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	<title>उत्तम शौच धर्म &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>मुक्ति तभी संभव जब अंतरंग के विकार हों नष्ट :  पर्यूषण पर्व के चौथे दिन उत्तम शौच धर्म पर हुआ व्याख्यान </title>
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					<description><![CDATA[पर्यूषण पर्व में उत्तम क्षमा, उत्तम मार्दव, उत्तम आर्ज़व धर्म के बाद चौथे दिन बड़े जैन मंदिर में मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज एवं मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज ने उत्तम शौच धर्म पर व्याख्यान दिया। पढ़िए, यह खबर&#8230; पर्यूषण पर्व में उत्तम क्षमा, उत्तम मार्दव, उत्तम आर्ज़व धर्म के बाद चौथे दिन बड़े जैन मंदिर में मुनिश्री विलोकसागरजी [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>पर्यूषण पर्व में उत्तम क्षमा, उत्तम मार्दव, उत्तम आर्ज़व धर्म के बाद चौथे दिन बड़े जैन मंदिर में मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज एवं मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज ने उत्तम शौच धर्म पर व्याख्यान दिया। <span style="color: #ff0000">पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p>पर्यूषण पर्व में उत्तम क्षमा, उत्तम मार्दव, उत्तम आर्ज़व धर्म के बाद चौथे दिन बड़े जैन मंदिर में मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज एवं मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज ने उत्तम शौच धर्म पर व्याख्यान दिया। उन्होंने कहा कि कि कषाय जीव के लिए बहुत हानिकारक है। लोभ कषाय जीव के लिए बहुत खतरनाक है। लोभ कषाय करने से जीव को नरक तिरंच आदि गतियों में कई भवो तक चक्कर लगाने पड़ते हैं । आज तक जितने भी जीव इस संसार से पार हुए हैं उन सभी जीवों को लोभ को छोड़कर के उत्तम शौच धर्म को अपनाना पड़ा है। जैन दर्शन में उत्तम शौच धर्म एक महत्वपूर्ण अवधारणा है, जिसका अर्थ है पवित्रता या शुचिता। यह न केवल शारीरिक स्वच्छता को दर्शाता है, बल्कि आंतरिक शुचिता, यानी मन, वचन और कर्म की शुद्धता पर भी जोर देता है। मन में लोभ, मोह, क्रोध, माया, और ईर्ष्या जैसी भावनाओं को कम करना या त्यागना ही उत्तम शौच धर्म है।</p>
<p><strong>दसलक्षण विधान में नीरज शास्त्री ने किया मंत्रोचार</strong></p>
<p>बड़े जैन मंदिर में चल रहे दस दिवसीय दसलक्षण विधान में सांगानेर से पधारे हुए विद्वत नीरज जैन शास्त्री ने मंत्रोचारण करते हुए सभी क्रियाएं सम्पन्न कराईं। रात्रिकालीन शास्त्र सभा के दौरान नीरज जैन शास्त्री ने कहा कि कषाय जीव के पतन का कारण है। कषाय ही जीव को दुर्गति में भटकाता है। कषाय के कारण ही जीव त्रियंच नरक आदि गतियों में जाता है। कषाय में सबसे भयंकर लोभ कषाय होती है। जब व्यक्ति का लाभ बढ़ता है तो साथ में उसका लोभ भी बढ़ता है । लोभ कषाय बहुत भयंकर होती है। लोभ के कारण जीव दुर्गातियों में जाता है ।</p>
<p><strong>तीर्थंकर पुष्पदंत भगवान का मोक्ष कल्याणक</strong></p>
<p>दसलक्षण पर्व के दौरान रविवार को मुनिश्री विलोकसागरजी एवं मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज के पावन सान्निध्य में जैन धर्मावलंबियों द्वारा भगवान पुष्पदंत स्वामी का मोक्ष कल्याणक मनाया गया। सभी श्रावकों ने भगवान पुष्पदंत स्वामी का जलाभिषेक, शांतिधारा कर अष्टदृव्य से पूजन किया। तत्पश्चात निर्वाण कांड का वाचन करते हुए मोक्ष लक्ष्मी की कामना के साथ जिनेंद्र प्रभु के श्री चरणों में निर्वाण लाड़ू अर्पित किया। इस अवसर पर प्रथम स्वर्ण कलशाभिषेक राजकुमार, पुनीतकुमार जैन, प्रथम शांतिधारा राजेश कुमार, पंकज जैन मेडिकल एवं द्वितीय शांतिधारा राजेशकुमार, विपुलकुमार विपुल मोक्ष जैन को करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। मोक्ष कल्याणक पर सर्वप्रथम लाड़ू अर्पित करने का सौभाग्य डालचंद जैन को प्राप्त हुआ। सभी भक्तों ने अत्यंत ही श्रद्धा एवं भक्ति के साथ निर्वाण लाड़ू अर्पित किया।</p>
<p><strong>सभी जिनालयों में पर्यूषण पर्व की धूम</strong></p>
<p>नगर के सभी जिनालयों में पर्यूषण पर्व की धूम मची हुई है। श्रीचंद्रप्रभु चैत्यालय मंदिर, आदिनाथ चैत्यालय गंज एवं लोहिया बाजार जैन मंदिरों में विशेष पूजा अर्चना की गई। आज नसियाजी जैन मंदिर में प्रथम अभिषेक एवं शांतिधारा सुरेशचंद चंद्रप्रकाश राजकुमार जैन द्वारा एवं द्वितीय शांतिधारा नीलेशकुमार विदित जैन द्वारा की गई। सभी भक्तों ने विशेष मंत्रों का वाचन करते हुए भगवान पुष्पदंत मोक्ष कल्याणक के अवसर पर मोक्षलक्ष्मी की कामना के साथ श्री जिनेंद्र प्रभु के चरणों में निर्वाण लाड़ू अर्पित किया।</p>
