को समान माना जाता था। सारनाथ जैन-आगम ग्रंथों में सिंहपुर के नाम से प्रसिद्ध है। यहीं पर जैन धर्म के 11वें तीर्थंकर श्रेयांसनाथ जी ने जन्म लिया था और अपने अहिंसा धर्म का प्रचार-प्रसार किया था। केवल ज्ञान के बाद तीर्थंकर पार्श्वनाथ ने जैन धर्म के चार मुख्य व्रत सत्य, अहिंसा, अस्तेय और अपरिग्रह की शिक्षा दी थी।</p>
<p><strong>भगवान पार्श्वनाथ ने कहाः-‘दयाहीन धर्म किसी काम का नहीं।’</strong></p>
<p>जैन ग्रंथों के अनुसार वर्तमान में काल चक्र का अवरोही भाग, अवसर्पिणी गतिशील है और इसके चौथे युग में 24 तीर्थंकरों का जन्म हुआ था। भगवान् पार्श्वनाथ का जन्म वाराणसी के भेलूपुर में हुआ था। तीर्थंकर पार्श्वनाथ का जन्म आज से लगभग 2 हजार 9 सौ वर्ष पूर्व वाराणसी में हुआ था। वाराणसी में अश्वसेन नाम के इक्ष्वाकुवंशीय क्षत्रिय राजा थे। उनकी रानी वामा ने पौष कृष्ण एकादशी के दिन महा तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया। जिसके शरीर पर सर्प चिन्ह था। वामादेवी ने गर्भकाल में एक बार स्वप्न में एक सर्प देखा था। इसलिए पुत्र का नाम ‘पार्श्व’ रखा गया। उनका प्रारंभिक जीवन राजकुमार के रूप में व्यतीत हुआ। एक दिन पार्श्व ने अपने महल से देखा कि पुरवासी पूजा की सामग्री लिए एक ओर जा रहे हैं। वहां जाकर उन्होंने देखा कि एक तपस्वी जहां पंचाग्नि जला रहा है और अग्नि में एक सर्प का जोड़ा मर रहा है तब पार्श्व ने कहाः-‘दयाहीन धर्म किसी काम का नहीं।’ तीर्थंकर पार्श्वनाथ ने तीस वर्ष की आयु में घर त्याग दिया था और जैन दीक्षा ली।</p>
<p><strong> सम्मेद शिखरजी पर हुआ निर्वाण</strong></p>
<p>अपना निर्वाणकाल समीप जानकर श्री सम्मेद शिखरजी (पारसनाथ की पहाड़ी जो झारखंड में है) पर चले गए। जहां श्रावण शुक्ल सप्तमी को उन्हे मोक्ष की प्राप्ति हुई। भगवान पार्श्वनाथ की लोक व्यापकता का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि आज भी सभी तीर्थंकरों की मूर्तियों और चिन्हों में पार्श्वनाथ का चिन्ह सबसे ज्यादा है। आज भी पार्श्वनाथ की कई चमत्कारिक मूर्तियां देशभर में विराजित हैं। जिनकी गाथा आज भी पुराने लोग सुनाते हैं।</p>
<p><strong>भगवान पार्श्वनाथ का पूर्वजन्म</strong></p>
<p>जैन ग्रंथों में तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ के नौ पूर्व जन्मों का वर्णन है। पहले जन्म में ब्राह्मण, दूसरे में हाथी, तीसरे में स्वर्ग के देवता, चौथे में राजा, पांचवें में देव, छठवें जन्म में चक्रवर्ती सम्राट और सातवें जन्म में देवता, आठ में राजा और नौवें जन्म में राजा इंद्र (स्वर्ग) के बाद दसवें जन्म में उन्हें तीर्थंकर बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। पूर्व जन्मों के संचित पुण्यों और दसवें जन्म के तप के फलस्वरूप तीर्थंकर बनें।</p>
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		<title>मुनिश्री प्रशम सागरजी ससंघ का बावनगजा सिद्ध क्षेत्र में हुआ मंगल प्रवेशः पूर्व विराजित संतो से हुआ मिलन </title>
