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	<title>आर्यिका श्री महायशमति माताजी &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
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	<title>आर्यिका श्री महायशमति माताजी &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>9वां संयम वर्षवर्द्धन दिवस 25 अप्रैल को: वैशाख शुक्ल दशमी पर तिथि अनुसार विशेष, आर्यिका महायशमती ने आर्यिकाओं की परंपरा को किया गौरवान्वित </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shree Phal News]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 25 Apr 2026 11:33:52 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[भारतीय संस्कृति के उन्नयन में श्रमण संस्कृति का महनीय योगदान है। श्रमण संस्कृति के बिना भारतीय संस्कृति की कल्पना नहीं की जा सकती है। इस गौरवमयी श्रमण परंपरा में चतुर्विध संघ के अंतर्गत आर्यिकाओं का भी अहम योगदान रहा है। धर्म और संस्कृति की रक्षा में महिलाओं का योगदान प्रमुख है। संस्कारों से धर्म और [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>भारतीय संस्कृति के उन्नयन में श्रमण संस्कृति का महनीय योगदान है। श्रमण संस्कृति के बिना भारतीय संस्कृति की कल्पना नहीं की जा सकती है। इस गौरवमयी श्रमण परंपरा में चतुर्विध संघ के अंतर्गत आर्यिकाओं का भी अहम योगदान रहा है। धर्म और संस्कृति की रक्षा में महिलाओं का योगदान प्रमुख है। संस्कारों से धर्म और संस्कृति निरंतर बनी रहती है। <span style="color: #ff0000">ललितपुर से पढ़िए, डॉ.सुनील जैन संचय की यह प्रस्तुति&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>ललितपुर।</strong> भारतीय संस्कृति के उन्नयन में श्रमण संस्कृति का महनीय योगदान है। श्रमण संस्कृति के बिना भारतीय संस्कृति की कल्पना नहीं की जा सकती है। इस गौरवमयी श्रमण परंपरा में चतुर्विध संघ के अंतर्गत आर्यिकाओं का भी अहम योगदान रहा है। धर्म और संस्कृति की रक्षा में महिलाओं का योगदान प्रमुख है। संस्कारों से धर्म और संस्कृति निरंतर बनी रहती है। जैन परंपरा में आर्यिका के रूप में नारी को महत्वपूर्ण पूजनीय स्थान प्राप्त है। आर्यिकाओं के उपदेश से समाज, संस्कृति के उत्थान में नई प्रेरणा मिलती है। मानवीय मूल्यों की संरचना में आर्यिकाओं का योगदान महत्वपूर्ण है। आर्यिकाओं की गौरवशाली परंपरा में आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज जी की अक्षुण्ण पट्ट परंपरा के आचार्य श्री वर्धमानसागर जी की सुयोग्य सुशिष्या आर्यिका श्री महायशमति माताजी का महनीय योगदान है। आर्यिका श्री महायशमति माताजी का जन्म सनावद, जिला खरगोन (मप्र) में 3 जनवरी 1989 पोष वदी ग्यारस को हुआ था। जन्म नाम सिद्धा जैन पंचोलिया था। आपके पिता श्रावक श्रेष्ठी राजेश जैन पंचोलिया और माता संगीता पंचोलिया हैं। आपने लौकिक शिक्षा एमएससी (आईटी) तक ग्रहण की। बचपन से ही आपके मन में वैराग्य के प्रति लगाव था। पारिवारिक धार्मिक संस्कार के कारण 8 वर्ष की उम्र में सनावद में धार्मिक फैंसी ड्रेस प्रतियोगिता में आर्यिका माता का अभिनय किया। स्कूल, समाज में सांस्कृतिक गतिविधियों में विभिन्न अभिनय, पंचकल्याणक में अष्ट कुमारी का अभिनय, ब्राह्मी-सुंदरी का अभिनय बड़ी कुशलता के साथ किया।</p>
