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	<title>आत्मजागरण &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<title>आत्मजागरण &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>श्रुत पंचमी ज्ञान और आत्मजागरण का महापर्व : आचार्यश्री निर्भयसागर जी ने श्रुत पंचमी महापर्व का महत्व बताया </title>
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		<pubDate>Thu, 18 Jun 2026 14:10:22 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री निर्भयसागर जी महाराज ने छीपीटोला स्थित जैन भवन में श्रुत पंचमी महापर्व की पूर्व बेला पर श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि श्रुत पंचमी जैन समाज का एक अनूठा पर्व है। आगरा से पढ़िए, यह खबर&#8230; आगरा। आचार्य श्री निर्भयसागर जी महाराज ने छीपीटोला स्थित जैन भवन में श्रुत पंचमी महापर्व की [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य श्री निर्भयसागर जी महाराज ने छीपीटोला स्थित जैन भवन में श्रुत पंचमी महापर्व की पूर्व बेला पर श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि श्रुत पंचमी जैन समाज का एक अनूठा पर्व है। <span style="color: #ff0000">आगरा से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>आगरा।</strong> आचार्य श्री निर्भयसागर जी महाराज ने छीपीटोला स्थित जैन भवन में श्रुत पंचमी महापर्व की पूर्व बेला पर श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि श्रुत पंचमी जैन समाज का एक अनूठा पर्व है। जिसमें खान-पान या भौतिक उत्सव नहीं, बल्कि ज्ञान, स्वाध्याय और आत्मचिंतन को महत्व दिया जाता है। उन्होंने कहा कि ज्ञान आत्मा का गुण स्वभाव और वास्तविक संपत्ति है। ज्ञान के बिना न व्यक्ति को सम्मान प्राप्त होता है और न ही जीवन का समुचित विकास संभव है।आचार्य श्री ने बताया कि ज्येष्ठ शुक्ल पंचमी के दिन आचार्य पुष्पदंत एवं आचार्य भूतबली द्वारा रचित जैन धर्म के महान ग्रंथ षट्खंडागम की रचना पूर्ण हुई थी। इसी अवसर पर पुष्पावली और भूतावली नामक देवियों ने उस ग्रंथ की पूजा-अर्चना की थी, जिसके स्मरण में श्रुत पंचमी पर्व मनाया जाता है।</p>
<p><strong>आहारदान देकर धर्मलाभ अर्जित किया जाता है</strong></p>
<p>उन्होंने कहा कि इस पावन पर्व पर प्रातःकाल सामूहिक णमोकार मंत्र जाप, जिनवाणी माता सरस्वती एवं जिनेंद्र भगवान की पूजा-अर्चना की जाती है। साथ ही गुरुजनों को आहारदान देकर धर्मलाभ अर्जित किया जाता है। सायंकाल जिनवाणी का स्वाध्याय एवं आरती कर ज्ञान के प्रति श्रद्धा व्यक्त की जाती है।</p>
<p><strong>आचार्यश्री को श्रद्धापूर्वक जिनवाणी भेंट की</strong></p>
<p>आचार्य श्री ने जैन धर्म की प्राचीनता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जैन धर्म अनादिकाल से गुरु-शिष्य परंपरा के माध्यम से निरंतर प्रवाहित होता आ रहा है। उन्होंने कहा कि भगवान ऋषभदेव ने मानव समाज को कृषि, शिल्प, वाणिज्य तथा शिक्षा का मार्ग दिखाकर सभ्यता के विकास की आधारशिला रखी। जैन आगम और ग्रंथ प्राकृत भाषा में रचित हैं, जो अत्यंत प्राचीन एवं समृद्ध भाषा मानी जाती है। इस अवसर पर वीवीडी गुरु भक्त परिवार, छीपीटोला द्वारा आचार्यश्री को श्रद्धापूर्वक जिनवाणी भेंट कर उनका मंगल आशीर्वाद प्राप्त किया गया। श्रद्धालुओं ने श्रुत पंचमी के महत्व को आत्मसात करते हुए ज्ञानार्जन एवं स्वाध्याय को जीवन में अपनाने का संकल्प लिया।</p>
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		<title>श्रुत पंचमी जिनवाणी का अनंत आलोक और श्रुत-परंपरा का अक्षय महोत्सव : ज्ञान की अविरल गंगा, आचार्यों की अमर साधना और आत्मजागरण का महापर्व </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shree Phal News]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 16 Jun 2026 13:04:31 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जब संसार का समस्त वैभव काल की धूल में विलीन हो जाता है, जब राजसत्ताएँ, साम्राज्य और सभ्यताएँ इतिहास के पृष्ठों में सिमट जाती हैं, तब भी यदि कुछ अमर रहता है तो वह है ज्ञान। श्रुत पंचमी को लेकर डॉ. जयेन्द्र जैन निप्पू का पढ़िए, विशेष आलेख&#8230;. धम्मो मगलमुक्किट्ठं, अहिंसा संजमो तवो। देवा वि [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>जब संसार का समस्त वैभव काल की धूल में विलीन हो जाता है, जब राजसत्ताएँ, साम्राज्य और सभ्यताएँ इतिहास के पृष्ठों में सिमट जाती हैं, तब भी यदि कुछ अमर रहता है तो वह है ज्ञान। <span style="color: #ff0000">श्रुत पंचमी को लेकर डॉ. जयेन्द्र जैन निप्पू का पढ़िए, विशेष आलेख&#8230;.