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	<title>आलेख &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<title>आलेख &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>मरने के बाद की बनावटी संवेदनाएं, जीते जी सच्ची उपेक्षा: असली त्याग के लिए कोई आगे नहीं आता  </title>
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		<pubDate>Mon, 13 Apr 2026 12:21:43 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[इंसान के मरने के बाद अक्सर एक अजीब सा दृश्य देखने को मिलता है। हर रिश्तेदार, हर परिचित बड़ी सहजता से कहता है कि रोटी हमारी तरफ से होगी, व्यवस्था हम करेंगे। संवेदनाओं को झकझोरता यह आलेख पढ़िए, नितिन जैन की कलम से&#8230; पलवल (हरियाणा)। इंसान के मरने के बाद अक्सर एक अजीब सा दृश्य [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>इंसान के मरने के बाद अक्सर एक अजीब सा दृश्य देखने को मिलता है। हर रिश्तेदार, हर परिचित बड़ी सहजता से कहता है कि रोटी हमारी तरफ से होगी, व्यवस्था हम करेंगे। <span style="color: #ff0000">संवेदनाओं को झकझोरता यह आलेख पढ़िए, नितिन जैन की कलम से&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>पलवल (हरियाणा)।</strong> इंसान के मरने के बाद अक्सर एक अजीब सा दृश्य देखने को मिलता है। हर रिश्तेदार, हर परिचित बड़ी सहजता से कहता है कि रोटी हमारी तरफ से होगी, व्यवस्था हम करेंगे, कोई कमी नहीं रहने देंगे। उस समय मानो संवेदनाओं की बाढ़ आ जाती है पर यही लोग तब कहीं नजर नहीं आते जब वही इंसान ज़िंदा होता है, दर्द में होता है, बीमारी से जूझ रहा होता है। जब वह अस्पताल के चक्कर काट रहा होता है, दवाइयों के लिए पैसे जोड़ रहा होता है, मन से टूटा हुआ होता है, तब कोई यह नहीं कहता कि दवाई मेरी तरफ से होगी, इलाज की चिंता मत करो, मैं साथ खड़ा हूं। उस समय रिश्तों की असली परीक्षा होती है और दुर्भाग्य से अधिकांश रिश्ते वहीं फेल हो जाते हैं। आज समाज में एक खतरनाक प्रवृत्ति विकसित हो गई ह ैकि जीते जी साथ देने से बचना और मरने के बाद दिखावा करना क्योंकि, जीते जी मदद करने में त्याग करना पड़ता है, समय देना पड़ता है, पैसा खर्च करना पड़ता है और सबसे बड़ी बात कि दिल से जुड़ना पड़ता है जबकि, मृत्यु के बाद की व्यवस्थाओं में केवल समाज को दिखाने का अवसर होता है, जहां संवेदना कम और प्रदर्शन अधिक होता है। यह कटु सत्य है कि आज रिश्ते भावनाओं से नहीं, अवसरों और दिखावे से संचालित हो रहे हैं। किसी के दुःख में उसके साथ खड़ा होना कठिन लगता है, पर उसके जाने के बाद अपनी उपस्थिति दर्ज कराना आसान लगता है। यही कारण है कि समाज में संवेदनशीलता धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही है।</p>
<p>हमें यह समझना होगा कि असली धर्म, असली मानवता और असली रिश्ते वही हैं जो किसी के बुरे समय में काम आएं। अंतिम संस्कार में रोटी देने से कहीं बड़ा पुण्य उस समय होता है जब आप किसी की बीमारी में उसका सहारा बनते हैं, उसकी दवाई का खर्च उठाते हैं, उसे मानसिक बल देते हैं। जरूरत इस बात की है कि हम अपने व्यवहार में बदलाव लाएं। दिखावे की इस परंपरा को तोड़ें और सच्चे अर्थों में रिश्तों को निभाएं। किसी के जाने के बाद नहीं, बल्कि उसके जीते जी उसके काम आएं। क्योंकि मरने के बाद की रोटी से ज्यादा मूल्यवान जीते जी की दवाई होती है, और दिखावे की भीड़ से ज्यादा कीमती एक सच्चा साथ होता है। यदि हम सच में समाज को बेहतर बनाना चाहते हैं, तो हमें अपनी प्राथमिकताएं बदलनी होंगीकृदिखावे से हटकर संवेदनाओं की ओर, औपचारिकता से हटकर वास्तविकता की ओर।</p>
<p>संयोजक-जैन तीर्थ श्री पार्श्व पद्मावती धाम,</p>
<p>जिलाध्यक्ष-अखिल भारतीय अग्रवाल संगठन, पलवल</p>
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		<title>भगवान महावीर स्वामी के 2552वें निर्वाणोत्सव पर विशेष : दीपावली से शुरू हुआ था भारत का सबसे प्राचीन संवत </title>
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		<pubDate>Sun, 19 Oct 2025 03:10:42 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन परंपरा में दिवाली पर्व का विशेष महत्व है। यह दिन भगवान महावीर स्वामी के निर्वाणोत्सव के रूप में मनाया जाता है। ईसा से 527 वर्ष पूर्व कार्तिक कृष्ण अमावस्या को भगवान महावीर का निर्वाण हुआ था। इसके अगले दिन, कार्तिक शुक्ल एकम से जैन परंपरा में नए वर्ष की शुरुआत मानी जाती है। इस [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जैन परंपरा में दिवाली पर्व का विशेष महत्व है। यह दिन भगवान महावीर स्वामी के निर्वाणोत्सव के रूप में मनाया जाता है। ईसा से 527 वर्ष पूर्व कार्तिक कृष्ण अमावस्या को भगवान महावीर का निर्वाण हुआ था। इसके अगले दिन, कार्तिक शुक्ल एकम से जैन परंपरा में नए वर्ष की शुरुआत मानी जाती है। इस दिन दीपक जलाने की परंपरा भी जुड़ी हुई है। दीपक केवल बाहरी अंधकार को मिटाने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह मानव अंतर में व्याप्त अज्ञान और निराशा को दूर कर जीवन में ज्ञान, आशा और आलोक का प्रतीक बनता है। <span style="color: #ff0000">पढ़िए डॉ. सुनील जैन संचय का विशेष आलेख&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p>भारत धर्मप्रधान देश है और अहिंसा प्रधान संस्कृति का प्रतीक है। हमारे त्योहार संस्कृति एवं सभ्यता का दर्पण हैं और इनका संबंध प्राचीन महत्वपूर्ण घटनाओं से जुड़ा होता है। यहां पर धार्मिकता से जुड़े अनेक पर्व मनाए जाते हैं। दीपावली पर्व पूरे देश में बड़े उत्साह और उमंग के साथ मनाया जाता है। अधिकतर धर्म-संप्रदायों में इस पर्व को मनाने का कोई न कोई उद्देश्य अवश्य होता है।</p>
<p><strong>भारत में संवतों की विविधता</strong></p>
<p>भारत में वीर निर्वाण संवत, विक्रम संवत, शक संवत, शालिवाहन संवत, ईस्वी संवत, गुप्त संवत, हिजरी संवत आदि कई संवत प्रचलित हैं। इनमें से वीर निर्वाण संवत सबसे प्राचीन है। यह हिजरी, विक्रम, ईस्वी, शक आदि संवतों से भी अधिक पुराना है।</p>
<p><strong>जैन परंपरा में दीपावली</strong></p>
