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	<title>गौरेया &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
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	<title>गौरेया &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<item>
		<title>5 जून पर्यावरण दिवस -जानिये कैसे ये संस्था एक दशक से गौरैया के लिए घोंसला और पानी का कर रही इंतज़ाम</title>
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		<dc:creator><![CDATA[संपादक]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 03 Jun 2022 08:28:45 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[समाचार]]></category>
		<category><![CDATA[गौरेया]]></category>
		<category><![CDATA[चिड़िया]]></category>
		<category><![CDATA[पर्यावरण दिवस]]></category>
		<category><![CDATA[श्रीफल न्यूज]]></category>
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					<description><![CDATA[&#160; रिपोटिंग- डॉ. सुनील जैन संचय, ललितपुर ललितपुर। एक संस्था पूरे 10 साल यानी एक दशक से प्रकृति को बचाने में लगी है। ये संस्था है पर्यावरण प्रेमी संस्था मानव आर्गेनाईजेशन। गौरैया बचाने का उनका अभियान अब रंग ला रहा है। साल 2012 से ये अभिनव अभियान शुरू हुआ। पर्यावरण दिवस 5 जून पर इस [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>&nbsp;</p>
<p><span style="color: #ff0000;">रिपोटिंग- डॉ. सुनील जैन संचय, ललितपुर</span></p>
<p><strong>ललितपुर</strong>। एक संस्था पूरे 10 साल यानी एक दशक से प्रकृति को बचाने में लगी है। ये संस्था है पर्यावरण प्रेमी संस्था मानव आर्गेनाईजेशन। गौरैया बचाने का उनका अभियान अब रंग ला रहा है। साल 2012 से ये अभिनव अभियान शुरू हुआ। पर्यावरण दिवस 5 जून पर इस संस्था को जानना सबसे अच्छा हो सकता है।</p>
<p><a href="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2022/06/1654244006631_IMG_20220601_101009-scaled.jpg"><img fetchpriority="high" decoding="async" class="aligncenter wp-image-24934 size-medium" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2022/06/1654244006631_IMG_20220601_101009-300x169.jpg" alt="" width="300" height="169" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2022/06/1654244006631_IMG_20220601_101009-300x169.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2022/06/1654244006631_IMG_20220601_101009-1024x576.jpg 1024w" sizes="(max-width: 300px) 100vw, 300px" /></a></p>
<p>घर के आंगन में बच्चों की तरह पक्षियों की चहचाहट और उनके संरक्षण के उद्देश्य को लेकर नगर की पर्यावरण प्रेमी संस्था मानव ऑर्गनाइजेशन ने सकारात्मक पहल शुरू की है। वर्ष 2012 से गौरेया संरक्षण की दिशा में की जा रही उनकी पहल रंग ला रही है। मानव ऑर्गनाइजेशन एक तरफ गौरेया को बचाने के लिए निरंतर स्कूली बच्चों, कॉलेजों , विभिन्न ऑफिस आदि में घोंसले प्रदान करती है वहीं भीषण गर्मी में पशु पक्षियों को दाना पानी रखने की भी अपील करती रहती है।</p>
<p>पिछले दिनों जहां बचपन प्ले स्कूल, एजूकेशन प्लस के बच्चों एवं स्टॉप को समर बेकिशन के कार्यक्रम में कंपनी बाग में घोंसले संस्था ने प्रदान किए थे, वहीं गली मोहल्ले, वृक्षों में जाकर घोसले लगाने, बाटने का क्रम निरन्तर चलता रहता है। बुधवार को पर्यावरण सचेतक डॉ सुनील संचय को भी एक घोसला भेंट किया गया।</p>