</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>धम्मो मगलमुक्किट्ठं, अहिंसा संजमो तवो।</strong></p>
<p><strong>देवा वि तं नमंसन्ति, जस्स धम्मे सया मणो॥</strong></p>
<p>जब संसार का समस्त वैभव काल की धूल में विलीन हो जाता है, जब राजसत्ताएँ, साम्राज्य और सभ्यताएँ इतिहास के पृष्ठों में सिमट जाती हैं, तब भी यदि कुछ अमर रहता है तो वह है ज्ञान। और जब वह ज्ञान वीतराग सर्वज्ञ जिनेन्द्र भगवान की दिव्यध्वनि से प्रकट हुआ हो, आचार्यों की तपःपूत परम्परा से सुरक्षित हुआ हो तथा असंख्य भव्य जीवों के मोक्षमार्ग का प्रदीप बना हो, तब वह केवल ज्ञान नहीं रह जाता, वह श्रुतदेवता, वह जिनवाणी, वह आत्मा का चक्षु बन जाता है।</p>
<p>इसी अनादि-अनन्त ज्ञानधारा के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और समर्पण का पावन पर्व है श्रुत-पञ्चमी महापर्व।</p>
<p><strong>जिनवाणी रू भगवान महावीर की दिव्यध्वनि का अमृत</strong></p>
<p>भगवान महावीर स्वामी के केवलज्ञान प्रकट होने पर समवसरण में दिव्यध्वनि का प्रादुर्भाव हुआ। यह ध्वनि किसी एक भाषा, जाति अथवा सम्प्रदाय की नहीं थी, बल्कि समस्त प्राणिमात्र के कल्याण हेतु थी। गणधर देवों ने उसे द्वादशांग श्रुत के रूप में व्यवस्थित किया। गौतम स्वामी, सुधर्मा स्वामी और जम्बूस्वामी से प्रवाहित यह ज्ञानगंगा श्रुतकेवली आचार्यों की परम्परा द्वारा सुरक्षित रही।</p>
<p><strong>आचार्य उमास्वाति ने कहा</strong></p>
<p>सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः॥</p>
<p>मोक्ष का मार्ग सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चरित्र है। इन तीनों में ज्ञान की भूमिका सूर्य के समान है। बिना प्रकाश के मार्ग दिखाई नहीं देता और बिना जिनवाणी के आत्मा अपने स्वरूप को नहीं पहचान सकती।</p>
<p>धरसेनाचार्य, पुष्पदन्त और भूतबलि श्रुत के अमर प्रहरी</p>
<p>काल की गति के साथ जब श्रुत का लोप होने लगा, तब गिरिनार पर्वत की चन्द्रगुफा में विराजमान आचार्य धरसेनदेव ने अपने दो शिष्यों, आचार्य पुष्पदन्त और आचार्य भूतबलि को सिद्धान्त का अमूल्य खजाना प्रदान किया।</p>
<p>उनके पुरुषार्थ से षट्खण्डागम जैसा दिव्य सिद्धान्तग्रन्थ संसार को प्राप्त हुआ। यह केवल ग्रन्थ नहीं, अनन्त साधकों के लिए मोक्षमार्ग का मानचित्र है। इसी ऐतिहासिक घटना की स्मृति में ज्येष्ठ शुक्ल पंचमी को श्रुत-पञ्चमी के रूप में मनाया जाता है।</p>
<p><strong>आचार्य कुन्दकुन्ददेव आत्मा के सम्राट और श्रुत-सूर्य</strong></p>
<p>यदि दिगम्बर जैन परम्परा में किसी एक आचार्य ने आत्मतत्त्व को सर्वाधिक गहराई से उद्घाटित किया है, तो वे हैं आचार्य श्री कुन्दकुन्ददेव।</p>
<p>दिगम्बर परम्परा की श्रद्धानुसार, चारण ऋद्धि से सम्पन्न आचार्य कुन्दकुन्ददेव महाविदेह क्षेत्र में विराजमान वर्तमान तीर्थंकर भगवान सीमंधर स्वामी के समवसरण में पहुँचे और वहाँ से श्रुत-सार ग्रहण कर भारतभूमि में लौटे। चाहे इसे आध्यात्मिक अनुभूति मानें या परम्परागत विश्वास, इसमें निहित संदेश अत्यन्त गहन हैकृ सत्य की यात्रा सीमाओं से परे है और जिनवाणी कालातीत है।</p>
<p><strong>उनकी वाणी आज भी आत्मा को पुकारती हैकृ</strong></p>
<p>णाणं च दंसणं चेव चरित्तं च तवो तहा।</p>
<p>एयं मग्गं जिनक्खादं मोक्षस्स कारणं परं॥</p>
<p>समयसार, प्रवचनसार, नियमसार, पंचास्तिकाय और अष्टपाहुड़ आज भी आत्मानुभूति के दिव्य दीपक हैं।</p>
<p><strong>समन्तभद्र से नेमिचन्द्र तक- श्रुत की अखण्ड ज्योति</strong></p>
