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	<title>आचार्य श्री शान्तिसागर जी महामुनि &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
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	<title>आचार्य श्री शान्तिसागर जी महामुनि &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>बीसवीं सदी के प्रथमाचार्य आचार्य श्री शान्तिसागर जी के समाधि दिवस पर विशेष : दिगंबर साधु परंपरा के पुनरुत्थान और समाधि का अप्रतिम उदाहरण </title>
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		<pubDate>Mon, 25 Aug 2025 06:50:47 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[हमारे वीतरागी संत केवल अपना ही नहीं, बल्कि समस्त जीव जगत का कल्याण करते हैं। समाज और राष्ट्र को उनका योगदान अतुलनीय है। बीसवीं शताब्दी में इस परंपरा के पुनर्जागरण के सूत्रधार, चारित्र चक्रवर्ती 108 आचार्य श्री शान्तिसागर जी महाराज हुए, जिन्होंने दिगंबर मुनि परंपरा को पुनर्जीवित किया। पढ़िए उनके समाधि दिवस पर उदयभान जैन [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>हमारे वीतरागी संत केवल अपना ही नहीं, बल्कि समस्त जीव जगत का कल्याण करते हैं। समाज और राष्ट्र को उनका योगदान अतुलनीय है। बीसवीं शताब्दी में इस परंपरा के पुनर्जागरण के सूत्रधार, चारित्र चक्रवर्ती 108 आचार्य श्री शान्तिसागर जी महाराज हुए, जिन्होंने दिगंबर मुनि परंपरा को पुनर्जीवित किया। <span style="color: #ff0000">पढ़िए उनके समाधि दिवस पर उदयभान जैन का विशेष आलेख&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p>सच्चे देव-शास्त्र-गुरु ही जैन संस्कृति के मूल बिंदु हैं। भारत की यह पुण्यभूमि त्याग, तप, साधना और चारित्र प्रधान परंपरा के लिए जानी जाती है। यही वह भूमि है जहाँ अयोध्या जैसे शाश्वत तीर्थ और झारखंड का सम्मेद शिखर जी अवस्थित हैं। यही से तीर्थंकरों ने जन्म और मोक्ष प्राप्त कर सिद्ध शिला पर विराजमान होकर जगत का कल्याण किया। आचार्य भगवंतों ने स्पष्ट कहा है कि मानव जीवन का मुख्य उद्देश्य संयम पथ पर चलकर आत्मकल्याण और अंततः सिद्ध शिला तक पहुँचना है। हमारे वीतरागी संत केवल अपना ही नहीं, बल्कि समस्त जीव जगत का कल्याण करते हैं। समाज और राष्ट्र को उनका योगदान अतुलनीय है। बीसवीं शताब्दी में इस परंपरा के पुनर्जागरण के सूत्रधार, चारित्र चक्रवर्ती 108 आचार्य श्री शान्तिसागर जी महाराज हुए, जिन्होंने दिगंबर मुनि परंपरा को पुनर्जीवित किया।</p>
<p><strong>जन्म और प्रारंभिक जीवन</strong></p>
