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	<title>गौरवगाथा &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
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	<title>गौरवगाथा &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>अतीत की जड़ों से भविष्य की उड़ान : श्री दिगंबर जैन आचार्य संस्कृत महाविद्यालय की अमर गाथा </title>
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		<pubDate>Thu, 09 Apr 2026 09:25:49 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[ ‎भारत वर्ष की सांस्कृतिक चेतना में कुछ संस्थान केवल ‎भारतीय सांस्कृतिक चेतना के विराट आकाश में केवल शिक्षण-स्थल नहीं, अपितु परंपरा के सजीव तीर्थ स्वरूप होते हैं। ऐसा ही एक अनुपम, अद्वितीय एवं गौरवगाथा से मंडित संस्थान है श्री दिगंबर जैन आचार्य संस्कृत महाविद्यालय, सांगानेर, जयपुर (राजस्थान) जो अनवरत प्रवाहित ज्ञान गंगा का अमिट स्रोत [&#8230;]]]></description>
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<p><strong> ‎भारत वर्ष की सांस्कृतिक चेतना में कुछ संस्थान केवल ‎भारतीय सांस्कृतिक चेतना के विराट आकाश में केवल शिक्षण-स्थल नहीं, अपितु परंपरा के सजीव तीर्थ स्वरूप होते हैं। ऐसा ही एक अनुपम, अद्वितीय एवं गौरवगाथा से मंडित संस्थान है श्री दिगंबर जैन आचार्य संस्कृत महाविद्यालय, सांगानेर, जयपुर (राजस्थान) जो अनवरत प्रवाहित ज्ञान गंगा का अमिट स्रोत है। <span style="color: #ff0000">मुरैना/सांगानेर से पढ़िए, लेखक अंशुल जैन शास्त्री की यह प्रस्तुति मनोज जैन नायक के माध्यम से&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना/सांगानेर। ‎</strong>भारतवर्ष की सांस्कृतिक चेतना में कुछ संस्थान केवल ‎भारतीय सांस्कृतिक चेतना के विराट आकाश में केवल शिक्षण-स्थल नहीं, अपितु परंपरा के सजीव तीर्थ स्वरूप होते हैं। ऐसा ही एक अनुपम, अद्वितीय एवं गौरवगाथा से मंडित संस्थान है श्री दिगंबर जैन आचार्य संस्कृत महाविद्यालय, सांगानेर, जयपुर (राजस्थान) जो अनवरत प्रवाहित ज्ञान गंगा का अमिट स्रोत है।</p>
<p>वर्ष1885 का वह दासत्वग्रस्त काल, जब देश अंग्रेजी शासन की पराधीनता में जकड़ा हुआ था और भारतीय ज्ञान-परंपराएँ विशेषतः जैन दर्शन संस्कृत एवं प्राकृत का संरक्षण विलुप्ति के कगार पर था। उसी समय इस महाविद्यालय की स्थापना एक दिव्य दीप स्तंभ के रूप में हुई, जिसने अज्ञान अंधकार में ज्ञान प्रदीप प्रज्वलित किया। ‎इसी ऐतिहासिक प्रवाह के मध्य पावन रथयात्रा के शुभ अवसर पर पंडित श्री सदासुख दास जी की प्रेरणा तथा जैन समाज के निष्ठापूर्ण समर्पण से एक दिव्य बीज का रोपण हुआ। ज्ञान, अनुशासन एवं संस्कृति का वह बीज, जो कालांतर में एक विशाल वटवृक्ष के रूप में विकसित हुआ। ‎जयपुर के अधिपति महाराज सवाई मानसिंह बहादुर