<p>आचार्य समन्तभद्र, पूज्यपाद, अकलंकदेव, वीरसेन स्वामी, जिनसेनाचार्य, गुणभद्राचार्य, नेमिचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्ती, पण्डित टोडरमल और बनारसीदास जैसे महापुरुषों ने अपने जीवन का प्रत्येक क्षण जिनवाणी की सेवा में समर्पित कर दिया।</p>
<p>आचार्य नेमिचन्द्र सिद्धान्तचक्रती की गाथा आज भी आत्मा को झकझोरती हैकृ</p>
<p>जो जाणदि अरिहंतं दव्वगुणपज्जएहि संपूर्णं।</p>
<p>सो जाणदि अप्पाणं, मोहो खलु तस्स गलिदो॥</p>
<p>जो अरिहन्त को जानता है, वह स्वयं को जान लेता है और उसका मोह गल जाता है।</p>
<p><strong>श्रुत के बिना धर्म नहीं</strong></p>
<p>आचार्य वट्टकेर स्वामी मूलाचार में कहते हैं</p>
<p>सुयं णाणं महप्पं, सुयं धम्मस्स कारणं।</p>
<p>सुयेण विणा ण सिद्धी, सुयं मोक्षस्स कारणं॥</p>
<p>श्रुतज्ञान महान है, धर्म का कारण है और मोक्ष का आधार है।</p>
<p>इसलिए जैन परम्परा में जिनवाणी को माता कहा गया</p>
<p>‘श्रुतमाता’</p>
<p>क्योंकि माता शरीर को जन्म देती है, परन्तु जिनवाणी आत्मा को जागृत करती है।</p>
<p>आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज रू आधुनिक युग के श्रुत-ऋषि</p>
<p>वर्तमान युग में यदि किसी ने श्रुत-परम्परा को पुनः जन-जन तक पहुँचाने का महायज्ञ किया, तो वे राष्ट्रसंत, तपोनिधि, आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज हैं।</p>
<p>उन्होंने केवल ग्रन्थ नहीं पढ़े, बल्कि उन्हें जिया। उनका सम्पूर्ण जीवन स्वाध्याय, तप और करुणा का मूर्तिमान रूप था।</p>
<p>उनकी कालजयी कृति ‘मूकमाटी’ वस्तुतः मौन की वाणी है। नर्मदा के कोमल कंकड़ों में उन्होंने जीवन का दर्शन देखा। जिस प्रकार नर्मदा की धारा कठोर पत्थरों को भी चिकना और सुन्दर बना देती है, उसी प्रकार जिनवाणी का सतत संस्पर्श मनुष्य के भीतर के क्रोध, अहंकार और मोह को परिष्कृत कर देता है।</p>
<p>मूकमाटी मानो कहती है</p>
<p>पत्थर भी तराशे जा सकते हैं, तो फिर चेतन आत्मा क्यों नहीं?</p>
<p>आज का संकट रू ग्रन्थ सज रहे हैं, जीवन नहीं</p>
<p>आज घरों में विशाल पुस्तकालय हैं, किन्तु स्वाध्याय का समय नहीं। अलमारियों में आगम हैं, परन्तु मन मोबाइल में खोया हुआ है। बच्चों के हाथों में शास्त्र कम, स्क्रीन अधिक दिखाई देती है।</p>
<p>श्रुत-पंचमी हमें झकझोरती है</p>
<p>क्या केवल चन्दन, अक्षत और पुष्प अर्पित कर देना ही जिनवाणी की पूजा है?</p>
<p>नहीं।</p>
<p>वास्तविक पूजा है</p>
<p>एक गाथा पढ़ना।</p>
<p>एक श्लोक समझना।</p>
<p>एक सिद्धान्त जीवन में उतारना।</p>
<p>एक बालक को जैन संस्कृति से जोड़ना।</p>
<p>भक्तामर की विनम्रता और उत्तराध्ययन का मंगल संदेश</p>
<p>आचार्य मानतुंगदेव कहते हैं</p>
<p>बुद्ध्या विनापि विबुधार्चितपादपीठ!</p>
<p>स्तोतुं समुद्यतमतिर्विगतत्रपोऽहम्।</p>
<p>और उत्तराध्ययन सूत्र उद्घोष करता है</p>
<p>धम्मो मंगलमुक्किट्ठं, अहिंसा संजमो तवो।</p>
<p>देवा वि तं नमंसन्ति, जस्स धम्मे सया मणो॥</p>
<p>श्रुत-पं्चमी-केवल पर्व नहीं, आत्मा का उत्सव है</p>
<p>श्रुत-पं्चमी हमें स्मरण कराती है</p>
<p>जिनवाणी केवल अक्षरों का संग्रह नहीं, आत्मा का आलोक है।</p>
<p>शास्त्र केवल पढ़ने की वस्तु नहीं, जीने की दिशा हैं।</p>
<p>आचार्य केवल इतिहास के पात्र नहीं, वर्तमान के पथप्रदर्शक हैं।</p>
<p>स्वाध्याय केवल परम्परा नहीं, आत्मा का आहार है।</p>
<p>जब तक संसार में एक भी व्यक्ति नवकार मंत्र का जाप करेगा, जब तक कोई बालक समयसार की गाथा पढ़ेगा, जब तक किसी साधक के हाथों में षट्खण्डागम और मूकमाटी रहेगी, तब तक जिनवाणी की यह ज्योति कभी बुझ नहीं सकती।</p>
<p>अन्त में श्रुतदेवता के चरणों में यही प्रार्थना</p>
<p>जयतु जिनवाणी, जयतु श्रुतदेवता।</p>
<p>जयतु कुन्दकुन्द-वाणी।</p>
<p>जयतु षट्खण्डागम।</p>
<p>जयतु विद्यासागर-परम्परा।</p>
<p>जयतु जिनशासनम्॥</p>
<p>णमो अरिहंताणं।</p>
<p>णमो सिद्धाणं।</p>
<p>णमो आयरियाणं।</p>
<p>णमो उवज्झायाणं।</p>
<p>णमो लोए सव्वसाहूणं॥</p>
<p>॥ जय जिनेन्द्र ॥</p>
