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	<title>आमेर &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<title>आमेर &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>राजस्थान के जैन संत 20 मुनिश्री महनंदी की रचनाओं में भाषा उच्चकोटि की और शुद्ध और सुपाठ्य भी: कवि ने छोटे-छोटे दोहों में सुंदर भावों को भरा है </title>
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		<pubDate>Mon, 17 Mar 2025 00:30:50 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[भारत के संक्रमण काल में राजस्थान के जैन संतों ने देश के जीवन को सदा उच्च बनाए रख। यहां की संस्कृति और साहित्य को विनाश होने से बचाया। ऐसे ही संतों की श्रेणी में मुनिश्री महनंदी भी हैं। जैन धर्म के राजस्थान के दिगंबर जैन संतों पर एक विशेष शृंखला में 20वीं कड़ी में श्रीफल [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>भारत के संक्रमण काल में राजस्थान के जैन संतों ने देश के जीवन को सदा उच्च बनाए रख। यहां की संस्कृति और साहित्य को विनाश होने से बचाया। ऐसे ही संतों की श्रेणी में मुनिश्री महनंदी भी हैं। <span style="color: #ff0000">जैन धर्म के राजस्थान के दिगंबर जैन संतों पर एक विशेष शृंखला में 20वीं कड़ी में श्रीफल जैन न्यूज के उप संपादक प्रीतम लखवाल का मुनिश्री महनंदी के बारे में पढ़िए विशेष लेख…..</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> राजस्थान की धरा पर कई जैन संतों ने अपनी हिन्दी सेवा और साहित्य साधना के साथ आध्यात्म चेतना के माध्यम से जैन धर्म का संचालन किया। जगह-जगह विहार कर इन संतों ने अपने दिव्य संदेशों के जरिए जैन समाज में धार्मिक चेतना जगाई और मंदिरों में प्रतिष्ठा करवाकर धर्म, संयम, जप, तप और भक्ति के लिए प्रेरित किया। ऐसे ही एक संत हैं मुनिश्री महनंदी जी यहां इनका संक्षिप्त परिचय दिया जा रहा है। मुनिश्री महनंदी भट्टारक वीरचंद जी के शिष्य थे। इनकी एक कृति बारहखड़ी दोहा मिली है। इसका अपर नाम पाहुड़दोहा भी है। इसकी एक प्रति आमेर शास्त्र भंडार जयपुर में संवत 1602 की संग्रहित है। जो चंपावती चाटसू के पार्श्वनाथ चैत्यालय में लिखी गई थी। प्रति शुद्ध एवं सुपाठ्य है। लिपी के अनुसार रचना 15वीं शताब्दी की मालूम होती है। कवि की यद्यपि अभी तक एक ही कृति मिली है, लेकिन वही उच्च कृति है। भाषा में अपभं्रश प्रभावित है तथा काव्यगत गुणों से पूर्णतः युक्त है। बारहखड़ी में य, ष, श, आदि वर्णों पर कोई दोहा नहीं है। इसमें 333 दोहा हैं। इनकी रचना बहुत सुंदर है। इसे हम उपदेशात्मक कह सकते हैं। कवि ने छोटे-छोटे दोहों में सुंदर भावों को भरा है। वह कहता है कि जिस प्रकार दूध में घी, तिल में तेल और लकड़ी में अग्नि रहती है। उसी प्रकार शरीर में आत्मा निवास करती है।</p>
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		<title>राजस्थान के जैन संत 19 भट्टारक जगतकीर्ति ने साहित्य और प्रतिष्ठाओं के माध्यम से अलख जगाई:  इनकी विद्वत्ता के चलते कई श्रावक बने अनुयायी </title>