<p>जैन दर्शन में दीपावली पर्व का इतिहास अनूठा और तथ्यपरक है। यह पर्व भगवान महावीर स्वामी से जुड़ा हुआ है। ईसा से 527 वर्ष पूर्व कार्तिक कृष्ण अमावस्या को दीपावली के दिन ही भगवान महावीर का निर्वाण हुआ। इसके अगले दिन कार्तिक शुक्ल एकम से भारत का सबसे प्राचीन संवत ‘वीर निर्वाण संवत’ प्रारंभ हुआ। जैन परंपरा में इसी दिन से नए वर्ष की शुरुआत मानी जाती है।</p>
<p><strong>वीर निर्वाण संवत का प्रमाण</strong></p>
<p>वीर निर्वाण संवत की प्रामाणिकता सुप्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ता डॉ. गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने वर्ष 1912 में अजमेर जिले के बडली गाँव (भिनय तहसील, राजस्थान) से प्राप्त प्राचीन प्राकृत ब्राह्मी शिलालेख से सिद्ध की। इस शिलालेख में लिखा है “84 वीर संवत”, जो भगवान महावीर निर्वाण के 84 वर्ष बाद लिखा गया। यह शिलालेख अजमेर के राजपूताना संग्रहालय में सुरक्षित है।</p>
<p>शिलालेख की पहली पंक्ति में “वीर” शब्द भगवान महावीर स्वामी को संबोधित है और दूसरी पंक्ति में “निर्वाण से 84 वर्ष” अंकित है। ईसा से 527 वर्ष पूर्व निर्वाण से 84 वर्ष घटाने पर 443 वर्ष आता है, जो इस शिलालेख के लिखे जाने का वर्ष है।</p>
<p><strong>दीपावली और जीवन का आलोक</strong></p>
<p>दीपावली पर जलने वाले दीपकों की संख्या हजारों में होती है। यह बाहरी अंधकार को मिटाता है, लेकिन अंतर का अंधकार यथावत् रहता है। इस दीपावली पर एक दीपक इस अनुभूति के साथ जलाना चाहिए कि आत्मा की ज्योति मरणशील देह में मुस्कुराए।</p>
<p><strong>जैन परंपरा में नया वर्ष</strong></p>
<p>जैन परंपरा में भगवान महावीर स्वामी के निर्वाणोत्सव के अगले दिन से नए वर्ष की शुरुआत मानी जाती है।</p>
<p>“यद्यपि युद्ध नहीं कियो, नाहिं रखे असि-तीर,</p>
<p>परम अहिंसक आचरण, तदपि बने महावीर।”</p>
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		<title>आध्यात्मिक साधना का अद्वितीय जीवनवृत्त : संयम, तप और वात्सल्य के प्रतीक हैं आचार्य वर्धमान सागर जी महाराज </title>
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		<pubDate>Sat, 30 Aug 2025 05:00:00 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज का जीवन संयम, तप, करुणा और धर्मप्रभावना का अद्वितीय उदाहरण है। 75वें जन्मदिवस पर उनका यह जीवनवृत्त समाज के लिए प्रेरणा, भक्ति और आत्मशुद्धि का संदेश है। पढ़िए राजेश पंचोलिया का विशेष आलेख&#8230;. भारत की आध्यात्मिक परंपरा में संयम, तप और करुणा के प्रतीक आचार्य 108 श्री वर्धमान सागर [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज का जीवन संयम, तप, करुणा और धर्मप्रभावना का अद्वितीय उदाहरण है। 75वें जन्मदिवस पर उनका यह जीवनवृत्त समाज के लिए प्रेरणा, भक्ति और आत्मशुद्धि का संदेश है। <span style="color: #ff0000">पढ़िए राजेश पंचोलिया का विशेष आलेख&#8230;.</span></strong></p>
<hr />
<p>भारत की आध्यात्मिक परंपरा में संयम, तप और करुणा के प्रतीक आचार्य 108 श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने अपने साधु जीवन के 57 वर्षों में जिनधर्म की अखंड ज्योति प्रज्वलित की है। मूल बाल ब्रह्मचारी पट्ट परंपरा के पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री ने राष्ट्रभर में धर्मप्रभावना का अद्वितीय कार्य किया। 18 सितम्बर 1950 को जन्मे यह महामानव भादवा सुदी सप्तमी को 75वें अवतरण दिवस पर प्रवेश कर रहे हैं। उनकी साधना, उपसर्गों पर विजय, तप और वात्सल्य ने उन्हें समाज के लिए प्रेरणा का आधार बना दिया है।</p>
<p><strong>परंपरा और दीक्षा</strong></p>
<p>20वीं सदी के प्रथमाचार्य चारित्र चक्रवर्ती आचार्य 108 श्री शांतिसागर जी महाराज की मूल बाल ब्रह्मचारी पट्ट परंपरा में तृतीय पट्टाधीश आचार्य 108 श्री धर्मसागर जी से दीक्षित होकर, इस परंपरा के पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज बने।</p>
<p>उनकी दीक्षा 24 फरवरी 1969 (फाल्गुन शुक्ल अष्टमी) को श्री महावीर जी में आचार्य श्री धर्मसागर जी महाराज से हुई।</p>
<p><strong>जन्मभूमि और बाल्यकाल</strong></p>
<p>आचार्य श्री का जन्म मध्यप्रदेश के खरगोन जिले के सनावद नगर में हुआ, जो कई सिद्धक्षेत्रों के निकट स्थित है।</p>
<p>उनकी माता श्रीमती मनोरमा देवी जैन और पिता श्री कमलचंद जी जैन (पोरवाड़ उपजाति) थे। यशवंत नाम से जन्मे यह बालक अपने परिवार की 13वीं संतान थे। माता-पिता ने महावीर जी मंदिर में मन्नत मांगी थी कि यदि संतान जीवित हुई तो उसका मुंडन वहीं कराएंगे। बाद में यही स्थान उनकी मुनि दीक्षा का पावन स्थल बना।</p>
<p><strong>प्रारंभिक जीवन और संत-समागम</strong></p>
<p>मात्र 12 वर्ष की आयु में माता का असामयिक निधन हो गया।</p>
<p>युवावस्था में वे कई आचार्यों और आर्यिकाओं के संपर्क में आए। मई 1968 में संघ से जुड़ गए और आचार्य श्री शिवसागर जी महाराज से गृहत्याग का नियम लिया।</p>
<p><strong>उपसर्ग और नेत्रज्योति की पुनः प्राप्ति</strong></p>
<p>दीक्षा के बाद मात्र 19 वर्ष की उम्र में उनकी नेत्र ज्योति चली गई। डॉक्टरों ने इंजेक्शन के बिना दृष्टि लौटने की संभावना न के बराबर बताई। लेकिन मुनि श्री ने संकल्प किया कि वे उपचार नहीं कराएंगे।</p>
<p>लगातार 3 घंटे तक श्री शांति भक्ति का पाठ करने और प्रभु भक्ति की प्रभावना से 52 घंटे बाद उनकी नेत्र ज्योति लौट आई। यह घटना आज भी भक्तों के लिए आस्था का आधार है।</p>
<p><strong>आचार्य पद</strong></p>
<p>24 जून 1990 (आषाढ़ शुक्ल द्वितीया) को राजस्थान के पारसोला में, आचार्य श्री अजितसागर जी महाराज के लिखित आदेश से उन्हें आचार्य पद प्रदान किया गया। 57 वर्ष के साधु जीवन में उन्होंने देशभर में धर्मप्रभावना की और अनेक तीर्थ क्षेत्रों में चातुर्मास व विहार किए।</p>
<p><strong>दीक्षाएं और पंचकल्याणक</strong></p>
<p>अब तक आचार्य श्री ने 117 दीक्षाएं दी हैं – जिनमें 41 मुनि, 45 आर्यिका, 15 ऐलक-क्षुल्लक और 13 क्षुल्लिका शामिल हैं। उन्होंने 70 से अधिक पंचकल्याणक प्रतिष्ठाएं कराई हैं।</p>
<p><strong>विशेष योगदान</strong></p>
<p>57 वर्षों में 70 से अधिक सल्लेखनाएं कराई हैं। उनकी विचारधारा – “हम हमारी छोड़ेंगे नहीं, औरों की बिगाड़ेंगे नहीं” – समाज के लिए प्रेरणादायी रही है।</p>
<p><strong>उपाधियां</strong></p>
