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	<title>आर्यिका विभाश्री माताजी &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
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	<title>आर्यिका विभाश्री माताजी &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>कोटा में आर्यिका विभाश्री माताजी वर्षायोग चातुर्मास कलश स्थापना : समारोह श्रद्धा भक्ति समर्पण के संपन्न </title>
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		<pubDate>Mon, 14 Jul 2025 05:58:32 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[श्री दिगंबर जैन मंदिर विज्ञान नगर में आर्यिका विभाश्री माताजी के पावन वर्षायोग 2025 के लिए चातुर्मास कलश स्थापना का भव्य आयोजन दृढ़ भक्ति समर्पण के साथ किया गया। कोटा से पढ़िए, पारस जैन पार्श्वमणि की यह खबर&#8230; कोटा। श्री दिगंबर जैन मंदिर विज्ञान नगर में आर्यिका विभाश्री माताजी के पावन वर्षायोग 2025 के लिए [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>श्री दिगंबर जैन मंदिर विज्ञान नगर में आर्यिका विभाश्री माताजी के पावन वर्षायोग 2025 के लिए चातुर्मास कलश स्थापना का भव्य आयोजन दृढ़ भक्ति समर्पण के साथ किया गया। <span style="color: #ff0000">कोटा से पढ़िए, पारस जैन पार्श्वमणि की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>कोटा।</strong> श्री दिगंबर जैन मंदिर विज्ञान नगर में आर्यिका विभाश्री माताजी के पावन वर्षायोग 2025 के लिए चातुर्मास कलश स्थापना का भव्य आयोजन दृढ़ भक्ति समर्पण के साथ किया गया। मंदिर समिति के अध्यक्ष राजमल पाटोदी ने बताया कि प्रातःकाल मंदिर अभिषेक एवं शांतिधारा की गई। मुख्य समारोह का प्रारंभ वीरेंद्र पांड्या परिवार ने ध्वजारोहण कर किया। आचार्य विराग सागर महाराज एवं आचार्य विशुद्ध सागर महाराज के चित्र का अनावरण सकल दिगंबर जैन समाज समिति एवं दीप प्रज्ज्वलन दिगंबर जैन मंदिर समिति विज्ञान नगर द्वारा किया गया। गुरु मां का पाद प्रक्षालन शकुंतला पांड्या ने किया एवं शास्त्र भेंट पवन ठौरा एवं मुकेश जैन खटोड़ द्वारा किया गया।</p>
<p><strong>21 भक्तामर महास्तोत्र मंगल कलश स्थापित</strong></p>
<p>चातुर्मास समिति के लिए विनोद टौरड़ी को अध्यक्ष एवं रितेश सेठी को महामंत्री बनाया गया। नृत्य के साथ मंगलाचरण रचिता, रूबी, रिया एवं प्रियंका द्वारा भाव पूर्ण प्रस्तुत किया गया। विभिन्न कलशों की स्थापना की गई। मंदिर समिति के महामंत्री अनिल ठौरा ने बताया कि चातुर्मास हेतु मुख्य मंगल कलश विराग विशुद्ध विभा मंगल कलश मनोज आशीष जैसवाल ने स्थापित किया। 11 सहस्रनाम कलश पुण्यार्जक परिवारों द्वारा स्थापित किए गए। 21 भक्तामर महास्तोत्र मंगल कलश स्थापित किए गए। द्वितीय मुख्य मंगल कलश भी स्थापित किया गया, इस हेतु पुण्यार्जक परिवारों के नाम संकलित किए गए।</p>
<p><strong>वर्षा में भी नहीं रुका गुरु वाणी का प्रवाह</strong></p>
<p>गणिनी आर्यिका विभाश्री माताजी ने उपस्थित जन समुदाय को संबोधित करते हुए कहा कि जीवन में यदि दान के माध्यम से पुण्य का संचय कर लिया जाए तो यह पुण्य अगले जन्म में भी साथ चला जाता है,जबकि धन साथ जाने वाला नहीं है। इसलिए यथायोग्य पुण्य का अर्जन करते रहना चाहिए। उन्होंने बताया कि चातुर्मास हेतु जो कलश स्थापित किए गए हैं, चार माह तक सहस्रनाम के मंत्रों के साथ वे मंत्रित होते रहेंगे। प्रवचन के दौरान वर्षा आरंभ हो गई, किंतु श्रद्धालु बिना विचलित हुए माताजी की वाणी का श्रवण करते रहे। कार्यक्रम में वर्षा का आ जाना वास्तविक वर्षायोग का एक सुखद संकेत है।</p>
<p><strong>तीर्थ रक्षा कलश और अखंड ज्योति</strong></p>
<p>मंदिर समिति के मंत्री पी.के. हरसोरा ने बताया कि एक तीर्थ रक्षा कलश, जिसकी राशि तीर्थों के जीर्णोद्धार में लगाई जाएगी, उसे भी स्थापित किया गया। अखंड ज्योति भी स्थापित की गई। भक्ति नृत्य अंतिमा, श्वेता, अलका, नीतिका, दीक्षा एवं जयंती द्वारा प्रस्तुत किया गया। कार्यक्रम के दौरान ही इंद्र देवता ने भी प्रसन्न होकर वर्षा प्रारंभ कर दी।</p>
<p><strong>वर्षा में भी जारी रहा प्रवचन </strong></p>
<p>बारिश भी माताजी की वाणी के प्रवाह को नहीं रोक सकी एवं उपस्थित श्रद्धालु बारिश में भी माताजी की वाणी का श्रवण करते रहे। गुरु मां की आरती का पुण्यार्जन गिराज कुमार ने प्राप्त करते हुए माताजी की आरती की। कार्यक्रम समापन पर विधि-विधान के साथ कलशों को मंदिर जी में स्थापित किया गया। ये कलश चातुर्मास के दौरान मंदिर जी में विराजित रहेंगे, तत्पश्चात इन्हें पुण्यार्जक परिवारों को दे दिया जाएगा। 14 जुलाई से प्रतिदिन प्रातः 8 बजे तत्त्वार्थ सूत्र की कक्षा पूरे चातुर्मास के दौरान चलेगी।</p>
