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	<title>उत्तम क्षमा &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<title>उत्तम क्षमा &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>दिगंबर जैन पाठशाला में वसंतोत्सव पर दो बेटियों का नवप्रवेश: बच्चों को माघ मास के दशलक्षण पर्व तथा उत्तम क्षमा की जानकारी दी </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shree Phal News]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 24 Jan 2026 08:39:08 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[नगर में दिगंबर जैन पाठशाला दिगंबर जैन समाज की ओर से 1955से अनवरत जारी है। यहां वसंतोत्सव पारंपरिक श्रद्धा एवं भक्ति भाव से मनाया गया। पाठशाला प्रेरक अजीत कोठिया के नेतृत्व में बच्चों को माघ मास के दशलक्षण पर्व तथा उत्तम क्षमा दश धर्मों की जानकारी दी गई। डडूका से पढ़िए, यह खबर&#8230; डडूका। नगर [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>नगर में दिगंबर जैन पाठशाला दिगंबर जैन समाज की ओर से 1955से अनवरत जारी है। यहां वसंतोत्सव पारंपरिक श्रद्धा एवं भक्ति भाव से मनाया गया। पाठशाला प्रेरक अजीत कोठिया के नेतृत्व में बच्चों को माघ मास के दशलक्षण पर्व तथा उत्तम क्षमा दश धर्मों की जानकारी दी गई। <span style="color: #ff0000">डडूका से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>डडूका</strong>। नगर में दिगंबर जैन पाठशाला दिगंबर जैन समाज की ओर से 1955से अनवरत जारी है। यहां वसंतोत्सव पारंपरिक श्रद्धा एवं भक्ति भाव से मनाया गया। पाठशाला प्रेरक अजीत कोठिया के नेतृत्व में बच्चों को माघ मास के दशलक्षण पर्व तथा उत्तम क्षमा दश धर्मों की जानकारी दी गई। आचार्य श्री कुंदकुंद देव के अवतरण दिवस पर पर बच्चों को विशिष्ट जानकारियां दी गई। इस अवसर पर दो बेटियों हृदया चिराग जैन तथा हित्वी धवल सेठ को श्रीफल के साथ नव प्रवेश दिया गया। बच्चों ने विद्यालय में दो नई बेटियों का स्वागत अभिनंदन किया। इस अवसर पर पाठशाला प्रेरक कोठिया ने अभिभावकों धवल सेठ, रेखा सेठ तथा चेष्टा जैन का स्वागत करते हुए बेटियों के जैन पाठशाला में नव प्रवेश पर शुभकामनाएं दी।</p>
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		<title>आत्महत्या का सोचना और करना पाप है इससे अल्पायु कर्म का बंध होता है: आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने धर्म आराधना का महत्व समझाया  </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 10 Sep 2025 12:50:55 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[दशलक्षण पर्व में 10 दिनों तक धर्म की आराधना धर्म की पाठशाला अध्यात्म महापर्व में आपने क्या सीखा है? उत्तम क्षमा, मार्दव आर्जव, शौचधर्म से क्रोध, मान, माया और लोभ चार कषाय छोड़कर त्याग तप करने का संदेश उपदेश दिया गया। यह मंगल देशना राजकीय अतिथि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने धर्मसभा में प्रकट [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>दशलक्षण पर्व में 10 दिनों तक धर्म की आराधना धर्म की पाठशाला अध्यात्म महापर्व में आपने क्या सीखा है? उत्तम क्षमा, मार्दव आर्जव, शौचधर्म से क्रोध, मान, माया और लोभ चार कषाय छोड़कर त्याग तप करने का संदेश उपदेश दिया गया। यह मंगल देशना राजकीय अतिथि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने धर्मसभा में प्रकट की। <span style="color: #ff0000">टोंक से राजेश पंचोलिया की पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>टोंक।</strong> दशलक्षण पर्व में 10 दिनों तक धर्म की आराधना धर्म की पाठशाला अध्यात्म महापर्व में आपने क्या सीखा है? उत्तम क्षमा, मार्दव आर्जव, शौचधर्म से क्रोध, मान, माया और लोभ चार कषाय छोड़कर त्याग तप करने का संदेश उपदेश प्रवचन के माध्यम से आप सभी को दिया गया। आजकल हर परिवार में ऐसे अवसर आते हैं कि जब व्यक्ति अत्यधिक दुखी होता है और क्रोध में कुछ बोलता है या करता है। क्रोध के कारण आत्महत्या का बोलना या करना महापाप है। रौद्र ध्यान के कारण आयु कर्म कारण नीचे गति का बंध होता है। यहां तक की तीर्यच गति और नरक गति में भी जाना पड़ता है। यह मंगल देशना राजकीय अतिथि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने धर्मसभा में प्रकट की। राजेश पंचोलिया ने बताया कि आचार्य श्री ने आगे मुनिराज कीर्ति धर मुनि श्री सुकौशल और व्याघ्रनी की कथा के माध्यम से बताया कि अभी आर्यिका महा यशमति माता जी द्वारा कीर्तिधर मुनि सुकौशल मुनि की कथा सबने सुनी। कीर्तिधर मुनि ने गृहस्थ अवस्था में पुत्र होते ही उसके मस्तक पर तिलक कर दीक्षा ले ली। उसी पुत्र ने विवाह के बाद मुनि को देखकर गर्भवती पत्नी के पेट पर तिलक कर दीक्षा ले ली। इस कारण गृहस्थ अवस्था की माता रौद्र ध्यान से मरकर व्याधनी बनी और ध्यानस्थ मुनि पुत्र के पैर का भक्षण करने लगी। उसी समय तप और ध्यान से मोक्ष हुआ जीवन अनमोल है हर समय सावधान सभी को रहना चाहिए।</p>
<p><strong>वैराग्य दृढ़ता से होता है</strong></p>
