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	<title>कटनी &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
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	<title>कटनी &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>संयुक्त शपथ ग्रहण समारोह होगा आयोजित : दिगम्बर जैन सोशल ग्रुप फेडरेशन के राष्ट्रीय नेतृत्व का 29 मार्च को प्रथम कटनी आगमन </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shree Phal News]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 27 Mar 2026 13:24:50 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[दिगम्बर जैन सोशल ग्रुप फेडरेशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष मनोहर झांझरी, राष्ट्रीय महासचिव विनय जैन एवं राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष अश्विन कासलीवाल का प्रथम बार “बारडोली” कटनी आगमन रविवार, 29 मार्च को होने जा रहा है। पढ़िए नितिन जैन की रिपोर्ट&#8230; कटनी। दिगम्बर जैन सोशल ग्रुप फेडरेशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष मनोहर झांझरी, राष्ट्रीय महासचिव विनय जैन एवं राष्ट्रीय [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>दिगम्बर जैन सोशल ग्रुप फेडरेशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष मनोहर झांझरी, राष्ट्रीय महासचिव विनय जैन एवं राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष अश्विन कासलीवाल का प्रथम बार “बारडोली” कटनी आगमन रविवार, 29 मार्च को होने जा रहा है। <span style="color: #ff0000">पढ़िए नितिन जैन की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>कटनी</strong>। दिगम्बर जैन सोशल ग्रुप फेडरेशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष मनोहर झांझरी, राष्ट्रीय महासचिव विनय जैन एवं राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष अश्विन कासलीवाल का प्रथम बार “बारडोली” कटनी आगमन रविवार, 29 मार्च को होने जा रहा है।</p>
<p><strong>संयुक्त शपथ ग्रहण समारोह में होंगे शामिल</strong></p>
<p>फेडरेशन एवं महाकोशल-विंध्य रीजन के पदाधिकारियों की उपस्थिति में नव-नियुक्त पदाधिकारियों एवं सदस्यों का भव्य संयुक्त शपथ ग्रहण समारोह आयोजित किया जाएगा। यह समारोह 29 मार्च 2026, रविवार को प्रातः 11 बजे सत्कार गार्डन, पन्ना मोड़, कटनी में संपन्न होगा।</p>
<p><strong>विशिष्ट अतिथियों की रहेगी गरिमामयी उपस्थिति</strong></p>
<p>कार्यक्रम के मुख्य अतिथि के रूप में संदीप जायसवाल (विधायक, मुडवारा) उपस्थित रहेंगे। विशिष्ट अतिथि के रूप में महाकोशल-विंध्य रीजन के अध्यक्ष सीए मनोज जैन शामिल होंगे। इसके साथ ही फेडरेशन के अतिरिक्त महासचिव प्रशांत जैन, प्रवीण सिंघई, रीजन के सचिव हेमंत जैन, कोषाध्यक्ष सुनील घीया, निवर्तमान रीजन अध्यक्ष प्रदीप जैन, रश्मि पारस एवं राष्ट्रीय मीडिया संयोजक नितिन जैन सहित अनेक पदाधिकारी कार्यक्रम में सहभागिता करेंगे।</p>
<p><strong>तैयारियों में जुटे स्थानीय पदाधिकारी</strong></p>
<p>दिगम्बर जैन सोशल ग्रुप कटनी मेन ग्रुप के संरक्षक आदरणीय मगन ‘भैया’ के मार्गदर्शन में तथा निवर्तमान अध्यक्ष संजय जैन (कटनी मेन) एवं अंकित जैन (कटनी रॉयल) की प्रेरणा से नव-निर्वाचित अध्यक्ष सुधीर जैन (कटनी मेन) एवं युवा अध्यक्ष आकेत जैन (कटनी रॉयल) अपनी टीम के साथ आयोजन की तैयारियों में पूर्ण उत्साह और समर्पण के साथ जुटे हुए हैं।</p>
<p><strong>छह ग्रुप्स के पदाधिकारी लेंगे शपथ</strong></p>
<p>इस संयुक्त शपथ ग्रहण समारोह में कटनी मेन, कटनी रॉयल, सतना मेन, सतना मैत्री, मैहर एवं अमरपाटन ग्रुप्स के पदाधिकारी एवं सदस्य शपथ ग्रहण करेंगे। कार्यक्रम के शपथ विधि अधिकारी राष्ट्रीय महासचिव विनय जैन रहेंगे। यह आयोजन क्षेत्रीय एकता एवं आपसी सहयोग का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करेगा।</p>
<p><strong>सामूहिक शपथ का संकल्प साकार</strong></p>
<p>फेडरेशन के राष्ट्रीय महासचिव विनय जैन की लंबे समय से यह भावना रही है कि विभिन्न ग्रुप्स का सामूहिक शपथ ग्रहण एक साथ आयोजित किया जाए। इस आयोजन के माध्यम से महाकोशल-विंध्य रीजन के अध्यक्ष सीए मनोज जैन ने उनके इस संकल्प को साकार रूप देने का सराहनीय प्रयास किया है।कटनी सोशल ग्रुप की संयुक्त आयोजन समिति ने सभी सदस्यों से अधिक से अधिक संख्या में उपस्थित होकर इस गरिमामय समारोह की शोभा बढ़ाने की अपील की है।</p>
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		<title>गुरु ने कहा तो हो ही नहीं सकता मेरे वश की बात नहीं: बहोरीबंद में मुनिश्री के प्रवचन का पुण्य अर्जित कर रहे श्रद्धालु </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 22 Apr 2025 06:45:38 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[ निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज बचैया जनपद के बहोरीबंद में विराजमान है। यहां उनके प्रवचन सुनने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालुगण आ रहे हैं। मुनिश्री के जीवन दर्शन और मार्गदर्शन का भरपूर पुण्य अर्जित किया जा रहा है। बहोरीबंद से पढ़िए राजीव सिंघई की यह खबर&#8230; मुनिश्री सुधासागर जी महाराज ने कहा कि [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong> निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज बचैया जनपद के बहोरीबंद में विराजमान है। यहां उनके प्रवचन सुनने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालुगण आ रहे हैं। मुनिश्री के जीवन दर्शन और मार्गदर्शन का भरपूर पुण्य अर्जित किया जा रहा है। <span style="color: #ff0000">बहोरीबंद से पढ़िए राजीव सिंघई की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p>मुनिश्री सुधासागर जी महाराज ने कहा कि अपनी स्वयं की शक्तियों का जागरण व्यक्ति को स्वयं करना चाहिए क्योंकि अपनी स्वयं की जो शक्ति होती है, उस शक्ति का व्यक्ति उपयोग नहीं करना चाहता। जब व्यक्ति निज शक्ति को छुपाता या भूलता है या उसे निज शक्ति का ज्ञान नहीं होता है, वह व्यक्ति एक दिन इतनी गुलमियत में फंस जाता है कि वो अपनी स्वतंत्रता की श्वास भी नहीं ले पाता, इसलिए जैनाचार्यों ने सबसे पहले अपनी आत्म शक्ति की बात कही। हमें एक चींटी को बचाने में पुण्य लगता है और ये हवा सारे संसार को बचा रही है तो भी उसकों पुण्य नहीं लग रहा क्योंकि उसको मालूम ही नहीं है कि मेरे पास कितनी शक्ति है। होशपूर्वक तुम्हें इसका ज्ञान है कि मैं इसको बचा जा रहा हूँ, तब बचाओगे तो धर्म है। प्याऊँ खोलने वाले को धर्मात्मा जीव कहते हैं और पानी सारे जगत की प्यास बुझा रहा है लेकिन उसे पुण्यबन्ध नहीं क्योकि उसे मालूम ही नहीं कि मैं कितना मूल्यवान हूँ। कितने जीव है दुनिया में जिन्हें अपनी योग्यता मालूम नहीं, इसलिए ये स्थावर है, पापी है, इनका कभी कल्याण होने वाला नहीं उस सीधी पर्याय से। इसी तरह आपको भी अपनी जिंदगी का मूल्य पता नहीं है कि तुम कितने मूल्यवान हो।</p>