<p><strong>कार्यक्रम में यह रहे मौजूद </strong></p>
<p>कार्यक्रम में सकल दिगंबर जैन समाज के अध्यक्ष प्रकाश बज, महामंत्री पदम बडला, कोषाध्यक्ष जितेंद्र हरसोरा, ताराचंद बडला, पूर्व अध्यक्ष विमल नांता, पूर्व महामंत्री विनोद टौरड़ी, दीपक डीसीएम, रितेश सेठी, पारसमल धनोपिया, राजू गोधा, लोकेश जैन, महावीर युवा मंडल के कार्यकर्ता एवं विज्ञान नगर महिला मंडल के सदस्य एवं कोटा नगर के मंदिरों के अध्यक्ष एवं मंत्री भी उपस्थित रहे एवं कार्यक्रम में चंद्रप्रकाश कोटिया, विमल जैन वर्धमान ज्वैलर्स, लोकेश जैन सिसवाली, अशोक पाटनी, ईश्वर सोनी, राजेश सोनल सेठिया, जितेंद्र हरसोरा, अंकित जैन, पारस बज भी उपस्थित थे।नागौर, देवेंद्र नगर, मंडाना, झांसी, सुसनेर, कोडरमा, सुजानगढ़, जयपुर, इंदौर, सीकर, बूंदी, बारा, भोपाल, पथरिया, भवानी मंडी, पिडावा सहित अनेक शहरों से आए 500 श्रद्धालुओं ने उपस्थित रहकर गुरु मां का आशीर्वाद प्राप्त किया।</p>
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		<title>इंदौर में ऐलक विपिन सागर बने मुनि विपिन सागर : ३५ मुनिराज और ३५ आर्यिकाओं के सानिध्य में हुआ ऐतिहासिक दीक्षा महोत्सव </title>
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		<pubDate>Sat, 12 Apr 2025 12:43:56 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[इंदौर के बड़ा गणपति स्थित नसिया पर आज भव्य जैनेश्वरी मुनि दीक्षा का आयोजन सम्पन्न हुआ। ऐलक श्री विपिन सागरजी ने मुनि दीक्षा धारण कर मुनि विपिन सागर नाम प्राप्त किया। कार्यक्रम में आचार्य विशद सागर जी सहित ३५ मुनिराज एवं आर्यिका विभाश्री माताजी सहित ३५ आर्यिका माताओं का सानिध्य रहा। धार्मिक क्रियाएं ब्रह्मचारी पीयूष [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>इंदौर के बड़ा गणपति स्थित नसिया पर आज भव्य जैनेश्वरी मुनि दीक्षा का आयोजन सम्पन्न हुआ। ऐलक श्री विपिन सागरजी ने मुनि दीक्षा धारण कर मुनि विपिन सागर नाम प्राप्त किया। कार्यक्रम में आचार्य विशद सागर जी सहित ३५ मुनिराज एवं आर्यिका विभाश्री माताजी सहित ३५ आर्यिका माताओं का सानिध्य रहा। धार्मिक क्रियाएं ब्रह्मचारी पीयूष भैया व पंडित अर्पित जैन वाणी ने पूर्ण कराईं। आयोजन में समाज के सैकड़ों श्रद्धालु उपस्थित रहे। <span style="color: #ff0000">पढ़िए इंदौर से राजेश जैन दद्दू की यह विशेष रिपोर्ट&#8230;&#8230;..</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> 35 मुनिराजों और 35 आर्यिकाओं के सानिध्य में ऐलक श्री विपिन सागरजी ने धारण की मुनि दीक्षा। 11 अप्रैल 2025 प्रातः नसिया बड़ा गणपति पर भव्य आयोजन के साथ जैनेश्वरी मुनि दीक्षा समारोह सम्पन्न हुआ। धर्म समाज प्रचारक राजेश जैन ‘दद्दू’ ने जानकारी दी कि इस अवसर पर आचार्य विशद सागर, विनम्र सागर, विप्रणत सागर, उपाध्याय विशुरत सागर एवं श्रुत संवेगी मुनि आदित्य सागर सहित 35 मुनिराजों का परम सानिध्य प्राप्त हुआ। इस पावन अवसर पर ऐलक श्री विपिन सागरजी ने मुनि दीक्षा ग्रहण कर मुनि विपिन सागर नाम प्राप्त किया। साथ ही आर्यिका विभाश्री माताजी सहित 35 आर्यिका माताओं की भी उपस्थिति रही, जिससे यह आयोजन और भी भव्य और आध्यात्मिक रूप से समृद्ध हो गया। संपूर्ण धार्मिक क्रियाएं बाल ब्रह्मचारी पीयूष भैया एवं नगर गौरव पंडित अर्पित जैन वाणी द्वारा संपन्न कराई गईं।</p>
<p><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-78967" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/04/IMG-20250412-WA0027.jpg" alt="" width="854" height="1280" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/04/IMG-20250412-WA0027.jpg 854w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/04/IMG-20250412-WA0027-200x300.jpg 200w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/04/IMG-20250412-WA0027-683x1024.jpg 683w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/04/IMG-20250412-WA0027-768x1151.jpg 768w" sizes="(max-width: 854px) 100vw, 854px" />मुनि आदित्य सागरजी ने संपूर्ण दीक्षा कार्यक्रम का संचालन किया। इस दिव्य आयोजन में नसियां ट्रस्ट से योगेंद्र काला, नीरज मोदी, कमल काला, पारस पंड्या, मनोज काला, सुरेंद्र मोदी, हेमंत सेठी, जयदीप जैन, सुनील गोधा, प्रिंसपल टोंग्या सहित समाज के सैकड़ों श्रद्धालु उपस्थित रहे। कार्यक्रम के अंत में कमल काला ने सभी का आभार प्रकट किया।</p>
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		<title>निर्वाण कल्याणक महोत्सव मनाया  :  त्याग और तपस्या का त्योहार है दीपावली &#8211; आर्यिका श्री विभाश्री माताजी </title>