<p>धर्मसभा में टोक जिले और बूंदी जिले के उपस्थित श्रावकों को संबोधित करते हुए आचार्य श्री ने आगे बताया कि आचार्य धर्म सागर जी महाराज जी ने गृहस्थ अवस्था में बूंदी जिले के गंभीरा में जन्म लेकर परिजनों के वियोग कारण काफी संघर्ष किया। धर्म धारण करने से संयोग साधन मिलते हैं। मुनिश्री चंद्रसागर गुरु का सानिध्य पाकर उन्होंने व्रत और क्षुल्लक दीक्षा ली और बाद में आचार्य श्री वीर सागर जी महाराज से मुनि दीक्षा धारण की। वैराग्य दृढ़ता से होता है। पर्वाें से कषाय और विषय कम कर धर्म का श्रवण और धारण कर चिंतन संयम वैराग्य से जीवन सार्थक होता है।</p>
<p><strong>प्रातः णमोकार मंत्र का जाप करें</strong></p>
<p>आचार्य श्री के प्रवचन के पूर्व आर्यिका श्री महायश मति माताजी ने अपने धर्म देशना में बताया कि मुनि कीर्तिधर मुनि सुकौशल की कथा के माध्यम से बताया कि वैराग्य कभी भी हो सकता हैं। साधक का समता धन होता हैं मुनि श्री चिन्मय सागर जी की संलेखना समाधि चल रही है। 6 माह से अन्न का त्याग कर एकांतर उपवास साधना चल रही हैं। रात्रि को शयन के पूर्व सभी को 5 पापों का त्याग करना चाहिए। प्रातः उठकर णमोकार मंत्र का जाप करना चाहिए। प्रवचन के पूर्व आचार्य श्री शांति सागर जी एवं पूर्वाचार्यों के चित्र समक्ष दीप प्रवज्लन बूंदी नगर के भक्तों एवं स्थानीय पदाधिकारियों ने कर आचार्य श्री के चरण प्रक्षालन कर जिनवाणी भेंट की टोंक समाज द्वारा अतिथियों का सम्मान किया गया।</p>
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		<title>पयुर्षण पर्व के समापन पर उत्तम क्षमा: मन को निर्मल करने के लिए क्षमा आवश्यक </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/may_you_have_great_success_in_seeking_forgiveness_at_the_conclusion_of_the_paryushana_festival/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 07 Sep 2025 16:31:47 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[महापर्व पर्युषण के अवसर पर उत्तम क्षमा का महत्व काफी बढ़कर है। इसे अपनाकर सब मोह-माया छूट जाती है। मन निर्मल हो जाता है। उत्तम क्षमा पर पढ़िए, राजीव सिंघई मोनू की यह काव्यात्मक अभिव्यक्ति&#8230; उत्तम क्षमा   निमित्त को कर्ता देखा, तो मन में भ्रम सदा, उत्तम क्षमा अपनाकर, मिटे सब मोह-कथा। पर्याय दृष्टि से [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>महापर्व पर्युषण के अवसर पर उत्तम क्षमा का महत्व काफी बढ़कर है। इसे अपनाकर सब मोह-माया छूट जाती है। मन निर्मल हो जाता है। उत्तम क्षमा पर पढ़िए, राजीव सिंघई मोनू की यह काव्यात्मक अभिव्यक्ति&#8230;</strong></p>
<hr />
<p><strong>उत्तम क्षमा  </strong></p>
<p>निमित्त को कर्ता देखा, तो मन में भ्रम सदा,</p>
<p>उत्तम क्षमा अपनाकर, मिटे सब मोह-कथा।</p>
<p>पर्याय दृष्टि से जिसने, जग को आँका हो,</p>
<p>उत्तम क्षमा से वही, निर्मल मन रचता हो।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>यदि किसी का दिल दुखाया, अनजाने ही सही,</p>
<p>क्षमा से धुल जाए वह, भूल पुरानी सभी।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>पर को कर्ता मान लिया, तो बंधन बढ़ते हैं,</p>
<p>उत्तम क्षमा का दीप जले, सब दुख हरते हैं।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>जब अपने को आत्मा जाना, तब सच्ची क्षमा हुई,</p>
<p>सबमें भगवान देख लिया, तो जीवन सफल हुई।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>पुरानी बातें छोड़ दो, स्मृति का बोझ उतारो,</p>
<p>क्षमा से कषाय मिटे, निर्मलता का हारो।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>क्षमा माँगने में यदि अहं का रंग चढ़ा,</p>
<p>तो जानो गलती वही, पथ से मन हट गया।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>पर क्षमा करने में ही, क्रोध शिथिल हो जाए,</p>
<p>सबको अपना मानो, जीवन सरल बन जाए।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>क्षमा से ही जीव बने, महान और उदार,</p>
<p>यह कायर का पथ नहीं, वीरों का है सार।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>यदि कषाय में किसी को, निमित्त बनाया है,</p>
<p>क्षमा की वर्षा से ही, मन को सजाया है।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>क्षमा न करना क्रोध ही, अग्नि जलाता तन,</p>
<p>धर्म रहेगा जीवन में, क्षमा बनेगा धन।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>मनोमालिन्य हर लेती, क्षमा मधुर झरना है,</p>
<p>मोक्ष का पथ रोकता, अहंकार का करना है।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>इसलिए- क्षमा ही सच्चा साधन है, क्षमा ही जीवन धन,</p>
<p>’राजीव राशि सिंघई’ कहे-</p>
<p>ष्क्षमा प्रार्थी हूँ मैं सदैव, यही है मेरा मन।</p>