<p><strong>मन की कषायों को छोड़ना होगा</strong></p>
<p>चार मित्र एक स्थान पर जा रहे थे, अंधेरा हो गया था । रास्ते में नदी मिली, नदी के पास नाव भी दिखी। चारों मित्र नाव में सवार हो गए। चारों मित्रों ने अपने अपने हाथों में पतवार सम्हाली और नाव को खेने लगे। चारों मित्र ये सोचकर कि रात भर नाव को चलाते रहे कि हम सही रास्ते पर चल रहे हैं और सुबह होने तक अपनी मंजिल पर पहुंच जाएंगे लेकिन, जैसे ही सुबह हुई, उजाला हुआ तो उन्होंने देखा कि हम तो नदी के उसी किनारे पर खड़े हैं, जहां से यात्रा प्रारंभ की थी। उन सभी को भारी आश्चर्य हुआ कि रातभर नाव चलाने के बाद भी हम वहीं के वहीं खड़े हैं। तब एक मित्र ने देखा कि नाव तो अपने खूंटे पर एक रस्सी से बंधी है, रस्सी की गांठ को तो हमने खोला ही नहीं हैं। यही हाल हमारा है, हम सब खूब भगवान की भक्ति करते हैं, पूजन करते हैं लेकिन, अंदर के विकारों को, अंदर की बुराइयों को, अंदर की कषायों को नहीं छोड़ते। इसी कारण हम संसार में भटकते रहते हैं और मुक्ति प्राप्त नहीं कर पाते। हमें अपने अंदर की बुराइयों को, कषायों को त्यागना होगा, तभी इस संसार से मुक्ति संभव है।</p>
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		<title>लोभ-लालच और लिप्सा से निवृत्ति ही शौच धर्म है : उत्तम शौच धर्म पर मुनिश्री प्रमाणसागर के विचारों से मिली श्रावकों को प्रेरणा  </title>
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		<pubDate>Mon, 01 Sep 2025 07:55:11 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[दशलक्षण पर्व के चतुर्थ दिवस पर उत्तम शौचष्धर्म की व्याख्या करते हुए मुनिश्री प्रमाणसागर महाराज ने कहा- मन की तरंग मार ले, बस हो गया भजन; आदत बुरी सुधार ले, बस हो गया भजन। मुनिश्री ने कहा कि इंसान झोपड़ी में रहता है लेकिन, महलों की चाह उसे चैन से जीने नहीं देती। भोपाल से [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>दशलक्षण पर्व के चतुर्थ दिवस पर उत्तम शौचष्धर्म की व्याख्या करते हुए मुनिश्री प्रमाणसागर महाराज ने कहा- मन की तरंग मार ले, बस हो गया भजन; आदत बुरी सुधार ले, बस हो गया भजन। मुनिश्री ने कहा कि इंसान झोपड़ी में रहता है लेकिन, महलों की चाह उसे चैन से जीने नहीं देती। <span style="color: #ff0000">भोपाल से पढ़िए, राजीव सिंघई मोनू की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>भोपाल।</strong> दशलक्षण पर्व के चतुर्थ दिवस पर उत्तम शौचष्धर्म की व्याख्या करते हुए मुनिश्री प्रमाणसागर महाराज ने कहा- मन की तरंग मार ले, बस हो गया भजन; आदत बुरी सुधार ले, बस हो गया भजन। मुनिश्री ने कहा कि इंसान झोपड़ी में रहता है लेकिन, महलों की चाह उसे चैन से जीने नहीं देती। यही चाह जीवन में काँटों का मार्ग बनाती है। धन की चाह कांटों का ताज है, जिसने गरीब से लेकर करोड़पति तक सभी को दौड़ाया है। धन की यह दौड़ इंसान को ठहरने नहीं देती और चित्त को मलिन करती है। उन्होंने कहा कि लोभ-लालच और लिप्सा से निवृत्ति ही शौच धर्म है। इच्छाओं की आग कभी खत्म नहीं होती, वह हवा और ऑक्सीजन की तरह भड़कती रहती है किंतु, संयम रूपी नाइट्रोजन ही इस आग को शांत कर सकती है।</p>
<p><strong>दूसरों की ओर निगाह रखने से केवल ‘दाह’ बढ़ती है</strong></p>
<p>मुनिश्री ने प्रसिद्ध लेखक टॉलस्टॉय का उल्लेख करते हुए कहा कि मनुष्य के जीवन की दो बड़ी घटनाएँ हैं- जिसे वह चाहता है, वह मिलता नहीं और जो मिलता है, उसे चाहता नहीं। यदि जीवन को संभालना है तो जो मिला है उसमें संतोष करना सीखना होगा। दूसरों की ओर निगाह रखने से केवल ‘दाह’ बढ़ती है। उन्होंने स्पष्ट कहा- चाह होगी तो दाह होगी। इसे कोई रोक नहीं सकता। बड़े-बड़े धनपति और उद्योगपति भी इस संसार से आह भरते ही विदा हो गए। यदि चाह और दाह को शांत करना है तो संयम की राह पकड़ो, जहाँ संतोष ही आदर्श है।</p>
<p><strong>दशलक्षण धर्म की पूजा भक्ति भाव से की </strong></p>
