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	<title>आचार्य समय सागर महाराज &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>धर्मसभा में दिए प्रवचन : कर्मों का आश्रव निरंतर होता रहता है- आचार्य श्री समयसागर जी महाराज </title>
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		<pubDate>Sun, 30 Jun 2024 06:57:25 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री समय सागर जी महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा शरीर में कर्म के उदय से व्याधि आ जाती है और उस रोग व्याधि का निष्कासन भी औषधि उपचार के माध्यम से हो जाता है। निष्कासन महत्वपूर्ण नहीं है बहुत जल्दी रोग से मुक्त हो सकता है किंतु रोग जो आया है वह [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य श्री समय सागर जी महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा शरीर में कर्म के उदय से व्याधि आ जाती है और उस रोग व्याधि का निष्कासन भी औषधि उपचार के माध्यम से हो जाता है। निष्कासन महत्वपूर्ण नहीं है बहुत जल्दी रोग से मुक्त हो सकता है किंतु रोग जो आया है वह किस द्वार से आया है उसका परीक्षण हमें करना है। <span style="color: #ff0000">पढ़िए राजीव सिंघई मोनू और जयकुमार जलज की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>कुंडलपुर (दमोह)।</strong> सुप्रसिद्ध सिद्ध क्षेत्र कुंडलपुर में युग श्रेष्ठ संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य परम पूज्य आचार्य श्री समय सागर जी महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा शरीर में कर्म के उदय से व्याधि आ जाती है और उस रोग व्याधि का निष्कासन भी औषधि उपचार के माध्यम से हो जाता है। निष्कासन महत्वपूर्ण नहीं है बहुत जल्दी रोग से मुक्त हो सकता है किंतु रोग जो आया है वह किस द्वार से आया है उसका परीक्षण हमें करना है। नहीं तो बार-बार व्याधि होती है और औषधि लेते हैं। क्योंकि औषधि दान का प्रावधान तो है ही आगम में हम दवाई लेते चले जाएंगे किंतु रोग का निष्कासन इसलिए नहीं होगा। जिस द्वार से रोग का प्रवेश हो रहा है उस द्वार को बंद नहीं कर पा रहे हैं।</p>
<p>दवाई बिल्कुल अच्छी क्वालिटी की है डॉक्टर भी अच्छा है दवाई भी राम बाण है किंतु पथ्य का पालन होना भी उसके साथ होना आवश्यक है। परहेज नहीं रखेंगे तो रोग बढ़ेगा ।औषधि के द्वारा रोग बढ़ रहा है ऐसा नहीं है वह आहार के द्वारा ही रोग आया है आहार के अलावा और बहुत सारे निमित्त हो सकते हैं। निमित्तों की ओर ध्यान देने की आवश्यकता है ।उसी प्रकार मोक्ष मार्ग में भी कर्मों का आश्रव निरंतर होता रहता है।किंतु वह आश्रव अपने आप नहीं होता अपने आप आश्रव नहीं होता अपने आप बंध नहीं होता है ।यदि अपने आप आश्रव हो जाता तो अपने आप ही आश्रव का रोकना भी हो जाएगा। आश्रव निर्जरा संवरा ऐसा सूत्र बनाने की क्या आवश्यकता ।आश्रव होता बुद्धि पूर्वक भी होता है अबुद्धि पूर्वक भी आश्रव होता है।</p>
