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	<title>इतिहास &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<title>इतिहास &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>टीएमयू के फॉरेंसिक स्टूडेंट्स ने पुलिस अकादमी का किया भ्रमण : अकादमी के इतिहास, संग्रहालय, हथियार गृह, फॉरेंसिक प्रयोगशाला का अवलोकन   </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shree Phal News]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 31 Jan 2026 14:01:05 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी, मुरादाबाद के कॉलेज ऑफ पैरामेडिकल साइंसेज के फॉरेंसिक विज्ञान विभाग की ओर से छात्रों को डॉ. भीमराव अंबेडकर पुलिस अकादमी का भ्रमण करवाया गया। मुरादाबाद से पढ़िए, प्रो.श्यामसंुदर भाटिया की यह खबर&#8230; मुरादाबाद। तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी, मुरादाबाद के कॉलेज ऑफ पैरामेडिकल साइंसेज के फॉरेंसिक विज्ञान विभाग की ओर से डॉ. भीमराव अंबेडकर [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी, मुरादाबाद के कॉलेज ऑफ पैरामेडिकल साइंसेज के फॉरेंसिक विज्ञान विभाग की ओर से छात्रों को डॉ. भीमराव अंबेडकर पुलिस अकादमी का भ्रमण करवाया गया। <span style="color: #ff0000">मुरादाबाद से पढ़िए, प्रो.श्यामसंुदर भाटिया की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरादाबाद।</strong> तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी, मुरादाबाद के कॉलेज ऑफ पैरामेडिकल साइंसेज के फॉरेंसिक विज्ञान विभाग की ओर से डॉ. भीमराव अंबेडकर पुलिस अकादमी, मुरादाबाद के शैक्षिक दौरे में छात्रों ने कानून प्रवर्तन एजेंसियों की कार्यप्रणाली के साथ आपराधिक जांच में फॉरेंसिक विज्ञान के वास्तविक जीवन में अनुप्रयोगों की बारीकियों को समझा। टीएमयू के फॉरेंसिक छात्रों के प्रतिनिधिमंडल ने अकादमी के इतिहास, संग्रहालय, हथियार गृह, फॉरेंसिक प्रयोगशाला, पुस्तकालय, मिग-21 विमान का अवलोकन भी किया। इससे पूर्व फॉरेंसिक कॉलेज के प्राचार्य डॉ. नवनीत कुमार ने डॉ. भीमराव अंबेडकर पुलिस अकादमी के डायरेक्टर जनरल राजीव सभरवाल से भेंट करके कुलाधिपति सुरेश जैन की ओर से उन्हें तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी आने के लिए आमंत्रित किया।</p>
<p><strong>पुलिस प्रशिक्षण प्रणाली से अपडेट हुए</strong></p>
<p>शैक्षणिक भ्रमण में शामिल इन 66 छात्रों ने अपराध स्थल प्रबंधन, साक्ष्य संकलन, संरक्षण प्रक्रियाओं, कानूनी प्रथाओं और पुलिस प्रशिक्षण प्रणाली से अपडेट हुए। इस शैक्षिक संवाद में फॉरेंसिक एक्सपर्ट्स और पुलिस ऑफिसर्स के बीच समन्वय को टीएमयू के छात्रों ने समझा। प्राचार्य ने उप पुलिस महानिरीक्षक विकासकुमार वैद्या का भी शुक्रिया अदा किया। शैक्षिक यात्रा में फॉरेंसिक के एचओडी रवि कुमार, योगेशकुमार, सौम्या त्रिपाठी के संग-संग रिसर्च स्कॉलर अजयप्रताप सिंह आदि शामिल रहे। पुलिस उप-अधीक्षक हरेंद्रसिंह यादव ने अपनी टीम के साथ छात्रों को अकादमी का भ्रमण कराया। अकादमी के पुष्करकुमार शर्मा, पंकज तोमर की भी उल्लेखनीय भूमिका रही।</p>