<p>जैन धर्म निष्कर्म बनने की प्रेरणा नहीं देता, बल्कि निष्काम बनने की राह दिखाता है। जीवन में पुरुषार्थ करना चाहिए, किंतु यह भाव रखना आवश्यक है कि ष्मेरे हाथ में प्रयत्न है, परिणाम नहीं। प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ ने बताया कि प्रातःकाल भगवान का अभिषेक एवं शांतिधारा के साथ दशलक्षण धर्म की पूजा भक्ति भाव से की गई। भगवान पुष्पदंत स्वामी के निर्वाण कल्याणक के अवसर पर मुनिश्री ने भावनायोग के माध्यम से श्री सम्मेदशिखर तीर्थराज का ध्यान कराया और निर्वाण लाड़ू चढ़ाया गया। इसका सौभाग्य मधु जैन व पारस जैन (आगरा) को प्राप्त हुआ। इस अवसर पर भोपाल सहित इंदौर, विदिशा, सागर, ललितपुर, मुंबई, आगरा, दिल्ली, कोलकाता और बोस्टन (अमेरिका) से श्रद्धालु बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। मुनिश्री संधानसागर महाराज सहित सभी क्षुल्लक विराजमान रहे। संचालन अशोक भैया लिधोरा ने किया।</p>
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		<title>लोभ की मुक्ति से मिलती है पवित्रता : मुनि गुरुदत्त सागर ने बताया उत्तम शौच धर्म का महत्व  </title>
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		<pubDate>Mon, 01 Sep 2025 07:53:30 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[श्री अजितनाथ दिगंबर जैन मंदिर में चल रहे दशलक्षण महापर्व के चौथे दिन रविवार को उत्तम शौच धर्म पर धर्मसभा का आयोजन हुआ। आचार्य श्री निर्भयसागर महाराज के शिष्य मुनि श्री गुरुदत्त सागरजी एवं मुनि श्री मेघदत्त सागर जी की ससंघ मंगलमय उपस्थिति में श्रद्धालुओं ने धर्मलाभ लिया। महरौनी से पढ़िए, यह खबर&#8230; महरौनी। श्री [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>श्री अजितनाथ दिगंबर जैन मंदिर में चल रहे दशलक्षण महापर्व के चौथे दिन रविवार को उत्तम शौच धर्म पर धर्मसभा का आयोजन हुआ। आचार्य श्री निर्भयसागर महाराज के शिष्य मुनि श्री गुरुदत्त सागरजी एवं मुनि श्री मेघदत्त सागर जी की ससंघ मंगलमय उपस्थिति में श्रद्धालुओं ने धर्मलाभ लिया। <span style="color: #ff0000">महरौनी से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>महरौनी।</strong> श्री अजितनाथ दिगंबर जैन मंदिर में चल रहे दशलक्षण महापर्व के चौथे दिन रविवार को उत्तम शौच धर्म पर धर्मसभा का आयोजन हुआ। आचार्य श्री निर्भयसागर महाराज के शिष्य मुनि श्री गुरुदत्त सागरजी एवं मुनि श्री मेघदत्त सागर जी की ससंघ मंगलमय उपस्थिति में श्रद्धालुओं ने धर्मलाभ लिया। धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनि श्री गुरुदत्त सागर जी ने कहा कि “उत्तम शौच का दूसरा नाम शुचिता और पवित्रता है। यह लोभ और अत्यधिक इच्छाओं को नियंत्रित करने से प्राप्त होती है। व्यक्ति को अपने पास जो है, उसी में संतोष करना चाहिए। लोभ के वशीभूत होकर ही मनुष्य सभी प्रकार के पाप कर्म करता है और यही समस्त दुखों का मूल कारण है।</p>
<p>इसी कारण लोभ को ‘पाप का बाप’ कहा गया है। अतः हमें लोभ का त्याग कर आत्मा को शुद्ध एवं पवित्र बनाने का प्रयास करना चाहिए।” वहीं मुनि श्री मेघदत्त सागर जी ने प्रवचन में कहा कि उत्तम शौच धर्म का अर्थ है आत्मा में शुचिता, लोभ का अभाव और संतोष का भाव। उन्होंने कहा कि बाहरी वस्तुओं की लालसा छोड़कर, जो कुछ है उसमें संतुष्ट रहने से ही वास्तविक पवित्रता प्राप्त होती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि “केवल बाहरी स्नान करने से शरीर शुद्ध नहीं होता, बल्कि आत्मा की शुद्धि के लिए लोभ कषाय का अभाव आवश्यक है।” रात्रि में पुरुष एवं महिला वर्ग की ओर से धार्मिक अंताक्षरी प्रतियोगिता का आयोजन हुआ, जिसमें श्रद्धालुओं ने बड़ी रुचि ली। इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं मौजूद रहीं और दशलक्षण महापर्व की बेला को धर्ममय वातावरण में मनाया। पंडित सनिल के भजनों ने इस पर्व में समां बांध दिया।</p>
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		<title>संसार को पसंद मत करो मोक्ष को पसंद करो-आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी : आचार्यश्री को कटारिया परिवार ने किया कमंडल भेंट  </title>
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		<pubDate>Mon, 01 Sep 2025 07:45:38 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[ आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज के सानिध्य में 10 लक्षण पर्व का चौथा दिन उत्तम शौच धर्म के रूप में मनाया गया। प्रतिदिन की भांति प्रातः 5 बजे आचार्य श्री ने ध्यान कराया। ध्यान उपरांत नगर के प्रमुख मंदिरों में पूजन अभिषेक एवं शांति धारा की गई। रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह [&#8230;]]]></description>
