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	<title>उपदेश &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<title>उपदेश &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>जीवन में अनुशासन संस्कार से होती है सुख शांति : आचार्य श्री वर्धमान सागरजी ने श्यामनगर में दी मंगल देशना  </title>
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		<pubDate>Wed, 22 Apr 2026 12:49:41 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[श्याम नगर जयपुर के आदिनाथ मंदिर में प्रवचन में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने मैत्री, अनुशासन, संस्कार, जीवन शैली में बदलाव आदि बातों पर उपदेश में बताया कि सभी जीवों से मैत्री” छोटा हो या बड़ा, मनुष्य हो या तिर्यंच (पशु-पक्षी) देव हो या अन्य जीव सबके प्रति एक ही भावना-सभी सुखी रहें। जयपुर [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>श्याम नगर जयपुर के आदिनाथ मंदिर में प्रवचन में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने मैत्री, अनुशासन, संस्कार, जीवन शैली में बदलाव आदि बातों पर उपदेश में बताया कि सभी जीवों से मैत्री” छोटा हो या बड़ा, मनुष्य हो या तिर्यंच (पशु-पक्षी) देव हो या अन्य जीव सबके प्रति एक ही भावना-सभी सुखी रहें। <span style="color: #ff0000">जयपुर से पढ़िए, राजेश पंचोलिया की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>जयपुर</strong>। श्याम नगर जयपुर के आदिनाथ मंदिर में प्रवचन में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने मैत्री, अनुशासन, संस्कार, जीवन शैली में बदलाव आदि बातों पर उपदेश में बताया कि सभी जीवों से मैत्री” छोटा हो या बड़ा, मनुष्य हो या तिर्यंच (पशु-पक्षी) देव हो या अन्य जीव सबके प्रति एक ही भावना-सभी सुखी रहें। मित्रता सीमित होती है (कुछ लोगों तक), उसमें शत्रुता भी हो सकती है लेकिन मैत्री सर्वव्यापी (सबके लिए) इसमें किसी के प्रति बैर नहीं होता। घर से ही शुरू होती है साधना हम बाहर तो बड़ी-बड़ी बातें करते हैं लेकिन घर में ही झगड़े होते हैंपति-पत्नी में मतभेद परिवार में टकराव जब घर में शांति नहीं तो बाहर की बातें व्यर्थ हैं।</p>
<p><strong>पहले सादगी थी मर्यादा थी</strong></p>
<p>सुरेश सबलावत ने बताया कि आचार्य श्री ने आगे कहा कि अनुशासन जीवन शास्त्र के अनुसार चलना चाहिए। जब जीवन में अनुशासन होगा तब ही सुख और शांति आएगी। बिना अनुशासन टकराव और अशांति निश्चित है। हमारी जीवन शैली भी बदल गई है। चूल्हा, गैस से श्रम कम होकर आराम होकर व्यायाम के अभाव में शरीर कमजोर (जैसे घुटनों की समस्या) हो रहा है। अपने घर का वातावरण कैसा है? शांति है या तनाव? संस्कार हैं या केवल सुविधा? पहले सादगी थी,मर्यादा थी ,आज टीवी, मोबाइल, सुविधाएँ लेकिन, इनका सही उपयोग ही लाभकारी है। बच्चों को कैसे संस्कारित करें। बच्चों को उपदेश से नहीं अपने आचरण से सिखाएं खुद मोबाइल छोड़ेंगे,बच्चे सीखेंगे, खुद संयम रखेंगे, बच्चे अपनाएंगे। भोजन करते समय ध्यान होना चाहिए तभी स्वाद और स्वास्थ्य दोनों मिलते हैं। जब आपका जीवन आदर्श बनेगा लोग अपने आप प्रेरित होंगे धर्म केवल बोलने की चीज नहीं जीने की चीज है।</p>
<p><strong>अपने जीवन को श्रेष्ठ बनाने के उद्देश्य से एकत्रित हुए हैं</strong></p>
<p>मैत्री भाव अपनाओ घर से शुरुआत करो बच्चों को आचरण से सिखाओ याद रखें। पहले स्वयं बनो, फिर संसार बदलेगा संघस्थ आर्यिका महायशमती माताजी ने प्रवचन में श्रावक, श्राविकाओं के कर्तव्य, आने वाली पीढ़ी के प्रति दायित्व, देव दर्शन धर्म के संस्कार आदि पर सरल भाषा में प्रभावी उपदेश में बताया कि आप सभी यहां अपने जीवन को श्रेष्ठ बनाने के उद्देश्य से एकत्रित हुए हैं। जब से आचार्य श्री का जयपुर महानगर में पदार्पण हुआ है, तब से निरंतर ज्ञान की गंगा प्रवाहित हो रही है और आप सभी उस ज्ञान में डुबकी लगाकर अपने जीवन को पावन बना रहे हैं। श्रावक-श्राविकाओं के मुख्य कर्तव्य हैं-देव पूजा, गुरु भक्ति (वैयावृत्य)। श्याम नगर में यह देखकर अत्यंत प्रसन्नता होती है कि यहां जिनागम अनुसार अभिषेक, पूजन और आराधना की परंपरा निरंतर चल रही है। आने वाली पीढ़ी के लिएअब हमारा कर्तव्य है कि अपने बच्चों को धर्म से जोड़ें। उन्हें प्रतिदिन जिनेंद्र भगवान के दर्शन कराएं ।</p>
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		<title>सच्चे सुख का स्वाद लेना है तो आकिंचन्य धर्म का पालन करें : आर्यिका मां विकुंदन श्री ने बड़वानी में उत्तम आकिंचन्य धर्म पर दिया उपदेश  </title>
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		<pubDate>Sat, 06 Sep 2025 04:59:34 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जब तक आपके जीवन ने आकिंचन्य धर्म नहीं आएगा आप सच्चे सुख के स्वाद को नहीं चख पाओगे। यह उद्गार बड़वानी में विराजित आचार्य विराग सागर जी महाराज की शिष्या आर्यिका मां विकुंदन श्री ने व्यक्त किए। धामनोद से पढ़िए, दीपक प्रधान की यह खबर&#8230; धामनोद। जब तक आपके जीवन ने आकिंचन्य धर्म नहीं आएगा [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जब तक आपके जीवन ने आकिंचन्य धर्म नहीं आएगा आप सच्चे सुख के स्वाद को नहीं चख पाओगे। यह उद्गार बड़वानी में विराजित आचार्य विराग सागर जी महाराज की शिष्या आर्यिका मां विकुंदन श्री ने व्यक्त किए। <span style="color: #ff0000">धामनोद से पढ़िए, दीपक प्रधान की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>धामनोद।</strong> जब तक आपके जीवन ने आकिंचन्य धर्म नहीं आएगा आप सच्चे सुख के स्वाद को नहीं चख पाओगे। यह उद्गार बड़वानी में विराजित आचार्य विराग सागर जी महाराज की शिष्या आर्यिका मां विकुंदन श्री ने दस लक्षण पर्व के नौवें दिन उत्तम आकिंचन्य धर्म पर उपदेश देते हुए कही। उन्होंने कहा कि आपको सब छोड़कर मोक्ष मार्ग पर चलना है। आप बाहर से कितना ही छोड़ दो, जब तक अंदर की मूर्छा शांत नहीं होगी। तब तक आकिंचन्य धर्म प्राप्त नहीं होगा। मूर्छा परिग्रह से काम, क्रोध और क्रोध से हिंसा होती है और हिंसा से दुर्गति का मार्ग मिलता है। उन्होंने कहा कि आचार्य कहते है आकिंचन धर्म को अपने अंदर धारण करो। जब तक अपने सारे परिग्रह छोड़ोगे नहीं उत्तम आकिंचन धर्म नहीं आ सकता।</p>
<p><strong>उसकी बोरी खाली हुई तो गुरु के पास शिखर पर पहुंचा शिष्य </strong></p>
<p>पूज्य माताजी ने दृष्टांत देते हुए बताया कि एक व्यक्ति अपने गुरु के पास गया और उनसे कहा कि मैने अपना घर, बार, पैसा, संपत्ति, जमीन जायदाद, माता-पिता, भाई-बहन, रिश्ते नातेदार सब छोड़ दिए पर मुझे अभी तक परमेश्वर के दर्शन नहीं हुए। तब गुरु ने शिष्य से कहा कि मैं तुम्हें सब ऊपर पर्वत के शिखर पर सब बताऊंगा और पर्वत के शिखर पर जाने के बाद गुरु ने अपने शिष्य को कहा कि तुम एक बोरी में कंकर और पत्थर लेकर चढ़ोगे गुरु की आज्ञा से वह शिष्य एक बोरी में पत्थर और कंकड़ लेकर जल्दी जल्दी पहाड़ पर चढ़ने की कोशिश करने लगा किंतु बोरी में भरा वजन होने से चढ़ने में दिक्कत आ रही थी तो उसने उस बोरी में से कंकड़ पत्थर छोड़ता गया और धीरे-धीरे ऊपर चढ़ता गया और वो जैसे ही खाली होता गया वो जल्दी ऊपर की ओर चढ़ता गया और जैसे ही उसकी बोरी खाली हुई तो वो गुरु के पास शिखर पर पहुंच गया।</p>
