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	<title>आध्यात्मिक बातें &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
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	<title>आध्यात्मिक बातें &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>दुनिया के स्वभाव को समझो और उसके अनुसार अपने स्वभाव को ढालो: मुनिश्री सुधासागर जी को सुनने बहोरीबंद तीर्थ क्षेत्र में श्रद्धालुओं का लगा तांता </title>
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		<pubDate>Thu, 06 Mar 2025 09:08:35 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मुनिश्री सुधासागर जी महाराज अपनी धर्मसभा में जीवन को कुशलता और प्रेम भाव से जीने की सलाह दे रहे हैं। वे दुःखों को मिटाकर सुखों के रास्तों को आसान बनाने की भी सलाह दे रहे हैं। मुनिश्री इन दिनों कटनी के बहोरीबंद तीर्थ क्षेत्र में विराजमान रहकर नित्य धर्म सभा को संबोधित कर रहे हैं। [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>मुनिश्री सुधासागर जी महाराज अपनी धर्मसभा में जीवन को कुशलता और प्रेम भाव से जीने की सलाह दे रहे हैं। वे दुःखों को मिटाकर सुखों के रास्तों को आसान बनाने की भी सलाह दे रहे हैं। मुनिश्री इन दिनों कटनी के बहोरीबंद तीर्थ क्षेत्र में विराजमान रहकर नित्य धर्म सभा को संबोधित कर रहे हैं। बुधवार को उन्होंने अपने प्रवचन में श्रद्धालुओं को जीवन के सार समझाते हुए अपनी बात कही। <span style="color: #ff0000">कटनी से पढ़िए राजीव सिंघई की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>कटनी।</strong> इस संसार में हमारे अनुकूल वातावरण मिलने वाला नहीं है, हमें एडजस्ट करना है, एक्जिस्टिंग पॉइंट जो होता है वह जिंदगी की सबसे बड़ी साधना और तपस्या होती है। यही व्यवहार कुशलता कहलाती है। गाड़ी के अनुसार रोड नहीं मुड़ेगा, रोड के अनुसार गाड़ी को मोड़ना सीखना पड़ेगा। यह बात मुनिश्री सुधासागर जी महाराज ने कटनी के बहोरीबंद तीर्थ क्षेत्र में अपनी धर्मसभा के दौरान कही। उन्होंने कहा कि दुनिया को मत बदलो, दुनिया को एडजस्ट करो। दुनिया के स्वभाव को मत बदलो, दुनिया के स्वभाव को समझो और उस स्वभाव के अनुसार अपने स्वभाव को ढालो। तुम कहो कि कांटे रास्ते में नहीं आएंगे, वो तो आएंगे। तुम कहो कि तुम कोई कार्य करो और कोई विरोध न करें, वो तो होगा। बस विरोध करने वाले को रोकना नहीं और विरोध करने वाला हमें रोक न पाएं। जितनी ताकत हम दुःखों को दूर करने में लगाते हैं, उतना दुःखों को कुशलता से दुःख के दिन निकालने में लगा दे।</p>
<p><strong>जिसने संकट झेला उसकी शरण लेना</strong></p>
<p>जितने भी प्रसिद्ध आदर्श हुए हैं, उन पर संकट जरूर आया है। आज सबसे ज्यादा संकट पारसनाथ ने झेले, यही कारण है कि भारत के हर मंदिर में पारसनाथ की प्रतिमा जरूर मिलती है। सबसे ज्यादा संकट आज भारत के शांतिनाथों में से किस मूर्ति ने झेले हैं? सारी मूर्तियां पर संकट आए, मूर्तियां खंडित हुई लेकिन, आज तक कोई मूर्ति ऐसी नहीं हुई जिसको लोगों ने झाड़ू मार करके पूजा हो, ये अपमान इस मूर्ति ने सहन किया है। इसलिए बहोरीबंद क्षेत्र का नाम चमत्कारोदय रखा है। जिसके जीवन में कोई संकट नहीं आए हैं। संकट के समय उसकी शरण में मत जाना, वो तुम्हारे संकट दूर नहीं करेगा। वास्तु में लिखा है कि तुम्हारे ऊपर संकट आया है तो सुखी आदमी के पास मत जाना। उसे समान संकट किस पर आया है। उस संकट में उसने कैसी जिंदगी जी है, उसकी आराधना कर लेना तुम्हें रास्ता मिल जाएगा।</p>
<p><strong>&#8230;यहीं पर न्योछावर राशि अर्पित कर कमेटी से मंगवाते हैं</strong></p>
