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	<title>आध्यात्मिक वर्षायोग &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>बिना चारित्र के मिले ज्ञान से संसार सागर से मुक्ति नहीं संभव : मुनिश्री विलोकसागर ने ग्रंथराज समयसार को विवेचित किया  </title>
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		<pubDate>Fri, 22 Aug 2025 14:17:53 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मुरैना में मुनिराजों का आध्यात्मिक वर्षायोग जारी है। इसमें रोज प्रवचन हो रहे हैं। बड़ै जैन मंदिर में धार्मिक कार्यक्रमों के साथ सभी गुरु भक्त धर्मसभा का लाभ भी ले रहे हैं। मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230; मुरैना। नगर में मुनिराजों का आध्यात्मिक वर्षायोग जारी है। इसमें रोज प्रवचन हो रहे [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>मुरैना में मुनिराजों का आध्यात्मिक वर्षायोग जारी है। इसमें रोज प्रवचन हो रहे हैं। बड़ै जैन मंदिर में धार्मिक कार्यक्रमों के साथ सभी गुरु भक्त धर्मसभा का लाभ भी ले रहे हैं। <span style="color: #ff0000">मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना।</strong> नगर में मुनिराजों का आध्यात्मिक वर्षायोग जारी है। इसमें रोज प्रवचन हो रहे हैं। बड़ै जैन मंदिर में धार्मिक कार्यक्रमों के साथ सभी गुरु भक्त धर्मसभा का लाभ भी ले रहे हैं। आध्यात्मिक वर्षायोग में प्रवचनों की श्रृंखला में चातुर्मासरत मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने ग्रंथ राज समयसार की विवेचना करते हुए कहा कि ज्ञान प्राप्त करना, ग्रंथों और शास्त्रों का अध्ययन करना तो सहज और सरल है। ज्ञान तो प्राप्त किया जा सकता है लेकिन, कोरे ज्ञान को प्राप्त करने से आत्मा का भला होने वाला नहीं हैं। ज्ञान तो हम सभी प्राप्त कर सकते है, लेकिन वह ज्ञान जब तक चारित्र में नहीं आएगा तब तक हमारा कल्याण होना संभव नहीं हैं। जब तक हमें सच्चे ज्ञान की, सही ज्ञान की प्राप्ति नहीं होगी, उस ज्ञान को, उन सिद्धांतों को हम चारित्र में नहीं उतारेंगे, तब तक हम यूं ही इस संसार के जन्म मृत्यु के चक्रव्यूह में भटकते रहेंगे।</p>
<p>जब ज्ञान चारित्र में आता है तो राग द्वेष स्वतः ही समाप्त हो जाते हैं, निज और पर समझ में आ जाते हैं। आत्मा का हित क्या है, इसका भाव समझ में आ जाता है। संसार से विरक्ति होकर आत्मा अपने में लीन होने का प्रयास करती है। यही मोक्ष मार्ग है। जब राग द्वेष पूर्णतः समाप्त हो जाता है और आत्मा अष्ट कर्मों को नष्टकर सिद्धत्व को प्राप्त कर लेती है।</p>
<p><strong>चारित्र आत्मा के शुद्ध आचरण और संयम को कहते हैं</strong></p>
<p>मुनिश्री ने कहा कि जैन दर्शन में चारित्र का गहरा संबंध है। चारित्र आत्मा के शुभ या शुद्ध आचरण और संयम को कहते हैं, जो मोक्ष प्राप्ति के लिए आवश्यक है। यह जैन धर्म का मूलभूत सिद्धांत है, जो अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह जैसे व्रतों का पालन करके प्राप्त होता है। चारित्र का अर्थ है पाप वृत्तियों का त्याग कर आत्म-शुद्धि की ओर बढ़ना, जो सम्यक् चारित्र के रूप में जीवन के सभी पहलुओं में नैतिक आचरण को अपनाना सिखाता है। जैन दर्शन के अनुसार चारित्र आत्मा की विभाव (अशुद्ध) अवस्था से स्वभाव (शुद्ध) अवस्था की ओर बढ़ना है। मोक्ष मार्ग एक ऐसा मार्ग है जिसके द्वारा आत्मा जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त करती है।</p>
<p><strong>चारित्र का अर्थ एवं महत्व</strong></p>
