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	<title>आचार्य श्री शांतिसागर महाराज &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
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		<title>आज्ञा में चलने से जीवन बनता है धन्य: श्री ज्ञानमति माताजी ने बताई आचार्यश्री शांतिसागर जी के तप-साधना क्रिया </title>
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		<pubDate>Mon, 24 Feb 2025 08:45:52 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आर्यिका श्री ज्ञानमति माताजी ने मार्ग प्रभावना भावना के बारे में बताया कि मार्ग यानि मोक्ष मार्ग की प्रभावना। ज्ञान द्वारा तप द्वारा, जिन पूजा आदि द्वारा धर्म की प्रभावना की जाती है। लोक में उसकी प्रसिद्धि होती है। आचार्यश्री शांतिसागर जी महाराज ने अपने जीवन में मार्ग प्रभावना की है। दक्षिण से उत्तर तक [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आर्यिका श्री ज्ञानमति माताजी ने मार्ग प्रभावना भावना के बारे में बताया कि मार्ग यानि मोक्ष मार्ग की प्रभावना। ज्ञान द्वारा तप द्वारा, जिन पूजा आदि द्वारा धर्म की प्रभावना की जाती है। लोक में उसकी प्रसिद्धि होती है। आचार्यश्री शांतिसागर जी महाराज ने अपने जीवन में मार्ग प्रभावना की है। दक्षिण से उत्तर तक विहार करके धर्म प्रभावना की है। <span style="color: #ff0000">पढ़िए कोल्हापुर से अभिषेक अशोक पाटील की यह प्रस्तुति&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>कोल्हापुर।</strong> आज से 69 साल पहले कुंथलगिरी पर्वत पर सन 1955 में आचार्य श्री शांतिसागर महाराज जी की अंतिम सल्लेखना शुरु थी। वह अंतर में मग्न थे। सन् 1955 में आचार्यश्री कुंथलगिरि में कुलभूषण-देशभूषण जी की प्रतिमा के समक्ष 12 वर्ष की सल्लेखना ली थी। ज्ञानमती माताजी उस समय क्षुल्लिका अवस्था में वीरमति माताजी थी, वह आचार्य श्री शांतिसागर महाराज जी की सल्लेखना के समय वहां गई थी। भादों शुक्ल दूज को आचार्यश्री ने अपने शरीर का परित्याग करके उपपाद शैय्या पर जाकर वैक्रियिक शरीर धारण किया। आज लगभग 1600 साधु विहार कर रहे हैं। यह सब आचार्य श्री शांतिसागर महाराज जी का ही उपकार है। भगवान आदिनाथ ने युग की आदि में जीवन जीने की कला सिखाया। आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज ने 20वीं शताब्दी के अंदर मुनि परंपरा को जीवंत किया। उसी प्रकार गुरु आज्ञा का पालन करते हुए ज्ञानमती माताजी जो कि प्रथम बालब्रह्मचारिणी, इन्होंने आर्यिका परंपरा को जीवंत किया। प्रथमाचार्य शांतिसागर जी महाराज, वे इस युग के लिए वरदान थे। आर्यिका श्री ज्ञानमति माताजी ने मार्ग प्रभावना भावना के बारे में बताया कि मार्ग यानि मोक्ष मार्ग की प्रभावना। ज्ञान द्वारा तप द्वारा, जिन पूजा आदि द्वारा धर्म की प्रभावना की जाती है। लोक में उसकी प्रसिद्धि होती है। आचार्यश्री शांतिसागर जी महाराज ने अपने जीवन में मार्ग प्रभावना की है। दक्षिण से उत्तर तक विहार करके धर्म प्रभावना की है।</p>
<p><strong>जिनागम के प्रति मेरूसम श्रद्धा</strong></p>
<p>आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज कहते थे कि जिनागम के अनुसार विचार बनाना चाहिए। अपनी धारणा के अनुसार आगम को नहीं बदलना चाहिए। उनकी आगम की श्रद्धा मेरु की तरह अविचलित थी। सागर के समान वही अथाह थी। आगम के विरुद्ध वे एक भी बात न कहते थे, न करते थे। उनका कहना था कि शास्त्र जलधि है, जीव मछली है, उसमें जीव जितना घूमे और अवगाहना करे उतना ही थोड़ा है। उनके आदेश के अनुसार जब धवला, जयधवला, महाबंध (महाधवल) सिद्धांत ग्रंथ ताम्रपत्र में उत्कीर्ण हो गए तब महाराज ने शास्त्र भंडार के व्यवस्थापकों से कहा था कि ये शास्त्र हमारे प्राण हैं। हमारे प्राण इस शरीर में नहीं हैं, जिनेंद्र भगवान की वाणी ही हमारा प्राण हैं।</p>
<p><strong>तीन बार सिंह-निष्क्रिडित नाम का तप करने वाले आचार्य श्री शांतिसागर </strong></p>
<p>आचार्य श्री शांतिसागर महाराज जी का मुनि जीवन 35 वर्ष का था। जिसमें से आचार्य श्री ने 9 हजार 338 निर्जल उपवास किए हैं जो की लगभग 27 वर्षाें में होते हैं और लगभग 3 बार सिंह-निष्क्रिडित नाम का तप किया। 1 आहार 1 उपवास, 1 आहार 2 उपवास, 1 आहार 3 उपवास और ये क्रम 9 उपवास तक चलता फिर 1 आहार 9 उपवास, 1 आहार 8 उपवास ऐसे पूरा क्रम होता है। आचार्य विद्यासागर जी जब विद्याधर थे। तब उन्होंने वो आहार देखा था। आचार्य विद्यासागर जी बताते हैं कि लगता नहीं था की शांतिसागर जी इतने उपवास के बाद आहार कर रहे है।</p>