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		<title>क्षमा उनसे मांगो जिनसे तुम्हारी शत्रुता है : मुनि श्री प्रमाण सागर ने बताया उत्तम क्षमा का महत्व </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/ask_forgiveness_from_those_with_whom_you_are_in_conflict/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 07 Sep 2025 16:29:23 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मुनि श्री प्रमाण सागरजी महाराज ने सभी शिविरार्थियों को संबोधित करते हुए कहा कि बाहरी तप के साथ जब अंतरंग के परिणामों में निर्मलता आती है तभी तप की सार्थकता होती है। आज का दिन आत्म समीक्षा का दिन है। भोपाल से पढ़िए, यह खबर&#8230; भोपाल। 32 उपवास करने वाले अजमेर (राजस्थान )से आए 65 [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>मुनि श्री प्रमाण सागरजी महाराज ने सभी शिविरार्थियों को संबोधित करते हुए कहा कि बाहरी तप के साथ जब अंतरंग के परिणामों में निर्मलता आती है तभी तप की सार्थकता होती है। आज का दिन आत्म समीक्षा का दिन है। <span style="color: #ff0000">भोपाल से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>भोपाल।</strong> 32 उपवास करने वाले अजमेर (राजस्थान )से आए 65 वर्षीय कैलाशचंद्र जैन सहित सोलह, दस, आठ, सात, छै, पांच तथा तीन उपवास करने वाले सभी उपासिओं का सम्मान किया गया। अविनाश जैन विद्यावाणी ने दी’ इस अवसर पर मुनि श्री प्रमाण सागरजी महाराज ने सभी शिविरार्थियों को संबोधित करते हुए कहा कि बाहरी तप के साथ जब अंतरंग के परिणामों में निर्मलता आती है तभी तप की सार्थकता होती है। आज का दिन आत्म समीक्षा का दिन है। हमारी जिन-जिन से वैमनस्यता और कटुता हुई है। सबसे पहले उनसे क्षमा मांगना चाहिए। तभी आपका उपवास और दस दिवसीय धर्म आराधना सार्थक होगी। मुनि श्री ने कहा कि अकेले क्षमावाणी के मेंसेज भेजने से कार्य नहीं होगा, उसे अपने अंतरंग में उतारो। उन्होंने कहा कि ष्मित्रो से क्षमा तो सब मांग लेते है,क्षमा तो उनसे मांगना चाहिये। जिनसे तुम्हारी शत्रुता हैष् और यह शत्रुता और कटुता मिटाने का भाव तुम्हारे अंदर से जगना चाहिये तभी आपके परिणामों निर्मलता आएगी और जीवन का उत्थान होगा ष्भाव शुद्धी के अभाव में जीवन का उत्थान असंभव है। भाव सुधरेगा तभी भव सुधरेगा, यदि इन दस दिनों में आपके परिणामों में अंतर नहीं आया तो आपने धर्म की आराधना नहीं की मात्र ऊपरी क्रिया को किया है।</p>
<p><strong>परिणामों की निर्मलता आती है तभी तप की सार्थकता होती है</strong></p>
<p>मनुष्य जीवन की सार्थकता तभी है जब आपके जीवन में अहिंसा, संयम, और तप आये तथा अपने आपको हिंसा से दूर रख कर भावों में शुद्धि और प्रवृत्ति पर नियंत्रण हो। मुनि श्री ने कहा कि यंहा पर 32 उपवास करने बालों को देखो, इन्होंने बाहरी तप भी किया और अंतरंग तप भी किया। बाहरी तप के साथ जब अंतरंग में परिणामों की निर्मलता आती है तभी तप की सार्थकता होती है, कुछ लोगों सोलह उपवास किए तो</p>
<p>कुछ युवा कार्यकर्ताओं ने 10 उपवास भी किये और अपना कार्य भी किया। यह उनका बहूत बड़ा पुरुषार्थ है।</p>
<p><strong>सोमवार को मुनि श्री मौन के साथ उपवास रहेगा</strong></p>
<p>जो युवा दो घंटे भी भूखे नहीं रह सकते उन युवाओं के द्वारा दस दिन तक निर्जल रहना कोई सधारण पुरुषार्थ नहीं है। यह इस बात का प्रमाण है कि तुम जो चाहो सो कर सकते हो,इन्होंने अपनी शक्ती का सही संयोजन किया है, लेकिन यह संयोजन तभी सार्थक कहलाएगा जब इनके भाव शुद्धि तथा परिणामों में निर्मलता आएगी। उन्होंने सभी तपस्वियों को आशीर्वाद देते हुए कहा कि इन दस दिनों की तपस्या को अपने जीवन में परिवर्तन लाकर अपने जीवन की स्थाई सम्पत्ति बनाइये।प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया सभी शिविरार्थियों का कमेटी के पदाधिकारियों द्वारा तिलक श्रीफल एवं अंग बस्त्र तथा धार्मिक ग्रंथ देकर सम्मानित किया गया। भी की पारणा संपन्न हुई। सोमवार को मुनि श्री मौन के साथ उपवास रहेगा।</p>
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			</item>
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		<title>प्रसंगवश क्षमापर्व विशेष, बंधनों से मुक्ति की चाबी-जैन क्षमा परंपरा : संबंधों का पुनर्निर्माण-क्षमा पर्व का सामाजिक आयाम </title>
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		<pubDate>Sun, 07 Sep 2025 16:12:01 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[ जैन धर्म की गहरी और संवेदनशील परंपरा हमें इन्हीं बोझों से मुक्ति का मार्ग दिखाती है-क्षमा पर्व के रूप में, जो केवल एक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि और जीवन की नवीनता का उत्सव है। बड़वानी से प्रो. आरके जैन ‘अरिजित’ की यह विशेष आलेख&#8230; बड़वानी। मनुष्य का जीवन एक ऐसी यात्रा है, जो [&#8230;]]]></description>