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		<pubDate>Sun, 16 Mar 2025 00:30:09 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[राजस्थान में आलोच्य समय में 1450 से 1750 तक सैकड़ों जैन संत हुए। जिन्होंने अपने महान व्यक्तित्व से देश, समाज और साहित्य की सेवा में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। यहां हमने राजस्थान के चुनिंदा जैन संतों के बारे में परिचय देने का यह उपक्रम किया है। जैन धर्म के राजस्थान के दिगंबर जैन संतों पर [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>राजस्थान में आलोच्य समय में 1450 से 1750 तक सैकड़ों जैन संत हुए। जिन्होंने अपने महान व्यक्तित्व से देश, समाज और साहित्य की सेवा में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। यहां हमने राजस्थान के चुनिंदा जैन संतों के बारे में परिचय देने का यह उपक्रम किया है। <span style="color: #ff0000">जैन धर्म के राजस्थान के दिगंबर जैन संतों पर एक विशेष शृंखला में 19वीं कड़ी में श्रीफल जैन न्यूज के उप संपादक प्रीतम लखवाल का भट्टारक जगतकीर्तिजी के बारे में पढ़िए विशेष लेख…..</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> जगतकीर्ति अपने समय के प्रसिद्ध एवं लोकप्रिय भट्टारक रहे हैं। ये संवत 1733 में सुरेंद्रकीर्ति जी के बाद भट्टारक बने। इनका पट्टाभिषेक आमेर में हुआ था। जहां आमेर और सांगानेर एवं अन्य नगरों के बड़ी संख्या में श्रावकों ने इन्हें अपना गुरु स्वीकार किया था। तत्कालीन पंडित रत्नकीर्ति, महीचंद और यशःकीर्ति ने इनका समर्थन किया। ये शास्त्रों के ज्ञाता एवं सिद्धांत ग्रंथों के गंभीर विद्धान थे। मंत्र शास्त्र में भी इनका अच्छा प्रवेश था। जगतकीर्ति लंबे समय तक भट्टारक रहे और इन्होंने अपने इस काल को राजस्थान में जगह-जगह विहार करके जन साधारण के जीवन को सांस्कृतिक, साहित्यिकक और धार्मिक दृष्टि से उच्च बनाया। संवत 1741 में आपने लवाण जयपुर गांव में विहार लिया। उस समय यहां के एक श्रावक हरनाम ने सोलहकारण व्रतोद्यापन के समय भट्टारक सोमसेन कृत रामपुराण ग्रंथ की प्रति इनके शिष्य शुभचंद्र को भेंट की थी।</p>
<p><strong>संवत 1746 में चांदखेड़ी में विशाल प्रतिष्ठा का संचालन इन्हीं ने किया</strong></p>
<p>इसी तरह एक अन्य अवसर पर संवत 1745 में श्रावकों ने मिलकर इनके शिष्य नाथूराम को सकलभूषण के उपदेश की रत्न माला की प्रति भेंट की थी। इनका एक शिष्य नेमिचंद्र अच्छा विद्वान था। उसने संवत 1769 में हरिवंशपुराण की रचना समाप्त की थी। इनकी ग्रंथ की प्रशस्ति में भट्टारक जगत कीर्ति की प्रशंसा में कवि ने छंद लिखा। पूर्व भट्टारकों के समान इन्होंने भी कितनी ही प्रतिष्ठाओं में भाग लिया। संवत 1741 में नरवर में प्रतिष्ठा महोत्सव हुआ। इसी वर्ष तक्षकगढ़ (टोडारायसिंह) में भी प्रतिष्ठा महोत्सव संपन्न हुआ। संवत 1746 में चांदखेड़ी में विशाल प्रतिष्ठा हुई। उसका संचालन इन्हीं ने किया। इस प्रतिष्ठा समारोह में हजारों मूर्तियों की प्रतिष्ठा हुई थी। आज भी वे राजस्थान के विभिन्न मंदिरों में उपलब्ध होती हैं। इस प्रकार संवत 1770 तक भट्टारक जगतकीर्ति ने जो साहित्य एवं संस्कृति की जो साधना की। वह चिरस्मरणीय रहेगी।</p>
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		<title>राजस्थान के जैन संत 18 भट्टारक सुरेंद्रकीर्तिजी के काल में आमेर शास्त्र भंडार की प्रगति रही शानदार: पूरे राजस्थान पर अपना प्रभाव स्थापित किया </title>