<p><strong>आचार्यश्री शांतिसागर जी के पास अद्भुत स्वाध्याय प्रवृत्ति </strong></p>
<p>आचार्य श्री शांतिसागर महाराज जी प्रतिदिन कम से कम 40 या 50 पृष्ठों का स्वाध्याय करते थे। धवलादि सिद्धांत ग्रंथों का बहुत सुंदर अभ्यास महाराज ने किया था। अपनी असाधारण स्मृति तथा तर्कणा के बल पर वे अनेक शंकाओं को उत्पन्न करके उनका सुंदर समाधान करते थे।</p>
<p><strong><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-75244" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250224-WA0016.jpg" alt="" width="1600" height="1009" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250224-WA0016.jpg 1600w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250224-WA0016-300x189.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250224-WA0016-1024x646.jpg 1024w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250224-WA0016-768x484.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250224-WA0016-1536x969.jpg 1536w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250224-WA0016-990x624.jpg 990w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250224-WA0016-1320x832.jpg 1320w" sizes="(max-width: 1600px) 100vw, 1600px" />गंभीर उपसर्ग जिन पर आचार्य श्री ने प्राप्त की विजय </strong></p>
<p>आचार्यश्री के अलौकिक आत्मध्यान निमग्नता की अनेकों अनमोल घटनाएं हैं। कोगनोली में महाराज एक निर्जन स्थान में बनी हुई गुफा में रात्रि के समय ध्यान में लीन थे। नगर का एक पागल महाराज के पास गुफा में गया। उसने महाराज के पास रोटी मांगी- बाबा, रोटी दो। भूख लगी है। बाबा के पास क्या था, वे तो मौन ध्यान कर रहे थे। बाबा को शांत देख पागल का दिमाग उत्तेजित हो गया। उसके हाथ में एक लकड़ी थी जिसके अग्रभाग में नोकदार लोहे का कीला लगा था, उससे बैलों को मारने का काम लिया जाता था। पागल इस लकड़ी से महाराज के शरीर को मारने लगा। लोहे की नोक पीठ, छाती आदि में चुभ गयी। सारा शरीर रक्त से सन गया। बहुत देर तक उपद्रव करने के बाद पागल वहां से चला गया। सबेरा होने पर लोगों ने देखा तो बहुत दुःखी हुए। भक्तों ने उनकी वैयावृत्ति की किन्तु महाराज चुपचाप थे। एक समय गुफा में ध्यान में लीन थे तब महाराज की पुरुष इंद्रिय पर एक मकोड़ा चिपट गया। वह मांस खाता था और रक्त की धारा बहती थी किंतु, महाराज का ध्यान स्थिर था। ध्यान हटने पर संघस्थ ब्र. बंडू ने उस मकोड़े को अलग किया।</p>
<p><strong>चीटियां भी ध्यान में नहीं डाल सकीं बाधा</strong></p>
<p>एक अवसर पर गुफा में रखे दीपक का कुछ तेल दैवयोग से बिखर गया और असंख्य चीटियां वहां आ गईं। महाराज के शरीर पर भी चीढ़ियां चढ़ गईं और काटती रहीं। प्रातःकाल लोगों ने आकर यह उपसर्ग दूर किया। महाराज का यह नियम था कि प्रत्येक अष्टमी व चतुर्दशी को उपवास का नियम लेकर मौन रहकर वे आत्मा का ध्यान किया करते थे। वहां गिरि-कंदराओं में अनेक बार व्याघ्र आदि हिंसक जंतु उनके पास आ जाया करते थे और कुछ समय पश्चात् उपद्रव किए बगैर चले जाते थे।</p>
<p><strong>विषधर सर्प शरीर पर दो घंटे लिपटा रहा</strong></p>
<p>एक बार कोगनोली की गुफा में लगभग 8 फीट का विषधर सर्प उनके शरीर में दो घंटे तक लिपटा रहा। वह सर्प भीषण होने के साथ अधिक वजनदार भी था। विहार करते हुए भी उनके मार्ग में अनेक हिंसक पशु आए और फिर महाराज के तप के प्रभाव से चले गए। शिखरजी के रास्ते में 100-150 बैलों का झुंड मिला। चार मस्त बैल भागकर महाराज की तरफ आए और उनके मुख को देखकर शांत होकर प्रणाम करके वहां से चले गए। महाराज कहते थे कि भय किसका किया जाए। जब तक कोई पूर्व का बैरी न हो तब तक वह नहीं सताता है। महाराज ने कहा था-‘‘हम बीच बाजार में भी बैठकर आत्मध्यान कर सकते हैं। एक बार मध्याह्न का समय था कोन्नूर की गुफा में महाराज श्री सामायिक कर रहे थे। एक उड़ने वाला सर्प आया और महाराज की जंघाओं के बीच छिप गया। वह लगभग तीन घंटे तक उपद्रव करता रहा लेकिन, आचार्य श्री ने अपनी स्थिर मुद्रा को भंग नहीं किया। जो उनकी साधना को दर्शाता है।</p>
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		<title>भारतगौरव गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी के 73वें संयम दिवस एवं 91वीं जन्मजयंती पर अयोध्या में आयोजन : वर्तमान में आचार्य श्री शांतिसागर जी का प्रतिरूप हैं 90 वर्षीय गणिनी ज्ञानमती माताजी: प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका श्री चंदनामती माताजी </title>
