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	<title>आर्यिका विकुंदन श्री &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<title>आर्यिका विकुंदन श्री &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>बड़वानी में आर्यिका विकुंदन श्री के सानिध्य में पर्यूषण पर्व की धूम – आर्जव धर्म पर विशेष उपदेश : दस लक्षण पर्व पर सरलता और मन वचन काय के मेल से आर्जव धर्म का महत्व समझाया </title>
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		<pubDate>Sat, 30 Aug 2025 18:28:12 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[बड़वानी में 30 सितंबर भद्र शुक्ल सप्तमी को पर्यूषण पर्व के तीसरे दिन उत्तम आर्जव धर्म के रूप में मनाया गया। आर्यिका विकुंदन श्री माताजी ने धर्म सभा में आर्जव धर्म के महत्व और सरलता की आवश्यकता पर विस्तृत उपदेश दिए। उन्होंने बताया कि मन, वचन और काय का एक होना आर्जव धर्म है। साधु [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>बड़वानी में 30 सितंबर भद्र शुक्ल सप्तमी को पर्यूषण पर्व के तीसरे दिन उत्तम आर्जव धर्म के रूप में मनाया गया। आर्यिका विकुंदन श्री माताजी ने धर्म सभा में आर्जव धर्म के महत्व और सरलता की आवश्यकता पर विस्तृत उपदेश दिए। उन्होंने बताया कि मन, वचन और काय का एक होना आर्जव धर्म है। साधु और महापुरुष सरलता और सच्चाई के प्रतीक होते हैं। <span style="color: #ff0000">पढ़िए पूरी रिपोर्ट…</span></strong></p>
<hr />
<p>बड़वानी में 30 सितंबर भद्र शुक्ल सप्तमी को जैन धर्म के पर्यूषण पर्व के तीसरे दिन उत्तम आर्जव धर्म के रूप में मनाया गया। नगर में विराजित राष्ट्र संत गणाचार्य विराग सागर जी महाराज की शिष्या, श्रमणि विदुषी आर्यिका विकुंदन श्री माताजी ससंघ के सानिध्य में इस पर्व का आयोजन बड़ी ही भक्ति और धूमधाम के साथ संपन्न हुआ। आज प्रातः भगवान के अभिषेक, शांतिधारा और आरती पाण्डुक शीला पर संपन्न हुई। इसके पश्चात नित्य नियम की पूजन, दस लक्षण और सोलह कारण जी की पूजन की गई। आर्यिका विकुंदन श्री माताजी ने धर्म सभा को संबोधित करते हुए आर्जव धर्म पर उपदेश दिया। माताजी ने बताया कि आर्जव का अर्थ है सीधे बनो, सरल बनो और मन वचन काय से एक बनो। जो व्यक्ति अपने दोषों को नहीं छुपाता और किसी के प्रति कुटिल विचार नहीं रखता, वही आर्जव धर्म का पालन करता है।</p>
<p><strong>बालक सीखता है वही बोलता है </strong></p>
<p>उन्होंने उदाहरण देकर समझाया कि साधु मन, वचन और काय से सरल होते हैं, जैसे बांसुरी जब बजती है तो मधुर और सीधी होती है। वहीं सांप टेढ़ा चलता है पर जब बिल में जाता है तो सीधे प्रवेश करता है। इसी प्रकार, एक बालक निष्छल होता है और जो सीखता है वही बोलता है।</p>
<p><strong>सरलता और सीधा विचार सिखाया जाए</strong></p>
<p>माताजी ने पूज्य आचार्य श्री विराग सागर जी के दृष्टांत साझा किए कि क्षुल्लक अवस्था में उन्होंने रसी का त्याग कर आहार में केला और सेवफल लिया और गुरु आचार्य सन्मति सागर जी को ईर्या पथ प्रतिक्रमण में बताया। गुरु महाराज ने गलती मालूम होने पर प्रायश्चित लिया। माताजी ने कहा कि माता अपने बच्चों को महावीर बना सकती है यदि उन्हें सरलता और सीधा विचार सिखाया जाए। जब तक मन में सरलता और सीधा भाव नहीं आएगा, व्यक्ति अपने लक्ष्य तक नहीं पहुंच सकता और संसार में भ्रमित रहेगा।</p>
<p><strong>गोली का घाव भरता बोली का घाव नहीं भरता</strong></p>
<p>आचार्य भगवंत का उपदेश है कि हमेशा झुकने का भाव रखें और संतों के प्रवचन को पहले अपने जीवन में उतारें। सरलता और आर्जव धर्म का परिणाम यह होता है कि व्यक्ति जीवन में सच्चाई और ईमानदारी अपनाता है। उन्होंने कहा कि गोली का घाव भर जाता है, पर बोली का घाव नहीं भरता, अतः हितकारी, मित्रवत और प्रिय वचन बोलें और हमेशा झुकने का भाव रखें।</p>
