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	<title>आर्यिका सिद्ध श्री माताजी ससंघ &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<title>आर्यिका सिद्ध श्री माताजी ससंघ &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>पुतले जलाने के बजाय पापों का त्याग करें तो दुनिया स्वर्ग बनेगी: आर्यिका श्री सिद्धश्री माताजी ने स्मृतिनगर में मुनिश्री सुव्रतनाथ भगवान के दर्शन कर मंगल देशना दी  </title>
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		<pubDate>Fri, 03 Oct 2025 12:45:33 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[हजारों वर्ष से हम रावण का पुतला जला रहे हैं और रावण के किए पापों को पाले हुए हैं। यह बात आर्यिका सिद्ध श्री माताजी ने कही। वहीं मुनिश्री शुद्धोपयोग सागर जी ने कहा कि किसी के गुणों को जानने के लिए उनसे मिलने, संबंध बनाने अथवा निकट जाने की जरूरत नहीं उनका साहित्य पढ़ [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>हजारों वर्ष से हम रावण का पुतला जला रहे हैं और रावण के किए पापों को पाले हुए हैं। यह बात आर्यिका सिद्ध श्री माताजी ने कही। वहीं मुनिश्री शुद्धोपयोग सागर जी ने कहा कि किसी के गुणों को जानने के लिए उनसे मिलने, संबंध बनाने अथवा निकट जाने की जरूरत नहीं उनका साहित्य पढ़ लो बस। स्मृतिनगर में भक्तों ने अभिषेक और शांतिधारा कर आराधना की। <span style="color: #ff0000">इंदौर से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> रावण बुरा नहीं था, रावण ने जो पाप किए वह बुरे थे, परन्तु हजारों वर्ष से आज तक हम रावण का पुतला जला रहे हैं और रावण के पापों को पालतू कुत्ते की तरह पाले हुए हैं।वाह रे मानव वाह। जरा सोचिए रावण के पुतले को जलाने के बजाय यदि हम उसके द्वारा किए गए पाप को अपने आप से विसर्जित कर दें तो यह दुनिया स्वर्ग बन जाएगी। यह विचार आर्यिका श्री सिद्धश्री माताजी ने अपने अल्प प्रवास के दौरान स्मृति नगर जैन मंदिर में प्रवचन के दौरान व्यक्त किए। वे यहां समर्थ सिटी से पंचबालयति मंदिर विजय नगर दीक्षा कार्यक्रम में शामिल होने जा रही थीं। रास्ते में मुनि संघ के दर्शनार्थ श्री मुनिसुव्रतनाथ नाथ जिनालय स्मृति नगर पहुंची थीं। साथ में आर्यिका संघ श्री माताजी एवं सभाश्री माताजी भी विहाररत हैं। आर्यिका संघ द्वारा मुनि संघ के दर्शन किए।</p>
<p><strong>गुरु के प्रति समर्पण ही शिष्य को प्रसिद्धि दिलाता है</strong></p>
<p>इस अवसर पर मुनि श्री शुद्धोपयोग सागर जी महाराज ने आचार्य श्री विद्यासागर जी महामुनि राज की हस्तलिखित अनुपम काव्य संग्रह ‘डुबो मत लगाओ डुबकी’ पर प्रतिदिन चलने वाली प्रवचन श्रृंखला के दौरान प्रवचन करते हुए कहा कि किसी महापुरुष के गुणों को जानने के लिए उनसे मिलने, संबंध बनाने अथवा निकट जाने की जरूरत नहीं उनका साहित्य पढ़ लो बस। उनके असीम गुणों का दर्शन उनके द्वारा लिखे गए साहित्य में हो जाते हैं। एक शिष्य का अपने गुरु के प्रति जो समर्पण होता है वह समर्पण ही शिष्य को प्रसिद्धि दिलाया करता है। आचार्य श्री विद्यासागर जी की प्रसिद्धि भी उनके बड़े-बड़े शिष्य मुनिश्री समय सागर जी, मुनिश्री सुधा सागर जी, मुनिश्री प्रमाण सागर जी, मुनिश्री समता सागर जी आदि के कारण नहीं हुई बल्कि उनके द्वारा अपने गुरु श्री ज्ञानसागर जी महाराज की अंतिम समय में की गई निःस्वार्थ अनुपम सेवा का सुफल है कि आज विश्व प्रसिद्ध हो गए। उन्हें हम आज संत शिरोमणि युगाचार्य और जगतगुरु के नाम जानते हैं। भले ही भौतिक रूप में वे आज हमारे बीच उपस्थित नहीं हैं परन्तु उनका यह साहित्य आज भी हमें उनके संयम पथ और उनकी अद्भुत साधना की अनुभूति करवा रहा है।</p>