<p><strong>ये शिक्षा केवल श्रमण के लिए ही नहीं श्रावक के लिए भी है</strong></p>
<p>तब गुरुजी ने उससे पूछा कि तुमको मैने कंकड़ पत्थर लाने के लिए कहा था तो तुम नहीं लाए तब शिष्य बोला कि मैने आपके वचनों का पालन तो किया, लेकिन रास्ते में मैं उसे छोड़ते आया ,तब गुरु जी ने समझाया कि तुम्हारे पास परिग्रह का वजन था। उसको छोड़ा तब तुम ऊपर आ पाए। उसी प्रकार हमारे अंदर जो परिग्रह का वजन है उसे हम छोड़ेंगे नहीं तब तक हमे भी परमात्मा की नजदीकी नहीं मिलेगी और जैसे-जैसे परिग्रह को छोड़ोगे परमात्मा के निकट पहुंचते जाओगे। आप थोड़े से भी परिग्रहवान, मूर्छावान है वो आपके लक्ष्य में बाधक होगा। ये शिक्षा केवल श्रमण के लिए ही नहीं श्रावक के लिए भी है।</p>
<p><strong>अपना जीवन एक रंगमंच है </strong></p>
<p>आर्यिका श्री ने कहा कि आप लोभ कषाय को छोड़ कर तप त्याग की कसौटी पर खरे नहीं उतरोगे। तब तक उत्तम आकिंचन्य धर्म आपके भीतर प्रवेश नहीं करेगा । नाकिंचनम ही आकिंचन्म याने मेरा कुछ नहीं है ये ही आकिंचन धर्म है। अपना जीवन एक रंगमंच है और उसमें से एक एक दिन खत्म हो रहा है और हम मैं-मैं कर रहे हैं जबकि, कुछ भी हमारा नहीं है। एक दिन सब समाप्त हो जाएगा। इसलिए समय रहते हुए संभल जाओ अपने अंदर की कषाय को छोड़ दो। आज प्रातः भगवान के अभिषेक, शांतिधारा, आरती, पूजन संपन्न हुई। दोपहर को माताजी ने तत्त्वार्थ सूत्र का स्वाध्याय करवाया,शाम को प्रतिक्रमण और आरती शास्त्र प्रवचन हुए।</p>
<p><strong>अनंत चतुर्दशी पर होंगे धार्मिक आयोजन </strong></p>
<p>शनिवार को अनंत चतुर्दशी के उपलक्ष्य में पार्श्वगिरी में विराजित गणिनी आर्यिका मां क्षमा श्री जी का ससंघ आगमन होगा और क्षमा श्री माताजी और विकुंदन श्री माताजी के ससंघ सानिध्य में भगवान के अभिषेक, शांतिधारा, आरती, उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म पर प्रवचन होंगे। साथ ही आर्यिका माताजी की आहार चर्या होगी। दोपहर को दोनों आर्यिका संघ के सानिध्य में भगवान की शोभायात्रा नगर के मुख्य मार्ग से निकाली जाएगी। पश्चात भगवान के अभिषेक,शांतिधारा ,आरती संपन्न होगी एवं दसलक्षण की माल की बोली होगी।</p>
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		<title>भगवान आदिनाथ जी का गर्भ कल्याणक 13 जून को: तिथि के अनुरूप आषाढ़ कृष्ण द्वितीया को मनाया जाता है गर्भ कल्याणक </title>
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		<pubDate>Thu, 12 Jun 2025 08:46:26 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ जी, जिन्हें भगवान ऋषभनाथ जी के नाम से भी पूजित और वंदित हैं। इनका गर्भ कल्याणक इस बार 13 जून को आ रहा है। इस दिन आषाढ़ कृष्ण द्वितीया है। इसी दिन भगवान का गर्भ कल्याणक दिगंबर जैन मंदिरों में पूर्ण भक्ति भाव से मनाया जाता है। श्रीफल [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ जी, जिन्हें भगवान ऋषभनाथ जी के नाम से भी पूजित और वंदित हैं। इनका गर्भ कल्याणक इस बार 13 जून को आ रहा है। इस दिन आषाढ़ कृष्ण द्वितीया है। इसी दिन भगवान का गर्भ कल्याणक दिगंबर जैन मंदिरों में पूर्ण भक्ति भाव से मनाया जाता है। <span style="color: #ff0000">श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्रृंखला के तहत पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल द्वारा संकलित यह प्रस्तुति&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ, जिन्हें सकल विश्व में भगवान ऋषभनाथ जी के नाम से श्रद्धापूर्वक स्मरण किया जाता है। इन्हीं प्रथम तीर्थंकर भगवान का गर्भ कल्याणक आषाढ़ कृष्ण द्वितीया को मनाया जाता है। इस दिन माता मरुदेवी ने भगवान आदिनाथ को अपने गर्भ में धारण किया था। जो इस अवसर्पिणी काल के प्रथम तीर्थंकर हैं। भगवान आदिनाथ के गर्भ कल्याणक की तिथि आषाढ़ कृष्ण द्वितीया है। माता का नाम मरुदेवी तथा पिता का नाम नाभिराय था। तीर्थनगरी अयोध्या में भगवान का जन्म हुआ।</p>
<p>जिस दिन भगवान का जन्म हुआ। उस दिन रोहिणी नक्षत्र था। धर्म शास्त्रों में वर्णित जानकारी के अनुसार भगवान आदिनाथ सवार्थ सिद्धि नामक अनुत्तर विमान से देव पर्याय को छोड़कर गर्भ में आए थे। माता मरुदेवी को रात्रि में 16 सपने आए थे, जो तीर्थंकर के आगमन का संकेत थे। भगवान आदिनाथ के गर्भ में आने की खुशी में इंद्र और अन्य देवगण ने माता मरुदेवी की सेवा की। भगवान आदिनाथ के जीवन के पांच कल्याणक हैं, जिनमें गर्भ कल्याणक भी शामिल है।</p>
<p>गर्भ कल्याणक जैन धर्म के लिए एक महत्वपूर्ण पर्व है। यह भगवान आदिनाथ के जन्म के पहले चरण का प्रतीक है और यह दर्शाता है कि कैसे एक महान व्यक्ति का जन्म होता है। यह दिन जैन समुदाय के लिए श्रद्धा और भक्ति का दिन है, जिसमें लोग मंदिर जाते हैं, पूजा करते हैं और भगवान आदिनाथ के जीवन की शिक्षाओं का पालन करते हैं। इस दिन मंदिर में विशेष पूजा और प्रार्थनाएं की जाती हैं।</p>
<p>कई मंदिरों और धार्मिक स्थानों पर विशेष समारोह आयोजित किए जाते हैं। यह उत्सव जैन धर्म की संस्कृति और परंपराओं का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह दिन ध्यान और आत्म-साधना के लिए भी एक महत्वपूर्ण दिन माना गया है। जैन पुराण साहित्य में लिखा गया है कि छह कलाएं असि, मसि, कृषि, वाणिज्य, शिल्प, कला का उपदेश ऋषभदेव जी ने दिया।</p>
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		<title>अधीरता एक ऐसी ही दुर्बलता है जो अंदर से कमजोरी करती है : मुनिश्री प्रमाण सागरजी ने भोपाल में धर्मसभा में दिए उपदेश  </title>
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		<pubDate>Wed, 23 Apr 2025 06:44:22 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मुनिश्री प्रमाणसागर महाराज ने अधीरता विषय पर मार्गदर्शन देते हुए अवधपुरी के विद्यासागर इंस्टीट्यूट में उपदेश दिए। उन्होंने अधीरता के स्वरुप, कारण, परिणाम तथा समाधान इन चार बातों पर चर्चा की। भोपाल से पढ़िए अविनाश जैन और अभिषेक जैन की यह खबर&#8230; भोपाल। जीवन की स्थायी उन्नति के लिये धैर्य रखना जरुरी है। जो अधीर [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>मुनिश्री प्रमाणसागर महाराज ने अधीरता विषय पर मार्गदर्शन देते हुए अवधपुरी के विद्यासागर इंस्टीट्यूट में उपदेश दिए। उन्होंने अधीरता के स्वरुप, कारण, परिणाम तथा समाधान इन चार बातों पर चर्चा की। <span style="color: #ff0000">भोपाल से पढ़िए अविनाश जैन और अभिषेक जैन की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>भोपाल।</strong> जीवन की स्थायी उन्नति के लिये धैर्य रखना जरुरी है। जो अधीर होता है। वह कभी भी अपने जीवन में उन्नति नहीं कर सकता। अधीरता से तो बने बनाये काम भी बिगड़ जाते हैं। यह उदगार मुनिश्री प्रमाणसागर महाराज ने अधीरता विषय पर मार्गदर्शन देते हुए अवधपुरी के विद्यासागर इंस्टीट्यूट में व्यक्त किए। मुनि श्री ने कहा जो अधीर है। वह धैर्य से पहले ही हार मान लेता है। आजकल प्रतीक्षा तो आदमी करना ही नहीं चाहता। समय से पहले ही रिजल्ट चाहता है। खेत में आज बीज बोया है तो अंकुर फूटने में समय तो लगेगा ही लेकिन, अधीरता से वह रोज-रोज उस बीज को देखता है और इस हड़बडी में बीज अंकुरित न होकर नष्ट ही हो जाता है। मुनि श्री ने कहा कि कोई भी कार्य हो वह अपने निर्धारित समय से ही पूर्ण होगा तुम कितने ही अधीर हो जाओ पेड़ फलेगा तो वह ऋतु चक्र के अनुरुप फलेगा तुम उसके लिये कितना भी प्रयास करो वहा कुछ होंने वाला नहीं।</p>
