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	<title>क्या आप जानते हैं &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>क्या आप जानते हैं : मन्दिर जी में घंटा क्यों बजाते हैं ? </title>
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		<pubDate>Tue, 05 Mar 2024 10:26:38 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मन्दिर जी में घण्टा रहता है, उसे क्यों बजाते हैं? घंटा बजाते समय हमारे क्या भाव होने चाहिये ? ये प्रश्न प्रायः मन में उठते अवश्य हैं किन्तु यथार्थ समाधान नहीं मिलने से मन कुण्ठित हो जाता है। सुनो ! घंटा &#8220;मंगल ध्वनि&#8217; के प्रतीक रूप में बजाया जाता है। घंटे की ध्वनि सुनकर दूर [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>मन्दिर जी में घण्टा रहता है, उसे क्यों बजाते हैं? घंटा बजाते समय हमारे क्या भाव होने चाहिये ? ये प्रश्न प्रायः मन में उठते अवश्य हैं किन्तु यथार्थ समाधान नहीं मिलने से मन कुण्ठित हो जाता है।</strong></p>
<hr />
<p>सुनो ! घंटा &#8220;मंगल ध्वनि&#8217; के प्रतीक रूप में बजाया जाता है। घंटे की ध्वनि सुनकर दूर के लोगों को भी मन्दिर जी का स्मरण हो जाता है। घंटा बजाते समय हमारे भाव होने चाहिये कि इस घंटे की मंगल ध्वनि तरंगे वहाँ पहुँच जायें, जहाँ हम नहीं पहुँच सकते। ऐसे नन्दीश्वर द्वीप, विदेह क्षेत्र, कैलाश पर्वत आदि उर्ध्व-मध्य-अधोलोक में जितने कृत्रिम-अकृत्रिम जिन-चैत्यालय विद्यमान हैं, जिन तीर्थक्षेत्रों की आपने साक्षात् जाकर वन्दना की हो, उनका ध्यान करते हुए, &#8220;उनको यह मेरी वन्दना-नमस्कार पहुँचे। घंटे को हल्के हाथों से तीन बार ही बजाना चाहिये। और घंटा बजाते समय अपना सिर घंटे के नीचे लगभग तीन सेकेण्ड ही रहना चाहिये।</p>
<p>मंदिर जी में लगा घंटा हमारी विशुद्ध भावनाओं को प्रसारित करने के लिये एक &#8220;वैज्ञानिक&#8221; यंत्र है। भौतिक युग की दूर संचार प्रणाली, ध्वनि प्रसारक यंत्रों के माध्यम से हमारी भाषा- भावनायें एक स्थान से दूसरे स्थान पर सेकेण्डों में पहुँच जाती हैं जैसे पोस्ट ऑफिस में तार करने के लिये एक छोटी सी डिब्बी खटखटाई जाती है। उसमें कोई शब्द नहीं बोले जाते। मात्र डिब्बी खटखटाने के ढंग से ही समाचार एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुँच जाता है। ठीक उसी प्रकार से ही घंटे का कार्य है। इसकी मंगल ध्वनि हमारा मानसिक प्रदूषण दूर करती है। आपने अनुभव किया होगा कि जब बच्चा रोता है तब उसे झुनझुने आदि की मधुर ध्वनि सुनाकर चुप किया जाता है।</p>
<p>घंटे की ध्वनि से पर्यावरण भी परिशुद्ध होता है क्योंकि पंचकल्याण के समय घंटे को भी मंत्रों से संस्कारित करके लगाते हैं। आपने देखा होगा, लाल मन्दिर, दिल्ली में एक बहुत बड़ा पुराना घंटा मन्दिर के चौक में एक शो कैस में लगा हैं। उसमें कई प्रकार के मंत्र भी उत्कीर्ण हैं। इसकी ध्वनि से मंत्रों का प्रभाव उद्घाटित होता था। अभी उसका प्रयोग बन्द है। जहाँ तक उसकी ध्वनि का प्रभाव होता था, वहाँ तक शारीरिक-मानसिक-दैविक एवं भौतिक प्रकोप भी हट जाते थे।</p>