<p>भू-गर्भ से निकली हुई मूर्तियां अतिशयकारी क्यों होती हैं? ये लोग पूछते हैं। वही मूर्ति जब ऊपर थी तब अतिशयकारी नहीं थी लेकिन, भू-गर्भ में चली गई और फिर ऊपर आई तो क्या बन गया। श्री महावीरजी, तिजारा जी, पदमपुरा जी आदि क्योंकि, इन मूर्तियों ने न जाने कितने समय तक संकटों को सहा और सुरक्षित बाहर निकर्ल आइं। मूर्तियों में पहले अतिशय होता था क्योंकि, वह बिना गिने न्यौछावर से आती थी, मूर्ति की कोई कीमत नहीं होती थी। बस सेठ आंख खुलाई की न्यौछावर राशि देते थे। सेठ मूर्ति देखकर इतना खुश होते थे कि 1 रुपए की मूर्ति की मजदूरी और सोने की मोहरी शिल्पी की झोली में डाल देते थे। फिर शिल्पी न्यौछावर पाकर छैनी से आंख खोलते थे, बाद में लागत से कम देने लगे तो शिल्पी भी गिनकर लेने लगे। इसलिए अब हम सेठ को मूर्ति लेने नहीं भेजते। यहीं पर न्योछावर राशि अर्पित कर कमेटी से मंगवाते हैं।</p>
<p><strong>ये शगुन का तिलकदान का श्रीफल है</strong></p>
<p>आज नई मूर्ति पर जाकर महिला-पुरुष तिलक दान करेंगे और कोई भी खाली हाथ नहीं करेगा। ये शगुन की बात है, न्योछावर राशि भेंट करना। फिर गीला नारियल लेकर फोड़कर पानी मूर्ति पर चढ़ा देना और वह नारियल शगुन में घर ले जाना। अपने परिवार वालों को, आस पड़ोस, रिश्तेदारों को खिलाना। ये शगुन का, तिलकदान का श्रीफल है। घर में जितने लोग हैं उतने लोगों के नाम से श्रीफल ले जाना।</p>
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		<title>मंदिर दीपक के समान प्रकाशमान होते हैं और तीर्थक्षेत्र सूरज के समान: बहोरीबंद अतिशय तीर्थ में आध्यात्मिक चेतना से ओतप्रोत रहे जैन श्रावक </title>
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		<pubDate>Mon, 03 Mar 2025 09:15:12 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मुनि श्री सुधासागर जी महाराज ने बुधवार को कटनी के बहोरीबंद अतिशय तीर्थ में धर्मसभा कर आध्यात्मिक चेतना से जैन श्रद्धालुओं को ओतप्रोत कर दिया। धर्म, संयम,नियम और भक्ति भाव से भगवान की आराधना के लिए उपस्थित जनसमुदाय को प्रेरित भी करते रहे। मुनिश्री के प्रवचनों में तत्वार्थ की बातों से श्रद्धालु गदगद हैं। पढ़िए [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>मुनि श्री सुधासागर जी महाराज ने बुधवार को कटनी के बहोरीबंद अतिशय तीर्थ में धर्मसभा कर आध्यात्मिक चेतना से जैन श्रद्धालुओं को ओतप्रोत कर दिया। धर्म, संयम,नियम और भक्ति भाव से भगवान की आराधना के लिए उपस्थित जनसमुदाय को प्रेरित भी करते रहे। मुनिश्री के प्रवचनों में तत्वार्थ की बातों से श्रद्धालु गदगद हैं। <span style="color: #ff0000">पढ़िए कटनी से राजीव सिंघई की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>कटनी।</strong> मुनिश्री सुधासागर जी महाराज ने बुधवार को बहोरीबंद अतिशय क्षेत्र में अपने प्रवचन में कहा कि धर्म आत्मा का स्वभाव होकर भी हम स्वभाव का आनंद नहीं ले पा रहे हैं, आम मीठा होकर भी व्यक्ति को मीठे का स्वाद नहीं आ पाता और कई बार स्वाद आता है लेकिन, वह खा नहीं पाता। हमारी आत्मा अनादि काल से त्रिकालिक है लेकिन, कभी हमें उस असाधारण गुण की अनुभूति नहीं हुई। सामान्य गुण की अनुभूति तो हमें होती है और सामान्य गुण का अर्थ होता है। अपने अस्तित्व की पहचान, अपने अस्तित्व की अनुभूति। मैं देख रहा हूं। सुन रहा हूं। मैं बोल रहा हूं। मैं चलता-फिरता हूं ये सबके अनुभव में है। चींटी, कीड़े मकोड़े को भी ये ज्ञान है लेकिन, जो कार्य सबमें विद्यमान हो, वे कार्य हमारी कोई उपलब्धि नहीं है। हमारा कुछ विशेषण बनना चाहिए, हम बिना विशेषण के जी रहे हैं। हमारी पहचान अस्तिरूप में है, हमारी पहचान किसी ऐसे रूप में नही है, जो अन्य में नहीं पाया जाए।</p>
<p><strong>हमें भी दुनिया का बनना होगा</strong></p>