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		<pubDate>Sat, 15 Mar 2025 00:30:32 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[राजस्थान की धरती पर जैन संतों ने अपनी विद्वता, साहित्य धर्मिता निभाकर जन-जन को आंदोलित किया। धर्म और साहित्य के दम पर जैन धर्म की नींव को मजबूत करने के लिए संतों ने कोई कमी नहीं छोड़ी। शिष्य परंपरा की अनूठी मिसाल यहां देखने में आती है जो अन्यत्र नहीं नजर आती। भट्टारक सुरेंद्रकीर्ति जी [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>राजस्थान की धरती पर जैन संतों ने अपनी विद्वता, साहित्य धर्मिता निभाकर जन-जन को आंदोलित किया। धर्म और साहित्य के दम पर जैन धर्म की नींव को मजबूत करने के लिए संतों ने कोई कमी नहीं छोड़ी। शिष्य परंपरा की अनूठी मिसाल यहां देखने में आती है जो अन्यत्र नहीं नजर आती। भट्टारक सुरेंद्रकीर्ति जी भी इसी तरह के राजस्थान के लोकप्रिय संत रहे हैं। <span style="color: #ff0000">जैन धर्म के राजस्थान के दिगंबर जैन संतों पर एक विशेष शृंखला में 18वीं कड़ी में श्रीफल जैन न्यूज के उप संपादक प्रीतम लखवाल का भट्टारक सुरेंद्रकीर्ति जी के बारे में पढ़िए विशेष लेख…..</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> राजस्थान जैन संतों के बारे में, उनके कृतित्व और व्यक्तित्व के बारे में लिखना सूर्य को दीया दिखाना होता है। राजस्थान की धरा पर जितने भी संत हुए हैं उनमें सुरेंद्रकीर्तिजी का अच्छा स्थान है। वे भट्टारक नरेंद्र कीर्ति के शिष्य थे। इनका गृहस्थ अवस्था का नाम दामोदरदास था तथा ये काला गोत्रीय खंडेलवाल जाति के श्रावक थे। ये बड़े भारी विद्वान एवं संयमी श्रावक थे। प्रारंभ से ही उदासीन रहते और शास्त्रों का पठन-पाठन भी करते थे। एक बार भट्टारक नरेंद्रकीर्ति का सांगानेर में आगमन हुआ तो उनका दामोदरदास से साक्षात्कार हुआ। पहली भेंट में ही ये दामोदरदास की विद्वता एवं वाकचातुर्य से प्रभावित हो गए और उन्हें अपना प्रमुख शिष्य बनाने को उद्यत हो गए। जब इन्हें अपने स्वयं शेष जीवन पर अविश्वास होने लगा तो भट्टारक गादी पर दामोदरदास को बिठाने की योजना बनाई गई। एक भट्टारक पट्टावली में इसका उल्लेख मिलता है।</p>
<p><strong>सुरेंद्रकीर्ति जी को संवत 1722 में भट्टारक बनाया</strong></p>
<p>सांगानेर और आमेर के प्रमुख श्रावकों ने एक स्वर से दामोदरदास को भट्टारक बनाने की अनुमति दे दी। वे उसके चरित्र एवं विनय तथा पांडित्य की प्रशंसा करने लगे। दामोदरदास को सांगानेर से बड़े ठाट-बाट के साथ आमेर लाया गया। उन्हें संवत 1722 में विधिवत भट्टारक बना दिया गया। अब दामोदरदास से उनका नाम भट्टारक सुरेंद्रकीर्ति हो गया। इनका पाटोत्सव बड़ी धूमधाम से हुआ। स्वर्ण कलश से स्नान करवाया गया। सारे राजस्थान में प्रतिष्ठित श्रावकों ने इस महोत्सव में भाग लिया।</p>
<p><strong>विहार कर समाज सुधार एवं साहित्य प्रचार किया</strong></p>
