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	<title>आध्यात्मिक चेतना &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<title>आध्यात्मिक चेतना &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>आचार्यश्री १०८ विनिश्चय सागरजी महाराज : त्याग, तपस्या और आध्यात्मिक चेतना के प्रतीक </title>
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		<pubDate>Thu, 25 Jun 2026 09:57:41 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[वाक्केशरी आचार्यश्री 108 विनिश्चय सागरजी महाराज के अवतरण दिवस पर उनके तप, त्याग, वैराग्य, विद्वता और आध्यात्मिक जीवन पर विशेष लेख। उनका जीवन जैन समाज और युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत है। पढ़िए श्रीफल साथी मनोज जैन नायक का यह विशेष आलेख । मुरैना। भारतीय संत परंपरा में अनेक ऐसे महापुरुष हुए हैं [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>वाक्केशरी आचार्यश्री 108 विनिश्चय सागरजी महाराज के अवतरण दिवस पर उनके तप, त्याग, वैराग्य, विद्वता और आध्यात्मिक जीवन पर विशेष लेख। उनका जीवन जैन समाज और युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत है। <span style="color: #ff0000">पढ़िए श्रीफल साथी मनोज जैन नायक का यह विशेष आलेख ।</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना।</strong> भारतीय संत परंपरा में अनेक ऐसे महापुरुष हुए हैं जिन्होंने अपने तप, त्याग और आध्यात्मिक साधना से समाज को नई दिशा प्रदान की। गणाचार्यश्री विरागसागरजी महाराज के परम प्रभावक एवं आज्ञानुवर्ती शिष्य वाक्केशरी आचार्यश्री 108 विनिश्चय सागरजी महाराज का जीवन भी इसी दिव्य परंपरा का उज्ज्वल उदाहरण है। उनके अवतरण दिवस पर श्रद्धालुजन उन्हें विनम्र नमन कर रहे हैं।</p>
<p><strong>संत सान्निध्य का दुर्लभ सौभाग्य</strong></p>
<p>संतों का सान्निध्य, समागम और उनकी वाणी का श्रवण विरले ही व्यक्तियों को प्राप्त होता है। दिगम्बर जैन संतों की कठोर चर्या, तपस्या, संयम और त्याग समाज को सदैव प्रेरित करते हैं। आचार्यश्री विनिश्चय सागरजी महाराज का तेजस्वी व्यक्तित्व, वात्सल्य और ओजस्वी वाणी श्रद्धालुओं के हृदय को सहज ही आकर्षित करती है।</p>
<p><strong>जन्म और प्रारंभिक जीवन</strong></p>
<p>आचार्यश्री विनिश्चय सागरजी महाराज का पूर्वाश्रम नाम अरुण कुमार जैन था। आपका जन्म 26 जून 1973 को मध्यप्रदेश के दमोह जिले के पथरिया ग्राम में एक धार्मिक एवं संस्कारवान दिगम्बर जैन परिवार में हुआ। आपकी माताजी का नाम श्रीमती कुसुमदेवी जैन तथा पिताजी का नाम श्री रमेशचंद्र जैन है। बाल्यकाल से ही धर्म, अध्ययन और वैराग्य के संस्कार आपके जीवन में विद्यमान रहे।</p>
<p><strong>वैराग्य से संयम पथ तक</strong></p>
<p>धर्म के प्रति गहन अनुराग और आत्मकल्याण की तीव्र भावना ने आपको सांसारिक जीवन से विरक्त कर दिया। 29 जनवरी 1995 को आपने गृह त्याग किया। इसके बाद 26 फरवरी 1995 को अतिशय क्षेत्र आहारजी में ब्रह्मचर्य व्रत धारण किया तथा 23 फरवरी 1996 को देवेंद्र नगर में ऐलक दीक्षा प्राप्त की।</p>
<p><strong>मुनि दीक्षा और साधना का उत्कर्ष</strong></p>
<p>14 दिसंबर 1998 को मध्यप्रदेश के बरासो क्षेत्र में पूज्य गणाचार्य विरागसागरजी महाराज से मुनि दीक्षा ग्रहण कर आपने आध्यात्मिक जीवन की नई यात्रा प्रारंभ की। गुरुदेव के सान्निध्य में कठोर तप, गहन अध्ययन और साधना के माध्यम से आपने अपने व्यक्तित्व को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया।</p>
<p><strong>आचार्य पद की गौरवपूर्ण प्राप्ति</strong></p>