<p>अबुद्धि पूर्वक जो आश्रव है उसको रोकने का प्रावधान अलग है उसको पुरुषार्थ के माध्यम से नहीं रोका जाता वह ऑटोमेटिक रुकता है कब रुकता है कहां रुकता है इसकी चर्चा हम बाद में करेंगे ।अभी बुद्धि पूर्वक जो आश्रव हो रहा है या बंध हो रहा है उस बंध की परंपरा को रोकना है ।तो बंध जो हो रहा है वह बिना हेतु के संभव नहीं है। बिना हेतु के बंध हो जाए तो आचार्य उमा स्वामी महाराज अष्टम अध्याय में प्रथम सूत्र दे रहे हैं उसकी कोई आवश्यकता नहीं। बिना कारण के बंध होता नहीं तो पहले कारण की ओर ध्यान देने की आवश्यकता है। तो शुभ और अशुभ आश्रव होता है अथवा पुण्य और पाप का आश्रव होता है तो उसके लिए मन वचन काय की कुछ ऐसी चेष्टाएं हैं जिनसे पाप का आश्रव होता है ।और ठीक इसके विपरीत आत्मगत कुछ उज्ज्वल कुछ आत्मगत परिणाम होते हैं पवित्र परिणाम होते हैं जिनके फलस्वरूप पुण्य का भी आश्रव होता है तो क्रम है। गुरुदेव का यह कहना है कि कर्म का जो आश्रव होता है उसकी निर्जरा हमें करनी है। किंतु क्रम से निर्जरा होगी पाप कर्म की निर्जरा ओर पुण्य कर्म की निर्जरा इसमें क्रम है।</p>
<p>पाप पहले मिटता है ।पाप प्रथम मिटता प्रथम तजो पुण्य फल भोग। पुनः पुण्य मिटता धरो आत्म निर्मल योग ।यह दोहा गुरुदेव ने सामने रखा है पाप प्रथम मिटता पाप का बंध हुआ है तो पाप पहले क्षय होगा पुण्य बाद में क्षय होगा ।मोक्ष मार्ग में पुण्य बाधक नहीं है ।कुछ लोगों की धारणा हो सकती है। स्वाध्याय शील होते हुए भी इस विषय में वह अनभिज्ञ रहे हैं उन्हें ज्ञात कर लेना चाहिए कि पाप का क्षय और पुण्य का क्षय करना है पाप और पुण्य यह दोनों इक्वल हैं दोनों समान है ।कहा भी है आगम में कुंदकुंद देव ने कहा चाहे लोहे की बेड़ी हो चाहे स्वर्ण की बेड़ी हो बेड़ी तो बेड़ी है ।</p>
<p>बंधन तो बंधन है बंधन किसको ईस्ट है संसार से मुक्त होना चाहता है प्रत्येक संसारी प्राणी हम बंधन से मुक्त होना चाहते महाराज इसलिए चाहे पाप हो चाहे पुण्य हो दोनों को एक तराजू में तोल लेते हैं वह ठीक नहीं माना जाता ।पुण्य और पाप दोनों बेड़ी तो हैं जो संसार में प्रवेश करता है वह सुशील कैसे हो सकता है ।यह कहा कुंद कुंद स्वामी ने उस गाथा को आप लेकर बैठ गए।</p>
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		<title>धर्मसभा में दिए प्रवचन :  आचार्य महाराज ने क्या नहीं दिया, सब कुछ दे दिया प्रकाश पूरा का पूरा सर्वत्र फैला दिया- आचार्य श्री समयसागर जी महाराज </title>
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		<pubDate>Fri, 28 Jun 2024 06:16:45 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री समय सागर जी महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा कि आचार्य महाराज एक बार संघ के लिए परमार्थ प्रकाश का स्वाध्याय करा रहे थे। सन 84 की बात हो सकती है। जबलपुर में उसका परमार्थ प्रकाश का स्वाध्याय। ग्रीष्माकाश में प्रातः और मध्यान में धवला का वाचन चलता था और धवला के [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य श्री समय सागर जी महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा कि आचार्य महाराज एक बार संघ के लिए परमार्थ प्रकाश का स्वाध्याय करा रहे थे। सन 84 की बात हो सकती है। जबलपुर में उसका परमार्थ प्रकाश का स्वाध्याय। ग्रीष्माकाश में प्रातः और मध्यान में धवला का वाचन चलता था और धवला के वाचन के पश्चात परमार्थ प्रकाश का संघ के लिए स्वाध्याय कराया। हमें लगता है थोड़ा सा भी हम कार्य करते हैं तो उसमें प्रतिकूलता का अनुभव करते हैं। जबकि उन्होंने कितना श्रम किया है अकेला होकर के इतना विशाल संघ का निर्माण किया है। <span style="color: #ff0000">पढ़िए राजीव सिंघई मोनू की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>कुंडलपुर (दमोह)।