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<p><strong> जैन धर्म की गहरी और संवेदनशील परंपरा हमें इन्हीं बोझों से मुक्ति का मार्ग दिखाती है-क्षमा पर्व के रूप में, जो केवल एक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि और जीवन की नवीनता का उत्सव है। <span style="color: #ff0000">बड़वानी से प्रो. आरके जैन ‘अरिजित’ की यह विशेष आलेख&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>बड़वानी।</strong> मनुष्य का जीवन एक ऐसी यात्रा है, जो बाहर की सड़कों से कहीं अधिक भीतर की गलियों में भटकती है। हम रोज़मर्रा की भागदौड़ में इतने उलझ जाते हैं कि यह भूल जाते हैं-हमारे कंधों पर न केवल सांसारिक ज़िम्मेदारियों का भार है, बल्कि उन अनकहे, अनदेखे बोझों का भी, जो हमारे मन के कोनों में धूल की तरह जमा होते रहते हैं। ये बोझ हैं हमारे उन शब्दों के, जो अनजाने में किसी के हृदय को चोट पहुँचाते हैं; उन विचारों के, जो किसी के प्रति ईर्ष्या या क्रोध से भरे होते हैं; और उन कर्मों के, जो अनजाने में भी किसी जीव को कष्ट देते हैं। जैन धर्म की गहरी और संवेदनशील परंपरा हमें इन्हीं बोझों से मुक्ति का मार्ग दिखाती है-क्षमा पर्व के रूप में, जो केवल एक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि और जीवन की नवीनता का उत्सव है।</p>
<p>क्षमा पर्व, जिसे जैन परंपरा में पर्यूषण पर्व के अंत में मनाया जाता है, केवल एक औपचारिक माफी माँगने का दिन नहीं है। उत्तम क्षमा या मिच्छामि दुक्कडम, ये शब्द केवल वाणी की सजावट नहीं, बल्कि एक गहरे दार्शनिक भाव के प्रतीक हैं, जो हमें स्वयं और दूसरों के प्रति करुणा का पाठ पढ़ाते हैं। यह पर्व हमें उस साहस की ओर ले जाता है, जहाँ हम अपने अहंकार को झुकाकर, अपनी भूलों को स्वीकार करते हैं। यह साहस कोई कमज़ोरी नहीं, बल्कि आत्मिक बल की पराकाष्ठा है। क्योंकि जब हम अपने मन की कठोरता को पिघलाते हैं, तभी हम उस उजाले को देख पाते हैं, जो हमारी आत्मा को मुक्त करता है।</p>
<p>जैन दर्शन का एक अनमोल सूत्र है, क्षमा पहले स्वयं को दी जाती है। हम अक्सर यह मान बैठते हैं कि क्षमा माँगना या देना केवल दूसरों के लिए होता है, पर वास्तव में यह प्रक्रिया हमारे भीतर शुरू होती है। जब तक हम अपनी कमियों, अपनी भूलों, अपने उन क्षणों को नहीं अपनाते, जिनमें हम कमज़ोर हुए, तब तक हम दूसरों के प्रति सच्ची सहानुभूति नहीं जगा सकते। स्वयं को क्षमा करना आसान नहीं, यह एक ऐसी यात्रा है, जिसमें हमें अपने उन हिस्सों को गले लगाना पड़ता है, जिन्हें हम अक्सर छिपाने की कोशिश करते हैं। जैन धर्म कहता है कि जब हम अपने अंदर की इन गांठों को खोलते हैं, तभी हम दूसरों के प्रति भी कोमल हो पाते हैं। यह आत्म-क्षमा ही वह पहला कदम है, जो हमें सच्ची करुणा और अहिंसा की ओर ले जाता है।</p>
<p>आज का युग, जहाँ हर क्षण सूचनाओं का तूफान आता है, रिश्तों को बनाना और तोड़ना पहले से कहीं आसान हो गया है। एक गलत शब्द, एक तीखी टिप्पणी, या एक छोटी-सी गलतफहमीकृये सब न केवल व्यक्तिगत रिश्तों को, बल्कि सामाजिक ताने-बाने को भी छिन्न-भिन्न कर सकते हैं। ऐसे में क्षमा पर्व हमें एक ठहराव देता है। यह हमें याद दिलाता है कि रिश्तों की मरम्मत कोई जटिल विज्ञान नहीं, बल्कि एक साधारण, हृदय से निकला “माफ़ कर दो” है। यह शब्द जादू की तरह काम करता है, यह न केवल सामने वाले के मन को शांत करता है, बल्कि हमें भी उस बोझ से मुक्त करता है, जो हम अनजाने में ढो रहे होते हैं।</p>
<p>क्षमा पर्व का एक और अनूठा आयाम है, यह हमें केवल मनुष्यों तक सीमित नहीं रखता। जैन धर्म की अहिंसा की अवधारणा इतनी व्यापक है कि यह समस्त जीव-जगत को अपने आलिंगन में लेती है। इस पर्व पर हम न केवल अपने परिचितों से, बल्कि उन सभी जीवों से क्षमा माँगते हैं, जिन्हें हमने अनजाने में कष्ट पहुँचाया। चाहे वह हमारे कदमों तले कुचला गया एक छोटा-सा कीट हो, या वह जल और पृथ्वी हो, जिसका हमने अनजाने में दुरुपयोग कियाकृक्षमा पर्व हमें इन सबके प्रति अपनी ज़िम्मेदारी स्मरण कराता है। यह एक ऐसी सोच है, जो हमें मनुष्य-केंद्रित दृष्टिकोण से बाहर निकालकर समस्त सृष्टि के साथ एक गहरे रिश्ते में जोड़ती है। यह हमें सिखाता है कि हमारा जीवन केवल हम तक सीमित नहीं, बल्कि इस विशाल विश्व के साथ एक अटूट बंधन में बंधा है।</p>
<p>क्षमा माँगना या देना इतना दुर्लभ क्यों है? क्योंकि हम इसे अक्सर अपनी प्रतिष्ठा, अपने अहंकार की कसौटी पर तौलते हैं। हम सोचते हैं-क्षमा माँगने से हम छोटे हो जाएँगे, या क्षमा देने से सामने वाला हमारा दुरुपयोग करेगा। पर जैन दर्शन हमें इस भ्रम से बाहर निकालता है। यह कहता है कि क्षमा कोई सौदा नहीं, बल्कि आत्मा की स्वाभाविक अवस्था है। जब हम क्षमा को गणनाओं से मुक्त करते हैं, तभी वह अपनी पूरी शक्ति के साथ हमारे जीवन को बदल देती है। यह वह शक्ति है, जो न केवल व्यक्तिगत शांति लाती है, बल्कि सामाजिक समरसता को भी पोषित करती है।</p>
<p>क्षमा पर्व का एक और गहरा संदेश है-यह हमें अपने विचारों, वचनों और कर्मों में एकरूपता लाने की प्रेरणा देता है। केवल शब्दों से उत्तम क्षमा या मिच्छामि दुक्कडम कहना पर्याप्त नहीं; यह भाव हमारे हृदय में उतरना चाहिए। अगर हम बाहर से क्षमा माँगते हैं, लेकिन भीतर क्रोध या कटुता पाले रहते हैं, तो यह आत्मप्रवंचना होगी। सच्ची क्षमा वही है, जो हमारे व्यवहार में झलके-जब हम किसी की भूल को भूल जाएँ, जब हम किसी के प्रति सहानुभूति से देखें, और जब हम अपने कर्मों को शुद्ध करने का संकल्प लें। यह वह क्षण है, जब क्षमा पर्व एक जीवंत अनुभव बन जाता है, न कि केवल एक परंपरा</p>