<p>आपकी असाधारण साधना, विद्वता और संघ संचालन क्षमता को देखते हुए वर्ष 2005 में महाराष्ट्र के कुण्थलगिरि में आपको आचार्य पद हेतु घोषित किया गया। इसके पश्चात 24 मई 2017 को अतिशय क्षेत्र करगुवांजी (झांसी) में गणाचार्य विरागसागरजी महाराज द्वारा आपको आचार्य पद के संस्कार प्रदान किए गए। वर्तमान में आप सम्पूर्ण जैन समाज में श्रद्धा और प्रेरणा के प्रमुख केन्द्र हैं।</p>
<p><strong>अध्ययन और विद्वता की अद्भुत साधना</strong></p>
<p>आचार्यश्री केवल तपस्वी संत ही नहीं, बल्कि उत्कृष्ट विद्वान और गंभीर चिंतक भी हैं। आपने श्रावकाचार, द्रव्यसंग्रह, मोक्षशास्त्र, पुरुषार्थसिद्ध्युपाय, इष्टोपदेश, समयसार, परीक्षामुख, न्यायदीपिका, मूलाचार, गोम्मटसार जीवकाण्ड, सर्वार्थसिद्धि, धवला सहित अनेक जैन आगम एवं दार्शनिक ग्रंथों का गहन अध्ययन किया है।</p>
<p><strong>समाज और युवाओं के लिए प्रेरणा</strong></p>
<p>अपने प्रवचनों के माध्यम से आचार्यश्री ने असंख्य लोगों को अहिंसा, सदाचार, आत्मानुशासन और आत्मकल्याण का मार्ग दिखाया है। उनके सरल, तर्कसंगत और जीवनोपयोगी उपदेश समाज को नैतिक मूल्यों की ओर प्रेरित करते हैं। उनका जीवन यह संदेश देता है कि सच्चा सुख भौतिक साधनों में नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति में निहित है।</p>
<p><strong>मुरैना से विशेष आत्मीय संबंध</strong></p>
<p>संस्कारधानी धर्मनगरी मुरैना में आचार्यश्री के दो चातुर्मास सम्पन्न हो चुके हैं। पहला चातुर्मास ऐलक अवस्था में वर्ष 1998 में तथा दूसरा मुनि अवस्था में वर्ष 2014 में हुआ था। आज भी श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन पंचायती बड़ा मंदिर, मुरैना में उनकी ओजस्वी वाणी और वात्सल्यपूर्ण उपदेशों की स्मृतियां जीवंत हैं।</p>
<p><strong>श्रद्धा और नमन</strong></p>
<p>आचार्यश्री 108 विनिश्चय सागरजी महाराज का जीवन त्याग, संयम, साधना और आध्यात्मिक चेतना का अनुपम उदाहरण है। उनके अवतरण दिवस पर चरण सेवक एवं समस्त श्रद्धालु उनके श्रीचरणों में कोटिशः वंदन और नमन अर्पित करते हैं तथा उनके स्वस्थ, मंगलमय और दीर्घ धर्मप्रभावना युक्त जीवन की कामना करते हैं।</p>
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		<title>भक्ति और वैराग्य का अनुपम संगम: भगवान मुनिसुव्रतनाथ जी के जन्म एवं तप कल्याणक 12 अप्रैल को </title>
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		<pubDate>Sat, 11 Apr 2026 14:22:28 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[तीर्थंकर मुनिसुव्रतनाथ स्वामी जैन धर्म के 20वें तीर्थंकर हैं। चैत्र शुक्ल दशमी का यह पावन दिन जैन जगत के लिए दोहरी खुशियों और आध्यात्मिक चेतना का अवसर लेकर आता है। चैत्र शुक्ल दशमी के दिन भगवान के जन्म और तप कल्याणक मनाया जाता है। इस बार यह 12 अप्रैल को आ रहा है। श्रीफल जैन [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>तीर्थंकर मुनिसुव्रतनाथ स्वामी जैन धर्म के 20वें तीर्थंकर हैं। चैत्र शुक्ल दशमी का यह पावन दिन जैन जगत के लिए दोहरी खुशियों और आध्यात्मिक चेतना का अवसर लेकर आता है। चैत्र शुक्ल दशमी के दिन भगवान के जन्म और तप कल्याणक मनाया जाता है। इस बार यह 12 अप्रैल को आ रहा है। <span style="color: #ff0000">श्रीफल जैन न्यूज की विशेष शृंखला में आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह संकलित, संयोजित और संपादित प्रस्तुति&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> तीर्थंकर मुनिसुव्रतनाथ स्वामी जैन धर्म के 20वें तीर्थंकर हैं। चैत्र शुक्ल दशमी का यह पावन दिन जैन जगत के लिए दोहरी खुशियों और आध्यात्मिक चेतना का अवसर लेकर आता है। आज ही के दिन प्रभु का जन्म कल्याणक और दीक्षा (तप) कल्याणक मनाया जाता है। यह दिन हमें सिखाता है कि कैसे राजसी सुखों के बीच रहकर भी आत्मा को परमात्मा बनाने की यात्रा शुरू की जाती है। भगवान मुनिसुव्रतनाथ जी का जन्म मगध देश की प्रसिद्ध नगरी राजगृह में हुआ था। इनके पिता राजा सुमित्र और माता रानी पद्मावती थीं।</p>
