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	<title>आर्यिका विभाश्री &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<title>आर्यिका विभाश्री &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>ईर्ष्या मनुष्य के चरित्र में लाभ की जगह हानि का बीज बोती है : आर्यिका विभाश्री ने ईर्ष्या भाव के बारे में बताया  </title>
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		<pubDate>Tue, 08 Aug 2023 06:51:59 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[व्यक्ति को जीवन में कभी ईर्ष्या नहीं करनी चाहिए। ईर्ष्यालु व्यक्ति कभी सुखी नहीं रह सकता, वह कभी भी गुणों को ग्रहण नहीं करता। दूसरों का सुख वह देख नहीं सकता है और दूसरों की खुशी को जो सहन नहीं कर सकता, वह व्यक्ति कभी अपने जीवन में खुश नहीं रह सकता। पढ़िए राकेश कासलीवाल [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>व्यक्ति को जीवन में कभी ईर्ष्या नहीं करनी चाहिए। ईर्ष्यालु व्यक्ति कभी सुखी नहीं रह सकता, वह कभी भी गुणों को ग्रहण नहीं करता। दूसरों का सुख वह देख नहीं सकता है और दूसरों की खुशी को जो सहन नहीं कर सकता, वह व्यक्ति कभी अपने जीवन में खुश नहीं रह सकता। <span style="color: #ff0000;">पढ़िए राकेश कासलीवाल की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>रांची।</strong> वासुपूज्य जिनालय के प्रांगण में गणिनी आर्यिका विभाश्री माताजी ने अपने प्रवचन में कहा कि व्यक्ति को जीवन में कभी ईर्ष्या नहीं करनी चाहिए। ईर्ष्यालु व्यक्ति कभी सुखी नहीं रह सकता, वह कभी भी गुणों को ग्रहण नहीं करता। दूसरों का सुख वह देख नहीं सकता है और दूसरों की खुशी को जो सहन नहीं कर सकता, वह व्यक्ति कभी अपने जीवन में खुश नहीं रह सकता।</p>
<p>दूसरों का बुरा सोचने से किसी का बुरा नहीं होता, यह उसके अच्छे-बुरे परिणामों पर निर्भर करता है। अत: व्यर्थ में दूसरों के विषय में बुरा नहीं सोचना चाहिये। ईर्ष्या करने वाला मनुष्य भीतर से कमजोर होता है। वह दीन होता है, असहाय होता है। वह दुख सहने के योग्य नहीं होता है। इसलिए उसमें ईर्ष्या के भाव जागते हैं। ऐसा व्यक्ति हमेशा असंतोष और दुख में जीता है। संसार की वैभवशाली वस्तुएं उसे दुखी करती हैं। उसे देखने का उसका दृष्टिकोण ही अलग होता है।</p>
<p>अगर मन में किसी के लिए ईर्ष्या के भाव ही न हों तो जीवन का नजरिया ही बदल जाएगा। राग और द्वेष हर व्यक्ति के अंदर होता है। संसार में दो प्रकार के व्यक्ति होते हैं । कुछ व्यक्ति तो ईश्वर पर आस्था रखते हैं। कुछ व्यक्ति ईर्ष्या पर आस्था रखते हैं। ईश्वर पर आस्था रखने वाले जीवन में महान बन जाते हैं। ईर्ष्या पर आस्था रखने वाले दुखी होते हैं अत:ईर्ष्या को छोड़कर ईश्वर पर आस्था रखना चाहिए। कितना भी बड़ा महल ,अट्टालिका क्यों न हो, कितनी छोटी गरीब की झोपड़ी क्यों न हो उसमें एक न एक दरवाजा अवश्य होता है।</p>
<p>इसी प्रकार प्रत्येक व्यक्ति के अंदर गुण अवगुण अवश्य होते हैं। गुणों को ग्रहण करने वाला व्यक्ति सद्गृहस्थ कहलाता है। व्यक्ति को जैसी संगति मिलती है। वैसी ही परिणति उसकी हो जाती है। सज्जन व्यक्ति दुर्जन व्यक्ति के जीवन में भी गुण खोज लेता और दुर्जन व्यक्ति सज्जन पुरुषों में दोषों को खोजने का प्रयास करता है। ईर्ष्या व्यक्ति और व्यक्ति के बीच असमानता और अलगाव के कारण उत्पन्न होती है। किसी की भी संपन्नता किसी को नहीं भाती और वही उसके ईर्ष्या का कारण बन जाता है।</p>