<p><strong>भक्तों ने अभिषेक शांतिधारा का लिया लाभ </strong></p>
<p>वर्द्धमानपुर शोध संस्थान के ओम पाटोदी एवं समाज अध्यक्ष शैलेष चंदेरिया ने बताया कि प्रारंभ में भक्तजनों ने श्री जी के अभिषेक, शांतिधारा आदि का लाभ लिया। समर्थ सिटी से आए श्री पार्श्वनाथ भक्त मंडल द्वारा भी प्रभु भक्ति और प्रवचन का लाभ प्राप्त किया गया। दोपहर चार बजे आर्यिका संघ का विहार समोशरण जैन मंदिर के लिए हुआ था। रात्रि विश्राम के बाद शनिवार को प्रातः उनका विहार मंगल सिटी के लिए होगा। रविवार को आचार्य श्री विनम्र सागर जी महाराज के सानिध्य में दो भव्य मुनि दीक्षा होगी।</p>
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		<title>यात्रा कैसी भी हो यदि आधी पार हो जाए तो फिर वापस लौट पाना संभव नहीं: इष्टोपदेश के रचयिता जैनाचार्य पूज्यपाद स्वामी विलक्षण प्रतिभा के थे धनी  </title>
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		<pubDate>Thu, 31 Jul 2025 13:29:09 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[नरक गति और तिर्यंच गति के भयंकर दुःखों को सहन करके हमने मनुष्य गति तक का आधे से ज्यादा रास्ता पार कर लिया है। अब इस जगह से पुनः नीचे की गतियां नहीं प्राप्त करना है तो हमें हर पल सजगता के साथ अपने अंतिम लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति के लिए प्रयत्न करना चाहिए। यह [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>नरक गति और तिर्यंच गति के भयंकर दुःखों को सहन करके हमने मनुष्य गति तक का आधे से ज्यादा रास्ता पार कर लिया है। अब इस जगह से पुनः नीचे की गतियां नहीं प्राप्त करना है तो हमें हर पल सजगता के साथ अपने अंतिम लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति के लिए प्रयत्न करना चाहिए। यह विचार समर्थ सिटी में आर्यिका मां सिद्ध श्री माताजी की संघस्थ आर्यिका मां सभा श्री माताजी ने अपने इष्टोपदेश ग्रंथ के स्वाध्याय के दौरान व्यक्त किए। <span style="color: #ff0000">इंदौर से पढ़िए, ओम पाटोदी की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> नरक गति और तिर्यंच गति के भयंकर दुःखों को सहन करके हमने मनुष्य गति तक का आधे से ज्यादा रास्ता पार कर लिया है। अब तो बस संयम नियम धर्म करके देवगति ओर मोक्ष की मंजिल पाना शेष रहा है। अब इस जगह से पुनः नीचे की गतियां नहीं प्राप्त करना है तो हमें हर पल सजगता के साथ अपने अंतिम लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति के लिए प्रयत्न करना चाहिए। यह विचार समर्थ सिटी में आर्यिका मां सिद्ध श्री माताजी की संघस्थ आर्यिका मां सभा श्री माताजी ने अपने इष्टोपदेश ग्रंथ के स्वाध्याय के दौरान व्यक्त किए। आर्यिका माताजी ने इष्टोपदेश ग्रंथ के बारे में बताया कि इस अध्यात्म ग्रंथ में इष्ट आत्मा के स्वरूप का परिचय प्रस्तुत किया है।</p>