<p><strong>मुनि अमित सागर की कृति ‘मंदिर’ से साभार</strong></p>
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		<title>क्या आप जानते हैं : मन्दिर जी जाने से पूर्व क्या करें ? </title>
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		<pubDate>Mon, 26 Feb 2024 23:30:46 +0000</pubDate>
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										<content:encoded><![CDATA[<p>मंदिर जाने से पहले सबसे पहले शुभ संकल्प करके दैनिक शौचादिक क्रियाओं से निपटकर, छने हुये जल से स्नान करना चाहिए। नहाते समय शैम्पू या चर्बीयुक्त साबुन प्रयोग नहीं करना चाहिए । धुले हुये साधारण वस्त्र पहनकर मन्दिर जी आना चाहिए । क्योंकि यदि हम चमकीले भड़कीले वस्त्र पहनकर मन्दिर जी जाते हैं तो अन्य लोगों का मन भगवान के दर्शन-पूजन-स्वाध्याय से हट जायेगा, जिससे हमें पापबन्ध होगा। वैसे पहले के समय में मन्दिर आदि आने की वेषभूषा, स्त्री पुरुषों के पीले या सफेद रंग की साड़ी-धोती-दुपट्टा था।</p>
<p>जिससे व्यक्ति अपने आप में संयमित रहता था और धर्म ध्यान में खूब मन लगाता था। याद रहे कि हमें चमड़ें के बने बेल्ट, जूते चप्पल, पर्स आदि का प्रयोग नहीं करना चाहिए, क्योंकि जिस जानवर का चमड़ा होगा, उसी जाति के सम्मूर्च्छन जीव (बैक्टीरिया) हमारे शरीर के स्पर्श से उत्पन्न होकर मरते रहते हैं। माता बहिनों को अपने ओठों में लिपिस्टिक या नाखूनों में नेलपालिश नहीं लगानी चाहिए।</p>
<p>क्योंकि ये दोनों वस्तुएँ जीवों के खून से निर्मित होती हैं सेन्ट आदि भी हिंसक तरीके से निर्मित होते हैं। अतः मन्दिर जी आते समय इनका प्रयोग नहीं करना चाहिये। ध्यान रहे कि हमारा मुख भी जूठा नहीं होना चाहिये, अर्थात् मुख में लौंग, इलाइची, सौंफ, सुपारी, तम्बाकू, गुटका, पान मसाला आदि नहीं होना चाहिये। मुख शुद्धि से हमारे पाठ या मन्त्रोच्चारण एवं शरीर की शुद्धि बनी रहती है एवं हमारे अन्दर पूज्यों का बहुमान एवं विनम्र गुण प्रकट होता है।</p>
<p>हमें अपने घर से ही शक्त्यानुसार शुद्ध मर्यादित जल-चन्दन, अक्षत- पुष्प-नवैद्य-दीप-धूप और फलादि यथायोग्य अष्टद्रव्य थाली या डिबिया आदि में रखकर, ईर्यापथ यानि नीचे चार हाथ जमीन देखकर चलना चाहिये।</p>
<p><strong>मुनि अमित सागर की कृति ‘मंदिर’ से साभार</strong></p>
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		<title>क्या आप जानते हैं : ब्रह्म बेला का महत्त्व और क्या करना चाहिए इस अमृत बेला में </title>
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		<pubDate>Tue, 13 Feb 2024 15:05:49 +0000</pubDate>