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		<title>साधु संतों के पदविहार में आवश्यक सावधानी श्रावकों के कर्तव्य : पद विहार होती है आत्मजागरण, धर्मप्रभावना और लोकमंगल की पवित्र यात्रा </title>
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		<pubDate>Wed, 20 May 2026 13:54:09 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[भारतीय संस्कृति की आत्मा यदि किसी में स्पंदित होती दिखाई देती है, तो वह तपस्वी संतों के चरणों में ही दिखाई देती है। त्याग, संयम, अहिंसा और आत्मशुद्धि की दिव्य परंपरा को जीवित रखने वाले दिगंबर एवं श्वेतांबर जैन साधु-संत केवल किसी समाज विशेष के आध्यात्मिक मार्गदर्शक नहीं हैं, अपितु सम्पूर्ण मानवता के लिए चलती-फिरती [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>भारतीय संस्कृति की आत्मा यदि किसी में स्पंदित होती दिखाई देती है, तो वह तपस्वी संतों के चरणों में ही दिखाई देती है। त्याग, संयम, अहिंसा और आत्मशुद्धि की दिव्य परंपरा को जीवित रखने वाले दिगंबर एवं श्वेतांबर जैन साधु-संत केवल किसी समाज विशेष के आध्यात्मिक मार्गदर्शक नहीं हैं, अपितु सम्पूर्ण मानवता के लिए चलती-फिरती तपोभूमि हैं। <span style="color: #ff0000">आज पढ़िए, सुनील सुधाकर शास्त्री का यह आलेख&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p>भारतीय संस्कृति की आत्मा यदि किसी में स्पंदित होती दिखाई देती है, तो वह तपस्वी संतों के चरणों में ही दिखाई देती है। त्याग, संयम, अहिंसा और आत्मशुद्धि की दिव्य परंपरा को जीवित रखने वाले दिगंबर एवं श्वेतांबर जैन साधु-संत केवल किसी समाज विशेष के आध्यात्मिक मार्गदर्शक नहीं हैं, अपितु सम्पूर्ण मानवता के लिए चलती-फिरती तपोभूमि हैं। उनका पदविहार केवल एक स्थान से दूसरे स्थान तक का गमन नहीं होता, बल्कि वह आत्मजागरण, धर्मप्रभावना और लोकमंगल की पवित्र यात्रा होती है। नंगे पाँव तपती धरा पर चलने वाले ये महापुरुष अपने प्रत्येक चरण से मानो मानवता को संयम और करुणा का संदेश देते हैं। किन्तु अत्यंत दुःख और चिंता का विषय है कि वर्तमान समय में इन संतों के पदविहार के दौरान अनेक प्रकार की दुर्घटनाएँ, दुर्व्यवहार और असुरक्षाएँ निरंतर बढ़ती जा रही हैं।</p>
<p>कभी तीव्र गति से दौड़ते वाहन उनके जीवन के लिए संकट बन जाते हैं, तो कभी असामाजिक एवं विधर्मी तत्व उपहास, अभद्रता अथवा हिंसक व्यवहार करने लगते हैं। कहीं संतों पर पथराव होता है, कहीं उनके साथ धक्का-मुक्की की घटनाएँ सामने आती हैं, तो कहीं माताजी संघ के प्रति अनुचित व्यवहार समाज को पीड़ित कर देता है। यह केवल किसी एक संप्रदाय की समस्या नहीं है; दिगंबर और श्वेतांबर दोनों परंपराओं के संत-संघ समान रूप से इन परिस्थितियों का सामना कर रहे हैं। यह स्थिति केवल धार्मिक असंवेदनशीलता का परिचायक नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना के क्षय का भी संकेत है।</p>
<p>वास्तव में, जैन साधु-संत अपने साथ कोई भौतिक सुरक्षा नहीं रखते। उनका एकमात्र आश्रय समाज की श्रद्धा और प्रशासन की संवेदनशीलता होती है। ऐसे में श्रावक समाज का उत्तरदायित्व अत्यंत बढ़ जाता है। संतों के पदविहार को केवल धार्मिक उत्साह का विषय मान लेना पर्याप्त नहीं है; उसे सुव्यवस्थित और सुरक्षित बनाना भी समाज का अनिवार्य दायित्व है। जब भी कोई संघ पदविहार करे, तब पर्याप्त संख्या में श्रावकों को उनके साथ चलना चाहिए। विशेष रूप से युवाओं को आगे आकर सुरक्षा और व्यवस्था की जिम्मेदारी संभालनी चाहिए। समाज का युवा वर्ग यदि धर्मरक्षा के इस कार्य में सक्रिय हो जाए, तो अनेक दुर्घटनाओं और दुर्व्यवहारों को रोका जा सकता है।</p>
<p>माताजी संघों के पदविहार में महिलाओं की पर्याप्त सहभागिता भी आवश्यक है। इससे मातृशक्ति को सुरक्षा का भाव प्राप्त होगा तथा अनुशासन और मर्यादा का वातावरण निर्मित रहेगा। पदविहार के समय मार्ग के दोनों ओर सुरक्षा-व्यवस्था के रूप में रस्सियाँ अथवा संकेतक लगाए जा सकते हैं, जिससे वाहन नियंत्रित रहें और संतों के मार्ग में अवरोध उत्पन्न न हो। जहाँ यातायात अधिक हो, वहाँ स्वयंसेवकों की टोली मार्गदर्शन और यातायात नियंत्रण का कार्य कर सकती है। अशांत एवं अत्यंत निर्जन मार्गाे पर पदविहार से यथासंभव बचना चाहिए तथा अत्यधिक व्यस्त राजमार्गों के स्थान पर सुरक्षित वैकल्पिक मार्गों का चयन किया जाना चाहिए।</p>