<p>वह मिथ्या हो जाता है जब व्यक्ति अपने जीवन की कोई असाधारण पहचान नहीं बना पाता, धर्म एक ही बात पूछता है तुम्हारे पास ऐसा क्या है जो दुनिया के पास नहीं है, जिसे दुनिया चाहती है। हमारा दुनिया साथ देती है, ये कोई बहादुरी नहीं है लेकिन, हम दुनिया का साथ देते हैं, ये बहादुरी है। यदि दुनिया को अपना बनाना है तो हमें भी दुनिया का बनना होगा, दुनिया हमें अपना मान लेगी लेकिन, हमें भी दुनिया को अपना मानना होगा। जो लोग ऐसे हो जाते हैं। उन्हीं को तीर्थंकर, उन्हीं को भगवान कहते हैं। किनके बनते हैं तीर्थ, किनके बनते हैं मंदिर, किनकी होती है पूजा, जिन्होंने दुनिया के लिए कुछ किया हो, जो दुनिया के लिए जिये हो। भगवान के पास जो कुछ होता है, वह सारे जगत का होता है।</p>
<p><strong>अपने पुण्य को साधु भोगता नहीं</strong></p>
<p>पेड़ कहता है कि मेरी छाया मेरे काम नहीं आएगी, इसका मुझे गम नहीं है लेकिन, मेरी छाया जगत के काम आएगी, इसकी खुशी मुझे है, इसी का नाम है महापुरुष। संसार में सबसे ज्यादा पुण्य का उदय साधु का होता है, तीन लोक में ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं है जो महाराज के पुण्य की बराबरी कर सके, बस साधु की विशेषता एक है, अपने पुण्य को भोगता नहीं, उसे भोगने का भाव नहीं आता, भोगना पड़े तो मजबूरी है कि मेरा पुण्य मेरे काम क्यों आ गया, ये खेद साधु को होता है। पुण्य के कारण से कई चीजों की उपलब्ध होती है तो उसे खुशी नहीं होती, वह खेद नहीं करेगा तो उदासीन रहेगा। उनके फल को भोगने में साधु उदासीन हो जाए तो समझना साधना में अतिशय होने वाला है और पुण्य के उदय को ठुकरा दे तो समझना वह साधु से भगवान बनने वाला है।</p>
<p><strong>सिद्धालय में बैठने से भगवान को आनंद है</strong></p>
<p>उस कार्य को करो जिससे तुम्हें लाभ न हो, जगत को लाभ हो, वह पुण्य धर्म कहलाता है। जिस क्रिया में स्वयं का लाभ या स्वार्थ निहित हो, महानुभाव! वो धर्म की कोटि में नही आता क्योंकि, सभी संसारी प्राणी अपने लिए करते है। जब कोई भी धर्म की क्रिया करने में तुम्हें यह भाव आ जाए कि इस क्रिया से मुझे यह लाभ है, यहाँ मेरा यश और प्रसिद्धि बढ़ेगी तो वहां वह धर्म नहीं, वह तो सभी करते हैं लेकिन इसको थोड़ा सा परिवर्तित कर दो, वह धर्म की कोटि में आ जायेगा जहां तुम्हारा स्वार्थ नहीं है, लेकिन तुम्हारे धर्म करने से जगत के स्वार्थ की सिद्धि हो जाएगी। सिद्धालय में बैठने से भगवान को आनंद है लेकिन मंदिरों में बैठने से भगवान को किंचित मात्र भी आनंद नहीं है फिर भी साक्षात तीर्थंकर से ज्यादा अतिशय व शक्ति मंदिर में बैठे भगवान में होती है क्योंकि मंदिर में जब भी भगवान बैठेगा, वह स्वयं के लिए नहीं, सारे जगत के लिए बैठेगा।</p>
<p><strong>तीर्थ क्षेत्र को कभी सीमित मत रखना</strong></p>
<p>तीर्थक्षेत्र क्यों बनते हैं? इसका मूल उद्देश्य होता है- तीर्थांे में वो ताकत होती है, जो एक तक सीमित नहीं, असीम हो जाते है। तीर्थ क्षेत्र को कभी सीमित मत रखना क्योंकि यह सूर्य के समान होते हैं। दीपक उतने ही कमरे प्रकाश देता है जितने में जलाया है लेकिन सूरज पूर्व में उगता है लेकिन प्रकाश सारे जगत को देता है। मंदिर दीपक के समान है और तीर्थक्षेत्र सूरज के समान प्रकाशमान होते है। बस तुम्हारे मन में ये भाव आ जाये कि कोई मुझे लाभ दें या हानि दंे, मैं सदा उसको सुखी ही देखना चाहूंगा तो धर्म आ गया, ये तीर्थक्षेत्र ऐसे ही होते है।</p>
<p><strong>एक धर्मात्मा धर्म से कैसे ऊब गया,</strong></p>