<p>इस अनूठी पहल के बारे में मानव ऑर्गनाइजेशन के अध्यक्ष अधिवक्ता पुष्पेन्द्र सिंह चौहान ने बताया कि घरों के बाहर पक्षियों का आशियाना बनाने के लिए लकड़ी के बॉक्स (घोंसले) बनाकर लोगों को नि:शुल्क बांटते हैं। स्कुलों, ऑफिस आदि में घोंसले बाटने का क्रम निरन्तर चलता रहता है। ताकि शहरीय क्षेत्र में भी पक्षियों की चहचाहट सुनाई दे।</p>
<p>शहरीय क्षेत्र में पेड़ों की संख्या कम हुई है। वहीं घरों में पक्षी घोंसला बनाते हैं तो लोग उन्हें हटा देते हैं। ऐसे में पक्षी गर्मी और बारिश के मौसम में परेशान हो रहे हैं। यही कारण है कि पक्षी जंगलों का रूख कर रहे हैं। शहर में पक्षियों की तादात बढ़ाने के लिए यह बॉक्स बना रहा हूं। ताकि लोग घरों के बाहर इन्हें रखे। इनमें पक्षी रहेंगे और अपना घोंसला बनाएंगे। जिससे हर घर के आंगन में पक्षियों की चहचाहट सुनाई देगी। घरों में कृत्रिम घोंसले और छतों पर पानी रखकर गौरैया को विलुप्ति से बचाएं।</p>
<p>भीषण गर्मी में आसमान से आग बरस रही है। गर्मी में मानव हो या फिर पशु-पक्षी सभी को ठंडे जल की तलाश रहती है। लोगों के लिए तो जगह-जगह प्याऊ व नल के साथ ही पानी की उचित व्यवस्था मिल ही जाती है, लेकिन पक्षियों को पानी के लिए कड़ा संघर्ष करना पड़ता है।</p>
<p>पर्यावरण सचेतक डॉ सुनील संचय ने बताया कि लोगों की जिम्मेदारी है कि वे पक्षियों के लिए दाना व पानी की उचित व्यवस्था कर अपने जिम्मेदारी का निर्वाहन करें। ताकि खुले आसमान और धूप में विचरण करने वाले पंछियों को राहत मिल सके। मैं हमेशा ही पक्षियों के लिए छत पर दाना-पानी तथा अपने आवास के बाहर पशुओं को पानी की व्यवस्था रखता हूँ। यह मेरी प्रतिदिन की दिनचर्या में शामिल है।</p>
<p>गर्मियों के मौसम में पक्षियों को दूर-दूर तक पानी नहीं मिलता है। कई बार ऐसी स्थिति में पक्षी प्यास से मर भी जाते हैं।मानव ऑर्गनाइजेशन टीम के डॉ. राजीव निरंजन, स्वतंत्र व्यास, सचिन जैन बॉस,रविन्द्र घोष,बलराम,प्रसन्न कौशिक आदि गौरेया को बचाने की इस मुहिम में निरंतर लगे हुए हैं।</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>कहाँ गयी मेरे आँगन की गौरैया!</title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/kahaan-gayee-mere-aangan-kee-gauraiya/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[संपादक]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 19 Mar 2022 22:42:54 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[आलेख]]></category>
		<category><![CDATA[chidiya]]></category>
		<category><![CDATA[gauraiya!]]></category>
		<category><![CDATA[गौरेया]]></category>
		<category><![CDATA[चिड़िया]]></category>
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					<description><![CDATA[विश्व गौरैया दिवस 20 मार्च 2022 पर विशेष : गौरैया के अस्तित्व पर संकट के बादल, गौरैया के संरक्षण के लिए आगे आएं &#8211; डॉ. सुनील जैन संचय, ललितपुर ( एक समय था जब घर-घर में गौरैया दिखती थीं, लेकिन समय के साथ पक्के मकानों और कम होते जंगलों के कारण गौरैया के कुनबे भी [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color: #ff0000;">विश्व गौरैया दिवस 20 मार्च 2022 पर विशेष :</span></p>
<p><span style="color: #ff9900;">गौरैया के अस्तित्व पर संकट के बादल, </span><br />
<span style="color: #ff9900;">गौरैया के संरक्षण के लिए आगे आएं</span></p>
<p><span style="color: #008000;"><strong> &#8211; डॉ. सुनील जैन संचय, ललितपुर</strong></span></p>