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		<title>विमलचंद काला ने किया देह परिवर्तन: क्षुल्लक दीक्षा के बाद दिया गया था विश्व उत्तीर्ण सागर नाम  </title>
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		<pubDate>Fri, 29 Aug 2025 09:04:47 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[बड़वानी में क्षुल्लक दीक्षा उपरांत क्षुल्लक श्री विश्वउत्तीर्ण सागर जी महाराज ने सभी से क्षमा याचना कर णमोकार मंत्र सुनते हुए देह परिवर्तन किया। उनका डोला शुक्रवार सुबह 6 बजे निकाला गया। यह संल्लेखना आर्यिका विकुंदन श्री के सानिध्य में हुई। धामनोद से पढ़िए, दीपक प्रदान की यह खबर&#8230; धामनोद। बड़वानी में क्षुल्लक दीक्षा उपरांत [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>बड़वानी में क्षुल्लक दीक्षा उपरांत क्षुल्लक श्री विश्वउत्तीर्ण सागर जी महाराज ने सभी से क्षमा याचना कर णमोकार मंत्र सुनते हुए देह परिवर्तन किया। उनका डोला शुक्रवार सुबह 6 बजे निकाला गया। यह संल्लेखना आर्यिका विकुंदन श्री के सानिध्य में हुई। <span style="color: #ff0000">धामनोद से पढ़िए, दीपक प्रदान की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>धामनोद।</strong> बड़वानी में क्षुल्लक दीक्षा उपरांत क्षुल्लक श्री विश्वउत्तीर्ण सागर जी महाराज ने सभी से क्षमा याचना कर णमोकार मंत्र सुनते हुए देह परिवर्तन किया। उनका डोला शुक्रवार सुबह 6 बजे निकाला गया। यह संल्लेखना आर्यिका विकुंदन श्री के सानिध्य में हुई। मनीष जैन ने बताया कि गांगली वाले काला परिवार के सबसे छोटे भाई विमलचंद काला जो सात तलाई में निवासरत थे। उनका स्वास्थ्य खराब होने से शुक्रवार को बड़वानी में विराजित आर्यिका मां विकुंदन श्री और बावनगजा जी दर्शनार्थ आए थे। पूरे सचेत अवस्था में माताजी के समक्ष सभी से क्षमा याचना की और पूरे परिवार ने उन्हें क्षुल्लक दीक्षा की स्वीकृति प्रदान की।</p>
<p>तब पूज्य माताजी ने आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी, श्रमण मुनि विवर्धन सागर जी, आर्यिका क्षमा श्री से आशीर्वाद प्राप्तकर क्षुल्लक दीक्षा प्रदान की और क्षुल्लक श्री विश्व उत्तीर्ण सागर जी नामकरण किया गया। उन्होंने पूरे समाज के समक्ष प्रतिक्रमण और नमोकार मंत्र सुनते हुए बड़े ही शांत रूप में अपनी देह त्याग दी। जिनका डोला 29 अगस्त को प्रातः 6 बजे फूलीबाई जैन धर्मशाला से निकाला गया। इसमें बड़ी संख्या में समाजजन उपस्थित हुए।</p>
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		<title>अंतर्मन से क्षमा भाव नहीं आया तो क्षमा धर्म मानना व्यर्थ : आर्यिका विकुंदन श्री के सानिध्य में अभिषेक शांतिधारा की  </title>
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		<pubDate>Thu, 28 Aug 2025 09:01:19 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आर्यिका माताजी ने जैन धर्म के दस लक्षण पर्व के प्रथम दिन बड़वानी के दिगंबर जैन मंदिर में दस लक्षण धर्म के उत्तम क्षमा पर प्रवचन दिए। उन्होंने कहा कि यदि इंसान के अंतर्मन से क्षमा का भाव नहीं आया तो क्षमा धर्म मनाना व्यर्थ है। धामनोद बड़वानी से पढ़िए, दीपक प्रधान की यह खबर&#8230; [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आर्यिका माताजी ने जैन धर्म के दस लक्षण पर्व के प्रथम दिन बड़वानी के दिगंबर जैन मंदिर में दस लक्षण धर्म के उत्तम क्षमा पर प्रवचन दिए। उन्होंने कहा कि यदि इंसान के अंतर्मन से क्षमा का भाव नहीं आया तो क्षमा धर्म मनाना व्यर्थ है। <span style="color: #ff0000">धामनोद बड़वानी से पढ़िए, दीपक प्रधान की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong> धामनोद / बड़वानी।