<p>आज जब हम इस पर्व को मना रहे हैं, तो यह प्रश्न उठता है, क्या क्षमा केवल एक दिन की बात है? क्या हमें हर बार पर्यूषण की प्रतीक्षा करनी चाहिए, या इसे अपने जीवन का हिस्सा बना लेना चाहिए? जैन दर्शन का जवाब साफ हैकृक्षमा एक सतत प्रक्रिया है। यह वह दीपक है, जिसे हमें हर दिन जलाए रखना है। हर रात, जब हम अपने दिन का लेखा-जोखा करें, तो यह पूछें-क्या मैंने किसी को दुख पहुँचाया? क्या मैंने किसी जीव के प्रति अहिंसा का पालन किया? और अगर कहीं भूल हुई, तो उसे स्वीकार कर, क्षमा माँगने का साहस जुटाएँ। यही वह साधना है, जो हमें सच्चे अर्थों में जैन बनाती है।</p>
<p>इस क्षमा पर्व पर, हम उस मौन को सुनें, जो हमारे भीतर की पुकार है। हम उन सभी से क्षमा माँगें जिन्हें हम जानते हैं और जिन्हें नहीं; जिन्हें हमने देखा और जिन्हें अनदेखा किया। हम स्वयं को भी क्षमा करें-उन क्षणों के लिए, जब हम कमज़ोर हुए, जब हम भटके, जब हमने स्वयं को ठगा। और सबसे बढ़कर, हम इस संकल्प को दोहराएँ कि हम अपने जीवन को अहिंसा, करुणा और क्षमा के रंगों से रंगेंगे। क्योंकि क्षमा केवल एक शब्द नहीं, बल्कि वह संगीत है, जो हमारी आत्मा को मुक्ति का रास्ता दिखाता है। यह वह पंख है, जो हमें क्रोध और घृणा के बोझ से मुक्त कर, आकाश की ऊँचाइयों तक ले जाता है।</p>
<p>इस क्षमा पर्व पर, हम अपने हृदय के दरवाज़े खोलें। हम उन सभी गांठों को खोल दें, जो हमें बाँधे हुए हैं। हम उन सभी के प्रति करुणा का हाथ बढ़ाएँ, जिनके साथ हमारा कोई भी रिश्ता है-चाहे वह मनुष्य हो, प्रकृति हो, या स्वयं हमारी आत्मा। और जब हम कहेंकृ उत्तम क्षमा या मिच्छामि दुक्कडम तो यह शब्द केवल हमारे होंठों से नहीं, बल्कि हमारी आत्मा की गहराइयों से निकले। यही इस पर्व की सच्ची सार्थकता है, और यही जैन धर्म का वह अनमोल उपहार है, जो हमें जीवन की सबसे बड़ी विद्रूपता से मुक्ति दिलाता है।</p>
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		<title>युगल मुनिराज सानिध्य में उत्तम छमा धर्म से हुई पर्युषण पर्व की शुरुआत : नगर में सामूहिक अभिषेक, शांतिधारा व प्रवचनों से गूंजा जैन समाज </title>
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		<pubDate>Thu, 28 Aug 2025 16:27:57 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[सनावद में युगल मुनिराज के सानिध्य में पर्युषण पर्व का शुभारंभ उत्तम छमा धर्म के साथ हुआ। सामूहिक अभिषेक, शांतिधारा, गुरु भक्ति और प्रवचनों से पूरा नगर धर्ममय वातावरण में डूबा रहा। पढ़िए सन्मति जैन काका की खास रिपोर्ट… सनावद। नगर में चातुर्मासरत मुनि श्री साध्य सागर जी महाराज ने अपने उद्बोधन में कहा कि [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>सनावद में युगल मुनिराज के सानिध्य में पर्युषण पर्व का शुभारंभ उत्तम छमा धर्म के साथ हुआ। सामूहिक अभिषेक, शांतिधारा, गुरु भक्ति और प्रवचनों से पूरा नगर धर्ममय वातावरण में डूबा रहा। <span style="color: #ff0000">पढ़िए सन्मति जैन काका की खास रिपोर्ट…</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>सनावद।</strong> नगर में चातुर्मासरत मुनि श्री साध्य सागर जी महाराज ने अपने उद्बोधन में कहा कि सहनशीलता क्रोध को उत्पन्न न होने देने का नाम है। यदि क्रोध हो भी जाए तो विवेक और नम्रता से उसे समाप्त करना ही उत्तम क्षमा है। क्षमा से आत्मा शुद्ध होती है और शांति की प्राप्ति होती है। प्रवक्ता सन्मति जैन काका ने बताया कि पर्वाधिराज पर्युषण के प्रथम दिन युगल मुनिराज द्वारा आचार्य वंदना व ध्यान के साथ कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। इसके बाद श्री दिगंबर जैन बड़ा मंदिर व संत निलय में पंचामृत अभिषेक, शांतिधारा और सामूहिक पूजन संपन्न हुआ। अभिषेक का सौभाग्य संयम सुदेश कुमार श्रीकांत जटाले परिवार को तथा शांतिधारा का सौभाग्य अभिजीत अक्षय कुमार सराफ को प्राप्त हुआ।</p>
<p><strong>जैन धर्म के दस प्रमुख लक्षणों की आराधना</strong></p>
<p>मुनि श्री विश्व सूर्य सागर जी महाराज ने प्रवचन में कहा कि दस लक्षण धर्म जैन धर्म का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व है, जो आत्मशुद्धि और आचार-संयम का मार्ग प्रशस्त करता है। यह पर्व पर्युषण के बाद दस दिनों तक चलता है और जैन धर्म के दस प्रमुख लक्षणों की आराधना की जाती है। दोपहर में मुनि श्री द्वारा तत्त्वार्थ सूत्र पूजन और उसका वाचन कर समाजजनों को गहन ज्ञान प्रदान किया गया। शाम को गुरु भक्ति, सामायिक और प्रश्न मंच का आयोजन हुआ। दिन का समापन सभी समाजजनों द्वारा भक्ति भाव से जिनेंद्र देव की आरती करने के साथ हुआ। इस अवसर पर बड़ी संख्या में समाजजन उपस्थित रहे और पूरे नगर में धार्मिक उत्साह का वातावरण बना रहा।</p>
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		<title>उत्तम क्षमा - आत्मशुद्धि और मोक्ष का प्रथम सोपान : क्षमा वीरस्य भूषणं </title>