</strong> सुप्रसिद्ध सिद्ध क्षेत्र कुंडलपुर में युग श्रेष्ठ संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य विद्या शिरोमणि परम पूज्य आचार्य श्री समय सागर जी महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा कि आचार्य महाराज एक बार संघ के लिए परमार्थ प्रकाश का स्वाध्याय करा रहे थे। सन 84 की बात हो सकती है। जबलपुर में उसका परमार्थ प्रकाश का स्वाध्याय। ग्रीष्माकाश में प्रातः और मध्यान में धवला का वाचन चलता था और धवला के वाचन के पश्चात परमार्थ प्रकाश का संघ के लिए स्वाध्याय कराया। हमें लगता है थोड़ा सा भी हम कार्य करते हैं तो उसमें प्रतिकूलता का अनुभव करते हैं। जबकि उन्होंने कितना श्रम किया है अकेला होकर के इतना विशाल संघ का निर्माण किया है और स्वयं अपना भी कल्याण करके वह निकल गए हैं। प्रतिकूलताएं अनुकूलताएं है यह तो लगी हुई हैं अंतर अंतर बोध में कर्मों का उतार चढ़ाव देखने में आता है।</p>
<p>क्योंकि पूर्व में बंधा हुआ जो कर्म है वह अपने आप क्षय को प्राप्त नहीं होता अपने आप निर्जरा नहीं होती। किंतु निर्जरा करने के लिए कुछ साधन है जिन साधनों के माध्यम से निर्जरा होती है। जैसे तपशा निर्जरा च ऐसा कहा तप के माध्यम से निर्जरा होती है। परीषहों के ऊपर विजय प्राप्त करने से भी निर्जरा होती है।संवर भी होता है यह सारा का सारा विषय आगम के माध्यम से आस्था का विषय बन जाता है। जिसके अंदर आस्था है श्रद्धा है रुचि है तो उसके माध्यम से वह चारित्र के क्षेत्र में कदम बढ़ाता है। तो मुझे विस्मय होता है ग्रीष्म ऋतु में इतनी भयानक गर्मी पड़ रही है मडिया जी में पहाड़ चट्टान तपती है दिन भर रात में वह चट्टान ठंडी नहीं हो पाती और पुनः सूर्योदय हुआ तो वह चट्टान तपती रहती है लू चलती रहती है ।12 घंटा नहीं रात में भी लूं चलती रहती है इसके बावजूद भी दो-तीन बार वाचना वह एक दिन में करते थे।</p>
<p>उन्होंने क्या नहीं दिया सब कुछ दे दिया प्रकाश पूरा का पूरा उन्होंने सर्वत्र फैला दिया और उसके उपरांत भी हमें कठिनाई का अनुभव होता है तो थोड़ा कष्ट तो होगा और परमार्थ प्रकाश पढ़ाते समय एक प्रसंग आया था ।योगेंद्र देव ने उसकी रचना की है परमार्थ प्रकाश की ।उसमें प्रसंग आया है केवल ज्ञान की विराटता को लेकर के जिस प्रकार आसमान में आसमान के किसी एक कोने में तारा दिखाई देती है आकाश में आकाश कितने प्रदेशीय है आकाश के अनंत प्रदेश होते हैं उस अनंत प्रदेशात्मक उस आकाश द्रव्य में एक कोने में तारा दिखाई दे रही है किंतु सर्वत्र ताराये नहीं होती हैं अनंत प्रदेश के बीच में जो लोकाकाश है 343 राजू गुण राजू प्रमाण विस्तार लोकाकाश है वह कैसा देखने में आता है जैसे आसमान के किसी कोने में तारा देखने मिल जाती तो आकाश बहुत लंबा चौड़ा है ओर छोर है नहीं अनंत प्रदेशात्मक है उसके बीच में यह तीन लोक खड़ा है तारे की भांति और आकाश जो अनंत प्रदेशीय है वह एक ही द्रव्य है ।</p>