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		<title>मुनि श्री ने किया प्राचीनतम लाइब्रेरी का अवलोकन : इंचार्ज राजेंद्रकुमार शर्मा से लाइब्रेरी का इतिहास जाना </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shree Phal News]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 02 Jan 2026 12:54:53 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[नगर की तकरीबन सौ साल पुरानी प्राचीनतम लाइब्रेरी का मुनि श्री अक्षय सागर जी महाराज ने अवलोकन किया। मुनिश्री दुर्लभ एवं प्राचीनतम ग्रंथों को पढ़ने में विशेष रुचि रखते हैं। उन्होंने लाइब्रेरी के इतिहास के बारे में जानकारी ली। सनावद से पढ़िए, सन्मति जैन काका की यह खबर&#8230; सनावद। नगर की तकरीबन सौ साल पुरानी [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>नगर की तकरीबन सौ साल पुरानी प्राचीनतम लाइब्रेरी का मुनि श्री अक्षय सागर जी महाराज ने अवलोकन किया। मुनिश्री दुर्लभ एवं प्राचीनतम ग्रंथों को पढ़ने में विशेष रुचि रखते हैं। उन्होंने लाइब्रेरी के इतिहास के बारे में जानकारी ली। <span style="color: #ff0000">सनावद से पढ़िए, सन्मति जैन काका की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>सनावद</strong>। नगर की तकरीबन सौ साल पुरानी प्राचीनतम लाइब्रेरी का मुनि श्री अक्षय सागर जी महाराज ने अवलोकन किया। दुर्लभ एवं प्राचीनतम ग्रंथों को पढ़ने में विशेष रुचि रखने वाले मुनि श्री अक्षय सागर महामुनिराज ने प्रिंस यशवंत शारदा लाइब्रेरी पहुंचकर संपूर्ण लाइब्रेरी का अवलोकन किया एवं भवन के इंचार्ज राजेंद्रकुमार शर्मा से लाइब्रेरी के इतिहास को जाना एवं भवन में सहेजकर रखे प्राचीनतम एवं दुर्लभ ग्रंथों एवं किताबों एवं पत्रिकाओं का अवलोकन किया एवं जानकारी ली।</p>
<p>मुनि श्री ने कहा कि तकरीबन सौ साल पुराने भवन एवं भवन के अंदर रखी इतनी पुरानी पत्रिकाओं, किताबों एवं शास्त्रों को सहेजना बहुत ही दुर्लभ एवं प्रशंसनीय है। यह भवन भविष्य में और निरंतर गति करें एवं नगर में सभी प्रबुद्धजन इस वाचनालय को संवारने में अपनी भूमिका निभाएं। इस अवसर पर डॉ यतीश जैन, अचिंत्य जैन, कमलेश भूच, राजेंद्र शर्मा, भैरूलाल व्यास उपस्थित थे।</p>
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		<title>गहन शोध के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध होंगी पांडुलिपियां: तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी मुरादाबाद को सैकड़ों वर्ष प्राचीन दुर्लभ जैन ग्रंथों की मिली अनमोल सौगात  </title>
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		<pubDate>Sat, 22 Nov 2025 12:24:07 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[कुलाधिपति सुरेश जैन बोले, तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी के संग्रह में अब तक हस्तलिखित ग्रंथ नहीं थे, लेकिन कुंदरकी जैन चैत्यालय की ओर से दिए गए इस दान के जरिए पहली बार यह ऐतिहासिक उपलब्धि संभव हुई। उम्मीद जताई कि ये पांडुलिपियां