<p>आचार्य श्री का जन्म कर्नाटक राज्य के बेलगाम जिले की चिकोडी तहसील के बेलगुल ग्राम में 25 जुलाई 1872 (आषाढ़ कृष्ण षष्ठी, विक्रम संवत् 1929) को भीमगोड़ा पाटिल और धर्मपत्नी सत्यवतीजी के यहाँ हुआ। बालक का नाम रखा गया गौड़ा। क्षत्रिय वंश में जन्मे इस पुण्यात्मा की मातृभाषा मराठी थी। तीन भाई-बहनों में यह प्रतिभाशाली बालक लौकिक शिक्षा में केवल तीसरी कक्षा तक ही पढ़ पाया, किंतु माता-पिता के धार्मिक संस्कारों ने उनके जीवन की धारा तय कर दी। नौ वर्ष की अल्पायु में विवाह हुआ, किंतु संयोगवश छः माह पश्चात् पत्नी का स्वर्गवास हो गया। इसके बाद उन्होंने आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन किया। 15 वर्ष की उम्र में ब्रह्मचर्य व्रत लिया और 32 वर्ष की आयु में घी-तेल का त्याग कर एक समयाहार का नियम अपना लिया। दयामयी और करुणामयी प्रवृत्ति से युक्त, वे खेती-बाड़ी और व्यापार में भी जीवों के प्रति संवेदनशील रहे। खेत में पक्षियों-पशुओं को कभी नहीं भगाया और कपड़े के व्यापार में ग्राहकों को पूर्ण स्वतंत्रता दी।</p>
<p><strong><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-88406" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/08/IMG-20250825-WA0011.jpg" alt="" width="398" height="534" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/08/IMG-20250825-WA0011.jpg 398w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/08/IMG-20250825-WA0011-224x300.jpg 224w" sizes="(max-width: 398px) 100vw, 398px" />दीक्षा और आचार्य पद</strong></p>
<p>43 वर्ष की आयु में क्षुल्लक दीक्षा और 1920 में आचार्य देवेंद्र कीर्ति से मुनिदीक्षा प्राप्त की। 1924 में ममडोली ग्राम में आचार्य पद से अलंकृत किए गए और वहीं चतुर्विध संघ की स्थापना हुई। उनके नेतृत्व में श्रमण संस्कृति को पुनः जीवंत स्वरूप मिला। समाज को पड़गाहन विधि का ज्ञान, 1930 में करुणाभाव से संघ की रक्षा, और 1931 में दिगंबर मुनियों को स्वतंत्र विचरण की अनुमति—ये सब उनके योगदान रहे। 1937 में गजपंथा जी पर उन्हें चारित्र चक्रवर्ती की उपाधि से विभूषित किया गया।</p>
<p><strong>उपसर्ग विजेता</strong></p>
<p>आचार्य श्री तप और संयम के पर्याय बने। कौन्स गुफा में ध्यान के समय सर्प दो घंटे तक लिपटा रहा, द्रोणगिरि पर शेर उनके पास बैठा रहा, लेकिन वे अविचल सामायिक में लीन रहे। ऐसे अनेक उपसर्गों पर विजय पाकर वे उपसर्ग विजेता कहलाए।</p>
<p><strong>समाधिमरण</strong></p>
<p>आचार्य श्री ने 36 वर्ष का दीक्षित जीवन व्यतीत किया, जिसमें लगभग 25 वर्ष उपवास में रहे। अंततः कुंथलगिरि में संलेखना पूर्वक 28 अगस्त 1955 (भाद्र शुक्ला द्वितीया) को प्रातः 6:50 बजे “ॐ सिद्धाय नमः” का उच्चारण करते हुए समाधिमरण प्राप्त किया। उनके जीवन ने आने वाली पीढ़ियों को समाधि-मरण का अद्भुत उदाहरण दिया।</p>
<p><strong>अमिट योगदान</strong></p>