<p>51 श्लोकों में पूज्यपाद स्वामी ने अध्यात्म को गागर में सागर भर देने की कहावत चरितार्थ की है। ईसा की छठवीं शताब्दी में रचित इस ग्रंथ में संसार की यथार्थ स्थिति का परिज्ञान प्राप्त होने से राग-द्वेष, मोह की परिणति घटती है। इस लघुकाय ग्रंथ में समयसार की गाथाओं का सार अंकित किया गया है। शैली सरल और प्रवाहमय है। पूज्यपाद स्वामी के बारे में वर्द्धमानपुर शोध संस्थान के ओम पाटोदी ने बताया कि पूज्यपाद स्वामी का समय 510 ई. से 600 ई. तक का माना जाता है। माता-पिता माधव भट्ट और श्रीदेवी थे। घर का नाम देवनंदी था। वे एक ब्राह्मण परिवार से थे। एक घटना ने उनके जीवन में वैराग्य की उत्पत्ति कर दी और वे एक दिगंबर जैन मुनि के रूप में दीक्षित हो गए। वे एक योगी, रहस्यवादी, कवि, विद्वान, लेखक और कई विधाओं में पारंगत थे।</p>
<p>यही वजह रही होगी कि स्वर्ग से देवता उनके चरण पाद की पूजा करने आते थे इसलिए उन्हें पूज्यपाद की उपाधि दी गई। वे आचार्य कुंदकुंद और आचार्य समंतभद्र जैसे अपने पूर्ववर्तियों के लेखन से काफी प्रभावित थे। उन्हें जैन साहित्य के शुरुआती महान् आचार्य के रूप में जाता जाता है। वे नंदी संघ के आचार्य थे, जो आचार्य कुंदकुंद के वंश पट्टपरंपरा से थे।</p>
<p><strong>सभी ग्रंथों पर विशेष शोध कार्य किया जाए</strong></p>
<p>पाटोदी ने बताया कि यह संभव है कि वे पहले जैन संत थे जिन्होंने न केवल धर्म पर, बल्कि आयुर्वेद और संस्कृत व्याकरण जैसे गैर-धार्मिक विषयों पर भी लिखा। वे एक व्याकरणाचार्य होकर संस्कृत काव्यशास्त्र और आयुर्वेद के भी ज्ञाता थे। उन्होंने न केवल आयुर्वेद साहित्य, बल्कि आध्यात्मिक, भाषा विज्ञान, दार्शनिक, ज्योतिष, पशु चिकित्सा आदि से संबंधित साहित्य भी लिखा। अतीत में उनके साहित्यिक कार्यों की जाँच-पड़ताल या अन्वेषण के लिए बहुत कम प्रयास किए गए हैं। आचार्य पूज्यपाद के सभी विद्यमान आयुर्वेद साहित्य की पहचान करना एक महत्वपूर्ण कार्य है। यदि उनके साहित्य पर शोध किया जाए तो प्राचीन भारत की कई महत्वपूर्ण जानकारियां सामने आ सकती है। जरूरत है तो बस प्राचीन जैन आचार्य के साहित्य पर शोध कार्य करने की क्योंकि, जैन आचार्य आध्यात्मिक रूप से तो दृढ़ संकल्प होते ही थे परंतु, उनका असीमित ज्ञान जो उन्हें तप और ध्यान से प्राप्त होता था जो ब्रम्हांड और मानव जीवन के कल्याण के लिए महत्वपूर्ण होता था।</p>
<p>अतः उस ज्ञान को सिर्फ अपने तक ही सिमीत न रखते हुए वे सभी अद्भुत अकल्पनीय और अविस्मरणीय जानकारियां लोक कल्याण की भावनाओं के साथ अपने लेखन में लेकर ग्रंथों में सूक्तियों, सूत्रांे एवं प्राकृत गाथाओं के माध्यम से लिपिबद्ध करके हम तक पहुंचाई। हमारा प्रयास होना चाहिए उन सभी ग्रंथों पर विशेष शोध कार्य किया जाए।</p>
<p><strong>आचार्य पूज्यपाद की कुल 23 पांडुलिपियां पाई गईं</strong></p>
