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	<title>उदय नगर &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
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	<title>उदय नगर &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>भावना की विशुद्धि से मोक्ष प्राप्ति तो अशुभ भावनाओं से परिभ्रमण: आचार्य श्री आर्जवसागर जी ने निर्मल भावनाओं की बताई महत्ता  </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 23 Jul 2025 14:19:17 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[उदय नगर स्थित जिनालय में विराजित दिगंबर जैनाचार्य श्री आर्जव सागर जी द्वारा सम्यक ध्यान प्रवचन श्रृंखला के अंतर्गत बुधवार को श्रद्धालुओं को निर्मल भावनाओं की महत्ता का उपदेश दिया गया। इंदौर से पढ़िए, ओम पाटोदी की यह खबर&#8230; इंदौर। उदय नगर स्थित जिनालय में विराजित दिगंबर जैनाचार्य श्री आर्जव सागर जी द्वारा सम्यक ध्यान [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>उदय नगर स्थित जिनालय में विराजित दिगंबर जैनाचार्य श्री आर्जव सागर जी द्वारा सम्यक ध्यान प्रवचन श्रृंखला के अंतर्गत बुधवार को श्रद्धालुओं को निर्मल भावनाओं की महत्ता का उपदेश दिया गया। <span style="color: #ff0000">इंदौर से पढ़िए, ओम पाटोदी की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> उदय नगर स्थित जिनालय में विराजित दिगंबर जैनाचार्य श्री आर्जव सागर जी द्वारा सम्यक ध्यान प्रवचन श्रृंखला के अंतर्गत बुधवार को श्रद्धालुओं को निर्मल भावनाओं की महत्ता का उपदेश दिया गया। स्वप्निल जैन ने बताया कि आचार्य श्री ने अपने प्रवचन में कहा कि जैसे मंदिर में शिखर, शिखर पर कलश और कलश के साथ ध्वज का विशेष महत्व होता है, वैसे ही आत्मा की शुद्धि के लिए निर्मल भावना अत्यंत आवश्यक है। हमारे भावों की विशुद्धि ही भव को सुधारने का आधार है। यदि भाव निर्मल हों, तो आत्मा का कल्याण निश्चित है और यही शुभ भावनाएं; भव अर्थात् संसार से मुक्ति दिलाने वाली होती हैं। पूर्वाचार्यों ने कहा भी है कि भावना भव नाशनी और भावना भववर्धनी। अर्थात बुरी भावना से भव वर्धन होता है, वैसे ही शुभ भावना से भव बंधन कटते हैं और मोक्ष की प्राप्ति संभव होती है। अतः हमें प्रयत्न करना चाहिए कि हमारे भावों में विचारों में कुटिलता नहीं आए। उत्तरोत्तर भावों में विशुद्ध बढ़े ताकि हम अपने सर्वाेच्च लक्ष्य को प्राप्त कर सकें और मोक्ष रूपी मंजिल को पा सकें। जैन धर्म में बारह भावना, सोलह कारण भावना आदि का चिंतन है, आचार्य श्री ने बताया कि इस प्रकार 70 भावनाएं होती है।</p>
<p><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-85817" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/07/IMG-20250723-WA0076.jpg" alt="" width="307" height="324" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/07/IMG-20250723-WA0076.jpg 307w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/07/IMG-20250723-WA0076-284x300.jpg 284w" sizes="(max-width: 307px) 100vw, 307px" />हर व्यक्ति को को बार-बार इन भावनाओं का चिंतन करना चाहिए। इन भावनाओं का चिंतन करने से सांसारिक मोह-माया से वैराग्य उत्पन्न होता है और आध्यात्मिक विकास में सहायता मिलती है। जैसे अनित्य भावना में चिंतन किया गया है कि इस संसार की सभी वस्तुएं क्षण भंगुर है। वहीं अशरण भावना हमारे चिंतन को उस सच्चाई की ओर ले जाती है कि हमरी मृत्यु के समय कोई भी व्यक्ति हमारी रक्षा नहीं कर सकता इसी प्रकार इन भावनाओं के चिंतन से हमारे संयम की भावना दृढ़ता को प्राप्त हुआ करती है।</p>