<p><strong>अपने अतीत को स्थापित कर दो</strong></p>
<p>जो व्यवहार हम दूसरों के साथ कर रहे हैं, वहीं व्यवहार यदि स्वयं के साथ होवे तो जैसे ही ये भाव आपके मन में आएगा तो आपके अंदर करुणा जाग जाएगी। पेड़ का पत्ता तोड़ो तो तोड़ते समय सोचना तुम कल यहाँ थे, तुम्हे भी किसी ने तोड़ कर फेंका होगा। अपने अतीत को स्थापित कर दो सारे संसार में। चिंतन करो हर चीज में यदि तुमने किसी जीव पर पैर रखा है तो कल मैं भी यहाँ था, किसी ने मेरे ऊपर पैर रखा होगा, उस समय मेरी वेदना क्या होगी। वैरागी को चिंतन करने के लिए पंचपरमेष्ठी की जरूरत नहीं है, वो तो बैठे-बैठे एक पेड़ का, एक चींटी भी चिंतन कर सकता है। वो जहाँ जाएगा, अपना रूप देख लेगा। नरकों का वर्णन पढ़ेगा, अपने आप को देख लेगा।</p>
<p><strong>अपनी शक्ति का भान करो</strong></p>
<p>तुम्हारी कितनी कीमत, शक्ति है, तुम अपनी शक्ति का भान करो, तुम चाहो तो इस जीव को बचा सकते हो, तुम चाहों तो मार सकते हो। हम चींटी को बचा सकते हैं तो हम अपनी जिंदगी में शक्ति नहीं छुपायेंगे, जब भी चींटी मेरे पैरों के पास आएगी, मैं बचाऊँगा क्योंकि मुझे बचाने की शक्ति है। हम किसी की प्यास बुझा सकते हैं इतनी शक्ति है मेरे पास, हुनर है तो बस एक ही नियम लेना है मेरे पास कभी भी कोई आएगा तो हम उसकी प्यास जरूर बुझायेंगे, उसे प्यासा नहीं मरने देंगे। अभी तुम्हारे पास खाने पीने की शक्ति नहीं है तो तुम किसी को पानी नहीं पिलाना क्योंकि तुम खुद ही पानी नही पी पा रहे हो, जैसे ये पेड़ पौधे आदि है क्योंकि ये स्वयं ही पानी को तरसते है। तुम्हारे पास खाने को नहीं है तो बिल्कुल मत खिलाना दूसरे को, दुनिया मरे तो मरने देना, जब है नहीं खिलाने को तो। यदि मेरे पास दो रोटी खिलाने की ताकत है तो जरूर नियम ले लेना कि मैं प्रतिदिन किसी दूसरे को दो रोटी खिलाकर ही सोऊँगा, यदि उस समय तुमने अपनी शक्ति छुपा ली तो अब तुम भूखों मरोगे, ये प्रकृति अब अपनी शक्ति दिखाएगी।</p>
<p><strong>भगवान, जिनवाणी माँ, गुरु ये बहुत दयालु हैं</strong></p>
<p>पैसा तो सबके पास है, पैसे का मूल्य क्या है उसकी शक्ति समझो। चाहे तो उस पैसे से स्वयं को व दुनिया को बर्बाद कर सकते हो। जब तक तुमने धर्म को भार माना, तुम कैमरे की नजर में हो, मां ने कहा अभिषेक करने जाओ, तुमने कहा कि मैं नहीं जा सकता, ये कहने के पहले थोड़ा सा सोच लेना, ये शब्द तुम माँ को बोल रहे हो, वो माँ कैसी जो बेटे की कूबत नहीं जानती है। भगवान, जिनवाणी माँ, गुरु ये बहुत दयालु है, ये उतना ही आदेश देंगे, जितनी अपनी शक्ति हैं लेकिन अपन ने माँ से क्या कह दिया हमारे वश की बात नहीं है। तुम्हारे अंदर परिणाम आना चाहिए कि गुरु ने कहा है तो हो ही नहीं सकता कि मेरे वश की बात नहीं, जिनवाणी माँ शक्ति से ज्यादा आदेश दे ही नहीं सकती। जिनका भविष्य जैसा होता है, उसकी शुरुआत बहुत पहले से हो जाती है, इसलिए गुरु आदेश, जिनवाणी का उपदेश कभी भार नहीं मानना, बस ये कहना शक्ति तो है लेकिन मेरा प्रमाद है।</p>
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		<title>काम पुरुषार्थ का अर्थ वासना से लेना देना नहीं : मुनि श्री सुधा सागर जी बताया मूल्यांकन का महत्व </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 20 Apr 2025 07:25:50 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मुनि श्री सुधासागर जी बहोरीबंद अतिशय क्षेत्र में विराजमान हैं। यहां नित्य प्रवचन हो रहे हैं। समाज जन रोज धर्म लाभ ले रहे हैं। बहोरीबंद से पढ़िए यह खबर&#8230; बहोरीबंद। निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज ने बहोरीबंद अतिशय क्षेत्र में धर्मसभा में प्रवचन देते हुए कहा कि ये दुनिया एक ऐसी अनिर्णीत वस्तु है [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>मुनि श्री सुधासागर जी बहोरीबंद अतिशय क्षेत्र में विराजमान हैं। यहां नित्य प्रवचन हो रहे हैं। समाज जन रोज धर्म लाभ ले रहे हैं। <span style="color: #ff0000">बहोरीबंद से पढ़िए यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>बहोरीबंद।</strong> निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज ने बहोरीबंद अतिशय क्षेत्र में धर्मसभा में प्रवचन देते हुए कहा कि ये दुनिया एक ऐसी अनिर्णीत वस्तु है जिसको निर्णय करके प्रकृति ने कुछ भी नहीं दिया। उसका मूल कारण था कि वस्तु में इतनी योग्यताएं हैं, वस्तु इतनी अनेकांतमयी है कि प्रकृति निर्धारण कर ही नहीं पाती कि हम किस वस्तु का क्या मूल्यांकन करे, वहीं वस्तु किसी के लिए अनमोल है वही वस्तु किसी के लिए निर्मूल है, किसी के लिए सुखदाई है तो किसी को दुखदाई। हम नहीं कह सकते कि प्रातः काल का सूर्य निकलने अच्छा होता है, उल्लू से पूछो उसको कितना बुरा लगता है। हमें भगवान अच्छे लगते हैं लेकिन कई लोगों को भगवान बुरे लगते है। किसी को महाराज को देखकर अहोभाग्य भाव जागता है तो किसी को दुर्भाग्य।</p>
<p><strong>मेरा धर्म जो चाहेगा वो होगा</strong></p>
<p>तुम्हारी किस्मत में जो लिखा है सो होगा, ये नियतवाद है, यह संतोषी का, अहंकार से ऊपर उठने का मंत्र है। हमें धर्म यह नहीं कहता कि तुम्हारी किस्मत में जो लिखा है सो होगा, यदि किस्मत में ही सब कुछ लिखा है तो फिर धर्म करने से क्या होना है, इसलिए अपने धर्म पर विश्वास करो, मेरा धर्म जो चाहेगा वो होगा। नियत कहता है कि अग्नि का काम जलाना है और हमारा काम जलना लेकिन नहीं, होता है चमत्कार जैसे ही सीता अग्नि में कूदी, अग्नि ने जलाना बंद कर दिया, अग्नि नीर का कुंड बन गया, इसको बोलते है चमत्कार, ये है धर्म।</p>
<p><strong>सारी वस्तुओं को हमें जुटाना पड़ता है</strong></p>
<p>अर्थ, धर्म व काम ये तीन पुरुषार्थ हम अपने जीवन में करें। अर्थ का अर्थ क्या है? पैसा, मकान नहीं, हमारे जीवन के उपयोग की जितनी भी वस्तुएं हैं। वे उपयोगी वस्तुये कभी किस्मत से, नियत से, सर्वज्ञ से नहीं मिलती, सारी वस्तुओं को हमें जुटाना पड़ता है। अब जो उपकारी है सब अर्थ पुरुषार्थ में जाएगा। काम पुरुषार्थ का अर्थ वासना से लेना देना नहीं है, जूते मिले है तुम्हे अर्थ पुरुषार्थ से, जूते पहनना काम पुरुषार्थ है, जो-जो चीज आपने उपभोग की, वो सब काम पुरुषार्थ है। गाड़ी लाना अर्थ पुरुषार्थ है और गाड़ी में बैठना काम पुरुषार्थ है।</p>
<p><strong>24 घंटे तीनों पुरुषार्थ एक साथ हों</strong></p>
<p>भगवान की पूजा का नाम ही धर्म पुरुषार्थ नहीं है। आपको व्यापार करते समय ये भाव आ गया कि नहीं, ये धंधा मैं नहीं करूंगा क्योंकि मैं जैनी हूं, इसमें हिंसा है। आप भोजन की थाली कर बैठे हैं, मैं यह नहीं खाऊंगा, ये अभक्ष्य है, भोजन करते हो गया धर्म पुरुषार्थ। आप चमड़े के नहीं, कपड़े के जूते पहन रहे है, अहिंसा परमोधर्म:, जूते पहनते हुए धर्म पुरुषार्थ। 24 घंटे तीनों पुरुषार्थ साथ एक साथ चलना चाहिए।</p>
<p><strong>देश का पैसा देश में</strong></p>