<p>कॉलोनी में मंदिर बनाते हो तो अपने लिए बनाते हो वो तो मजबूरी है लेकिन, जब तीर्थ में कोई मंदिर बनाओ तो वह अपने लिए नहीं, सारे जगत के लिए होता है, ये है दान। तीर्थ पर दिया गया दान सूरज के समान चमकता है, इसलिए जब तुम्हें तीर्थ पर कुछ करने का या तीर्थ बनाने का या तीर्थ का उद्धार मौका मिले तो चूकना मत। पापी कभी पाप से नहीं ऊबता है, रागी राग से, शराबी शराब से, गुटखा वाला गुटखा खाने से नहीं ऊबता है फिर एक धर्मात्मा धर्म से कैसे ऊब गया, ये समझ में नही आता है। धर्म करने के बाद तुम्हे थकान हो जाए तो समझना तुमने धर्म किया ही नहीं है, तुमने मजबूरी में किया है तो मजदूरी मिलेगी। मोह, राग या स्वार्थ में धर्म किया है तो व्यापार किया है। खेत में बीज बोने के सामान आदि धन फलता है तो वह दान कहलाएगा।</p>
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		<title>तुमने मां-बाप को छोड़ा तो स्वयं को अनाथ बनने का दे दिया निमंत्रण:  जैन समाज जीवन दर्शन और धर्म आध्यात्म की ले रहा सीख </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/when_you_left_your_parent_you_invited_yourself_to_become_an_orphan/</link>
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		<pubDate>Sun, 02 Mar 2025 08:21:07 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मुनिश्री सुधासागर जी महाराज वर्तमान में कटनी क्षेत्र में अपने प्रवचनों से धर्म प्रभावना बढ़ा रहे हैं। उनके आदर्श उद्बोधन से सकल जैन समाज जीवन दर्शन और धर्म आध्यात्म की सीख ले रहा है। यहां पर बड़ी संख्या में उनके अनुयायी और मुनि भक्त नित धर्मसभा का लाभ ले रहे हैं। पढ़िए कटनी से राजीव [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>मुनिश्री सुधासागर जी महाराज वर्तमान में कटनी क्षेत्र में अपने प्रवचनों से धर्म प्रभावना बढ़ा रहे हैं। उनके आदर्श उद्बोधन से सकल जैन समाज जीवन दर्शन और धर्म आध्यात्म की सीख ले रहा है। यहां पर बड़ी संख्या में उनके अनुयायी और मुनि भक्त नित धर्मसभा का लाभ ले रहे हैं। <span style="color: #ff0000">पढ़िए कटनी से राजीव सिंघई की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>कटनी।</strong> जैनदर्शन की असाधारण खोज है- मैं हूं अपने में स्वयं पूर्ण, पर कि मुझमें कुछ गंध नहीं। हर भगवान एक ही बात कहता है तुम मेरे सहारे हो जाओ, तुम्हारा मैं सब कार्य कर दूंगा, तुम मुझे समर्पित हो जाओ, तुम्हारा कोई कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा। विश्व के सारे दर्शनकारों ने अपनी आत्मा को सुरक्षित करने के लिए, आगे बढ़ाने के लिए किसी न किसी आलंबन की चर्चा की है। यह प्रबोधन मुनिश्री सुधासागरजी महाराज ने शनिवार को हुई धर्म सभा में दिया। उन्होंने कहा कि तुम कभी स्वतंत्र होकर कुछ कार्य कर नहीं सकते क्योंकि, प्रत्येक वस्तु स्वयं में असमर्थ है, यदि समर्थ कोई है तो वह है सर्वदृष्टा, ईश्वरीय शक्ति जो अदृश्य है। जब हमें चारों तरफ से सब कुछ मिल जाए और उस समय यदि हमें हर्ष हो गया। हमारा बहुत बड़ा पतन हो गया क्योंकि, हमारी जिंदगी सुबह से शाम तक पराधीन हो गई। अज्ञानी सोचता है कि मुझे सब कुछ मिल गया और ज्ञानी सोचता है कि मैं पग-पग पर पराधीन हो गया।</p>
<p><strong>63 शलाका पुरुषों का आर्यखंड था, उसमें तुम्हारा जन्म हो गया</strong><br />
साधु के स्वास्थ्य की कितनी ही प्रतिकूलता हो, आहार में अंतराय आने पर वह कहता है कि मेरी शांति अनमोल है। इसे एक बाल नहीं बिगाड़ सकता, इसे दो रोटियां नहीं बिगाड़ सकती। वह कहता है कि कर्म यदि जिंदगी भर भी खाने नहीं देगा तो मैं मरना पसंद करूंगा लेकिन, क्रोध नहीं करूंगा क्योंकि, मेरा धर्म अनमोल है। तुम्हारे पास जो अच्छा है तुम्हें पूर्व भव से, 84 लाख योनियों से करोड़ो अरबों जीवों में तुम्हे मनुष्य पर्याय मिली है, ये बहुत दुर्लभ है, उसमें भी भारत में जन्म लेना और दुर्लभ है। जो तीर्थंकर, चक्रवर्ती, 63 शलाका पुरुषों के लिए आर्यखंड था, उसमें तुम्हारा जन्म हो गया।</p>