<p><strong>खेलकूद में दिखाई अपनी प्रतिभा</strong></p>
<p>अध्ययन के दौरान स्कूल में कई प्रतियोगिताओं में भाग लिया। जिसमें अनेक पुरस्कार प्राप्त किए। जिसमें प्रमुख हैं- जूडो-कराटे में राज्य स्तर पर गोल्ड मैडल, राष्ट्रीय स्तर पर सिल्वर मेडल, कराटे में ब्लैक बेल्ट जैसे पुरस्कार मिले। वहीं स्कूल, कॉलेज में ट्रेंनिग भी दी</p>
<p><strong>वैराग्य का बीजारोपण</strong></p>
<p>हम देखते हैं कि वर्तमान के युवक-युवतियों को फिल्मी स्टार, क्रिकेट खिलाड़ियों से ऑटोग्राफ का शौक रहता है किंतु इन्हें आचार्याे, मुनियों, आर्यिका माताजी से डायरी में आशीर्वाद लिखवाने की गहन रुचि थी। बचपन से ही धार्मिक संस्कार प्राप्त होने के कारण धर्म मार्ग पर आगे बढ़ती रहीं। दादाजी की दीक्षा के बाद आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने आशीर्वाद में लिखा कि -कुल परंपरा अनुसार धर्म और त्याग मार्ग पर आगे बढ़ो। आचार्यश्री के इस आशीर्वचन का सिद्धा दीदी पर काफी प्रभाव पड़ा। अल्पायु से ही दादाजी के साथ मंदिर जाना, रात्रि को मंदिर में पाठशाला जाना, आलू-प्याज आदि जमींकंद का सेवन नहीं किया।</p>
<p><strong>दादाजी की दीक्षा’ </strong></p>
<p>जब सिद्धा दीदी की उम्र मात्र 4 वर्ष की थी तब आपके दादाजी श्री श्रवणबेलगोला में आचार्य श्री वर्धमानसागर जी महाराज के सिद्ध हस्त कर कमलों से मुनि दीक्षित होकर मुनि श्री चारित्र सागर जी महाराज नाम करण हुआ। जब आपकी उम्र मात्र 13 वर्ष की थी। तब गृह नगर सनावद में ही मुनि श्री चारित्र सागर जी की समाधि निकटता से देखने का अवसर मिला।</p>
<p><strong>आचार्य श्री वर्द्धमान सागर जी के संघ में शामिल</strong></p>
<p>सिद्धा दीदी, श्री सम्मेद शिखर जी पर वर्ष 2011 में विजयादशमी के दिन आचार्य श्री वर्द्धमान सागर जी के संघ में शामिल हो गईं। पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी से अतिशय क्षेत्र पपौरा जी जिला टीकमगढ़ (म.प्र.) में वर्ष 2012 में आपने अक्षय तृतीया के दिन आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत पूर्ण रूप से अपनाकर जीवन संयम की ओर मोड़ लिया। सिद्धा दीदी के रूप में आपने अपनी साधना, ओजस्वी प्रवचन, लेखन, संचालन आदि के माध्यम से अल्प समय में अपना एक अलग स्थान बना लिया। मेरा सौभाग्य रहा है कि सिद्धा दीदी जी से अनेक बार चर्चा, परिचर्चा का अवसर मिला। आपका स्नेह और वात्सल्य सदैव मुझे मिला। आचार्यश्री के सान्निध्य में विद्वत संगोष्ठियों में मुझे संयोजक के रूप में कार्य करने का अवसर मिला। आयोजन संबंधी कोई भी जानकारी मुझे सिद्धा दीदी से ही मिलती थी। 