<p>चोर चोरी करके माल को मार्केट में ले जाता है। वह देश की अर्थ व्यवस्था को कायम रखते हैं, घरों में रखे हुए धन को बाजार में लाते हैं, इसलिए अर्थ शास्त्री कभी चोरों को बुरा नहीं मानते। देश का पैसा देश में, ये राज विरुद्ध नहीं कहलाता। राज विरुद्ध वो कहलाता है, जिससे देश में विदेशी वस्तु को कानूनन मना किया है, स्मग्लरपना जितना है, सब राष्ट्रद्रोह में आएगा। अन्य देशों के साथ संबंध बनाना यह राष्ट्रद्रोह में आएगा।</p>
<p><strong>जाति कलंकित नहीं होना चाहिए</strong></p>
<p>तुम जो कुछ भी करते हो करो, बस तुम्हारे कारण से जाति कलंकित नहीं होना चाहिए, यदि आपने यह ध्यान रख लिया कि मैं ऐसा कोई कार्य नहीं करूंगा जिससे मेरी जाति बदनाम हो, जाओ आप जाति वाले कहलाएंगे, आप क्या आचरण पाल रहे है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। जितनी ज्यादा आप इच्छाएं संसार से पूरी कराने का भाव करोगे, आप असमर्थ होते जाओगे।</p>
<p><strong>पौधा अच्छी खाद, पानी चाहता है</strong></p>
<p>जो-जो वस्तु तुम्हें चाहिए है। जरूरत है, वे वस्तु तुम्हारी कैसे होगी एक आदत बदल दो, तुम्हें अपनी इच्छा पूरी कराना है तो पहले आपको नियम लेना है, इसकी क्या इच्छा है, मैं नियम लेता हूं, इसकी हर इच्छा पूरी करूँगा। एक गमले में पौधा है, वह तुम्हारे काम का है, तुम्हारे काम आएगा, बस तुम्हे एक नियम लेना है, इस पौधे की क्या इच्छा है, वह अच्छी मिट्टी है अच्छी खाद, पानी चाहता है, आप उसकी इच्छा पूरी कर दीजिएगा, तुम्हें कुछ भी नहीं कहना पड़ेगा, वो तुम्हारी इच्छा पूरी कर देगा।</p>
<p><strong>वह कोई नकारात्मक एनर्जी नहीं देगा</strong></p>
<p>वह तुम्हे उसी समय से तुम्हें एनर्जी देना प्रारंभ कर देगा। पेड़ को चाहो, पेड़ से मत चाहो अभी। आप घर से बाहर गए है, आपको चिंता होगी कि आज पेड़ को पानी कौन देगा, उस पेड़ की ऐसी एनर्जी आपके पास जाएगी कि आप जंगल में दबे हो गए वह पेड़ आपकी कुशलता की कामना कर रहा होगा कि मेरा मालिक सुरक्षित आ जाए। आप फल तोड़ोगे तो भी वह कोई नकारात्मक एनर्जी नहीं देगा क्योंकि, इसी ने तो मुझे पाला है।</p>
<p><strong>मां-बाप की हर इच्छा पूरी करूंगा</strong></p>
<p>भगवान से मांगो गुरु से मांगो कि मैं अपने मां-बाप की हर इच्छा पूरी करना चाहता हूँ, तुमने भगवान से आशीर्वाद लिया, णमोकार मंत्र पढा। पुरुषार्थ करना है कि मैं अपनी मां-बाप की हर इच्छा पूरी करूंगा, तुम्हें अपने लिए मांगने की जरूरत नहीं है, उनकी इच्छा की पूर्ति की बाद ऐसा अतिशय होगा कि एक बार वे तुम्हारी तरफ देख लेंगे, तुम्हारी सारी इच्छाएं पूरी हो जाएगी लेकिन, संकल्प लेना है तुम्हे। जिनवाणी माँ जो तुम्हे खिलाएगी, वह मैं खाऊँगा, जाओ तुम्हारी जिंदगी खतरे से बाहर रहेगी, दुर्गति से बचोगे।</p>
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		<title>ऐसा पाप मत करना जिससे राष्ट्र कलंकित हो: मुनिश्री के प्रवचनों में जीवन से जुड़े गुढ़ रहस्य का मिल रहा लाभ  </title>
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		<pubDate>Sat, 19 Apr 2025 16:43:32 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज इन दिनों बहोरीबंद अतिशय क्षेत्र में विराजमान होकर धर्म प्रभावना कर रहे हैं। उनके उपदेश सुनने के लिए आसपास के क्षेत्र से बड़ी संख्या में श्रद्धालु श्रावक यहां पहुंच रहे हैं। शनिवार को उन्होंने प्रवचन में कई महत्वपूर्ण उपदेश दिए।  कटनी। बहोरीबंद अतिशय क्षेत्र में अपने प्रवचन में मुनिश्री [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज इन दिनों बहोरीबंद अतिशय क्षेत्र में विराजमान होकर धर्म प्रभावना कर रहे हैं। उनके उपदेश सुनने के लिए आसपास के क्षेत्र से बड़ी संख्या में श्रद्धालु श्रावक यहां पहुंच रहे हैं। <span style="color: #ff0000">शनिवार को उन्होंने प्रवचन में कई महत्वपूर्ण उपदेश दिए। </span></strong></p>
<hr />
<p><strong>कटनी।</strong> बहोरीबंद अतिशय क्षेत्र में अपने प्रवचन में मुनिश्री सुधासागर जी महाराज ने कहा कि जीव के अंदर एक चाहत होती है कि सारी दुनिया मेरे लिए हो और जो कुछ भी करता है सब अपने लिए करता है, इसका परिणाम ये निकलता है कि वह कभी भी अपनी इच्छाओं को पूरा नहीं कर पाता, अभी वह सारी दुनिया को अपना नहीं बना पाता और एक दिन ऐसा आता है कि जब अपने भी पराए हो जाते है, यहाँ तक भी अपनी किस्मत, अपना शरीर, ज्ञान, ध्यान और भगवान भी साथ नहीं देते। सारी दुनिया में दवाई कर ली, कोई इलाज ही नहीं लग रहा है, ये ऐसे यक्ष प्रश्न है जिनके समाधान तो है नहीं लेकिन खोजना पड़ेगा। समस्या है तो समाधान भी कंही न कंही है, बीमारी है अर्थात उसका निदान भी है, ये निश्चित समझना। जैसे डाकू है तो इसका अर्थ है दुनिया में साधु भी है, जहाँ पाप है तो पुण्य जरूर दुनिया में है, विपदा आई है तो उसे दूर करने का उपाय जरूर है।</p>
<p><strong>दःख आया है तो घबराओ मत सुख का नंबर आने ही वाला है</strong></p>
<p>ऐसे ही हम अपनी जिंदगी में समझे बुरे दिन आ रहे है तो इसका अर्थ है अच्छा दिन जरूर आएगा ही आएगा। हम अपने अनुभव को अनुमान बनाये और उसका निर्णय करें जो हमारे अनुभव में नहीं आ रहा है, ऐसा ज्ञान जब हमारे अंदर हो जाता है तो हमारी घबराटे खत्म हो जाती है। दुख आया है तो घबराओ मत सुख का नंबर आने ही वाला है। दुख आया है तो ज्यादा अहंकार मत करो, दुख आने में ज्यादा देरी नहीं लगना। जब भी अच्छी कार्य करने की बात आती है तुम तुरंत हा नहीं कहते, आपके मुँह से न निकलता है, यही शब्द बता रहा है कि अभी हमारा कल्याण बहुत दूर है, हम आसन्न भव्य नहीं है। मेरे जीवन में अच्छे दिन कब आएंगे, मैं भगवान कब बनूँगा आदि किसी अच्छी चीज से यदि प्रभावित हो रहे हो कि यह मेरे जीवन में कब आएगा, पहला यदि कोई अच्छी बात कहे तो बिना विचारे आपके मुंह से हां निकालना चाहिए। जितनी अपन भगवान की प्रशंसा करते हैं कि भगवन आप धन्य है, यदि उसका दसवां हिस्सा भी भाव कर ले कि जितनी अपन भगवान की पूजा कर रहे है, उतना स्वयं भगवान बनने का प्रयास कर ले भगवान के स्थान पर तू खुद भगवान बन जाएगा।</p>
<p><strong>तुम गुरु को डाकू समझ रहे हो?</strong></p>
<p>तुम्हें डर लग रहा है कि गुरु के सामने जाऊंगा तो गुरु गुटखा छुड़ा देंगे, मुझे मंदिर जाने का नियम लेना पड़ेगा। इसलिए मैं तो महाराज के पास जाता ही नहीं तो इसका अर्थ है कि तुम गुरु को डाकू समझ रहे हो, क्योंकि डरा तो डाकू से जाता है। कितने ही बड़े पापी हो तुम, कितना ही बड़ा तुम्हे डर लग रहा हो, उस पाप को मत करना जिसको करते हुए तुम्हे मम्मी पापा का डर लगे। यदि तुम्हारे काले कारनामों के कारण मां-बाप की नजर झुक गयी, उनकी आंख में आंसू आ गया, कहां का मैंने ऐसा बेटा पैदा किया, इसने पूर्वजों की सारी इज्जत धूल में मिला दी, एक बार भी यह परिणाम आ गया तो जाओ इससे बड़ा अभिशाप तुम्हारी जिंदगी में नहीं होगा, तुम सैकड़ो भवों तक गंदे मां-बाप के यहां पैदा होंगे, पहली बात तो मां बाप मिलेंगे ही नहीं, अनाथ पैदा होंगे। गर्भ में आओगे ही नहीं, समुर्छनो में पैदा होंगे।</p>
<p><strong>अभिषेक करके गंधोदक लगाओ </strong></p>