<p><strong>&#8230;तो भारत में बनूंगा, भारत नहीं छोड़ूंगा</strong><br />
भारत में जन्म लेने वालों से मेरा कहना है अनमोल कर दो इस भारत के जन्म को। भारत में 5 लाख का पैकेज और विदेश में 45 लाख का पैकेज मिला तो इस 45 लाख के डिफरेंस ने भारत के जन्म को निर्मूल कर दिया। कर्म कहता है कि तूने अनमोल को मूल्य में बेच दिया तो जा अब तू म्लेच्छ खंडों में जन्म लेगा, नरक निगोद की योनियों में जन्म मिलेगा और जिनकी दृष्टि में अनमोल आ गया, वह कहता है कि मुझे भिखारी भी बनना पड़ा तो भारत में बनूंगा, भारत नहीं छोड़ूंगा। जैन दर्शन तुम्हें तब समझ में आएगा जिस दिन तुम पुण्य को ठुकराना सीख जाओगे, जिस पुण्य से मेरा भारत देश छूटता है, मैं उस पुण्य को ठुकराता हूं।</p>
<p><strong>लोभ ने तुम्हें इतना लोभी बना दिया</strong><br />
शास्त्रों में आया है कि किसके हाथ का सबसे बड़ा शगुन होता है, शिल्प शास्त्र में आया है कि किससे शिला रखवाएं, शिला की पूजन किससे करवाएं? उस महिला को जिसके दोनों पक्षों में अधिकतम पीढ़ी जिंदा हो। सबसे ज्यादा सौभाग्यशाली कहां पीहर के, पीहर में कितने लोग जिंदा है, पिता, पिता के पिता और फिर ससुराल पक्ष में। इस तरह जो दोनों तरफ से सोने की सीढ़ी चढ़ चुके हो, उस दंपति को सबसे शुभ माना गया है कि कितना पुण्यात्मा है कि चौथी पीढ़ी हो गई। क्या है सोने की सीढ़ी चढ़ना, इतना अनमोल है कि तीन लोक का राज्य दे दो तो भी मैं मां-बाप को नहीं छोड़ सकता। जब जब मां-बाप को अनमोल न करके तुमने मां-बाप को किसी भी कारण से छोड़ा है तो स्वयं को अनाथ बनने का निमंत्रण दे दिया है। क्यों मर जाते हैं माता-पिता छोटी उम्र में बच्चों को छोड़कर क्योंकि, तुम थोड़े से लोभ में आकर मां-बाप को छोड़कर चले गए होंगे। 45 लाख के लोभ ने तुम्हें इतना लोभी बना दिया कि जिस अवस्था में उन्हें तुम्हारे सहारे की जरूरत थी, महाराज बन जाते तो फिर भी तसल्ली थी, इससे अच्छा मर जाते तो भी तसल्ली थी।</p>
<p><strong>जहां मेरे तीर्थक्षेत्र नहीं है वहां मैं नहीं जाऊंगा</strong><br />
कहो भगवान से कि कोई मुझे तीन लोक के संपदा भी दें तो मैं वहां बसने को तैयार नहीं हूं, जहां तेरा मंदिर नहीं होगा, जिनेंद्र देव के लिए पुण्य को ठुकरा दो, जाओ वह गारंटी कार्ड दे रहा हूं, सीधे यहां के बाद मूर्ति का दर्शन नहीं, समवशरण में बैठकर साक्षात जिनेंद्र देव का दर्शन करोगे, बस अनमोल कर दो। जहां मेरे तीर्थक्षेत्र नहीं है वहां मैं नहीं जाऊंगा, तुमने ऐसा भाव कर लिया तो तुम वो पावन बन जाओगे कि जहां तुम्हारे पैर पड़ेंगे, वो जग तीर्थ हो जाएगा। जहां तुम शरीर छोड़ोगे वह सिद्ध क्षेत्र बन जाएगा।</p>
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		<title>तुम जैन हो तो अपना कोई आसाधारण लक्षण बताओ: मुनिश्री सुधासागर जी ने प्रवचन में फैलाया ज्ञान का प्रकाश </title>
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		<pubDate>Fri, 28 Feb 2025 10:05:20 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मुनिश्री सुधासागर जी महाराज ने अपने प्रवचनों में जैन समाज के श्रावक-श्राविकाओं को धर्म और ज्ञान से संबंधित उपदेश दे रहे हैं। मुनिश्री कटनी में धर्म सभा को संबोधित कर रहे हैं। यहां बड़ी संख्या में उनके प्रवचन और अमृत वचन सुनने के लिए जैन समाज के लोग जुट रहे हैं। पढि़ए कटनी से राजीव [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>मुनिश्री सुधासागर जी महाराज ने अपने प्रवचनों में जैन समाज के श्रावक-श्राविकाओं को धर्म और ज्ञान से संबंधित उपदेश दे रहे हैं। मुनिश्री कटनी में धर्म सभा को संबोधित कर रहे हैं। यहां बड़ी संख्या में उनके प्रवचन और अमृत वचन सुनने के लिए जैन समाज के लोग जुट रहे हैं। <span style="color: #ff0000">पढि़ए कटनी से राजीव सिंघई की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>कटनी।