<p>समाज ने उन्हें अनेक उपाधियां प्रदान कीं – आचार्य शिरोमणि, वात्सल्य वारिधि, राष्ट्र गौरव, तपोनिधि, संस्कृति संरक्षक, जिनधर्म प्रभावक इत्यादि।</p>
<p><strong>महामस्तकाभिषेक में मार्गदर्शन</strong></p>
<p>आचार्य श्री ने 1008 श्री गोमटेश्वर बाहुबली भगवान के महामस्तकाभिषेक (1993, 2006, 2018) और 2022 में श्री महावीर स्वामी के महामस्तकाभिषेक में प्रमुख सानिध्य और मार्गदर्शन प्रदान किया।</p>
<p><strong>विलक्षण प्रसंग</strong></p>
<p>-1994 में श्रवण बेलगोला से कनकगिरि विहार के दौरान देवों ने सर्प रूप में आचार्य श्री का मार्ग रोका। बाद में क्षेत्र विकास के संकेत मिले।</p>
<p>-1988 में भिंडर में गुरु-शिष्य मिलन का भावपूर्ण प्रसंग घटित हुआ, जब आचार्य अजितसागर जी के चरणों को वर्धमान सागर जी के अश्रुओं ने अभिषिक्त किया और बदले में आचार्य श्री के अश्रु आशीर्वाद शिष्य के मस्तक पर गिरे।</p>
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		<title>फादर्स डे पर विशेष पिता के स्नेह और समर्पण को समर्पित दिन : “पिता: जीवन की जड़, संत: जीवन की दिशा” </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Rekha Jain]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 14 Jun 2025 10:39:35 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[फादर्स डे एक विशेष दिन है जो पिता के प्रेम, त्याग और मार्गदर्शन को सम्मान देने के लिए मनाया जाता है। यह दिन हमें अपने पिता के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर देता है। आमतौर पर जून के तीसरे रविवार को मनाया जाने वाला यह दिन परिवार में पिता की भूमिका और उनके योगदान [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>फादर्स डे एक विशेष दिन है जो पिता के प्रेम, त्याग और मार्गदर्शन को सम्मान देने के लिए मनाया जाता है। यह दिन हमें अपने पिता के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर देता है। आमतौर पर जून के तीसरे रविवार को मनाया जाने वाला यह दिन परिवार में पिता की भूमिका और उनके योगदान को सराहने का समय होता है। उपहार, भावनात्मक संदेश और साथ बिताए खास पल इस दिन को और भी यादगार बना देते हैं। <span style="color: #ff0000">पढ़िए श्रीफल जैन न्यूज की संपादक रेखा जैन का विशेष आलेख&#8230;.</span></strong></p>
<hr />
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		<title>विश्व पर्यावरण दिवस 5 जून 2025 पर विशेष : पर्यावरण पुकारे&#8230;अब भी समय है! </title>
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		<pubDate>Wed, 04 Jun 2025 09:12:47 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[विश्व पर्यावरण दिवस हमें एक सतत और संतुलित जीवन जीने का संदेश देता है। इसकी शुरुआत हमारे घर की चौखट से होती है। यह एक स्मरण है – प्रकृति हमें जीवन देती है, अब हमारा कर्तव्य है कि हम उसे बचाएं। हमें आज ही यह प्रतिज्ञा लेनी चाहिए कि हम व्यक्तिगत, सामाजिक और राष्ट्रीय स्तर [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>विश्व पर्यावरण दिवस हमें एक सतत और संतुलित जीवन जीने का संदेश देता है। इसकी शुरुआत हमारे घर की चौखट से होती है। यह एक स्मरण है – प्रकृति हमें जीवन देती है, अब हमारा कर्तव्य है कि हम उसे बचाएं। हमें आज ही यह प्रतिज्ञा लेनी चाहिए कि हम व्यक्तिगत, सामाजिक और राष्ट्रीय स्तर पर पर्यावरण के रक्षक बनेंगे। <span style="color: #ff0000">इस अवसर पर पढ़िए डॉ. सुनील जैन &#8216;संचय&#8217; का विशेष आलेख&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p>हर वर्ष 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है। यह दिवस पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ाने और उसके संरक्षण हेतु सामूहिक प्रयासों को प्रेरित करने का एक वैश्विक अवसर है। 2025 में, जब हम इस दिवस को मना रहे हैं, तब पर्यावरणीय संकट पहले से कहीं अधिक गंभीर रूप ले चुका है। जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, जैव विविधता की क्षति और संसाधनों का अत्यधिक दोहन मानवता के सामने खड़ी प्रमुख चुनौतियाँ हैं। यह दिन हमें न केवल इन संकटों की याद दिलाता है, बल्कि यह भी प्रेरित करता है कि हम धरती माता की रक्षा के लिए कौन-कौन से कदम उठा सकते हैं।</p>
<p>इस वर्ष, विश्व पर्यावरण दिवस 2025 की थीम है: “विश्व स्तर पर प्लास्टिक प्रदूषण का अंत”। यह प्लास्टिक कचरे की गंभीर समस्या से निपटने का एक वैश्विक संकल्प है। हर साल 430 मिलियन टन से अधिक प्लास्टिक का उत्पादन होता है, जिसमें से लगभग दो-तिहाई केवल एक बार उपयोग के लिए होते हैं और शीघ्र ही कचरे में बदल जाते हैं। ये अल्पकालिक उपयोग की वस्तुएं नदियों और महासागरों को प्रदूषित करती हैं, हमारी खाद्य श्रृंखला में प्रवेश कर जाती हैं, और माइक्रोप्लास्टिक के रूप में हमारे शरीर में जमा हो जाती हैं।</p>
<p>5 जून – यह दिन हर वर्ष हमें प्रकृति के साथ हमारे संबंध की स्मृति कराता है। यह केवल वृक्षारोपण तक सीमित नहीं है, बल्कि चेतना का एक विस्तार है – एक सामूहिक प्रतिज्ञा कि हम अपनी धरती के साथ हिंसा नहीं, सह-अस्तित्व का संबंध बनाएँ।</p>
<p><strong>महात्मा गांधी ने कहा था:</strong></p>
<p>“पृथ्वी हर व्यक्ति की आवश्यकता को पूरा कर सकती है, लेकिन हर व्यक्ति के लालच को नहीं।”</p>
<p>ऋग्वेद में वर्णित है: &#8220;पृथ्वी हमारी माता है, हम इसके पुत्र हैं।&#8221;</p>
<p>थॉमस फुलर ने कहा: “हम तब तक पानी की कीमत नहीं समझते, जब तक कुआँ सूख न जाए।”</p>
<p>जैन दर्शन में यह स्पष्ट रूप से बताया गया है: “पर्यावरण की रक्षा करना अहिंसा की सबसे सच्ची साधना है।”</p>
<p>वर्तमान पर्यावरणीय परिदृश्य: संकट की आहटहम जिस तथाकथित विकास की दौड़ में शामिल हैं, वह कहीं न कहीं प्रकृति के विनाश से जुड़ी हुई है। उदाहरण स्वरूप: वनों की अंधाधुंध कटाई से वर्षा चक्र असंतुलित हो गया है। औद्योगीकरण और वाहन उत्सर्जन ने वायु को विषैला बना दिया है।</p>
<p>प्लास्टिक कचरा और रासायनिक अपशिष्टों ने नदियों और समुद्रों को दूषित कर दिया है।</p>
<p>तेज़ी से होते शहरीकरण ने भूमि उपयोग का संतुलन बिगाड़ दिया है।</p>