<p>कुछ ऐसे कृत्य हैं जहां णमोकार मंत्र की शक्ति भी फेल हो जाती है, जब तुमने ऐसा कृत्य किया और तुम्हारे उपकारी के मन में खेद हो गया, पाप तुमने किया और आंसू मां-बाप के आ गए, नजर उनकी झुक गई, कुल कलंकित हो गया। यदि तुम्हारे कारण से राष्ट्र कलंकित हुआ है तो तुम म्लेच्छ खंड में जन्म लोगे क्योंकि पाप तुमने किया है देश कलंकित हुआ है। आतंकवादी का पाप इसलिए बड़ा है कि आतकंवादी के कारण देश बदनाम होता है कि ये आतंकवादी पैदा करता है। आप जैन है ऐसे पाप मत करना जिससे लोग कहने लगे कि जैनी लोग भी ऐसा पाप करने लगे, करोगे तुम और बदनाम होगी जैन जाति। कोई ऐसा पाप मत करना जिससे तुम्हारा भगवान का अभिषेक करना छूट जाए, गुरुओ को आहारदान देना छूट जाए। आप लिस्ट बनाओ जो पाप तुमने अभिषेक के कारण छोड़ दिए कि मैं भगवान को छूने लायक नहीं रहूंगा, छोड़कर दिखाओ, फिर अभिषेक करके गंधोदक लगाओ तो जाओ कौन सी बीमारी है जो दूर नहीं होगी।</p>
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		<title>बचे हुए पैसे से कभी पाप मत करना : मुनि श्री सुधासागर जी को सुनने के लिए दूर-दूर से आ रहे गुरु भक्त </title>
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		<pubDate>Fri, 04 Apr 2025 07:48:30 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मुनि श्री सुधासागर जी महाराज ने गुरुवार को धर्म सभा में अपने प्रवचन में जीवन के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश दिया। उन्होंने जीवन का सार समझाया। कटनी से पढ़िए राजीव सिंघई की यह खबर&#8230; कटनी। निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज ने बहोरीबंद अतिशय तीर्थ में अपने प्रवचनों के माध्यम से जैन समाज को उपयोगी [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>मुनि श्री सुधासागर जी महाराज ने गुरुवार को धर्म सभा में अपने प्रवचन में जीवन के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश दिया। उन्होंने जीवन का सार समझाया। <span style="color: #ff0000">कटनी से पढ़िए राजीव सिंघई की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>कटनी।</strong> निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज ने बहोरीबंद अतिशय तीर्थ में अपने प्रवचनों के माध्यम से जैन समाज को उपयोगी मार्गदर्शन दिया। उन्होंने कहा कि अच्छाइयों को समझ लेने से हम अच्छे बन जाएंगे, ये उम्मीद मत रखना, मंजिल को समझ लेने से हमें मंजिल मिल जाएगी, ये उम्मीद मत करना। रोटी मिल जाएगी तो तुम खा लोगे, ये मत समझना। पानी पी लोगे तो प्यास बुझ जाएगी ये मत समझना। भगवान, गुरु मिल जाएंगे तो कल्याण हो जाएगा। ये मत समझ लेना। उच्च कुल, वज्र वृभषनाराच संहनन मिल जाएगा तो मत समझना कि तुम्हारा कल्याण हो जाएगा। ये सब पॉजिटिव एक पक्ष है और एक पक्ष से नदी नहीं बहती है। हमारी जितनी लग्न मोक्ष के प्रति है, उतनी लगन यदि तुम मोक्ष मार्ग के प्रति लगा लो तो मंजिल के प्रति लगन न होते हुए भी मंजिल मिल जाएगी। हर व्यक्ति अमीर बनना चाहता है लेकिन, कोई ये पूछने नहीं आता कि ये अमीर क्यों बना, कैसे बना, पूछना ही नहीं चाहता और बताएं तो सुनना नहीं चाहता। ये अमीर इसलिए बना है क्योंकि, इसने बहुत दान दिए हैं, बहुत करुणा की है, मंदिर बनाए हैं, धर्मशाला खोली, गरीबों की सहायता की है। इसलिए आज अमीर बना।</p>
<p><strong>गरीबी क्यों है इसकी खोज</strong></p>
<p>जब दो व्यक्ति जबरदस्त लड़ रहे हो तो लड़ते हुए व्यक्तियों को नाग की उपमा दी कि ये नाग हैं, जब दो नाग लड़ रहे हो तो उन्हें अलग करने का प्रयास मत करना, वे दोनों नाग मिलकर के तुम्हें निपटा देंगे। फिर वो लड़ेंगे। ऐसे ही मानी, मायाचारी और लोभी व्यक्ति को मत समझना, चारों कषायों की जब तीव्रता हो, तब आप धर्म का उपदेश नहीं देना, यदि दुर्जन है तो, उसकी कषाय मंद पड़ने दो। मध्यम कषाय वाले को ही शांति से समझाया जाता है, उपदेश दिया जाता है। हम साध्य के प्रति बहुत जल्दी प्रभावित हो जाते है। रोने से किस्मत अच्छी नहीं हो जाएगी, ये विचार करो कि किस्मत क्यों खराब है। गरीबी का रोना रोने से गरीबी दूर नहीं होगी, कितने ही रोते रहना, कितने ही विधान, पंचकल्याणक करते रहना, गरीबी क्यों है इसकी खोज करो। क्यों पर विचार नही करते, इसलिए हमारा भगवान, गुरु पर से विश्वास उठ जाता है।</p>
<p><strong>5 रुपये कम खर्च करके 5 रूपए का दान करो</strong></p>
<p>बचे हुये पैसे से पाप मत करना, अपने उपभोग में से कांटकर करना हो तो कर लेना क्योंकि, बचा हुआ पैसा नियम से तुम्हारें पुण्य कर्म से बचा है। मानकर चलिए तुम्हारा सौ रुपये निश्चित है तो 5 रुपये कम खर्च करके 5 रूपए का दान करो। तुम्हे और भी अनाव सनाव पैसा खर्च करना है तो अपने उपयोग में से कम कर दो, एक आवश्यक वस्तु कम खरीदो लेकिन, बचे हुए पैसे से पाप मत करना, वह तुम्हारे पुण्य की मेहरबानी है, अन्यथा पैसा बच ही नहीं सकता। तुमने वहाँ पुण्य किया है, जहाँ मंदिर में जरूरत नहीं थी, फिर भी तुमने कहा मैं तो मंदिर में दान दूँगा। भगवान को पीतल का छत्र लगा है, जरूरत नही है लेकिन मैं तो छत्र सोने का चढ़ाऊँगा।</p>
<p><strong>जानने के लिए चरित्र पढ़ना</strong></p>
<p>भगवान को जानने के लिए भगवान का चरित्र नहीं पड़ना, भगवान कैसे बने हैं उसको जानने के लिए चरित्र पढ़ना। भगवान का स्वरूप तो बहुत 2 मिनिट में आ जाएगा। अब सारी जिंदगी में समझ में आ जाए कि भगवान बनने की विधि क्या है? उस विधि को सीखों। महानुभाव एक पाप का भी त्याग नहीं है और तुम अपने आपको भगवान मान रहे हो तो तुम्हारी दशा उसी शराबी जैसी है, जिस भिखारी ने शराब की बोतल लगा ली और कहता है- आई एम गॉड।</p>
<p><strong>नौ बार णमोकार मंत्र पढ़ो</strong></p>
<p>एक दान होता है- जरूरत का दान, मंदिर में जो जरूरत है वो दे देना, मंदिर बन रहा है इस मंदिर में मेरा कुछ न कुछ लगेगा। दूसरा जो कहता है जरूरत नही है तो भी मैं मंदिर में दान दूँगा। हर व्यक्ति को अच्छे समय में तैयारी करना है कि बुरा समय आ जाए तो क्या तैयारी है? आप यात्रा पर जा रहे हो गाड़ी नहीं है लेकिन रास्ते में पंचर हो गई तो क्या तैयारी है? पक्ष की ही नहीं विपक्ष की भी तैयारी रखो, यदि इससे उल्टा हुआ तो क्या तैयारी है? रात में सकुशल सो रहे हो, कुछ भी नही, यदि रात में सोते-सोते मर गए तो क्या तैयारी है? जैन दर्शन है कहता है उस एक प्रतिशत की तैयारी करो। नौ बार णमोकार मंत्र पढ़ो, जब तक मेरी निद्रा है तब तक मैं सब कुछ अन्न जल परिग्रह का त्याग करता हूँ, प्रभु मेरे व तेरे अलावा कोई नही, अब निद्रा में मर भी जाएगा तो वही गति होगी जो एक त्यागी की होती है, जो णमोकार मंत्र पढ़ते पढ़ते मरने वाले की गति होती है, ये है समझदार व्यक्ति।</p>
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		<title>हमारा अस्तित्व त्रिकाली है, कोई मिटा नहीं सकताः अधर्म के साथ सोने की लंका में रहने की अपेक्षा धर्म के साथ वनवास में रहना श्रेष्ठ है-निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधा सागरजी महाराज </title>