<p>आज आवश्यकता केवल भावनात्मक श्रद्धा की नहीं, बल्कि संगठित जागरूकता की है। समाज को ऐसे प्रशिक्षित स्वयंसेवक तैयार करने चाहिए जो पदविहार के दौरान सुरक्षा, प्राथमिक उपचार, यातायात नियंत्रण और आपातकालीन सहायता का कार्य संभाल सकें। संघ के साथ चलने वाले वाहन केवल आवश्यक सामग्री और आकस्मिक सहायता के लिए हों, न कि प्रदर्शन और भीड़ का माध्यम बनें। पदविहार के पूर्व स्थानीय प्रशासन को सूचित करना, मार्ग का निरीक्षण करना और संभावित संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान करना भी अत्यंत आवश्यक है।</p>
<p>इस विषय में शासन और प्रशासन की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। जिस प्रकार विभिन्न धार्मिक यात्राओं, कांवड़ यात्राओं अथवा पर्वों के अवसर पर प्रशासन सुरक्षा-व्यवस्था सुनिश्चित करता है, उसी प्रकार जैन साधु-संतों के पदविहार को भी आधिकारिक सुरक्षा मिलनी चाहिए। प्रशासन की ओर से पुलिस बल अथवा सुरक्षा कर्मियों की व्यवस्था हो, यातायात को नियंत्रित किया जाए, और संवेदनशील क्षेत्रों में विशेष निगरानी रखी जाएकृतो अनेक अप्रिय घटनाओं को रोका जा सकता है। यह केवल धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा नहीं होगी, बल्कि भारतीय संविधान की उस भावना का सम्मान भी होगा जो प्रत्येक नागरिक को सुरक्षित धार्मिक आचरण का अधिकार प्रदान करती है।</p>
<p>दीर्घकालीन दृष्टि से सरकार को “पदविहार पथ” अथवा “धार्मिक पदयात्रा मार्ग” जैसी योजनाओं पर भी विचार करना चाहिए। जैसे साइकिल ट्रैक अथवा पैदल पथ निर्मित होते हैं, उसी प्रकार प्रमुख धार्मिक मार्गों पर सुरक्षित पदयात्रा पथ बनाए जा सकते हैं। इन मार्गों का उपयोग केवल जैन संत ही नहीं, बल्कि अन्य धार्मिक यात्राएँ और कांवड़ यात्राएँ भी कर सकेंगी। इससे दुर्घटनाओं में उल्लेखनीय कमी आएगी और धार्मिक यात्राओं की गरिमा भी सुरक्षित रहेगी। यह व्यवस्था भारत की आध्यात्मिक परंपराओं के संरक्षण की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम सिद्ध हो सकती है।</p>
<p>संत केवल किसी समाज की धरोहर नहीं होते; वे राष्ट्र की नैतिक चेतना होते हैं। जब तपस्वियों का अपमान होता है, तब वास्तव में समाज की आत्मा आहत होती है। जिन चरणों ने हिंसा के मार्ग को त्यागकर अहिंसा का प्रकाश फैलाया, जिन वचनों ने मनुष्य को आत्मोन्नति का पथ दिखाया, उन चरणों की सुरक्षा करना प्रत्येक संवेदनशील नागरिक का नैतिक दायित्व है। यदि समाज अपने संतों की रक्षा नहीं कर पाएगा, तो आने वाली पीढ़ियाँ केवल ग्रंथों में तप और त्याग की कथाएँ पढ़ेंगी, प्रत्यक्ष जीवन में उनका दर्शन दुर्लभ हो जाएगा।</p>
<p>आज आवश्यकता है कि जैन समाज सम्प्रदायगत सीमाओं से ऊपर उठकर साधु-संतों की सुरक्षा के प्रश्न पर एकजुट हो। दिगंबर हो या श्वेतांबर, तप और संयम की साधना समान रूप से वंदनीय है। समाज को यह समझना होगा कि संतों की सुरक्षा केवल कुछ व्यक्तियों का कार्य नहीं, बल्कि सामूहिक धर्म है। जब श्रावक जागरूक होंगे, युवा संगठित होंगे, महिलाएँ सहभागी बनेंगी और प्रशासन संवेदनशील होगाकृतभी पदविहार वास्तव में निर्भय, अनुशासित और मंगलमय बन सकेगा।</p>
<p>जिनमार्ग की यह तपःपरंपरा केवल इतिहास की स्मृति न बन जाए, इसके लिए आज ही सजग होना होगा। संतों के चरणों की रक्षा करना वास्तव में संस्कृति, संयम और सभ्यता की रक्षा करना है।</p>
<p>संतों पर उपसर्ग अगर हो, धन वैभव का सार नहीं।</p>
<p>संत सड़क पर हम ए.सी.में, समझो धर्म से प्यार नहीं।।</p>
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		<title>धर्म भय का नाम नहीं, बल्कि जीवन की दिशा है : ‎ ‎धर्म तो वह पवित्र चेतना है, जो मनुष्य को उसके भीतर के सत्य से परिचित कराती है </title>