<pre style="text-align: center;"><img decoding="async" class="alignnone size-medium wp-image-24823" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2022/03/images-63-300x300.jpeg" alt="" width="300" height="300" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2022/03/images-63-300x300.jpeg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2022/03/images-63-150x150.jpeg 150w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2022/03/images-63.jpeg 554w" sizes="(max-width: 300px) 100vw, 300px" />( एक समय था जब घर-घर में गौरैया दिखती थीं, लेकिन समय के साथ पक्के मकानों और कम होते जंगलों के कारण गौरैया के कुनबे भी कम हो गए, जिसका असर पर्यावरण पर भी पड़ रहा है।जैसे-जैसे हम पेड़-पौधों को काटते जा रहे हैं उससे गौरैया आज लुप्त होने की कगार पर पहुँच गयी है। अब घरों में न तो गौरैया दिखाई देती है और न ही उसकी चीं-चीं करती आवाज़। आज गौरैया पक्षी को बचाने के लिए तरह-तरह के आयोजन किये जा रहे हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए 20 मार्च को हर वर्ष पूरे विश्व में गौरैया दिवस मनाया जाता है। 20 मार्च 2022 विश्व गौरैया दिवस के अवसर पर,
दिनोंदिन नन्ही गौरैया की संख्या में आ रही गिरावट पर चिंता जाहिर करते हुए गौरैया के संरक्षण और संवर्द्धन पर प्रकाश डाल रहे हैं डॉ. सुनील जैन संचय। हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है कि गौरैया का गौरव लौटाएं, ताकि फिर आंगन व छत पर गौरैया फुदकती नजर आए।-संपादक)</pre>
<div dir="auto">प्रकृति की सभी रचनाएं प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष एक-दूसरे पर निर्भर हैं और उनमें हमारे साथ-साथ नन्ही गौरैया भी शामिल है। गौरैया चिड़िया यह एक छोटी पक्षी है जो प्रायः सभी स्थानों पर मिल जाती है। इसके रहने का एक अलग ही अंदाज होता है। गौरैया रहती तो घोंसले में ही है, पर यह अपना घोंसला अधिकाशतः ऐसे स्थानों पर बनाती है जो चारों तरफ से सुरक्षित हो। गौरैया हल्की भूरे रंग , सफेद रंग लिये होती है। नर के गले के पास (चोंच के नीचे) काले रंग का धब्बा होता है, जो नर गौरैया की पहचान कराता है। प्रातःकाल इनके चहकने की अनोखी प्रकृति होती है, जो बहुत ही सुखमय प्रतीत होती है। हम घर-आँगन में इसकी चूं-चूं की मधुर आवाज़ को बचपन से सुनते आए हैं।</div>
<div dir="auto">जिस आंगन में नन्ही गौरैया की चहल कदमी होती थी आज वह आंगन सूने पड़े हुए हैं।दुनिया भर में गौरैया पक्षी के संरक्षण के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए 20 मार्च को विश्व गौरैया दिवस मनाया जाता है। विश्व गौरैया दिवस पहली बार वर्ष 2010 में नेचर फाइबर सोसायटी के द्वारा मनाया गया  था।  आधुनिक मकान, बढ़ता प्रदुषण, जीवन शैली में बदलाव के कारण गौरैया लुप्त हो रही। कभी गौरैया का बसेरा इंसानों के घर में होता था। अब गौरैया के अस्तित्व पर छाए संकट के बादलों ने इसकी संख्या काफी कम कर दी है और कहीं..कहीं तो अब यह बिल्कुल दिखाई नहीं देती। इस संकट की घड़ी में नन्ही गौरैया को अपने अंगने में बुलाने के लिए हम लोगों को मिलकर कई काम करने होंगे।</div>