</strong> मुनिश्री सुधासागर जी महाराज ने अपने प्रवचनों में जैन समाज के श्रावक-श्राविकाओं को धर्म और ज्ञान से संबंधित उपदेश दिए। उनकी धर्म सभा कटनी में चल रही है। यहां संबोधित करते हुए मुनिश्री ने कहा कि दो प्रकार का ज्ञान होता है। एक वस्तु को जानने के लिए ज्ञान किया जाता है और एक वस्तु के निर्णय होने के बाद ज्ञान होता है। ज्ञान हर जीव को है लेकिन, जानने के लिए उपयोग करता है। क्यों जानना चाहते हो दुनिया को, क्यों जानने चाहते हो अपने पड़ोसी को, क्या लेना-देना है उससे? जितना अपनों को, गुरु को और भगवान को और हद तो वहां है, जहां अपने आप को भी जानने की इच्छा नहीं होती। जितना दुश्मन को जानने की इच्छा रहती है। मैं क्या हूं, ये नहीं सोच रहा है। मैं कहां से आया हूं। कहां जाना है ये सोचने का समय ही नहीं है। 24 घंटे में हमने क्या किया है? ये याद ही नहीं रहता, बस यही सबसे बड़ी भूल हो रही है। जितना हम दुश्मन को जानने में समय दे रहे हैं कि 24 घंटे हमारा दुश्मन क्या कर रहा है, उतना समय कम से कम हम अपने को और अपनों को जानने में दे दें।</p>
<p><strong>शास्त्र पढो तो मनुष्य पुराण पढ़ना, धर्म पुराण नहीं</strong></p>
<p>तुम कौन हो? इतना सा तुम्हे अपनें अनुभव में लाना है, तुम मनुष्य हो, इतना तो सबको अनुभव में आ रहा है ज्ञानी-अज्ञानी सबके अनुभव में आता है। बस अब तुम्हे दूसरा पुराण पढ़ना ही नहीं है, मैं मनुष्य हूँ, मनुष्य की पढ़ाई करो, मनुष्य के जीवन को मैं कैसे सुखी बनाऊँ, कैसे इसमें मनुष्यता आवे और मनुष्य की जिंदगी को कैसे खतरे से बचाऊँ और भविष्य में भी मैं मनुष्य बनता रहूँ। उस संबंध में ही गुरु से पूछना, मैं मनुष्य हूँ, मुझे मनुष्यता सिखाओ। शास्त्र पढो तो मनुष्य पुराण पढ़ना, धर्म पुराण नहीं। मनुष्य बनने के लिए आप पशु को समझो कि पशु के अलावा हम मनुष्य क्यों है? कोई तुम्हें पशु कहे और तुम्हें बुरा लग जाए तो समझना तुम पशु नहीं हो। कोई एक चीज ढूंढो जो मनुष्यों में ही हो सकती है, पशुओं में नहीं। मैं ऐसा क्या कर सकता हूँ, जो पशु नहीं कर सकता, बस वो चीज खोजना है। तुम मनुष्य हो कोई आसाधारण लक्षण बताओ।</p>
<p><strong>भारत अपनी संस्कृति को माता कहता है</strong></p>
<p>फिर गुरु तुमसे दूसरा प्रश्न पूछते हैं कि तुम मनुष्य ही हो या कुछ भी हो क्योंकि, मनुष्य तो सारी दुनिया में है, नहीं महाराज मैं मनुष्य हूं लेकिन आर्यखंड का हूँ, मैं भारतीय हूँ। अब तुम अपने अंदर वह गुण बताओ जो केवल भारतीयों में होता है, विदेशियों में नहीं। भारतीय व्यक्ति परमार्थ चाहता है, भारत अपनी संस्कृति को माता कहता है, नारी शब्द और माता शब्द में कितना अंतर है, माता शब्द पूजनीय वंदनीय और श्रद्धा का विषय है, शिक्षक है, गुरु है और नारी क्या ये पापियों से पूछो। वासनाओं से भरा हुआ जीव दुनिया को नारी दृष्टि से देखता है और पवित्रता से भरा हुआ जीव नारी को माता की दृष्टि से देखता है, इस बात को लेकर कहा कि भारत देश किसी से मैचिंग नहीं करता। अगर तुमसे प्रश्न पूछा जाए कि अगला जन्म किस देश में चाहते हो, उत्तर भारत हो तो भारतीय पुराण पढो। तुम भारतीय हो तो भारतीय की आंख ऐसी होती है जो धरती को भी माँ कहता है और पराई नारियों को भी माँ की दृष्टि से देखता है। मेरी आँख अपने से बड़ी को माँ, छोटी हो तो बिटिया और बराबरी की हो तो बहन का रूप देखती है, इसलिए मैं ओरिजनल भारतीय हूँ। ये गुण तुम्हारे अंदर मरते समय तक है तो गारन्टी मैं देता हूँ नियम से अगला जन्म भारत मे ही होगा।</p>
<p><strong>सारा जगत जैन भोजन को जानता है</strong></p>