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		<pubDate>Tue, 12 May 2026 10:09:07 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जहां भय समाप्त होता है, वहीं से धर्म की शुरुआत होती है। मनुष्य के जीवन में जैसे ही धर्म शब्द प्रवेश करता है, उसके मन में अनेक प्रश्न जन्म लेने लगते हैं। ‎यह कैसे करना होगा ? इसकी क्रियाएँ क्या होंगी? कहीं कोई गलती न हो जाए? यदि त्रुटि हो गई तो उसका परिणाम क्या [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जहां भय समाप्त होता है, वहीं से धर्म की शुरुआत होती है। मनुष्य के जीवन में जैसे ही धर्म शब्द प्रवेश करता है, उसके मन में अनेक प्रश्न जन्म लेने लगते हैं। ‎यह कैसे करना होगा ? इसकी क्रियाएँ क्या होंगी? कहीं कोई गलती न हो जाए? यदि त्रुटि हो गई तो उसका परिणाम क्या होगा? <span style="color: #ff0000">मुरैना/सांगानेर से पढ़िए, अंशुल जैन शास्त्री का यह आलेख, प्रस्तुति मनोज जैन नायक&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना/सांगानेर।</strong> जहां भय समाप्त होता है, वहीं से धर्म की शुरुआत होती है। मनुष्य के जीवन में जैसे ही धर्म शब्द प्रवेश करता है, उसके मन में अनेक प्रश्न जन्म लेने लगते हैं। ‎यह कैसे करना होगा ? इसकी क्रियाएँ क्या होंगी? कहीं कोई गलती न हो जाए? यदि त्रुटि हो गई तो उसका परिणाम क्या होगा? ‎इन प्रश्नों की भीड़ में मनुष्य का मन अक्सर भय से भर जाता है ‎परंतु, सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि ‎क्या वास्तव में धर्म भय का नाम है? ‎क्या धर्म केवल डराने के लिए है? ‎या फिर धर्म वह प्रकाश है, जो जीवन को सही दिशा प्रदान करता है? यदि वास्तविकता में देखा जाए तो धर्म कभी भय का विषय रहा ही नहीं। ‎हमने स्वयं अपनी संकीर्ण धारणाओं और सामाजिक दबावों के कारण धर्म को भय का रूप दे दिया है। ‎हम डरते हैं कि कहीं कोई दोष न लग जाए, कोई हमें तुच्छ न समझ ले, कोई हमारी आलोचना न कर दे। ‎लेकिन धर्म का वास्तविक स्वरूप इन भय और आशंकाओं से कहीं ऊपर है। ‎धर्म तो वह पवित्र चेतना है, जो मनुष्य को उसके भीतर के सत्य से परिचित कराती है।</p>
<p>वह जीवन को संयम, विवेक और आत्मबोध की ओर ले जाती है। ‎धर्म मनुष्य को दबाता नहीं, बल्कि उसे भीतर से इतना मजबूत बनाता है कि वह स्वयं अपने जीवन का सही निर्धारण कर सके। ‎हाँ, यह सत्य है कि कभी-कभी कुछ लोग, जो स्वयं को धर्म का ज्ञाता या महान व्यक्ति मान लेते हैं, धर्म के नाम पर दूसरों को भयभीत करने का प्रयास करते हैं। ‎वे धर्म को कठोर नियमों और भय की सीमाओं में बाँध देते हैं ‎परंतु, किसी व्यक्ति का व्यवहार धर्म नहीं होता।</p>
<p><strong> वास्तव में धर्म डर का नाम नहीं है</strong></p>
<p>‎धर्म का वास्तविक स्वरूप तो करुणा, शांति और आत्मजागरण है। ‎यदि धर्म को सही अर्थों में समझा जाए, तो वही मनुष्य के जीवन को धरती से लेकर मोक्ष तक की यात्रा में सुगम बनाता है। ‎महान आचार्यों और ऋषियों ने अपने शास्त्रों में धर्म को कभी भय का साधन नहीं कहा। ‎उन्होंने धर्म को आत्मा को पहचानने का मार्ग बताया है। ‎उन्होंने शास्त्रों को जीवन का आधार इसलिए माना, क्योंकि वे मनुष्य को अज्ञान से ज्ञान की ओर ले जाते हैं। ‎वास्तव में धर्म डर का नाम नहीं है।</p>
<p>‎धर्म तो प्रेरणा का नाम है। ‎वह प्रेरणा, जो मनुष्य को पतन से उठाकर उत्कर्ष की ओर ले जाए; ‎जो उसे भीतर से निर्मल बनाए ‎और जो उसके जीवन में ऐसा प्रकाश भर दे कि फिर उसे किसी भय की आवश्यकता ही न रहे। जहाँ भय समाप्त होता है, वहीं से सच्चे धर्म की शुरुआत होती है।</p>
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		<title>मुनि पुंगव श्री सुधासागर जी महाराज बोले – “रोटी साधु के पीछे घूम रही है, मनुष्य को अपनी सोच बदलनी होगी : दर्शनोदय तीर्थ थूवोनजी में मुनि श्री के प्रवचनों से गूंजी आत्मजागरण की भावना </title>