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<p><strong> आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज के सानिध्य में 10 लक्षण पर्व का चौथा दिन उत्तम शौच धर्म के रूप में मनाया गया। प्रतिदिन की भांति प्रातः 5 बजे आचार्य श्री ने ध्यान कराया। ध्यान उपरांत नगर के प्रमुख मंदिरों में पूजन अभिषेक एवं शांति धारा की गई। <span style="color: #ff0000">रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong> रामगंजमंडी।</strong> आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज के सानिध्य में 10 लक्षण पर्व का चौथा दिन उत्तम शौच धर्म के रूप में मनाया गया। प्रतिदिन की भांति प्रातः 5 बजे आचार्य श्री ने ध्यान कराया। ध्यान उपरांत नगर के प्रमुख मंदिरों में पूजन अभिषेक एवं शांति धारा की गई। मुख्य पंडाल में भी श्री जी का अभिषेक एवं शांति धारा की गई। इसके उपरांत नित्य नियम पूजन की गई एवं मुख्य तीन मंडलों पर आचार्य श्री के सानिध्य में तत्वार्थ सूत्र के अर्ध समर्पित किए गए। इन अनुपम क्षणों में भक्ति भाव से ओतप्रोत होते हुए प्रेमलता, महेश, नमिता, दर्पक, हार्दिक कटारिया परिवार रामगंजमंडी ने आचार्य श्री के कर कमलों में कमंडल भेंट किया। इस अवसर पर समस्त कटारिया परिवार मौजूद रहा। आचार्य श्री ने उत्तम शौच धर्म पर प्रकाश डाला। आचार्य श्री ने कहा धर्म हमें प्रेरणा देता है कि संसार को पसंद मत करो मोक्ष को पसंद करो लेकिन, हमें संसार पसंद आता है। जब तक संसार में दृष्टि रहेगी। हाथ में कुछ भी नहीं लगने वाला है। हमें मोक्ष को पसंद करना चाहिए। संपूर्ण सुखी अनुभूति मोक्ष में है और संपूर्ण दुखो की अनुभूति संसार में है। हमें पतन की ओर जाना है या उत्थान की ओर जाना है यह निर्णय हमें स्वयं करना होगा।</p>
<p><strong>चमत्कार साधना में होता है </strong></p>
<p>आचार्य श्री ने कहा किसी वस्तु में चमत्कार नहीं होता है चमत्कार हमारी साधना में होता है। चमत्कार धन में नहीं पुण्य में होता है। लोगों के यहां धन के ढेर लगे होते हैं और वह एक अन्न का दाना भी नहीं खा पाते हैं। चमत्कार धन में नहीं होता है। आप जोड़े चले जा रहे हैं। आप जोड़े चले जा रहे हैं। चमत्कार आपकी आत्मा में है, जो पुण्य हासिल करती है, जो उसे पुण्य के उदय में आकर भोग कर पाती है। लोगों ने मान रखा है कि धन में ही लाभ होता है। इसीलिए लोग धन के पीछे भाग रहे हैं।</p>
<p><strong>लोभ पाप का बाप है </strong></p>
<p>आचार्य श्री ने लोभ को पाप का बाप बताते हुए कहा कि उन्होंने कहा कि खुद भी प्रेक्टिकल करके देखो। जब भी आपको लोभ आएगा। कोई ना कोई पाप आपसे जरूर होगा। लोभ आपको धन का आएगा। जो भी लोभ आयेगा आपसे सिर्फ पाप कराएंगे और कुछ नहीं कराएंगे।</p>
<p><strong>उत्तम शौच का अर्थ पवित्रता आत्मा की गंदगी को निकालना</strong></p>
<p>आचार्य श्री ने उत्तम शौच धर्म पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इसका अर्थ है पवित्रता आत्मा की गंदगी को निकालना। गुरुदेव ने कहा कि घर में इतनी सी धूल आपके मन को खटकती है और आप प्रयास करते हैं कि यह शीघ्र निकल जाए। हर उपाय करते हो और आत्मा में घर की धूल को साफ करने के लिए बनाने वाले ने इतनी चीजे बना दी कि घर में एक धूल का कण न मिले लेकिन, आत्मा में लगी धूल इसको साफ करने के लिए अनादि से उपाय है उत्तम शौच धर्म धारण कर लो आत्मा की गंदगी धीरे-धीरे बाहर आ जाएगी और एक दिन आत्मा साफ सुथरी मिलेगी। जो गंदा होता है वह कभी गंदा नहीं होता फिर भी अगर गंदा हुआ है तो हम उसे साफ कर सकते हैं। अगर साफ करने के उपाय में आ जाएं तो हम उसे साफ करके ही छोड़ेंगे। इसका सबसे सरल उपाय है निर्लाेभता।</p>
<p><strong>आचार्यश्री ने निर्लाेभता को समझाया </strong></p>
<p>आचार्य श्री ने निर्लाेभता को समझाया लाभ लो लेकिन लोभ मत करो। लाभ जितना हो उतना ग्रहण करो आसक्ति मत बढ़ाओ संग्रह मत करो उसके कारण लड़ो मत किसी को मारो पिटो नहीं। किसी को दुख और परेशान मत करो। लाभ तो लेना क्योंकि लाभ आपका पुण्य है लेकिन लोभ नहीं होना चाहिए। क्योंकि जहां लोभ आ जाता है वहा आत्मा अपवित्र हो जाती है। उन्होंने कहा लोभ बहुत अच्छी चीज नहीं है। उन्होंने कहा जब पुण्य का उदय होगा तो धन के लिए प्रार्थना करने की जरूरत ही नहीं होगी अपने आप आएगा, फिर थोड़ा सा परिश्रम करना होगा अपने आप धन आ जाएगा। उन्होंने कहा आपको बात माननी ही होगी आप ही कहेंगे कुछ नहीं चाहिए बस सुख चौन चाहिए। उन्होंने कहा अनासक्त भाव से निर्लाेभता आती है। आत्मा पवित्र होती है और उत्तम शौच धर्म आत्मा में बसता है। हमें यह प्रयास करना चाहिए उत्तम शौच धर्म हमारे आत्मा में समाहित हो जाए। हमारी आत्मा में प्रवेश कर जाए ताकि हमारी आत्मा पवित्र हो जाए।</p>