<p>आकाश द्रव्य अनेक नहीं है आकाश तक एक-एक द्रव्य हुआ करते हैं। धर्म द्रव्य और अधर्म द्रव्य एक आकाश अनंत प्रदेशीय जो आकाश है इस प्रकार के अनंत भी आकाश आ जाएं ,हैं नहीं परिकल्पना हम कर लें तब भी केवल ज्ञान रूपी आकाश में सारे के सारे समाहित हो जाते हैं। इतना विशाल रूप है केवल ज्ञान का अर्थ ये है केवल ज्ञान में ऐसा कोई भी ज्ञेय पदार्थ अवशिष्ट नहीं है जो ज्ञान का विषय नहीं बना हो। दूसरी बात ध्यान देने की बात यह है केवल ज्ञान उत्पन्न होने के प्रथम समय में सारा विश्व उनके केवल ज्ञान में आया है ।अब अनंतर समय के ज्ञान के विषय के लिए कोई नया ज्ञेय नहीं आएगा।</p>
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		<title>धर्मसभा में दिए प्रवचन : मैं तो पिकनिक मनाने आया था, बहुत दिन हो गए चलो दर्शन नहीं करें &#8211; मुनि श्री योग सागर जी महाराज </title>
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					<description><![CDATA[मुनि श्री योग सागर जी महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा आज पावन पर्व है पर्व का अर्थ होता है महोत्सव कौन सा महोत्सव है ना जन्म महोत्सव है ना दीक्षा महोत्सव है आज तो मृत्यु महोत्सव है। जिन्होंने मृत्यु महोत्सव का अनुभव किया उन्होंने अपने जीवन में जिनवाणी की आराधना करते-करते जिस चीज [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>मुनि श्री योग सागर जी महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा आज पावन पर्व है पर्व का अर्थ होता है महोत्सव कौन सा महोत्सव है ना जन्म महोत्सव है ना दीक्षा महोत्सव है आज तो मृत्यु महोत्सव है। जिन्होंने मृत्यु महोत्सव का अनुभव किया उन्होंने अपने जीवन में जिनवाणी की आराधना करते-करते जिस चीज की उपलब्धि की जिन्होंने अपने जीवन को पूरा का पूरा लगाया और अंत में उन्हें मृत्यु महोत्सव का लाभ हुआ। <span style="color: #ff0000">पढ़िए राजीव सिंघई मोनू की रिपोर्ट..</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>कुंडलपुर (दमोह)।</strong> सुप्रसिद्ध सिद्ध क्षेत्र कुंडलपुर में युग श्रेष्ठ संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य जेष्ठ श्रेष्ठ निर्यापक श्रमण मुनि श्री योग सागर जी महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा आज पावन पर्व है पर्व का अर्थ होता है महोत्सव कौन सा महोत्सव है ना जन्म महोत्सव है ना दीक्षा महोत्सव है आज तो मृत्यु महोत्सव है। जिन्होंने मृत्यु महोत्सव का अनुभव किया उन्होंने अपने जीवन में जिनवाणी की आराधना करते-करते जिस चीज की उपलब्धि की जिन्होंने अपने जीवन को पूरा का पूरा लगाया और अंत में उन्हें मृत्यु महोत्सव का लाभ हुआ। ऐसे महान आचार्य श्री ज्ञान सागर जी महाराज का दर्शन करने का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ था ।</p>