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		<pubDate>Wed, 12 Nov 2025 15:17:43 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[दर्शनोदय तीर्थ थूवोनजी में मुनि पुंगव श्री सुधासागर जी महाराज के सानिध्य में चल रही प्रवचनमालाओं में आज उन्होंने जीवन की गूढ़ सच्चाइयों पर प्रकाश डाला। मुनि श्री ने कहा कि मनुष्य रोटी के पीछे नहीं, बल्कि सत्य और त्याग के मार्ग पर चले तो संसार स्वयं उसके चरणों में आ जाता है। पढ़िए राजीव [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>दर्शनोदय तीर्थ थूवोनजी में मुनि पुंगव श्री सुधासागर जी महाराज के सानिध्य में चल रही प्रवचनमालाओं में आज उन्होंने जीवन की गूढ़ सच्चाइयों पर प्रकाश डाला। मुनि श्री ने कहा कि मनुष्य रोटी के पीछे नहीं, बल्कि सत्य और त्याग के मार्ग पर चले तो संसार स्वयं उसके चरणों में आ जाता है। <span style="color: #ff0000">पढ़िए राजीव सिंघई मोनू की रिपोर्ट…</span></strong></p>
<hr />
<p>दर्शनोदय तीर्थ थूवोनजी में मुनि पुंगव श्री सुधासागर जी महाराज ने विशाल धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि मनुष्य जिस दिशा में सोचता है, उसी दिशा में जीवन चलता है। “यदि तुम भीड़ के पीछे चलते हो तो गुलामी का प्रतीक है, पर यदि भीड़ तुम्हारे पीछे चले, तो वही बादशाहत है।” उन्होंने कहा कि संसार को जो त्याग देता है, संसार उसी के पीछे चलता है।</p>
<p><strong>पुण्य का त्याग ही सच्ची साधना</strong></p>
<p>मुनि श्री ने कहा कि महावीर ने केवल पाप नहीं, बल्कि पुण्य से प्राप्त सुखों के त्याग की शिक्षा दी। भोग-विलास की वस्तुएँ भी अंततः दुःख देती हैं, अतः उनका त्याग ही मुक्ति का सच्चा मार्ग है।</p>
<p><strong><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-94299" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/11/IMG-20251112-WA0014.jpg" alt="" width="960" height="1280" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/11/IMG-20251112-WA0014.jpg 960w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/11/IMG-20251112-WA0014-225x300.jpg 225w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/11/IMG-20251112-WA0014-768x1024.jpg 768w" sizes="(max-width: 960px) 100vw, 960px" />गगन विहारी भगवान की प्रतिमा का निर्माण</strong></p>
<p>तीर्थ क्षेत्र कमेटी के प्रचार मंत्री विजय धुर्रा ने बताया कि गगन विहारी भगवान की विशाल पाषाण प्रतिमा पंचमुखी जिनालय और सिंहद्वार के साथ निर्मित की जा रही है। इस दिव्य रचना में 225 कमलों की आकृतियाँ इंद्रों द्वारा सृजित होंगी। शिलान्यास 16 नवम्बर को प्रतिष्ठाचार्य प्रदीप भैया के निर्देशन में सम्पन्न होगा।</p>
<p><strong>108 इंद्रों द्वारा अभिषेक और शांति धारा</strong></p>
<p>वाल ब्रह्मचारी प्रदीप भैया ने कहा कि निर्यापक श्रमण मुनि पुंगव श्री सुधासागर जी महाराज के सानिध्य में 108 इंद्रों द्वारा पूजित शांति धारा का आयोजन हो रहा है, जो चक्रवर्ती भगवान को समर्पित विधि के समान है।</p>
<p><strong>“तुम भोजन के लिए हो या भोजन तुम्हारे लिए”</strong></p>
<p>मुनि श्री ने गूढ़ प्रश्न पूछते हुए कहा कि विचार करो — धन तुम्हारे लिए है या तुम धन के लिए; भोजन तुम्हारे लिए है या तुम भोजन के लिए। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति भोजन का दास बन जाता है, वह आत्मज्ञान से दूर हो जाता है, जबकि साधक भोजन का स्वामी होता है। इस अवसर पर तीर्थ क्षेत्र कमेटी के अध्यक्ष अशोक जैन (टींगू मिल), महामंत्री मनोज भैसरवास, कोषाध्यक्ष प्रमोद मंगल, दीप मंत्री राजेन्द्र हलवाई, प्रदीप जैन रानी सहित अनेक श्रद्धालु उपस्थित रहे। कार्यक्रम का उद्देश्य आत्मजागरण और जगत कल्याण की भावना को प्रबल करना रहा।</p>
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		<title>पंचकल्याणक महोत्सव आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर महाराज सानिध्य में सम्पन्न : मोक्षकल्याणक, पिच्छिका परिवर्तन और वात्सल्यमना उपाधि से गूंजा रामगंजमंडी </title>