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		<pubDate>Tue, 14 Nov 2023 16:16:55 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[वासुपूज्य जिनालय में आर्यिका श्री विभाश्री माताजी ने कहा कि बाहर की साफ सफाई के साथ अन्दर की सफाई का प्रयास इस दिन होना चाहिये, तभी दीपावली पर्व मनाने की सार्थकता है। आज पर्व को हमने खाने-पीने, पहनने तक कर दिया है जबकि पर्व जीवन में त्याग कर मनाया जाना चाहिए। पढ़िए प्रदीप बाकलीवाल और [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><span style="color: #000000;">वासुपूज्य जिनालय में आर्यिका श्री विभाश्री माताजी ने कहा कि बाहर की साफ सफाई के साथ अन्दर की सफाई का प्रयास इस दिन होना चाहिये, तभी दीपावली पर्व मनाने की सार्थकता है। आज पर्व को हमने खाने-पीने, पहनने तक कर दिया है जबकि पर्व जीवन में त्याग कर मनाया जाना चाहिए।</span><br />
<span style="color: #ff0000;">पढ़िए प्रदीप बाकलीवाल और राकेश कासलीवाल की रिपोर्ट&#8230;</span></p>
<hr />
<p>रांची। कार्तिक कृष्ण तेरस के दिन भगवान महावीर ने बिहार के पावापुरी के पदम् सरोवर में योग निरोध धारण किया था, जिस कारण यह कार्तिक कृष्ण माह की &#8216;तेरस&#8217; धन्य हो गई थी। हमारे इस काल के 24वें तीर्थंकर चौदहवें गुणस्थान के अंतिम दो समयों में अपनी शेष 85 कर्म प्रकृतियों का क्षय कर18000 शीलों का पालन कर मोक्ष प्राप्ति के लिए ध्यानस्थ हुए थे। इसीलिए हम श्रमण संस्कृति के अनुयायी, वर्तमान में जैन धर्मावलम्बी धन्य तेरस मनाते हैं। यह बात!पूज्य गणिनी आर्यिका 105 श्री विभाश्री माताजी ने प्रवचन में कही।</p>
<p>आखिरी उपदेश दिया था</p>
<p>उन्होंने कहा कि इसके ठीक दो दिवस उपरान्त जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर को निर्वाण प्राप्त हुआ था। उस दिन कार्तिक मास की अमावस्या की ही रात थी। इसी दिन भगवान महावीर के प्रमुख गणधर गौतम स्वामी को भी कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। जैन ग्रंथों के मुताबिक महावीर भगवान ने दिवाली वाले दिन मोक्ष जाने से पहले आखिरी बार उपदेश दिया था, जिसे &#8216;उत्तराध्ययन सूत्र&#8217; के नाम से जाना जाता है। भगवान के मोक्ष जाने के बाद जैन धर्मावलंबियों ने दीपक जलाकर रोशनी की और खुशियां मनाईं। जैन धर्म के लिए यह त्योहार विशेष रूप से त्याग और तपस्या के त्योहार के तौर पर मनाया जाता है। इसलिए इस दिन जैन धर्मावलंबी भगवान महावीर की विशेष पूजा करके उनके त्याग और तपस्या को याद करते हैं।</p>
<p><img decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-51836" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/11/34.jpg" alt="" width="1280" height="853" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/11/34.jpg 1280w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/11/34-300x200.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/11/34-1024x682.jpg 1024w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/11/34-768x512.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/11/34-414x276.jpg 414w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/11/34-470x313.jpg 470w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/11/34-640x426.jpg 640w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/11/34-130x86.jpg 130w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/11/34-187x124.jpg 187w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/11/34-990x660.jpg 990w" sizes="(max-width: 1280px) 100vw, 1280px" /></p>
<p>अंदर की सफाई करें</p>
<p>आर्यिका श्री ने कहा कि बाहर की साफ सफाई के साथ अन्दर की सफाई का प्रयास इस दिन होना चाहिये, तभी दीपावली पर्व मनाने की सार्थकता है। आज पर्व को हमने खाने-पीने, पहनने तक कर दिया है जबकि पर्व जीवन में त्याग कर मनाया जाना चाहिए। दिवाली यानी वीर निर्वाणोत्सव वाले दिन सभी जैन मंदिरों में विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है। बीते 13 नवम्बर को भगवान महावीर के मोक्ष कल्याणक पर वासुपूज्य जिनालय में प्रमुख पात्रों के द्वारा निर्वाण लाडू कृत्रिम पावापुरी की रचना में चढ़ाया गया। यह रचना बंगाल के कारीगरों के द्वारा की गई थी।।</p>
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		<title>जिनसहस्रनाम के मंत्रों से शांतिधारा और सिद्धों की आराधना  :  हमेशा अपने पुण्य की लकीर को बड़ा करो &#8211; आर्यिका विभाश्री </title>