<p>सुरेंद्रकीर्ति की योग्यता एवं संयम की चारों ओर प्रशंसा होने लगी और शीघ्र ही इन्होंने पूरे राजस्थान पर अपना प्रभाव स्थापित कर लिया। ये केवल 11 भट्टारक रहे, लेकिन इस अल्प समय में ही इन्होंने सब ओर विहार करके समाज सुधार एवं साहित्य प्रचार का बड़ा भारी कार्य किया। इन्हें कितने ही स्थानों से निमंत्रण मिलते। जबये आहार के लिए जाते तो श्रावक इन पर सोने-चांदी के सिक्के न्योछावर करते और इनके आगमन से अपने घर को पवित्र समझते। वास्तव में इन्हें अत्यधिक आदर एवं सत्कार मिला। सुरेंद्रकीर्ति साहित्यिक भी थे। इनके काल में आमेर शास्त्र भंडार की अच्छी प्रगति रही। कितनी ही नई प्रतियां लिखवाई गईं। कितने ही ग्रंथों का जीर्णोद्धार किया गया।</p>
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		<title>राजस्थान के जैन संत 17 भट्टारक नरेंद्रकीर्ति जी ने अमूल्य साहित्य का सृजन और संरक्षण किया:  राजस्थान की धरती पर बड़ी तादाद में रचा गया हिन्दी साहित्य </title>
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		<pubDate>Fri, 14 Mar 2025 00:30:06 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[राजस्थान के जैन संतों में भट्टारक नरेंद्रकीर्ति जी का अलग ही स्थान है। इन्होंने अमूल्य साहित्य का सृजन किया और हिन्दी साहित्य का ग्रंथ संग्रहालय में संरक्षित भी करवाया। इनका पट्टााभिषेक सांगानेर में हुआ था। ये भट्टारक देवेंद्रकीर्ति जी के शिष्य थे। जो आमेर गादी के संस्थापक थे। जैन धर्म के राजस्थान के दिगंबर जैन [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>राजस्थान के जैन संतों में भट्टारक नरेंद्रकीर्ति जी का अलग ही स्थान है। इन्होंने अमूल्य साहित्य का सृजन किया और हिन्दी साहित्य का ग्रंथ संग्रहालय में संरक्षित भी करवाया। इनका पट्टााभिषेक सांगानेर में हुआ था। ये भट्टारक देवेंद्रकीर्ति जी के शिष्य थे। जो आमेर गादी के संस्थापक थे। <span style="color: #ff0000">जैन धर्म के राजस्थान के दिगंबर जैन संतों पर एक विशेष शृंखला में 17वीं कड़ी में श्रीफल जैन न्यूज के उप संपादक प्रीतम लखवाल का भट्टारक नरेंद्रकीर्ति जी के बारे में पढ़िए विशेष लेख…..</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> राजस्थान के जैन संतों में भट्टारक नरेंद्रकीर्ति जी का अलग ही स्थान है। इन्होंने अमूल्य साहित्य का सृजन किया और हिन्दी साहित्य का ग्रंथ संग्रहालय में संरक्षित भी करवाया। भट्टारकों की पंक्ति के वे अपने समय के उत्कृष्ट विद्वान थे। पंथवादी होने के कारण इनका विरोध भी खूब हुआ, लेकिन धर्म, संस्कृति और जनजागरण में कमी नहीं आई। नरेंद्रकीर्तिजी अपने समय के विद्वान भट्टारक थे। ये शुद्ध बीस पंथ को मानने वाले थे। ये खंडेलवाल श्रावक थे और सौगाणी इनका गौत्र था। एक भट्टारक पट्टावली के अनुसार नरेंद्रकीर्ति जी संवत 1691 में भट्टारक बने थे। इनका पट्टााभिषेक सांगानेर में हुआ था। इसकी पुष्टि बख्तराम साह ने अपने बुद्धि विलास में की है। ये भट्टारक देवेंद्रकीर्ति जी के शिष्य थे। जो आमेर गादी के संस्थापक थे। संपूर्ण राजस्थान में ये प्रभावशाली थे। मालवा, मेवात तथा दिल्ली आदि के प्रदेशों में इनके भक्त रहते थे और जब वे जाते तब उनका खूब स्वागत किया जाता।</p>