<p>आज से सन् 1968 &#8211;1969 दो साल लगातार 2 माह 3 माह तक उनके चरण वंदन करने का रज लगाने का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ ।उस वक्त मैं बालक जैसा था ।10 -12 वर्ष का था धर्म के बारे में जानता ना था। उनके वचन सुनता रहा। आचार्य विद्यासागर जी ने मुझे णमोकार मंत्र सिखाया। यह नहीं पूछा मैं यह क्यों पढ़ रहा हूं क्यों पढ़ा रहे हो बड़े कहते हैं बड़ों की बात मानना जो पढ़ा रहे उनसे पूछना नहीं जो कह रहे सही कहते हैं हां कहते जाओ। मुझे ज्ञानसागर महाराजकी क्या उपलब्धि हुई आचार्य ज्ञानसागर महाराज के मुखारविंद से वह उपलब्धि हुई आचार्य ज्ञानसागर महाराज जब भी प्रवचन करते णमोकार मंत्र का मंगलाचरण करते और चत्तारि दंडक का उच्चारण करते।</p>
<p>मुझे चत्तारि दंडक याद हुआ यह उपलब्धि ज्ञान सागर महाराज से हुई इससे बढ़कर और क्या चाहिए। दो बार लगातार दर्शन किया तीसरी बार आया तो मैं विद्यासागर के सागर में यह बूंद समा गया ऐसा प्रभाव पड़ा आचार्य ज्ञान सागर का ऐसा बीज हमें मिला था वह विद्यासागर के सरोवर में बीज अंकुरित हुआ। मैंने कभी जीवन में सोचा नहीं था कि मुनि बन जाऊंगा क्योंकि छोटी उम्र थी संस्कार तो थे णमोकार मंत्र आता संस्कार होते हुए वह पुण्य ऐसे जागृत हुआ उनके चरणों में समर्पित हुआ वैराग्य का सोचा नहीं था।</p>
<p>मैं तो पिकनिक मनाने आया था बहुत दिन हो गए यह सोचा दर्शन नहीं करें चलो इतना था पुण्य का उदय ऐसा आया ज्ञान सागर महाराज के दर्शन करते वे दृश्य हमें आज भी सामने दिखाई देते है। हमें भजन के लिए खड़े करते थे जो भी याद आता है कई लोगों ने कविता लिखी उसमें एक कविता हम लोग बोलते थे ।खिले हैं सखी आज दुल्हन बनके ।उनकी कृपा से उनके आशीर्वाद से हम लोग यहां आए हम लोग शक्ति प्राप्त कर रहे हैं जो गुरुओं ने प्राप्त किया। समाधि जिसे प्राप्त हो जाए अब संसार में भटकने की बात नहीं है ।जैसे आचार्य ज्ञान सागर जी महाराज ने वह निधि प्राप्त की और तीन माह पूर्व आचार्य विद्यासागर जी महाराज ने प्राप्त की ।उनके सानिध्य को प्राप्त करने का वह सौभाग्य हमें प्राप्त हुआ।</p>
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		<title>चातुर्मास का निवेदन करने बड़ी संख्या में लोग कुंडलपुर पहुंच रहे : आर्यिकारत्न श्री पूर्णमति माताजी का कुंडलपुर से मंगल विहार </title>
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		<pubDate>Sat, 22 Jun 2024 05:30:57 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[सुप्रसिद्ध सिद्ध क्षेत्र कुंडलपुर से मुनि संघों एवं आर्यिका संघों का मंगल विहार विभिन्न नगर क्षेत्र की ओर निरंतर होने का क्रम जारी है। 20 जून को प्रातः आर्यिकारत्न श्री पूर्णमति माताजी ससंघ का मंगल विहार आचार्य श्री समय सागर जी महाराज के मंगल आशीर्वाद से कुंडलपुर से पटेरा की ओर हुआ। पढ़िए यह रिपोर्ट&#8230; [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>सुप्रसिद्ध सिद्ध क्षेत्र कुंडलपुर से मुनि संघों एवं आर्यिका संघों का मंगल विहार विभिन्न नगर क्षेत्र की ओर निरंतर होने का क्रम जारी है। 20 जून को प्रातः आर्यिकारत्न श्री पूर्णमति माताजी ससंघ का मंगल विहार आचार्य श्री समय सागर जी महाराज के मंगल आशीर्वाद से कुंडलपुर से पटेरा की ओर हुआ। <span style="color: #ff0000">पढ़िए यह रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>कुंडलपुर (दमोह)।