<p>आज लगभग 1800 से अधिक दिगंबर साधु चारित्र पथ पर अग्रसर हैं, यह आचार्य श्री की ही कृपा का परिणाम है। उनके शिष्य और परंपरा में आचार्य वीरसागर जी, शिवसागर जी, धर्मसागर जी, श्रेयांससागर जी, अभिनंदनसागर जी और वर्तमान में आचार्य वर्धमान सागर जी तथा अनेकान्तसागर जी आचार्य परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ने उनके नाम से सम्मेद शिखरजी पर शान्तिसागर धाम का निर्माण कराया, जहाँ 31 फीट ऊँची भगवान अजितनाथ की प्रतिमा विराजमान है। माताजी के आशीर्वाद और प्रेरणा से समाधि दिवस पर देशभर में संगोष्ठियाँ, प्रदर्शनी, नाटिकाएँ, भाषण और प्रतियोगिताएँ आयोजित होती हैं। आज भी आचार्य श्री का समाधि दिवस पूरे देश में श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है।</p>
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		<title>संत परिचय-1 : आज पढ़िए आचार्य श्री शान्तिसागर जी महामुनि का परिचय   </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 18 Jun 2023 07:40:52 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[संत परिचय]]></category>
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					<description><![CDATA[श्रीफल जैन न्यूज की ओर से जैन संतों और साध्वियों की परिचय की श्रृंखला शुरू की जा रही है। जैन धर्म में मुनि बनना एक बहुत साहसिक और वैराग्य पूर्ण कार्य है। हर कोई व्यक्ति मुनि नहीं बन सकता। जैन दर्शन में मुनियों के आचार- विचार और दिनचर्या पर बहुत ही स्पष्ट और सख्त नियम [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>श्रीफल जैन न्यूज की ओर से जैन संतों और साध्वियों की परिचय की श्रृंखला शुरू की जा रही है। जैन धर्म में मुनि बनना एक बहुत साहसिक और वैराग्य पूर्ण कार्य है। हर कोई व्यक्ति मुनि नहीं बन सकता। जैन दर्शन में मुनियों के आचार- विचार और दिनचर्या पर बहुत ही स्पष्ट और सख्त नियम बनाए हैं। श्रीफल जैन न्यूज का उद्देश्य है कि इस श्रृंखला के जरिए पाठक जान सकें कि जैन धर्म जीवन जीने की कला है। यह अध्यात्म और विज्ञान पर आधारित जीवन मार्ग है और इनके बारे में पढ़कर लोग धर्म की राह पर चल सकें। इसी श्रृंखला की दूसरी कड़ी में आज प्रस्तुत है <span style="color: #ff0000;">राजेश पंचोलिया की कलम से आचार्य श्री शांतिसागर महाराज के बारे में&#8230;. </span></strong></p>
<hr />
<p>बीसवीं सदी के प्रथम आचार्य चारित्र चक्रवर्ती गुरु नाम गुरु प्रातः स्मरणीय आचार्य श्री शान्तिसागर जी महामुनि के अवतरण दिवस मिति अनुसार आषाढ़ कृष्णा 6 बुधवार दिनांक अनुसार 8 जून (151वां जन्म) वर्ष 2023 मनाया जा रहा है। जानते हैं इन्हीं के बारे में&#8230;</p>
<p>भोज ग्राम में सत्यवती जी और भीमगौड़ा पाटिल के यहां सन 1872 में 1008 श्री वासु पूज्य भगवान के गर्भ कल्याणक दिवस आषाढ़ कृष्णा 6 विक्रम संवत 1929 एक महामना का जन्म हुआ, जिनका नाम सातगौड़ा रखा गया। आपसे बड़े 2 भाई तथा एक भाई छोटा तथा एक बहन भी थी। आपमें बचपन से ही धार्मिक संस्कार रहे। 18 वर्ष की उम्र में अपने बिस्तर का त्याग कर दिया।</p>
<p><strong>आजीवन ब्रहचर्य व्रत</strong></p>
<p>-आपने 18 वर्ष की अल्पायु में श्री सिद्ध सागर जी से आजीवन ब्रहचर्य व्रत लिया।</p>