<p>यह बात अच्छी तरह से समझ लेना चाहिए। मुनि श्री ने कहा अधीरता एक ऐसी ही दुर्बलता है,जो हमें अंदर से कमजोर करती है। हमारे चित्त को उद्विग्न और बैचेन करती है, जबकि मन में जब धैर्य होता है तो वहा निश्चिन्तता होती है। उन्होंने अधीरता के स्वरुप, कारण, परिणाम तथा समाधान इन चार बातों पर चर्चा की। अधीर मन से सफलता नहीं मिलती। उसके लिए प्रतीक्षा करना पड़ती है उदाहरण देते हुए कहा कि एक व्यक्ति ने अपने नये व्यवसाय की शुरुआत की और उसका व्यापार अच्छा चला। उसने उसी आधार पर साल भर का बजट बना लिया लेकिन, बीच में व्यापार कमजोर हो गया तो वह अधीर हो उठा कि मेरा व्यापार नहीं चल रहा और इससे वह डिप्रेशन का शिकार हो गया।</p>
<p><strong>अविवेक पूर्ण निर्णय ने उपकारी के प्राण ले लिए</strong></p>
<p>मुनि श्री ने कहा कि हड़बड़ी से ही गड़बड़ी होती है अभी तुमने व्यापार की शुरुआत की है थोड़ी प्रतीक्षा तो करो, किसी भी कार्य में अपेक्षा रखो लेकिन अति अपेक्षा न रखो, अतिअपेक्षा से धैर्य टूटता है और बना बनाया कार्य भी बिगड़ जाता है। एक उदाहरण के माध्यम से महाराज श्री ने बताया की एक व्यक्ति बेटी के संबंध के लिये परेशान था। हमारे पास आया तो हमने कहा कि आप अपना पुरुषार्थ तो कर रहे हो जब उसका निमित्त आएगा तो उसका संबंध भी हो जाएगा। अधीरता से तो बने बनाये काम भी बिगड़ जाते है। मुनि श्री ने कहा कोई कार्य भय या उतावले पन से काम नहीं होता उन्होंने कहा कि आप सभी लोगों ने सांप और नेवला की कहानी तो पड़ी ही होगी। जिसमें नेवला परिवार का अंग था। गृह मालकिन अपने बच्चे को उसके भरोसे छोड़कर पानी भरने जाती है इस बीच एक सांप उधर आकर बच्चे की ओर बढ़ता है तो नेवला उस सांप का काम तमाम कर देता है और वह घर की चौखट पर मालकिन इंतजार करता है। इधर गृह मालकिन आती है और नेवला के मुख पर खून लगा देख उसे कुछ शंका होती है और आव न देखा ताव वह पानी का घड़ा उस नेवला पर पटक देती है। जिससे उसके तुरंत प्राण पखेरू उड़ जाते हैं और जब वह अंदर पहुंच कर देखती है कि उसका बच्चा तो खेल रहा है और पास में एक भयानक विषधर के टुकड़े-टुकड़े होकर पड़े है तो वह स्थिति को समझ अपने आपको पश्चाताप करती है कि उसके अधीरता और अविवेक पूर्ण निर्णय ने उसके उपकारी के प्राण ले लिए।</p>
<p><strong>अधीरता से संबंधों में खटास उत्पन्न हो जाती है</strong></p>
<p>मुनि श्री ने कहा कि आप लोगों के जीवन में भी कही बार ऐसी स्थिति आती है, कोई भी कार्य हड़बड़ी में करने के पश्चात असफलता पर मन को बहुत तकलीफ होती है उन्होंने कहा कि कोई भी बात हो सोच समझकर बोलो विवेक से बोलो जो अतिरेक में अपने शब्दों का प्रयोग करते है वह अपना ही नुकसान करते है,अधीरता में लिया गया निर्णय प्रायःपश्चाताप का ही कारण बनता हैष् अधीरता से संबंध बिगड़ते है नई नई शादी हुई पति ने अधीरता दिखाई और पत्नी के सामने बहुत सी अपेक्षा रख दी और उन अपेक्षा की पूर्ति न होने पर शादी के दो माह में ही पत्नी अपने घर जाकर बैठ गई और स्थिति यह हुई कि दोनों के बीच तलाक हो गया। व्यापार व्यवसाय घर या रिश्तेदारी में अधीरता से संबंधों में खटास उत्पन्न हो जाती है, बात-बात पर अपने बच्चों को डांटिए मत धैर्य से बच्चों को समझा कर अपनी समझदारी का परिचय दीजिए। जिससे आपको पछताना न पड़े।</p>
<p><strong>सफलता में समय और उसकी प्रतीक्षा करो</strong></p>
<p>कभी-कभी आपकी अधीरता आपको तो मानसिक रुप से कष्ट देती ही है। परिवार को भी नष्ट कर देती है। उन्होंने कहा गृहस्थी हो या साधना का क्षेत्र हो धैर्य रखना बहुत जरूरी है। अधीरता में मानसिक प्रगति रुक जाती है। सदैव इस बात को अपना सूत्र बनाइये। ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मां फलेषु कदाचनं’ मेरे हाथ में प्रयत्न है। प्रयत्न में कोई कमी नहीं करो, कार्य शिद्दत से करो,परिणाम पर बैचेनी नहीं। सफलता में समय और उसकी प्रतीक्षा करो रोटी खाने से खून बनता है लेकिन, रोटी खाते ही खून नहीं बनता। उन्होंने प्रयोग बताते हुए कहा कि जब भी मन में अधीरता हो तो गहरी सांस लो और रुकें तथा धीरे-धीरे छोड़ें। इससे आपकी अधीरता में कमी आएगी। हम चीजों के लिए थोड़ा समय दें और प्रतिक्रिया करने से बचें। धीरज तथा संयम के साथ यदि अपने से आत्म संवाद करें इससे आपका अवचेतन मन सक्रिय हो उठेगा और आपके अंदर की अधीरता नष्ट हो जाएगी।</p>
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		<title>गुरु ने कहा तो हो ही नहीं सकता मेरे वश की बात नहीं: बहोरीबंद में मुनिश्री के प्रवचन का पुण्य अर्जित कर रहे श्रद्धालु </title>
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		<pubDate>Tue, 22 Apr 2025 06:45:38 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[ निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज बचैया जनपद के बहोरीबंद में विराजमान है। यहां उनके प्रवचन सुनने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालुगण आ रहे हैं। मुनिश्री के जीवन दर्शन और मार्गदर्शन का भरपूर पुण्य अर्जित किया जा रहा है। बहोरीबंद से पढ़िए राजीव सिंघई की यह खबर&#8230; मुनिश्री सुधासागर जी महाराज ने कहा कि [&#8230;]]]></description>
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<p><strong> निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज बचैया जनपद के बहोरीबंद में विराजमान है। यहां उनके प्रवचन सुनने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालुगण आ रहे हैं। मुनिश्री के जीवन दर्शन और मार्गदर्शन का भरपूर पुण्य अर्जित किया जा रहा है। <span style="color: #ff0000">बहोरीबंद से पढ़िए राजीव सिंघई की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p>मुनिश्री सुधासागर जी महाराज ने कहा कि अपनी स्वयं की शक्तियों का जागरण व्यक्ति को स्वयं करना चाहिए क्योंकि अपनी स्वयं की जो शक्ति होती है, उस शक्ति का व्यक्ति उपयोग नहीं करना चाहता। जब व्यक्ति निज शक्ति को छुपाता या भूलता है या उसे निज शक्ति का ज्ञान नहीं होता है, वह व्यक्ति एक दिन इतनी गुलमियत में फंस जाता है कि वो अपनी स्वतंत्रता की श्वास भी नहीं ले पाता, इसलिए जैनाचार्यों ने सबसे पहले अपनी आत्म शक्ति की बात कही। हमें एक चींटी को बचाने में पुण्य लगता है और ये हवा सारे संसार को बचा रही है तो भी उसकों पुण्य नहीं लग रहा क्योंकि उसको मालूम ही नहीं है कि मेरे पास कितनी शक्ति है। होशपूर्वक तुम्हें इसका ज्ञान है कि मैं इसको बचा जा रहा हूँ, तब बचाओगे तो धर्म है। प्याऊँ खोलने वाले को धर्मात्मा जीव कहते हैं और पानी सारे जगत की प्यास बुझा रहा है लेकिन उसे पुण्यबन्ध नहीं क्योकि उसे मालूम ही नहीं कि मैं कितना मूल्यवान हूँ। कितने जीव है दुनिया में जिन्हें अपनी योग्यता मालूम नहीं, इसलिए ये स्थावर है, पापी है, इनका कभी कल्याण होने वाला नहीं उस सीधी पर्याय से। इसी तरह आपको भी अपनी जिंदगी का मूल्य पता नहीं है कि तुम कितने मूल्यवान हो।</p>