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		<pubDate>Sun, 22 Oct 2023 16:47:51 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[गणिनी आर्यिका विभा श्री माता जी के सानिध्य में प्रातः काल जिनसहस्रनाम के मंत्रों से शांतिधारा और सिद्धों की आराधना की गई। इस अवसर पर मंत्रोच्चार द्वारा सातवें दिन 512 अर्घ्य समर्पित किए गए। पूज्य माता जी ने धर्म सभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि धर्म का मूल, धर्म का आधार, धर्म का प्राण, [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>गणिनी आर्यिका विभा श्री माता जी के सानिध्य में प्रातः काल जिनसहस्रनाम के मंत्रों से शांतिधारा और सिद्धों की आराधना की गई। इस अवसर पर मंत्रोच्चार द्वारा सातवें दिन 512 अर्घ्य समर्पित किए गए। पूज्य माता जी ने धर्म सभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि धर्म का मूल, धर्म का आधार, धर्म का प्राण, धर्म की जान, धर्म की आत्मा, धर्म की उपजाऊ भूमि, धर्म की शक्ति यह एक मात्र सम्यक दर्शन है। <span style="color: #ff0000;">पढ़िए राकेश कासलीवाल की रिपोर्ट&#8230;</span></p>
<hr />
<p><strong><br />
रांची</strong>। <strong>गणिनी आर्यिका विभा श्री माता जी</strong> के सानिध्य में प्रातः काल जिनसहस्रनाम के मंत्रों से शांतिधारा और सिद्धों की आराधना की गई। इस अवसर पर मंत्रोच्चार द्वारा सातवें दिन 512 अर्घ्य समर्पित किए गए। पूज्य माता जी ने धर्म सभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि धर्म का मूल, धर्म का आधार, धर्म का प्राण, धर्म की जान, धर्म की आत्मा, धर्म की उपजाऊ भूमि, धर्म की शक्ति यह एक मात्र सम्यक दर्शन है। दर्शन का अर्थ दिखना है लेकिन यह मोक्ष मार्ग का प्रकरण है। इसीलिए दर्शन का अर्थ देखना नहीं है, दर्शन का अर्थ है श्रद्धा, विश्वास, आस्था, प्रतीति, रुचि। गणित के क्षेत्र में जो महत्व अंक का है, वह महत्व धर्म के क्षेत्र में सम्यक दर्शन का है। अंक के बिना शून्य का क्या महत्व हो सकता है, जिस तरह चेक पर शून्य &#8211; शून्य लिख दिये हों और यदि अंक नहीं लिखा है तो चेक की कोई कीमत नहीं है, उसी तरह से अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह यह सब सम्यक दर्शन के बिना शून्य हैं। जो पदार्थ जिस रूप में है, उसी रूप में श्रद्धा होना,अरिहंत आदि में भक्ति होना सम्यकत्व है।</p>
<p><strong>मार्ग नहीं होता अशुद्ध</strong></p>
<p>माताजी ने कहा कि आज सम्यक दर्शन के पांचवे अंग उपगूहन अंग की ओर दृष्टिपात करना है। जब तक श्रद्धा नहीं होगी, तब उपगूहन अंग असम्भव है। कषायों की तीव्रता इतनी है कि श्रद्धा पैदा होने नहीं देती मार्ग के प्रति निःशक्ति होते हुए और मार्ग के फल के प्रति अंतरंग भावना से निःशक्त होकर मार्ग में चलते समय कितनी भी कठिनाइयां आएं, गुणों को प्रकट कर दोषों को दूर कर देना ही उपगूहन अंग है। मार्ग कभी भी अशुद्ध नहीं होता। इस मोक्ष मार्ग के अलावा अन्य कोई दूसरा मार्ग नहीं है, निर्वाण प्राप्ति के लिए सबसे पहले श्रद्धा, मार्ग के फल की प्रति होनी चाहिए। बाल और आसक्त लोगों के द्वारा जो धर्म की, धर्मात्माओं के द्वारा निंदा, दोष, गंदगी पैदा हो जाती है, उसका जो प्रमार्जन करता है उसके दोषों को छिपाना, गुणों को ग्रहण करना उपगूहण अंग है। संध्या आरती का सौभाग्य जितेन्द्र कुमार छाबड़ा सीए की बहनों को प्राप्त हुआ।</p>
<p><strong>इन्हें मिला सौभाग्य</strong></p>
<p>आश्विन शुक्ल अष्टमी तिथि को जैन धर्म के दसवें तीर्थंकर शीतलनाथ भगवान के मोक्ष कल्याणक के उपलक्ष्य में निर्वाण लाडू समर्पित करने का सौभाग्य कान्ति कुमार, विकास कुमार गंगवाल परिवार को मिला। पाद प्रक्षालन करने का सौभाग्य धर्मचन्द राजकुमार, बबिता अजमेरा को मिला। शास्त्र भेंट करने का सौभाग्य महेन्द्र कुमार, मनीष कुमार, राकेश कुमार छाबड़ा परिवार को मिला।</p>
<p><strong>धार्मिक कार्यक्रम होंगे</strong></p>
<p>सोमवार को विधान के अंतिम दिन 1024 अर्घ्य समर्पित किए जाएंगे। विधान पूजन के उपरान्त विश्व शांति की कामना के लिए महायज्ञ (हवन )किया जाएगा। वहीं आगामी 24 अक्टूबर को आर्यिका माताजी संघ की 9 आर्यिका माताजी के दीक्षा अवतरण पर प्रातः काल से ही अनेक कार्यक्रम आयोजित होंगे।</p>
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		<title>चातुर्मासिक धर्मसभा में प्रवचन : धर्म तत्त्व को जीवन में अंगीकार करने से ही उन्नति का मार्ग मिलता है- आर्यिका विभाश्री </title>
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		<pubDate>Sun, 06 Aug 2023 12:29:06 +0000</pubDate>