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		<title>पर्युषण के चौथे दिन उत्तम शौच धर्म का महात्म्य समझाया: अंतर्मुखी मुनिश्री पूज्यसागर जी महाराज ने उत्तम शौच धर्म पर शांतिधारा एवं मांगलिक क्रिया करवाईं </title>
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		<pubDate>Mon, 01 Sep 2025 07:25:58 +0000</pubDate>
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<p><strong>अंतर्मुखी मुनिश्री पूज्यसागर जी महाराज ने पर्युषण के चौथे दिन उत्तम शौच धर्म का महात्म्य समझाया। परिवहन नगर में रविवार को मुनिश्री के सानिध्य में पर्युषण पर्व पर उत्तम शौच धर्म के दिन शांतिधारा एवं मांगलिक क्रिया की गईं। <span style="color: #ff0000">इंदौर से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>इंदौर।</strong> अंतर्मुखी मुनिश्री पूज्यसागर जी महाराज ने पर्युषण के चौथे दिन उत्तम शौच धर्म का महात्म्य समझाया। परिवहन नगर में रविवार को मुनिश्री के सानिध्य में पर्युषण पर्व पर उत्तम शौच धर्म के दिन शांतिधारा एवं मांगलिक क्रिया की गईं। दीप प्रज्वलन और पाद प्रक्षालन कर शास्त्र भेंट के पुण्यार्जक इंद्र चेतन, भारती, अर्चित, आरव जैन, चंदन, अंजना, धैर्य माही रावका परिवार रहे। रविवार को सुबह 7 बजे गुरुदेव के मुखारविंद से अभिषेक शांति धारा हुई। 7.45 बजे प्रीति लोकेंद्र, टीसा लोकेंद्र जैन का 3 उपवास के बाद पारणा गुरुदेव के आशीर्वाद से हुआ। 8 बजे से नित्य नियम पूजन, पुष्पदंत भगवान, महावीर स्वामी पूजन, सोलह कारण पूजन, पंचमेरू पूजन, दसलक्षण धर्म पूजन संगीतकार जैनम जैन ने करवाया। गुरुदेव के प्रवचन 10 बजे से हुए। इस अवसर पर आचार्य अभिनंदन सागर जी महाराज, आचार्य वर्धमान सागर जी की तस्वीर के सामने दीप प्रज्वलन करने, अंतर्मुखी मुनिश्री पूज्य सागर जी के पाद प्रक्षालन, शास्त्र भेंट प्रमोद, सुलेखा, दीपेश चंदेरिया, चेतन, भारती, अर्चित, आरव जैन, ऋषभ रजनी जैन ने किया।</p>
<p><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-89266" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/09/IMG-20250901-WA0021.jpg" alt="" width="1600" height="900" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/09/IMG-20250901-WA0021.jpg 1600w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/09/IMG-20250901-WA0021-300x168.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/09/IMG-20250901-WA0021-1024x576.jpg 1024w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/09/IMG-20250901-WA0021-768x432.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/09/IMG-20250901-WA0021-1536x864.jpg 1536w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/09/IMG-20250901-WA0021-990x557.jpg 990w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/09/IMG-20250901-WA0021-1320x743.jpg 1320w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/09/IMG-20250901-WA0021-470x264.jpg 470w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/09/IMG-20250901-WA0021-640x360.jpg 640w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/09/IMG-20250901-WA0021-215x120.jpg 215w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/09/IMG-20250901-WA0021-414x232.jpg 414w" sizes="(max-width: 1600px) 100vw, 1600px" />शाम को 6 बजे प्रतिक्रमण, सामायिक ध्यान मुनिश्री पूज्यसागर जी ने करवाया। रात्रि 8.15 बजे आरती भक्ति तथा मुनिश्री के शौच धर्म पर प्रवचन हुए। 9.30 बजे सांस्कृतिक कार्यक्रम धार्मिक अंताक्षरी का आयोजन महावीर नवयुग मंडल ने करवाया। यह जानकारी परिवहन नगर के श्रेष्ठी जैन ने दी।</p>
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		<title>संतोषी प्राणी सदैव पुण्य का बंध करता है : उत्तम शौच धर्म पर प्रतिष्ठाचार्य विजय कुमार जैन ने दी शिक्षा </title>