<p>परिणामस्वरूप – प्राकृतिक आपदाएँ, जल संकट, तापमान वृद्धि, जैव विविधता का विनाश और महामारी जैसी स्थितियाँ लगातार बढ़ रही हैं।</p>
<p><strong>एक काव्यांश में ये भाव कुछ यूँ व्यक्त होते हैं:</strong></p>
<p>नदियाँ भी अब बहते-बहते थक गईं,</p>
<p>जंगलों की चीखें भी अब चुप रह गईं।</p>
<p>कृत्रिम विकास की अंधी इस दौड़ में,</p>
<p>हम अपनी जड़ें ही खुद से काट गए हैं कहीं।।</p>
<p><strong> समाधान की दिशा में व्यावहारिक पहल</strong></p>
<p>पर्यावरणीय संकट का समाधान केवल सरकारी योजनाओं से नहीं, जन-सहयोग से ही संभव है। प्रत्येक व्यक्ति निम्नलिखित प्रयास कर सकता है:</p>
<p><strong>&#8211; व्यक्तिगत स्तर पर:</strong></p>
<p>घर के आसपास कम से कम एक पौधा अवश्य लगाएँ और उसे जीवित रखें।</p>
<p>बिजली और पानी की बर्बादी को रोकें।</p>
<p>एकल-प्रयोग प्लास्टिक (Single-use plastic) से परहेज़ करें।</p>
<p>निजी वाहन का प्रयोग सीमित करें, कारपूल या सार्वजनिक परिवहन को अपनाएँ।</p>
<p><strong>➤ सामाजिक स्तर पर:</strong></p>
<p>सामूहिक सफाई अभियान और वृक्षारोपण कार्यक्रमों में भाग लें।</p>
<p>स्कूलों और समाज में पर्यावरण शिक्षा को बढ़ावा दें।</p>
<p>बच्चों को प्रकृति प्रेम की प्रेरणा दें – उन्हें “प्रकृति मित्र” बनाएँ।</p>
<p>प्रौद्योगिकी और अनुसंधान के स्तर पर:</p>
<p>सौर, पवन और जैविक ऊर्जा स्रोतों का उपयोग बढ़ाएँ।</p>
<p>जल पुनर्चक्रण और वर्षा जल संचयन को प्रोत्साहित करें।</p>
<p>पर्यावरण-अनुकूल तकनीकों में निवेश करें।</p>
<p><strong>भारतीय ज्ञान परंपरा में पर्यावरण संरक्षण</strong></p>
<p>भारत की प्राचीन परंपरा में प्रकृति को ईश्वरतुल्य माना गया है – ‘वृक्ष देवता’ से लेकर ‘नदी माँ’ तक की अवधारणाएँ इसकी पुष्टि करती हैं।</p>
<p>वेदों, उपनिषदों, जैन और बौद्ध साहित्य में प्रकृति के प्रति करुणा और सह-अस्तित्व का स्पष्ट वर्णन मिलता है।</p>
<p>पंचमहाभूतों – पृथ्वी, अग्नि, जल, वायु और आकाश – की पूजा भारतीय संस्कृति में होती आई है।</p>
<p>जैन दर्शन के अनुसार जल, वायु, पृथ्वी और वनस्पति सभी में जीवन है; इसलिए इनका दुरुपयोग पाप है।</p>
<p>संयमित और संतुलित जीवनशैली ही पर्यावरण की रक्षा कर सकती है।</p>
<p>&#8216;अहिंसा परमो धर्म:&#8217; का सिद्धांत हमें सिखाता है कि प्रकृति के साथ हिंसा नहीं, सहजीवन आवश्यक है।</p>
<p>तीर्थंकरों और बुद्ध ने वृक्षों के नीचे ध्यान कर प्रकृति के संरक्षण का संदेश दिया।</p>
<p>जैन मुनि अपने आचरण से पर्यावरण रक्षा के आदर्श प्रस्तुत करते हैं।</p>
<p>“परिग्रह परिमाण” की अवधारणा उपभोग को सीमित कर संतुलन की प्रेरणा देती है।</p>
<p><strong> धर्म और पर्यावरण – एक अभिन्न संबंध</strong></p>
<p>भारतीय पूजा-पद्धतियों में तुलसी, पीपल, नीम, गंगा जल आदि का धार्मिक महत्व प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि पारिस्थितिकी और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।</p>
<p>जैन मुनियों की पदयात्रा, मौन, अपरिग्रह और भोजन में चयनशीलता – पर्यावरण संरक्षण के उत्कृष्ट उपाय हैं।</p>
<p>प्रेरक तथ्य (2025 के परिप्रेक्ष्य में)</p>
<p>संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, हर वर्ष लगभग 10 मिलियन हेक्टेयर वन क्षेत्र नष्ट हो रहा है।</p>
<p>प्रति मिनट एक ट्रक प्लास्टिक समुद्र में गिराया जा रहा है।</p>
<p>वर्ष 2025 तक लगभग 2 अरब लोगों को स्वच्छ जल की कमी का सामना करना पड़ सकता है।</p>
<p><strong>निष्कर्ष:</strong></p>
<p>अब नहीं, तो कभी नहीं।</p>
<p>पृथ्वी हमसे कुछ नहीं माँगती – वह केवल संरक्षण चाहती है। अब समय है कि हम अपनी प्राथमिकताओं को पुनः परिभाषित करें। प्रगति का अर्थ विनाश नहीं, सतत विकास है।</p>
<p>विश्व पर्यावरण दिवस हमें एक सतत और संतुलित जीवन जीने का संदेश देता है। इसकी शुरुआत हमारे घर की चौखट से होती है।</p>
<p>यह एक स्मरण है – प्रकृति हमें जीवन देती है, अब हमारा कर्तव्य है कि हम उसे बचाएँ।</p>
<p>हमें आज ही यह प्रतिज्ञा लेनी चाहिए कि हम व्यक्तिगत, सामाजिक और राष्ट्रीय स्तर पर पर्यावरण के रक्षक बनेंगे।</p>
<p>क्योंकि स्वस्थ पर्यावरण ही, स्वस्थ जीवन की कुंजी है।</p>
<p>विश्व पर्यावरण दिवस केवल एक दिन नहीं, बल्कि एक संकल्प दिवस होना चाहिए।</p>
<p>&#8220;धरती है धरोहर, न इसे करो बर्बाद,</p>
<p>संरक्षण में ही है इसका असली संवाद।&#8221;</p>
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		<title>माँ का आशीर्वाद: हर राह को रोशन करता दीप : माँ – एक एहसास, जो शब्दों से परे है </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 10 May 2025 13:41:01 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[माँ—एक शब्द, लेकिन उसमें समाया है संपूर्ण सृष्टि का प्रेम, त्याग और करुणा। माँ न केवल जीवन देती है, बल्कि हमें जीना भी सिखाती है। उसके आँचल में सुकून है, उसकी ममता में ईश्वर का स्पर्श है। चाहे वह यशोदा हो, जीजाबाई हो, या आज की आधुनिक माँ—हर युग की माँ ने अपने बच्चों को [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>माँ—एक शब्द, लेकिन उसमें समाया है संपूर्ण सृष्टि का प्रेम, त्याग और करुणा। माँ न केवल जीवन देती है, बल्कि हमें जीना भी सिखाती है। उसके आँचल में सुकून है, उसकी ममता में ईश्वर का स्पर्श है। चाहे वह यशोदा हो, जीजाबाई हो, या आज की आधुनिक माँ—हर युग की माँ ने अपने बच्चों को संस्कार, संबल और स्वाभिमान दिया है। मदर्स डे पर हम उन सभी माताओं को नमन करते हैं, जिन्होंने हमें बनाया, संवारा और हर कठिन घड़ी में मार्गदर्शन किया। <span style="color: #ff0000">आइए आज उनके त्याग, प्रेम और समर्पण को शब्दों से नहीं, भावनाओं से सराहें। पढ़िए श्रीफल जैन न्यूज की संपादक रेखा संजय जैन का विशेष आलेख&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p>&#8220;जब खुदा को हर जगह नहीं रहना था, तो उसने माँ बना दी।&#8221; यह उक्ति जितनी सरल लगती है, उतनी ही गहरी और व्यापक है। माँ — यह केवल एक शब्द नहीं, बल्कि एक सम्पूर्ण भाव है, एक अनुभव है, एक जीवंत चेतना है जो सृष्टि का आधार बनती है। मातृत्व के इस अद्वितीय रूप को समर्पित मदर्स डे, महज़ एक दिन नहीं, बल्कि माँ के प्रति हमारे कृतज्ञता के भाव को प्रकट करने का एक अवसर है।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>लेकिन क्या माँ को याद करने के लिए सिर्फ एक दिन काफी है? क्या उसका समर्पण, त्याग और तप केवल कुछ शब्दों में समेटा जा सकता है? शायद नहीं, फिर भी हम प्रयास करते हैं — माँ की ममता को शब्दों का स्वरूप देने का। इस लेख में हम इतिहास की उन महान माँओं की चर्चा करेंगे जिन्होंने न केवल अपने पुत्र को जन्म दिया, बल्कि उनके जीवन की दिशा और दर्शन भी तय किए। साथ ही, हम आधुनिक माँओं की बदलती भूमिका और संघर्षों पर भी विचार करेंगे।</p>