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<p><strong>गणिनी आर्यिका विभाश्री माताजी ने अपने प्रवचन में कहा कि हमारे परिणामों में इतनी शांति होनी चाहिये कि कितना भी क्रोधी व्यक्ति हमारे आभामण्डल में आ जाये तो वह भी शांति को प्राप्त हो जाये। तत्व ज्ञान के बिना जीवन शून्य के समान है। <span style="color: #ff0000;">पढ़िए राकेश कासलीवाल की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>रांची।</strong> वासुपूज्य जिनालय के प्रांगण में गणिनी आर्यिका विभाश्री माताजी ने अपने प्रवचन में कहा कि हमारे परिणामों में इतनी शांति होनी चाहिये कि कितना भी क्रोधी व्यक्ति हमारे आभामण्डल में आ जाये तो वह भी शांति को प्राप्त हो जाये। तत्व ज्ञान के बिना जीवन शून्य के समान है। जिसे तत्व ज्ञान हो जाता है, वह स्व और पर का भेद समझ जाता है। जीवन में राग व द्वेष ही हमारी प्रगति की राह में बाधक बनते हैं, इन्हें हटाना जरूरी है। ज्ञान का संवेदन करने पर गुणों का भान होने लगता है। जब तत्व ज्ञान होता है, तब यह संसार माया जाल दिखता है। तब उसको वन और भवन एक समान दिखाई देते हैं। चाहे उसे सुख मिले या दुख के दिन आएं, वह दोनों स्थिति में समता भाव धारण करता है। उसको शत्रु और मित्र एक समान दिखते हैं। वह शत्रु से बिछड़ने में मित्र से मिलने में भी सुख का अनुभव नहीं करता और शत्रु से मिलने और मित्र से बिछुड़ने में दुख का अनुभव भी नहीं करता है। जब आत्म ज्ञान हो जाता है तो संसार की घर संपत्ति मकान, सब जीर्ण तृण के समान लगने लगते हैं। आज आपका सुख दुख दूसरों के हाथ में है, जरा सी प्रशंसा किसी ने कर दी बस आप फूले नहीं समाते हैं। अगर कोई निन्दा करता है तो आप दुखी हो जाते हैं।</p>
<p><strong>संसार में कोई अजर-अमर नहीं</strong></p>
<p>पूज्य माताजी ने कहा कि सभी को एक दिन जाना है। इस संसार में अजर &#8211; अमर स्थायी होकर कोई नहीं आया है, जिस प्रकार फूल प्रातः काल खिलते है और संध्या को मुरझा जाते है। सूर्य प्रातः काल उदित होता है, संध्या को अस्त हो जाता है, उसी प्रकार जीवन रूपी फूल, जीवन रूपी सूर्य कभी भी मुरझा सकता है, कभी भी अस्त हो सकता है। जीवन अस्त हो इससे पहले जीवन में कुछ अच्छा कार्य कर लो, अतः जीवन को सही तरीके से जीने का प्रयास करना चाहिये।</p>
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		<title>चातुर्मासिक धर्मसभा में प्रवचन : किसी के उपकार को मानना हमारे बड़प्पन का द्योतक है &#8211; आर्यिका विभाश्री  </title>
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		<pubDate>Sat, 05 Aug 2023 07:50:17 +0000</pubDate>
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</blockquote>
<p><strong> आर्यिका विभाश्री माताजी ने अपने प्रवचन में कहा कि जब कोई किसी के उपकार को मानता है तो वो जीवन में बहुत ऊचाइयों को प्राप्त कर लेता है, चाहे वह गुरुओं का उपकार हो या माता पिता का। प्रेम और घृणा, उपकार और अपकार भी हमारे जीवन के अनिवार्य अंश हैं। जीवन में उपकार की प्रवृत्ति का अत्यंत महत्व है। <span style="color: #ff0000;">पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>रांची।</strong> वासुपूज्य जिनालय के प्रांगण में गणिनी आर्यिका विभाश्री माताजी ने अपने प्रवचन में कहा कि जब कोई किसी के उपकार को मानता है तो वो जीवन में बहुत ऊचाइयों को प्राप्त कर लेता है, चाहे वह गुरुओं का उपकार हो या माता पिता का। प्रेम और घृणा, उपकार और अपकार भी हमारे जीवन के अनिवार्य अंश हैं। जीवन में उपकार की प्रवृत्ति का अत्यंत महत्व है। दया, प्रेम, करुणा हमारी मूल प्रवृत्तियां हैं। इन्हीं से उपकार की भावना जागृत होती है।</p>
<p>उपकार करने से व्यक्ति श्रेष्ठ बनता है। किसी आपदा में पड़े व्यक्ति का आप उपकार करके देखें। उसका तो कल्याण होगा ही, किंतु इससे आपका मन प्रसन्नता से भर जाएगा। जिस शिष्य के अंदर अहंकार होता है, वह गुरु के उपकार को स्वीकार नहीं करेगा, वैसे ही माता &#8211; पिता का बच्चों पर बहुत बड़ा उपकार होता है। माता-पिता ने तुम्हें जन्म दिया, उंगली पकड़कर चलना सिखाया, पढ़ा-लिखा कर बड़ा कर दिया लेकिन जो बच्चे अपने माता-पिता का उपकार मानते हैं, वे हमेशा अपने माता-पिता के प्रति कृतज्ञ रहते हैं।</p>
<p>उपकार का बदला पैसे से नहीं चुकाया जा सकता है लेकिन आजकल की संतानें तो माता-पिता का उपकार तक नहीं मानती हैं। वे कहते हैं कि मैंने योग्यता से पढ़ाई करके बड़ी-बड़ी उपाधियां प्राप्त की हैं। इसमें आपने क्या किया है और आपने जितने पैसे मेरी पढ़ाई में खर्च किये उतने आप मुझसे ले लो। अगर किसी ने कोई अपराध किया और वह उसे क्षमा कर दे यह बहुत कठिन है। अगर बहू सास को दस बातें सुना दे और बाद में क्षमा मांगने लगे तो क्षमा करना बहुत कठिन है। क्षमा मांगने से ज्यादा क्षमा करना कठिन है।</p>
<p>जिन्होंने भी क्षमा का सहारा लिया, वे महान बन गये। क्षमा का प्रकाश जिनके जीवन में आ जाता है, उनके जीवन में क्रोध का अन्धकार तिरोहित हो जाता है। क्रोध के परमाणु कड़वे होते हैं और क्षमा के परमाणु मीठे होते हैं ।</p>