<p>प्राप्त जानकारी के अनुसार पूरे भारत में आचार्य पूज्यपाद की कुल 23 पांडुलिपियां पाई गईं। इनमें से अधिकांश कन्नड़ में थीं और कर्नाटक के विभिन्न पुस्तकालयों, विशेष रूप से श्री मंजुनाथेश्वर सांस्कृतिक एवं अनुसंधान प्रतिष्ठान, धर्मस्थल में संरक्षित थीं। ये पांडुलिपियां रसशास्त्र, नाड़ी, कायचिकित्सा, शालक्य और कौमारभृत्य की विशिष्टताओं से संबंधित थीं। इस गहन खोज से भारत भर में पांडुलिपियों के रूप में जो 23 चिकित्सा साहित्य कृतियों के अस्तित्व का पता चला। 23 पांडुलिपियों में से, 15 ताड़पत्र, 3 कागज़, 10 कन्नड़, 6 अन्य भाषा, 12 पूर्ण, 4 अपूर्ण, 1 रसशास्त्र, 2 नाड़ी, 19 कायचिकित्सा, 4 शालक्य, 2 कौमार भृत्य पाए गए। सत्रह कर्नाटक में और 8 कर्नाटक के बाहर उपलब्ध थे। उनकी अधिकांश रचनाएं श्री मंजुनाथेश्वर सांस्कृतिक एवं अनुसंधान प्रतिष्ठान, धर्मस्थल, कर्नाटक में संरक्षित हैं।</p>
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		<title>मन का दुरुपयोग न करें अच्छा सोचें, अच्छा बोले अच्छे कार्य करें: आर्यिका सिद्ध श्री माताजी के प्रवचन में मन की गति का रहस्य  </title>
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		<pubDate>Wed, 23 Jul 2025 14:50:27 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[84 लाख योनियों में सर्वश्रेष्ठ मानव पर्याय प्राप्त हुई है और सबसे बड़ी बात की मन मिला है। पंडित दौलत राम जी अपने छहढाला ग्रंथ में कहते हैं कि मन हर प्राणी के पास नहीं होता है, सिर्फ सेनी पंचेन्द्री जीव और मनुष्य के पास ही मन की शक्ति होती है। सर्वज्ञ देव की दिव्य [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>84 लाख योनियों में सर्वश्रेष्ठ मानव पर्याय प्राप्त हुई है और सबसे बड़ी बात की मन मिला है। पंडित दौलत राम जी अपने छहढाला ग्रंथ में कहते हैं कि मन हर प्राणी के पास नहीं होता है, सिर्फ सेनी पंचेन्द्री जीव और मनुष्य के पास ही मन की शक्ति होती है। सर्वज्ञ देव की दिव्य ध्वनि के माध्यम से जो श्रुत ज्ञान जैनाचार्यों ने प्राप्त किया। यह प्रबोधन आर्यिका सिद्ध श्री माताजी ने दिया। <span style="color: #ff0000">इंदौर से पढ़िए, ओम पाटोदी की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> 84 लाख योनियों में सर्वश्रेष्ठ मानव पर्याय प्राप्त हुई है और सबसे बड़ी बात की मन मिला है। पंडित दौलत राम जी अपने छहढाला ग्रंथ में कहते हैं कि मन हर प्राणी के पास नहीं होता है, सिर्फ सेनी पंचेन्द्री जीव और मनुष्य के पास ही मन की शक्ति होती है। सर्वज्ञ देव की दिव्य ध्वनि के माध्यम से जो श्रुत ज्ञान जैनाचार्यों ने प्राप्त किया उसके अनुसार मनुष्य गति में मन के माध्यम से सोचने समझने की योग्यता प्राप्त हुई है और उसके अनुसार कार्य करने का बल भी मिला हैं। अतः हमें मन का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए। जोड़ने को तीन लोक और छोड़ने को तीन चीजें। यह बातें श्री पारसनाथ दिगंबर जैन मंदिर समर्थ सिटी में आर्यिका मां सिद्ध श्री माताजी ने अपने प्रवचन में कहीं।</p>
<p>उन्होंने कहा कि जोड़ने को तो हमारे पास पूरे तीन लोक की धन संपदा और द्रव्य सामग्री है, जिसे प्राप्त करने के बाद भी शायद हमारा मन संतुष्ट नहीं हो पायेगा और पाने की लालसा बनी रहेगी परंतु, मानव के पास छोड़ने की मात्रा तीन वस्तु ही है राग, द्वेष और मोह। यदि हमने मात्र इन तीन चीजों को छोड़कर धैर्य धारण करके मन की पवित्रता को बनाते हुए अपने चंचल मन को अच्छे कार्यों में प्रवृत्त कर दिया तो हमारा मानव जीवन लेना सफल हो जाएगा अन्यथा हमें पुनः 84 लाख योनियों में भयंकर दुःख सहने के लिए जाना ही पड़ेगा।</p>