द्वितीय द्वारा प्रदत्त पुण्यभूमि पर “जैन पाठशाला” की स्थापना की गई। जिसने इस संस्थान को संगठित, सुदृढ़ एवं स्थायी स्वरूप प्रदान किया। यह केवल एक शिक्षण संस्था नहीं, अपितु सांस्कृतिक पुनर्जागरण का सशक्त केंद्र बनकर उदित हुई। ‎जैन समाज के उदार दान, त्याग एवं तपश्चर्या से यह महाविद्यालय निरंतर उन्नति के पथ पर अग्रसर होता रहा। इसके प्रथम अध्यक्ष धन्नालाल फौजदार ने अपनी दूरदर्शिता से इसकी आधारशिला को दृढ़ किया। तदनंतर भोरीलाल सेठी जैसे समर्पित नेतृत्व ने इसे उत्कर्ष के शिखर तक पहुँचाया। ‎वर्तमान में इस महाविद्यालय का संचालन पूर्व आईएएस अधिकारी नरेशकुमार सेठी के कुशल नेतृत्व में हो रहा है। जिनकी प्रशासनिक दक्षता एवं दूरदृष्टि इस संस्थान को निरंतर उत्कृष्टता की ओर अग्रसर कर रही है। ‎इस महाविद्यालय के प्रथम प्रधानाचार्य पंडित काशीनाथ थे, जिनकी विद्वत्ता, अनुशासनप्रियता एवं शिक्षण-निष्ठा ने इसे आदर्श शिक्षण-केंद्र के रूप में प्रतिष्ठित किया। उनके पश्चात फूलचंद ने भी इस गौरवपूर्ण परंपरा को अक्षुण्ण बनाए रखा।</p>
<p><strong>दुर्लभ पांडुलिपियाँ भारतीय ज्ञान-परंपरा की अमूल्य निधि </strong></p>
<p>‎वर्तमान में इस महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. अनिलकुमार जैन हैं, जिनके नेतृत्व में यह संस्थान विकास, नवोन्मेष एवं शैक्षणिक उत्कर्ष की दिशा में अग्रसर है। ‎यह संस्थान केवल ज्ञानार्जन का स्थल नहीं, अपितु संस्कार-संवर्धन का दिव्य धाम है। यहाँ पुस्तकीय ज्ञान के साथ-साथ जीवन-मूल्यों, अनुशासन एवं आत्म-विकास का समन्वित शिक्षण प्रदान किया जाता है। यही कारण है कि यहाँ से शिक्षित सहस्राधिक विद्यार्थी सम्पूर्ण भारतवर्ष में जैन दर्शन, भारतीय संस्कृति एवं मानवीय मूल्यों का आलोक प्रसारित कर रहे हैं। वर्तमान समय में यह महाविद्यालय सेंट्रल संस्कृत यूनिवर्सिटी से संबद्ध है, जो इसकी शैक्षणिक गरिमा एवं राष्ट्रीय मान्यता को सुदृढ़ करता है। ‎इस महाविद्यालय की विशिष्टता बहुआयामी है। यहाँ स्थित भव्य ऑडिटोरियम विविध सांस्कृतिक, शैक्षणिक एवं आध्यात्मिक आयोजनों का साक्षी है। साथ ही, समृद्ध पुस्तकालय में संरक्षित सैकड़ों दुर्लभ पांडुलिपियाँ भारतीय ज्ञान-परंपरा की अमूल्य निधि के रूप में संरक्षित हैं।</p>
<p><strong>संस्कृत महाविद्यालय जीवंत धरोहर </strong></p>
<p>वर्ष 2002 में मुनि श्री सुधासागर जी के मार्गदर्शन एवं डॉ. शीतलचंद्र जैन के निर्देशन में इस महाविद्यालय का स्थानांतरण मनिहारों के रास्ते से सांगानेर तक किया गया, जो विकास एवं विस्तार की दिशा में एक युगांतकारी कदम सिद्ध हुआ। वर्तमान में यह महाविद्यालय संस्कृत एवं जैन जगत में एक अद्वितीय स्थान रखता है, जहाँ सैकड़ों विद्यार्थी अध्ययनरत हैं। यह केवल संख्या नहीं, अपितु उस अखंड परंपरा, तप एवं श्रद्धा का प्रतीक है, जो युगों से