<p><strong>इतिहास की महान माताएँ: जिन्होंने इतिहास रचा</strong></p>
<p>1. माँ जीजाबाई (राजमाता जीजाबाई): छत्रपति शिवाजी की प्रेरणा</p>
<p>छत्रपति शिवाजी महाराज की वीरता, कुशल रणनीति और राष्ट्रभक्ति को कौन नहीं जानता। लेकिन उनकी इस असाधारण शक्ति का बीज उनकी माँ राजमाता जीजाबाई ने ही बोया था। जीजाबाई ने न केवल शिवाजी को संस्कार दिए, बल्कि युद्ध नीति, राजनीति और धर्म का पाठ भी पढ़ाया। उन्होंने अपने पुत्र को हिंदवी स्वराज की भावना से सींचा और हर कठिन समय में उसकी ढाल बनकर खड़ी रहीं।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>2. पुत्र मोह की प्रतीक — गंधारी</p>
<p>महाभारत की गंधारी एक ऐसी माँ थीं, जिन्होंने अपने सौ पुत्रों को हर हाल में प्रेम किया, भले ही वे अधर्म के पथ पर चले। उन्होंने अपने जीवन को अंधकारमय बनाकर पतिव्रता धर्म निभाया। गंधारी हमें बताती हैं कि माँ केवल मार्गदर्शक नहीं, एक कठोर नियति को भी आत्मसात करने वाली शक्ति है।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>3. यशोदा: ममता की पराकाष्ठा</p>
<p>यशोदा माँ, जिन्हें भगवान कृष्ण ने अपनी बाललीलाओं से अलौकिक बना दिया, वो बताती हैं कि माँ होने के लिए जन्म देना आवश्यक नहीं होता। यशोदा की ममता, उनका वात्सल्य आज भी हर रिश्ते को परिभाषित करता है।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>4. माँ मदालसा: आत्मज्ञान की मूर्तिमान प्रेरणा</p>
<p>पुराणों में वर्णित मदालसा एक ऐसी माँ थीं, जिन्होंने अपने बच्चों को लोरी के रूप में आत्मज्ञान दिया — &#8220;तू चैतन्य स्वरूप है, तू अमर आत्मा है।&#8221; उन्होंने बच्चों को संसार के मोह से ऊपर उठने की प्रेरणा दी। आज भी वह हर उस माँ की प्रतीक हैं जो अपने बच्चों को सिर्फ सांसारिक नहीं, आत्मिक रूप से भी शक्तिशाली बनाना चाहती है।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p><strong>समय बदला, भूमिका बदली — पर माँ की छवि अमर रही</strong></p>
<p>जैसे-जैसे समय बदला, समाज की संरचना बदली, लेकिन माँ की भूमिका और महत्त्व कम नहीं हुआ। हाँ, अब माँ ऑफिस जाती है, जिम्मेदारियाँ साझा करती है, तकनीक सीखती है, घर और करियर के बीच संतुलन बनाती है, लेकिन फिर भी हर सुबह बच्चों का टिफिन बनाना, होमवर्क देखना और रात को चिंता करना — ये सब उसके मूल में अब भी हैं।</p>
<p><strong>आधुनिक माँ: मल्टीटास्किंग की प्रतिमूर्ति</strong></p>
<p>आज की माँ सीईओ भी है और केयरटेकर भी। वह वर्क फ्रॉम होम करती है और बच्चों के स्कूल में पीटीएम भी अटेंड करती है। वह सामाजिक परिवर्तन की वाहक बन रही है। लेकिन आज की माँ का संघर्ष कुछ और भी है — गिल्ट। ऑफिस में समय देने पर बच्चों की चिंता और घर में रहने पर आत्मनिर्भरता की तलाश — इन दोनों के बीच माँ आज भी त्याग कर रही है, मगर मुस्कराहट के साथ।</p>
<p><strong>सिंगल मदर्स और संघर्ष</strong></p>
<p>आज की दुनिया में लाखों महिलाएं अकेले माँ की भूमिका निभा रही हैं। वे माँ भी हैं, पिता भी। उनका संघर्ष दोहरा है, लेकिन संकल्प अडिग। ऐसी माँएं समाज के लिए मिसाल बनती हैं।</p>
<p><strong>कोरोना काल और माँ</strong></p>
<p>कोविड-19 महामारी ने माँ की भूमिका को और व्यापक कर दिया। जब बच्चे ऑनलाइन पढ़ाई कर रहे थे, तब माँ टीचर बनी। जब कोई हॉस्पिटल में था, माँ नर्स बनी। जब कमाई बंद हो गई, तब माँ ने रसोई में जुगाड़ से चमत्कार किया। महामारी ने माँ की संकट प्रबंधन की क्षमता को दुनिया के सामने उजागर कर दिया।</p>
<p><strong>क्या मदर्स डे मनाना काफी है</strong></p>
<p>हम माँ को एक दिन फूल, कार्ड और सोशल मीडिया पोस्ट से याद करते हैं। लेकिन असल मदर्स डे तो हर वह दिन है, जब हम उनके त्याग को पहचानें। जब हम उनके लिए समय निकालें, जब हम उनकी भावनाओं को समझें।</p>
<p>माँ को समय दो, आदर दो, और उनका सपना पूरा करो — यही सच्चा मदर्स डे है।</p>
<p><strong>समाप्ति नहीं, शुरुआत&#8230;</strong></p>
<p>माँ का कोई पर्याय नहीं। वह न तो बदली जा सकती है, न दोहराई जा सकती है। वह एक जीवित देवता है — जो बिना पूजा के पूज्य है। वह एक भावना है — जो शब्दों से परे है।</p>
<p>आज जब हम मदर्स डे मना रहे हैं, तो आइए एक वचन लें — कि हम माँ को केवल श्रद्धांजलि नहीं देंगे, बल्कि उनके जीवन को सम्मान और प्रेम से भर देंगे।</p>
<p>क्योंकि माँ सिर्फ जननी नहीं, जीवन की पहली पाठशाला है — और शायद आखिरी भी।</p>
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		<title>दिगंबर जैन समाज का विराट व्यक्तित्व ; पंडित जयसेन जैन बाबू जी को विनम्र श्रद्धांजलि </title>
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		<pubDate>Sun, 30 Mar 2025 16:55:32 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[बाबूजी जयसेन जैन के कार्यों का गुणगान करना मेरे लिए छोटा मुंह बड़ी बात होगी, लेकिन मैंने उनके विराट व्यक्तित्व को जितना देखा उसे ही बता रहा हूं। यहां आलेख संपादकीय युगों-युगों तक हमारे तीर्थंकरों भगवान आदिनाथ से महावीर तक की बातों को युवा पीढ़ी तक पहुंचती रहेगी। इंदौर से पढ़िए हरिहर सिंह चौहान की [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>बाबूजी जयसेन जैन के कार्यों का गुणगान करना मेरे लिए छोटा मुंह बड़ी बात होगी, लेकिन मैंने उनके विराट व्यक्तित्व को जितना देखा उसे ही बता रहा हूं। यहां आलेख संपादकीय युगों-युगों तक हमारे तीर्थंकरों भगवान आदिनाथ से महावीर तक की बातों को युवा पीढ़ी तक पहुंचती रहेगी। <span style="color: #ff0000">इंदौर से पढ़िए हरिहर सिंह चौहान की यह