<div dir="auto"> हम जैसे जैसे शहरीकरण और विकास के नए आयामों को छूते जा रहे हैं इन पक्षियों के प्राकृतिक निवास भी उसी तीव्र गति से खत्म हो रहे हैं। हमारी वर्तमान पीढ़ी तकनीक में इतना ज्यादा उलझ चुकी है कि प्रकृति से उसका नाता लगभग खत्म ही हो चुका है। प्रकृति के प्रति हमारे युवाओं की अनदेखी के कारण ही घर पर कलरव करने वाली गौरैया चिडिय़ा भी अब हमारे जेहन में नहीं रही। हमारे घरों में अपनाई जाने वाली जीवनशैली में आए परिवर्तन से भी गौरैया के जीवन पर संकट के बादल मंडराये हैं। जहां महिलाएं पहले गेंहू को आटे में परिवर्तित करने से पूर्व उसे धोकर छतों अथवा आंगन में सुखाया करती थी, वहीं अब गेंहू सीधे आटे का रूप ले रहा है या फिर रेडिमेड आटा ही उपयोग में लाया जा रहा है। इस तरह छतों और आंगन से गौरैया को मिलने वाला आहार अब उपलब्ध नहीं है। गौरैया की चूं चूं अब चंद घरों में ही सिमट कर रह गई है। एक समय था जब उनकी आवाज़ सुबह और शाम को आंगन में सुनाई पड़ती थी। मगर आज के परिवेश में आये बदलाव के कारण वह शहर से दूर होती गई। गांव में भी उनकी संख्या कम हो रही है।</div>
<div dir="auto">बचपन की सबसे सुखद स्मृतियों में गौरैया जरूर आती है, क्योंकि सबसे पहले बच्चा इसी चिड़िया को पहचानना सीखता था। पड़ोस के लगभग हर घर में इनका घोंसला होता था। आंगन में या छत की मुंडेर पर वे दाना चुगती थीं। बस अड्डों और रेलवे स्टेशनों पर ये झुंड के झुंड फुदकती रहती थीं। प्राचीन काल से ही हमारे उल्लास, स्वतंत्रता, परंपरा और संस्कृति की संवाहक वही गौरैया अब संकट में है। संख्या में लगातार गिरावट से उसके विलुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है।</div>
<div dir="auto"><img decoding="async" class="size-medium wp-image-24824 aligncenter" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2022/03/images-59-300x300.jpeg" alt="" width="300" height="300" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2022/03/images-59-300x300.jpeg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2022/03/images-59-150x150.jpeg 150w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2022/03/images-59.jpeg 554w" sizes="(max-width: 300px) 100vw, 300px" /></div>
<div dir="auto"><strong>विदेशों में भी घट रही संख्या</strong></div>
<div dir="auto">न केवल भारत में बल्कि दूसरे देशों में भी गौरैया की संख्या में दिनों-दिन गिरावट आ रही है।ब्रिटेन, इटली, फ्रांस, जर्मनी जैसे देशों में इनकी संख्या जहां तेज़ी से गिर रही है। मगर नीदरलैंड में तो इन्हें ‘रेड लिस्ट’ के वर्ग में रखा गया है।</div>
<div dir="auto">दिल्ली में तो इस पक्षी को ढूंढना इतना दुर्लभ हो गया है कि लाख ढूंढने पर भी यह पक्षी दिखाई नहीं देता, इसीलिए दिल्ली सरकार द्वारा साल 2012 में गौरैया को ‘राज्य-पक्षी’ घोषित करने का फैसला लिया गया।</div>
<div dir="auto"><strong>गौरैया की दिनोंदिन घटती संख्या का कारण</strong></div>
<div dir="auto">सबसे बड़ा कारण है आधुनिक घरों में गौरैया के रहने के लिए जगह नहीं है। घरों की खिड़कियों में लगे कूलर, रोशनदानों की जगह विण्डो, ए सी ने गौरैया के जीवन को और भी खतरे में डाल दिया है। अगर चिलचिलाती धूप से बचने या भोजन की खोज में गौरैया आपके घरों में आयेगी भी तो पंखे या कूलर से इसके कट जाने का खतरा रहता है।</div>
<div dir="auto">घर का माहौल भी अब उनके अनुकूल नहीं रहा है। घर में अब महिलाएं न तो गेहूं सुखाती हैं न ही धान कूटती हैं जिससे उन्हें छत पर खाना नहीं मिलता है।अब घरों में टाइल्स का इस्तेमाल ज्यादा होने लगा है।खेती में कीटनाशकों का इस्तेमाल बढ़ गया है जिसका असर गौरैया पर पड़ रहा है। गौरेया की घटती संख्या का मुख्य कारण है, भोजन-पानी की कमी और पेड़ों का कटान। बढ़ती मॉडर्न टेक्नोलॉजी ने चिड़ियों का सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया है।शहरीकरण के नए दौर में घरों में बगीचों के लिए स्थान नहीं है।पेट्रोल के दहन से निकलने वाला मेथिल नाइट्रेट छोटे कीटों के लिए विनाशकारी होता है, जबकि यही कीट चूजों के खाद्य पदार्थ होते हैं।मोबाइल फोन टावरों से निकलने वाली तरंगों में इतनी क्षमता होती है, जो इनके अंडों को नष्ट कर सकती है।</div>