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		<pubDate>Thu, 28 Aug 2025 03:38:01 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[उत्तम क्षमा आत्मशुद्धि और मोक्ष का प्रथम सोपान है। यह क्रोध, द्वेष और प्रतिशोध को शांत कर आत्मा को निर्मल बनाती है। क्षमा से मैत्रीभाव व सामाजिक सद्भाव का विकास होता है और यह अहिंसा का सच्चा रूप है। क्षमा के बिना अन्य धर्मों का पालन भी पूर्ण नहीं हो सकता। क्षमा अहंकार गलाकर आत्मा [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>उत्तम क्षमा आत्मशुद्धि और मोक्ष का प्रथम सोपान है। यह क्रोध, द्वेष और प्रतिशोध को शांत कर आत्मा को निर्मल बनाती है। क्षमा से मैत्रीभाव व सामाजिक सद्भाव का विकास होता है और यह अहिंसा का सच्चा रूप है। क्षमा के बिना अन्य धर्मों का पालन भी पूर्ण नहीं हो सकता। क्षमा अहंकार गलाकर आत्मा को गरिमा और मोक्ष की ओर ले जाती है। <span style="color: #ff0000">पढ़िए श्रीफल जैन न्यूज़ द्वारा उत्तम क्षमा पर आलेख&#8230;&#8230;..</span></strong></p>
<hr />
<p>उत्तम क्षमा &#8211; धर्म हमें बताता है कि वास्तविक शक्ति किसी को दंड देने में नहीं, बल्कि क्षमा करने में है। यह न केवल आत्मा को शुद्ध करता है, बल्कि परिवार, समाज और विश्व में प्रेम, शांति और सद्भाव का वातावरण बनाता है। क्षमा ही आत्मोद्धार और मोक्ष की कुंजी है।</p>
<p><strong>महत्व :</strong></p>
<p>क्रोध पर विजय</p>
<p>क्रोध आत्मा का सबसे बड़ा शत्रु है। क्षमा का अभ्यास क्रोध को शांत करता है और मन को स्थिर बनाता है।</p>
<p><strong>द्वेष का अंत</strong></p>
<p>जब हम क्षमा करते हैं, तो वैर-भाव और प्रतिशोध की ज्वाला बुझती है। यह मैत्रीभाव को जन्म देती है।</p>
<p><strong>आत्मकल्याण का मार्ग</strong></p>
<p>क्षमा से आत्मा के कर्मबंध कटते हैं। यह मोक्षमार्ग की सीढ़ी है।</p>
<p><strong>सामाजिक समरसता</strong></p>
<p>समाज में कलह, झगड़े और अशांति का कारण अहंकार और प्रतिशोध है। क्षमा इन्हें दूर करके सद्भाव और शांति का वातावरण बनाती है।</p>
<p><strong>आध्यात्मिक साधना </strong></p>
<p>दस धर्मों में क्षमा को प्रथम स्थान दिया गया है। इसका कारण है कि जब तक क्षमा नहीं होगी, तब तक अन्य धर्मों (मार्दव, आर्जव, शौच आदि) का पालन पूर्णता से नहीं हो सकता।</p>
<p><strong>अहिंसा का सहचर</strong></p>
<p>क्षमा अहिंसा का स्वरूप है। अहिंसा का अर्थ केवल किसी को मारना नहीं है, बल्कि मन, वचन और काय से किसी को कष्ट न पहुँचाना है। क्षमा इस अहिंसा की पूर्णता है।</p>
<p><strong>आत्मा की गरिमा  </strong></p>
<p>क्षमा लेने और देने वाला व्यक्ति अपने अहंकार को गलाकर विनम्रता को आत्मसात करता है। यही आत्मा की सबसे बड़ी विजय है।</p>
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		<title>उत्तम क्षमा केवल एक गुण नहीं है, आत्मा के विकास का पहला चरण : मुनिश्री सर्वार्थ सागर जी ने उत्तम क्षमा पर दिए दिव्य संदेश  </title>
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		<pubDate>Wed, 27 Aug 2025 13:53:41 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्यश्री विशुद्धसागर जी महाराज ससंघ का चातुर्मास पथरिया में जारी हैै। आचार्यश्री के शिष्य विचित्र बाते प्रणेता मुनिश्री सर्वार्थ सागर महाराज जी ने बुधवार को प्रवचन में कहा कि उत्तम क्षमा-यह केवल एक गुण नहीं है, यह आत्मा के विकास का पहला चरण है। उन्होंने कहा कि जब हम ‘दश धर्म’ की बात करते हैं [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्यश्री विशुद्धसागर जी महाराज ससंघ का चातुर्मास पथरिया में जारी हैै। आचार्यश्री के शिष्य विचित्र बाते प्रणेता मुनिश्री सर्वार्थ सागर महाराज जी ने बुधवार को प्रवचन में कहा कि उत्तम क्षमा-यह केवल एक गुण नहीं है, यह आत्मा के विकास का पहला चरण है। उन्होंने कहा कि जब हम ‘दश धर्म’ की बात करते हैं तो सबसे पहले आता है-उत्तम क्षमा। <span style="color: #ff0000">पथरिया से पढ़िए, अभिषेक अशोक पाटील की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>पथरिया।</strong> आचार्यश्री विशुद्धसागर जी महाराज ससंघ का चातुर्मास पथरिया में जारी हैै। आचार्यश्री के शिष्य विचित्र बाते प्रणेता मुनिश्री सर्वार्थ सागर महाराज जी ने बुधवार को प्रवचन में कहा कि उत्तम क्षमा-यह केवल एक गुण नहीं है, यह आत्मा के विकास का पहला चरण है। उन्होंने कहा कि जब हम ‘दश धर्म’ की बात करते हैं तो सबसे पहले आता है-उत्तम क्षमा। इसका कारण यही है कि जब तक हमारे भीतर क्षमा का भाव नहीं है, तब तक बाकी धर्मों की साधना अधूरी ही रह जाती है। क्षमा केवल एक क्रिया नहीं है-यह एक भावना है, जो आत्मा को हल्का करती है। जिसके मन में क्षमा का भाव है, उसके भीतर कोई द्वेष नहीं टिक सकता, कोई बैर नहीं ठहर सकता। जीवन में हमसे अनेक बार, अनेक लोगों से टकराव हो जाता है-विचारों से व्यवहार से शब्दों से। कभी दूसरों से भूल होती है, तो कभी हमसे। पर जो व्यक्ति हर परिस्थिति में ‘मैं क्षमा देता हूं’ और ‘मैं क्षमा मांगता हूं’ कह सकता है, वही वास्तव में उत्तम क्षमा को समझता है। उन्होंने कहा कि उत्तम क्षमा का मतलब है-किसी के दोष को पकड़कर नहीं बैठना, किसी की गलती को अपने भीतर बोझ बनाकर नहीं रखना और न ही अपने अहंकार को क्षमा के रास्ते में आने देना। यह क्षमा शर्तों पर आधारित नहीं होती-अगर वह माफी मांगेगा, तभी मैं क्षमा करूंगा।</p>