जैन दर्शन, इतिहास, भाषा और संस्कृति से जुड़े गहन शोध एवं अध्ययन के लिए [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>कुलाधिपति सुरेश जैन बोले, तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी के संग्रह में अब तक हस्तलिखित ग्रंथ नहीं थे, लेकिन कुंदरकी जैन चैत्यालय की ओर से दिए गए इस दान के जरिए पहली बार यह ऐतिहासिक उपलब्धि संभव हुई। उम्मीद जताई कि ये पांडुलिपियां जैन दर्शन, इतिहास, भाषा और संस्कृति से जुड़े गहन शोध एवं अध्ययन के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध होंगी। <span style="color: #ff0000">मुरादाबाद से पढ़िए, यह विशेष रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरादाबाद।</strong> तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी, मुरादाबाद को सैकड़ों वर्ष प्राचीन दुर्लभ जैन ग्रंथों की अनमोल सौगात मिली है। जैन साहित्य के इस दुर्लभ संग्रह में डुंडारी भाषा की हस्तलिखित पांडुलिपियां भी शामिल हैं। ये पांडुलिपियां सैकड़ों वर्ष पुरानी होने के कारण ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं। टीएमयू के कुलाधिपति सुरेश जैन कहते हैं कि यूनिवर्सिटी के संग्रह में अब तक हस्तलिखित ग्रंथ नहीं थे, लेकिन इस दान के जरिए पहली बार यह ऐतिहासिक उपलब्धि संभव हुई है। ये पांडुलिपियां जैन दर्शन, इतिहास, भाषा और संस्कृति से जुड़े गहन शोध एवं् अध्ययन के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध होंगी। इस अवसर पर फर्स्ट लेडी वीना जैन, ग्रुप वाइस चेयरमैन मनीष जैन, ऋचा जैन, जाह्न्वी जैन ने कहा कि यह जैन साहित्य टीएमयू की संस्कार आधारित शिक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर अक्षत जैन कहते हैं कि लाइब्रेरी को भेंट में मिले इन दुर्लभ जैन ग्रंथों के अध्ययन से स्टुडेंट्स को जैन धर्म के वास्तविक मूल एवं् जीवन दर्शन सीखने का सौभाग्य मिलेगा।</p>
<p><strong>ज्ञान परंपरा के संरक्षण एवं संवर्द्धन के लिए अत्यंत प्रेरणादायक </strong></p>
<p>उल्लेखनीय है कि तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी के नॉलेज रिसोर्स सेंटर में वर्तमान में 3 लाख 14 हजार से अधिक पुस्तकों का समृद्ध संग्रह उपलब्ध है। कुलपति प्रो. वीके जैन ने कहा कि आज के नवाचार, विज्ञान और तकनीकी युग में भी पारंपरिक ज्ञान की महत्ता कभी कम नहीं होती है। उन्होंने कहा कि आधुनिकता और परंपरा के समन्वय से ही संतुलित, संवेदनशील और पूर्ण विकास संभव है। टीएमयू इसी सोच के साथ सतत प्रगति के मार्ग पर अग्रसर है। प्रो. जैन ने कहा कि यह दान जैन अध्ययन और भारतीय ज्ञान परंपरा के संरक्षण एवं् संवर्द्धन के लिए अत्यंत प्रेरणादायक है। प्रो. जैन ने घोषणा की, शीघ्र ही इन दुर्लभ ग्रंथों के डिजिटाइजेशन की प्रक्रिया आरंभ होगी, जिससे इन ऐतिहासिक धरोहरों का सुरक्षित संरक्षण और वैश्विक स्तर पर शोधार्थियों तक उनकी सहज पहुंच सुनिश्चित की जा सके।</p>
<p><strong>इन लोगों ने लाइब्रेरी को ग्रंथों का दिया दान </strong></p>