<p>-25 वर्ष की उम्र में जूते चप्पल का त्याग कर दिया।</p>
<p>-32 वर्ष की उम्र में अपने सम्मेद शिखर जी की यात्रा की घी और तेल का आजीवन त्याग कर दिया।</p>
<p>-शिखर जी की यात्रा के बाद 32 वर्ष की उम्र में ही एक समय भोजन का नियम ले लिया और जीवन भर आपने एक समय ही भोजन किया।</p>
<p><strong>क्षुल्लक दीक्षा</strong></p>
<p>-सन् 1915 में आपने उत्तर ग्राम में क्षुल्लक दीक्षा श्री देवेंद्र कीर्ति जी स्वामी से ली।</p>
<p><strong>ऐलक दीक्षा</strong></p>
<p>आपने गिरनार यात्रा सन 1918 में 1008 श्री नेमीनाथ भगवान की 5वी टोंक पर स्वयं ने ऐलक दीक्षा ली।</p>
<p><strong>मुनि दीक्षा</strong></p>
<p>-सन् 1920 यरनाल, कर्नाटक में आपने मुनि दीक्षा ग्रहण की।</p>
<p><strong>ये रहा खास </strong></p>
<p>-आपको सन् 1924 में आचार्य पद दिया गया।</p>
<p>-सन् 1925 में श्री श्रवणबेलगोला महामस्तकाभिषेक के बाद गुरुणा गुरु की उपाधि दी गई।</p>
<p>-आपने दीक्षा गुरु श्री देवेंद्र कीर्ति जी को पुनः मुनि दीक्षा दी इसलिए भी गुरुणा गुरु कहा जाता है।</p>
<p>-सन् 1937 में आपको चारित्र चक्रवर्ती पद दिया गया।</p>
<p><strong>जिनवाणी संरक्षण</strong></p>
<p>-आपकी प्रेरणा से धवल जयधवला टीका वाले षटखंडागम महाबंध कषाय पाहुड ग्रन्थ त्रय को 50 मन तांबे पर 2664 पत्रों पर अंकित कराया। यह ग्रंथ आज भी फलटण में सुशोभित विराजित है।</p>
<p><strong>उपसर्ग</strong></p>
<p>-आपके जीवन में सर्प के कोंगनोली, गोकाक, कौंनुर, शेडवाल आदि 5 से अधिक अनेक उपसर्ग।</p>
<p>-सिंह के गोकाक, मुक्तागिर जंगल, श्रवणबेलगोला यात्रा, सोनागिर, बावनगजा, द्रोणगिरी सिद्ध क्षेत्रों में 6 से अधिक उपसर्ग से अधिक। मकोड़े के, चींटी के और अन्य मानव जन्य उपसर्ग हुए हैं। आपने नाम अनुरूप शांति के सागर बन कर उपसर्ग सहन किये।</p>
<p>-आपने अपने जीवन के साधु जीवन के 40 वर्षों में 9938 उपवास किए।</p>
<p><strong>आपने 26 मुनि दीक्षा दी</strong></p>
<p>-प्रथम मुनि शिष्य श्री वीरसागरजी</p>
<p>-4 आर्यिका दीक्षा, 16 ऐलक दीक्षा, 28 क्षुल्लक दीक्षा, 14 क्षुल्लिका दीक्षा, कुल 88 आपने दीक्षाएं दीं।</p>
<p>-आपके बड़े भाई भी आपसे मुनि दीक्षा लेकर मुनि श्री वर्द्धमान सागर जी बने।</p>
<p>&#8211; 1105 दिन तक अनाज का त्याग, विधर्मियों के मंदिर प्रवेश के विरोध में किया।</p>
<p>-8 वर्षों तक श्रावकों ने केवल दूध, चावल, पानी दिया।</p>
<p>-8 दिन तक आहार में पानी ही नहीं दिया।</p>
<p>-ललितपुर चातुर्मास में सन् 1929 में सभी रसों का आजीवन त्याग किया।</p>
<p>-24 अक्टूबर, 1951 में गजपंथा जी में 12 वर्ष की नियम संल्लेखना ली।</p>
<p>-26 अगस्त, 1955 को लिखित पत्र से मुनि श्री वीर सागर जी को आचार्य पद दिया।</p>
<p>-36 दिन की संल्लेखना में 18 सितम्बर, 1955 को आपकी उत्कृष्ट समाधि हुई।</p>
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