2018 में श्रवणबेलगोला में संपन्न गोमटेश्वर बाहुबली भगवान के महमस्तकाभिषेक के समय भी आपसे अनेक बार चर्चा करने का अवसर मिला। जानकारी आदि आपसे प्राप्त की। सिद्धा दीदी ने जैन संस्कृति के संरक्षण और संवर्द्धन में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। वे खुद युवा अवस्था में संयम के मार्गपर चलकर दूसरों के लिए प्रेरणा का अनुकरणीय उदाहरण बनीं। साथ ही उन्होंने अपने लेखन, प्रवचन आदि के माध्यम से युवाओं में नैतिकता का शंखनाद किया।</p>
<p><strong> आर्यिका दीक्षा का बना अद्भुत संयोग </strong></p>
<p>29 वर्ष की युवावस्था में ग्रहण की आर्यिका दीक्षा तारीख 25 अप्रैल 2018 वैशाख शुक्ल दशमी को विश्व प्रसिद्ध ऐतिहासिक स्थल श्रवणबेलगोला, कर्नाटक में आचार्य श्री वर्द्धमान सागर जी ने विधि विधान के साथ आर्यिका दीक्षा के संस्कार प्रदान किए। आर्यिका दीक्षा का यह महोत्सव अपने आप में अनूंठा था। दीक्षार्थी दीदी के चेहरे पर मनचाही कामना पूर्ति की झलक मुस्कान स्पष्ट देखी जा सकती थी। दीक्षा के समय 29 वर्ष की आयु थी। इस उम्र में जहां युवा वर्ग अपना संसार वर्द्धन करता है। वहीं दीक्षार्थी अपना मोक्षमार्ग वर्द्धन करने निकल पड़ीं थीं। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी द्वारा भव्य जैनेश्वरी दीक्षा श्रीक्षेत्र श्रवणबेलगोला, कर्नाटक में प्रदान कर वैराग्य पथ पर अग्रसर कर नवीन नामकरण अपने श्री मुख से उच्चारित किए। गृहस्थ अवस्था का नाम सिद्धा दीदी था , जो सिद्ध भगवान का सूचक है। दीक्षा के बाद ड्रेस, एड्रेस दोनों बदले। आचार्यश्री ने नया नामकरण आर्यिका श्री महायशमति माता जी किया, जो कि भगवान के 1008 नामों में एक नाम है। 468 नंबर श्री महायश नाम भगवान का है।</p>
<p>उल्लेखनीय है कि आपके दादाजी तिलोक चंद सराफ सनावद ने भी वर्ष 1993 को श्रवण बेलगोला में आचार्य श्री से दीक्षा लेकर मुनि श्री चारित्र सागर जी बने। आपकी बुआजी ने भी आचार्य श्री वर्धमान सागर जी से दीक्षा लेकर आर्यिका श्री निर्माेह मति माताजी हैं। आपके ताऊजी के लड़के मुनि श्री श्रेष्ठ सागर जी हैं। ऐसे संयोग पुण्यशाली आत्माओं धर्मात्माओं को नसीब होते हैं।</p>
<p><strong>सहज और सरल हैं आर्यिका महायशमती</strong></p>
<p>विलक्षण और तपस्वी साध्वी के रूप में आपकी पहचान है। समाज और संस्कृति को भी एक नई दिशा दिखा रहीं हैं। वे सहज और सरल हैं । उन्होंने समाज में अभिनव चेतना और जागृति का संचार किया। माता जी ने अपने नाम को सार्थक किया है, वे निरंतर ज्ञानाराधना और शास्त्रानुशासन के संबल से अपने जनकल्याणी और जगतकल्याणी विचारों को आगम के संबल से ऊर्जित होकर साधनातीत जीवन की आत्यंतिक गहराईयों- अनुभूतियों और वात्सल्य के संचार से मानवीय चिंतन के सतत परिष्कार में सतत सन्नद्ध होकर जीवन को एक सहज-सरल जीने की एक कला बताने में आचार्यश्री की प्रेरणा से निरंतर संलग्न हैं। आर्यिकाओं की परंपरा को आपने गौरवान्वित किया है।</p>