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		<pubDate>Tue, 01 Apr 2025 17:31:34 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जन्म होगा और जन्म हुआ है तो मरण भी होगा। हम एक दिन भी जियेंगे तो आनंद के साथ जियेंगे। चूहे की तरह सौ दिन जीने की अपेक्षा शेर की तरह एक दिन जीना काफी है, रोते रोते जीने की अपेक्षा हंसते हंसते मरेंगे तो काफी है। ये बात निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधा सागरजी महाराज [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>जन्म होगा और जन्म हुआ है तो मरण भी होगा। हम एक दिन भी जियेंगे तो आनंद के साथ जियेंगे। चूहे की तरह सौ दिन जीने की अपेक्षा शेर की तरह एक दिन जीना काफी है, रोते रोते जीने की अपेक्षा हंसते हंसते मरेंगे तो काफी है। ये बात निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधा सागरजी महाराज ने अपने प्रवचन में कहीं। <span style="color: #ff0000">पढ़िए बहोरीबंद से राजीव सिंघई मोनू की यह पूरी खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>बहोरीबंद (कटनी)।</strong> व्यक्ति की सबसे बड़ी भूल है कि वह अपने अस्तित्व की चिंता करता है कि मेरा अस्तित्व खत्म न हो जाए, ये जो हमारे मन में मिथ्या धारणा बनी हुई है क्योंकि कभी जीव का अस्तित्व खत्म होता ही नहीं है। जो काम होता ही नहीं है, उस काम में हम समय क्यों बर्बाद कर रहे हैं, हमारा अस्तित्व त्रिकाली है, कोई मिटा नहीं सकता। दूसरे को मत मिटाओ, तुम कितना ही प्रयास करना नहीं मिटा पाओगे। अब अपना समय बर्बाद मत करो कि मेरा अस्तित्व बना रहे, समय बचाओ, वो तो बना रहेगा। कल की मौत का भय, आज के जीने के आनंद को बर्बाद कर रहा है। लिस्ट बनाओ कौन-कौन से कार्य हैं जो हम रोक नहीं सकते और हम करना चाहे तो कर नहीं सकते, उसमे समय खराब मत करना।</p>
<p><strong>भागकर मरने में बहुत बड़ा पाप है</strong></p>
<p>इस संसार की जंग से भागना नहीं, सुसाइड नहीं करना, रोना नहीं, आने दो, हम कर्माे से लड़ते-लड़ते, विपदाओं से जूझते जूझते मर जायेंगे लेकिन भागेंगे नहीं। अशुभ कर्म का उदय आ गया तो महाराज श्री ऐसा भाव आ रहा है कि मर जाऊँ, कायर कंही का, कष्ट सहन करते मर जा, लड़ते-लड़ते मरने में कोई आपत्ति नहीं, भागकर मरने में बहुत बड़ा पाप है। भील से वैद्य कहता है कि नियम तोड दे, जिंदा रह जायेगा, भील कहता है कि कभी मरूँगा तो नहीं, वैद्य कहता है कि मरेगा तो सही लेकिन कुछ दिन जिंदा रह जायेगा तो सम्यक दृष्टि कहता है कि नियम तोड़कर कुछ दिन जिंदा रहने की अपेक्षा नियम पालन करते हुए एक क्षण में मर जाना श्रेष्ठ है। हम नियत को अनियत बना दे, हमारी नियत है कि हम कल मरेंगे लेकिन हमारी ताकत है कि हम णमोकार मंत्र के लिए आज ही मरने को तैयार है, कल मरेंगे तो मरेंगे।</p>
<p><strong>क्या मौत के डर से मन्दिर जाना छोड़ दू</strong></p>
<p>जब भगवान महावीर स्वामी का समवशरण राजगृह में आया तो एक मेंढ़क ने कहा मैं भी समवशरण में जाऊँगा। लोगों ने कहा कि इतनी भीड़ है तू रस्ते में कुचल कर मर जायेगा। दुनिया का एक मात्र दर्शन जैनदर्शन है, जिसमें पशुओं के लिए भी अलग से एक सभा रखी गई। सभी बड़े सामान नहीं होते हैं, कुछ बड़े ऐसे होते हैं, जो स्वयं बड़े होते हैं, बड़ों के साथ रहते हैं। लेकिन छोटों का भी उतना ही मान रखते हैं, जितना बड़ों का रखते हैं, जैसे सारी दुनिया जिसके पैर धोती थी वह श्रीकृष्ण, सुदामा के पैर धो रहा है। मेढ़क ने कहा मैं दर्शन करने तो जाऊँगा, भली मुझे दर्शन न मिले, एक कदम बढ़ाऊँ, मंदिर को कदम बढ़ाना श्रेष्ठ है, क्या मौत के डर से मन्दिर जाना छोड़ दूँ। चुन लिया है पथ जो मैनें, मैं उसी पथ पर चलूँगा, दे दिया सर्वस्व जिसकों, अब न मैं उसकों छलूँगा, खो दिया इस पार, पर उस पार मैं पाके रहूंगा। वह मेढ़क, हाथी के पैर से दबकर मर गया लेकिन मरकर के देव बनकर उसने भगवान के दर्शन किये।</p>
<p><strong>णमोकार मंत्र पढ़े बिना सौ साल की जिंदगी भी बेकार </strong></p>
<p>मन्दिर भली न आ पाओ लेकिन मन्दिर की ओर कदम उठाकर चलना, कम से कम ये तो होगा कि मन्दिर भली न पहुँच पाया लेकिन मन्दिर के रास्ते मे मर गया। यदि आपकी भावना सच्ची है और आपने कदम बढ़ा दिया है, भली मंजिल पर नही पहुँच पाये तो ये कर्म तुम्हे ऐसी व्यवस्था बनाएगा कि तुमने जैसी भावना भाई थी, तुम समवशरण में मिलोगे। मुझे भली मोक्ष मिले न मिले, मैं मोक्षमार्ग पर ही मरना चाहता हूँ क्योंकि मैंनें कम से कम चलने का प्रयास तो किया। अधर्म के साथ सोने की लंका में रहने की अपेक्षा धर्म के साथ वनवास में रहना श्रेष्ठ है। णमोकार मंत्र पढ़े बिना सौ साल की जिंदगी भी बेकार है और णमोकार मंत्र पढ़ते-पढ़ते हमें मौत मिलती है तो हमें स्वीकार है।</p>
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		<title>करने का मन होता है तो अधर्म हैः मोबाइल के अंदर लगे चित्र से तुम्हारे अंदर के चरित्र पता चल रहा है-निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधा सागरजी महाराज </title>
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		<pubDate>Fri, 28 Mar 2025 17:02:54 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन दर्शन ने सूत्र दिया-तुम कौन हो? हर व्यक्ति ये जानने का प्रयास कर रहा है कि मुझे क्या करना चाहिए, क्या जानना चाहिए? मुझे क्या बोलना, पढ़ना चाहिए? मैं क्या देखूँ, सुनूँ ये समझ नही आ रहा। ये बात निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधा सागरजी महाराज ने अपने प्रवचन में कहीं। पढ़िए बहोरीबंद से राजीव [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>जैन दर्शन ने सूत्र दिया-तुम कौन हो? हर व्यक्ति ये जानने का प्रयास कर रहा है कि मुझे क्या करना चाहिए, क्या जानना चाहिए? मुझे क्या बोलना, पढ़ना चाहिए? मैं क्या देखूँ, सुनूँ ये समझ नही आ रहा। ये बात निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधा सागरजी महाराज ने अपने प्रवचन में कहीं। <span style="color: #ff0000">पढ़िए बहोरीबंद से राजीव सिंघई मोनू व पृथ्वीपुर से शुभम की यह पूरी खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>बहोरीबंद (कटनी)</strong>। जब किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाओ तो एक सूत्र दे रहा हूँ-तुम कौन हो? क्या अनुभूति हो रही है, मनुष्य की, मैं भारतीय हूँ, मैं जैन हूँ, मैं पिता हूँ, मैं पति हूँ, मैं भक्त हूँ। जो वस्तु तुम्हे दिखी, उसको देखते ही अनुभूति में क्या आ रहा है? माँ को देखते ही मैं बेटा, गुरु को देखते ही मैं शिष्य हूँ, बस तुम जो हो, अब वह करना है। खाते समय तुम्हें यह नहीं देखना है कि मैं क्या खाऊं, डिप्रेशन में चले जाओगे मैं मनुष्य हूँ और मनुष्य मैं भी जैन हूँ, बस, जैन व्यक्ति को क्या खाना चाहिए अब लिस्ट जल्दी बन जाएगी। जैन में भी व्रती हूँ, व्रती में भी मुनि हूँ तो जो तुम्हारे रत्नत्रय के लिए, धर्म साधना के लिए जो तुम्हारी आचार संहिता में लिखा है, वह तुम्हे खाना है बस।</p>
<p><strong>कार्य दो प्रकार से होते है</strong></p>