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		<pubDate>Wed, 12 Nov 2025 15:14:24 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[रामगंजमंडी में आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर महाराज सानिध्य में पंचकल्याणक महोत्सव अत्यंत भव्यता से सम्पन्न हुआ। इस अवसर पर मोक्षकल्याणक महोत्सव, पिच्छिका परिवर्तन और आचार्य श्री को वात्सल्यमना उपाधि से सुशोभित करने का आयोजन हुआ। पढ़िए अभिषेक जैन लुहाड़िया की रिपोर्ट… रामगंजमंडी। नगर के इतिहास का तीसरा पंचकल्याणक महोत्सव आयोजित हुआ। यह आयोजन आचार्य [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>रामगंजमंडी में आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर महाराज सानिध्य में पंचकल्याणक महोत्सव अत्यंत भव्यता से सम्पन्न हुआ। इस अवसर पर मोक्षकल्याणक महोत्सव, पिच्छिका परिवर्तन और आचार्य श्री को वात्सल्यमना उपाधि से सुशोभित करने का आयोजन हुआ। <span style="color: #ff0000">पढ़िए अभिषेक जैन लुहाड़िया की रिपोर्ट…</span></strong></p>
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<p><strong>रामगंजमंडी।</strong> नगर के इतिहास का तीसरा पंचकल्याणक महोत्सव आयोजित हुआ। यह आयोजन आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर महाराज संघ सानिध्य एवं प्रतिष्ठाचार्य श्री नमन भैया, पंडित जयकुमार जैन, पंडित सुलभ जैन शास्त्री और आकाश जैन के निर्देशन में सम्पन्न हुआ। श्रद्धालुओं ने पाषाण से भगवान बनने की अद्भुत क्रिया को प्रत्यक्ष देखा और इस क्षण को जीवन का सर्वोत्तम पुण्यफल बताया।</p>
<p><strong>युवाओं ने निभाई प्रमुख भूमिकाएं, धर्म जागृति का बना प्रतीक</strong></p>
<p>इस महोत्सव की विशेषता यह रही कि प्रमुख पात्र युवा वर्ग से थे। इससे समाज में नई ऊर्जा और धर्म की अलख जागृत हुई। आचार्य श्री ने कहा कि धर्म की रक्षा और संयम का पालन युवाओं की सहभागिता से ही संभव है।</p>
<p><strong>प्रातः बेला में सम्पन्न हुआ मोक्षकल्याणक महोत्सव</strong></p>
<p>अंतिम दिन प्रभात बेला में मोक्षकल्याणक महोत्सव का आयोजन हुआ। आचार्य श्री ने प्रवचन देते हुए कहा — “जैनत्व के बिना कर्म क्षय का मार्ग नहीं खुलता। जब हृदय में लोभ-लालसा का क्षय होता है, तभी आत्मा शुद्धि का द्वार खुलता है।” उन्होंने समझाया कि आदि प्रभु ने कैलाश पर्वत पर योग निरोध धारण कर कर्मों का क्षय कर मोक्ष प्राप्त किया।</p>
<p><strong>दोपहर में सम्पन्न हुआ पिच्छिका परिवर्तन समारोह</strong></p>
<p>दोपहर की बेला में परम पूज्य आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर महाराज संघ का पिच्छिका परिवर्तन सम्पन्न हुआ। श्रद्धालुओं ने भक्ति भावना से सुसज्जित थालों से अष्टद्रव्य पूजन किया। इस अवसर पर आरवी सबदरा ने नृत्य प्रस्तुति दी, और सुरलाया, रुचि टोंग्या ने मंगलाचरण प्रस्तुत किया। कार्यक्रम का संचालन मुनि श्री 108 प्रांजल सागर महाराज ने किया।</p>
<p><strong>इनको मिला पुरानी पिच्छिका का सौभाग्य</strong></p>
<p>आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर महाराज की पुरानी पिच्छिका श्रीमान नितिन-कल्पना सबदरा को प्राप्त हुई। मुनि श्री 108 प्रांजल सागर महाराज की पिच्छिका प्रदीप-संगीता विनायका को मिली। मुनि श्री प्रत्यक्ष सागर महाराज की पिच्छिका देवेंद्र-मीनाक्षी टोंग्या को प्राप्त हुई, जबकि प्रमेश सागर महाराज की पिच्छिका प्रदीप कुमार-चंदना लुहाड़िया रामगंजमंडी को प्राप्त हुई। सकल दिगंबर जैन समाज रामगंजमंडी की ओर से आचार्य श्री को “वात्सल्यमना” उपाधि से सम्मानित किया गया। यह उपाधि समाज संरक्षक अजीत सेठी, अध्यक्ष दिलीप विनायका, उपाध्यक्ष चेतन बागड़िया, कमल लुहाड़िया, मंत्री राजीव बाकलीवाल और महावीर मंदिर अध्यक्ष महेंद्र ठोरा सहित अन्य गणमान्यजनों ने संयुक्त रूप से प्रदान की।</p>
<p><strong>आचार्य श्री ने बताया — “पिच्छिका संयम का प्रतीक”</strong></p>
<p>आचार्य श्री ने कहा कि “पिच्छिका निर्ग्रंथ का स्वरूप है। इसके बिना साधु निर्ग्रंथ नहीं हो सकता। यह संयम का प्रमुख उपकरण है और दिगंबर मुद्रा का आधार भी।” उन्होंने कहा कि जैन दर्शन का मूल लक्ष्य जीवों का संरक्षण और आत्मशुद्धि है। मयूर पिच्छिका जीवदया का प्रतीक है, क्योंकि मयूर अपने त्यागे हुए पंख से पिच्छिका बनाता है।</p>
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