<p><strong>अपने अतीत को स्थापित कर दो</strong></p>
<p>जो व्यवहार हम दूसरों के साथ कर रहे हैं, वहीं व्यवहार यदि स्वयं के साथ होवे तो जैसे ही ये भाव आपके मन में आएगा तो आपके अंदर करुणा जाग जाएगी। पेड़ का पत्ता तोड़ो तो तोड़ते समय सोचना तुम कल यहाँ थे, तुम्हे भी किसी ने तोड़ कर फेंका होगा। अपने अतीत को स्थापित कर दो सारे संसार में। चिंतन करो हर चीज में यदि तुमने किसी जीव पर पैर रखा है तो कल मैं भी यहाँ था, किसी ने मेरे ऊपर पैर रखा होगा, उस समय मेरी वेदना क्या होगी। वैरागी को चिंतन करने के लिए पंचपरमेष्ठी की जरूरत नहीं है, वो तो बैठे-बैठे एक पेड़ का, एक चींटी भी चिंतन कर सकता है। वो जहाँ जाएगा, अपना रूप देख लेगा। नरकों का वर्णन पढ़ेगा, अपने आप को देख लेगा।</p>
<p><strong>अपनी शक्ति का भान करो</strong></p>
<p>तुम्हारी कितनी कीमत, शक्ति है, तुम अपनी शक्ति का भान करो, तुम चाहो तो इस जीव को बचा सकते हो, तुम चाहों तो मार सकते हो। हम चींटी को बचा सकते हैं तो हम अपनी जिंदगी में शक्ति नहीं छुपायेंगे, जब भी चींटी मेरे पैरों के पास आएगी, मैं बचाऊँगा क्योंकि मुझे बचाने की शक्ति है। हम किसी की प्यास बुझा सकते हैं इतनी शक्ति है मेरे पास, हुनर है तो बस एक ही नियम लेना है मेरे पास कभी भी कोई आएगा तो हम उसकी प्यास जरूर बुझायेंगे, उसे प्यासा नहीं मरने देंगे। अभी तुम्हारे पास खाने पीने की शक्ति नहीं है तो तुम किसी को पानी नहीं पिलाना क्योंकि तुम खुद ही पानी नही पी पा रहे हो, जैसे ये पेड़ पौधे आदि है क्योंकि ये स्वयं ही पानी को तरसते है। तुम्हारे पास खाने को नहीं है तो बिल्कुल मत खिलाना दूसरे को, दुनिया मरे तो मरने देना, जब है नहीं खिलाने को तो। यदि मेरे पास दो रोटी खिलाने की ताकत है तो जरूर नियम ले लेना कि मैं प्रतिदिन किसी दूसरे को दो रोटी खिलाकर ही सोऊँगा, यदि उस समय तुमने अपनी शक्ति छुपा ली तो अब तुम भूखों मरोगे, ये प्रकृति अब अपनी शक्ति दिखाएगी।</p>
<p><strong>भगवान, जिनवाणी माँ, गुरु ये बहुत दयालु हैं</strong></p>
<p>पैसा तो सबके पास है, पैसे का मूल्य क्या है उसकी शक्ति समझो। चाहे तो उस पैसे से स्वयं को व दुनिया को बर्बाद कर सकते हो। जब तक तुमने धर्म को भार माना, तुम कैमरे की नजर में हो, मां ने कहा अभिषेक करने जाओ, तुमने कहा कि मैं नहीं जा सकता, ये कहने के पहले थोड़ा सा सोच लेना, ये शब्द तुम माँ को बोल रहे हो, वो माँ कैसी जो बेटे की कूबत नहीं जानती है। भगवान, जिनवाणी माँ, गुरु ये बहुत दयालु है, ये उतना ही आदेश देंगे, जितनी अपनी शक्ति हैं लेकिन अपन ने माँ से क्या कह दिया हमारे वश की बात नहीं है। तुम्हारे अंदर परिणाम आना चाहिए कि गुरु ने कहा है तो हो ही नहीं सकता कि मेरे वश की बात नहीं, जिनवाणी माँ शक्ति से ज्यादा आदेश दे ही नहीं सकती। जिनका भविष्य जैसा होता है, उसकी शुरुआत बहुत पहले से हो जाती है, इसलिए गुरु आदेश, जिनवाणी का उपदेश कभी भार नहीं मानना, बस ये कहना शक्ति तो है लेकिन मेरा प्रमाद है।</p>
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		<title>काम पुरुषार्थ का अर्थ वासना से लेना देना नहीं : मुनि श्री सुधा सागर जी बताया मूल्यांकन का महत्व </title>
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		<pubDate>Sun, 20 Apr 2025 07:25:50 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मुनि श्री सुधासागर जी बहोरीबंद अतिशय क्षेत्र में विराजमान हैं। यहां नित्य प्रवचन हो रहे हैं। समाज जन रोज धर्म लाभ ले रहे हैं। बहोरीबंद से पढ़िए यह खबर&#8230; बहोरीबंद। निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज ने बहोरीबंद अतिशय क्षेत्र में धर्मसभा में प्रवचन देते हुए कहा कि ये दुनिया एक ऐसी अनिर्णीत वस्तु है [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>मुनि श्री सुधासागर जी बहोरीबंद अतिशय क्षेत्र में विराजमान हैं। यहां नित्य प्रवचन हो रहे हैं। समाज जन रोज धर्म लाभ ले रहे हैं। <span style="color: #ff0000">बहोरीबंद से पढ़िए यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>बहोरीबंद।</strong> निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज ने बहोरीबंद अतिशय क्षेत्र में धर्मसभा में प्रवचन देते हुए कहा कि ये दुनिया एक ऐसी अनिर्णीत वस्तु है जिसको निर्णय करके प्रकृति ने कुछ भी नहीं दिया। उसका मूल कारण था कि वस्तु में इतनी योग्यताएं हैं, वस्तु इतनी अनेकांतमयी है कि प्रकृति निर्धारण कर ही नहीं पाती कि हम किस वस्तु का क्या मूल्यांकन करे, वहीं वस्तु किसी के लिए अनमोल है वही वस्तु किसी के लिए निर्मूल है, किसी के लिए सुखदाई है तो किसी को दुखदाई। हम नहीं कह सकते कि प्रातः काल का सूर्य निकलने अच्छा होता है, उल्लू से पूछो उसको कितना बुरा लगता है। हमें भगवान अच्छे लगते हैं लेकिन कई लोगों को भगवान बुरे लगते है। किसी को महाराज को देखकर अहोभाग्य भाव जागता है तो किसी को दुर्भाग्य।</p>
<p><strong>मेरा धर्म जो चाहेगा वो होगा</strong></p>
<p>तुम्हारी किस्मत में जो लिखा है सो होगा, ये नियतवाद है, यह संतोषी का, अहंकार से ऊपर उठने का मंत्र है। हमें धर्म यह नहीं कहता कि तुम्हारी किस्मत में जो लिखा है सो होगा, यदि किस्मत में ही सब कुछ लिखा है तो फिर धर्म करने से क्या होना है, इसलिए अपने धर्म पर विश्वास करो, मेरा धर्म जो चाहेगा वो होगा। नियत कहता है कि अग्नि का काम जलाना है और हमारा काम जलना लेकिन नहीं, होता है चमत्कार जैसे ही सीता अग्नि में कूदी, अग्नि ने जलाना बंद कर दिया, अग्नि नीर का कुंड बन गया, इसको बोलते है चमत्कार, ये है धर्म।</p>
<p><strong>सारी वस्तुओं को हमें जुटाना पड़ता है</strong></p>
<p>अर्थ, धर्म व काम ये तीन पुरुषार्थ हम अपने जीवन में करें। अर्थ का अर्थ क्या है? पैसा, मकान नहीं, हमारे जीवन के उपयोग की जितनी भी वस्तुएं हैं। वे उपयोगी वस्तुये कभी किस्मत से, नियत से, सर्वज्ञ से नहीं मिलती, सारी वस्तुओं को हमें जुटाना पड़ता है। अब जो उपकारी है सब अर्थ पुरुषार्थ में जाएगा। काम पुरुषार्थ का अर्थ वासना से लेना देना नहीं है, जूते मिले है तुम्हे अर्थ पुरुषार्थ से, जूते पहनना काम पुरुषार्थ है, जो-जो चीज आपने उपभोग की, वो सब काम पुरुषार्थ है। गाड़ी लाना अर्थ पुरुषार्थ है और गाड़ी में बैठना काम पुरुषार्थ है।</p>
<p><strong>24 घंटे तीनों पुरुषार्थ एक साथ हों</strong></p>
