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	<title>इच्क्षु &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
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		<title>अक्षय तृतीया प्रदान करती है सुख समृद्धि: तीर्थंकर ऋषभदेव ने लिया एक वर्ष के बाद लिया प्रथम आहार  </title>
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		<pubDate>Fri, 25 Apr 2025 15:55:22 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव से जुड़ा है अक्षय तृतीया पर्व का इतिहास। इस दिन प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव ने पारणा किया था। राजा श्रेयांस ने उन्हें ईख जिसे इच्क्षु भी कहा जाता है कि उसका रस भगवान को अर्पित किया था। उस दिन वैशाख मास की तृतीया थी। तभी से उस दिन [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव से जुड़ा है अक्षय तृतीया पर्व का इतिहास। इस दिन प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव ने पारणा किया था। राजा श्रेयांस ने उन्हें ईख जिसे इच्क्षु भी कहा जाता है कि उसका रस भगवान को अर्पित किया था। उस दिन वैशाख मास की तृतीया थी। तभी से उस दिन को अक्षय तिथि कहा जाने लगा। <span style="color: #ff0000">अयोध्या से पढ़िए, विजयकुमार जैन शास्त्री की खबर&#8230; </span></strong></p>
<hr />
<p><strong>अयोध्या।</strong> जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव से जुड़ा है अक्षय तृतीया पर्व का इतिहास। भगवान ऋषभदेव ने अयोध्या में जन्म लिया एवं प्रयाग की (इलाहाबाद) धरती पर जैनेश्वरी दीक्षा को धारण किया। जो इस युग की प्रथम दीक्षा थी क्योंकि, भगवान ऋषभदेव वर्तमान चौबीसी के प्रथम तीर्थंकर हैं। दीक्षा को धारण करते ही ध्यान लगाकर भगवान बैठ गये। भगवान के साथ में 4 हजार राजाओं ने दीक्षा ग्रहण की। 6 माह पश्चात भगवान ऋषभदेव आहारचर्या बतलाने के लिए कि जैन साधुओं को किस प्रकार आहार करना चाहिए। लोगों को इस विधि का ज्ञान हो सके। इसलिए आहार के लिए निकले। लोगों को ज्ञान ही नहीं था कि जैन साधुओं को आहार किस प्रकार से करना चाहिए। महायोगी ऋषभदेव जिस ओर कदम रखते थे।</p>
<p>वहीं के लोग प्रसन्न होकर के बड़े आदर के साथ उन्हें प्रणाम करते थे और कहते थे कि भगवान प्रसन्न हो जाइये कहिये क्या काम है, कितने ही लोग भगवान के पीछे-पीछे चलने लगते थे, अन्य कितने ही लोग बहुमूल्य रत्न लाकर भगवान के सामने रखकर कहते थे कि हे देव इन रत्नों ग्रहण कर लीजिए और कितने ही लोग अन्य प्रकार के पदार्थ वस्त्र आभूषण, माला, कन्या, भवन, सवारी आदि दिखाकर कहते थे कि प्रभु इसे ग्रहण कर लीजिए और हमें कृतार्थ कीजिए। तीर्थंकर भगवन अपनी चर्या में विघ्न मानकर आगे बढ़ जाते थे। लोग निराश होकर के प्रभु की ओर देखते रह जाते थे और सोचते थे कि किस प्रकार से भगवान को उनकी महचाही वस्तु देकर हम कृतार्थ हो सकें। इस प्रकार से भगवान को 6 माह व्यतीत हो जाते हैं। 1 वर्ष पूर्ण हो जाता है और महामुनि कुरू जांगल देश के आभूषण ऐसे हस्तिनापुर नगर के समीप पहुंचते हैं।</p>
<p><strong>अक्षय का अर्थ है जिस वस्तु का कभी क्षय न हो</strong></p>
<p>जैन समाज के वरिष्ठ विद्वान सहितासूरी प्रतिष्ठाचार्य श्री विजय कुमार जैन शास्त्री ने बताया कि अक्षय तृतीया का प्राचीन इतिहास हस्तिनापुर तीर्थ से ही प्रारंभ हुआ है। वैशाख सुदी तीज को अक्षय तृतीय के नाम से जाना जाता है। अक्षय का अर्थ है जिस वस्तु का कभी क्षय न हो अर्थात् वस्तु समाप्त न हो और वह महीना वैशाख का था और तिथि तृतीया थी। इसलिए इसका नाम अक्षय तृतीया पड़ा। लोगों का मानना है कि इस दिवस किया जाने वाला कार्य वृद्धि को प्राप्त होता है। भगवान ऋषभदेव को हुए कोड़ा कोड़ी वर्ष (करोड़ों करोड़ो साल) व्यतीत हो गये।</p>
<p>लेकिन, आज भी अक्षय तृतीया का पर्व मनाने के लिए देश एवं विदेश से जैन श्रद्धालु हस्तिनापुर की धरती पर आते हैं। जैन श्रद्धालु आहार दान की महिमा का वर्णन करते हुए इस पवित्र धरती पर आते हैं। इस पवित्र दिवस का ये महत्व है कि बिना मुहुर्त के ही हजारों विवाह सम्पन्न होते हैं। अगणित ग्रह प्रवेश आदि मांगलिक कार्य सम्पन्न किये जाते हैं। और इसे सर्वश्रेष्ठ मुहुर्त माना जाता है।</p>