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		<title>मोह रूपी नशे का त्याग जरूरी जल्द नहीं उतरता: आर्यिका सिद्ध श्री माताजी ने छहढाला ग्रंथ के सारत्व बताए  </title>
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		<pubDate>Wed, 23 Jul 2025 07:10:02 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आर्यिका सिद्ध श्री माताजी इंदौर में विराजित होकर धर्म प्रभावना की ऐसी धारा प्रवाहित कर रही हैं। जिसमें सभी भक्तजन गोते लगा रहे हैं। उन्होंने छहढाला की चर्चा करते हुए इंद्रीय सुख और दुख का विश्लेषण करते हुए मोह त्यागने पर जोर दिया। इंदौर से पढ़िए, ओम पाटोदी की यह खबर&#8230; इंदौर। संसार के सब [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आर्यिका सिद्ध श्री माताजी इंदौर में विराजित होकर धर्म प्रभावना की ऐसी धारा प्रवाहित कर रही हैं। जिसमें सभी भक्तजन गोते लगा रहे हैं। उन्होंने छहढाला की चर्चा करते हुए इंद्रीय सुख और दुख का विश्लेषण करते हुए मोह त्यागने पर जोर दिया। <span style="color: #ff0000">इंदौर से पढ़िए, ओम पाटोदी की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>इंदौर।</strong> संसार के सब जीव सुख को चाहते हैं और दुख से हमेशा भयाक्रांत रहते हैं परंतु, दुख के कारण को समझने का प्रयास नहीं करते। पंडित दौलत राम अपने छहढाला ग्रंथ के प्रारंभ में कर रहे हैं। यदि मनुष्य को अपना कल्याण करना है तो हमारे गुरु (अरिहंत भगवान) ने जो शिक्षा प्रदान की है, उसे एकाग्रचित होकर सुनो और उस पर अनुसरण करना चाहिए। माताजी ने आगे कहा कि पंडित जी बता रहे हैं कि जो मनुष्य पर्याय हमें प्राप्त हुई है, यह अत्यंत ही दुर्लभ है। जिस प्रकार की एक चिंतामणि रत्न को प्राप्त करना महा दुर्लभ होता है। इस जीव ने निगोद से लेकर एक इंद्री, दो इंद्री, तीन इंद्री, चार इंद्री, पांच इंद्री आदि शरीर को धारण किया है और बहुत दुख सहे हैं। हमारी यात्रा निगोदिया जीव से प्रारंभ होती है। जहां इस जीव को एक सांस लेने में जितना समय लगता है, उस समय में जन्म और मरण को प्राप्त करने का महा दुख सह कर हम पुण्य योग से पेड़ पौधे बने, फिर लट इल्ली, कैचूआ बने कुछ संयोग पाकर चिंटी, मकोड़े, खटमल आदि शरीर को धारण किया। फिर मक्खी, भौंरा, पतंगा आदि असैनी पंचेंद्री जीव भी बने और असहाय होकर अन्य जीवों द्वारा सताए गए, मारे गए बहुत ही पुण्य के आश्रय से मनुष्य भव प्राप्त हुआ है।</p>
<p>उसमें भी उच्च कुल जिनेंद्र भगवान की वाणी सुनने का, उसके समझने का अवसर प्राप्त हुआ है। यदि फिर भी हम लोग ने इसका सदुपयोग नहीं किया तो जिस प्रकार अनंत काल से हम भयंकर दुःख भोगते हुए आएं हैं। पुनः उन दुःखांे को भोगने के लिए तैयार हो जाना पड़ेगा। माताजी ने आगे कहा कि उक्त सभी दुःख से छुटने का एक ही उपाय है कि हमनें जो मोह रूपी मदिरा की आदत डाल रखी है, उसे छोड़ना होगा, क्योंकि शराब का नशा तो दो चार घंटे में या ज्यादा से ज्यादा एक दिन में उतर जाता है परन्तु, मोह रुपी मदिरा का नशा इतना तेज नशा है कि उतरने कि नाम ही नहीं लेता है। इस नरभव रूपी पर्याय में आपको यह सुनहरा अवसर प्राप्त हुआ है। अतः इसका सदुपयोग करें।</p>
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		<title>छह ढाला में आचार्य कुंदकुंद स्वामी के ग्रंथों का सार : आर्यिका सिद्ध श्री माताजी जी ने पंडित दौलतराम जी का किया गुणानुवाद  </title>