<p>अब भारतीय में भी कौन हो? जैन हो। यदि जैन हो तो तुम में ऐसा क्या लक्षण है जो दूसरों में नहीं पाया जाता। तुम वह लक्षण लेकर मरना कि जैन कुल में जन्म लेने की यह विशेषता है और जो मेरे में गुण है वह संसार में कहीं नहीं मिल सकता है क्योंकि मैं जैन हूँ तो अगला भव नियम से तुम्हारा जैन में पक्का है, कोई नही टाल सकता है। सब तरफ से पहचानों, जैनियों का घर कैसा होता है, जो लक्षण दूसरों के घरों में नहीं मिलना चाहिए, जैनी कैसा होता है? ये घर जैनियों का है क्योंकि यहां सदा मुनियों का पड़गाहन होता रहता है। 24 घंटे यदि जैन हो तो ऐसा कुछ खाओ जो मात्र जैनी की ही थाली में होता हो। दुनिया में आज तक किसी धर्म के नाम पर भोजन का नाम नहीं रखा गया लेकिन, सारा जगत जैन भोजन को जानता है। तुम्हारा अगला जन्म जैनकुल में होगा, बस खाते समय वही खाना जो जैनी की पहचान हो।</p>
<p><strong>ऐसी वंदना करो जैसे तीर्थक्षेत्र की वंदना कर रहे </strong></p>
<p>जिनेंद्र भगवान हमारे पूर्वज है तो हमें उनके संबंध में परिचय प्राप्त करना है। मैं जैन हूं क्योंकि, मुझे 24 भगवानों के नाम याद है। जैनियों को 24 तीर्थंकर के नाम तो आना ही चाहिए क्योंकि, हमे अपने बाप का नाम तो याद होना चाहिए और जैनियों का बाप है- जिनंेद्र देव। ऐसे होते हैं हमारे भगवान, ऐसे होते हैं हमारे गुरु इतना बेसिक ज्ञान तो हमें होना ही चाहिए। साल भर में अपने नगर के सारे मंदिरों की ऐसी वंदना करना चाहिए, जैसे तीर्थक्षेत्र की वंदना कर रहे हैं। कायदे से वेदी पर जितने भगवान है उतने नमोस्तु बैठकर होना चाहिए, ये नही कर सकते तो नेत्र नमस्कार कर लो। एक गर्दन से प्रणाम होता है, नेत्र नमस्कार का अर्थ है मूर्ति को देखों और आँख झुका लो।</p>
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		<title>आप कहीं संकट में हैं, तो मन से भगवान का स्पर्श कीजिए: प्रवचन में जान रहे हैं गूढ़ रहस्य की बातें </title>
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		<pubDate>Fri, 21 Feb 2025 09:47:00 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मुनि श्री सुधासागर जी महाराज के प्रवचन इन दिनों कटनी में गजरथ महोत्सव में धर्मसभा में चल रहे हैं। रोज उनके प्रवचन सुनने के लिए बड़ी संख्या में जैन समाज के लोग उपस्थित रहकर धर्मलाभ ले रहे हैं। मुनिश्री धर्म आधारित संदेशों के माध्यम से कई गूढ़ रहस्य की आध्यात्मिक बातें बता रहे हैं। पढ़िए [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>मुनि श्री सुधासागर जी महाराज के प्रवचन इन दिनों कटनी में गजरथ महोत्सव में धर्मसभा में चल रहे हैं। रोज उनके प्रवचन सुनने के लिए बड़ी संख्या में जैन समाज के लोग उपस्थित रहकर धर्मलाभ ले रहे हैं। मुनिश्री धर्म आधारित संदेशों के माध्यम से कई गूढ़ रहस्य की आध्यात्मिक बातें बता रहे हैं। <span style="color: #ff0000">पढ़िए कटनी से राजीव सिंघई की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>कटनी।</strong> मुनिश्री सुधासागर जी महाराज ने अपने प्रवचन में गुरुवार को कहा कि नदी जब निकलती है तो बहुत छोटी होती है। इतनी छोटी लगती है कि नदी है या पोखर है लेकिन, धीरे-धीरे नदी अपना स्थान बड़ा बना लेती है कि अथाह अनंत सागर में मिलने की भी ताकत आ जाती है। ऐसे ही अपनी जिंदगी एक छोटे से रूप में शुरू होती है। जब बालक का जन्म होता है तो कोई नहीं कह सकता कि इतना बड़ा भी कभी होगा, इतना बड़ा सोच होगा लेकिन, वह छोटे से अबोध बालक की जिंदगी बढ़ते-बढ़ते केवलज्ञान तक पहुंच जाती है। एक कदम नहीं चलने वाला व्यक्ति मोक्ष तक पहुंच जाता है। अपनी जिंदगी के संबंध में भी नहीं सोच पाता और एक दिन सारी दुनिया के संबंध में सोच लेता है। यह सारे विकासवाद के सूत्र प्रकृति ने हमें दिए हैं। योग्यता के रूप में। अब उस योग्यता को पकाना हमें है और पकने के बाद फिर वह कितना बीज बनेगा। फिर श्रृंखला बन जाती है।</p>