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<p><strong>विश्व की प्रायः सभी धर्म संस्कृतियाँ प्रातः काल की ब्रह्मबेला को महत्त्व देती हैं। पर हमें यह नहीं मालूम कि ब्रह्मबेला कहते किसे हैं, इसका क्या महत्त्व है ? सूर्योदय के चौबीस मिनिट पहले से सूर्योदय के चौबीस मिनिट बाद तक का समय ब्रह्मबेला या ब्रह्ममुहूर्त कहलाती है इसे ही आत्म जागरण का समय कहा है। क्योंकि तीर्थकर की वाणी इसी मुहूर्त में खिरती है। जिस प्रकार सरोवर में कमल दल इसी समय खिलते हैं, उसी प्रकार ब्रह्म मुहूर्त में जागने से हमारा हृदय-कमल भी खिल जाता है, जिससे हमारे जीवन में निरोगता का संचार होता है एवं इस समय मन में जो भी शुभ संकल्प लिये जाते हैं, दुहराये जाते हैं। उससे व्यक्ति के अन्दर आत्म विश्वास एवं कार्य करने की दृढ़ क्षमता उद्भूत होती है। <span style="color: #ff0000">प्रातःकाल उठकर क्या विचार करना चाहिये- इस विषय में पं० आशाधर जी ने सागारधर्मामृत ग्रन्थ में लिखा है कि &#8211;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>ब्रम्हे मुहूर्ते उत्थाय पंच नमस्कार कृते सति ।</strong></p>
<p><strong>कोऽहं ! को मम ! किं निज धर्मः इति विचिन्त्येत् ।।</strong></p>
<p>अर्थात् ब्रम्ह मुहूर्त में निद्रा छोड़कर पंच नमस्कार णमोकार मन्त्र कम से कम नव बार पढ़ना चाहिये। यदि आपके पास समय है तो पूरे एक सौ आठ बार जपना चाहिये।</p>
<p>उसके बाद दोनों हस्त कमलों को जोड़कर, दोनों अंगूठों को छोड़कर, शेष बीच की आठ अंगुलियों के चौबीस पोरों में चौबीस तीर्थंकर के नाम स्मरण करते हुए, हाथों को देखें।</p>
<p><strong>हाथ (कर) दर्शन का महत्त्व अन्य शास्त्रों में भी बताया गया है-</strong></p>
<p><strong>कराग्रे वसते लक्ष्मी, कर मध्ये सरस्वती । कर मूले तु गोविन्दः प्रभाते कर दर्शनम् ॥</strong></p>
<p>अर्थात्, हाथ के अग्रभाग में लक्ष्मी का, मध्य में सरस्वती का एवं मूल भाग में हरि ! प्रभो !! ईश्वर !!! का हाथ (कर) का दर्शन करना चाहिये। निवास है। अतः प्रतिदिन प्रातः काल</p>
<p>उपर्युक्त श्लोक बोलते हुऐ अपने हाथों को देखो । यह मनोवैज्ञानिक एवं अर्थपूर्ण प्रक्रिया है इससे व्यक्ति के हृदय में आत्म-निर्भरता, स्वावलम्बनता की भावना का उदय होता है यदि वह ऐसा नहीं करे तो वह अपने जीवन के प्रत्येक कार्य में दूसरों का मुख देखने का अभ्यासी बन जाता है। अतः संसार में जो भी भला या बुरा कार्य करता है, हाथों से ही करता है। ये हाथ ही धर्म- अर्थ काम एवं मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों की कुंजी है।</p>
<p><strong>मुनि अमित सागर की कृति ‘मंदिर’ से साभार</strong></p>
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		<title> श्रीफल ओरिजिनल क्या आप जानते हैं 7 : अभिषेक के बिना पूजा है अधूरी </title>
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		<pubDate>Tue, 21 Feb 2023 00:30:26 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[भगवान तीर्थंकर का पूजन अभिषेक पूर्वक ही मान्य है और सम्पूर्ण फल की प्राप्ति कराने वाला है। अभिषेक से संसार और मोक्ष सुख, दोनों मिलते हैं। जिन प्रतिमाओं की मंत्रों के माध्यम से प्रतिष्ठा हो गई है, उन तीर्थंकरों-अरिहंत भगवान का अभिषेक होता है। प्रतिष्ठित प्रतिमा पर प्रासुक, सुगंधित जल से मस्तक पर धारा छोड़ना [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>भगवान