अविच्छिन्न रूप से प्रवाहित हो रही है। ‎यदि इस महाविद्यालय को एक जीवंत धरोहर कहा जाए, तो यह सर्वथा उपयुक्त होगा। यह वह ज्ञानदीप है, जो भारतीय संस्कृति, जैन परंपरा एवं शाश्वत मूल्यों की ज्योति को अनादि-अनंत काल तक आलोकित करता रहेगा। ‎अतः ऐसे महान संस्थान का संरक्षण, संवर्धन एवं सम्मान करना प्रत्येक समाजजन का परम कर्तव्य है क्योंकि, यही हमारी सांस्कृतिक अस्मिता, परंपरा और उज्ज्वल भविष्य का आधार है।</p>
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		<title>तीर्थंकर की अलग-अलग प्रतिमाओं के साथ चतुर्विंशंती तीर्थंकर प्रतिमाएं बनने की परम्परा रही हैः प्रमुख केंद्रीय तीर्थंकर कायोत्सर्ग मुद्रा में  </title>
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		<pubDate>Fri, 28 Mar 2025 10:02:42 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन धर्म के तीर्थंकरों की प्रतिमाओं के बारे में जानकारिया दी जा रही है। वर्द्धमानपुर शोध संस्थान से जुडे़ ओम पाटोदी हमें इस बारे में नई एवं खोजपूर्ण जानकारियॉ उपलब्ध करवा रहे है। इस बार वे चतुर्विशंती मूर्तियों के महत्व के बारे में विशेष जानकारी दे रहे है। वे इसकी प्राचीन गौरवगाथा पर भी प्रकाश [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जैन धर्म के तीर्थंकरों की प्रतिमाओं के बारे में जानकारिया दी जा रही है। वर्द्धमानपुर शोध संस्थान से जुडे़ ओम पाटोदी हमें इस बारे में नई एवं खोजपूर्ण जानकारियॉ उपलब्ध करवा रहे है। इस बार वे चतुर्विशंती मूर्तियों के महत्व के बारे में विशेष जानकारी दे रहे है। वे इसकी प्राचीन गौरवगाथा पर भी प्रकाश डालते है। <span style="color: #ff0000">पढ़िए इंदौर से ओम कीर्ति पाटोदी की यह पूरी खबर&#8230;.</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर</strong>। जैन तीर्थंकर मूर्ति कला में चतुर्विंशंती मूर्तियों का विशेष महत्व होता है, इसके अंतर्गत जैन धर्म के 24 तीर्थंकरों की मूर्तियां एक साथ एक शीला फलक पर बनाई जाती है। इसमें 23 तीर्थंकर आस-पास और बीच में एक बड़ी प्रतिमा किसी भी एक तीर्थंकर की हुआ करती है। अधिकतर चतुर्विंशंती तीर्थंकर में मूल प्रतिमा के रूप में प्रथम तीर्थंकर भगवान श्री आदिनाथ स्वामी, नेमिनाथ, पारसनाथ और महावीर भगवान की मूर्तियां अधिक पाई जाती है। वहीं अधिकतर प्राचीन मूर्तियों में भगवान आदिनाथ की प्रतिमाएं मूल नायक प्रतिमा के रूप में प्राप्त होती है।</p>
<p><strong>विशेष-चतुर्विंशंती के बारे में </strong></p>
<p>उक्त जानकारी देते हुए वर्द्धमानपुर शोध संस्थान के ओम पाटोदी ने बताया कि आदि महावीर जन्मोत्सव के अवसर पर आज हम शासकीय संग्रहालय, चेन्नई की एक चतुर्विंशंती की जानकारी से अवगत करवा रहे हैं। यह प्रतिमा लगभग 10वीं शताब्दी ई. पूर्व की होकर अभिलेख संख्या 2511 पर प्रदर्शित है। इसकी ऊँचाई 86 सेमी, चौड़ाई 40 सेमी है यह प्रतिमा संभवतः मैसूर क्षेत्र कर्नाटक से प्राप्त हुई है। इस सुंदर मूर्ति में एक तीर्थंकर की प्रमुख केंद्रीय आकृति को दर्शाया गया है, जिसके चारों ओर छोटे आकार के चौबीस तीर्थंकरों की प्रतिमा है।</p>