<p>अद्भुत आभा: प्रभु के शरीर का वर्ण ‘नीलमणि’ के समान श्यामल (नीला) था।</p>
<p>चिह्न: उनका लक्षण ’कछुआ (कूर्म)’ है, जो हमें अपनी इंद्रियों को समेटकर अंतर्मुखी होने का संदेश देता है।</p>
<p>अनुशासन का प्रतीक: मुनिसुव्रतनाथ जी के काल में मर्यादा पुरुषोत्तम राम का भी अस्तित्व माना जाता है, जिससे यह काल नैतिकता और अनुशासन के चरमोत्कर्ष का प्रतीक है। जब प्रभु का जन्म हुआ, तब इंद्रों ने सुमेरु पर्वत पर उनका जन्माभिषेक किया और संपूर्ण विश्व में सुख-शांति की लहर दौड़ गई।</p>
<p><strong>वैराग्य की ओर कदम: तप कल्याणक का संदेश</strong></p>
<p>भोग से योग की ओर संक्रमण ही जैन धर्म का मूल है। भगवान मुनिसुव्रतनाथ ने हजारों वर्षों तक राज्य संचालन किया, लेकिन उनके भीतर वैराग्य की लौ सदैव प्रज्वलित रही। जैसे कमल जल में रहकर भी उससे अछूता रहता है, वैसे ही प्रभु राजसी वैभव में रहकर भी विरक्त रहे।</p>
<p>चैत्र शुक्ल दशमी के दिन ही उन्होंने दीक्षा ग्रहण की। प्रभु ने सांसरिक मोह-माया का त्याग कर ‘नील’ नामक वन में जाकर जैनेश्वरी दीक्षा धारण की। उनके साथ हजारों राजाओं ने भी आत्म-कल्याण का मार्ग चुना। यह तप कल्याणक हमें याद दिलाता है कि वास्तविक शक्ति बाहरी विजय में नहीं, बल्कि अपनी इंद्रियों और इच्छाओं पर विजय प्राप्त करने में है।</p>
<p><strong>आज के दिन कैसे बढ़ाएं भक्ति प्रभावना?</strong></p>
<p>इस विशेष अवसर पर श्रावक-श्राविकाओं को अपनी आध्यात्मिक ऊर्जा बढ़ाने के लिए यह क्रियाएँ करनी चाहिए।</p>
<p>अभिषेक एवं शांतिधारा: प्रातः काल जिनालय जाकर प्रभु का केसरिया जल से अभिषेक करें।</p>
<p>पूजन और अर्घ्य: मुनिसुव्रतनाथ पूजन के माध्यम से उनके गुणों का स्तवन करें और विशेष अर्घ्य समर्पित करें।</p>
<p>सामायिक और ध्यान: कम से कम 48 मिनट का मौन रखकर प्रभु के स्वरूप का ध्यान करें।</p>
<p>शनि दोष निवारण: जैन परंपरा में मान्यता है कि भगवान मुनिसुव्रतनाथ की भक्ति करने से शनि ग्रह के अशुभ प्रभाव दूर होते हैं, क्योंकि वे न्याय और अनुशासन के स्वामी हैं।</p>
<p><strong>निष्कर्ष: प्रभु का मार्ग ही सच्चा मार्ग</strong></p>
<p>भगवान मुनिसुव्रतनाथ जी का जीवन हमें ‘व्रत’ की महिमा सिखाता है। उनके नाम में ही ‘मुनि’ और ‘सुव्रत’ (श्रेष्ठ व्रत) समाहित है। आज के इस आपाधापी भरे युग में प्रभु का संयम और तप हमें मानसिक शांति और सही दिशा प्रदान कर सकता है। आइए, इस चैत्र शुक्ल दशमी पर हम संकल्प लें कि हम भी प्रभु के बताए मार्ग पर चलते हुए अपने जीवन में अल्प मात्रा में ही सही, पर ‘व्रत’ और ‘नियम’ को स्थान देंगे।</p>
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		<title>आस्था, संयम और साधना की यात्रा : श्री शांतिनाथ सेवा संघ की वार्षिक तीर्थ यात्रा 23 जनवरी से </title>
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		<pubDate>Wed, 31 Dec 2025 08:16:47 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[ शांतिनाथ सेवा संघ (दिल्ली) की वार्षिक तीर्थ यात्रा आगामी 23 जनवरी से श्रद्धा और उल्लास के साथ प्रारंभ होने जा रही है। इस पावन यात्रा का उद्देश्य केवल तीर्थ दर्शन नहीं, बल्कि श्रद्धालुओं को आत्मसंयम, समभाव और आध्यात्मिक चेतना की अनुभूति कराना है। दिल्ली से पढ़िए, हर्ष जैन की यह खबर&#8230; दिल्ली।धर्म, आस्था और आत्मशुद्धि [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong> शांतिनाथ सेवा संघ (दिल्ली) की वार्षिक तीर्थ यात्रा आगामी 23 जनवरी से श्रद्धा और उल्लास के साथ प्रारंभ होने जा रही है। इस पावन यात्रा का उद्देश्य केवल तीर्थ दर्शन नहीं, बल्कि श्रद्धालुओं को आत्मसंयम, समभाव और आध्यात्मिक चेतना की अनुभूति कराना है। <span style="color: #ff0000">दिल्ली से पढ़िए, हर्ष जैन की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>दिल्ली।