<p>मंगलाचरण डॉ. करुणा जैन और डॉ. अर्चना जैन ने प्रस्तुत किया। संचालन डॉ. कल्पना जैन ने किया। यूनिवर्सिटी की चीफ लाइब्रेरियन डॉ. विनीता जैन ने बताया कि यूनिवर्सिटी को जैन साहित्य की ये अनमोल देन कुंदरकी के जैन चैत्यालय की ओर से समीर जैन, चतुर बिहारीलाल जैन, प्रमोद बिहारीलाल जैन, कुलवंत राय जैन और संपूर्ण सोनी परिवार से प्राप्त हुई है।</p>
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		<title>साइंस ऑफ लिविंग सत्र में प्रवचन : आदत होना सही, गलत आदत होना दुर्गति का कारण &#8211; मुनि श्री निरंजन सागर जी </title>
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		<pubDate>Wed, 01 Mar 2023 06:56:17 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[साइंस ऑफ लिविंग सत्र में मुनि श्री निरंजन सागर जी महाराज जीवन जीने का सबका अपना-अपना तरीका है। व्यक्ति का स्वयं के मापदंडों से जीना ठीक है लेकिन मापदंड के बारे में विचारें कि वे सही हैं या गलत। पढ़िए जय कुमार जलज/राजेश रागी की विस्तृत रिपोर्ट&#8230; कुण्डलपुर। आदत के आदि होना बुरी बात नहीं, [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>साइंस ऑफ लिविंग सत्र में मुनि श्री निरंजन सागर जी महाराज जीवन जीने का सबका अपना-अपना तरीका है। व्यक्ति का स्वयं के मापदंडों से जीना ठीक है लेकिन मापदंड के बारे में विचारें कि वे सही हैं या गलत। <span style="color: #ff0000;">पढ़िए जय कुमार जलज/राजेश रागी की विस्तृत रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>कुण्डलपुर।</strong> आदत के आदि होना बुरी बात नहीं, परंतु गलत आदत के आदी होना सही नहीं है। जीवन जीने का सभी का अपना अपना तरीका होता है, हम किसी के तरीके को गलत नहीं ठहराना चाहते हैं क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति का अपना मापदंड होता है। वह स्वयं का जीवन अपने मापदंडों के हिसाब से जीता है और उसे वह सही भी मानता है। यह बात साइंस ऑफ लिविंग सत्र में मुनि श्री निरंजन सागर जी महाराज ने कही। उदाहरण के तौर पर आप उस शराबी आदि को देख लीजिए, सभी के अपने-अपने मापदंड हैं और इसमें भी साहित्य का योगदान और मिल जाए बस फिर वो उनका कथन उनकी क्रियाओं को सही सिद्ध करने में देर नहीं लगाते।</p>
<p>एक प्रसिद्ध कवि ने लिखा है, मंदिर मस्जिद बैर कराते मेल कराती मधुशाला। हो सकता है आपको यह कविता शब्दशः याद भी हो। पर कवि का क्या उद्देश्य था और आपने क्या समझ लिया। कवि महोदय कह रहे हैं जिस प्रकार शराबी व्यक्ति एक साथ बैठकर हिल मिलकर मदिरालय में अपना आनंद मनाते हैं, उसी प्रकार क्या आप लोग देवालय में बैठकर हिल मिलकर प्रभु की भक्ति का आनंद मनाते हैं ? यह प्रश्नवाचक काव्य शैली है। हम इसका सही अर्थ भी आपको बताएंगे।</p>
<p>तो भी आप मानोगे नहीं ,क्योंकि यह कविता आपकी बात का पोषण करती है।आज प्रायः कर यह सिद्धांत बन गया है। हम उसी बात का समर्थन करते हैं जो बात हमारी बात का समर्थन करे।</p>
<p><strong>अनादि काल से है स्थित</strong></p>