<p><strong>प्रमुख केंद्रीय तीर्थंकर कायोत्सर्ग मुद्रा में </strong></p>
<p>आमतौर पर आसपास के तीर्थंकरों की संख्या शेष 23 होनी चाहिए, लेकिन इस मूर्ति में वे चौबीस हैं और प्रमुख केंद्रीय तीर्थंकरों सहित कुल संख्या पच्चीस है। मूल नायक या प्रमुख केंद्रीय तीर्थंकर कायोत्सर्ग (खड़े होने की मुद्रा) में हैं। आसपास के सभी छोटे तीर्थंकर बैठे हुए ध्यान-पद्मासन मुद्रा में हैं। घुंघराले बालों के साथ मूल नायक का चौड़ा चौकोर चेहरा हमें इस मूर्ति की तुलना मैसूर क्षेत्र के श्रवणबेलगोला में पहले तीर्थंकर आदिनाथ के दूसरे पुत्र बाहुबली की विशाल और प्रसिद्ध मूर्ति के मुखमंडल से करने के लिए प्रेरित करता है।</p>
<p><strong>ऋषभदेव के रूप में पहचानने में मदद </strong></p>
<p>खड़े हुए तीर्थंकर के दोनों कंधों पर गिरे बालों से हमें उन्हें आदिनाथ ऋषभदेव के रूप में पहचानने में मदद मिलती है। आदिनाथ पहले तीर्थंकर को विभिन्न रूपों में युगादिदेव और आदिश्वर (युग या विश्व-काल के पहले भगवान) कहा जाता है। वह अयोध्या के राजा और रानी, नाभिराज और मरुदेवी के पुत्र थे।</p>
<p><strong>प्रतिमा भूगर्भ से प्राप्त हुईं </strong></p>
<p>चतुर्विंशंती तीर्थंकर प्रतिमा की बात करें तो मालवा क्षेत्र के प्राचीन नगर बदनावर वर्द्धमानपुर की प्रतिमा भी विशेष महत्व की है। बदनावर, वर्द्धमानपुर की चतुर्विंशंती शीला फलक में तीर्थंकर भगवान के पंचकल्याणक को शिल्पित किया गया है। जो विशेष महत्व रखता है। यह प्रतिमा भूगर्भ से प्राप्त हुईं थीं।</p>
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		<title>तमिलनाडु का भू-भाग: आदिनाथ व जैन तीर्थंकरों की अतिप्राचीन प्रतिमाओं से समृद्ध </title>
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		<pubDate>Tue, 25 Mar 2025 13:40:28 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[तमिलनाडु में जैन धर्म की तीर्थंकर प्रतिमाएं एवं मंदिर मौजूद है। यहां के गौरवशाली इतिहास को काफी नुकसान हुआ है। परन्तु अभी भी जो अवशेष बच गये है वे इतनी संख्या में पहाड़ों, कंदराओं, जंगलों और गांवों में उपलब्ध है। वे इसकी प्राचीन गौरवगाथा पर भरपूर प्रकाश डालते है। पढ़िए इंदौर से ओम कीर्ति पाटोदी [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>तमिलनाडु में जैन धर्म की तीर्थंकर प्रतिमाएं एवं मंदिर मौजूद है। यहां के गौरवशाली इतिहास को काफी नुकसान हुआ है। परन्तु अभी भी जो अवशेष बच गये है वे इतनी संख्या में पहाड़ों, कंदराओं, जंगलों और गांवों में उपलब्ध है। वे इसकी प्राचीन गौरवगाथा पर भरपूर प्रकाश डालते है। <span style="color: #ff0000">पढ़िए इंदौर से ओम कीर्ति पाटोदी की यह पूरी खबर&#8230;.