<p>25 अप्रैल वैशाख शुक्ल दशमी 9वां संयम वर्षवर्द्धन दिवस के इस पावन अवसर पर यही कामना है कि आचार्य श्री शांतिसागर जी की परंपरा में शांति मार्ग पर वीरता, दृढ़ता से शिव, मोक्ष को लक्ष्य बना कर श्रुत का संवर्धन करते हुए धर्ममार्ग पर अजीत रहते हुए वर्तमान के वर्धमान सम वात्सल्य वारिधि आचार्य श्री वर्धमानसागर जी का यश बढ़ाते हुए उत्तम चारित्र का पालन कर महायश की प्राप्त करें। आर्यिका महायशमती माता जी के रूप में आप आचार्यश्री की क्षत्रछाया में निरंतर जहां अपनी रत्नत्रय की साधना में संलग्न हैं। वहीं गहन स्वाध्याय, अध्ययन, मनन-चिंतन जारी है साथ ही अपनी प्रखर, तेजस्वी, उर्जावान वाणी के द्वारा प्रभावना कर रहीं हैं।</p>
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		<title>आचार्य श्री वर्धमान सागर महाराज की जन्मस्थली सनावद से 18 वी दीक्षार्थी होगी प्रतिमा धारी मधु दीदी 22 जुलाई को गणिनी आर्यिका ज्ञानमती माताजी के कर कमलो से अयोध्या में लेगी दीक्षा  </title>
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		<pubDate>Sun, 19 May 2024 17:10:12 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[प्रतिमा धारी मधु दीदी सनावद 22 जुलाई को आर्यिका दीक्षा अयोध्या जी में ग्रहण करेंगी। सनावद जिला खरगोन मध्य प्रदेशसिद्ध क्षेत्र सिद्धवरकूट, सिद्धक्षेत्र पावागिरी उन और सिद्ध क्षेत्र श्री बावनगजा जी के समीप स्थित गुलशनाबाद, जो वर्तमान में सनावद नगर नाम से विख्यात है। पढि़ए राजेश पंचोलिया इंदौर एवं अभिषेक जैन लुहाडिय़ा की पूरी रिपोर्ट&#8230; [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>प्रतिमा धारी मधु दीदी सनावद 22 जुलाई को आर्यिका दीक्षा अयोध्या जी में ग्रहण करेंगी। सनावद जिला खरगोन मध्य प्रदेशसिद्ध क्षेत्र सिद्धवरकूट, सिद्धक्षेत्र पावागिरी उन और सिद्ध क्षेत्र श्री बावनगजा जी के समीप स्थित गुलशनाबाद, जो वर्तमान में सनावद नगर नाम से विख्यात है। <span style="color: #ff0000">पढि़ए राजेश पंचोलिया इंदौर एवं अभिषेक जैन लुहाडिय़ा की पूरी रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>सनावद।</strong> प्रतिमा धारी मधु दीदी सनावद 22 जुलाई को आर्यिका दीक्षा अयोध्या जी में ग्रहण करेंगी। सनावद जिला खरगोन मध्य प्रदेशसिद्ध क्षेत्र सिद्धवरकूट, सिद्धक्षेत्र पावागिरी उन और सिद्ध क्षेत्र श्री बावनगजा जी के समीप स्थित गुलशनाबाद, जो वर्तमान में सनावद नगर नाम से विख्यात है। इस सनावद नगरी को विश्व विख्यात बनाने का सौभाग्य अगर मिला है, तो वह है प्रथमाचार्य चारित्र चक्रवती आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज की मूल बाल ब्रह्मचारी पट्ट परंपरा के पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज, जिन्होंने सन 1969 में मुनि दीक्षा लेकर सनावद से मुनि धर्म की शुरुआत की है तब से अभी तक देखें तो 17 भव्य प्राणी सनावद के श्रमण दीक्षा अंगीकार कर चुके हैं। पंचोलिया परिवार की अगर बात कहें तो आचार्य श्री वर्धमान सागर जी, मुनिश्री चारित्र