<p>यह व्यापार है, धर्म नहीं। धर्म की क्षमा तो निःस्वार्थ होती है, वह स्वयं की शुद्धि के लिए होती है, वह आत्मा की सफाई के लिए होती है। जब हम मन, वचन और काया से ष्मिच्छामी दुक्कड़म्ष् कहते हैं कृ तो यह केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि आत्मा को झुकाने की साधना है। हर बार जब हम क्षमा माँगते हैं, तो हम अहंकार के एक आवरण को उतारते हैं और जब हम क्षमा करते हैं, तो हम अपने हृदय में प्रेम का दीप जलाते हैं। बंधुओं उत्तम क्षमा कोई एक दिन की बात नहीं, यह तो जीवन की शैली होनी चाहिए। हर दिन, हर क्षण, हमें इस भाव को जीना है, क्योंकि जिसने क्षमा को आत्मसात कर लिया। उसके मन में कोई बोझ नहीं रहता, उसके जीवन में कोई बैर नहीं रहता और उसकी आत्मा हर पल ऊपर उठती रहती है।</p>
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		<title>दसलक्षण महापर्व धर्म के दस लक्षणों से जीवन और समाज में शान्ति स्थापित करता है : विश्व शान्ति का आधार है दसलक्षण महापर्व &#8211; आचार्य विमर्श सागर जी </title>
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		<pubDate>Tue, 26 Aug 2025 15:05:44 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री विमर्श सागर जी महामुनिराज ने कहा कि दसलक्षण महापर्व केवल जैनों का पर्व नहीं है बल्कि यह सम्पूर्ण मानव समाज के लिए जीवनोपयोगी है। धर्म के दस लक्षण ही विश्व शान्ति की आधारशिला हैं। पढ़िए सोनल जैन की ख़ास रिपोर्ट… दिगम्बर जैन धर्म में भाद्रपद शुक्ला पंचमी से प्रारम्भ होने वाला दसलक्षण महापर्व [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य श्री विमर्श सागर जी महामुनिराज ने कहा कि दसलक्षण महापर्व केवल जैनों का पर्व नहीं है बल्कि यह सम्पूर्ण मानव समाज के लिए जीवनोपयोगी है। धर्म के दस लक्षण ही विश्व शान्ति की आधारशिला हैं। <span style="color: #ff0000">पढ़िए सोनल जैन की ख़ास रिपोर्ट…</span></strong></p>
<hr />
<p>दिगम्बर जैन धर्म में भाद्रपद शुक्ला पंचमी से प्रारम्भ होने वाला दसलक्षण महापर्व वास्तव में विश्व शान्ति का पर्व माना गया है। श्रमणाचार्य विमर्श सागर जी महामुनिराज ने अपने उपदेश में कहा कि धर्म के दस लक्षण ही वास्तविक शान्ति का आधार हैं। उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, संयम, तप, त्याग, आकिंचन्य और ब्रह्मचर्य जीवन की दिशा को बदल सकते हैं। उन्होंने समझाया कि क्षमा हर समस्या का समाधान है, मार्दव जीवन में मृदुता लाता है, आर्जव छल-कपट से बचाता है, शौच संतोष का भाव जगाता है, सत्य धर्म हितकारी वचनों की शिक्षा देता है। संयम मनोबल बढ़ाता है, तप आत्मा को शुद्ध करता है, त्याग निस्वार्थ सेवा की भावना देता है, आकिंचन्य &#8216;मैं&#8217; और &#8216;मेरेपन&#8217; का विसर्जन कर आत्मा से जुड़ने का मार्ग दिखाता है, और ब्रह्मचर्य सामाजिक मर्यादा और स्थिरता का आधार बनता है।</p>
<p>आचार्य श्री ने कहा कि इन दस दिनों में साधर्मियों को खान-पान, आचरण और व्यवहार सुधारकर संयमित जीवन अपनाना चाहिए। सामायिक, उपवास, स्वाध्याय और साधना के माध्यम से धर्ममय जीवन जिया जा सकता है। व्यापार, गपशप और भोगवादी प्रवृत्तियों का त्याग कर सात्विक और सादगीपूर्ण जीवन से ही आत्मा की शुद्धि संभव है।</p>
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		<title>स्व को जानने और जगाने का पर्वाधिराज है पर्युषण : तप, संयम और धर्म रक्षा के संकल्प को पूरा करते हैं श्रावक-श्राविकाएं  </title>
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		<pubDate>Tue, 19 Aug 2025 07:34:43 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन समाज के पर्वाधिराज पर्युषण को लेकर समाजजनों में धार्मिक उल्लास तो है ही, साथ ही इस उत्साह के साथ इसका इंतजार किया जा रहा है कि अब यह वह समय है जब हम स्व को जान सकें। अंतरआत्मा को जगाकर संयम मार्ग की ओर कदम बढ़ाएं। यह विदित है कि पयुर्षण पर्व श्वेतांबर जैन [&#8230;]]]></description>
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<p>जैन समाज के पर्वाधिराज पर्युषण को लेकर समाजजनों में धार्मिक <strong>उल्लास तो है ही, साथ ही इस उत्साह के साथ इसका इंतजार किया जा रहा है कि अब यह वह समय है जब हम स्व को जान सकें। अंतरआत्मा को जगाकर संयम मार्ग की ओर कदम बढ़ाएं। यह विदित है कि पयुर्षण पर्व श्वेतांबर जैन समाज 20 अगस्त से मनाना आरंभ करेंगे तो दिगंबर जैन समाज के पर्युषण 28 अगस्त से शुरू होंगे। श्रीफल जैन न्यूज के साथ हम यह जानने की कोशिश करते हैं कि पर्युषण आखिर है क्या? क्यों मनाया जाता है? और इसका महत्व क्या है? <span style="color: #ff0000">उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह संकलित प्रस्तुति आज पढ़िए&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> भारतीय संस्कृति में पर्वों का बहुत