</strong>धर्म, आस्था और आत्मशुद्धि की भावना को सुदृढ़ करने वाली श्री शांतिनाथ सेवा संघ (दिल्ली) की वार्षिक तीर्थ यात्रा आगामी 23 जनवरी से श्रद्धा और उल्लास के साथ प्रारंभ होने जा रही है। इस पावन यात्रा का उद्देश्य केवल तीर्थ दर्शन नहीं, बल्कि श्रद्धालुओं को आत्मसंयम, समभाव और आध्यात्मिक चेतना की अनुभूति कराना है। यात्रा के मुख्य संयोजक गोकुलचंद जैन ने बताया कि यह विशाल तीर्थ यात्रा दिल्ली, आगरा एवं झाँसी से प्रस्थान करने वाली चार विशेष ट्रेनों के माध्यम से संचालित होगी। इन ट्रेनों द्वारा श्रद्धालु अयोध्या, काशी (बनारस) सहित अनेक पवित्र तीर्थ स्थलों के दर्शन करेंगे, जहाँ अध्यात्म की दिव्य तरंगें आत्मा को शांति और संतोष प्रदान करती है।</p>
<p><strong>621 श्रद्धालु यात्री सम्मिलित होंगे</strong></p>
<p>इस वर्ष की यात्रा में 621 श्रद्धालु यात्री सम्मिलित हो रहे हैं। सेवा संघ द्वारा यात्रियों के लिए यात्रा, आवास, भोजन, स्वच्छता और सुरक्षा की उत्कृष्ट व्यवस्थाएं सुनिश्चित की गई हैं, ताकि श्रद्धालु पूर्ण निश्चिंतता के साथ प्रभु भक्ति में लीन रह सकें। यात्रियों को समय-समय पर आवश्यक दिशा निर्देश और जानकारी उपलब्ध कराई जा रही है। इस आध्यात्मिक यात्रा का संचालन संघ की अनुभवी और समर्पित समिति द्वारा किया जा रहा है। समिति में अध्यक्ष हरिश्चंद्र जैन, उपाध्यक्ष सुनील जैन, महामंत्री दिनेश जैन टीटू, कोषाध्यक्ष अजय जैन अजिया एवं प्रदीप जैन, मंत्री राजकुमार जैन पप्पू, यातायात मंत्री दीपक जैन दीपू, संगठन मंत्री विशाल जैन एवं मनोज जैन टिंकल, मीडिया प्रभारी लोकेंद्र जैन, तथा प्रचार मंत्री अंकित जैन एवं संजय जैन (मुरैना) अपनी सेवाएं प्रदान करेंगे।</p>
<p><strong>अनुपम साधना सिद्ध होगी</strong></p>
<p>संघ के सभी पदाधिकारी यात्रा के प्रत्येक चरण में श्रद्धालुओं के साथ रहकर व्यवस्थाओं का मार्गदर्शन करेंगे। यह तीर्थ यात्रा श्रद्धालुओं के लिए आध्यात्मिक उत्थान, धर्मभावना के जागरण और आत्मिक शुद्धि की अनुपम साधना सिद्ध होगी, जो जीवन में शांति, संयम और सदाचार का प्रकाश फैलाएगी।</p>
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		<title>पंचकल्याणक महोत्सव आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर महाराज सानिध्य में सम्पन्न : मोक्षकल्याणक, पिच्छिका परिवर्तन और वात्सल्यमना उपाधि से गूंजा रामगंजमंडी </title>
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		<pubDate>Wed, 12 Nov 2025 15:14:24 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[रामगंजमंडी में आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर महाराज सानिध्य में पंचकल्याणक महोत्सव अत्यंत भव्यता से सम्पन्न हुआ। इस अवसर पर मोक्षकल्याणक महोत्सव, पिच्छिका परिवर्तन और आचार्य श्री को वात्सल्यमना उपाधि से सुशोभित करने का आयोजन हुआ। पढ़िए अभिषेक जैन लुहाड़िया की रिपोर्ट… रामगंजमंडी। नगर के इतिहास का तीसरा पंचकल्याणक महोत्सव आयोजित हुआ। यह आयोजन आचार्य [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>रामगंजमंडी में आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर महाराज सानिध्य में पंचकल्याणक महोत्सव अत्यंत भव्यता से सम्पन्न हुआ। इस अवसर पर मोक्षकल्याणक महोत्सव, पिच्छिका परिवर्तन और आचार्य श्री को वात्सल्यमना उपाधि से सुशोभित करने का आयोजन हुआ। <span style="color: #ff0000">पढ़िए अभिषेक जैन लुहाड़िया की रिपोर्ट…</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>रामगंजमंडी।</strong> नगर के इतिहास का तीसरा पंचकल्याणक महोत्सव आयोजित हुआ। यह आयोजन आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर महाराज संघ सानिध्य एवं प्रतिष्ठाचार्य श्री नमन भैया, पंडित जयकुमार जैन, पंडित सुलभ जैन शास्त्री और आकाश जैन के निर्देशन में सम्पन्न हुआ। श्रद्धालुओं ने पाषाण से भगवान बनने की अद्भुत क्रिया को प्रत्यक्ष देखा और इस क्षण को जीवन का सर्वोत्तम पुण्यफल बताया।</p>