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		<pubDate>Fri, 18 Jul 2025 10:03:43 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[पंडित दौलत राम जिनशासन के उच्च कोटि के विद्वान हुए हैं। जिन्होंने अपनी रचनाओं में आध्यात्म का सागर भर दिया है। यही वजह है कि जैन समाज के प्राचीन कवियों में कविवर पंडित दौलतराम का नाम बहुत सम्मान एवं आदर से लिया जाता है। इंदौर से पढ़िए, ओम पाटोदी की यह खबर&#8230; इंदौर। पंडित दौलत [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>पंडित दौलत राम जिनशासन के उच्च कोटि के विद्वान हुए हैं। जिन्होंने अपनी रचनाओं में आध्यात्म का सागर भर दिया है। यही वजह है कि जैन समाज के प्राचीन कवियों में कविवर पंडित दौलतराम का नाम बहुत सम्मान एवं आदर से लिया जाता है। <span style="color: #ff0000">इंदौर से पढ़िए, ओम पाटोदी की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>इंदौर।</strong> पंडित दौलत राम जिनशासन के उच्च कोटि के विद्वान हुए हैं। जिन्होंने अपनी रचनाओं में आध्यात्म का सागर भर दिया है। यही वजह है कि जैन समाज के प्राचीन कवियों में कविवर पंडित दौलतराम का नाम बहुत सम्मान एवं आदर से लिया जाता है। उनकी प्रसिद्ध कृति छह ढाला आध्यात्मिक दृष्टि से एक बहुत ही महत्वपूर्ण रचना है। जो संसारी जीवों की चतुरगति के परिभ्रमण के कारण और निदान की वास्तविक जानकारी को प्रस्तुत करती है। यह विचार जिनवाणी पुत्री आर्यिका सिद्ध श्री माताजी ने अपनी छहढाला स्वाध्याय की कक्षा में प्रवचन के माध्यम से व्यक्त किए।</p>
<p><strong>वीतराग विज्ञानता अर्थात् रागद्वेष रहित ज्ञान</strong></p>
<p>आर्यिका श्री ने बताया कि पंडितजी अपने मंगलाचरण में लिखते हैं कि तीन भुवन में सार, वीतराग विज्ञानता। शिव स्वरूप शिवकार, नमहुं त्रियोग सम्हारिवैं।। इन पंक्तियों का अर्थ बताते हुए आर्यिका माताजी ने कहा कि त्रिभुवन अर्थात् तीन लोकों में जो सार भूत और सर्वाेत्तम वस्तु है, वह है वीतराग विज्ञानता अर्थात् रागद्वेष रहित ज्ञान अर्थात केवल ज्ञान। यही केवल ज्ञान आनंद स्वरूप है, अनंत सुख को देने वाला है और संसारी बंधनों से मुक्त कराने वाला है। मतलब मोक्ष रूपी अवस्था को प्राप्त करवाने वाला है। अतःमैं मन-वचन-काय को संभालकर उस केवल ज्ञान रूपी स्वरूप, वीतराग अवस्था अर्थात अरिहंत सिद्ध भगवान को नमस्कार करता हूं। अंत में मां सिद्धश्री ने कहा कि इस संसार में जन्म मरण के दुष्चक्र से निकलने के लिए एक मात्र वीतराग देव की शरण है, उनकी स्तुति हर प्राणी के लिए कल्याणकारी है।</p>
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		<title>आर्यिका संघ के मंगल प्रवेश में सादगी भी और धार्मिक उल्लास भी : शोभायात्रा के साथ आर्यिका संघ का पदार्पण समर्थ सिटी में </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 12 Jul 2025 12:55:24 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[समाचार]]></category>
		<category><![CDATA[Aryika Siddha Shri Mataji Sangh]]></category>