प्रस्तुति&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> धर्म और समाज में जब समन्वय एकजुटता के साथ विद्वान ज्ञानी और राष्ट्र भक्त व्यक्ति मिलता है तो उस समाज के लिए गर्व की बात होती है। इंदौर में दिगंबर जैन समाज में एक समय था जब न्याय सूरी पंडित नाथूलाल शास्त्री जैसे और वरिष्ठ विद्यावान गुनी व्यक्ति थे। जिनसे पूरे भारत में इंदौर का समाज उनके नाम से जाना जाता था। उन्हीं पंडित जी के आशीर्वाद और शिक्षा से उसी विरासत संभालने के लिए महावीर ट्रस्ट और देवकुमार सिंह कासलीवाल जैसे समाज रत्न के साथ मिलकर पूरे भारत में दिगंबर जैन समाज के दिव्य और आलोकित रोशनी से दिगंबर जैन समाज का नाम रोशन करने वाले वरिष्ठ कलमकार लेखक विचारक चिंतक वरिष्ठ जैन पत्रकार, वरिष्ठ शिक्षक और दिगंबर जैन समाज के विद्यावान पंडित जयसेन जैन का विराट व्यक्तित्व का चला जाना बहुत दुःखद है। ऐसे तो बाबूजी जयसेन जैन के कार्यों का गुणगान करना मेरे लिए छोटा मुंह बड़ी बात होगी, लेकिन मैंने उनके विराट व्यक्तित्व को जितना देखा उसे ही बता रहा हूं। जब महावीर ट्रस्ट हो या कुंदकुंद ज्ञानपीठ का आफिस जहां देवकुमार सिंह कासलीवाल, अनुपम जैन, प्रदीप कासलीवाल और वीर निंकलक के संपादक रमेश कासलीवाल के साथ पंडित जयसेन बाबूजी का वह सौम्य व्यवहार मैंने देखा है और जब भी वह श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर जबरी बाग़ नसिया जी में आते थे तो पारस प्रभु के अतिशय से रह नहीं पाते थे।</p>
<p><strong>वर्तमान पीढ़ी को उनके व्यक्तित्व से सीख लेनी चाहिए</strong></p>
<p>सभी से बात करना पुराने दिनों के बारे में अपने छोटों को बताना जब सेठ हुकुमचंद के बारे में और पंडित नाथूलाल शास्त्री, धर्मचंद जैन, ताराचंद जैन छात्रावास में संस्कृत महाविद्यालय नसिया में पढ़ते थे। उन दिनों की बात किया करते थे। ऐसे तो छावनी दिगंबर जैन समाज और अनंतनाथ जिनालय को जो ऊंचाईयां बाबूजी ने दी उसे भूला देना संभव नहीं है। बढ़ती उम्र के बाद भी वह भजन आरती व भक्तमार पाठ शांतिधारा में शामिल होते थे। समाज सेवा में आप हमेशा लगे रहे। वर्तमान पीढ़ी को उनके व्यक्तित्व से सीख लेनी चाहिए।</p>
<p><strong>शीतल जल सेवा करते थे</strong></p>
<p>बुजुर्गो को लेकर एक ओल्ड सोशल ग्रुप में पंडित जयसेन जैन बाबू जी भी जुड़े रहे। जब इंदौर रेलवे स्टेशन पर हर साल दिगंबर जैन समाज ओल्ड सोशल ग्रुप के दादा-दादी, नाना-नानी अम्मा यात्रीगण को शीतल जल सेवा करते थे और यह सभी सदस्य तीर्थ यात्रा, प्रभातफेरी, भक्तमार पाठ आदि कार्यक्रम करते रहते थे। पूरे भारत के दिगंबर जैन समाज में पंडित जयसेन जैन की अपनी अलग पहचान थी।</p>
<p><strong>संपादकीय समाज जागरण की मुख्य धरोहर है</strong></p>
<p>संत, आचार्य, मुनि, महाराज, आर्यिका माता जी, दीदी भैय्या जी सभी उनके प्रति विनम्र और उदारता के भाव रखते थे। पंडित जी उनके ज्ञान व धर्म संबंधी गुणों के ज्ञान के वैचारिक मंथन करते रहते थे। यह उनके संपादकीय लेखों में दिखता था। महावीर ट्रस्ट से निकलने वाली मासिक पत्रिका सन्मति वाणी में पंडित जयसेन जैन के संपादकीय समाज जागरण की मुख्य धरोहर है। उनकी क़लम हमेशा सच्चाई का साथ देती थी। उनके काटक्ष समाजिक जिम्मेदारी व धर्म संबंधी लेखों में नए संकल्पों को साकार करती रही। आज बाबूजी जयसेन जैन जी हमारे बीच नहीं है पर उनके यहां आलेख संपादकीय युगों-युगों तक हमारे तीर्थंकरों भगवान आदिनाथ से महावीर तक की बातों को युवा पीढ़ी तक पहुंचती रहेगी। अनेक संतों आचार्य का आशीष उन्हें हमेशा मिलता रहा। वरिष्ठ वयोवृद्ध जैन पत्रकार पंडित जयसेन जैन को नसिया जी दिगंबर जैन समाज इंदौर की और से भावभीनी श्रद्धांजलि व शत शत नमन।</p>
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		<title>दिगंबर जैन समाज का विराट व्यक्तित्व ; पंडित जयसेन जैन बाबू जी को विनम्र श्रद्धांजलि </title>
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<p><strong>बाबूजी जयसेन जैन के कार्यों का गुणगान करना मेरे लिए छोटा मुंह बड़ी बात होगी, लेकिन मैंने उनके विराट व्यक्तित्व को जितना देखा उसे ही बता रहा हूं। यहां आलेख संपादकीय युगों-युगों तक हमारे तीर्थंकरों भगवान आदिनाथ से महावीर तक की बातों को युवा पीढ़ी तक पहुंचती रहेगी। <span style="color: #ff0000">इंदौर से पढ़िए हरिहर सिंह चौहान की यह प्रस्तुति&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर</strong>। धर्म और समाज में जब समन्वय एकजुटता के साथ विद्वान ज्ञानी और राष्ट्र भक्त व्यक्ति मिलता है तो उस समाज के लिए गर्व की बात होती है। इंदौर में दिगंबर जैन समाज में एक समय था जब न्याय सूरी पंडित नाथूलाल शास्त्री जैसे और वरिष्ठ विद्यावान गुनी व्यक्ति थे। जिनसे पूरे भारत में इंदौर का समाज उनके नाम से जाना जाता था। उन्हीं पंडित जी के आशीर्वाद और शिक्षा से उसी विरासत संभालने के लिए महावीर ट्रस्ट और देवकुमार सिंह कासलीवाल जैसे समाज रत्न के साथ मिलकर पूरे भारत में दिगंबर जैन समाज के दिव्य और आलोकित रोशनी से दिगंबर जैन समाज का नाम रोशन करने वाले वरिष्ठ कलमकार लेखक विचारक चिंतक वरिष्ठ जैन पत्रकार, वरिष्ठ शिक्षक और दिगंबर जैन समाज के विद्यावान पंडित जयसेन जैन का विराट व्यक्तित्व का चला जाना बहुत दुःखद है। ऐसे तो बाबूजी जयसेन जैन के कार्यों का गुणगान करना मेरे लिए छोटा मुंह बड़ी बात होगी, लेकिन मैंने उनके विराट व्यक्तित्व को जितना देखा उसे ही बता रहा हूं। जब महावीर ट्रस्ट हो या कुंदकुंद ज्ञानपीठ का आफिस जहां देवकुमार सिंह कासलीवाल, अनुपम जैन, प्रदीप कासलीवाल और वीर निंकलक के संपादक रमेश कासलीवाल के साथ पंडित जयसेन बाबूजी का वह सौम्य व्यवहार मैंने देखा है और जब भी वह श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर जबरी बाग़ नसिया जी में आते थे तो पारस प्रभु के अतिशय से रह नहीं पाते थे।</p>