<p>दिगंबर जैन समाज के प्रसिद्ध तेरह पंथ की उत्पत्ति भी इन्हीं के समय में हुई थी। यह पंथ सुधारवादी था और इसके द्वारा अनेक कुरीतियों का जोरदार विरोध किया गया था। नरेंद्रकीर्ति का अपने समय में ही विरोध होने लगा था और इनकी मान्यताओं का विरोध करने के लिए कुछ समाज सुधारकों ने तेरहपंथ नाम के पंथ को जन्म दिया, लेकिन विरोध होते हुए भी नरेंद्रकीर्ति अपने मिशन के पक्के थे और जगह-जगह घूमकर साहित्य और संस्कृति का प्रचार किया करते थे। यह अवश्य था कि ये संत अपने आध्यात्मिक उत्थान की ओर कम ध्यान देने लगे थे तथा लौकिक रूढि़यों में फंसते जा रहे थे। इसलिए इनका धीरे-धीरे विरोध बढ़ रहा था। जिसने महापंडित टोडरमल के समय उग्र रूप धारण कर लिया और इन संतों के महत्व को ही सदा के लिए खत्म कर दिया।<br />
स्तोत्रों की हिन्दी गद्य टीका करने वाले ‘अखयराज’ इनके ही शिष्य नरेंद्र कीर्ति जी ने अपने समय में आमेर के प्रसिद्ध भट्टारकीय शास्त्र भंडार को सुरक्षित रखा और उसमें नई-नई प्रतियां लिखवाकर विराजमान करवाई। संवत 1722 तक ये भट्टारक रहे और इसी वर्ष महापंडित आशाधर कृत प्रतिष्ठा पाठ की एक हस्त लिखित प्रति इनके शिष्य आचार्य चंद्रकीर्ति, घासीराम, पंडित भीवसी एवं मयाचंद के पठनार्थ भेंट की गई। कितने ही स्तोत्रों की हिन्दी गद्य टीका करने वाले अखयराज इन्हीं के शिष्य थे। संवत 1717 में संस्कृत मंजरी की प्रति इन्हें भेंट की गई थी। टोडारायसिंह के प्रसिद्ध पंडित कवि जगन्नाथ इन्हीं के शिष्य थे।</p>
<p><strong>लोग शास्त्रों के अभ्यास अपने ज्ञान की वृद्धि के लिए करते थे</strong></p>
<p>पंडित परमानंद ने नरेंद्रकीर्ति के विषय में लिखते हुए कहा कि इनके समय में टोडारायसिंह में संस्कृत पठन-पाठन का अच्छा कार्य चलता था। लोग शास्त्रों के अभ्यास द्वारा अपने ज्ञान की वृद्धि करते थे। यहां शास्त्रों का भी अच्छा संग्रह था। लोगों को जैन धर्म से विशेष प्रेम था। अष्ट सहस्त्री और प्रमाण निर्णय आदि न्याय ग्रंथों का लेखन, प्रवचन, पंचास्तिकाय आदि सिद्धांत ग्रंथों आदि का प्रति लेखन कार्य तथा अनेक नूतन ग्रंथों का निर्माण हुआ था। कवि जगन्नाथ ने श्वेतांबर पराजय में नरेंद्र कीर्ति का मंगलाचरण प्रस्तुत किया है। नरेंद्र कीर्ति ने कितनी ही प्रतिष्ठाओं का नेतृत्व भी किया। पांवापुर संवत 1700 गिरनार 1708 मालपुरा 1710 हस्तिनापुर 1716 में होने वाली प्रतिष्ठाएं इन्हीं की देखरेख में हुई थीं।</p>
<p><strong>आमेर, सांगानेर, चाटसू और टोडारायसिंह प्रमुख केंद्र बने</strong></p>
<p>17वीं शताब्दी में राजस्थान में आमेर राज्य का महत्व बढ़ रहा था। आमेर के शासकों का मुगल बादशाहों से घनिष्ठ संबंध के कारण यहां अपेक्षाकृत शांति थी। इसके अतिरिक्त आमेर शासन में भी जैन दीवानों का प्रमुख हाथ था। वहां जैनों की अच्छी बस्ती थी और पुरातत्व एवं कला की दृष्टि से भी आमेर एवं सांगानेर के मंदिर राजस्थान भर में प्रसिद्धि पा चुके थे। इसलिए देहली के भट्टारकों ने भी अपनी गादी को दिल्ली से आमेर स्थानांतरित करना उचित समझा और इसमें प्रमुख भाग लिया भट्टारक देवेंद्रकीर्ति जी ने। जिनका पट्टाभिषेक संवत 1662 में चाटसू में हुआ था। इसके बाद तो आमेर, सांगानेर, चाटसू और टोडारायसिंह आदि नगरों के प्रदेश इन भट्टारकों की गतिविधियों के प्रमुख केंद्र बन गए।</p>
<p>18वीं शताब्दी से गृहस्थ भी साहित्य सृजन करने लगे</p>