<div dir="auto"><strong>गौरैया को विलुप्त होने से हम ऐसे बचा सकते हैं</strong></div>
<div dir="auto">यदि इसके संरक्षण के उचित प्रयास नहीं किए गए तो हो सकता है कि गौरैया इतिहास की चीज बन जाए और भविष्य की पीढ़ियों को यह देखने को ही न मिले। गौरैया को विलुप्त होने से बचाने  के लिए हम कुछ छोटे-छोटे प्रयास कर सकते हैं।</div>
<p><strong>विदेशों में भी घट रही संख्या</strong><br />
न केवल भारत में बल्कि दूसरे देशों में भी गौरैया की संख्या में दिनों-दिन गिरावट आ रही है।ब्रिटेन, इटली, फ्रांस, जर्मनी जैसे देशों में इनकी संख्या जहां तेज़ी से गिर रही है। मगर नीदरलैंड में तो इन्हें ‘रेड लिस्ट’ के वर्ग में रखा गया है।<br />
दिल्ली में तो इस पक्षी को ढूंढना इतना दुर्लभ हो गया है कि लाख ढूंढने पर भी यह पक्षी दिखाई नहीं देता, इसीलिए दिल्ली सरकार द्वारा साल 2012 में गौरैया को ‘राज्य-पक्षी’ घोषित करने का फैसला लिया गया।</p>
<p><strong>गौरैया की दिनोंदिन घटती संख्या का कारण</strong><br />
सबसे बड़ा कारण है आधुनिक घरों में गौरैया के रहने के लिए जगह नहीं है। घरों की खिड़कियों में लगे कूलर, रोशनदानों की जगह विण्डो, ए सी ने गौरैया के जीवन को और भी खतरे में डाल दिया है। अगर चिलचिलाती धूप से बचने या भोजन की खोज में गौरैया आपके घरों में आयेगी भी तो पंखे या कूलर से इसके कट जाने का खतरा रहता है।<br />
घर का माहौल भी अब उनके अनुकूल नहीं रहा है। घर में अब महिलाएं न तो गेहूं सुखाती हैं न ही धान कूटती हैं जिससे उन्हें छत पर खाना नहीं मिलता है।अब घरों में टाइल्स का इस्तेमाल ज्यादा होने लगा है।खेती में कीटनाशकों का इस्तेमाल बढ़ गया है जिसका असर गौरैया पर पड़ रहा है। गौरेया की घटती संख्या का मुख्य कारण है, भोजन-पानी की कमी और पेड़ों का कटान। बढ़ती मॉडर्न टेक्नोलॉजी ने चिड़ियों का सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया है।शहरीकरण के नए दौर में घरों में बगीचों के लिए स्थान नहीं है।पेट्रोल के दहन से निकलने वाला मेथिल नाइट्रेट छोटे कीटों के लिए विनाशकारी होता है, जबकि यही कीट चूजों के खाद्य पदार्थ होते हैं।मोबाइल फोन टावरों से निकलने वाली तरंगों में इतनी क्षमता होती है, जो इनके अंडों को नष्ट कर सकती है।</p>
<p><strong>गौरैया को विलुप्त होने से हम ऐसे बचा सकते हैं</strong><br />
यदि इसके संरक्षण के उचित प्रयास नहीं किए गए तो हो सकता है कि गौरैया इतिहास की चीज बन जाए और भविष्य की पीढ़ियों को यह देखने को ही न मिले। गौरैया को विलुप्त होने से बचाने के लिए हम कुछ छोटे-छोटे प्रयास कर सकते हैं।</p>
<p><strong>गौरैया संरक्षण के उपाय :</strong><br />
ब्रिटेन की रॉयल सोसाइटी ऑफ बर्डस द्वारा विश्व के विभिन्न देशों में किए गए अनुसंधान के आधार पर भारत और कई बड़े देशों में गौरैया को रेड लिस्ट कर दिया गया है जिसका अर्थ है कि यह पक्षी अब पूर्ण रूप से विलुप्ति की कगार पर है। गौरैया संरक्षण के लिए हम यही कर सकते हैं कि अपनी छत पर दाना-पानी रखें, अधिक से अधिक पेड़- पौधे लगाएं, उनके लिए कृत्रिम घोंसलों का निर्माण करें।</p>
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