<p><strong>युवाओं ने निभाई प्रमुख भूमिकाएं, धर्म जागृति का बना प्रतीक</strong></p>
<p>इस महोत्सव की विशेषता यह रही कि प्रमुख पात्र युवा वर्ग से थे। इससे समाज में नई ऊर्जा और धर्म की अलख जागृत हुई। आचार्य श्री ने कहा कि धर्म की रक्षा और संयम का पालन युवाओं की सहभागिता से ही संभव है।</p>
<p><strong>प्रातः बेला में सम्पन्न हुआ मोक्षकल्याणक महोत्सव</strong></p>
<p>अंतिम दिन प्रभात बेला में मोक्षकल्याणक महोत्सव का आयोजन हुआ। आचार्य श्री ने प्रवचन देते हुए कहा — “जैनत्व के बिना कर्म क्षय का मार्ग नहीं खुलता। जब हृदय में लोभ-लालसा का क्षय होता है, तभी आत्मा शुद्धि का द्वार खुलता है।” उन्होंने समझाया कि आदि प्रभु ने कैलाश पर्वत पर योग निरोध धारण कर कर्मों का क्षय कर मोक्ष प्राप्त किया।</p>
<p><strong>दोपहर में सम्पन्न हुआ पिच्छिका परिवर्तन समारोह</strong></p>
<p>दोपहर की बेला में परम पूज्य आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर महाराज संघ का पिच्छिका परिवर्तन सम्पन्न हुआ। श्रद्धालुओं ने भक्ति भावना से सुसज्जित थालों से अष्टद्रव्य पूजन किया। इस अवसर पर आरवी सबदरा ने नृत्य प्रस्तुति दी, और सुरलाया, रुचि टोंग्या ने मंगलाचरण प्रस्तुत किया। कार्यक्रम का संचालन मुनि श्री 108 प्रांजल सागर महाराज ने किया।</p>
<p><strong>इनको मिला पुरानी पिच्छिका का सौभाग्य</strong></p>
<p>आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर महाराज की पुरानी पिच्छिका श्रीमान नितिन-कल्पना सबदरा को प्राप्त हुई। मुनि श्री 108 प्रांजल सागर महाराज की पिच्छिका प्रदीप-संगीता विनायका को मिली। मुनि श्री प्रत्यक्ष सागर महाराज की पिच्छिका देवेंद्र-मीनाक्षी टोंग्या को प्राप्त हुई, जबकि प्रमेश सागर महाराज की पिच्छिका प्रदीप कुमार-चंदना लुहाड़िया रामगंजमंडी को प्राप्त हुई। सकल दिगंबर जैन समाज रामगंजमंडी की ओर से आचार्य श्री को “वात्सल्यमना” उपाधि से सम्मानित किया गया। यह उपाधि समाज संरक्षक अजीत सेठी, अध्यक्ष दिलीप विनायका, उपाध्यक्ष चेतन बागड़िया, कमल लुहाड़िया, मंत्री राजीव बाकलीवाल और महावीर मंदिर अध्यक्ष महेंद्र ठोरा सहित अन्य गणमान्यजनों ने संयुक्त रूप से प्रदान की।</p>
<p><strong>आचार्य श्री ने बताया — “पिच्छिका संयम का प्रतीक”</strong></p>
<p>आचार्य श्री ने कहा कि “पिच्छिका निर्ग्रंथ का स्वरूप है। इसके बिना साधु निर्ग्रंथ नहीं हो सकता। यह संयम का प्रमुख उपकरण है और दिगंबर मुद्रा का आधार भी।” उन्होंने कहा कि जैन दर्शन का मूल लक्ष्य जीवों का संरक्षण और आत्मशुद्धि है। मयूर पिच्छिका जीवदया का प्रतीक है, क्योंकि मयूर अपने त्यागे हुए पंख से पिच्छिका बनाता है।</p>
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		<title>श्री इंद्रध्वज विधान के सातवें दिन श्रीजी अभिषेक से गुंजा आगरा जैन समाज : भक्ति और आस्था के सागर में डूबा हरिपर्वत परिसर, ‘‘जय जिनेन्द्र’’ के जयघोष से गूंज उठा परिसर </title>