<p>इन संतों की कृपा से यहां संस्कृत एवं हिन्दी ग्रंथों का पठन-पाठन ही प्रारंभ नहीं हुआ बल्कि इन भाषाओं में ग्रंथ रचना भी होने लगी और आमेर, सांगानेर, टोडारायसिंह और फिर जयपुर में विद्वानों की मानों एक कतार ही खड़ी हो गई। 17वीं शताब्दी में तक प्रायः सभी विद्वान संत हुआ करते थे, लेकिन 18वीं शताब्दी से गृहस्थ भी साहित्य सृजन करने लगे। अजयराज पाटणी, खुशालचंद काला, जोधराज गोदीका, दौलतराम कासलीवाल महा पंडित टोडरमल, जयचंद्र छाबड़ा जैसे विद्वानों को जन्म देने का गर्व इसी भूमि को है।</p>
<p>संतों की दूरदर्शिता से अमूल्य साहित्य नष्ट होने से बचा</p>
<p>आमेर शास्त्र भंडार जैसे महत्वपूर्ण ग्रंथ संग्रहालय की स्थापना एवं उसमें अपभ्रंश, संस्कृत एवं हिन्दी ग्रंथों की प्राचीनतम प्रतिलिपियों का संग्रह इन्हीं संतों की देन है। आमेर शास्त्र भंडार में अपभ्रंश का जो महत्वपूर्ण संग्रह है, वैसा संग्रह नागौर के भट्टारकीय शास्त्र भंडार को छोड़कर राजस्थान के किसी भी ग्रंथ संग्रहालय में नहीं है। वास्तव में इन्हीं संतों की दूरदर्शिता के कारण देश का अमूल्य साहित्य नष्ट होने से बच गया।</p>
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		<title>जैन मुनि श्री काम कुमार नंदी की हत्या का मामला : चातुर्मासिक धर्मसभा में दी श्रद्धांजलि    </title>
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		<pubDate>Sun, 16 Jul 2023 11:04:27 +0000</pubDate>
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<p><strong>आमेर स्थित संकटहरण श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर में चातुर्मासरत उपाध्याय ऊर्जयंत सागर जी मुनिराज के सानिध्य में आचार्य श्री काम कुमार नंदी को विनयांजलि अर्पित की गई। इस अवसर पर पूज्य उपाध्याय श्री ने आचार्य श्री काम कुमार नंदी जी महाराज की आत्मा की शांति की कामना के साथ दोषी लोगों पर सख्त कार्रवाई हेतु कर्नाटक सरकार और केंद्र सरकार से आग्रह किया। <span style="color: #ff0000;">पढ़िए अनमोल सेठी की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>जयपुर।</strong> पिछले दिनों कर्नाटक राज्य में दिगंबर जैन आचार्य श्री काम कुमार जी महाराज की कुछ लोगों ने उनका अपहरण कर निर्मम हत्या कर दी थी। उन्हें आमेर स्थित संकटहरण श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर में चातुर्मासरत उपाध्याय ऊर्जयंत सागर जी मुनिराज के सानिध्य में विनयांजलि अर्पित की गई। इस अवसर पर पूज्य उपाध्याय श्री ने आचार्य श्री काम कुमार नंदी जी महाराज की आत्मा की शांति की कामना के साथ दोषी लोगों पर सख्त कार्रवाई हेतु कर्नाटक सरकार और केंद्र सरकार से आग्रह किया। उपाध्याय श्री ने कहा कि जैन संतों की सुरक्षा हेतु भारत को एवं सभी राज्य सरकारों को कानून बनाना चाहिए।</p>
<p>इस अवसर पर प्रताप नगर के गुरु भक्तों द्वारा णमोकार मंत्रों का साज-बाज से पाठ किया एवं भजनों के माध्यम से भगवान से आचार्य कामकुमार नंदी जी महाराज की आत्मा शांति की कामना की। चातुर्मास समिति के मुख्य संयोजक रूपेंद्र छाबड़ा अशोक के अनुसार श्रद्धांजलि सभा में समिति के दौलत फागीवाला, समाज श्रेष्ठी सुखानंद काला, जिनेन्द्र गंगवाल जीतू, महेश सेठी, बाबू लाल जैन ईटून्दा, शिखर गोधा सारसोप, पूरण गंगवाल एवं धर्म जागृति महिला मंडल सेक्टर 8 प्रताप नगर सहित शहर की विभिन्न कॉलोनियों से पधारे भक्त उपस्थित रहे।</p>
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