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		<title>मुनि श्री को चातुर्मास के लिए श्रीफल किया समर्पित: छत्रपति नगर पधारने का भी किया आग्रह  </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 10 Jun 2025 05:41:55 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मुनिश्री निष्पक्ष सागर जी और मुनि श्री निष्पृह सागर जी महाराज को मिनी बुंदेलखंड के रूप में चर्चित छत्रपति नगर में पधारने एवं इस वर्ष 2025 का चातुर्मास छत्रपति नगर में स्थापित करने के लिए श्रीफल भेंट किया। श्री दिगंबर जैन आदिनाथ धार्मिक एवं पारमार्थिक ट्रस्ट के अध्यक्ष भूपेंद्र जैन के नेतृत्व में समाजजनों ने [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>मुनिश्री निष्पक्ष सागर जी और मुनि श्री निष्पृह सागर जी महाराज को मिनी बुंदेलखंड के रूप में चर्चित छत्रपति नगर में पधारने एवं इस वर्ष 2025 का चातुर्मास छत्रपति नगर में स्थापित करने के लिए श्रीफल भेंट किया। श्री दिगंबर जैन आदिनाथ धार्मिक एवं पारमार्थिक ट्रस्ट के अध्यक्ष भूपेंद्र जैन के नेतृत्व में समाजजनों ने निवेदन कर अपनी भावना व्यक्त की। <span style="color: #ff0000">इंदौर से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> नगर के उदय नगर में विराजमान आचार्य श्री विद्यासागर जी एवं आचार्य श्री समय सागर जी के शिष्य मुनिश्री निष्पक्ष सागर जी और मुनि श्री निष्पृह सागर जी महाराज को मिनी बुंदेलखंड के रूप में चर्चित छत्रपति नगर में पधारने एवं इस वर्ष 2025 का चातुर्मास छत्रपति नगर में स्थापित करने के लिए श्री दिगंबर जैन आदिनाथ धार्मिक एवं पारमार्थिक ट्रस्ट छत्रपति नगर के अध्यक्ष भूपेंद्र जैन के नेतृत्व में समाज जनों ने श्रीफल समर्पित किया और निवेदन तथा अपनी भावना व्यक्त की।</p>
<p>राजेश जैन दद्दू ने बताया कि इस अवसर पर मुनिश्री ने कहा कि आपकी भावना गुरु भक्ति अच्छी है। इस अवसर पर छत्रपति नगर के डॉ. जैनेंद्र जैन, विपुल बांझल, कमल जैन, राकेश नायक, अखिलेश सोधिया, श्रुत जैन, संदीप जैन आलोक जैन एवं वीरेंद्र जैन आदि समाज जन उपस्थित थे।</p>
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		<title>धर्मचर्चा : आत्मा की अमूढ़ता वंदनीय आर्यिका मां 105 श्री विज्ञानमती माताजी      </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 06 Aug 2023 12:32:26 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[उदयनगर कॉलोनी स्थित चंदा प्रभु जिनालय में विज्ञानमती माताजी संसघ के चातुर्मास दौरान धर्मचर्चा और प्रतिदिन क्लास रूपी प्रवचन के माध्यम से माता जी ने बताया की अमूढ़ आत्मा इन सबको अपना मानता है ये मेरा घर है,ये मेरा धन है,ये मेरी स्त्री है&#124; &#124; पढ़िए यह राजीव सिंघई मोनू की विशेष रिपोर्ट श्रीफल जैन [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>उदयनगर कॉलोनी स्थित चंदा प्रभु जिनालय में विज्ञानमती माताजी संसघ के चातुर्मास दौरान धर्मचर्चा और प्रतिदिन क्लास रूपी प्रवचन के माध्यम से माता जी ने बताया की अमूढ़ आत्मा इन सबको अपना मानता है ये मेरा घर है,ये मेरा धन है,ये मेरी स्त्री है| | <span style="color: #ff0000;">पढ़िए यह राजीव सिंघई मोनू की विशेष रिपोर्ट श्रीफल जैन न्यूज़ के साथ&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर |</strong> उदयनगर कॉलोनी स्थित चंदा प्रभु जिनालय में विज्ञानमती माताजी संसघ के चातुर्मास दौरान धर्मचर्चा और प्रतिदिन क्लास रूपी प्रवचन के माध्यम से माता जी ने बताया शरीर,धन,घर,स्त्री,पुत्र,मित्र, शत्रु&#8230;ये सब हमारे से सर्वथा भिन्न हैं फिर भी ये अमूढ़ आत्मा इन सबको अपना मानता है ये मेरा घर है,ये मेरा धन है,ये मेरी स्त्री है&#8230;और इनके वियोग होने पर दुखी होता है। यही आत्मा की अमूढ़ता है।</p>
<p><strong>वृक्ष और पक्षी</strong></p>