</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> भारत के कोने-कोने में जैन धर्म की तीर्थंकर प्रतिमाएं एवं मंदिर मौजूद है। इसमें तमिलनाडु का विशेष स्थान है। हालांकि काल के थपेडों ने यहां के गौरवशाली इतिहास को काफी नुकसान पहुंचाया है। परन्तु अभी भी जो अवशेष बच गये है वे इतनी संख्या में पहाड़ों, कंदराओं, जंगलों और छोटे छोटे गांवों में उपलब्ध है। वे इसकी प्राचीन गौरवगाथा पर भरपूर प्रकाश डालते है।</p>
<p><strong>जैन धर्मावलंबी भी अपरिचित</strong></p>
<p>यहां के जैन जनसंख्या में कम होने से यहां के जैन मन्दिरों और तीर्थ स्थलों की जानकारी हमारे पास कम ही है। जैन धर्म के लोग भी इनसे अपरिचित से है। उक्त जानकारी देते हुए वर्द्धमानपुर शोध संस्थान के ओम पाटोदी ने बताया कि आदि तीर्थंकर भगवान श्री आदिनाथ स्वामी से लेकर अन्तिम तीर्थंकर भगवान श्री महावीर स्वामी के जन्म कल्याणक महोत्सव के अवसर पर आज हम तमिलनाडु के स्थानों की जानकारी एवं वहां मौजूद आदिनाथ स्वामीजी की प्रतिमाओं से रूबरू करवा रहे हैं।</p>
<p><strong>विभिन्न स्थानों पर दर्शनीय मूर्तियॉ हैं</strong></p>
<p>तमिलनाडु में आचार्य अकलंक देव की तपोभूमि के नाम से प्रसिद्ध तिरक्कोइल हिल है। जिसे थिरकोइल हिल भी कहा जाता है, यहां पर एक छोटी-सी प्राचीन पहाड़ी है। जहां पर गोल उन्नत चट्टान है। जिसके चारों ओर भगवान आदिनाथ, चंद्रप्रभ, पारसनाथ एवं भगवान महावीर की अतिप्राचीन दर्शनीय पद्मासन मूर्तियां है। जैसे ही हम पहाड़ी पर चढ़ते हैं तो हमें सर्वप्रथम आदि तीर्थंकर आदिनाथ के दर्शन होते हैं। इसी प्रकार कांचीपुरम जिले जिसे जिनकाशी के नाम से भी जाना जाता है। इस जिले में एक जैन तीर्थ थिरूपरूत्तिकुंड्रम है, यह क्षेत्र लगभग 2500 वर्ष प्राचीन है।</p>
<p><strong>85 जैन मन्दिर नष्ट होकर अतिक्रमण </strong></p>
<p>पहले यहां पर 85 जैन मन्दिर थे जो धार्मिक विद्वेष के कारण या तो नष्ट कर दिये गये अथवा अतिक्रमण कर लिए गए हैं। यह तीर्थ अतिशय क्षेत्र के नाम से प्रसिद्ध है इसमें आदिनाथ भगवान की अत्यंत प्राचीन प्रतिमा उपलब्ध है यह क्षेत्र जैन इतिहास एवं स्थापत्य कला से समृद्ध है। कांचीपुरम जिले में ही आरपाक्कम् जैन अतिशय क्षेत्र है यहां पर श्री आदिपट्टाराकट नाम से एक विशाल जैन मंदिर है। जिसमें मूल नायक भगवान श्री आदिनाथ स्वामी विराजमान हैं यह क्षेत्र तमिलनाडु के कुल देवता के रूप में आस्था का केंद्र है। यहां पर जैन-अजैन सभी लोग आते हैं। इसी प्रकार तमिलनाडु में सैकड़ों ऐसे जैन धर्म के स्थान मौजूद है जिनके बारे में देश के लोग कम ही जानकारी रखते हैं।</p>
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