<p><strong>मन की यात्रा बहुत तेज है</strong></p>
<p>रेकी एक ऐसा ओरा है, शास्त्र की भाषा में भावना और विज्ञान की भाषा में ऊर्जा बोलते हैं। ये सब साधक अपनी साधना के बल पर कहीं भी कितनी भी दूर भेजी जा सकती है क्योंकि, आना-जाना साधु का हो नहीं पाता, वह पदयात्री है लेकिन, मन की यात्रा बहुत तेज है। साधु का शरीर कम काम करता है, मन ज्यादा काम करता है। आप श्रावक भी साधु को शरीर से कम चाहा करो, मन से ज्यादा चाहा करो। तीन चीजों से प्राप्त करना है हमें वह वस्तु जो हमारे बुझे हुए दीपक को जला दे तो एक शरीर से छूना होता है जो हमेशा सबके लिए हर समय संभव नहीं। दूसरा वचन से छूना, जैसे- हे! भगवान मैं आपके चरणों में चढ़ा रहा हूं, वचनों में स्त्री पुरुष का भेद नहीं होता। तीसरा मन से छू सकते हो, आंख बंद करो और मन से भगवान के चरणों में सिर रखो, आंख बंद करो और सिद्धालय पहुंच जाओ। सबसे ज्यादा ताकतवर होता है। मन का स्पर्श, शरीर के स्पर्श में इतनी ताकत नहीं, शरीर के स्पर्श में सबसे कम ताकत होती है, उससे ज्यादा वचन के स्पर्श में और सबसे ज्यादा मन के स्पर्श में ताकत होती है।</p>
<p><strong>जिस भगवान की एनर्जी लेना है, उनका ध्यान कीजिए</strong></p>
<p>रेकी लेना है हमें सिद्ध भगवान से, अपने मन को सिद्धालय भेज दो और जैसे पारसनाथ का ध्यान करना है तो पारसनाथ की टोंक पर पहुंचों और ठीक मन को सिद्धालय भेज दो और जो भगवान की काया थी। उस काया प्रमाण सिद्धालय को मन से स्पर्श करो। वहां से एनर्जी आपको ऐसी चालू हो जाएगी कि जैसे मैना सुंदरी ने मन से सिद्धों को छुआ और 700 कोढियों का कोढ़ दूर हो गया। जिस भगवान की एनर्जी लेना है, उनका ध्यान कीजिए। हमंे अपना बुझा हुआ दीपक जलाना है तो पर्टिकुलर किसी एक भगवान को चुनना पड़ेगा, वो कहा है तो शास्त्रों में कहां-जहां उनका निर्वाण भूमि हो। उस निर्वाण भूमि के ठीक 90° के एंगल पर वह सिद्ध परमेष्ठी मिलेंगे क्योंकि, वह ऋजुगति से गए हैं।</p>
<p><strong>ध्यान और ऊर्जा लेने में अंतर है</strong></p>
<p>आप कही संकट में है, आप द्वंद्वों में हैं, आप मन से भगवान का स्पर्श कीजिए। अपने मन के माध्यम से उस मूर्ति से संपर्क कीजिए, पूरी मूर्ति का अवलोकन कीजिए, वहां का स्पर्श करते ही आपको उस मूर्ति से एनर्जी प्राप्त हो जाएगी लेकिन, आपको मन से टच करना पड़ेगा और वह आपको मूर्ति फिक्स करना पड़ेगी। सभी मूर्तियां तब ध्यान में करना जब हमें कुछ नहीं चाहिए, हमें सिर्फ दर्शन, पूजन करना है। इसी प्रकार जब हमें अपने गुरु से एनर्जी चाहिए तो किसी एक महाराज को आंख बंद करके मन से चरणों में स्पर्श कीजिए। उनसे एनर्जी मिलना चालू हो जाएगी। ध्यान और ऊर्जा लेने में अंतर है। ध्यान में हम तदरूप होते हैं, ध्यान में एनर्जी मिलती नहीं है, ध्यान में एनर्जी जागती है।</p>
<p><strong>एनर्जी प्राप्त होगी तो हाथ से छूने पर होती है</strong></p>
<p>महिला है, बालक है या जंगल में है तो कैसे एनर्जी प्राप्त करें तो उस स्थिति में आप मन का स्पर्श करें। मन का स्पर्श करने पर आपको वही एनर्जी प्राप्त होगी तो हाथ से छूने पर होती है। 24 घंटे में एक बार भगवान को छू लिया करो। उसके लिए धोती दुपट्टा पहनना पड़ेगा, नहाना पड़ेगा और सब नहीं छू सकते। अब गंधोदक की बात आती है कि भगवान को जिसने छू लिया है उस जल को छू लिया करो, उसको महिला, पुरुष सब छू सकते। राहु-केतु को पचाने की सबसे बड़ी ताकत पुष्पदंत भगवान में है, भगवान को कुछ नहीं करना उनका मगरमच्छ ही निपटा देता है। शनिवार को कहीं मत भटको, न शनि देवता को तेल लगाओ, उस दिन मुनिसुव्रतनाथ भगवान का अभिषेक कर लो।</p>
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