</strong> सुप्रसिद्ध सिद्ध क्षेत्र कुंडलपुर से मुनि संघों एवं आर्यिका संघों का मंगल विहार विभिन्न नगर क्षेत्र की ओर निरंतर होने का क्रम जारी है। 20 जून को प्रातः आर्यिकारत्न श्री पूर्णमति माताजी ससंघ का मंगल विहार आचार्य श्री समय सागर जी महाराज के मंगल आशीर्वाद से कुंडलपुर से पटेरा की ओर हुआ ।विहार दिशा संभवतः मुरार, ग्वालियर की ओर हो रहा है। पटेरा में आहार चर्या संपन्न हुई।</p>
<p>विभिन्न नगरों से चातुर्मास की आस लेकर कुंडलपुर में आचार्य श्री समय सागर जी महाराज से अपने-अपने नगर में चातुर्मास हेतु निवेदन करने बड़ी संख्या में लोग पहुच रहे हैं। बांसा ग्राम से पैदल चलकर बड़ी संख्या में लोग कुंडलपुर पहुंचे और चातुर्मास नगर में स्थापित हो इस आशा के साथ आचार्य श्री समय सागर जी महाराज से निवेदन किया।</p>
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		<title>धर्म सभा में दिए प्रवचन : स्वच्छंद प्रवृत्ति को रोकने का नाम गुप्ति &#8211; आचार्य श्री समयसागर जी महाराज </title>
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		<pubDate>Sat, 22 Jun 2024 05:00:15 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री समयसागर जी महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा कि कोलाहल के माध्यम से मन हमेशा विक्षिप्त रहता है। जैसे अभी एक सेकंड के लिए कुछ बोला नहीं था। मैंने ऐसे ही मौन बैठे तो अच्छा लग रहा। शब्दों का भी बहुत बड़ा प्रभाव रहता है और प्रदूषण भी होता है। उसे शब्द [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य श्री समयसागर जी महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा कि कोलाहल के माध्यम से मन हमेशा विक्षिप्त रहता है। जैसे अभी एक सेकंड के लिए कुछ बोला नहीं था। मैंने ऐसे ही मौन बैठे तो अच्छा लग रहा। शब्दों का भी बहुत बड़ा प्रभाव रहता है और प्रदूषण भी होता है। उसे शब्द प्रदूषण बोलते निष्प्रयोजन बोलने की चेष्टा नहीं होनी चाहिए। <span style="color: #ff0000">पढ़िए राजीव सिंघई मोनू की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>कुंडलपुर (दमोह)।</strong> सुप्रसिद्ध सिद्ध क्षेत्र कुंडलपुर में युग श्रेष्ठ संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य आचार्य श्री समयसागर जी महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा कि कोलाहल के माध्यम से मन हमेशा विक्षिप्त रहता है। जैसे अभी एक सेकंड के लिए कुछ बोला नहीं था। मैंने ऐसे ही मौन बैठे तो अच्छा लग रहा। शब्दों का भी बहुत बड़ा प्रभाव रहता है और प्रदूषण भी होता है। उसे शब्द प्रदूषण बोलते निष्प्रयोजन बोलने की चेष्टा नहीं होनी चाहिए। इस प्रकार आचार्य महाराज का बार-बार संघ के लिए संबोधन रहता था आवश्यक हो तो वचनों का प्रयोग करें।</p>