महत्व है। पर्व का नाम सुनते ही परिग्रह, राग, द्वेष, खानपान की ही कल्पना करते हैं अथवा खुश होते हैं, लेकिन दशलक्षण धर्म पर्युषण पर्व आने और बल्कि आने से भी पहले श्रावकों के मन में अति उत्साह रहता है। सबसे बड़ी बात यह उत्साह खाना-पीना छोड़ने के प्रति रहता है और इस दौरान एक कंपीटिशन सा रहता है कि किसका त्याग अधिक है। इन दिनों छोटे से छोटे बच्चे तक व्रत,उपवास, संयम तथा स्वाध्याय करते हैं। सभी प्रातः देवदर्शन, पूजन, व्रत, उपवास, एकासन्न आदि करते हैं। दिल्ली की नीति जैन कहती हैं कि कितने श्रावक दस दिनों तक निर्जल उपवास भी करते हैं तथा अपने कर्मों की निर्जरा करते हैं। दशलक्षण पर्युषण महापर्व पर धर्मात्मा बंधु आत्मा के दस धर्मों की विशेष आराधना करते हैं। उत्तम, क्षमा, मार्दव, आर्जव, सत्य, शौच, संयम, तप, त्याग, आकिंचन और ब्रह्मचर्य आत्मा के स्वाभाविक धर्म है, लेकिन अशुम कर्मों के उदय से इन धर्मों की आराधना भले ही जैन श्रावक ही करते हैं, जो आत्मा के अस्तित्व को स्वीकारते हैं। दस दिनों तक इन दस धर्मों की भावपूर्वक आराधना करने वाला शीध्र ही आत्मा की अनुमति को प्राप्त करता है और मोक्ष की ओर अग्रसर हो सकते हैं। ये दस धर्म आत्मा को शुद्ध बनाते हैं।</p>
<p><strong>इसलिए महत्व है 10 लक्षण पर्व यानि पर्युषण का </strong></p>
<p>जैन धर्म मंे 10 लक्षण पर्वका बहुत महत्व है। इस पर्व मैं जिनालयों में धर्म की प्रभावना की जाती है। यह पर्व आध्यात्मिक पर्व है। इस पर्व में उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, संयम, तप, त्याग, आकिंचन, ब्रह्मचर्य आदि जीवन मूल्य की आराधना होती है। यह पर्व तीर्थंकरों की पूजा का नहीं या अन्य आराध्य की पूजा का नहीं, बल्कि गुणों की आराधना उपासना का पर्व है। इस पर्व में व्यक्ति शक्ति और सामर्थ्य अनुसार व्रत औैर उपवास करते हैं। यह पर्व जीवन में सुख एवं शांति के लिए मनाया जाता है। इस समय अधिक से अधिक समय धर्म में लगाया जाता है।</p>
<p><strong>यह है जैन धर्म में 10 लक्षण धर्म </strong></p>
<p>उत्तम क्षमा, क्रोध छोड़कर सबको क्षमा कर सकूं तथा सबसे क्षमा मांग सकूं, उत्तम मार्दव, मान नहीं करना घमंड छोड़ना, उत्तम आर्जव, कपट नहीं करना सरलता लाना, उत्तम शौच, लोभ का त्याग करना, उत्तम सत्य, सत्य वचन ही बोलना, उत्तम संयम, इंद्रिय व मन को बश मे करना, उत्तम तप, इच्छाओं को रोकना तथा तप धारण करना, उत्तम त्याग, चार प्रकार का दान आदि देना, उत्तम आकिंचन, ममत्त्व का त्याग करना उत्तम ब्रह्मचर्य, विषय सेवन को छोड़ कर अपनी आत्मा मंे लीन होना। इन दिनों में तत्वार्थ सूत्र के अध्याय का व्याख्यान किया जाता है। तिथि दसवीं के दिन सुगंध दशमी या धूप दशमी के रूप में मनाया जाता है तथा अंतिम दिन अनंत चतुर्दशी के रूप मे मनाया जाता है।</p>
<p><strong>‘पर्वों का राजा’ आत्म-चिंतन, पश्चाताप और क्षमा का पर्व</strong></p>
<p>पर्युषण पर्व जैन धर्म का एक प्रमुख पर्व है, जिसे ‘पर्वों का राजा’ भी कहा जाता है। यह पर्व आत्म-चिंतन, पश्चाताप और क्षमा का समय होता है। यह भाद्रपद मास में मनाया जाता है और जैन धर्मावलंबी इसे बड़े उत्साह और भक्ति के साथ मनाते हैं। श्वेतांबर जैन इसे 8 दिनों तक मनाते हैं, जिसे अष्टान्हिका कहा जाता है और दिगंबर जैन 10 दिनों तक मनाते हैं, जिसे दसलक्षण पर्व कहते हैं। पर्युषण पर्व जैनियों को अपने कर्मों का आत्मनिरीक्षण करने और पिछले किए गए गलतियों के लिए पश्चाताप करने का अवसर प्रदान करता है। इस पर्व में, लोग एक दूसरे से क्षमा मांगते हैं और दूसरों को क्षमा करते हैं। यह ‘क्षमापना’ के रूप में मनाया जाता है, जहां लोग एक दूसरे को ‘खामेमि सव्वे जीवा, सव्वे जीवा खमंतु मे’ (मैं सभी जीवों को क्षमा करता हूं, सभी जीव मुझे क्षमा करें) कहकर क्षमा करते हैं। पर्युषण पर्व अहिंसा (अहिंसा परमो धर्मः) और प्रेम के सिद्धांतों पर जोर देता है। जैन धर्म में अहिंसा का अर्थ है किसी भी जीव को किसी भी प्रकार की हानि न पहुंचाना। यह पर्व जैनियों को अपनी आध्यात्मिक और मानसिक उन्नति पर ध्यान केंद्रित करने के लिए प्रेरित करता है। वे उपवास, ध्यान, और धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन करते हैं। पर्युषण पर्व को मोक्ष प्राप्ति (मुक्ति) के मार्ग में एक महत्वपूर्ण कदम है।</p>
<p><strong>पर्युषण पर्व कैसे मनाया जाता है?</strong></p>
<p>जैन धर्मावलंबी पर्युषण पर्व के दौरान उपवास करते हैं और अपनी भौतिक आवश्यकताओं को कम करते हैं। वे धार्मिक ग्रंथों का पाठ करते हैं, मंदिरों में जाते हैं, और धार्मिक प्रवचन सुनते हैं। वे एक दूसरे से क्षमा मांगते हैं और दूसरों को क्षमा करते हैं। वे गरीबों और जरूरतमंदों को दान देते हैं। वे अहिंसक जीवनशैली जीने का संकल्प लेते हैं और दूसरों को भी ऐसा करने के लिए प्रेरित करते हैं। इन दिनों में तत्वार्थ सूत्र के अध्याय का व्याख्यान किया जाता है। तिथि दसवीं के दिन सुगंध दशमी य धूप दशमी के रूप में मनाया जाता है तथा अंतिम दिन अनंत चतुर्दशी के रूप में मनाया जाता है।</p>
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