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		<title>चातुर्मासिक धर्मसभा में प्रवचन : कर्तव्यों का सम्यक निवर्हन ही सच्चा धर्म है- आर्यिका विभाश्री </title>
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		<pubDate>Wed, 02 Aug 2023 13:40:22 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[श्री दिगम्बर जैन वासुपूज्य जिनालय के प्रांगण में जैन संत गणिनी आर्यिका विभाश्री माताजी ने अपने प्रवचन में कहा कि कर्तव्यों का पालन करने से धर्म का निर्वाह स्वयं हो जायेगा, क्योंकि मनुष्य का असली धर्म कर्तव्यों का निष्ठा के साथ पालन करना है। पढ़िए राजकुमार अजमेरा की रिपोर्ट&#8230; रांची। श्री दिगम्बर जैन वासुपूज्य जिनालय [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>श्री दिगम्बर जैन वासुपूज्य जिनालय के प्रांगण में जैन संत गणिनी आर्यिका विभाश्री माताजी ने अपने प्रवचन में कहा कि कर्तव्यों का पालन करने से धर्म का निर्वाह स्वयं हो जायेगा, क्योंकि मनुष्य का असली धर्म कर्तव्यों का निष्ठा के साथ पालन करना है। पढ़िए राजकुमार अजमेरा की रिपोर्ट&#8230;</strong></p>
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<p><strong>रांची।</strong> श्री दिगम्बर जैन वासुपूज्य जिनालय के प्रांगण में जैन संत गणिनी आर्यिका विभाश्री माताजी ने अपने प्रवचन में कहा कि कर्तव्यों का पालन करने से धर्म का निर्वाह स्वयं हो जायेगा, क्योंकि मनुष्य का असली धर्म कर्तव्यों का निष्ठा के साथ पालन करना है। आचार्य नेमिचन्द्र सिद्धान्त चक्रवर्ती ने गोम्मटसार जीवकाण्ड में बताया है कि सबसे पहले आप अपने कर्तव्यों का निर्वाह नहीं करोगे और मंदिर में जाकर पूजन करने लगोगे तो आपकी गृहस्थी नहीं चल सकती।अगर आपने शादी की तो पत्नी, बच्चे का पालन-पोषण करना आपका कर्तव्य है।</p>
<p>यदि आप बहू हैं तो आपका कर्तव्य है कि परिवार के लिए भोजन बनाकर देना, स्त्री की प्रशंसा भोजन एवं गृहकार्य से ही होती है। आजकल महिलाओं के लिए सबसे कठिन काम है भोजन बनाना, जब आप चौके में भोजन नहीं बनाओगी तो अपना पेट कैसे भरोगी। सास का कर्तव्य है कि वह बहू को ज्यादा पाबंदी में न रखे। पिता का कर्तव्य है अपने पुत्र को पढ़ाना-लिखाना योग्य &#8211; बनाना। हम घर गृहस्थी में रहते हैं तो हमारा शरीर के प्रति, संबंधों के प्रति, संपत्ति के प्रति क्या कर्तव्य है, यह जानना अधिक आवश्यक है।</p>
<p><strong>जो अनिष्ट है, उसका त्याग करो</strong></p>
<p>सेवन करने के योग्य कौन सी वस्तु है और कौन सी वस्तु नहीं है, क्या खाना चाहिए, क्या नहीं खाना चाहिए इसके लिए आचार्य समन्तभद्र स्वामी ने बताया है कि जो आपके लिए अनिष्ट है, उसका त्याग करो। हम दो चीज को देखें एक शरीर और दूसरी आत्मा। आपके शरीर के लिए क्या &#8211; क्या अनिष्ट है, स्वास्थ्य के लिए क्या हानिकारक है, विचार करें अच्छे लेख आलेखों से, मोबाइल से नुस्खे देख लें तो समझ में आयेगा कि क्या खाना चाहिए, क्या नहीं खाना चाहिए। जितने भी ऐलोपैथिक डॉक्टर हैं, आयुर्वेदिक डाक्टर हैं, होम्योपैथिक डॉक्टर हैं, उनसे आप पूछोगे तो वो यही कहेंगे कि रात को 8 बजे खाना खाना यह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। सोने के चार घंटे पहले भोजन करना चाहिए, ब्रह्ममुहूर्त में उठना चाहिए। मद्य, मांस, शराब, पंचउदम्बर (बड़, पीपल, ऊमर, कठुमर, अंजीर) आपके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है, इनका सेवन करने से बचना चाहिए, इनका सेवन करना अयोग्य है।</p>
<p><strong>कोडरमा मीडिया प्रभारी जैन राज कुमार अजमेरा</strong></p>
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		<title>चातुर्मासिक धर्मसभा में प्रवचन : संसार में भगवान की भक्ति से बढ़कर कोई दूसरी कल्याणकारी वस्तु नहीं है &#8211; आर्यिका विभाश्री </title>
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		<pubDate>Wed, 02 Aug 2023 13:31:41 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[वासुपूज्य जिनालय के प्रांगण में गणिनी आर्यिका विभाश्री माताजी ने अपने प्रवचन में कहा कि गुरु की आराधना, संतों की संगति, जिनवाणी का श्रवण, हमारे जीवन की दशा और दिशा दोनों को ही बदल देती है। जैसे हमारे परिणामों में विशुद्धि बने वैसे वातावरण में रहने का प्रयास करना चाहिए। पढ़िए राकेश कासलीवाल की रिपोर्ट&#8230; [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>वासुपूज्य जिनालय के प्रांगण में गणिनी आर्यिका विभाश्री माताजी ने अपने प्रवचन में कहा कि गुरु की आराधना, संतों की संगति, जिनवाणी का श्रवण, हमारे जीवन की दशा और दिशा दोनों को ही बदल देती है। जैसे हमारे परिणामों में विशुद्धि बने वैसे वातावरण में रहने का प्रयास करना चाहिए। <span style="color: #ff0000;">पढ़िए राकेश कासलीवाल की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>रांची।