<p>करने योग्य कार्य दो प्रकार से होते हैं, धर्म या करने योग्य कहो, एक ही बात है। जो-जो करने योग्य है वे-वे सब धर्म है और जो जो करने योग्य नहीं है और करने का मन होता है तो अधर्म है। अब इस दुनिया मे क्या करने योग्य है, क्या नहीं, इसकी दृष्टि कैसे बनाये तो जैन दर्शन ने सूत्र दिया-तुम कौन हो? हर व्यक्ति ये जानने का प्रयास कर रहा है कि मुझे क्या करना चाहिए, क्या जानना चाहिए? मुझे क्या बोलना, पढ़ना चाहिए? मैं क्या देखूँ, सुनूँ ये समझ नही आ रहा।</p>
<p><strong>अच्छे कुल की परिभाषा जिसमें अनैतिक कार्य नहीं होते </strong></p>
<p>साधु के लिए कहा कि पहले यह मत देखना कि विधि है या नहीं, पहले ये देखना कि इसके हाथ से आहार लेने लायक है या नहीं, कौन से कुल का है। साधु तुम्हारे सामने क्या मानकर खड़ा हुआ है कि तुम बहुत अच्छे कुल के हो, पात्र हो, जैन हो। अच्छे कुल की परिभाषा क्या है जिसमें मांसाहार, शराब, अभक्ष्य सेवन, अनैतिक कार्य नहीं होते। पर इससे बड़ी शर्म क्या होगी कि साधुओ को पूछना पड़ता है कि तुम रात में तो नहीं खाते, शराब तो नहीं पीते। कई बार निकल भी आते है। आज के समय में अनजाने चौके में हम साधु नहीं जा सकते। वही साधु आहार को उठ सकता है कि जिस साधु को इतना निमित्त ज्ञान हो, जो देखते ही पता कर ले कि ये कौन है।</p>
<p><strong>मोबाइल के अंदर चित्र से तुम्हारे अंदर का चरित्र पता चल रहा </strong></p>
<p>इस घर का क्या चरित्र है, ये उस घर मे टँगे हुए चित्रों से पता चल जाता है। कोई कहे कि मैं अपने मोबाइल में माँ का फोटो लगाता हूँ नेचुरल रूप से, बस मैं आंख बंद करके कह दूँगा ये व्यक्ति कभी माँ को दुख नहीं दे सकता, चाहे कितनी भी उद्दंड पत्नी आ जाए क्योंकि ये बार-बार माँ को देखना चाह रहा है। यदि पति नेचुरल रूप से मोबाइल में अपनी पत्नी का चित्र लगाता है तो वह निश्चिंत रहे तुम्हारा पति कंही नही जाएगा क्योंकि वह दिन में दो हजार बार तुम्हारा चेहरा देख रहा है, फिर भी बोर नहीं हो रहा। यदि पिता, बेटे बिटिया का चित्र लगाए है तो वह बेटे बिटिया निश्ंिचत रहे, तुम्हारा पिता तुम्हे अनाथ नहीं होने देगा। यदि भक्त सालों से गुरु का फोटो लगाए है तो यह निश्चित है कि यह सब कुछ छोड़ सकता है लेकिन गुरु को नहीं छोड़ पायेगा। मोबाइल के अंदर चित्र से तुम्हारे अंदर का चरित्र पता चल रहा है कि तुम किसको चाहते हो।</p>
<p><strong>भगवान की छाया तुम्हारे सिर पर मिलेगी </strong></p>
<p>भगवन से कहना है कि तू सर्वज्ञ है देख ले मेरे घर में, मेरे मोबाइल में, मेरे सीने में, मेरे मन मे, मेरे वचन में, मेरी काया में, कभी भी स्वप्न में मैंने किसी का चित्र नहीं चाहा, सब जगह आपका चित्र है, 6 महीने करके देख लीजिए, शांतिनाथ भगवन आपके हो जायेगे। आप घनघोर जंगल मे भी रहेंगे और जैसे ही आप शांतिनाथ भगवान का नाम लेकर उनकी मूर्ति याद करेंगे, वही शांतिनाथ भगवान की छाया तुम्हारे सिर पर मिलेगी।</p>
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		<title>सबसे अधिक भय उस व्यक्ति को है जो सबसे ज्यादा सुखी: मुनिश्री सुधासागर जी के प्रवचनों में धर्म प्रभावना से लबरेज हो रहे भक्त </title>
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		<pubDate>Fri, 28 Mar 2025 07:49:21 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज के प्रवचनों में जैन समाज के श्रावक-श्राविकाओं की अपार मौजूदगी ने धर्म सभा का पूरा लाभ अर्जित किया है। गुरुवार को मुनि श्री सुधासागर जी के प्रवचनों में नियम, संयम, धैर्य, कर्तव्य और धर्म आराधना के संदेश दिए जा रहे हैं। इससे सकल जैन समाज लाभान्वित हो रहा है। [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज के प्रवचनों में जैन समाज के श्रावक-श्राविकाओं की अपार मौजूदगी ने धर्म सभा का पूरा लाभ अर्जित किया है। गुरुवार को मुनि श्री सुधासागर जी के प्रवचनों में नियम, संयम, धैर्य, कर्तव्य और धर्म आराधना के संदेश दिए जा रहे हैं। इससे सकल जैन समाज लाभान्वित हो रहा है। <span style="color: #ff0000">कटनी से पढ़िए राजीव सिंघई मोनू और शुभम पृथ्वीपुर की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>कटनी</strong>। मुनिश्री सुधासागर जी ने गुरुवार को अपने प्रवचनों में मौजूद भक्तजनों से कहा कि सबकुछ हमारे पास है लेकिन, डर लग रहा है कि कहीं यह चला न जाए। हम जिंदा हैं तो हमें जिंदा रहने की खुशी नहीं है। हमें मरने का डर लग रहा है। सब मिला भी तो हम निर्भय नहीं हो पाए, सब पाने के बाद भी हम कंगाल बने रहे। बच्चा घूमने जा रहा है लेकिन, डर है कि कहीं कुछ गड़बड़ न हो जाए। नियम लेने के बाद डर रहता है कि कहीं नियम न टूट जाए। सबसे ज्यादा भय वो व्यक्ति कर रहा है जो सबसे ज्यादा सुखी है। पूज्य समंतभद्र स्वामी ने कहा कि सर्वस्व तुम्हारे पास है लेकिन, सर्व भौमपना तुम्हारे पास नहीं है। हमने जो कुछ भी पाया है, अपने लिए पाया है, हमने कभी जगत की चिंता नहीं की। हमने सबको लूटकर अपने को धनी को बनाया है। सब की तरफ ध्यान न देकर खुद सुखी बनने का प्रयास किया है, आप सुखी नहीं रह पाओगे। या तो तुम एक नियम ले लो-न देना न लेना, मगन रहना। हमें किसी से कुछ लेना नहीं, हम किसी को कुछ देंगे नहीं।</p>
<p><strong>दुनिया में तेरी आत्मा से अच्छी कोई हो ही नहीं सकती</strong></p>
<p>आचार्य समंतभद्र स्वामी ने भगवान की स्तुति करते हुए लिखा कि भगवन जब से आपने दीक्षा ली है, केवलज्ञान, मोक्ष प्राप्त किया, आप जागते ही रहते हैं। सोते ही नहीं, क्या देख रहे हो आप इन आंखों से, इसलिए ये निर्णय समझो कि साधु को दिखता नहीं, सो मत समझना। साधु के देखने की इच्छा नहीं है, सो भी मत समझना, बस इतना सा है कि कुंदकुंद भगवान कहते हैं कि इसके मन मे धारणा बैठ गई है कि दुनिया को क्या देखूं, मेरे से ज्यादा सुंदर दुनिया हो ही नहीं सकती। जब मैं अपनी आत्मा को देखता हूं तो सारा संसार फीका लगता है। तुम दुनिया में खोज रहे हो कि तुमसे अच्छा कौन है? दुनिया में तेरी आत्मा से अच्छी कोई हो ही नहीं सकती। बस यहां से होती है सिद्धि, अब कोई तुम्हें अंधा नहीं कर पाएगा, अब तुम कभी बोर नहीं हो सकते क्योंकि, अपनी आत्मा को देखना है, अपनत्व लाओ, हम पर को देखते है इसलिए थकते हैं। स्व को देखो, एक मां बेटे को देखते हुए नहीं थकती है क्योंकि, वो अपना है। साधु क्यों नहीं थक रहा है क्योंकि, वह अपनी आत्मा को देख रहा है।</p>
<p><strong>ऐसी धारणा बनाओ कि मेरे पास वह सबकुछ है </strong></p>
<p>सारी दुनिया से चोरी बंद हो सकती है बस एक भावना तुम्हें भाना है कि हे भगवन! जगत में हर व्यक्ति के पास इतना हो कि उसे चोरी करने की जरूरत ही न पड़े। जिस पर उसकी नियत जाए वो पहले से उसके पास है और बल्कि उससे अच्छा है। जब सारी दुनिया ऐसी हो जाएगी तो तुम्हे धन पाकर लुटने का डर रहेगा, नहीं क्यों? लूटने वाला कहेगा कि उसके पास क्या है जो मेरे पास नहीं है। जब भी तुम्हारी पर पर दृष्टि जाए तो एक धारणा बना लेना- मेरे पास जो है, उससे ज्यादा दुनिया के पास नहीं है। पर की तरफ दृष्टि जाना बता रहा है कि यह कंगाल है, तुम ऐसी धारणा बनाओ कि मेरे पास वह सबकुछ है, जो दुनिया के पास है, इसलिए मैंने साधना शुरू कर दी है कि न मुझे किसी से लेना है, न किसी को कुछ देना है।</p>