<p>एक बार गुरुदेव ने कहा था कि बोलना अनिवार्य नहीं किंतु आवश्यक हो तो आगम के माध्यम से अल्प शब्दों के माध्यम से उस विषय को पूर्ण करना चाहिए। इच्छा नहीं जागृत होती है गुरुदेव ने कहा था आपके साथ कोई बोलना नहीं चाहता तो आपकी क्या दशा होगी। आपके साथ कोई एक व्यक्ति भी वार्तालाप नहीं करना चाहता है। मान लो उस समय आपके अंदर क्या व्यू उठते हैं। अब दूसरे के अधीन क्यों हो रहे हम स्वाधीन जीवन पसंद नहीं करते। समझने के लिए जब निद्रा का उदय हो जाता है तो उस समय ऑटोमेटिक ही नींद आती है तो किसके साथ आप वार्तालाप करते हो 4 &#8211;6 घंटे के लिए मान लो शयन अवस्था में समय व्यतीत हुआ किसके साथ बोल रहे हो कहने की बात है किसके साथ बोल रहे ना उस समय आपकी दृष्टि में कोई शत्रु उपस्थित हुआ है ना मित्र उपस्थित हुआ है एक अवचेतन अवस्था है।</p>
<p>उस समय कोई भी विकल्प जागृत अवस्था नहीं होती है। कोई विकल्प समय व्यतीत हो जाता। जागृत अवस्था में एक घंटे के लिए मौन लो कठिनाई होती है, संयम कहलाता है। बहुत कठिनाई होती है निकटवर्ती कोई व्यक्ति हो तो मन में भाव आता है। भले बाद में 2 घंटे के लिए मौन हो लूं। अभी तो भाव आता बोलना इस प्रकार से मन स्थिति एक प्रकार से होती है इसलिए उसको समझाना बहुत कठिन हो जाता है। निष्प्रयोजन मन वचन काय की चेष्टा को रोकने के लिए कहा गया है। यह भी कहा गया है मन वचन काय की जो स्वच्छंद प्रवृत्ति है उसको रोकने का नाम गुप्ति भी कहा गया है।</p>
<p>आप मान लो किसी के साथ बोल भी रहे हैं तो भी उसको गुप्ति की संज्ञा दी जा रही।क्योंकि स्वच्छंद प्रवृत्ति को अपने रोका है। आपकी प्रवृत्ति तो हो रही है उसके साथ असंयम का कोई संबंध नहीं है। इसलिए स्वच्छंद प्रवृत्ति को रोकने का नाम गुप्ति कहा। गुप्ति का अर्थ भी यही है कि गोपनम इति गुप्ति जिसके माध्यम से आत्मा की रक्षा हो उसका नाम गुप्ति कहा है। किसी दूसरे की हम रक्षा कर रहे हैं, उसको गुप्ति नहीं कहा क्योंकि किसी न किसी प्रयोजन को लेकर के एक दूसरे की रक्षा के भाव आपके हो सकते हैं क्योंकि उसके साथ आपका संबंध जुड़ा हुआ है। ऐसा लगता है कि मैं रक्षा करने जा रहा, वह रक्षा नहीं मानी जाती। प्राणी मात्र के प्रति रक्षा का जो भाव आता है, वही वस्तु का मैत्री भाव माना जाता अथवा कारुण्य भाव माना जाता है।</p>
<p>स्वार्थ के साथ किसी के साथ संबंध जोड़ना मात्र संबंध है उसके द्वारा संसार का निर्माण होता है। संयम होने के उपरांत निश्चित रूप से समय पाकर के प्रयोजनीय होता है। संयोग दशा में संसारी प्राणी आनंद का अनुभव करता है। जैसे किसी का जन्म हो गया तो आनंद मानता संयोग हुआ है उसके वियोग में दुखी हो जाता है दुख का अनुभव करता है।</p>
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		<title>धर्म सभा में दिए प्रवचन : सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान, सम्यक चारित्र को धर्म कहा है- आचार्य समय सागर जी महाराज </title>
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		<pubDate>Sat, 22 Jun 2024 04:00:40 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री समय सागर जी महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा कि प्रधानं सर्व धर्माणाम जैनम जयतु शासनम ऐसा कहा गया है। संसार में अपनी-अपनी मान्यता को लिए हुए संसारी प्राणी संसार में परिभ्रमण कर रहा है। पढ़िए राजीव सिंघई मोनू की रिपोर्ट&#8230; कुंडलपुर (दमोह)। सुप्रसिद्ध सिद्ध क्षेत्र कुंडलपुर में युग श्रेष्ठ संत शिरोमणि [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य श्री समय सागर जी महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा कि प्रधानं सर्व धर्माणाम जैनम जयतु शासनम ऐसा कहा गया है। संसार में अपनी-अपनी मान्यता को लिए हुए संसारी प्राणी संसार में परिभ्रमण कर रहा है। <span style="color: #ff0000">पढ़िए राजीव सिंघई मोनू की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>कुंडलपुर (दमोह)। </strong>सुप्रसिद्ध सिद्ध क्षेत्र कुंडलपुर में युग श्रेष्ठ संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य पूज्य आचार्य श्री समय सागर जी महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा कि प्रधानं सर्व धर्माणाम जैनम जयतु शासनम ऐसा कहा गया है। संसार में अपनी-अपनी मान्यता को लिए हुए संसारी प्राणी संसार में परिभ्रमण कर रहा है। धर्म का अर्थ स्वरूप हुआ करता है स्वरूप की ओर दृष्टि जानी चाहिए, चाहे वह वैवागिक धर्म हो चाहे। स्वाभाविक धर्म हो धर्म तो धर्म माना जाता है उसका परिणाम अपने-अपने धर्म के अनुरूप निकलता है। मिथ्यात्व रूप जो भाव है वह भी आत्मा का ही धर्म है। क्योंकि उसको भी स्वतत्व कहा है ऐसा नहीं समझना चाहिए मिथ्या रूप भाव परतत्व है। स्वतत्व ही है आत्मगत भाव है असाधारण तत्व के भाव के अनुरूप लिया है। हमें चिंतन करना होगा, उसको आगम के आधार से समझना होगा क्योंकि आचार्य समन्तभद्र महाराज ने स्पष्ट कर दिया है।</p>
<p>श्रावकाचार ग्रंथ में सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चारित्र इन तीनों को धर्म की संज्ञा दी है। पृथक रूप से सम्यक दर्शन भी धर्म है, सम्यक ज्ञान भी धर्म नाम पाता है और सम्यक चारित्र तो है ही। लेकिन धर्म और मोक्ष मार्ग इनमें थोड़ा सा अंतर देखने मिलता है। चतुर्थ गुणस्थान में वह धर्म की उपासना कर रहा है क्योंकि सम्यक दर्शन के साथ उसका जीवन चल रहा है किंतु वह मोक्षमार्गी नहीं है। मोक्ष मार्ग जो होता है वह पर्टिकुलर किसी धर्म को लेकर नहीं होता है। इसमें तीनों समाहित होते हैं तब कहीं जाकर उसको मोक्ष मार्ग की संज्ञा दी जाती है।</p>
<p>सम्यक दर्शन के साथ वह चल रहा है इसलिए उसका उपयोग शुभयोग माना गया है। चारित्र का अभाव होने के कारण उसको अग्रति ऐसा कहा है। अग्रति का अर्थ हमें समझना चाहिए मिथ्या दृष्टि के आचरण में और अग्रसम दृष्टि के आचरण में बड़ा अंतर है। सम्यक दर्शन तो है उसके पास आचरण कहां है, तभी तो उन्होंने अग्रति ऐसा कहा है। किंतु सम्यक दर्शन के साथ उसका आचरण भी बना रहता है, जिसको कुंदकुंद स्वामी ने सम्यक आचरण चारित्र की संज्ञा दी है। सम्यक आचरण चारित्र अलग है और स्वयं आचरण चारित्र अलग है।</p>
<p>स्वयं आचरण चारित्र के दो भेद किए हैं। दोनों प्रकार के चरित्र सकल और विकल से वह दूर है सम्यक दर्शन के अनुरूप उसका आचरण है इस अपेक्षा से उसको सम्यक आचरण की संज्ञा दी है। फिर मिथ्या दृष्टि के आचरण में और अगत दृष्टि के आचरण में अंतर क्या है इस अंतर को समझना है तो गुरुदेव ने अच्छा उदाहरण दिया है।</p>
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