<p><strong><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-77863" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/03/IMG-20250330-WA0022.jpg" alt="" width="1080" height="1141" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/03/IMG-20250330-WA0022.jpg 1080w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/03/IMG-20250330-WA0022-284x300.jpg 284w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/03/IMG-20250330-WA0022-969x1024.jpg 969w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/03/IMG-20250330-WA0022-768x811.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/03/IMG-20250330-WA0022-990x1046.jpg 990w" sizes="auto, (max-width: 1080px) 100vw, 1080px" />वर्तमान पीढ़ी को उनके व्यक्तित्व से सीख लेनी चाहिए</strong></p>
<p>सभी से बात करना पुराने दिनों के बारे में अपने छोटों को बताना जब सेठ हुकुमचंद के बारे में और पंडित नाथूलाल शास्त्री, धर्मचंद जैन, ताराचंद जैन छात्रावास में संस्कृत महाविद्यालय नसिया में पढ़ते थे। उन दिनों की बात किया करते थे। ऐसे तो छावनी दिगंबर जैन समाज और अनंतनाथ जिनालय को जो ऊंचाईयां बाबूजी ने दी उसे भूला देना संभव नहीं है। बढ़ती उम्र के बाद भी वह भजन आरती व भक्तमार पाठ शांतिधारा में शामिल होते थे। समाज सेवा में आप हमेशा लगे रहे। वर्तमान पीढ़ी को उनके व्यक्तित्व से सीख लेनी चाहिए।</p>
<p><strong>शीतल जल सेवा करते थे</strong></p>
<p>बुजुर्गो को लेकर एक ओल्ड सोशल ग्रुप में पंडित जयसेन जैन बाबू जी भी जुड़े रहे। जब इंदौर रेलवे स्टेशन पर हर साल दिगंबर जैन समाज ओल्ड सोशल ग्रुप के दादा-दादी, नाना-नानी अम्मा यात्रीगण को शीतल जल सेवा करते थे और यह सभी सदस्य तीर्थ यात्रा, प्रभातफेरी, भक्तमार पाठ आदि कार्यक्रम करते रहते थे। पूरे भारत के दिगंबर जैन समाज में पंडित जयसेन जैन की अपनी अलग पहचान थी।</p>
<p><strong>संपादकीय समाज जागरण की मुख्य धरोहर है</strong></p>
<p>संत, आचार्य, मुनि, महाराज, आर्यिका माता जी, दीदी भैय्या जी सभी उनके प्रति विनम्र और उदारता के भाव रखते थे। पंडित जी उनके ज्ञान व धर्म संबंधी गुणों के ज्ञान के वैचारिक मंथन करते रहते थे। यह उनके संपादकीय लेखों में दिखता था। महावीर ट्रस्ट से निकलने वाली मासिक पत्रिका सन्मति वाणी में पंडित जयसेन जैन के संपादकीय समाज जागरण की मुख्य धरोहर है। उनकी क़लम हमेशा सच्चाई का साथ देती थी। उनके काटक्ष समाजिक जिम्मेदारी व धर्म संबंधी लेखों में नए संकल्पों को साकार करती रही। आज बाबूजी जयसेन जैन जी हमारे बीच नहीं है पर उनके यहां आलेख संपादकीय युगों-युगों तक हमारे तीर्थंकरों भगवान आदिनाथ से महावीर तक की बातों को युवा पीढ़ी तक पहुंचती रहेगी। अनेक संतों आचार्य का आशीष उन्हें हमेशा मिलता रहा। वरिष्ठ वयोवृद्ध जैन पत्रकार पंडित जयसेन जैन को नसिया जी दिगंबर जैन समाज इंदौर की और से भावभीनी श्रद्धांजलि व शत शत नमन।</p>
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		<title>Life Management-36 जीवन का प्रबंधन-यत्न पूर्वक चेष्टा करें : मस्तिष्क का विज्ञान-भगवान महावीर की दृष्टि में </title>
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		<pubDate>Sat, 22 Mar 2025 02:30:18 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[डॉ. विनोद शर्मा अपनी पुस्तक मस्तिष्क विज्ञान और पढाई आसान में कहते है-‘हमारे दिमाग का सबसे महत्वपूर्ण काम है सूचनाओ को सही तरीके से एकत्रित करना और जरूरत पड़ने पर पुनः प्राप्त करना। जिसे हम री-कलेक्शन कहते है। इन्फॉर्मेशन को प्राप्त करना कहलाता है। याद करना यानी मेमोराइजेशन, दिमाग मे रखना कहलाता है-रिटेंशन और ‘पुनः [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>डॉ. विनोद शर्मा अपनी पुस्तक मस्तिष्क विज्ञान और पढाई आसान में कहते है-‘हमारे दिमाग का सबसे महत्वपूर्ण काम है सूचनाओ को सही तरीके से एकत्रित करना और जरूरत पड़ने पर पुनः प्राप्त करना। जिसे हम री-कलेक्शन कहते है। इन्फॉर्मेशन को प्राप्त करना कहलाता है। याद करना यानी मेमोराइजेशन, दिमाग मे रखना कहलाता है-रिटेंशन और ‘पुनः प्राप्त करना यानी याद आना कहलाता है री-कलेक्शन। याद तो हम सब कुछ करते है, लेकिन सब कुछ याद आता नही है। क्योकि याद आना निर्भर करता है की दिमाग मे सूचना कहाँ और किस तरह से रखी गयी है। सूचना को अच्छी तरह से सही जगह पर रखने के लिए हमे एसोसिएशन की जरूरत पड़ती है। मुनिश्री प्रणम्य सागरजी महाराज की पुस्तक खोजो मत पाओ व अन्य ग्रंथों के माध्यम से श्रीफल जैन न्यूज Life Management निरंतरता लिए हुए है। <span style="color: #ff0000">पढ़िए इसके 36वें अर्थात अंतिम भाग में श्रीफल जैन न्यूज के रिपोर्टर संजय एम तराणेकर की विशेष रिपोर्ट….</span></strong></p>
<hr />
<p>मस्तिष्क का विज्ञान</p>
<p>मस्तिष्क का विज्ञान यह है कि वह चार भागों में बँटा है। प्रत्येक भाग अलग-अलग कार्य करने में नियुक्त है। पहले हिस्से से तर्क बुद्धि उत्पन्न होती है। किसी भी सुने हुए या पढ़े हुए विषय को यह हिस्सा तर्क के माध्यम से सुनकर उस पर विचार विमर्श करता है। इस हिस्से का यदि सही उपयोग एक ही दिशा में लगातार होता रहे तो व्यक्ति बहुत बुद्धिमान बन जाता है। एक ही विषय में अर्जित ज्ञान को तर्क के माध्यम से और अधिक चिन्तनपरख बनाना इसी हिस्से का काम है। मस्तिष्क का दूसरा हिस्सा योजना बनाता है। विद्यार्थी जब तक पढ़ता है उसके इस हिस्से का उपयोग कम होता है। इस हिस्से का उपयोग तब ही अधिक होता है जब व्यक्ति किसी व्यवसाय या नौकरी के काम में लग जाता है। तीसरे हिस्से का काम चंचल वृत्ति पैदा करना है। चंचलता बढ़ने से पहले और दूसरे हिस्से की कार्य प्रणाली भी प्रभावित होती है। मोबाइल, इंटरनेट पर बैठकर कई घण्टों तक मनोरंजन करने वाले युवा विद्यार्थियों या बच्चों के लिए यह चंचलता बहुत हानिकारक होती है। मस्तिष्क के इस तीसरे हिस्से का अधिक प्रयोग मनोरंजन के साधनों से ही होता है। ये साधन ही काम, वासना, इच्छा, अनैतिक चरित्र की वृत्तियाँ बढ़ाते हैं। अधिक बातचीत इस हिस्से पर बहुत प्रभाव डालती है, जिससे चंचलता और बढ़ती है। चंचलता मन को सुख देती है, ऐसा आदमी को महसूस होता है। इस कारण से वह चंचलवृत्ति को और अधिक बढ़ाता चला जाता है। मस्तिष्क के इस हिस्से के अधिक क्रियाशील होने पर व्यक्ति विवेकशून्य और जिम्मेदारियों के प्रति बे-परवाह हो जाता है। मस्तिष्क का चौथा हिस्सा अन्तर्ज्ञान से सम्बन्धित है। अन्तर्ज्ञान उसे आध्यात्मिक बना देता है। प्रज्ञा का जागरण अन्तर्ज्ञान से ही होता है। इस हिस्से की क्रियाशीलता से आध्यात्मिक झुकाव बढ़ने लगता है। सुख और शान्ति का संचार होने लगता है। व्यक्ति अपने में सन्तुष्ट होता है।