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		<pubDate>Mon, 01 Sep 2025 05:35:17 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[अयोध्या। अखिल भारतवर्षीय दिगंबर जैन युवा परिषद के कार्याध्यक्ष अशोक पाटील ने बताया कि गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ससंघ अयोध्या में विराजमान हैं। गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी के संघस्थ ब्रम्हचारी प्रतिष्ठाचार्य विजयकुमार जैन ने उत्तम धर्म के बारे में कहा कि &#8211; उत्तम शौच सर्व जग जाना, लोभ पाप को बाप बखाना। आशा-पास [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>अयोध्या।</strong> अखिल भारतवर्षीय दिगंबर जैन युवा परिषद के कार्याध्यक्ष अशोक पाटील ने बताया कि गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ससंघ अयोध्या में विराजमान हैं। गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी के संघस्थ ब्रम्हचारी प्रतिष्ठाचार्य विजयकुमार जैन ने उत्तम धर्म के बारे में कहा कि &#8211; उत्तम शौच सर्व जग जाना, लोभ पाप को बाप बखाना। आशा-पास महा दुःखदानी, सुख पावैं संतोषी प्रानी।। उत्तम शौच धर्म सुचिता के भाव को प्रगट करता है। शौच अर्थात् आत्म शुद्धि।</p>
<p>जब तक आत्मा में शुद्धि के परिणाम नहीं होगे अर्थात् परिणामों में विशुद्धि नहीं होगी तब तक किसी भी प्रकार का धर्म प्रगट नहीं हो सकता है। शौच धर्म लोभ-कषाय के अभाव में प्रगट होता है। आचार्यों ने लोभ को पाप का बाप कहा है क्योंकि, प्राणी लोभ के वशीभूत होकर के ही पापों को करता चला जाता है एवं अपने आपको दुर्गति का पात्र बना लेता है। आशाओं से परिपूर्ण व्यक्ति सदैव ही लोभवृत्ति को प्राप्त होता है। संतोषी प्राणी सदैव पुण्य का बंध करता है एवं पापों से दूर रहता है। यही उत्तम शौच धर्म है। शुचि का जो भाव शौच वो ही, मन से सब लोभ दूर करना। निर्लोभ भावना से नित ही, सब जग को स्वप्न सदृश गिनना।</p>
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		<title>जो शाश्वत उसे प्राप्त करना उत्तम सत्य धर्म : आचार्य श्री विमर्शसागर जी ने बताया उत्तम शौच धर्म का महत्व </title>
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		<pubDate>Mon, 01 Sep 2025 05:28:07 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[उत्तम सत्य धर्म-दूसरों को पीड़ादायक कठोर वचन परनिंदापरक वचन, झूठ वचन तथा दूसरों को नीचा दिखाने वाले वचन, असत्य की श्रेणी में आते हैं। सहारनपुर से पढ़िए, सोनल जैन की यह खबर&#8230;  सहारनपुर। उत्तम सत्य धर्म-दूसरों को पीड़ादायक कठोर वचन परनिंदापरक वचन, झूठ वचन तथा दूसरों को नीचा दिखाने वाले वचन, असत्य की श्रेणी में [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>उत्तम सत्य धर्म-दूसरों को पीड़ादायक कठोर वचन परनिंदापरक वचन, झूठ वचन तथा दूसरों को नीचा दिखाने वाले वचन, असत्य की श्रेणी में आते हैं। <span style="color: #ff0000">सहारनपुर से पढ़िए, सोनल जैन की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong> सहारनपुर</strong>। उत्तम सत्य धर्म-दूसरों को पीड़ादायक कठोर वचन परनिंदापरक वचन, झूठ वचन तथा दूसरों को नीचा दिखाने वाले वचन, असत्य की श्रेणी में आते हैं। इन सभी असत्य वचन को त्याग कर हित-मित प्रिय वचन कहना, उत्तम सत्य धर्म है। इस धर्म के होने पर ही धार्मिकता होती है। उत्तम सत्य धर्म-सत्य व्यक्तिगत अनुभूति का नाम है। सत्य की अनुभूति के पूर्व जीवन में उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव और शौच को प्रगट करना पड़ता है तब सत्य का अनुभव हो पाता है। सत्य की सिर्फ अनुभूति की जा सकती है क्योंकि, सत्य वस्तु का स्वभाव है। सत्य सिर्फ अनुभव का विषय है, इसमें किसी को शामिल नहीं किया जा सकता। कोई पूछे जल का स्वभाव शीतलता कैसा होता है? अरे भाई ! वो तो जैसा होता है वैसा ही होता है, जहाँ सत्य के प्रति प्रश्न खड़ा हो जाये, वहाँ शब्द मौन हो जाते हैं, क्योंकि अनुभव को शब्दों से नहीं बताया जा सकता। सत्य दो प्रकार का होता है, एक निश्चय सत्य और दूसरा व्यवहार सत्य। निश्चय सत्य वह है जो अविनाशी है दूसरा सत्य व्यवहार सत्य है जो लोक व्यवहार में बोला जाता है। निश्चय सत्य बोला नहीं जाता, सिर्फ अनुभव किया जाता है और व्यवहार सत्य वह है जो शब्दों के द्वारा प्रगट होता दिखता है।</p>
<p>जीवन में इस शब्द रूप वाणी का बहुत प्रभाव होता है। एक वाणी वो है जो घाव कर देती है और एक वाणी वो है जो घाव को भर देती है उत्तम सत्य धर्म स्वपर का भेद विज्ञान करने वाले निग्रंथ योगीराज द्वारा पालन किया जाता है। सत्य वचन, उत्तम सत्य धर्म नहीं है, उत्तम सत्य धर्म तक पहुँचने का मार्ग है। उत्तम सत्य तो निज शुद्धात्मा है। सत्य बोलना व्यवहार उत्तम सत्य धर्म है और निज शुद्धात्मा निश्चय उत्तम सत्य धर्म है। सत्य शाश्वत है और जो शाश्वत है वही सत्य है। सत्य त्रैकालिक होता है। सत्य कभी नष्ट नहीं होता, सत्य कभी परिवर्तित नहीं होता। अग्नि में ऊष्णता है यह सत्य है, यह सत्य किसी भी काल में, दिन में, रात में हमेशा हमारे साथ है। सत्य को कभी झुठलाया नहीं जा सकता। हमारी मनुष्य पर्याय शाश्वत नहीं है, कथंचित सत्य है कथंचित असत्य है पर्याय का सत्य यही है कि वह बदलती रहती है और द्रव्य का सत्य यही है कि वह शाश्वत होता है। शाश्वत सत्य और व्यवहारिक सत्य को जानकर उत्तम सत्य धर्म की प्राप्ति का पुरुषार्थ करना चाहिये। जैन धर्म के दशलक्षण महापर्व में आज उत्तम सत्य धर्म का दिन है सहारनपुर मे परम पूज्य भावलिंगी संत दिगंबर जैनाचार्य श्री विमर्शसागर जी महामुनिराज ससंघ (30 पिच्छी) के सानिध्य में &#8216;उपासक धर्म संस्कार शिविर&#8217; में जैन धर्मानुयायी भावशुद्धि द्वारा अपने जीवन को सफल कर रहे हैं।</p>