<p>चारित्र का अर्थ है पाप वृत्तियों का त्याग कर आत्म-शुद्धि की ओर बढ़ना, जो सम्यक् चारित्र के रूप में जीवन के सभी पहलुओं में नैतिक आचरण का मार्ग सिखाता है। जैन दर्शन में ष्चारित्रष् आत्मा के शुभ और शुद्ध आचरण को कहते हैं, जो पाप प्रवृत्तियों का त्याग और संयम में संलग्न होकर मोक्ष प्राप्ति का मार्ग है । यह श्री जिनेंद्र भगवान के सिद्धांतों पर आधारित है और आध्यात्मिक विकास के लिए सम्यक् ज्ञान, सम्यक् दर्शन, और सम्यक् चारित्र नामक त्रिरत्न का महत्वपूर्ण हिस्सा है ।विशेष रूप से, यह पांच महाव्रतों- अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह का पालन करके प्राप्त किया जाता है। चारित्र का अर्थ है आचरण या व्यवहार। जैन धर्म में यह आत्मा के शुद्ध आचरण को दर्शाता है जो मोक्ष की ओर ले जाता है। मोक्ष प्राप्त करने के लिए सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चारित्र, तीनों आवश्यक हैं। चारित्र का अर्थ है सभी पाप वृत्तियों और सावध प्रवृत्तियों का त्याग करना, तथा मोक्ष के लिए शुभ और संयमित प्रवृत्ति करना</p>
<p><strong>जैन दर्शन में सम्यक चरित्र </strong></p>
<p>सम्यक चरित्र का अर्थ है ‘सही आचरण’ या ‘सच्चा आचरण’। यह जैन धर्म में एक महत्वपूर्ण अवधारणा है, जो संसार से मुक्ति के लिए, मोक्ष प्राप्त करने के लिए आवश्यक तीन रत्नों में से एक है। अन्य दो रत्न हैं सम्यक दर्शन और सम्यक ज्ञान हैं। सम्यक चरित्र, जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, ‘सही’ या ‘सत्य’ आचरण को संदर्भित करता है। यह न केवल कर्मों के संदर्भ में, बल्कि विचारों और भावनाओं के संदर्भ में भी सही आचरण को दर्शाता है। जैन धर्म में सम्यक चरित्र का पालन करने का अर्थ है,नैतिक नियमों का पालन करना, जीवित प्राणियों को नुकसान पहुंचाने से बचना, और स्वयं को आसक्ति और अन्य अशुद्ध दृष्टिकोणों से मुक्त करना।</p>
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		<title>स्वयं के बांधे कर्मों का फल स्वयं को ही भोगना है: मुनिश्री विलोकसागर जी ने कथनी-करनी में भेद समझाया  </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 20 Aug 2025 11:56:21 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैनाचार्यश्री आर्जवसागरजी महाराज के शिष्य मुनिश्री विलोकसागरजी एवं मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज के आध्यात्मिक वर्षायोग में प्रतिदिन प्रवचनों के माध्यम से अमृतवर्षा हो रही है। बुधवार को धर्मसभा में मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने कुंद-कुंद स्वामी द्वारा रचित सैद्धांतिक ग्रंथ समयसार की वाचना करते हुए कथनी-करनी के संदर्भ में बताया। मुरैना से पढ़िए मनोज जैन की , [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जैनाचार्यश्री आर्जवसागरजी महाराज के शिष्य मुनिश्री विलोकसागरजी एवं मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज के आध्यात्मिक वर्षायोग में प्रतिदिन प्रवचनों के माध्यम से अमृतवर्षा हो रही है। बुधवार को धर्मसभा में मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने कुंद-कुंद स्वामी द्वारा रचित सैद्धांतिक ग्रंथ समयसार की वाचना करते हुए कथनी-करनी के संदर्भ में बताया। <span style="color: #ff0000">मुरैना से पढ़िए मनोज जैन की , यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना।</strong> जैनाचार्यश्री आर्जवसागरजी महाराज के शिष्य मुनिश्री विलोकसागरजी एवं मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज के आध्यात्मिक वर्षायोग में प्रतिदिन प्रवचनों के माध्यम से अमृतवर्षा हो रही है। बुधवार को धर्मसभा में मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने कुंद-कुंद स्वामी द्वारा रचित सैद्धांतिक ग्रंथ समयसार की वाचना करते हुए कथनी-करनी के संदर्भ में बताया। दुनिया में छह द्रव्य जीव पुदगल धर्म अधर्म आकाश और काल के बारे में समझाते हुए कहा कि जीव और पुदगल का संयोग जब होता है तब कर्म बंध होता है। शेष चार द्रव्य धर्म, अधर्म, आकाश और काल तो अपने आप में रहते हैं। जो भी कर्म बंध होता है वह जीव और पुदगल के संयोग से ही होता है। जो भी शुभ अशुभ फल होता है, जो भी बंध होता है वह हमारे स्वयं के द्वारा ही होता है। जब हम कूलर या एसी की हवा खाते हैं तो उसका बिल किसे भरना पड़ेगा, हमें ही तो भरना पड़ेगा, हमें ही तो चुकाना पड़ेगा।</p>
<p><strong>भेद विज्ञान को समझ लेंगे, तब हमारे वस्त्र स्वयं ही छूट जाएंगे</strong></p>
<p>इसी प्रकार हम जिस प्रकार की सांसारिक क्रियाओं में लिप्त रहते हैं तो उनके द्वारा बांधे गए कर्माें का फल हमको ही भोगना पड़ेगा। कोई दूसरा हमारा अच्छा या बुरा नहीं कर सकता। यदि हम अधर्म के कामों में, पाप कर्मों में लिप्त रहेंगे तो परमात्मा भी हमारे दुःखों को हमारे कष्टों को दूर नहीं कर सकता। हमें स्वयं को इसके लिए पुरुषार्थ करना होगा, हमें ही जागृत होना पड़ेगा। जब हम जागृत हो जाएंगे, भेद विज्ञान को समझ लेंगे, तब हमारे वस्त्र स्वयं ही छूट जाएंगे। हम स्वयं ही संसार से विरक्त हो जाएंगे। वस्त्र उतारे नहीं जाते, स्वयं ही उतर जाते हैं। त्याग विरक्ति तो अंतरंग से आती है। जब सच्चाई का ज्ञान हो जाता है, जब स्व और पर का भेद समझ आ जाता है, तब मन संसार से विरक्त होकर जीव मोक्ष मार्गी हो जाता है।</p>
<p><strong>जैन दर्शन में कर्मों के बंधन से मुक्त होना ही मुख्य लक्ष्य</strong></p>
<p>जैन धर्म में, जीव और पुद्गल दो अलग-अलग द्रव्य हैं जो इस ब्रह्मांड का निर्माण करते हैं। जीव चेतन तत्व है, जबकि पुद्गल जड़ (निर्जीव) पदार्थ है। जीव को आत्मा भी कहा जाता है, जो शाश्वत और चेतन तत्व है। यह सुख-दुःख का अनुभव करता है और कर्मों के बंधन में बंधा होता है। जैन धर्म का मुख्य लक्ष्य जीव को कर्मों के बंधन से मुक्त कराना है, जिससे मोक्ष की प्राप्ति हो सके। पुद्गल जड़ (निर्जीव) पदार्थ है, जो विभिन्न रूपों में मौजूद है। यह दिखाई देने वाला, स्पर्श करने योग्य और परिवर्तनशील है। पुद्गल में वर्ण (रंग), गंध (गंध), रस (स्वाद) और स्पर्श (स्पर्श) गुण होते हैं। शरीर, मन, वचन और सांसें सभी पुद्गल से बनी हैं। जैन धर्म में, पुद्गल को कर्मों के रूप में भी माना जाता है जो आत्मा के साथ बंधते हैं।</p>
<p><strong>जैन दर्शन में जन्म मृत्यु के चक्र से मुक्त होना ही मुख्य ध्येय</strong></p>
<p>जैन धर्म के अनुसार, जीव और पुद्गल अनादि काल से एक दूसरे से बंधे हुए हैं। जीव पुद्गल के साथ मिलकर संसार में जन्म-मरण के चक्र में फंसा रहता है। जीव को कर्मों के बंधन से मुक्त कराने के लिए, उसे पुद्गल से अलग होना होगा, यानी कर्मों से छुटकारा पाना होगा। पुद्गल से मुक्ति पाने के लिए, जीव को सम्यक ज्ञान, सम्यक दर्शन और सम्यक चारित्र का पालन करना होता है। जैन धर्म में जीव और पुद्गल दो अलग-अलग तत्व हैं, लेकिन वे एक दूसरे से जुड़े हुए हैं और एक दूसरे को प्रभावित करते हैं। जीव को कर्मों के बंधन से मुक्त कराने के लिए, उसे पुद्गल से अलग होना होगा, जो जैन धर्म का मुख्य लक्ष्य है।</p>
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