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		<pubDate>Wed, 29 Oct 2025 14:31:21 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आगरा के हरीपर्वत स्थित एम.डी. जैन इंटर कॉलेज ग्राउंड में चल रहे श्री इंद्रध्वज महामंडल विधान के सातवें दिन भव्य अभिषेक, अष्टद्रव्य आराधना और भक्ति आरती के बीच जैन समाज में दिव्य उत्साह का संचार हुआ। पढ़िए शुभम जैन की रिपोर्ट… आगरा। परम पूज्य आचार्य श्री चैत्य सागर जी महाराज ससंघ के मंगल सान्निध्य एवं [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आगरा के हरीपर्वत स्थित एम.डी. जैन इंटर कॉलेज ग्राउंड में चल रहे श्री इंद्रध्वज महामंडल विधान के सातवें दिन भव्य अभिषेक, अष्टद्रव्य आराधना और भक्ति आरती के बीच जैन समाज में दिव्य उत्साह का संचार हुआ। <span style="color: #ff0000">पढ़िए शुभम जैन की रिपोर्ट…</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>आगरा।</strong> परम पूज्य आचार्य श्री चैत्य सागर जी महाराज ससंघ के मंगल सान्निध्य एवं स्वर्गीय स्वरूपचंद जैन मारसंस की पावन स्मृति में आयोजित श्री इंद्रध्वज महामंडल विधान का सातवां दिवस भी अभूतपूर्व भक्ति, श्रद्धा और आध्यात्मिक ऊर्जा का साक्षी बना। यह दिव्य आयोजन बिमलेश कुमार जैन, ऊषा जैन, नितिन जैन, मेघना जैन, आदित्य जैन, अनुष्का जैन मारसंस परिवार द्वारा एम.डी. जैन इंटर कॉलेज ग्राउंड, हरीपर्वत में आयोजित किया जा रहा है।</p>
<p>29 अक्टूबर की प्रातःकालीन बेला में श्रीजी का अभिषेक विधानाचार्य डॉ. आनंदप्रकाश जैन (कोलकाता) के वैदिक मंत्रोच्चारण के मध्य संपन्न हुआ। इस अवसर पर उपस्थित सैकड़ों श्रद्धालुओं ने 458 चैत्यालयों में विराजमान जिन प्रतिमाओं का जल, पुष्प, फल एवं अष्टद्रव्य से पूजन-अर्चन किया। सौभाग्यशाली भक्तों ने आचार्यश्री का पादप्रक्षालन कर शास्त्र भेंटकर आशीर्वाद प्राप्त किया।</p>
<p><strong>इंद्रध्वज विधान आत्मा की विजय का प्रतीक</strong></p>
<p>आचार्यश्री चैत्य सागर जी महाराज ने अपने मंगल प्रवचन में कहा कि इंद्रध्वज विधान आत्मा की विजय का प्रतीक है — यह साधक को भीतर की शुद्धि एवं स्थिरता के पथ पर अग्रसर करता है। सायं काल भक्ति संगीत और नृत्य आरती के साथ संपूर्ण परिसर ‘‘जय जिनेन्द्र’’ के जयघोषों से गूंज उठा।</p>
<p><strong>यह आयोजन में रहे उपस्थित </strong></p>
<p>इस अवसर पर प्रदीप जैन पीएनसी, डॉ. जितेन्द्र जैन, राकेश जैन, अशोक जैन, अमित सेठी, राजेन्द्र जैन, अजीत प्रसाद जैन, सुनील जैन ठेकेदार, हुकुम जैन, संजय जैन, मीडिया प्रभारी शुभम जैन सहित आगरा जैन समाज के अनेक श्रद्धालु बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।</p>
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		<title>पीपलगोन मंगल प्रवेश यात्रा: आध्यात्मिक चेतना से ओतप्रोत शांति प्रदान करने वाली रही  </title>
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		<pubDate>Tue, 20 May 2025 09:57:12 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[दिन रविवार यानी 18 मई। अवसर अंतर्मुखी मुनिश्री पूज्यसागर जी महाराज का विहार करते हुए जन्मभूमि पीपलगोन में भव्य मंगल प्रवेश का। इंदौर से सुबह 6 बजे बस में सवार होकर यात्रा आरंभ हुई। यह अनूठा अनुभव रहा। श्रीजी के जयकारों के साथ भजन-भक्ति करते हुए पीपलगोन पहुंचे। नगर से करीब एक किमी पहले अंतर्मुखी [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>दिन रविवार यानी 18 मई। अवसर अंतर्मुखी मुनिश्री पूज्यसागर जी महाराज का विहार करते हुए जन्मभूमि पीपलगोन में भव्य मंगल प्रवेश का। इंदौर से सुबह 6 बजे बस में सवार होकर यात्रा आरंभ हुई। यह अनूठा अनुभव रहा। श्रीजी के जयकारों के साथ भजन-भक्ति करते हुए पीपलगोन पहुंचे। नगर से करीब एक किमी पहले अंतर्मुखी मुनिश्री पूज्यसागर जी महाराज के दर्शन पाकर धन्य-धन्य हुए। <span style="color: #ff0000">इंदौर से पढ़िए, यह स्पेशल रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> 18 मई रविवार को अंतर्मुखी मुनिश्री पूज्यसागर जी महाराज का मुनि दीक्षा के 12 वर्षों बाद पहली बार अपने गृहग्राम जन्मभूमि स्थल पीपलगोन में मंगल प्रवेश होने जा रहा था। जितना उत्साह, जितनी उमंग पीपलगोन वासियों में थी। उससे कहीं अधिक इंदौर दिगंबर जैन समाज