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		<title>सनावद में पर्युषण पर्व के चौथे दिन सामूहिक पूजन और विधान सम्पन्न : आत्मा के परिणामों की शुद्धता ही है उत्तम शौच धर्म – मुनि साध्य सागर जी </title>
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		<pubDate>Mon, 01 Sep 2025 05:14:56 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[सनावद में पर्युषण पर्व के चौथे दिन उत्तम शौच धर्म की महत्ता पर मुनि श्री साध्य सागर जी महाराज ने प्रवचन दिए। इस दौरान पंचामृत अभिषेक, शांति धारा, लड्डू चढ़ाने और सामूहिक पूजन का आयोजन हुआ। पढ़िए सन्मति जैन काका की खास रिपोर्ट… सनावद में दसलक्षण पर्व के चौथे दिन का आयोजन श्रद्धा और भक्ति [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>सनावद में पर्युषण पर्व के चौथे दिन उत्तम शौच धर्म की महत्ता पर मुनि श्री साध्य सागर जी महाराज ने प्रवचन दिए। इस दौरान पंचामृत अभिषेक, शांति धारा, लड्डू चढ़ाने और सामूहिक पूजन का आयोजन हुआ। <span style="color: #ff0000">पढ़िए सन्मति जैन काका की खास रिपोर्ट…</span></strong></p>
<hr />
<p>सनावद में दसलक्षण पर्व के चौथे दिन का आयोजन श्रद्धा और भक्ति से सम्पन्न हुआ। मुनि श्री साध्य सागर जी महाराज ने अपने प्रवचन में कहा कि आत्मा के परिणामों में सरलता और शुचिता होना ही वास्तविक शौच है। जब यह शुचिता आत्मा की श्रद्धा से जुड़ती है, तब ‘उत्तम शौच धर्म’ कहलाती है।</p>
<p>उन्होंने बताया कि लोक में शरीर की स्वच्छता को ही शुचिता माना जाता है, परंतु जैन धर्म में परिणामों की शुद्धता को सर्वोपरि माना गया है। यह शुचिता लोभ का त्याग करने पर प्रकट होती है। मुनि श्री विश्वसूर्य सागर जी महाराज ने भी प्रवचन में कहा कि “लोभ पाप का बाप है” और इससे बचकर ही आत्मिक प्रगति संभव है।</p>
<p><strong>कल्याणक अवसर पर विशेष लड्डू चढ़ाया</strong></p>
<p>इस अवसर पर सन्मति काका ने जानकारी दी कि प्रतिदिन बड़े मंदिर जी और संत निलय में पंचामृत अभिषेक और सामूहिक पूजन का आयोजन हो रहा है। आज की शांति धारा का सौभाग्य विशाल श्रुति सराफ परिवार को प्राप्त हुआ। साथ ही, भगवान पुष्पदंत के मोक्ष कल्याणक अवसर पर विशेष लड्डू चढ़ाया गया। आदिनाथ छोटे मंदिर में समाजजनों द्वारा दसलक्षण पर्व विधान का आयोजन किया गया, जहां उत्तम शौच धर्म की विशेष पूजन की गई। सभी समाजजन बड़ी संख्या में उपस्थित होकर इस धार्मिक अवसर के साक्षी बने।</p>
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		<title>भक्ति भाव से झूमरीतिलैया में मनाया गया पर्युषण महापर्व का चौथा दिवस : उत्तम शौच धर्म की आराधना, प्रवचन और सांस्कृतिक कार्यक्रम बने आकर्षण </title>
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		<pubDate>Mon, 01 Sep 2025 05:07:10 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[झूमरीतिलैया। श्री दिगंबर जैन समाज झूमरीतिलैया के दोनों जैन मंदिरों में पर्युषण महापर्व अत्यंत भक्ति और श्रद्धा के साथ मनाया जा रहा है। आज पर्व का चौथा दिन उत्तम शौच धर्म के रूप में समर्पित किया गया। इस अवसर पर बड़ा मंदिर स्थित सरस्वती भवन में जयपुर से पधारीं डॉ. निर्मला दीदी ने अपने प्रवचन [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>झूमरीतिलैया</strong>। श्री दिगंबर जैन समाज झूमरीतिलैया के दोनों जैन मंदिरों में पर्युषण महापर्व अत्यंत भक्ति और श्रद्धा के साथ मनाया जा रहा है। आज पर्व का चौथा दिन उत्तम शौच धर्म के रूप में समर्पित किया गया।</p>
<p>इस अवसर पर बड़ा मंदिर स्थित सरस्वती भवन में जयपुर से पधारीं डॉ. निर्मला दीदी ने अपने प्रवचन में कहा—</p>
<p>“उत्तम शौच लोभ परिहारी, संतोषी गुण रतन भंडारी”। उन्होंने समझाया कि जो व्यक्ति लोभ और लालच का त्याग करता है तथा संतोष धारण करता है, वह आत्मा की निर्मलता को प्राप्त कर परम शांति का अनुभव करता है।</p>