</strong> वासुपूज्य जिनालय के प्रांगण में गणिनी आर्यिका विभाश्री माताजी ने अपने प्रवचन में कहा कि एक बार लंकाधिपति रावण भगवान की भक्ति में लीन था। उसकी भक्ति को देखकर स्वर्ग के देव नागेन्द्र बहुत ही प्रसन्न हुए। नागेन्द्र रावण के पास आकर बोले- हे, रावण तुमने बहुत सुन्दर रोमांचक भजन गाया है, मैं तुम्हें कुछ भेंट स्वरूप देना चाहता हूं, बोलो तुम्हें क्या चाहिए। रावण नागेन्द्र से कहता है कि जिनेन्द्र भगवान की स्तुति से बढ़कर यदि कोई दूसरी वस्तु है तो वो मुझे प्रदान करें। नागेन्द्र कहते हैं कि इस संसार में भगवान की भक्ति से बढ़कर कोई दूसरी कल्याणकारी वस्तु नहीं है।</p>
<p>भगवान की भक्ति से, आराधना से हमारे पूर्व जन्म के सम्पूर्ण पापकर्मों का बंध होता है, वे पाप कर्म क्षय को प्राप्त होते है और पुण्य कर्म का बंध होता है, विघ्न दूर होते हैं। विष निर्विष हो जाता है, भूत-प्रेत, पिशाच जो भी परेशान कर रहे हैं, वे सब भगवान की पूजा भक्ति से दूर हो जाते हैं।</p>
<p><strong>हमेशा भगवान की भक्ति करें</strong></p>
<p>पूज्य माता जी ने बताया कि गुरु की आराधना, संतों की संगति, जिनवाणी का श्रवण, हमारे जीवन की दशा और दिशा दोनों को ही बदल देती है। जैसे हमारे परिणामों में विशुद्धि बने वैसे वातावरण में रहने का प्रयास करना चाहिए। मंदिर का वातावरण, गुरुजनों की सभा का वातावरण कभी विषाक्त नहीं बनाना चाहिए, संसार में ऐसी कोई भी वस्तु नहीं है जो भगवान की भक्ति से प्राप्त नहीं हो सकती। इसीलिए हमेशा भगवान की भक्ति करते रहना चाहिए l</p>
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		<title>चातुर्मासिक धर्मसभा में प्रवचन : इच्छा और तृष्णा से बचने की एक मात्र औषधि है संतोष &#8211; आर्यिका विभाश्री </title>
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		<pubDate>Mon, 31 Jul 2023 08:41:43 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[वासुपूज्य जिनालय के प्रांगण में गणिनी आर्यिका विभाश्री माताजी ने अपने प्रवचन में कहा कि छोटे को देखकर जिओ क्योंकि छोटे को देखकर जीवन में सुख और शांति बनी रहेगी और बड़ों को देखकर बढ़ो, अच्छे के लिए हमेशा प्रयत्न करो और बुरे को सहन करने के लिए तैयार रहो। पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट&#8230; रांची। [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>वासुपूज्य जिनालय के प्रांगण में गणिनी आर्यिका विभाश्री माताजी ने अपने प्रवचन में कहा कि छोटे को देखकर जिओ क्योंकि छोटे को देखकर जीवन में सुख और शांति बनी रहेगी और बड़ों को देखकर बढ़ो, अच्छे के लिए हमेशा प्रयत्न करो और बुरे को सहन करने के लिए तैयार रहो। <span style="color: #ff0000;">पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>रांची।</strong> वासुपूज्य जिनालय के प्रांगण में गणिनी आर्यिका विभाश्री माताजी ने अपने प्रवचन में कहा कि जो संसार विषय सुख होता, तीर्थंकर क्यों त्यागे। जब संसार में सुख ही था, तो तीर्थंकर ने क्यों त्यागा। यद्यपि संसार में सुख नहीं है लेकिन हम जितने दुःखी हो रहे हैं, उतना दुख भी नहीं है। हम कैसे अपनी जीवन शैली को महान बनाएं, कैसे हम सुख और शांति के साथ अपने जीवन को जी सकें, कुछ महापुरुषों ने अपने जीवन का अनुभव और इसकी प्रेरणा दी है।</p>
<p>इन प्रेरणाओं को पाकर हम अपने जीवन को सुख-शांति से जी सकते हैं और अपने जीवन को महान बना सकते हैं। छोटे को देखकर जिओ क्योंकि छोटे को देखकर जीवन में सुख और शांति बनी रहेगी और बड़ों को देखकर बढ़ो, अच्छे के लिए हमेशा प्रयत्न करो और बुरे को सहन करने के लिए तैयार रहो, सबसे पहली बात है इंसान के जीवन की सबसे बड़ी समस्या है कि जब-जब उसने अपने से बड़ों को देखा, तब -तब वह असंतुष्ट और दुखी हो गया। उसे अपने दुख से ज्यादा दुसरे की सुख की चिंता होने लगी। नीति कहती है कि जिस दिन आप छोटों को देखकर जीना सीख जाओगे तो आप अपने आप सुखी हो जाओगे लेकिन जब-जब बड़ों को देखकर जिओगे, तब-तब आप महत्वाकांक्षाओं से भर जाओगे और असंतोष का जन्म होगा।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-49951" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/07/IMG-20230731-WA0015.jpg" alt="" width="576" height="1280" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/07/IMG-20230731-WA0015.jpg 576w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/07/IMG-20230731-WA0015-135x300.jpg 135w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/07/IMG-20230731-WA0015-461x1024.jpg 461w" sizes="auto, (max-width: 576px) 100vw, 576px" /></p>
