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	<title>आठ दिवसीय पुण्योदय सम्यग्ज्ञान शिक्षण शिविर &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
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		<title>जो जीवन में जितना त्याग करेगा वो उतना उठेगा: आठ दिवसीय पुण्योदय सम्यग्ज्ञान शिक्षण शिविर जारी  </title>
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		<pubDate>Fri, 09 May 2025 07:04:49 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[पुण्योदय अतिशय क्षेत्र नसिया जी में आठ दिवसीय पुण्योदय सम्यग्ज्ञान शिक्षण शिविर जारी है। शिविर के पंचम दिवस पर नसिया जी में मुनि श्री विभोरसागर जी के प्रवचन हुए। प्रवचनों में उन्होंने जीवन में उन्नति के मार्ग बताए। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में समाजजन मौजूद रहे। अभिषेक और शांतिधारा की गई। कोटा से पढ़िए, पारस [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>पुण्योदय अतिशय क्षेत्र नसिया जी में आठ दिवसीय पुण्योदय सम्यग्ज्ञान शिक्षण शिविर जारी है। शिविर के पंचम दिवस पर नसिया जी में मुनि श्री विभोरसागर जी के प्रवचन हुए। प्रवचनों में उन्होंने जीवन में उन्नति के मार्ग बताए। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में समाजजन मौजूद रहे। अभिषेक और शांतिधारा की गई। <span style="color: #ff0000">कोटा से पढ़िए, पारस जैन पार्श्वमणि की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>कोटा।</strong> पुण्योदय अतिशय क्षेत्र नसिया जी दादाबाड़ी में आचार्य श्री विद्यासागर जी शिष्य मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी के आशीर्वाद एवं प्रेरणा से आठ दिवसीय पुण्योदय सम्यग्ज्ञान शिक्षण शिविर जारी है। शिविर के पंचम दिवस पर नसिया जी में प्रातः काल मुनि श्री 108 विभोरसागर जी के प्रवचन हुए। जिसमें उन्होंने कहा कि त्याग से ही जीवन की उन्नति होती है। जिसके जीवन में त्याग नहीं होता उसके जीवन में उन्नति का मार्ग अवरुद्ध रहता है। जैन धर्म के अनुसार, त्याग जीवन की उन्नति का सबसे महत्वपूर्ण मार्ग है। प्राणी मात्र को त्याग को अपनाना चाहिए और जीवन में उन्नति प्राप्त करनी चाहिए। इसीलिए आचार्यों ने त्याग को श्रेयस्कर कहा है। शिविर संयोजिका अर्चना रानी जैन सर्राफ ने बताया कि प्रवचनों के पश्चात सांगानेर से पधारे पंडित पारस जैन शास्त्री ने तत्वार्थ सूत्र की कक्षा में कहा कि तीर्थंकर प्रकृति नाम कर्म की सर्वश्रेष्ठ प्रकृति है। इस प्रकृति से तीर्थंकर पद को प्राप्त किया जाता है। तीर्थंकर प्रकृति एक अद्वितीय प्रकृति है, जो उदय में आने से पहले ही अपने फल दिखने लगती है। इसका अर्थ है कि जब यह प्रकृति किसी जीव के कर्मों में होती है, तो वह जीव अपने कर्मों के अनुसार पहले से ही शुभ परिणाम और तीर्थंकर बनने की संभावना प्रदर्शित करने लगता है।</p>
<p>तीर्थंकर प्रकृति के कारण ही कोई जीव तीर्थंकर बन पाता है, जो संसार सागर से पार लगाने वाला तीर्थ की रचना करता है। तीर्थंकर वे व्यक्ति हैं, जो पूरी तरह से क्रोध, अभिमान, छल, इच्छा आदि पर विजय प्राप्त करते हैं। अगर किसी जीव के कर्मों में तीर्थंकर प्रकृति है तो वह जीव पहले से ही अपने व्यवहार, ज्ञान, और जीवनशैली में तीर्थंकर के गुणों को प्रदर्शित करने लगेगा। यह पहले से ही दर्शाने लगेगा कि वह तीर्थंकर बनने की ओर अग्रसर है।</p>
<p><strong>पुण्यार्जक परिवार का सम्मान किया</strong></p>
<p>संयोजक धर्मचंद जैन धनोप्या ने बताया कि जहां देव शास्त्र गुरु धर्म, अध्यात्म आध्यात्मिक ज्ञान और भक्ति का अद्भुत संगम से बालबोध भाग एक, बालबोध भाग दो, छहढाला (पूर्वार्ध), छहढाला (उत्तरार्द्ध), इष्टोपदेश ग्रंथ, तत्वार्थ सूत्र, प्रश्नोत्तरी रत्नमालिका, आदि ग्रंथों के ज्ञान का लाभ मिल रहा है। निदेशक हुकम जैन काका ने बताया कि आज के अल्पाहार पुण्यार्जक सरिता राजेंद्र, रोहित, नितिशा, निमिशा, समस्त ठग परिवार रहे। शादी की वर्षगांठ के अवसर पर दीप प्रज्जवन कर महाराज श्री को श्रीफल अर्पित कर आशीर्वाद प्राप्त किया। कार्यकारणी ने पुण्यार्जक परिवार का तिलक, माला, दुप्पटे, पगड़ी पहनाकर कर सम्मान किया। प्रशसनिक मंत्री अशोक खादी ने बताया कि आज प्रातः 11 पांडूशिलाआंे पर 11 श्री जी के 11 झारी द्वारा 11 पुण्यार्जकों ने राजेंद्र, आशा हरसोरा, सुशीला बाई विवेक ठोरा, महावीर जी मित्तल, कमलेश चक्रेश कोटिया, विमलाबाई धनराज जेठानीवाल, महेंद्र अतुल पाटनी, पुष्पाबाई महावीर बागड़िया, गोपाल बाई लोकेश सारिका पटौदी, सुरेश राहुल साकुण्या, जयप्रकाश सुनीता सबदरा ने धूमधाम से शांति धारा करके भगवान को विहार करवाया।</p>
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