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		<title>भगवान की भक्ति, आराधना एवं विशुद्ध आचरण से दुर्लभ से दुर्लभ वस्तु भी सुलभता से प्राप्त हो जाती है : आर्यिका विभाश्री ने प्रभु की भक्ति की महिमा का किया बखान  </title>
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		<pubDate>Mon, 07 Aug 2023 07:19:09 +0000</pubDate>
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<p><strong>वासुपूज्य जिनालय के प्रांगण में गणिनी आर्यिका विभाश्री माताजी ने अपने प्रवचन के माध्यम से प्रभु की भक्ति की महिमा का व्याख्यान किया | जब मेरा मन और तन पवित्र होगा तब हम भगवान की आराधना कर पायेगें । संसार की कोई भी ऐसी वस्तु नहीं है जो हमें भगवान की आराधना से प्राप्त न हो। <span style="color: #ff0000;">पढ़िए राकेश कासलीवाल की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>रांची।</strong> वासुपूज्य जिनालय के प्रांगण में गणिनी आर्यिका विभाश्री माताजी ने अपने प्रवचन के माध्यम से प्रभु की भक्ति की महिमा का व्याख्यान किया | जब मेरा मन और तन पवित्र होगा तब हम भगवान की आराधना कर पायेगें । संसार की कोई भी ऐसी वस्तु नहीं है जो हमें भगवान की आराधना से प्राप्त न हो। जब हमें भगवान की भक्ति की महिमा का अहसास होता है। तब हमें भगवान के प्रति श्रद्धा बढ़ती है । संसार के सभी प्रकार के दुःख , कष्ट , संकट , परेशानियाँ भगवान की भक्ति से नष्ट हो जाते हैं ,और संसार के सभी सुख , मानसिक सुख , शारीरिक सुख एवं सभी प्रकार की सिद्धियाँ हमें भगवान की आराधना से प्राप्त होती हैं। यदि माता-पिता अच्छे हैं, तो उनके बच्चो में भी अच्छे ही संस्कार आएंगे। यदि माता-पिता के संस्कार अच्छे नहीं हैं तो उनके बच्चे भी संस्कार विहीन होंगे।</p>
<p><strong>बच्चों का भविष्य माता-पिता के हाथ में</strong></p>
<p>बच्चों का भविष्य माता-पिता के हाथ में होता है। वह चाहे तो श्रवण कुमार बना दें चाहे तो रावण हर मां अपने बच्चे को श्रवण कुमार बनाना चाहती है, लेकिन अपने पति को श्रवण कुमार बनते नहीं देखना चाहती। क्योंकि उसमें वह संस्कार नहीं है। इसलिए बच्चो में वह संस्कार डालें, जिससे वह धर्म के मार्ग पर चलकर अपनो के साथ दूसरों का सम्मान करें। प्रसिद्ध जैन स्तोत्र भक्तामर की महिमा के लिए कहा कि यह एक ऐसा स्तोत्र है जिसको प्रत्येक मां को अपने बेटे को जरूर पढ़ाना चाहिए । भक्तामर स्तोत्र का एक &#8211; एक अक्षर अपने आप में संपूर्ण मंत्र है । इस भक्तामर स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन करने से हमारी सब विघ्न बाधायें दूर हो जाती है । भक्तामर का घर में पाठ करने से हमारे घर की शुद्धि होती हैं तथा घर में यदि भूत &#8211; प्रेत की बाधा हो तो भी दूर हो जाती है तथा हमारी सारी मनोकामनाओं को पूरा करने वाला भी यह भक्तामर स्तोत्र का पाठ है। प्रातः काल उठते ही प्रभु का नाम, प्रभु की पूजा करना चाहिए । जिनकी आप आराधना करते हो वह वीतरागी होना चाहिए, जो राग द्वेष से रहित हो ऐसे वीतरागी की आराधना से हमें धर्म का मार्ग प्रशस्त होता है।</p>