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					<description><![CDATA[शनिवार सुबह गोम्मटगिरि तलहटी मंदिर से भव्य शोभायात्रा के साथ आर्यिका सिद्ध श्री माताजी ससंघ का पदार्पण समर्थ सिटी में हुआ। चल समारोह में श्री पार्श्व दिव्य घोष के युवा मंडल का जोश देखते ही बनता था। महिला मंडल मंगल कलश के साथ और पुरुष वर्ग हाथों में जैन ध्वज लेकर भक्ति में झूम रहे [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>शनिवार सुबह गोम्मटगिरि तलहटी मंदिर से भव्य शोभायात्रा के साथ आर्यिका सिद्ध श्री माताजी ससंघ का पदार्पण समर्थ सिटी में हुआ। चल समारोह में श्री पार्श्व दिव्य घोष के युवा मंडल का जोश देखते ही बनता था। महिला मंडल मंगल कलश के साथ और पुरुष वर्ग हाथों में जैन ध्वज लेकर भक्ति में झूम रहे थे। वहीं बालिका मंडल और बहु मंडल द्वारा बहुत ही सुंदर नृत्य द्वारा आर्यिका माताजी के संघ की अगवानी की। <span style="color: #ff0000">इंदौर से पढ़िए, ओम पाटोदी की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>इंदौर</strong>। चार माह का चातुर्मास आपके जीवन को एक नया मोड़ प्रदान करने कि अवसर लेकर आया है। बाहर पानी बरसेगा और यहां आपके अंतर्मन में आध्यात्म की बरसात होगी। आप जितना समय हमको देंगे हम आपको सिखाने का प्रयत्न करेंगे। चातुर्मास भक्ति में डूबने जाने का अवसर है। आपकी भक्ति ही एक दिन आपको भगवान बनाने वाली है। यह बातें श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर समर्थ सिटी में चातुर्मास के लिए पधारी आर्यिका सिद्ध श्री माताजी ने अपने मंगल प्रवेश के दौरान धर्मसभा में कहीं। उन्होंने आगे कहा कि चातुर्मास हम सभी त्यागी वृतियों के लिए अहिंसा महाव्रत, इरिया समिति के निर्दाेष पालन करने के लिए महत्त्वपूर्ण अवसर होता है। सुबह गोम्मटगिरि तलहटी मंदिर से भव्य शोभायात्रा के साथ आर्यिका संघ का पदार्पण समर्थ सिटी में हुआ। चल समारोह में श्री पार्श्व दिव्य घोष के युवा मंडल का जोश देखते ही बनता था। महिला मंडल मंगल कलश के साथ और पुरुष वर्ग हाथों में जैन ध्वज लेकर भक्ति में झूम रहे थे।</p>
<p><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-84974" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/07/IMG-20250712-WA0019.jpg" alt="" width="1080" height="1440" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/07/IMG-20250712-WA0019.jpg 1080w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/07/IMG-20250712-WA0019-225x300.jpg 225w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/07/IMG-20250712-WA0019-768x1024.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/07/IMG-20250712-WA0019-990x1320.jpg 990w" sizes="(max-width: 1080px) 100vw, 1080px" />वहीं बालिका मंडल और बहु मंडल द्वारा बहुत ही सुंदर नृत्य द्वारा आर्यिका माताजी के संघ की आगवानी की। कार्यक्रम की शुरुआत में शैलेश चंदेरिया ने समाज जनों के साथ संघ को श्रीफल भेंट किया। शैलेंद्र चंदेरिया, रिचा चंदेरिया, संदीप चंदेरिया ने गुरु मां को शास्त्र भेंट किया। गुरु पूजन पंडित सनतकुमार जी ने करवाया। आर्यिका माताजी को आहार करवाने का सौभाग्य आभा दीदी एवं राजुल अंशुल जैन परिवार को प्राप्त हुआ। संचालन सुलभ जैन ने किया।</p>
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