के मुनि भक्तों, गुरु भक्तों में देखने में आई। इंदौर से जब सुबह 6 बजे के करीब बस पीपलगोन की ओर रवाना हुई तो पूरी बस जयकारों से गूंज उठी। हर भक्त के हाथ तालियों के साथ भजन-भक्ति में लयबद्ध हो रहे थे। पीपलगोन पहुंचने के बाद तो भक्ति अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंच चुकी थी। बैंडबाजों पर नृत्य करते मुनि भक्तों ने मुनिश्री को कार्यक्रम स्थल पांडाल तक लेकर आए। इस बीच जगह-जगह ग्रामीणों और समाजजनों ने मुनिश्री के पाद प्रक्षालन किए। भक्ति का यह अद्भुत दृश्य पीपलगोन की पावन धरती को गौरवान्वित कर रहा था।</p>
<p>अंतर्मुखी मुनिश्री पूज्यसागरजी महाराज ने यहां पहुंचने के बाद सबसे पहले मंदिर में जाकर भगवान के दर्शन किए। वहां से आने के बाद मंचासीन होकर सभी जैन-अजैन भक्तों को आशीवर्चन से उपकृत किया। पाद पूजन, श्रीफल भेंट, अर्घ्य अर्पण के साथ गुरु शास्त्र देव पूजन, शास्त्र भेंट आदि के नियमित विधान संपन्न कराए गए। इस दौरान आराधना और भक्ति का ऐसा दौर देखने में आया कि पूरा पांडाल आचार्यों, मुनिराजों और गुरुवर के जयकारों से गूंजायमान हो गया। यह देखना, अनुभूतना अपने आप में अलौकिक पल से कम नहीं रहा।</p>
<p><strong><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-81201" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/05/IMG-20250520-WA0013.jpg" alt="" width="1040" height="780" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/05/IMG-20250520-WA0013.jpg 1040w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/05/IMG-20250520-WA0013-300x225.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/05/IMG-20250520-WA0013-1024x768.jpg 1024w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/05/IMG-20250520-WA0013-768x576.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/05/IMG-20250520-WA0013-74x55.jpg 74w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/05/IMG-20250520-WA0013-111x83.jpg 111w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/05/IMG-20250520-WA0013-215x161.jpg 215w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/05/IMG-20250520-WA0013-990x743.jpg 990w" sizes="(max-width: 1040px) 100vw, 1040px" />मुनिश्री की प्रकृति, संस्कृति और धर्म के रक्षार्थ देशना </strong></p>
<p>मुनिश्री पूज्यसागर जी महाराज ने यहां धर्मसभा में प्रकृति, संस्कृति और अपने धर्म की रक्षार्थ जो देशना प्रस्तुत की। उसमें सबसे अधिक आध्यात्मिक चिंतन तो था ही अलौकिक शांति का संदेश भी था। अपने प्रवचन के आरंभ में ही मुनिश्री पूज्यसागर जी महाराज ने कहा कि आज समाज, प्रदेश और देश पर संकट के बादल छाए हुए हैं। धर्म और संस्कृति पर पाश्चात्य संस्कृति का हमला हो रहा है। मुनिश्री ने कहा कि निश्चित रूप से तीर्थंकरों की धरती है। महात्माओं की धरती है। जो राम और महावीर हमें धर्म बता कर गए हैं। उसे सुरक्षित रखना है तो हमें कृष्ण का रूप धारण करना पड़ेगा। अब विचार करें कि व्यक्ति उसे समय भी यहां की लोक के माध्यम से मरण को प्राप्त कर सकता है आने वाली पीढ़ी को सुरक्षित रखना है, हमारी संस्कृति को कोई नुकसान पहुंचाए, परिवार को नुकसान पहुंचाएगा उससे बचाने के लिए हमें आगे आना होगा। मुनिश्री ने कहा कि इस धरती पर गर्मी का वातावरण बनेगा तो इंसानों का बाहर निकलना मुश्किल हो जाएगा। धरती मां की बात हो, चाहे भगवान की बात हो उसका संरक्षण करना हमारा काम है। हम भगवान की आराधना करें। हम पूजा करते हैं, अभिषेक करते हैं। पाठ करते हैं, हम गुरु की वंदना करते हैं।</p>