<p>भगवान की पूजा का नाम ही धर्म पुरुषार्थ नहीं है। आपको व्यापार करते समय ये भाव आ गया कि नहीं, ये धंधा मैं नहीं करूंगा क्योंकि मैं जैनी हूं, इसमें हिंसा है। आप भोजन की थाली कर बैठे हैं, मैं यह नहीं खाऊंगा, ये अभक्ष्य है, भोजन करते हो गया धर्म पुरुषार्थ। आप चमड़े के नहीं, कपड़े के जूते पहन रहे है, अहिंसा परमोधर्म:, जूते पहनते हुए धर्म पुरुषार्थ। 24 घंटे तीनों पुरुषार्थ साथ एक साथ चलना चाहिए।</p>
<p><strong>देश का पैसा देश में</strong></p>
<p>चोर चोरी करके माल को मार्केट में ले जाता है। वह देश की अर्थ व्यवस्था को कायम रखते हैं, घरों में रखे हुए धन को बाजार में लाते हैं, इसलिए अर्थ शास्त्री कभी चोरों को बुरा नहीं मानते। देश का पैसा देश में, ये राज विरुद्ध नहीं कहलाता। राज विरुद्ध वो कहलाता है, जिससे देश में विदेशी वस्तु को कानूनन मना किया है, स्मग्लरपना जितना है, सब राष्ट्रद्रोह में आएगा। अन्य देशों के साथ संबंध बनाना यह राष्ट्रद्रोह में आएगा।</p>
<p><strong>जाति कलंकित नहीं होना चाहिए</strong></p>
<p>तुम जो कुछ भी करते हो करो, बस तुम्हारे कारण से जाति कलंकित नहीं होना चाहिए, यदि आपने यह ध्यान रख लिया कि मैं ऐसा कोई कार्य नहीं करूंगा जिससे मेरी जाति बदनाम हो, जाओ आप जाति वाले कहलाएंगे, आप क्या आचरण पाल रहे है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। जितनी ज्यादा आप इच्छाएं संसार से पूरी कराने का भाव करोगे, आप असमर्थ होते जाओगे।</p>
<p><strong>पौधा अच्छी खाद, पानी चाहता है</strong></p>
<p>जो-जो वस्तु तुम्हें चाहिए है। जरूरत है, वे वस्तु तुम्हारी कैसे होगी एक आदत बदल दो, तुम्हें अपनी इच्छा पूरी कराना है तो पहले आपको नियम लेना है, इसकी क्या इच्छा है, मैं नियम लेता हूं, इसकी हर इच्छा पूरी करूँगा। एक गमले में पौधा है, वह तुम्हारे काम का है, तुम्हारे काम आएगा, बस तुम्हे एक नियम लेना है, इस पौधे की क्या इच्छा है, वह अच्छी मिट्टी है अच्छी खाद, पानी चाहता है, आप उसकी इच्छा पूरी कर दीजिएगा, तुम्हें कुछ भी नहीं कहना पड़ेगा, वो तुम्हारी इच्छा पूरी कर देगा।</p>
<p><strong>वह कोई नकारात्मक एनर्जी नहीं देगा</strong></p>
<p>वह तुम्हे उसी समय से तुम्हें एनर्जी देना प्रारंभ कर देगा। पेड़ को चाहो, पेड़ से मत चाहो अभी। आप घर से बाहर गए है, आपको चिंता होगी कि आज पेड़ को पानी कौन देगा, उस पेड़ की ऐसी एनर्जी आपके पास जाएगी कि आप जंगल में दबे हो गए वह पेड़ आपकी कुशलता की कामना कर रहा होगा कि मेरा मालिक सुरक्षित आ जाए। आप फल तोड़ोगे तो भी वह कोई नकारात्मक एनर्जी नहीं देगा क्योंकि, इसी ने तो मुझे पाला है।</p>
<p><strong>मां-बाप की हर इच्छा पूरी करूंगा</strong></p>
<p>भगवान से मांगो गुरु से मांगो कि मैं अपने मां-बाप की हर इच्छा पूरी करना चाहता हूँ, तुमने भगवान से आशीर्वाद लिया, णमोकार मंत्र पढा। पुरुषार्थ करना है कि मैं अपनी मां-बाप की हर इच्छा पूरी करूंगा, तुम्हें अपने लिए मांगने की जरूरत नहीं है, उनकी इच्छा की पूर्ति की बाद ऐसा अतिशय होगा कि एक बार वे तुम्हारी तरफ देख लेंगे, तुम्हारी सारी इच्छाएं पूरी हो जाएगी लेकिन, संकल्प लेना है तुम्हे। जिनवाणी माँ जो तुम्हे खिलाएगी, वह मैं खाऊँगा, जाओ तुम्हारी जिंदगी खतरे से बाहर रहेगी, दुर्गति से बचोगे।</p>
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		<title>ऐसा पाप मत करना जिससे राष्ट्र कलंकित हो: मुनिश्री के प्रवचनों में जीवन से जुड़े गुढ़ रहस्य का मिल रहा लाभ  </title>
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		<pubDate>Sat, 19 Apr 2025 16:43:32 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज इन दिनों बहोरीबंद अतिशय क्षेत्र में विराजमान होकर धर्म प्रभावना कर रहे हैं। उनके उपदेश सुनने के लिए आसपास के क्षेत्र से बड़ी संख्या में श्रद्धालु श्रावक यहां पहुंच रहे हैं। शनिवार को उन्होंने प्रवचन में कई महत्वपूर्ण उपदेश दिए।  कटनी। बहोरीबंद अतिशय क्षेत्र में अपने प्रवचन में मुनिश्री [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज इन दिनों बहोरीबंद अतिशय क्षेत्र में विराजमान होकर धर्म प्रभावना कर रहे हैं। उनके उपदेश सुनने के लिए आसपास के क्षेत्र से बड़ी संख्या में श्रद्धालु श्रावक यहां पहुंच रहे हैं। <span style="color: #ff0000">शनिवार को उन्होंने प्रवचन में कई महत्वपूर्ण उपदेश दिए। </span></strong></p>
<hr />
<p><strong>कटनी।</strong> बहोरीबंद अतिशय क्षेत्र में अपने प्रवचन में मुनिश्री सुधासागर जी महाराज ने कहा कि जीव के अंदर एक चाहत होती है कि सारी दुनिया मेरे लिए हो और जो कुछ भी करता है सब अपने लिए करता है, इसका परिणाम ये निकलता है कि वह कभी भी अपनी इच्छाओं को पूरा नहीं कर पाता, अभी वह सारी दुनिया को अपना नहीं बना पाता और एक दिन ऐसा आता है कि जब अपने भी पराए हो जाते है, यहाँ तक भी अपनी किस्मत, अपना शरीर, ज्ञान, ध्यान और भगवान भी साथ नहीं देते। सारी दुनिया में दवाई कर ली, कोई इलाज ही नहीं लग रहा है, ये ऐसे यक्ष प्रश्न है जिनके समाधान तो है नहीं लेकिन खोजना पड़ेगा। समस्या है तो समाधान भी कंही न कंही है, बीमारी है अर्थात उसका निदान भी है, ये निश्चित समझना। जैसे डाकू है तो इसका अर्थ है दुनिया में साधु भी है, जहाँ पाप है तो पुण्य जरूर दुनिया में है, विपदा आई है तो उसे दूर करने का उपाय जरूर है।</p>
<p><strong>दःख आया है तो घबराओ मत सुख का नंबर आने ही वाला है</strong></p>
<p>ऐसे ही हम अपनी जिंदगी में समझे बुरे दिन आ रहे है तो इसका अर्थ है अच्छा दिन जरूर आएगा ही आएगा। हम अपने अनुभव को अनुमान बनाये और उसका निर्णय करें जो हमारे अनुभव में नहीं आ रहा है, ऐसा ज्ञान जब हमारे अंदर हो जाता है तो हमारी घबराटे खत्म हो जाती है। दुख आया है तो घबराओ मत सुख का नंबर आने ही वाला है। दुख आया है तो ज्यादा अहंकार मत करो, दुख आने में ज्यादा देरी नहीं लगना। जब भी अच्छी कार्य करने की बात आती है तुम तुरंत हा नहीं कहते, आपके मुँह से न निकलता है, यही शब्द बता रहा है कि अभी हमारा कल्याण बहुत दूर है, हम आसन्न भव्य नहीं है। मेरे जीवन में अच्छे दिन कब आएंगे, मैं भगवान कब बनूँगा आदि किसी अच्छी चीज से यदि प्रभावित हो रहे हो कि यह मेरे जीवन में कब आएगा, पहला यदि कोई अच्छी बात कहे तो बिना विचारे आपके मुंह से हां निकालना चाहिए। जितनी अपन भगवान की प्रशंसा करते हैं कि भगवन आप धन्य है, यदि उसका दसवां हिस्सा भी भाव कर ले कि जितनी अपन भगवान की पूजा कर रहे है, उतना स्वयं भगवान बनने का प्रयास कर ले भगवान के स्थान पर तू खुद भगवान बन जाएगा।</p>
<p><strong>तुम गुरु को डाकू समझ रहे हो?</strong></p>
<p>तुम्हें डर लग रहा है कि गुरु के सामने जाऊंगा तो गुरु गुटखा छुड़ा देंगे, मुझे मंदिर जाने का नियम लेना पड़ेगा। इसलिए मैं तो महाराज के पास जाता ही नहीं तो इसका अर्थ है कि तुम गुरु को डाकू समझ रहे हो, क्योंकि डरा तो डाकू से जाता है। कितने ही बड़े पापी हो तुम, कितना ही बड़ा तुम्हे डर लग रहा हो, उस पाप को मत करना जिसको करते हुए तुम्हे मम्मी पापा का डर लगे। यदि तुम्हारे काले कारनामों के कारण मां-बाप की नजर झुक गयी, उनकी आंख में आंसू आ गया, कहां का मैंने ऐसा बेटा पैदा किया, इसने पूर्वजों की सारी इज्जत धूल में मिला दी, एक बार भी यह परिणाम आ गया तो जाओ इससे बड़ा अभिशाप तुम्हारी जिंदगी में नहीं होगा, तुम सैकड़ो भवों तक गंदे मां-बाप के यहां पैदा होंगे, पहली बात तो मां बाप मिलेंगे ही नहीं, अनाथ पैदा होंगे। गर्भ में आओगे ही नहीं, समुर्छनो में पैदा होंगे।</p>