सागर जी, मुनि श्री श्रेष्ठ सागर जी, आर्यिका श्री सुदृद मति माताजी, आर्यिका श्री महायशमति माताजी और क्षुल्लक श्री मोती सागर जी के बाद अब 64 वर्षीय तीन प्रतिमा धारी श्रीमती मधुबाला स्व प्रकाश चंद जी पंचोलिया जैन 22 जुलाई को देश की सर्वाधिक संयम धारी गणनी श्री ज्ञानमती माताजी से सर्वश्रेष्ठ नारी दीक्षा ग्रहण करेंगी। सनावद अनेक दिगंबर मंदिरों, अनेक साधुओं की जन्म नगरी, दीक्षा स्थली और समाधि स्थली होकर धर्म नगरी ही नहीं अपितु धर्म राजधानी मानना अतिशयोक्ति पूर्ण नहीं होगा।</p>
<p><strong>एक परिचय</strong></p>
<p>वैभव , विशाल अजय पंचोलिया ने बताया कि सन 1959 को भारत के प्रसिद्ध मिर्च मंडी वेडिय़ा ग्राम में आपका जन्म सरोज बाई तिलोक चंद जी के यहां हुआ। आपने लौकिक शिक्षा 10वीं तक प्राप्त की। आपका विवाह सनावद के सुप्रसिद्ध श्रावक श्री प्रकाश चंद जी पंचोलिया सराफ से हुआ। आपने अपने जेठ क्षुल्लक श्री मोती सागर जी के दीक्षा अवसर पर 8 मार्च 1987 को आजीवन शुद्र जल का त्याग किया। विवाह के बाद आपकी पुत्री चंद्रिका और दो पुत्र वैभव और विशाल हुए। पुत्री बाल ब्रह्मचारिणी चंद्रिका ने पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी से 21 मार्च 1993 को 2 वर्ष का ब्रह्मचर्य व्रत अंगीकार किया। आपकी पुत्री ने परम पूज्य 105 गणनी आर्यिका श्री ज्ञान मति माताजी से दिनांक 17 फरवरी 2010 को आर्यिका दीक्षा हस्तिनापुर में ग्रहण कर आर्यिका श्री सुदृदमति बनी। उसी दिन माता पिता प्रकाश चंद जी एवं मधु ने आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत आर्यिका श्री ज्ञानमती जी से लिया। पारिवारिक दायित्व पुत्रों के विवाह के बाद आर्यिका श्री ज्ञानमती जी के संघ में संघस्थ होकर आपने आर्यिका श्री ज्ञानमती जी से दो प्रतिमा और 3 प्रतिमा के व्रत वर्ष 2013 में लिए।</p>
<p><strong>आर्यिका दीक्षा हेतु निवेदन</strong></p>
<p>अक्षय तृतीया जैसे पावन पवित्र दिन ब्रह्मचारिणी मधु दीदी ने परम पूज्य गणनी आर्यिका श्री ज्ञानमती जी को आर्यिका दीक्षा हेतु निवेदन कर श्रीफल भेंट कर निवेदन किया। सन 1934 में जन्मी 90 वर्षीय परम उपकारी परम पूज्य सन 1953 से दीक्षित 71 वर्ष से संयम साधना में रत गणनी आर्यिका श्री ज्ञानमती माताजी ने आगामी 22 जुलाई श्रावण कृष्ण एकम वीर शासन जयंती पर दीक्षा प्रदान करने की स्वीकृति प्रदान की। आपके सहित 5 आर्यिका दीक्षाए होंगी।</p>
<p><strong>सनावद का आचार्य साधु परमेष्टि का गौरव शाली इतिहास</strong></p>
<p>अभी तक सनावद से इसके पूर्व 17 दीक्षाएं हो चुकी हैं, जिनमें एक आचार्य श्री वर्धमान सागर जी, 9 मुनिराज, 6 आर्यिका माताजी और एक क्षुल्लक सहित 17 साधु हुए हैं।</p>
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		<title>अशोकनगर में हुई धर्मसभा : जिनेन्द्र प्रभु के दर्शन से पुण्य का आश्रव होकर कर्मों की निर्जरा क्षय होता है- आचार्य श्री वर्धमान सागर </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/with_the_darshan_of_jinendra_prabhu_there_is_a_drop_of_virtue_and_the_destruction_of_deeds_is_destroyed_acharya_shri_vardhman_sagar/</link>