<p><strong>जैसे हो, वैसे होने में ही है सुख </strong></p>
<p>पू्ज्य माताश्री ने कहा कि जो काम सुई कर सकती है, वह काम तलवार नही कर सकती और जिस दिन आप छोटों को देखकर जिओगे तो खुद आप सुखी हो जाओगे और अगर हम अपने से नीचे वाले को देखते हैं तो लगता है कि हम सबसे सुखी हैं और हमारी चाहत यहीं तक है। सुख कहीं मिलेगा, इस भ्रांति का नाम संसार है। सुख अभी है, यहीं है, इस बोध का नाम निर्वाण है। सुख किसी से मिलेगा, इस भ्रांति का नाम संसार है। सुख अपना स्वभाव है, इस जागृति का नाम मोक्ष है।</p>
<p>सुख के लिए कोई परिस्थिति चाहिए, कोई शर्त पूरी करनी पड़ेगी, इस आपाधापी का नाम संसार है। सुख है ही, तुम जैसे हो वैसे होने में सुख है। सुख से तुम कभी च्युत ही नहीं हुए, सुख से ही तुम निर्मित हो। सुख को मांगने में भूल है, सुख को भोगने में सुख है। इस संसार में जितना मिला, उतना भोगा पर कभी तृप्ति नहीं मिली। यह संसार भी भला कभी तृप्त होने वाला है। संसार के साधनों के प्रति किया जाने वाला प्रेम ऐसा ही है, जिसे पाने के बाद और कुछ नया पाने की इच्छा उमड़ती है।</p>
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		<title>चातुर्मासिक धर्मसभा में दिए प्रवचन :  महत्वाकांक्षा की कीमत पर मनुष्यता सदैव हारी है &#8211; आर्यिका विभाश्री </title>
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		<pubDate>Sat, 29 Jul 2023 13:20:44 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[वासुपूज्य जिनालय के प्रांगण में गणिनी आर्यिका विभाश्री माताजी ने अपने प्रवचन में कहा कि आज के समय में हर व्यक्ति दुःख से ग्रसित है और उसके दुःख का कारण उसकी स्वयं की महत्वाकांक्षाएं हैं। इच्छाओं का कोई अंत नहीं होता, एक के पूरा होते ही दूसरी इच्छा जन्म ले लेती है। पढ़िए यह विशेष [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>वासुपूज्य जिनालय के प्रांगण में गणिनी आर्यिका विभाश्री माताजी ने अपने प्रवचन में कहा कि आज के समय में हर व्यक्ति दुःख से ग्रसित है और उसके दुःख का कारण उसकी स्वयं की महत्वाकांक्षाएं हैं। इच्छाओं का कोई अंत नहीं होता, एक के पूरा होते ही दूसरी इच्छा जन्म ले लेती है।<span style="color: #ff0000;"> पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>रांची।</strong> वासुपूज्य जिनालय के प्रांगण में गणिनी आर्यिका विभाश्री माताजी ने अपने प्रवचन में कहा कि आज के समय में हर व्यक्ति दुःख से ग्रसित है और उसके दुःख का कारण उसकी स्वयं की महत्वाकांक्षाएं हैं। इच्छाओं का कोई अंत नहीं होता, एक के पूरा होते ही दूसरी इच्छा जन्म ले लेती है। इच्छा, कामना, लालसा महत्वाकांक्षा ये सब ही तृष्णा के पर्यायवाची हैं। इन्हीं कारणों से व्यक्ति अनीति और अधर्म के मार्ग को अपनाता है। प्रत्येक व्यक्ति अपने आप को विशेष समझता है।</p>
<p>पंचमकाल में व्यक्ति और चालाक होते जाएंगे और जितने ज्यादा चालाक होते जाएंगे, उतने ज्यादा दुखी रहेंगे। प्रत्येक व्यक्ति अपने आप को अपनी सीमा से ज्यादा होशियार समझता है। जितनी तीव्र कषाएं होंगी, व्यक्ति उतना ज्यादा पीड़ाओं से ग्रसित होता जाएगा। किसी से नाराज होने की जरूरत नहीं है। जब तक हमारे अंदर सरलता और सहजता नहीं आएगी, तब तक हमारे सुख के रास्ते खुलने वाले नहीं है।</p>
<p><strong>किसी से बैर &#8211; भाव नहीं बांधना चाहिए</strong></p>
<p>उन्होंने कहा कि इस संसार में कोई किसी को कुछ नहीं देता है। जो भी मेरा अच्छा &#8211; बुरा हो रहा हो वह मेरे ही पूर्व में किए गए कर्मों का फल है। यदि कोई मेरे लिये अच्छा कर रहा है तो ये मेरे पुण्य का फल है और यदि कोई मेरा बुरा कर रहा है तो ये मेरे ही पाप का फल है। किसी से नाराज होने की जरूरत नहीं, किसी से राग -द्वेष करने की जरूरत नहीं, द्वेष करने से हमारी दुर्गति ही होती है।</p>
<p>किसी से बैर &#8211; भाव नहीं बांधना चाहिये। दुर्जनों की सम्पत्ति दुर्गण हुआ करते हैं क्योंकि दुर्जन दुर्गण को ग्रहण करते हैं और सज्जन व्यक्ति दूसरों के गुणों को ग्रहण करते हैं और सज्जन व्यक्ति दूसरों के गुणों की कथाएं कहा करते हैं। हम जब अपनी हजारों गलतियों को माफ करके अपने से प्रेम कर सकते हैं तो क्या हम दूसरों की गलतियों को क्षमा करके उनसे प्रेम नहीं कर सकते। अपनी गलतियों को राई के समान मानते हैं और दूसरों की गलतियों को पहाड़ के समान मान लेते हैं। पर निन्दा करना, अपनी प्रशंसा करना नीच गोत्र के आश्रव का कारण है।</p>
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