<p>सुबह नये मंदिर एवं बड़े मंदिर में भगवान की भव्य अभिषेक-शांतिधारा हुई। अनेक परिवारों को इस पुण्य का सौभाग्य मिला। साथ ही दसलक्षण धर्म की संगीतमय पूजन संपन्न हुई, जिसका आयोजन सुबोध-आशा जैन गंगवाल परिवार ने किया। आज का दिन विशेष इसलिए भी रहा क्योंकि जैन धर्म के 9वें तीर्थंकर भगवान श्री पुष्पदंतनाथ का निर्वाण दिवस पूरे समाज में उल्लास के साथ मनाया गया। इस अवसर पर निर्वाण लड्डू अर्पित किए गए।</p>
<p><strong>शास्त्री और निर्मला दीदी ने धर्म प्रवचन दिया</strong></p>
<p>संध्या में महाआरती के पश्चात पंडित अभिषेक शास्त्री और निर्मला दीदी ने धर्म प्रवचन दिया। इसके बाद सांस्कृतिक कार्यक्रम में विभिन्न समूहों ने प्रस्तुतियाँ दीं।</p>
<p>• अनिता जैन सोगानी और किरण जैन ठोल्या द्वारा समाज की कुरीतियों पर आधारित नाटक को प्रथम पुरस्कार मिला।</p>
<p>• योग प्रतियोगिता में प्रथम जैन को द्वितीय स्थान प्राप्त हुआ।</p>
<p>• भजन प्रतियोगिता में ललित जैन सेठी और सायशा जैन को तृतीय स्थान दिया गया।</p>
<p>पुरस्कार वितरण नवीन-बबिता, वैशाली और आकांक्षा जैन सेठी के करकमलों से किया गया। मौके पर समाज के पदाधिकारी, संयोजक और मीडिया प्रभारी राजकुमार जैन अजमेरा एवं नवीन जैन उपस्थित रहे।</p>
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		<title>उत्तम शौच धर्म के साथ परयूषण का चौथा दिवस मनाया : भगवान पुष्पदंत का मोक्ष कल्याणक, मंदिरों में चढ़ाए निर्वाण लाडू </title>
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		<pubDate>Mon, 01 Sep 2025 05:03:50 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[धामनोद (बड़वानी) – परयूषण पर्व के चौथे दिवस को उत्तम शौच धर्म के रूप में मनाया गया। इस दिन भगवान पुष्पदंत का मोक्ष कल्याणक बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। आर्यिका श्री माताजी ने धर्मसभा में बताया कि शौच का अर्थ केवल बाहरी स्वच्छता नहीं बल्कि आंतरिक शुचिता और लोभ का त्याग है। पढ़िए खास [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>धामनोद (बड़वानी) – परयूषण पर्व के चौथे दिवस को उत्तम शौच धर्म के रूप में मनाया गया। इस दिन भगवान पुष्पदंत का मोक्ष कल्याणक बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। आर्यिका श्री माताजी ने धर्मसभा में बताया कि शौच का अर्थ केवल बाहरी स्वच्छता नहीं बल्कि आंतरिक शुचिता और लोभ का त्याग है। <span style="color: #ff0000">पढ़िए खास रिपोर्ट…</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>धामनोद // बड़वानी।</strong> जैन धर्म का सबसे बड़ा पर्व परयूषण महापर्व देश-विदेश में बड़ी श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जा रहा है। श्रावक-श्राविकाएं तप और त्याग के साथ उपवास, एकाशना और विभिन्न प्रकार के संयम व्रत कर रहे हैं। कोई एक दिन, दो दिन, पाँच दिन, दस दिन, सोलह कारण जी के उपवास कर रहा है तो कोई 32 उपवास कर तपश्चर्या में लीन है।</p>
<p>भाद्रपद शुक्ल अष्टमी को भगवान पुष्पदंत स्वामी का मोक्ष कल्याणक मनाया गया। माना जाता है कि इस दिन भगवान पुष्पदंत ने सम्मेद शिखर जी से निर्वाण प्राप्त किया था। इस अवसर पर दिगंबर जैन मंदिर में निर्वाण कांड का वाचन किया गया, निर्वाण लाडू चढ़ाए गए, भगवान का अभिषेक, शांतिधारा, पूजन और आरती की गई।धर्मसभा को संबोधित करते हुए आर्यिका विकुंदन श्री माताजी ने कहा कि –</p>
<p><img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/1f449.png" alt="👉" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /> “शौच का अर्थ शुचिता है। बाहर की सफाई के साथ-साथ मन की सरलता और भावों की शुद्धि ही वास्तविक शौच धर्म है। लोभ ही चारों कषायों का जनक है और पाप का मूल कारण है। धन संग्रह जीवन का उद्देश्य नहीं है। परिवार, समाज और धर्म के लिए समय निकालना ही वास्तविक जीवन की उपलब्धि है।”</p>
<p><strong>धन उतना ही कमाओ जितनी आवश्यकता है</strong></p>
<p>उन्होंने आगे कहा कि संतोष रूपी जल से तीव्र लोभ भी मंद पड़ जाता है। धन उतना ही कमाओ जितनी आवश्यकता है। दान करने से वस्तु घटती नहीं बल्कि और बढ़ती है। सिकंदर ने पूरी दुनिया जीत ली थी पर अंत में खाली हाथ ही चला गया। इसलिए शौच धर्म को आत्मसात करो और संतोषी बनकर दान-पुण्य में जीवन लगाओ।” श्रावकों ने दिन भर स्वाध्याय, तप, त्याग और पूजा-अर्चना में समय व्यतीत किया। मंदिरों और धर्म सभाओं में श्रद्धालुओं की बड़ी उपस्थिति रही।</p>
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