<p><strong>अभिषेक करके गंधोदक लगाओ </strong></p>
<p>कुछ ऐसे कृत्य हैं जहां णमोकार मंत्र की शक्ति भी फेल हो जाती है, जब तुमने ऐसा कृत्य किया और तुम्हारे उपकारी के मन में खेद हो गया, पाप तुमने किया और आंसू मां-बाप के आ गए, नजर उनकी झुक गई, कुल कलंकित हो गया। यदि तुम्हारे कारण से राष्ट्र कलंकित हुआ है तो तुम म्लेच्छ खंड में जन्म लोगे क्योंकि पाप तुमने किया है देश कलंकित हुआ है। आतंकवादी का पाप इसलिए बड़ा है कि आतकंवादी के कारण देश बदनाम होता है कि ये आतंकवादी पैदा करता है। आप जैन है ऐसे पाप मत करना जिससे लोग कहने लगे कि जैनी लोग भी ऐसा पाप करने लगे, करोगे तुम और बदनाम होगी जैन जाति। कोई ऐसा पाप मत करना जिससे तुम्हारा भगवान का अभिषेक करना छूट जाए, गुरुओ को आहारदान देना छूट जाए। आप लिस्ट बनाओ जो पाप तुमने अभिषेक के कारण छोड़ दिए कि मैं भगवान को छूने लायक नहीं रहूंगा, छोड़कर दिखाओ, फिर अभिषेक करके गंधोदक लगाओ तो जाओ कौन सी बीमारी है जो दूर नहीं होगी।</p>
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		<title>भगवान महावीर जयंती पर विशेष : हम भी महावीर बनने की तैयारी करें </title>
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		<pubDate>Tue, 08 Apr 2025 13:40:33 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[भगवान महावीर के जन्म जयंती पर उनके उपदेश और संदेशों पर अमल कर जीवन को सरल बनाया जा सकता है। क्योंकि उन्होंने मानवता के कल्याण के लिए धर्म का उपदेश दिया। भगवान महावीर से जुड़ी जानकारी साझा कर रहे हैं ललितपुर से डॉ. सुनील जैन &#8216;संचय&#8217; पढ़िए यह खबर&#8230; ललितपुर। जैन धर्म में 24 तीर्थंकर [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>भगवान महावीर के जन्म जयंती पर उनके उपदेश और संदेशों पर अमल कर जीवन को सरल बनाया जा सकता है। क्योंकि उन्होंने मानवता के कल्याण के लिए धर्म का उपदेश दिया। <span style="color: #ff0000">भगवान महावीर से जुड़ी जानकारी साझा कर रहे हैं ललितपुर से डॉ. सुनील जैन &#8216;संचय&#8217; पढ़िए यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>ललितपुर।</strong> जैन धर्म में 24 तीर्थंकर हुए हैं। वर्तमान कालीन 24 तीर्थंकरों की श्रृंखला में प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव और 24वें एवं अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी हैं। भगवान महावीर के जन्म कल्याणक को देश-विदेश में बडे़ ही उत्साह और पूरी आस्था के साथ मनाया जाता है। भगवान महावीर को वर्द्धमान, सन्मति, वीर, अतिवीर के नाम से भी जाना जाता है। ईसा से 599 पूर्व वैशाली गणराज्य के कुण्डलपुर में राजा सिद्धार्थ एवं माता त्रिशला की एक मात्र सन्तान के रूप में चैत्र शुक्ला त्रयोदशी को भगवान जन्म हुआ था। महावीर पूजा में लिखा है-</p>
<p>जनम चैत सित तेरस के दिन, कुण्डलपुर कन वरना।</p>
<p>सुरगिरि सुरगुरु पूज रचायो, मैं पूजौं भवहरना।।</p>
<p>30 वर्ष तक राज प्रासाद में रहकर आप आत्म स्वरूप का चिंतन एवं अपने वैराग्य के भावों में वृद्धि करते रहे। 30 वर्ष की युवावस्था में आप महल छोड़कर जंगल की ओर प्रयाण कर गए एवं वहां मुनि दीक्षा लेकर 12 वर्षों तक घोर तपश्चरण किया। इसके बाद 30 वर्षों तक देश के विविध अंचलों में पदविहार कर आपने संत्रस्त मानवता के कल्याण के लिए धर्म का उपदेश दिया।</p>
<p><strong>धर्म का सही अर्थ समझो</strong></p>
<p>ईसा से 527 वर्ष पूर्व कार्तिक अमावस्या को उषाकाल में पावापुरी में आपको निर्वाण (मोक्ष) प्राप्त हुआ।</p>
<p>महावीर जयंती हम प्रतिवर्ष मानते हैं, एक बार स्वयं महावीर के रास्ते पर चलने का यदि संकल्प ले लिया तो हम स्वयं महावीर बनने की ओर कदम बढ़ा लेंगे। इसलिए जरूरी है कि हम में से हर व्यक्ति महावीर बनने की तैयारी करे। तभी सभी समस्याओं से मुक्ति पाई जा सकती है। भगवान महावीर वही व्यक्ति बन सकता है, जो लक्ष्य के प्रति पूर्ण समर्पित हो, जिसमें दुःख-कष्टों को सहने की क्षमता हो। जिसको प्रतिकूल परिस्थितियों में भी संतुलन बनाना आ गया। वह महावीर बन सकता है। आज की भागमभाग के जीवन में सुख-शांति की खोज महावीर के पथ से प्राप्त हो सकती है। जिसके मन मस्तिष्क में प्राणिमात्र के प्रति सहअस्तित्व की भावना हो। जो पुरुषार्थ द्वारा अपना भाग्य बदलना जानता हो, वह महावीर बन सकता है।</p>
<p>भगवान महावीर ने अपनी देशना में मानव के लिए उपदेश दिया कि धर्म का सही अर्थ समझो।</p>
<p><strong>जिए गए मूल्यों के पुनर्जन्म की अपेक्षा है</strong></p>
<p>धर्म तुम्हें सुख, शांति, समृद्धि, समाधि -यह सब आज देता है या बाद में -इसका मूल्य नहीं है। मूल्य इस बात का है कि धर्म तुम्हें समता, ईमानदारी, सत्य, पवित्रता, नैतिकता, स्याद्वाद, अपरिग्रह और अहिंसा की अनुभूति कराता है या नहीं। महावीर का जीवन हमारे लिए इसलिए महत्वपूर्ण है कि उसमें धर्म के सूत्र निहित हैं। आज महावीर के पुनर्जन्म की नहीं, बल्कि उनके द्वारा जिए गए मूल्यों के पुनर्जन्म की अपेक्षा है। जरूरत है हम बदलें, हमारा स्वभाव बदले और हम हर क्षण महावीर बनने की तैयारी में जुटें, तभी महावीर जयंती मनाना सार्थक होगा।</p>
<p><strong>भगवान महावीर की मूल शिक्षा है- अहिंसा</strong></p>
<p>महावीर बनने की कसौटी है- देश और काल से निरपेक्ष तथा जाति और संप्रदाय की कारा से मुक्त चेतना का आविर्भाव। भगवान महावीर एक कालजयी और असांप्रदायिक महापुरुष थे। जिन्होंने अहिंसा, अपरिग्रह और अनेकांत को तीव्रता से जिया।</p>
<p>भगवान महावीर की मूल शिक्षा है- अहिंसा। अहिंसा का सीधा अर्थ यह है कि व्यावहारिक जीवन में हम किसी को कष्ट नहीं पहुंचाएं, किसी प्राणी को अपने स्वार्थ के लिए दुख न दें। दूसरे व्यक्तियों से ऐसा व्यवहार करें जैसा कि हम उनसे अपने लिए अपेक्षा करते हैं।महावीर का दूसरा व्यावहारिक संदेश है- क्षमा। उन्होंने कहा कि मैं सभी से क्षमा याचना करता हूं। मुझे सभी क्षमा करें। मेरे लिए सभी प्राणी मित्रवत हैं। मेरा किसी से भी वैर नहीं है।व्यावहारिक जीवन में यह आवश्यक है कि हम अहंकार को मिटाकर शुद्ध हृदय से बार-बार ऐसी क्षमा प्रदान करें। हमारा जीवन धन्य हो जाए यदि हम भगवान महावीर के इस छोटे से उपदेश का ही सच्चे मन से पालन करने लगें कि संसार के सभी छोटे-बड़े जीव हमारी ही तरह हैं, हमारी आत्मा का ही स्वरूप हैं।</p>
<p><strong>सम-सामयिक समस्याओं के समाधान पाए जा सकते हैं</strong></p>
<p>भगवान महावीर का आदर्श वाक्य था -&#8216;मित्ती में सव्व भूएसु।&#8217; अर्थात सब प्राणियों से मेरी मैत्री है।</p>