<p>बड़े से बड़ा व्यक्तित्व भी आप को समझाने में अपने आप को असमर्थ पाता है। यह स्थिति वर्तमान समय में नहीं बनी बल्कि अनादि कालीन है। जब जब कोई व्यक्ति व्यसनों में लिप्त हुआ, उसने अपना सब कुछ खो दिया पर किसी की नहीं मानी। भीम ने युधिष्ठिर को कितना मना करा, उनसे कितनी अनुनय की, पर युधिष्ठिर दांव पर दांव लगाते गए और परिणाम सभी को ज्ञात है। भरी सभा में इतना बड़ा घोर अपमान हुआ। रावण को किसने नहीं समझाया कि पर स्त्री का सेवन दुर्गति का कारण है। मंदोदरी, विभीषण, कुंभकरण यहां तक कि उसके पुत्रों ने कहा पर रावण ने किसी की नहीं मानी। रावण के साथ क्या-क्या हुआ सभी को ज्ञात है। ज्ञात हो कर भी हम क्या कर रहे हैं।</p>
<p><strong>व्यसन से आती विवेकहीनता</strong></p>
<p>व्यसन की वासना कभी समाप्त हुई है क्या? और इसी व्यसन में व्यक्ति इतना तल्लीन हो जाता है कि वह विवेकहीन हो जाता है। उस वासना का सार्थक अर्थ है (वास +ना) अर्थात यहां वास नहीं करना। इन व्यसनों में जिसने वास नहीं किया, निवास नहीं किया, उसका आवास एक मंदिर की तरह पूज्य बन गया जाता है।फिर इस शरीर रूपी देवालय में बैठा आपका आत्म तत्व रूपी देवता आपको स्पष्ट दिखाई देने लगता है।</p>
<p>आपका तन मन और आत्मा रूपी धन तीनों ही तीर्थ के समान पवित्र हो जाते हैं। इसलिए साक्षी है व्यसन में लिप्त बड़े-बड़े महारथियों की किस प्रकार दुर्दशा हुई। जिसका कदम कदभृ( कीचड़ )में फंस जाता है उसे बड़े यत्न से ही निकाला जा सकता है। वरना तो कदम निकालते-निकालते ही दम निकल जाता है। यह कदम विकार से विकास की ओर बढ़े। हमारी सही लत से ही हम स्वयं का और दूसरों का कल्याण कर सकते हैं।</p>
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		<title>धर्म प्रभावना : आदर्श जीवन से ही बनता है गौरवशाली इतिहास : मुनि श्री निरंजन सागर  </title>
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		<pubDate>Mon, 20 Feb 2023 14:03:20 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[समाचार]]></category>
		<category><![CDATA[Acharya Shri Vidyasagar Maharaj कुंडलपुर]]></category>
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					<description><![CDATA[मुनि श्री निरंजन सागर ने प्रवचन के दौरान कहा कि प्रसिद्धि भी दो तरह से होती है। पहली विख्यात और दूसरी कुख्यात ।यह ख्याति की चाह, पूजन( आदर सत्कार) की चाह, लाभ की चाह और सभी जगह बस मेरी वाह वाह। पढ़िए जयकुमार जलज हटा/राजेश रागी बकस्वाहा की विस्तृत रिपोर्ट&#8230; कुण्डलपुर। हर व्यक्ति आज चाहता [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>मुनि श्री निरंजन सागर ने प्रवचन के दौरान कहा कि प्रसिद्धि भी दो तरह से होती है। पहली विख्यात और दूसरी कुख्यात ।यह ख्याति की चाह, पूजन( आदर सत्कार) की चाह, लाभ की चाह और सभी जगह बस मेरी वाह वाह। <span style="color: #ff0000;">पढ़िए जयकुमार जलज हटा/राजेश रागी बकस्वाहा की विस्तृत रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>कुण्डलपुर।