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>इसलिए भगवान् महावीर ने प्रयत्नपूर्वक बोलने पर जोर डाला है। यत्न शब्द बहुअर्थीय है। इस यत्न शब्द से ही यह अर्थ ध्वनित होता है कि बोलने में जब यत्न लगता है तो व्यक्ति को कष्ट महसूस होगा। बोलने में कष्ट हो, फिर भी बोलना पड़े तो वह सही बोलना है।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>भगवान् वर्द्धमान महावीर के इन छह सूत्रों को अपने जीवन में अपनाने वाला निश्चित ही एक दिन महावीर बन सकता है। व्याख्यान का कोई अन्त नहीं होता है किन्तु बुद्धिमान के लिए संकेत मात्र ही पर्याप्त होता है। यह लघु कृति समस्त प्राणियों की जीवन शैली को अहिंसक बना देने में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करेगी, ऐसा मेरा विश्वास है।</p>
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		<title>Life Management-35 जीवन का प्रबंधन-यत्न पूर्वक चेष्टा करें : पहले तोलो, फिर बोलो-भगवान महावीर की दृष्टि में </title>
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		<pubDate>Fri, 21 Mar 2025 02:30:47 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[शब्दों का प्रयोग करने से पहले उसे मन के तराजू में तोल लेना चाहिए। यदि वह शब्द आपको अच्छे लगते हैं तभी वह दूसरों को प्रभावित कर पाएंगे, यदि आपको वह शब्द कड़वे लगते हैं तब वह शब्द दूसरों को भी उतने ही बुरे लगेंगे। ‘ऐसी वाणी बोलिए मन का आपा खोये। औरन को शीतल [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>शब्दों का प्रयोग करने से पहले उसे मन के तराजू में तोल लेना चाहिए। यदि वह शब्द आपको अच्छे लगते हैं तभी वह दूसरों को प्रभावित कर पाएंगे, यदि आपको वह शब्द कड़वे लगते हैं तब वह शब्द दूसरों को भी उतने ही बुरे लगेंगे। ‘ऐसी वाणी बोलिए मन का आपा खोये। औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होए।‘ संत कबीरदासजी का मत है कि यदि वाणी में शीतलता हो तब वह सुनने वाले को प्रभावित करती है यह न केवल स्वयं को सुख पहुंचाती है अपितु दूसरों को भी सुख प्रदान करती है। मुनिश्री प्रणम्य सागरजी महाराज की पुस्तक खोजो मत पाओ व अन्य ग्रंथों के माध्यम से श्रीफल जैन न्यूज Life Management निरंतरता लिए हुए है। <span style="color: #ff0000">पढ़िए इसके 35वें भाग में श्रीफल जैन न्यूज के रिपोर्टर संजय एम तराणेकर की विशेष रिपोर्ट….</span></strong></p>
<hr />
<p>पहले तोलो, फिर बोलो</p>
<p>भगवान् महावीर बचपन से ही हित-मित-प्रिय वचनों को बोलते थे। केवल सच बोलना ही पर्याप्त नहीं है किन्तु सच के साथ वचनों में प्रियता भी हो। प्रियता से भी बढ़कर शर्त यह है कि वह हितकर हो। जिन वचनों में प्राणी का हित नहीं है वह वचन सच होकर भी झूठ हैं। हित से तात्पर्य उस प्राणी की रक्षा से है।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>एक बार एक शिकारी गाय के पीछे दौड़ रहा था। एक चौराहे से वह गाय गुजरी। वहीं एक साधु खड़ा था। साधु के पास थोड़ी देर में वह शिकारी आया। साधु को गाय के जाने की दिशा ज्ञात थी। उन्होंने तत्काल अपना मुख मोड़ लिया और दिशा बदल ली। शिकारी ने पूछा क्या इस दिशा में गाय को जाते देखा है ? साधु ने कहा जब से मैं इस ओर खड़ा हूँ तब से अभी तक यहाँ से कोई नहीं गुजरा है। साधु की बात सुनकर शिकारी लौट गया। गाय की जान बच गई। जीव रक्षा हेतु साधु के ये वचन छल नहीं किन्तु उनका विवेक है। भगवान् महावीर ने कहा कि &#8211;</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>ऐसा सत्य भी मत बोलो जो किसी को विपत्ति में डाल दे। अहिंसा की रक्षा के लिए ही वचन प्रयोग करना चाहिए।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>इसी तरह एक शिकारी अपने हाथ में चिड़िया बन्द किये पूछता है कि बताओ मेरे हाथ में बंद चिड़िया मृत है या जीवित ? यदि आपने कहा कि जीवित है तो वह मारकर आपकी बात गलत सिद्ध कर देगा। ऐसी स्थिति में आपका कर्तव्य है कि आप कह दें कि वह चिड़िया मृत है, तो वह उसे उड़ा कर दिखा देगा, चिड़िया के प्राण बच जायेंगे। इसीलिए भगवान् महावीर ने कहा कि यत्न पूर्वक बोलो अर्थात् सोच समझकर बोलो। इसलिए कहा है कि-‘पहले तोलो फिर बोलो।‘</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>आज बोलने की प्रवृत्ति बहुत बढ़ गयी है। इसका मुख्य कारण मोबाइल जैसे उपकरणों का अति प्रयोग है। पहले जब फोन का प्रचलन प्रारम्भ हुआ था तो बात करने का बहुत पैसा लगता था। लोग पैसा खर्च होने के भय से सीमित और आवश्यक बात करते थे। आजकल प्राइवेट कंपनियों की प्रतिस्पर्धा में मोबाइल फोन पर बात करना बहुत सस्ता हो गया है। बच्चों से लेकर बड़ों तक यह प्रवृत्ति इतनी अधिक बढ़ गयी है कि घंटों तक दूर के संबंधियों से, मित्रों से, रिश्तेदारों से और परिजनों से लोग बातचीत करते रहते हैं। इस बातचीत से आदमी वाचाल हो जाता है। इसी कारण से अनचाहे सम्बन्ध बनते हैं और अपराधिक प्रवृत्तियाँ बढ़ती हैं। अनेक दुर्गुणों का प्रवेश इस मोबाइल फोन पर घण्टों बातचीत करने से हो रहा है। अधिक बोलने का एक आधुनिक दुष्परिणाम क्या हो सकता है। इस पर नजर डालें-‘आज जब युवक-युवती की शादी तय होती है तो मोबाइल की सस्ती दरें उनके बीच इतनी अधिक बात करने का जरिया बन जाती हैं कि वे एक दिन में चार-चार घंटे लुभावनी बातें करते हैं, शादी होने के बाद वो हकीकत साकार नहीं हो पाती। जैसी उन्होंने फोन पर घंटों डिसकस की थीं फलस्वरूप उनका वैवाहिक जीवन कलहपूर्ण बन जाता है।‘ विद्यार्थियों का दिमाग पढ़ने से डिस्टर्ब ऐसी ही बातचीत के कारण होता है। बोलना कम होगा तो विद्यार्थी को अपने कोर्स का पाठ याद रहेगा। जब अधिक बात करने से बहुत समय निःसार व्यतीत हो जाता है तो मस्तिष्क में स्मृति पर प्रभाव पड़ता है। विद्यार्थी के लिए स्मृति अप्रभावित होनी चाहिए। जो अपना विषय नहीं है उस विषयों में अधिक समय लगाने से मस्तिष्क में से मूल विषय विस्मृत हो जाता है। मस्तिष्क की कार्यक्षमता प्रभावित होती है।</p>
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