<p>आज जरूरत इस बात की है कि शत्रुता का अंत हो जाए और विश्व में शांति स्थापित हो, क्योंकि बैर से बैर कभी नहीं मिटता। मैत्री और करूणा से ही मानव के मन में, घर में, नगर और देश तथा विश्व में शांति और सुख , अमनचैन की धारा बहती है। इसके लिए हमें भगवान महावीर बनने की दिशा में कदम बढ़ाना होगा। भगवान महावीर की शिक्षाओं में पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों का ह्रास, युद्ध और आतंकवाद के जरिए हिंसा, धार्मिक असहिष्णुता तथा गरीबों के आर्थिक शोषण जैसी सम-सामयिक समस्याओं के समाधान पाए जा सकते हैं।</p>
<p><strong>अहिंसा एवं अनेकांत का नारा</strong></p>
<p>भगवान महावीर ने ‘अहिंसा परमो धर्मः’ का शंखनाद कर ‘आत्मवत् सर्व भूतेषु’ की भावना को देश और दुनिया में जाग्रत किया। ‘जियो और जीने दो’ अर्थात् सह-अस्तित्व, अहिंसा एवं अनेकांत का नारा देने वाले महावीर स्वामी के सिद्धांत विश्व की अशांति दूर कर शांति कायम करने में समर्थ है।</p>
<p>अतः यदि आज भगवान महावीर के सर्वोदयी सिद्धांत, अनेकान्तात्मक विचार, सभी पक्षों को अपने में समाहित कर लेने वाली स्याद्वाद वाणी, अहिंसा युक्त आचरण और अल्प संग्रह से युक्त जीवनवृत्ति हमारे सामाजिक जीवन का आधार व अंग बन जाये तो हमारी बहुत सी समस्यायें सहज ही सुलझ सकती हैं। अतएव हम विश्व शांति के साथ-साथ आत्म शांति की दिशा में भी सहज अग्रसर हो सकते हैं। इस महावीर जयंती हम उनके चरण छूने के साथ ही आचरण भी छूने का प्रयास करें, तभी महावीर जयंती मनाने की सार्थकता है।</p>
<p>&#8220;यदीया वाग्गङ्गा विविध-नय कल्लोल-विमला,</p>
<p>वृहज्ज्ञानांभोभिर्जगति जनतां या स्नपयति ।</p>
<p>इदानीमप्येषा बुध-जनमरालै: परिचिता,</p>
<p>महावीर-स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे ॥&#8221;</p>
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		<title>बचे हुए पैसे से कभी पाप मत करना : मुनि श्री सुधासागर जी को सुनने के लिए दूर-दूर से आ रहे गुरु भक्त </title>
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		<pubDate>Fri, 04 Apr 2025 07:48:30 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मुनि श्री सुधासागर जी महाराज ने गुरुवार को धर्म सभा में अपने प्रवचन में जीवन के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश दिया। उन्होंने जीवन का सार समझाया। कटनी से पढ़िए राजीव सिंघई की यह खबर&#8230; कटनी। निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज ने बहोरीबंद अतिशय तीर्थ में अपने प्रवचनों के माध्यम से जैन समाज को उपयोगी [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>मुनि श्री सुधासागर जी महाराज ने गुरुवार को धर्म सभा में अपने प्रवचन में जीवन के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश दिया। उन्होंने जीवन का सार समझाया। <span style="color: #ff0000">कटनी से पढ़िए राजीव सिंघई की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>कटनी।</strong> निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज ने बहोरीबंद अतिशय तीर्थ में अपने प्रवचनों के माध्यम से जैन समाज को उपयोगी मार्गदर्शन दिया। उन्होंने कहा कि अच्छाइयों को समझ लेने से हम अच्छे बन जाएंगे, ये उम्मीद मत रखना, मंजिल को समझ लेने से हमें मंजिल मिल जाएगी, ये उम्मीद मत करना। रोटी मिल जाएगी तो तुम खा लोगे, ये मत समझना। पानी पी लोगे तो प्यास बुझ जाएगी ये मत समझना। भगवान, गुरु मिल जाएंगे तो कल्याण हो जाएगा। ये मत समझ लेना। उच्च कुल, वज्र वृभषनाराच संहनन मिल जाएगा तो मत समझना कि तुम्हारा कल्याण हो जाएगा। ये सब पॉजिटिव एक पक्ष है और एक पक्ष से नदी नहीं बहती है। हमारी जितनी लग्न मोक्ष के प्रति है, उतनी लगन यदि तुम मोक्ष मार्ग के प्रति लगा लो तो मंजिल के प्रति लगन न होते हुए भी मंजिल मिल जाएगी। हर व्यक्ति अमीर बनना चाहता है लेकिन, कोई ये पूछने नहीं आता कि ये अमीर क्यों बना, कैसे बना, पूछना ही नहीं चाहता और बताएं तो सुनना नहीं चाहता। ये अमीर इसलिए बना है क्योंकि, इसने बहुत दान दिए हैं, बहुत करुणा की है, मंदिर बनाए हैं, धर्मशाला खोली, गरीबों की सहायता की है। इसलिए आज अमीर बना।</p>
<p><strong>गरीबी क्यों है इसकी खोज</strong></p>
<p>जब दो व्यक्ति जबरदस्त लड़ रहे हो तो लड़ते हुए व्यक्तियों को नाग की उपमा दी कि ये नाग हैं, जब दो नाग लड़ रहे हो तो उन्हें अलग करने का प्रयास मत करना, वे दोनों नाग मिलकर के तुम्हें निपटा देंगे। फिर वो लड़ेंगे। ऐसे ही मानी, मायाचारी और लोभी व्यक्ति को मत समझना, चारों कषायों की जब तीव्रता हो, तब आप धर्म का उपदेश नहीं देना, यदि दुर्जन है तो, उसकी कषाय मंद पड़ने दो। मध्यम कषाय वाले को ही शांति से समझाया जाता है, उपदेश दिया जाता है। हम साध्य के प्रति बहुत जल्दी प्रभावित हो जाते है। रोने से किस्मत अच्छी नहीं हो जाएगी, ये विचार करो कि किस्मत क्यों खराब है। गरीबी का रोना रोने से गरीबी दूर नहीं होगी, कितने ही रोते रहना, कितने ही विधान, पंचकल्याणक करते रहना, गरीबी क्यों है इसकी खोज करो। क्यों पर विचार नही करते, इसलिए हमारा भगवान, गुरु पर से विश्वास उठ जाता है।</p>
<p><strong>5 रुपये कम खर्च करके 5 रूपए का दान करो</strong></p>
<p>बचे हुये पैसे से पाप मत करना, अपने उपभोग में से कांटकर करना हो तो कर लेना क्योंकि, बचा हुआ पैसा नियम से तुम्हारें पुण्य कर्म से बचा है। मानकर चलिए तुम्हारा सौ रुपये निश्चित है तो 5 रुपये कम खर्च करके 5 रूपए का दान करो। तुम्हे और भी अनाव सनाव पैसा खर्च करना है तो अपने उपयोग में से कम कर दो, एक आवश्यक वस्तु कम खरीदो लेकिन, बचे हुए पैसे से पाप मत करना, वह तुम्हारे पुण्य की मेहरबानी है, अन्यथा पैसा बच ही नहीं सकता। तुमने वहाँ पुण्य किया है, जहाँ मंदिर में जरूरत नहीं थी, फिर भी तुमने कहा मैं तो मंदिर में दान दूँगा। भगवान को पीतल का छत्र लगा है, जरूरत नही है लेकिन मैं तो छत्र सोने का चढ़ाऊँगा।</p>
<p><strong>जानने के लिए चरित्र पढ़ना</strong></p>
<p>भगवान को जानने के लिए भगवान का चरित्र नहीं पड़ना, भगवान कैसे बने हैं उसको जानने के लिए चरित्र पढ़ना। भगवान का स्वरूप तो बहुत 2 मिनिट में आ जाएगा। अब सारी जिंदगी में समझ में आ जाए कि भगवान बनने की विधि क्या है? उस विधि को सीखों। महानुभाव एक पाप का भी त्याग नहीं है और तुम अपने आपको भगवान मान रहे हो तो तुम्हारी दशा उसी शराबी जैसी है, जिस भिखारी ने शराब की बोतल लगा ली और कहता है- आई एम गॉड।</p>
<p><strong>नौ बार णमोकार मंत्र पढ़ो</strong></p>
<p>एक दान होता है- जरूरत का दान, मंदिर में जो जरूरत है वो दे देना, मंदिर बन रहा है इस मंदिर में मेरा कुछ न कुछ लगेगा। दूसरा जो कहता है जरूरत नही है तो भी मैं मंदिर में दान दूँगा। हर व्यक्ति को अच्छे समय में तैयारी करना है कि बुरा समय आ जाए तो क्या तैयारी है? आप यात्रा पर जा रहे हो गाड़ी नहीं है लेकिन रास्ते में पंचर हो गई तो क्या तैयारी है? पक्ष की ही नहीं विपक्ष की भी तैयारी रखो, यदि इससे उल्टा हुआ तो क्या तैयारी है? रात में सकुशल सो रहे हो, कुछ भी नही, यदि रात में सोते-सोते मर गए तो क्या तैयारी है? जैन दर्शन है कहता है उस एक प्रतिशत की तैयारी करो। नौ बार णमोकार मंत्र पढ़ो, जब तक मेरी निद्रा है तब तक मैं सब कुछ अन्न जल परिग्रह का त्याग करता हूँ, प्रभु मेरे व तेरे अलावा कोई नही, अब निद्रा में मर भी जाएगा तो वही गति होगी जो एक त्यागी की होती है, जो णमोकार मंत्र पढ़ते पढ़ते मरने वाले की गति होती है, ये है समझदार व्यक्ति।</p>