</strong> हर व्यक्ति आज चाहता है कि उसका नाम भी इतिहास में अंकित हो और वह भी सामान्य नहीं बल्कि स्वर्णिम अक्षरों में। जिस व्यक्ति ने अपना जीवन ही स्वर्णमय बना लिया हो, उस व्यक्ति का जीवन ही स्वर्णिम अक्षरों से इतिहास में स्थान पाता है। जिस व्यक्ति ने अपने आप को स्वर्ण की भांति निखारा न हो, तपाया न हो, ऐसा व्यक्ति तीन काल में आदर्श प्रस्तुत नहीं कर सकता है। यह बात मुनि श्री निरंजन सागर जी ने महाराज में प्रतिदिन होने वाले प्रवचनों की श्रंखला के दौरान कही। प्रसिद्धि भी दो तरह से होती है। पहली विख्यात और दूसरी कुख्यात ।यह ख्याति की चाह, पूजन( आदर सत्कार) की चाह, लाभ की चाह और सभी जगह बस मेरी वाह वाह। यह कुछ ऐसी चाह है कि जब तक मुख से आह न निकले अर्थात प्राणांत होने तक बनी रहती है। इस चाह को स्वाहा किए बिना हम एक आदर्श पूर्ण जीवन नहीं जी सकेंगे। साइंस ऑफ लिविंग का रहस्य समझ में आना बड़ा कठिन है। जिसने ऐसे समझ लिया वही जीवन के सही आनंद को प्राप्त कर सकता है। जीवन का सार है मर्यादा और जिसने मर्यादा का उल्लंघन कर दिया, फिर वह किसी की मर्यादा अर्थात् विनय आदर आदि भी नहीं करता। पिता पुत्र की मर्यादा का आदर्श उदाहरण हैं श्रीराम और दशरथ जी। गुरु शिष्य की मर्यादा का आदर्श उदाहरण हैं एकलव्य और द्रोणाचार्य। देश प्रेम का आदर्श उदाहरण हैं दानवीर भामाशाह। राष्ट्रप्रेम का आदर्श उदाहरण हैं महाराणा प्रताप। अतिथि सत्कार का आदर्श उदाहरण हैं शबरी। भक्ति का आदर्श उदाहरण हैं मीरा। ऐसे कई गौरवशाली व्यक्तित्व से भारतीय सनातन इतिहास भरा पड़ा है। इन महापुरुषों ने अपने जीवन को सफल आदर्श के रूप में प्रस्तुत किया। इतिहास जब भी लिखा जाता है कुछ करने वालों का ही लिखा जाता है परंतु वह कार्य अगर आदर्श कार्य हो तो वह इतिहास को गौरवान्वित करता है और वही कुछ कुकृत्य ऐसे भी होते हैं जिनसे इतिहास कलंकित भी हो जाता है। रावण, कौरव आदि ऐसे उदाहरण हैं, जिनसे इतिहास को शर्मसार होना पड़ा।</p>
<p><strong>वर्तमान में आदर्शों की कमी</strong></p>
<p>वर्तमान समय में समाज में आदर्शों की बहुत बड़ी कमी होती जा रही है। यह हम सभी का प्रबल पुण्य का उदय है इस कलिकाल में जहां धर्म नाम मात्र का रह गया था, वहां आचार्य महाराज जैसे सूर्य का उदय हुआ। इस युग में आदर्श पुरुष राष्ट्रहित चिंतक आचार्य गुरुवर 108 श्री विद्यासागर जी महामुनि राज का जन्म हुआ। जिन्होंने इस धर्म की ध्वजा को इतना ऊपर उठाया कि वह धर्म इस युग के अंत तक अनवरत इसी तरह चलता रहेगा।गुरुदेव ने अपने मर्यादित आदर्श पूर्ण जीवन के माध्यम से एक ऐसा गौरवशाली इतिहास रच डाला। ऐसा इतिहास ना भूतो ना भविष्यति। यह इतिहास युगों युगों तक गुरुदेव के गुणगान गा कर उनकी गौरवगाथा सबको सुनाता रहेगा। आचार्यों ने आदर्श पूर्ण जीवन जीने को कहा है। ऐसा जीवन जो बिना प्रदर्शन के मात्र आत्मदर्शन को दर्शाए, वही आदर्श जीवन है। आदर्श अर्थात (आ +दर्श) आत्मदर्शन जहां हो। ऐसा आदर्श हम सभी अपने जीवन में स्थापित करें और जिन्होंने किया है, उनका अनुकरण कर अपना जीवन सफल करें।</p>
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		<title>नया दावा-अशोक स्तंभ नहीं, बल्कि ‘मनोज्ञ स्तंभ’</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 17 Jul 2022 00:00:16 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[धर्म]]></category>