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		<pubDate>Thu, 13 Mar 2025 13:12:02 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[बावनगजाजी पर आज प्रातः मुनिश्री प्रशम सागरजी, मुनिश्री प्रणुत सागरजी, मुनिश्री साध्य सागरजी, मुनिश्री जयेंद्र सागरजी का बड़वानी के निकट पार्श्वगिरी पर रात्रि विश्राम के पश्चात पार्श्वगिरी स्थित मंदिरों की वंदना दर्शनकर विहार हुआ। युवा और बच्चे साथ थे जो जैन धर्म का जयकारा और धर्म ध्वजा लिए चल रहे थे। हरसुख गुरुकुल के बच्चों [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>बावनगजाजी पर आज प्रातः मुनिश्री प्रशम सागरजी, मुनिश्री प्रणुत सागरजी, मुनिश्री साध्य सागरजी, मुनिश्री जयेंद्र सागरजी का बड़वानी के निकट पार्श्वगिरी पर रात्रि विश्राम के पश्चात पार्श्वगिरी स्थित मंदिरों की वंदना दर्शनकर विहार हुआ। युवा और बच्चे साथ थे जो जैन धर्म का जयकारा और धर्म ध्वजा लिए चल रहे थे। हरसुख गुरुकुल के बच्चों ने पाद प्रक्षालन कर आरती उतारी। <span style="color: #ff0000">पढ़िए बड़वानी से दीपक प्रधान जैन की यह पूरी खबर..</span></strong></p>
<hr />
<p><strong> बड़वानी।</strong> दिगंबर जैन समाज के विश्व प्रसिद्ध तीर्थ सिद्ध क्षेत्र बावनगजाजी पर आज प्रातः मुनिश्री प्रशम सागरजी, मुनिश्री प्रणुत सागरजी, मुनिश्री साध्य सागरजी, मुनिश्री जयेंद्र सागरजी का बड़वानी के निकट पार्श्वगिरी पर रात्रि विश्राम के पश्चात आज प्रातः पार्श्वगिरी स्थित मंदिरों की वंदना दर्शन कर बावनगजाजी सिद्ध क्षेत्र पर विहार हुआ। विहार के समय बड़वानी के युवा बच्चे साथ थे जो जैन धर्म का जयकारा और धर्म ध्वजा लिए चल रहे थे।</p>
<p><strong>मुनि संघ और आचार्य से मंगल मिलन </strong></p>
<p>सिद्ध क्षेत्र पर पहुंचने पर ट्रस्ट अध्यक्ष विनोद दोशी ने निमाड़ के भक्तों ने बड़वानी के युवा बच्चांे ने बावनगजा के स्टाफ, परिवार ने पाद प्रक्षालन कर आरती उतारी और श्रीफल समर्पित कर मंगल आशीर्वाद प्राप्त किया मुनि संघ ने बावनगजा पहुंचकर तलहटी के मंदिरों के दर्शन कर पूर्व में विराजित दो संघों के मुनि संघ और आचार्य से मंगल मिलन किया। मुनि संघ ने आहार चर्या सम्पन्न की और दोपहर में सामयिक, प्रतिक्रमण, धर्म चर्चा की सायंकाल श्रावकों ने मुनि संघ की और भगवान की आरती उतारी।</p>
<p><strong>महा अर्चना का आयोजन </strong></p>
<p>बावनगजा ट्रस्ट के अध्यक्ष विनोद दोशी ने बताया कि आगामी 15 तारीख को राष्ट्र संत गणाचार्य विराग सागरजी के मूल संघ के परम पूज्य गणधर श्रमण मुनि श्री विवर्धन सागरजी और प्रवर्तक श्रमण विश्व नायक सागरजी ,आचार्य गिरनार सागरजी, मुनिश्री प्रशम सागरजी, मुनिश्री प्रणुत सागरजी सहित संघ मुनि आर्यिका, क्षुल्लक, क्षुल्लिका चतुर्विध संघ के सानिध्य में बावनगजा महा आदिश्वर महा अर्चना का आयोजन किया गया है।</p>
<p><strong>बीच भक्तामर महा विधान आराधना </strong></p>
<p>बड़वाह की संगीत पार्टी कमल जैन एंड पार्टी की स्वर लहरियों के बीच भक्तामर महा विधान आराधना होगी। जिसमें अधिक से अधिक साधर्मियों को शामिल होकर धर्म लाभ लेने की अपील की है।</p>
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