<p><strong>राजा श्रेयांस को उत्तम-उत्तम 7 स्वप्न दिखाई देते हैं</strong></p>
<p>हस्तिनापुर नगरी के शासक राजा सोमप्रभ और उनके भाई श्रेयांस कुमार थे। पिछली रात्रि में राजा श्रेयांस को उत्तम-उत्तम 7 स्वप्न दिखाई देते हैं। प्रातः वह अपने स्वप्नों को अपने भाई सोमप्रभ से उन स्वप्नों को बताकर उनका फल पूछते हैं। प्रथम स्वप्न में मैने सुमेरू पर्वत देखा है, दूसरे में एक कल्पवृक्ष देखा है जिसकी शाखाओं पर आभूषण लटक रहे हैं, तीसरे में सिंह देखा है, चौथे में बैल, पांचवें में सूर्य और चंदमा, छठे में लहरों से सुशोभित समुद्र तथा सातवें में अष्ट मंगल द्रव्यों को हाथों में धारण किये व्यंतर देवों को देखा है। इन स्वप्नों का उत्तम फल जानकर अति प्रसन्नचित्त हो करके के चिंतन ही कर रहे होते हैं कि तभी सुनने में आता है कि तीर्थंकर ऋषभदेव हस्तिनापुर में प्रवेश कर चुके हैं। चारों ओर भारी जन समुदाय एकत्र होकर के भगवान का दर्शन करता है। उनके चरणों की पूजन करता है।</p>
<p><strong>इच्क्षु रस का हुआ पारण, आखा तीज महान।</strong></p>
<p><strong>जय जय ऋषभदेव भगवान, जय जय ऋषभदेव भगवान।।</strong></p>
<p>कोई कहता है कि अहो बड़े आश्चर्य की बात है कि ये तीन लोक के स्वामी भगवान ऋषभदेव समस्त राज्य वैभव का त्यागकर पूर्ण दिगंबर होकर आज अकेले ही इस पृथ्वीतल पर विचरण कर रहे हैं। इतने में ही द्वारपाल द्वारा सूचना प्राप्त होती है कि प्रभु समीप में ही पधार चुके है और इधर ही आ रहे हैं। राजा सोमप्रभ और श्रेयांस महल के बाहर आ जाते हैं प्रभु के चरणों में नम्रतापूर्वक नमस्कार करते हैं। इतने में ही राजकुमार श्रेयांस को पूर्वभव का जाति स्मरण हो जाता है कि जब में राजा बज्रजंघ की रानी श्रीमती की पर्याय में मुनियों को दिये गये आहार दान की सारी विधि स्मरण में आ जाती है। महाप्रभु ऋषभदेव को देखते ही राजा श्रेयांस एवं सोमप्रभ ने हे! भगवन् अत्रो-अत्रो, तिष्ठो-तिष्ठो आहार जल शुद्ध है, मन शुद्धि, वचन शुद्धि, काय शुद्धि आहार-जल शुद्ध है। मुद्रा छोडिये आहार ग्रहण करिये नवधा भक्ति पूर्वक पड़गाहन कर लेते हैं एवं अष्ट द्रव्य से पूजन कर नमस्कार करते हैं। ऐसे निवेदन कर प्रभु से आहार ग्रहण करने हेतु प्रार्थना करते हैं। भगवान ऋषभ देव करपात्र में आहार प्रारंभ कर देते हैं। बड़ी भक्ति के साथ राजा श्रेयांस इच्छुरस (गन्ने) का आहार देते हैं। उसी समय आकाश से देवों द्वारा रत्न वृष्टि होने लग जाती है। नाना प्रकार सुगंधित पुष्पों की वृष्टि होने लग जाती है। देवता भी धन्य है यह दान धन्य यह पात्र धन्य ये दाता ऐसे शब्दों से आकाश गुंजायमान कर देते हैं एवं देवों द्वारा पांच अतिशय पंचाश्चर्य कहलाते हैं। राजा श्रेयांस प्रभु को आहार देने में मग्न हैं देवतागण हर्ष विभोर होकर के पंचाश्चर्य की वृष्टि कर रहे है। प्रभु ऋभषदेव आहार करके वन की ओर प्रस्थान कर जाते हैं। उस दिन सारे नगर में गन्ने के सार का प्रसाद वितरण किया जाता है लेकिन, फिर भी गन्ने का रस समाप्त नहीं होता है। वह अक्षय हो जाता है।</p>
<p><strong>राजा श्रेयांस ने प्रथम आहार दान दिया </strong></p>
<p>राजा श्रेयांस ने प्रथम आहार दान दिया क्योंकि इस युग के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव थे। तो यह प्रथम आहार था भरत चक्रवर्ती ने अयोध्या से पूरी सेना के साथ हस्तिनापुर आकर के राजा श्रेयांस व सोमप्रभ का खूब सम्मान किया एवं दान तीर्थ प्रवर्तक की उपाधि से उन्हें अलंकृत किया। इससे पूर्व दान देने की प्रथा इस धरती पर नहीं थी इसका शुभांरभ राजा श्रेयांस के द्वारा ही हुआ। तो यह दानवीर भूमि भी कहलाई। तब से लेकर के आज तक ये हस्तिनापुर की धरती के समीप वर्ती क्षेत्रों में इच्क्षु (गन्ना) खेती खूब पाई जाती है। उस दिन से इस धरती पर गन्ने की खेती भी अक्षय हो गई समीपवर्ती सभी क्षेत्रों में गन्ने की खेती होती है एवं ऐसा मानते है कि जैन साधु जहां पर भी विराजमान है उनको आज के दिन गन्ने के रस का आहार करवाया जाता है। जो लोग वर्षीय उपवास करते हैं वे पारणा करने के लिए हस्तिनापुर की धरती पर आकर के अपना उपवास समाप्त करके पारणा इच्क्षु रस से करते हैं और अपने आप को धन्य मानते हैं यह इस भूमि का असीम पुण्य है। अक्षय तृतीय आखा तीज के नाम से भी जाना जाता है।</p>
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