		<category><![CDATA[अशोक सम्राट]]></category>
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		<category><![CDATA[इतिहास]]></category>
		<category><![CDATA[जैन न्यूज]]></category>
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		<category><![CDATA[महावीर भगवान]]></category>
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					<description><![CDATA[श्रीफल न्यूज के लिए प्रकाश श्रीवास्तव की रिपोर्ट जयपुर।  इतिहास में अब तक यही मान्यता रही है कि सम्राट अशाेक ने बिहार के वैशाली जिले में भगवान बुद्ध की स्मृति में सिंह वाले स्तम्भ का निर्माण कराया था। लेकिन, अब इसे लेकर एक नया दावा सामने आया है। उत्खनन में मिले पुरातात्विक अवशेषों पर शाेध [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color: #ff0000">श्रीफल न्यूज के लिए प्रकाश श्रीवास्तव की रिपोर्ट</span></p>
<p><strong>जयपुर।</strong>  इतिहास में अब तक यही मान्यता रही है कि सम्राट अशाेक ने बिहार के वैशाली जिले में भगवान बुद्ध की स्मृति में सिंह वाले स्तम्भ का निर्माण कराया था। लेकिन, अब इसे लेकर एक नया दावा सामने आया है। उत्खनन में मिले पुरातात्विक अवशेषों पर शाेध कर रहे जैन दार्शनिकों ने दावा किया है कि यह अशोक स्तंभ भगवान बुद्ध नहीं, बल्कि भगवान महावीर की दीक्षा की स्मृति में बनाया गया ‘मनोज्ञ स्तंभ’ है।<br />
वैसे तो बिहार का वैशाली जिला अपने आप में विशद इतिहास को समेटे हुए है। वैशाली से ही गणतांत्रिक शासन व्यवस्था की शुरुआत की गई थी। ऐसे में विश्व को सर्वप्रथम गणतंत्र का पाठ पढ़ाने वाला जिला वैशाली ही है। यह भूमि महावीर स्वामी की जन्मभूमि और भगवान बुद्ध की कर्मभूमि भी है। वैशाली के बासोकुंड गांव के पास कुंडलपुर में भगवान महावीर स्वामी का जन्म हुआ था। अब इस भूमि पर भगवान महावीर का भव्य मंदिर बना हुआ है। वैशाली बौद्धों के लिए भी पवित्र भूमि है क्योंकि यहीं पर बुद्ध ने अपने निर्वाण की घोषणा भी की थी।<br />
इतिहासकार सच्चिदानंद चौधरी की किताब के हवाले से वैशाली इंस्टीट्यूट ऑफ रिसर्च के डाॅ आरसी जैन और वैशाली के महावीर पुस्तक के संपादक राजेन्द्र जैन ने बताया है कि महावीर ने ज्ञातृ वन में 12 वर्ष तप के बाद राजा बकुल के भवन में प्रथम आहार किया था। इस भवन के अवशेष एक सिंह वाले स्तंभ के पास मिले हैं। दावा है कि अशाेक ने महावीर की स्मृति में यह स्तंभ बनवाया था।</p>
<p><strong>स्तंभ पर एक ही सिंह बड़ा सबूत</strong><br />
जैन दार्शनिकों का तर्क है कि भगवान महावीर का प्रतीक चिह्न एक सिंह है और वैशाली के प्रसिद्ध अशोक स्तंभ में भी एक ही सिंह है। जबकि बुद्ध से जुड़े स्थलों पर प्रतीक चिह्नों में सिंह की संख्या चार है। महावीर के जन्मस्थल की मिट्टी काे अहिल्य माना जाता है। यानी ऐसी भूमि जहां हल नहीं चलाया जा सकता। इसलिए इसके आसपास के स्थान पर कभी हल नहीं चलाया गया। इन सब साक्ष्य के मद्देनजर उपरोक्त दावा किया गया है।</p>
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