<p><strong>90 प्रतिशत बड़े आदमी और उनके बच्चे दुर्गुणी होते हैं</strong></p>
<p>आप नियम ले लो कि मैं सुख के दिनों में मंदिर नहीं आऊंगा, अमीरी में मैं दान नहीं करूंगा, जो पैसा है, उससे मौज मस्ती करूंगा, ठीक है अभी तेरे पुण्य का उदय है, इसलिए ऐसा कह रहा है लेकिन, जब गरीबी में दुःख के दिन तुम्हारे जिंदगी में आए तो मंदिर नहीं आना। 90 प्रतिशत बड़े आदमी और उनके बच्चे दुर्गुणी होते हैं। जब तुम्हारे जीवन में इतना पुण्य आ जाए, तुम्हारा इतना व्यापार चलें कि तुम्हे मंदिर जाने को, प्रवचन सुनने को समय न मिले तो मैं तुरंत समझ जाता हूं कि इसका पुण्य कह रहा है कि इसको मत बुलाओ, इसको हमें दुर्गति भेजना है। यदि तुम कमजोर हो और दुश्मन से बदला नहीं ले सकते हो तो तुम उसके हो जाओ। हर व्यक्ति चाहता है कि सारी दुनिया अच्छी हो मुझे छोड़ करके। यदि तुम रावण बनकर सीता को चाह रहे हो तो तुम धूल में मिल जाओगे, भस्म हो जाओगे। तुम राम बन जाओ, सीता को तुम्हें खोजना नहीं पड़ेगा, सीता तुम्हारे पास खुद मिल जाएगी। राम बनने की साधना नहीं हो रही और सब सीता चाहते हैं और साधना ये कहती है कि राम बनो, तुम सीता को नहीं चाहोगे, सीता तुम्हें चाहेगी।</p>
<p><strong>&#8230;क्योंकि गरीब बनकर भीख तो मांग लेगा</strong></p>
<p>जो-जो व्यक्ति तुम्हारी जिंदगी में आए और वह तुम्हें बीच में छोड़कर मर जाए। समझ लेना यह पूर्व भव का बैरी आया था जो तुम्हें मझधार में छोड़कर चला गया। तुम पति-पत्नी हो और पत्नी बीच में छोड़कर चली गई तो समझना भाई पूर्व की बैरन है। जो तुम्हें दुःख लेकर चल गई कि न तुम इधर के रहे, न उधर के। मां बेटे को भी छोड़कर जा सकती है। इसी तरह धन कहता है कि मैं तुम्हे बर्बाद करके रहूंगा, गरीब बनाकर नहीं, क्योंकि गरीब बनकर भीख तो मांग लेगा। कर्म कहता है मैं अमीर बनाकर मारूँगा, मैं तुझे इतना धन दूंगा कि चोर आकर सारे घर को सुलाएगा और सबकुछ लूट ले जाएगा। वो धन तुम्हारा बैरी बनकर आया था जबकि तुमने उसे अपना माना था क्योंकि, पूर्वभव में तुमने धन का अनादर दुरूपयोग किया था। तुमने धन से इतने पाप किए कि धन कहता है ले, यही धन तेरी मौत का कारण बनेगा।</p>
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		<title>आत्मसिद्धि के सामने संसार की कोई सिद्धि बड़ी नहीं हो सकतीः मुनि श्री सुधासागर जी ने अपने प्रवचन में दिए महत्वपूर्ण संदेश </title>
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		<pubDate>Tue, 25 Mar 2025 07:03:56 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मुनिश्री सुधासागर जी महाराज इन दिनों कटनी क्षेत्र के बहोरीबंद तीर्थ में प्रवचन कर रहे हैं। उन्होंने सोमवार को समयसार का महत्व बताया। महाराजश्री के प्रवचन सुनने के लिए बड़ी संख्या में लोग पहुंच रहे हैं। कटनी से पढ़िए राजीव सिंघई मोनू की यह खबर&#8230; कटनी। मुनिश्री सुधासागर जी महाराज ने धर्म सभा को संबोधित [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>मुनिश्री सुधासागर जी महाराज इन दिनों कटनी क्षेत्र के बहोरीबंद तीर्थ में प्रवचन कर रहे हैं। उन्होंने सोमवार को समयसार का महत्व बताया। महाराजश्री के प्रवचन सुनने के लिए बड़ी संख्या में लोग पहुंच रहे हैं। <span style="color: #ff0000">कटनी से पढ़िए राजीव सिंघई मोनू की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>कटनी।</strong> मुनिश्री सुधासागर जी महाराज ने धर्म सभा को संबोधित करते हुए कहा कि जब व्यक्ति असमर्थ होता है तो उसे बहुत कुछ करने का भाव आता है और जब व्यक्ति समर्थ होता है तो उसे सोने का या नहीं करने का भाव आता है। पूज्य कुंदकुंद स्वामी ने बार-बार पुण्य से बचने को कहा है। व्यक्ति पाप कर्म से तो डरता है कि मेरे जीवन में अशुभकर्म का उदय न आए लेकिन, कोई शुभ कर्म से नही डरता, ये सबसे बड़ी कमजोरी है। गरीबी से डरता है, अमीरी से नहीं डरता, अंधा होने से डरता है, नेत्रवान होने से नहीं डरता। जिसकी शादी नहीं हुई वो दुःखी हो रहा है लेकिन, जिसको अच्छी पत्नी मिली, वो दुःखी नहीं हो रहा है। हम अशुभकर्माे में दुःखी हुए, कभी पुण्यकर्म में दुःखी नहीं हुए, इसलिए आज तक अपना कल्याण नहीं हुआ।</p>
<p><strong>समयसार में आत्मसिद्धि बताई</strong></p>
<p>जो प्रकृति के, काल के, किस्मत के भरोसे रहते हैं, वो कभी जिंदगी में विकास नहीं कर सकते। सामने वाला इतना हावी है कि मैं कुछ नहीं कर सकता, ऐसा भाव तुम्हें आ जाए तो तुम कुछ काम के नहीं हो, तुम्हारा डाउन फॉल चालू हो जाएगा। जब-जब तुम्हें लगे कि कोई ऊपरी बाधा है, समझ लेना तुम्हारी सारी शक्तियां खत्म हो गई। जब-जब तुम निमित्त बुद्धि या पर बुद्धि लाए, तुम्हारा आत्मा का सबकुछ नाश हो जाता है। समयसार में आत्मसिद्धि बताई- आत्मा को वश में करो। आत्मसिद्धि के सामने संसार की कोई सिद्धि बड़ी नहीं हो सकती। जो सिद्धि अपनी आत्मा में है, जो मैं कर सकता हूं। मेरा काम सारी दुनिया मिलकर आ जाए तो भी नहीं कर सकती। सारी दुनिया मुझे सुखी-दुःखी नहीं कर सकती। समयसार पढ़ने वाले को मौत भी दुखी नहीं कर सकती।</p>
<p><strong>याद रखना रास्ता स्वयं बदनाम नहीं होता, रास्ता बदनाम होता</strong></p>
<p>लोगों ने देखा कि जब तक समयसार नही पढ़ते थे तब तक वे लोग मुनियों के लिए चौका लगाते थे, जिनेंद्र भगवान की पूजा करते थे लेकिन, देखा कि समयसार पढ़ने के बाद इनमे ये परिवर्तन आने लगा कि मुनियों को आहार देना, पूजा करना ये व्यवहार है, जड़ की क्रिया है, ये मानकर छोड़ दिया तो तब से लोगों ने संस्था विशेष से छपे समयसार को मंदिरों से बाहर निकाल दिया। याद रखना रास्ता स्वयं बदनाम नहीं होता, रास्ता बदनाम होता है रास्ते पर चलने वालों के कारण। यदि मुनियों को आहार देना व्यवहार की क्रिया है तो क्यों न मुनि स्वयं आहार बनाने लगे? 187 दिन तक ऋषभदेव घूमते रहे तीन अंजुली रस के लिए, उस समय जंगलों में गन्ने अपने आप होते थे, रस स्वयं अपने आप टपकता था, अंजुली लगाकर स्वयं से ले लेते, बेवजह परेशान हुए। क्यों नही किया? कैसा है जैनधर्म, 187 दिन घूमते रहे लेकिन, जब तक श्रावक नवधाभक्ति पूर्वक नहीं देगा, जिंदगी भर निराहार रह जाएगा, दिगंबर मुनि लेकिन, अपने हाथ से आहार ग्रहण नहीं करेगा।</p>
<p><strong>आप लोगों को धर्म की क्रिया में आगे बढ़ना चाहिए</strong></p>
<p>मैं तुमसे वादा करता हूं कि समयसार को मंदिरों में फिर से उच्चासन दिलवाऊंगा, बस एक काम तुम लोग कर लो, जितना जितना तुम लोग समयसार पढो, उतना उतना आप लोगों को धर्म की क्रिया में आगे बढ़ना चाहिए। अभी दर्शन करते थे, अब पूजा अभिषेक करना। अभी रात में पानी पीते थे, अब वो भी छोड़ देना। मुनियों को तो छोड़ो त्यागी व्रतियों का भी सम्मान करना, यदि समयसार को चाहते हो तो इतना बलिदान दे दो क्योंकि, समयसार के बहिष्कार का मूल कारण है समाज का बिगड़ना तो तुम बस सन्मार्ग पर आकर दिखा दो। अपने पूज्य समयसार ग्रंथ के लिए इतना तो तुम कर ही सकते हो।</p>