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		<pubDate>Mon, 08 May 2023 12:21:01 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[सभी को जिनेंद्र प्रभु का दर्शन करना चाहिए। जिनेंद्र प्रभु के दर्शन श्रद्धा और विनय के साथ करना चाहिए। यह मंगल प्रवचन अशोक नगर की धर्म सभा में आचार्य शिरोमणि वात्सल्य वारिधि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने प्रकट किए। संघस्थ शिष्या आर्यिका श्री महायशमति माताजी ने भी प्रवचन में कर्म सिद्धांत की विवेचना को [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>सभी को जिनेंद्र प्रभु का दर्शन करना चाहिए। जिनेंद्र प्रभु के दर्शन श्रद्धा और विनय के साथ करना चाहिए। यह मंगल प्रवचन अशोक नगर की धर्म सभा में आचार्य शिरोमणि वात्सल्य वारिधि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने प्रकट किए। संघस्थ शिष्या आर्यिका श्री महायशमति माताजी ने भी प्रवचन में कर्म सिद्धांत की विवेचना को बताया। <span style="color: #ff0000;">पढ़िए राजेश पंचोलिया की विशेष रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>उदयपुर।</strong> मैंने अशोकनगर प्रवेश के दिन अशोक नगर का शाब्दिक अर्थ बतलाया था। तीर्थंकर श्री शांतिनाथ भगवान शोक रहित होकर अशोकनगर जिनालय में विराजित हैं। श्री शांतिनाथ भगवान 6 खंड के अधिपति चक्रवर्ती राजा, कामदेव और सुदर्शन चक्रधारी हैं। पुण्य कैसे प्राप्त करें, इसका प्रवचन अभी आपने सुना। सभी को जिनेंद्र प्रभु का दर्शन करना चाहिए। जिनेंद्र प्रभु के दर्शन श्रद्धा और विनय के साथ करना चाहिए। यह मंगल प्रवचन अशोक नगर की धर्म सभा में आचार्य शिरोमणि वात्सल्य वारिधि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने प्रकट किए।</p>
<p><strong>नियमानुसार करें अभिषेक</strong></p>
<p>ब्रह्मचारी गजू भैया, राजेश पंचोलिया अनुसार, आचार्य श्री ने बताया कि कार्य अगर विधि अनुसार, नियमानुसार किया जाए तो वह पूर्ण होता है। जिस प्रकार युद्ध लड़ने के लिए रणनीति बनाई जाती है, हर लौकिक कार्य चाहे वह व्यापार हो या नौकरी का हो, वह कार्य विधि अनुसार करते हैं। किंतु जब भगवान के दर्शन करते हैं तब आप दर्शन, अभिषेक, पूजन विधि और नियम भूल जाते हैं। भगवान के दर्शन अभिषेक-पूजन के लिए अनेक मंदिर आगम विरुद्ध मनमाने नियम बनाकर समय सीमा के बाद अभिषेक नहीं करने देते, जो कि गलत है।</p>
<p><strong>पुण्य के कारण मिलती है मनुष्य की गति</strong></p>