<p>हम उसके साथ कर्तव्य निभाएं। आने वाले समय में अगर हम प्रकृति के प्रति व्यक्ति उदासीनता भाव रहा तो निश्चित रूप से कहता हूं कि हमें अपने जेब में ऑक्सीजन के छोटे-छोटे सिलेंडर लेकर घूमना पड़ेंगे। इस समय के अनुसार धर्म के प्रति आस्थाएं श्रद्धाएं तो कम हो रही हैं। मैं आपसे पूछना चाहता हूं क्या आपने अपने बच्चों के लिए मकान बनाया होगा। खेत खरीदा होगा, लेकिन आने वाली पीढ़ी के लिए ऑक्सीजन की व्यवस्था की है। पर्यावरण की रक्षा के लिए, धरती की रक्षा के लिए हमें अधिक से अधिक पौधे लगाकर उनका लालन पालन करना होगा। खेतों की मेढ़ पर पौधे लगाकर उन्हें पेड़ बनने तक रक्षा करें। मुनिश्री ने कहा कि पीपलगोन में भी बड़े पैमाने पर पौधे लगाकर हरियाली की जाएगी। इसका संकल्प लेना होगा।</p>
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		<title>आदिनाथ और महावीर स्वामी की प्रतिमा पर अद्भुत अद्वितीय शिल्प: एक ही प्रस्तर पर कल्पनातीत चमत्कार  </title>
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		<pubDate>Thu, 27 Mar 2025 07:20:42 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मूर्तिकला, भारतीय स्थापत्य कला के बारे में जितना गहराई से विवेचन करेंगे तो उतना ही यह हमें चमत्कृत करने के लिए विवश करती है। भारत की सरजमीं पर शिल्पकारों ने बेमिसाल शिल्प को गढ़ा है। एक ही पत्थर पर दो देवों की प्रतिमाएं आश्चर्य चकित भी करती है तो आंदोलित भी करती है। मूर्तियों की [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>मूर्तिकला, भारतीय स्थापत्य कला के बारे में जितना गहराई से विवेचन करेंगे तो उतना ही यह हमें चमत्कृत करने के लिए विवश करती है। भारत की सरजमीं पर शिल्पकारों ने बेमिसाल शिल्प को गढ़ा है। एक ही पत्थर पर दो देवों की प्रतिमाएं आश्चर्य चकित भी करती है तो आंदोलित भी करती है। मूर्तियों की एक विशेषता होती है कि वह इतनी प्रभावी होती हैं कि मानव के शरीर को आध्यात्मिक चेतना से भर देती हैं। <span style="color: #ff0000">इंदौर से पढ़िए यह खबर&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>इंदौर।</strong> मूर्ति कला में जैन धर्म के तीर्थंकर एवं देवी देवताओं की प्रतिमाएं संपूर्ण जगत में अपने आप में विशिष्ट स्थान रखती हैं। हर प्रतिमा में हमें कोई ना कोई नई जानकारी प्राप्त होती है। कुछ आकार प्रकार की दृष्टि से प्रसिद्ध है तो कोई अनुपम सौंदर्य लिए हुए आकर्षित किया करती है। कोई प्रतिमा अतिशयकारी होने से जग विख्यात है तो कोई अपनी शांत मुद्रा और प्रशांत वीतरागी छवि के कारण भक्तों को आकर्षित करती है। वर्द्धमानपुर शोध संस्थान के ओम पाटोदी ने बताया कि आदि महावीर प्रकल्प के अंतर्गत हम यहां दो ऐसी विशिष्ट प्रतिमाओं की जानकारी दे रहे हैं, जो एक ही पाषाण में दो तीर्थंकर के दर्शन का लाभ प्राप्त करवाती है।</p>
<p>ये प्रतिमा अपने विशेष शिल्पांकन की दृष्टि से दुनिया में एकमात्र प्रतिमा है। पहली प्रतिमा की जानकारी हमें कर्नाटक से मिली है और दूसरी प्रतिमा की जानकारी हमें उत्तरप्रदेश के देवगढ़ से मिली है। कर्नाटक की प्रतिमा एक सामान्य तीर्थंकर प्रतिमा है परंतु, जब हम इसे ग़ौर से देखते हैं तो इसमें हमें दो तीर्थंकर के दर्शन प्राप्त होते हैं। शिल्पकार ने इसके आधे हिस्से को प्रथम तीर्थंकर भगवान श्री आदिनाथ को उनके चिन्ह और विशेषताओं के साथ प्रदर्शित करने की कोशिश की है। वहीं आधे हिस्से में उसे इस प्रकार बनाया की वह अंतिम तीर्थंकर भगवान श्री महावीर स्वामी का दर्शन करवाती है। इसी प्रकार देवगढ़ की यह प्रतिमा एक ही शिला फलक पर इस तरह से बनाईं गई है कि आगे जब हम दर्शन करते हैं तो हमें आदिनाथ भगवान दिखाई देते हैं और जब हम घूमकर पीछे जाते हैं तो हमें अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी के दर्शन होते हैं। यह अद्भुत सोच शिल्पकार की उम्दा सोच का परिणाम है।</p>
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