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		<title>जिंदगी में एक बार बैलगाड़ी से शिखरजी की वंदना करना: मुनिश्री सुधासागर जी ने जन्म कल्याणक पर दिए प्रभावी संदेश </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 24 Mar 2025 07:19:04 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मुनिश्री सुधासागर जी इन दिनों कटनी क्षेत्र के बहोरीबंद अतिशय क्षेत्र में धर्म प्रभावना के साथ मंगल संदेश से जैन जनमानस को सजग और उपकृत कर रहे हैं। भगवान आदिनाथ जी के जन्म कल्याणक पर भी उन्होंने जैन समाज को प्रभावी संदेश देकर भगवान आदिनाथ की शिक्षाओं का स्मरण करवाया। कटनी बहोरीबंद से पढ़िए राजीव [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>मुनिश्री सुधासागर जी इन दिनों कटनी क्षेत्र के बहोरीबंद अतिशय क्षेत्र में धर्म प्रभावना के साथ मंगल संदेश से जैन जनमानस को सजग और उपकृत कर रहे हैं। भगवान आदिनाथ जी के जन्म कल्याणक पर भी उन्होंने जैन समाज को प्रभावी संदेश देकर भगवान आदिनाथ की शिक्षाओं का स्मरण करवाया। <span style="color: #ff0000">कटनी बहोरीबंद से पढ़िए राजीव सिंघई मोनू की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>कटनी</strong>। मुनि श्री सुधासागर जी महाराज ने भगवान आदिनाथ के जन्म और तप कल्याणक का गूढ़ रहस्य बताया। उन्होंने धर्म सभा में कहा कि जब-जब हमें यह भाव आता है कि संसार का सबसे बड़ा धनी आदमी मैं बनूं समझ लेना तुमने संसार में सबसे बड़ा कंगाल बनने का बीज बो दिया। तुमने यह भाव किया कि संसार का सबसे बड़ा आदमी मैं बनूं यही कंगाली का लक्षण है। तुम्हारे मन मंे भाव आया कि मैं सबसे संसार का सबसे बड़ा ज्ञानी बनूं तो समझ लेना तुम संसार की सबसे बड़े मूर्ख बनोगे, तुमसे ज्यादा मूर्ख कोई नहीं होगा। तुम चाहते हो कि मेरा परिवार सबसे बड़ा हो, एक दिन तुम अकेले बचोगे। हर चीज में यह लगा लेना तुम संसार से आगे दौड़ना चाहते हो, सबसे बड़े पतन का कारण बनता है। किसी भी क्षेत्र में किसी को पीछे करके आगे आना यह पतन का लक्षण है, मन में भाव मत लाना, वचन व काया से भी नहीं। ये ‘सबसे’ शब्द खतरनाक है।</p>
<p><strong>एक काम करो ईष्या मत करो</strong></p>
<p>हमारे विफल होने का कारण क्या है? हम अच्छा होना चाहते हैं, हो ही नहीं पा रहे। हम अच्छा सोचना चाहते हैं, सोच ही नहीं पा रहे। इन सबके पीछे एक शब्द की अपनी गलती हुई है। हमेशा हमने हर चीज के पीछे ‘सबसे’ शब्द लगा दिया, आज हमें आदिनाथ जयंती पर यह सबसे शब्द का त्याग करना है। स्पर्धा व ईष्या यह दोनों हमारे पतन का कारण बनते हैं। ईष्या में समाने वाले को रोक रहा है और स्पर्धा में वह उसको पीछे कर रहा है। ईष्या तो इतनी खतरनाक है कि स्वयं बढ़ने का भाव नहीं कर रहा है। ये क्यों बढ़ रहा है। मेरा सम्मान नहीं हो रहा है। इसका गम्य नहीं, इसका क्यों हो रहा है, इसको कभी जीवन में पनपने मत देना। तुम कुछ नहीं कर सकते तो कम से कम एक काम करो- ईष्या मत करना। ईष्या ऐसी अग्नि है जो जलाकर भस्म कर देती है।</p>
<p><strong>अधिक गुण लाओ तो जनता तुम्हारी जय करेगी</strong></p>
<p>इसका विकल्प मत करो कि मैं जुगनू हूं। बस एक विकल्प छोड़ दो कि मैं कभी सूरज को हटाने का भाव नहीं करुंगा क्योंकि, यदि सूरज हट गया तो इस अंधकार को कौन संभालेगा। पहले उसके गुण सीखो कि यह बड़ा आदमी क्यों है, वे सारे गुण अपने में लाओ, बराबरी के बन जाओ, फिर हटाओगे तो जनता तुम्हारे लिए कुछ नहीं कहेगी, वो हट गया, ये आ गया और पूजा करवाना चाहते हो तो जिसको तुम हटाना चाहते हो, उसमें जितने गुण हैं। उससे अधिक गुण लाओ तो सारी जनता तुम्हारी जय जयकार करेगी।</p>
<p><strong>पीछे करने का भाव मत करना</strong></p>
<p>स्पर्धा करने से हमारा डाउनफॉल चालू हो जाएगा। जो हमारे पास ताकत है, यह भी हम खो देंगे, अभी हम चमक रहे हैं, हम जुगनू भी नही रहेंगे क्योंकि, हमने सूरज से स्पर्धा की है। कभी पुण्यात्मा को पीछे करने का प्रयास मत करना। जब तुम्हें महसूस हो कि सामने वाला हमसे बड़ा है, धन में, पद में, बल में, तप में किसी भी चीज में बड़ा है तो कभी उसको पीछे करने का भाव मत करना, उसका कुछ नही बिगड़ेगा। आगे बढ़ना है लेकिन सबसे आगे नहीं। अमीर बनना है सबसे ज्यादा अमीर नहीं, ज्ञानी बनना है लेकिन, सबसे ज्यादा ज्ञानी नहीं। यदि तुम सबसे आगे हो तो किसी दिन भीड़ तुम्हें तुम्हें कुचल देगी क्योंकि, तुम पुण्यात्मा को पीछे करके आगे आए हो। सावधान तुम ट्रॉले के आगे चल रहे हो।</p>
<p><strong>सवाल यह कि तुमसे कितने लोग सुखी हैं </strong></p>
<p>सवाल यह नहीं है कि तुम सुखी हो? सवाल यह है कि तुमसे कितने लोग सुखी हैं। तुम कितने बड़े पापी बने रहना, तुम कितने ही गंदे बने रहना, मैं तुम्हें निकाल लूंगा बस एक ध्यान रखना- तुम्हारे पापी होने से कितने लोग पापी हो जाएंगे। तुम्हारे दुःखी होने से कितने लोग दुखी हो रहे हैं। तुम्हारे गलत रास्ते पर चलने से कितने लोग गलत रास्ते पर चले जाएंगे। बस अब हमारे पास कोई रास्ता नहीं, तुम पापी हो, बचा लूंगा लेकिन, तुम्हारे पाप से दूसरा भी पापी हो रहा है, अब नहीं बचोगे। तुम्हें गलत रास्ते पर जाना है तो पहले पीछे देखो, वो भीड़ तुम्हारे पीछे तो नहीं आएगी।</p>
<p><strong>आदिनाथ भगवान कहते हैं कि तुम कितनों को ज्ञानी बना सकते हो</strong></p>
<p>हमें मंजिल मिले या न मिले लेकिन, हमें मंजिल का रास्ता बनाना आना चाहिए। किसी को उठाकर मंजिल तक ले जाने की ताकत तुम में नहीं है, कम से कम जहां से तुम चलो, उस रास्ते को बना देना तो भी तुम तीर्थंकर कहलाओगे। तुम्हारे पास जो कुछ भी है उन चीजों से तुम कितनों को वो बना सकते हो जो तुम्हारे पास है। ज्ञान तुम्हारे पास है, आदिनाथ भगवान कहते हैं कि तुम कितनों को ज्ञानी बना सकते हो। जिनको तुम ज्ञान दोंगे, उसमे तुम्हारा अपमान होगा, तुम्हे नीचे उतरना पड़ेगा। तीर्थंकर कहते है यदि मेरे दीपक से किसी का दीपक जलता है तो मैं झुकने को तैयार हूं। ये प्रसंशनीय नहीं कि तुम्हारे पास दीपक है, ये बताओ इस दीपक से तुम कितने दीपक जला सकते हो।</p>
<p><strong>जैनियों के यहां खेती जरूर होना चाहिए</strong></p>
<p>यदि खेती करना पाप होता तो तीर्थंकर जैसी महान आत्माएं कभी खेती का उपदेश नहीं देती। उन्होंने खुद सिखाया। आज दुनिया में जितने बूचड़ खाने खुल रहे हैं, जितने नंदी कट रहे हैं, ये सब वो ही पापी हैं, जो खेती ट्रैक्टर से कर रहे हैं। तुम मात्र एकंेद्रियों को बचा रहे हो और सारे बैल कटने जा रहे हैं, बूचड़खाने। यदि हल से खेती होने लग जाए तो सारे बैल बच जाएंगे। आज गाय को पालने में सबसे बड़ा प्रश्न है कि बछड़े का क्या करेंगे तो उसके लिए खेती ही एक मात्र सहारा है। ऋषभदेव ने बैल का उपदेश इसलिए दिया है। अन्यथा ये बैल कटेंगे, वे अवधिज्ञानी थे गाड़ी का, ट्रेक्टर का उपदेश दे सकते थे। जैनियों के यहां खेती जरूर होना चाहिए या तो तलवार उठाओ या फिर हल उठाओ। जिंदगी में एक बार बैलगाड़ी से शिखरजी की वंदना करना और गाड़ी से जिंदगी भर की हजारों वंदना करना, वो एक वंदना श्रेष्ठ हैं, क्योंकि बैल की बचत है।</p>
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