<p>अलग अलग देशों से, दिशाओं से पक्षी आकर के एक वृक्ष पर रहते हैं&#8230;फिर जिनको जिस दिशा में जाना होता है..वहां गमन कर जाते हैं उसी प्रकार हमारे यहां पर भी परिवार रूपी वृक्ष है उस पर&#8230;क्या पता नरक से आया..तिर्यंंच से आया&#8230;और आकर हमारे वृक्ष पर बैठ गया&#8230;कब तक बैठा रहेगा जब तक उसके कार्य की सिद्धी नहीं हो जाती&#8230;जैसे ही कार्य की सिद्धी होगी वृक्ष से चला जाएगा.. कोई नियम नहीं है&#8230;60 वर्ष तक रहेगा,60 महीने या 60 दिन रहेगा&#8230;कभी वृक्ष से चला जाएगा.. कोई आश्चर्य नहीं है.. कोई बदला लेने के लिए हमारे वृक्ष पर आ सकता है कोई प्रेम देकर चला जाएगा&#8230; किसीका जवान बेटा मर गया.. पहले प्रेम बढ़ाया.. लाड़ला बना,सबसे प्यारा था..उसको रुलाना था.. रुलाकर चला गया..पूर्व भव में आपने रुलाया होगा..अब वो रुला गया।</p>
<p><strong>बुरे के साथ भी अच्छा करो</strong></p>
<p>जैसा तुमने किसी के साथ किया है वैसा तुम्हारे साथ भी होगा,अच्छा किया तो अच्छा होगा,बुरा किया तो बुरा होगा..आज भले ही आपने आम का पेड़ (पुण्य) लगाया लेकिन अगर आपके आंगन में कांटे (दुःख) हैं वो इस बात का प्रमाण है कि आपने निश्चित ही पूर्व में बबूल का बीज (पाप) बोया था।</p>
<p><strong>महाराज जरूर बनेंगे</strong></p>
<p>तुम सबको महाराज बनना है कि नहीं&#8230;अरे हां तो बोल दिया करो&#8230; हां बनना है भले ही 80 साल में बनें या 90 साल में लेकिन बनेंगे जरूर.. कोई कितना ही गरीब हो उससे करोड़पति बनने का पूछेंगे तो वो मना कर देगा क्या&#8230;अभी भले ही हैसियत नहीं है लेकिन कभी तो बनेंगे&#8230; भावना भाते रहो कि हम भी महाराज बनेंगे&#8230; कम से कम अभी से ये संकल्प कर लो कि इतने साल बाद घर का त्याग कर देंगे।</p>
<p>इस प्रकार सब अपने अपने कार्य के वश होकर के आते हैं और कार्य करके अपने अपने देशों को चले जाते हैं इसलिए कोई अपने वृक्ष (घर) से चला जाए तो आर्त ध्यान नहीं करना.. जो आया है सो जाएगा। मारने वाले के लिए तू गुस्सा क्यों करता है मारने वाला तो स्वयं मारा जाएगा। सामने वाले ने कितना ही बुरा किया हो मैं उसका बुरा नहीं करूंगा&#8230; बुरा करना उसका काम है..मैं उसका काम क्यूं करूं? बुरा करना मुझे अच्छा नहीं लगता&#8230;उसने अंगारे फेंके हैं तो उसका हाथ जलेगा&#8230;उसने दुख दिया है तो उसको दुःख मिलेगा&#8230;मुझे उसे दुःख नहीं देना है।पारसनाथ ने कमठ का कभी बुरा नहीं किया और कमठ हमेशा बुरा करता रहा&#8230;अंत में किसका बुरा हुआ।अपन लोग तो कमठ के भक्त हैं&#8230;नहीं नहीं भक्त तो पारसनाथ के हैं लेकिन&#8230;काम हम पारसनाथ जैसा कार्य करें&#8230;नहीं कर सकते हैं तो कोई बात नहीं&#8230; कम से कम कमठ जैसे कार्य ना करें।</p>
<p><strong>व्रत लिए बगैर संलेखना हो सकती है क्या?</strong></p>
<p>व्रत कितने दिन के लिए धारण करना जरूरी है&#8230;.व्रत धारण किए बगैर सम्यग्दृष्टी की संलेखना होती है,क्या तकलीफ है,व्रत धारण करना अनिवार्य नहीं है&#8230;घर में रहकर भी अच्छी संलेखना हो सकती है&#8230;अगर उसको विधि आए तो। व्रत लेना चाहिए बहुत अच्छी बात है&#8230;और बहुत स्थिरता के साथ में व्रतों का पालन करना चाहिए।</p>
<p><strong>मांसाहार</strong></p>
<p>कल एक ठाकुर महिला आई थी उसने बताया कि उसकी दादी ने 10 साल की उम्र में मांसाहार का,व्यसन का त्याग करवा दिया था 15 साल की उम्र में उसकी शादी हो गई&#8230;ससुराल में ये सब चलता था&#8230;उसकी सासू ने मांस खाने व बनाकर खिलाने के लिए लातें तक मारी लेकिन वो अपने नियम से नहीं डिगी&#8230;घर भी नहीं छोड़ा और न स्वयं खाया न अपने पति को खाने दिया। इसे कहते हैं रघुकुल रीत सदा चली आई प्राण जाए पर वचन न जाई ऐसा करना चाहिए,ऐसा करके प्रतिमा लेने वाले की अवश्य समाधि होगी लेकिन जो प्रतिमा नहीं ले पा रहा है वो भी अंत समय में&#8230;.आजकल तो ऐसी ऐसी बीमारियां हो रही हैं&#8230;डॉक्टर पहले ही बता देता है&#8230; ऐसे में आदमी स्वतंत्रता पूर्वक समाधि ले सकता है लेकिन वेदना को सहन करना और घर वालों का माहौल नहीं बनता&#8230;करने वाले कर भी रहे हैं..दृढ़तापूर्वक करना ही चाहिए। जैन कुल में आने के बाद भी हम मिलावट के रूप में अप्रत्यक्ष रूप से मांसाहार का सेवन कर रहे हैं दवाई हो या बाजार की अन्य वस्तु&#8230;देखकर, पढ़कर,समझ कर सेवन करो।</p>
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