तीर्थंकर का पूजन अभिषेक पूर्वक ही मान्य है और सम्पूर्ण फल की प्राप्ति कराने वाला है। अभिषेक से संसार और मोक्ष सुख, दोनों मिलते हैं। जिन प्रतिमाओं की मंत्रों के माध्यम से प्रतिष्ठा हो गई है, उन तीर्थंकरों-अरिहंत भगवान का अभिषेक होता है। प्रतिष्ठित प्रतिमा पर प्रासुक, सुगंधित जल से मस्तक पर धारा छोड़ना ही अभिषेक है। मूलाचर प्रदीप ग्रंथ में आचार्य सकल कीर्ति देव ने चार प्रकार के अभिषेक बताए हैं- जन्माभिषेक, राज्याभिषेक, दीक्षाभिषेक और प्रतिमाभिषेक।</p>
<p>&#8211; तीर्थंकर का जन्म होता है, तब उसे सौधर्म इन्द्र सुमेरु पर्वत ले जाकर पाण्डुक शिला पर अभिषेक करते हैं, उसे जन्माभिषेक कहते हैं। सौधर्म इन्द्र के बाद अन्य इन्द्र अभिषेक करते हैं।</p>
<p>&#8211; जब तीर्थंकर बालक का राज्याभिषेक होता है, तो उससे पहले राज्याभिषेक होता हैं। सौधर्म इन्द्र के बाद अन्य इन्द्र अभिषेक करते हैं।</p>
<p>&#8211; जब तीर्थंकर बालक दीक्षा ग्रहण करता हैं, तो उससे पहले दीक्षा अभिषेक होता है। यह मनुष्य और देव, दोनों मिलकर करते हैं।</p>
<p>&#8211; पाषाण, धातु आदि की प्रतिमा बनाकर उसकी प्रतिष्ठा कर उसे अरिहंत भगवान के रूप में स्थापित किया जाता है। उसके बाद उसका अभिषेक किया जाता है। इस अभिषेक का वर्णन दश भक्ति संग्रह, जम्बूद्वीप पन्नती, त्रिलोकसार आदि ग्रंथों में मिलता है।</p>
<p><strong>किससे करते हैं अभिषेक?</strong></p>
<p>&#8211; सागर धर्मामृत में पंचामृत अभिषेक का वर्णन करते हुए कहा गया है कि चार कलशों से, सुगंधित जल, इक्षुरस, घी, दूध, दही से अभिषेक करना चाहिए। इसके बाद चंदन लेपन भी करना चाहिए।</p>
<p>&#8211; श्रावकाचार संग्रह प्रथम भाग में कहा है कि दाख़, खजूर, नारियल, ईख, आंवला, केला, आम, सुपारी के रसों से तथा इलायची, लौंग, कंकोल (फल का नाम), चंदन, अगुरू(अगर) के काढ़े से भी अभिषेक किया जाता है।</p>
<p>&#8211; हल्दी, चावल के आटा सहित अनेक जडी-बूटियों के मिश्रण से अभिषेक किया जाता है।</p>
<p><strong>अभिषेक का फल</strong></p>
<p>&#8211; जल से अभिषेक का फल बताते हुए कहा गया है कि इसे करने वाला देव और मनुष्य द्वारा पूजित है, ऐसा चक्रवर्ती होता है।</p>
<p>&#8211; दूध से अभिषेक करने वाला मनुष्य परम कांति का धारक होता है, वह स्वर्ग में देव होता है। वहां से आकर मनुष्य होकर मोक्ष जाता है।</p>
<p>&#8211; दही से अभिषेक करने वाला उज्ज्वल यश को प्राप्त होता है और रुका हुआ धन आता है।</p>
<p>&#8211; घी से अभिषेक करने वाला स्वर्ग में परम ऋद्धि का धारी देव होकर परंपरा से अनन्त वीर्य को प्राप्त करता है।</p>
<p>&#8211; इक्षुरस से अभिषेक करने वाले को अमृत के समान आहार मिलता है, स्वर्ग आदि सुख भोगकर परंपरा से मोक्ष को प्राप्त करता है।</p>
<p>&#8211; जिनेन्द्र भगवान का अभिषेक करने वाला स्वयं अभिषेक को प्राप्त होता है।</p>
<p><strong>(अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर महाराज की कलम से )</strong></p>
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