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		<title>सबसे अधिक भय उस व्यक्ति को है जो सबसे ज्यादा सुखी: मुनिश्री सुधासागर जी के प्रवचनों में धर्म प्रभावना से लबरेज हो रहे भक्त </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/the_person_who_is_happiest_has_the_most_to_fear/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 28 Mar 2025 07:49:21 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज के प्रवचनों में जैन समाज के श्रावक-श्राविकाओं की अपार मौजूदगी ने धर्म सभा का पूरा लाभ अर्जित किया है। गुरुवार को मुनि श्री सुधासागर जी के प्रवचनों में नियम, संयम, धैर्य, कर्तव्य और धर्म आराधना के संदेश दिए जा रहे हैं। इससे सकल जैन समाज लाभान्वित हो रहा है। [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज के प्रवचनों में जैन समाज के श्रावक-श्राविकाओं की अपार मौजूदगी ने धर्म सभा का पूरा लाभ अर्जित किया है। गुरुवार को मुनि श्री सुधासागर जी के प्रवचनों में नियम, संयम, धैर्य, कर्तव्य और धर्म आराधना के संदेश दिए जा रहे हैं। इससे सकल जैन समाज लाभान्वित हो रहा है। <span style="color: #ff0000">कटनी से पढ़िए राजीव सिंघई मोनू और शुभम पृथ्वीपुर की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>कटनी</strong>। मुनिश्री सुधासागर जी ने गुरुवार को अपने प्रवचनों में मौजूद भक्तजनों से कहा कि सबकुछ हमारे पास है लेकिन, डर लग रहा है कि कहीं यह चला न जाए। हम जिंदा हैं तो हमें जिंदा रहने की खुशी नहीं है। हमें मरने का डर लग रहा है। सब मिला भी तो हम निर्भय नहीं हो पाए, सब पाने के बाद भी हम कंगाल बने रहे। बच्चा घूमने जा रहा है लेकिन, डर है कि कहीं कुछ गड़बड़ न हो जाए। नियम लेने के बाद डर रहता है कि कहीं नियम न टूट जाए। सबसे ज्यादा भय वो व्यक्ति कर रहा है जो सबसे ज्यादा सुखी है। पूज्य समंतभद्र स्वामी ने कहा कि सर्वस्व तुम्हारे पास है लेकिन, सर्व भौमपना तुम्हारे पास नहीं है। हमने जो कुछ भी पाया है, अपने लिए पाया है, हमने कभी जगत की चिंता नहीं की। हमने सबको लूटकर अपने को धनी को बनाया है। सब की तरफ ध्यान न देकर खुद सुखी बनने का प्रयास किया है, आप सुखी नहीं रह पाओगे। या तो तुम एक नियम ले लो-न देना न लेना, मगन रहना। हमें किसी से कुछ लेना नहीं, हम किसी को कुछ देंगे नहीं।</p>
<p><strong>दुनिया में तेरी आत्मा से अच्छी कोई हो ही नहीं सकती</strong></p>
<p>आचार्य समंतभद्र स्वामी ने भगवान की स्तुति करते हुए लिखा कि भगवन जब से आपने दीक्षा ली है, केवलज्ञान, मोक्ष प्राप्त किया, आप जागते ही रहते हैं। सोते ही नहीं, क्या देख रहे हो आप इन आंखों से, इसलिए ये निर्णय समझो कि साधु को दिखता नहीं, सो मत समझना। साधु के देखने की इच्छा नहीं है, सो भी मत समझना, बस इतना सा है कि कुंदकुंद भगवान कहते हैं कि इसके मन मे धारणा बैठ गई है कि दुनिया को क्या देखूं, मेरे से ज्यादा सुंदर दुनिया हो ही नहीं सकती। जब मैं अपनी आत्मा को देखता हूं तो सारा संसार फीका लगता है। तुम दुनिया में खोज रहे हो कि तुमसे अच्छा कौन है? दुनिया में तेरी आत्मा से अच्छी कोई हो ही नहीं सकती। बस यहां से होती है सिद्धि, अब कोई तुम्हें अंधा नहीं कर पाएगा, अब तुम कभी बोर नहीं हो सकते क्योंकि, अपनी आत्मा को देखना है, अपनत्व लाओ, हम पर को देखते है इसलिए थकते हैं। स्व को देखो, एक मां बेटे को देखते हुए नहीं थकती है क्योंकि, वो अपना है। साधु क्यों नहीं थक रहा है क्योंकि, वह अपनी आत्मा को देख रहा है।</p>
<p><strong>ऐसी धारणा बनाओ कि मेरे पास वह सबकुछ है </strong></p>
<p>सारी दुनिया से चोरी बंद हो सकती है बस एक भावना तुम्हें भाना है कि हे भगवन! जगत में हर व्यक्ति के पास इतना हो कि उसे चोरी करने की जरूरत ही न पड़े। जिस पर उसकी नियत जाए वो पहले से उसके पास है और बल्कि उससे अच्छा है। जब सारी दुनिया ऐसी हो जाएगी तो तुम्हे धन पाकर लुटने का डर रहेगा, नहीं क्यों? लूटने वाला कहेगा कि उसके पास क्या है जो मेरे पास नहीं है। जब भी तुम्हारी पर पर दृष्टि जाए तो एक धारणा बना लेना- मेरे पास जो है, उससे ज्यादा दुनिया के पास नहीं है। पर की तरफ दृष्टि जाना बता रहा है कि यह कंगाल है, तुम ऐसी धारणा बनाओ कि मेरे पास वह सबकुछ है, जो दुनिया के पास है, इसलिए मैंने साधना शुरू कर दी है कि न मुझे किसी से लेना है, न किसी को कुछ देना है।</p>
<p><strong>90 प्रतिशत बड़े आदमी और उनके बच्चे दुर्गुणी होते हैं</strong></p>
<p>आप नियम ले लो कि मैं सुख के दिनों में मंदिर नहीं आऊंगा, अमीरी में मैं दान नहीं करूंगा, जो पैसा है, उससे मौज मस्ती करूंगा, ठीक है अभी तेरे पुण्य का उदय है, इसलिए ऐसा कह रहा है लेकिन, जब गरीबी में दुःख के दिन तुम्हारे जिंदगी में आए तो मंदिर नहीं आना। 90 प्रतिशत बड़े आदमी और उनके बच्चे दुर्गुणी होते हैं। जब तुम्हारे जीवन में इतना पुण्य आ जाए, तुम्हारा इतना व्यापार चलें कि तुम्हे मंदिर जाने को, प्रवचन सुनने को समय न मिले तो मैं तुरंत समझ जाता हूं कि इसका पुण्य कह रहा है कि इसको मत बुलाओ, इसको हमें दुर्गति भेजना है। यदि तुम कमजोर हो और दुश्मन से बदला नहीं ले सकते हो तो तुम उसके हो जाओ। हर व्यक्ति चाहता है कि सारी दुनिया अच्छी हो मुझे छोड़ करके। यदि तुम रावण बनकर सीता को चाह रहे हो तो तुम धूल में मिल जाओगे, भस्म हो जाओगे। तुम राम बन जाओ, सीता को तुम्हें खोजना नहीं पड़ेगा, सीता तुम्हारे पास खुद मिल जाएगी। राम बनने की साधना नहीं हो रही और सब सीता चाहते हैं और साधना ये कहती है कि राम बनो, तुम सीता को नहीं चाहोगे, सीता तुम्हें चाहेगी।</p>
<p><strong>&#8230;क्योंकि गरीब बनकर भीख तो मांग लेगा</strong></p>
<p>जो-जो व्यक्ति तुम्हारी जिंदगी में आए और वह तुम्हें बीच में छोड़कर मर जाए। समझ लेना यह पूर्व भव का बैरी आया था जो तुम्हें मझधार में छोड़कर चला गया। तुम पति-पत्नी हो और पत्नी बीच में छोड़कर चली गई तो समझना भाई पूर्व की बैरन है। जो तुम्हें दुःख लेकर चल गई कि न तुम इधर के रहे, न उधर के। मां बेटे को भी छोड़कर जा सकती है। इसी तरह धन कहता है कि मैं तुम्हे बर्बाद करके रहूंगा, गरीब बनाकर नहीं, क्योंकि गरीब बनकर भीख तो मांग लेगा। कर्म कहता है मैं अमीर बनाकर मारूँगा, मैं तुझे इतना धन दूंगा कि चोर आकर सारे घर को सुलाएगा और सबकुछ लूट ले जाएगा। वो धन तुम्हारा बैरी बनकर आया था जबकि तुमने उसे अपना माना था क्योंकि, पूर्वभव में तुमने धन का अनादर दुरूपयोग किया था। तुमने धन से इतने पाप किए कि धन कहता है ले, यही धन तेरी मौत का कारण बनेगा।</p>
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