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		<title>कर्तव्यों का सम्यक निवर्हन ही सच्चा धर्म है : आर्यिका विभाश्री ने दिया कर्तव्य और निष्ठा के बारे में बताया  </title>
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		<pubDate>Wed, 02 Aug 2023 07:48:32 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[वासुपूज्य जिनालय के प्रांगण में गणिनी आर्यिका विभाश्री माताजी ने अपने प्रवचन में कहा कि कर्तव्यों का पालन करने से धर्म का निर्वाह स्वयं हो जायेगा, क्योंकि मनुष्य का असली धर्म कर्तव्यों का निष्ठा के साथ पालन करना है। पढ़िए एक रिपोर्ट&#8230; रांची। वासुपूज्य जिनालय के प्रांगण में गणिनी आर्यिका विभाश्री माताजी ने अपने प्रवचन [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>वासुपूज्य जिनालय के प्रांगण में गणिनी आर्यिका विभाश्री माताजी ने अपने प्रवचन में कहा कि कर्तव्यों का पालन करने से धर्म का निर्वाह स्वयं हो जायेगा, क्योंकि मनुष्य का असली धर्म कर्तव्यों का निष्ठा के साथ पालन करना है। <span style="color: #ff0000;">पढ़िए एक रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>रांची।</strong> वासुपूज्य जिनालय के प्रांगण में गणिनी आर्यिका विभाश्री माताजी ने अपने प्रवचन में कहा कि कर्तव्यों का पालन करने से धर्म का निर्वाह स्वयं हो जायेगा, क्योंकि मनुष्य का असली धर्म कर्तव्यों का निष्ठा के साथ पालन करना है। आचार्य नेमिचन्द्र सिद्धान्त चक्रवर्ती ने गोम्मटसार जीवकाण्ड में बताया है कि सबसे पहले आप अपने कर्तव्यों का निर्वाह नहीं करोगे और मंदिर में जाकर पूजन करने लगोगे तो आपकी गृहस्थी नहीं चल सकती। अगर आपने शादी की तो पत्नी , बच्चे का पालन पोषण करना आपका कर्तव्य है, यदि आप बहू है तो आपका कर्तव्य है परिवार के लिए भोजन बनाकर देना, स्त्री की प्रशंसा भोजन एवं गृहकार्य से ही होती है। आजकल महिलाओं के लिए सबसे कठिन काम है भोजन बनाना ,जब आप चौके में भोजन नहीं बनाओगी तो अपना पेट कैसे भरोगी। सास का कर्तव्य है कि वह बहू को ज्यादा पाबंदी में न रखें ।</p>
<p>पिता का कर्तव्य है अपने पुत्र को पढ़ाना लिखाना योग्य बनाना, हम घर गृहस्थी में रहते हैं तो हमारा शरीर के प्रति, संबंधों के प्रति, संपत्ति के प्रति क्या कर्तव्य है यह जानना अधिक आवश्यक है। सेवन करने के योग्य कौन सी वस्तु है और कौन सी वस्तु नहीं है क्या खाना चाहिए क्या नहीं खाना चाहिए। इसके लिए आचार्य समन्तभद्र स्वामी ने बताया है की जो आपके लिए अनिष्ट है उसका त्याग करो हम दो चीज को देखें एक शरीर और दुसरी आत्मा आपके शरीर के लिए क्या &#8211; क्या अनिष्ट है। स्वास्थ्य के लिए क्या हानिकारक है, विचार करे अच्छे लेख आलेखों से, मोबाइल से नुस्खे देख ले तो समझ में आएगा।</p>
<p>क्या खाना चाहिए क्या नहीं खाना चाहिए, जितने भी ऐलोपैथिक डॉक्टर है, आयुर्वेदिक डाक्टर है, होमियोपैथिक डॉक्टर है उनसे आप पूछोगे तो वे यही कहेंगे कि रात को आठ बजे खाना खाना यह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। खाने के चार घंटे पहले भोजन करना चाहिए, ब्रह्ममुहूर्त में उठना चाहिए। मद्य, मांस, शराब, पंचउदम्बर (बड पीपल, ऊमर, कठुमर,अंजीर ) आपके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है, इनका सेवन करने से बचना चाहिए, इनका सेवन करना अयोग्य है।</p>
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