<p>आचार्य श्री ने प्रवचन में बताया कि जिनेंद्र प्रभु के दर्शन से पुण्य का आश्रव होकर कर्मों की निर्जरा होती है। मूल रूप से 8 कर्म है किंतु उनकी उत्तर प्रकृति 148 है। आपके यह कर्म आत्मा में बैठे हैं। परिणामों में निर्मलता जिनेंद्र भगवान के दर्शन से आती है । दर्शन, दो हाथ, दो पैर और मस्तक जोड़कर जिनेंद्र प्रभु के दर्शन करना चाहिए। विधि पूर्वकदर्शन नमस्कार से कर्म के निर्जरा होती है। संसार भ्रमण में दुख और दुर्गति मिली है। पुण्य के कारण आपको मनुष्य गति मिली है। आचार्य श्री ने आगे बताया कि अहिंसा का छोटा नियम भी भगवान बना सकता है। एक उदाहरण से बताया कि महावीर स्वामी पूर्व पर्याय में पुरवा भील थे। एक छोटा सा अहिंसा का नियम लिया, उसी प्रकार सिंह की पर्याय में भी रहे थे, तिर्यंच गति में रहे उस समय मुनि के संबोधन से तिर्यंच गति से भगवान महावीर आगामी भव में बने। आचार्य ने बताया कि प्रतिमा का अभिषेक सभी को करने देना चाहिए। कई मंदिरों में अभिषेक का समय निश्चित कर दिया जाता है उसके बाद अभिषेक करने नहीं दिया जाता है, परंपरा ठीक नहीं है। बिना अभिषेक के पूजन पूर्ण नहीं होती है। आचार्य श्री ने बताया कि मंदिर से जाने के समय यह जरूर कह कर जाना चाहिए। भगवान मैं फिर दर्शन करने आऊंगा। मोबाइल के धार्मिक स्थलों में प्रचलन पर जागरूक करते हुए आचार्य श्री ने कहा कि मोबाइल की परिभाषा बताई कि जो मन को चित को चलाएं, मान कर दे वह मोबाइल है। धार्मिक स्थलों में धर्म सभा में मोबाइल का उपयोग नहीं करना चाहिए। विधि पूर्वक कार्य से पुण्य की प्राप्ति होती है। साधु के उपदेश सुनकर ग्रहण करें।</p>
<p><strong>कर्म का फल अनुभव कराता है</strong></p>
<p>इसके पूर्व संघस्थ शिष्या आर्यिका श्री महायशमति माताजी ने प्रवचन में कर्म सिद्धांत की विवेचना में बताया कि कर्म का फल अनुभव कराता है। कर्म का फल दिखता नहीं है। माताजी ने श्री आदिनाथ भगवान द्वारा दिए गए उपदेश के आधार पर असि,मसि कृषि, वाणिज्य, शिल्प और कला की विवेचना कर बताया संसारी व्यक्ति प्रतिदिन जो क्रिया करते हैं, वह इसी पर आधारित है। जिनवाणी के चारों अनुयोग पुण्य और पाप में भेद बताते हैं। माताजी ने श्रावक और श्राविकाओं के लिए 6 आवश्यक क्रियाएं, देव पूजा, गुरु पूजा, स्वाध्याय, संयम, तप और दान के बारे में विस्तृत जानकारी दी। धर्म सभा में श्रोता के क्या-क्या गुण होना चाहिए। श्रोता भक्ति मान होना चाहिए। उसे समर्पित भाव से प्रवचन सुनना चाहिए। श्रोता को मिश्र भाषी होना चाहिए, सभा में अहंकार रहित होना चाहिए, श्रोता की सुनने में रुचि होना चाहिए और आसन की स्थिरता होना चाहिए। ग्रहण करने की क्षमता और तथा निंदक नहीं होना चाहिए।</p>
<p><strong>9 मई को होगा मंगल विहार</strong></p>
<p>धर्म सभा के प्रारंभ में सीमा अशोक गोधा ने मंगलाचरण किया। चित्र अनावरण, दीप प्रवज्जलन कमेटी सदस्यों द्वारा किया गया। आचार्य श्री के चरण प्रक्षालन और शास्त्र भेंट पुण्यार्जक परिवार द्वारा किया गया। दिनांक 9 मई को आचार्य श्री संघ का मंगल विहार सेक्टर 4 और 5 में अल्प प्रवास के लिए होगा। 21 मई से 25 मई तक सेक्टर 11 में होने वाले पंच कल्याणक में संघ सहित आचार्य श्री वर्धमान सागर जी का सेक्टर 11 में 14 मई को आगमन होगा।</p>
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