</strong> यदि इंसान के अंतर्मन से क्षमा का भाव नहीं आया तो क्षमा धर्म मनाना व्यर्थ है। उपरोक्त उद्गार बड़वानी में विराजित आर्यिका मां विकुंदन श्री ने उत्तम क्षमा धर्म पर धर्मसभा में दिए। आर्यिका माताजी ने जैन धर्म के दस लक्षण पर्व के प्रथम दिन स्थानीय दिगंबर जैन मंदिर में दस लक्षण धर्म के उत्तम क्षमा पर प्रवचन दिए। उन्होंने आगे बताया कि करोड़ों पूजा के बराबर एक स्तोत्र होता है। करोड़ों स्तोत्र के बराबर एक जाप होता है। करोड़ों जाप के बराबर एक ध्यान होता है और करोड़ों ध्यान के बराबर एक बार की गई क्षमा होती है। क्रोध के निमित्त के मालूम होने पर क्षमा का पालन करे तो क्षमा धर्म मनाना सार्थक है। माताजी ने बताया कि दस धर्मों में सबसे प्रथम उत्तम क्षमा धर्म आया है। अनादि के संस्कार सभी प्राणियों में रहते हैं और क्षमा धर्म को धारण करना ही उत्तम क्षमा धर्म है। आचार्य कुंदकुंद स्वामी ने बहुत अच्छी गाथा में कहा कि क्रोध की उत्पत्ति का कारण क्या है क्रोध का यद्यपि कोई साक्षात् कारण विद्यमान हो तो कुछ भी क्रोध परिणाम नहीं करता।</p>
<p><strong>हित, मीत और प्रिय वाणी का उपयोग करें </strong></p>
<p>आचार्य कहते है कि क्रोध एक ज्वालामुखी है। एक विस्फोटक पदार्थ है। क्रोध बाहर आकर अग्नि को धारण कर लेता है और हमें जला देता है। क्रोध से धैर्य का नाश होता है हमारा जीवन भी नाश हो जाता है। श्रुत का भी नाश होता है। हमारा जीवन भी नाश हो जाता है क्रोध जब आता है तब वो कुछ भी नहीं देखता और अपने पूरे जीवन का सर्वनाश कर लेता है। क्रोध के समान हमारा कोई शत्रु नहीं है। इच्छाओं की पूर्ति ना होना भी क्रोध का कारण है। हित, मीत और प्रिय वाणी का उपयोग करना चाहिए। क्रोध के दूसरे कारण आचार्य बताते है के जब मन शांत नहीं होता तब भी क्रोध आता है, तन में शक्ति नहीं होती तब भी क्रोध आता है,जब हमारे मन की नहीं होती तब भी क्रोध आता है और क्रोध के दुष्परिणाम से व्यक्ति अपना मान, सम्मान परिवार किसी की भी परवाह नहीं करता और हमें जब भी दो मिनट भी क्रोध आता है तो वो हमारी 6 घंटे की ऊर्जा नष्ट कर देता है। हम क्रोध में आकर कुछ भी कर लेते है और उसके परिणाम अच्छे नहीं होते।</p>
<p><strong>क्षमा तो वीरों का आभूषण है</strong></p>
<p>क्रोध 4 प्रकार के होते है। अनंतानुबंधी यह पत्थर की लकीर की तरह होते हैं। जैसे क्रोध में कमठ ने 10 भव तक भगवान पार्श्वनाथ पर उपसर्ग किया किंतु भगवान ने उस पर क्षमा का भाव ही रखा। अप्रत्याखान, धरती में दरार की तरह जो कि एक बार आए और वापस भर जाए ये कषाय 6 माह तक रहती है। प्रत्याखान ये धूल की लकीर की तरह होती है। जैसे ही हवा चलती है मिट जाती है। स्वतः जलन ये पानी में लकीर की तरह होती है और ये कषाय मुनिराज को होती है। जो तत्काल समाप्त हो जाती है और क्षमा तो वीरों का आभूषण है। जिसने क्षमा को जीवन में धार लिया वो जीवन से तर गया और वो भगवान से यही मांगेगा मेरा किसी से वैर नहीं है सबके प्रति क्षमा भाव है। इसके पूर्व आर्यिका माताजी का ससंघ धूमधाम से मंदिर आगमन हुआ और माताजी के सानिध्य में भगवान के पांडुक शीला पर अभिषेक, शांतिधारा, आरती नित्य नियम का पूजन, दस लक्षण, उत्तम क्षमा धर्म और सोलह कारण जी का पूजन विधान हुआ और दोपहर में माताजी के सानिध्य में तत्वार्थ सूत्र का वाचन शाम को प्रतिक्रमण भगवान की आरती की। लाडो दीदी के प्रवचन हुए एवं धार्मिक प्रतियोगिता आयोजित की गई। जिसमें समाज के युवा, महिला, पुरुष, बच्चे आदि उपस्थित थे।</p>
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