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		<pubDate>Tue, 15 Oct 2024 16:59:43 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[पूज्य गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी के रूप में हमें आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज का दर्शन मिलता है। माताजी ने अपने जीवन में अपने गुरु, प्रथमाचार्य चारित्र्य चक्रवर्ती श्री शांतिसागर जी महाराज के हर आदेश, संदेश और बातों को अंगीकार किया है। पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट&#8230; अयोध्या। आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज के बारे में [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>पूज्य गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी के रूप में हमें आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज का दर्शन मिलता है। माताजी ने अपने जीवन में अपने गुरु, प्रथमाचार्य चारित्र्य चक्रवर्ती श्री शांतिसागर जी महाराज के हर आदेश, संदेश और बातों को अंगीकार किया है। <span style="color: #ff0000">पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>अयोध्या।</strong> आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज के बारे में क्या कहें? मेरा परम सौभाग्य है कि ऐसे चारित्र्य चक्रवर्ती आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज का आचार्य पदारोहण शताब्दी वर्ष चल रहा है। सन 1924 में उन्हें समडोली, महाराष्ट्र में समाज ने आचार्य पद पर प्रतिष्ठापित किया था। वे बीसवीं शताब्दी के पहले आचार्य बने, जो हम सबके लिए दिगदिगन्त बने। आज भी, जब हम पूज्य गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी के मुख से उनकी बातें सुनते हैं, तो ऐसा लगता है कि हमने आचार्य श्री शांतिसागर महाराज के साक्षात दर्शन कर लिए हैं।</p>
<p>पूज्य गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी के रूप में हमें आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज का दर्शन मिलता है। माताजी ने अपने जीवन में अपने गुरु, प्रथमाचार्य चारित्र्य चक्रवर्ती श्री शांतिसागर जी महाराज के हर आदेश, संदेश और बातों को अंगीकार किया है। 1956 में माधोराजपुरा (राज.) में आचार्य श्री वीरसागर जी महाराज से दीक्षित होकर, माताजी पिछले 72 वर्षों से जैन धर्म का संदेश दे रही हैं। आज, जब माताजी 90 वर्ष की हो रही हैं, उन्होंने आचार्य शांतिसागर जी महाराज के संदेशों को पूरे विश्व में फैलाया है।</p>
<p><img decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-68481" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/10/IMG-20241015-WA0015.jpg" alt="" width="1152" height="864" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/10/IMG-20241015-WA0015.jpg 1152w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/10/IMG-20241015-WA0015-300x225.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/10/IMG-20241015-WA0015-1024x768.jpg 1024w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/10/IMG-20241015-WA0015-768x576.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/10/IMG-20241015-WA0015-74x55.jpg 74w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/10/IMG-20241015-WA0015-111x83.jpg 111w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/10/IMG-20241015-WA0015-215x161.jpg 215w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/10/IMG-20241015-WA0015-990x743.jpg 990w" sizes="(max-width: 1152px) 100vw, 1152px" />उनके प्रवचन में कभी भी ऐसा नहीं होता कि वे शांतिसागर जी महाराज की बात न करें या उनकी जयजयकार न करें। ऐसे शिष्यों का मिलना भी अनूठा है, जो अपने गुरु के गुरु को इस प्रकार से प्रभावित करते हैं कि देश भर में आदर्श गुरु परंपरा को प्राप्त किया जा सके। आचार्य शांतिसागर जी महाराज हमारे जैन समाज के आदर्श हैं। उनके मार्ग पर चलकर हमारे सभी संत, आर्यिका माताएं, और दिगंबर मुनि उनके बताए हुए मार्ग का पालन कर रहे हैं। हम आचार्य शांतिसागर जी महाराज को शत-शत नमन करते हैं। उनके आचार्य पदारोहण शताब्दी वर्ष की मिसाल हमारे लिए प्रेरणादायक हो। यह मंगल प्रार्थना है कि आने वाली पीढ़ियां भी उनके संदेशों पर चलते हुए जैन धर्म की पताका फहराते रहें और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करती रहें।</p>
<p>भारतगौरव गणिनिप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी के 73वें संयम दिवस एवं 91वीं जन्मजयंती पर माताजी के चरणों में शत-शत वंदन।</p>
<p>साभार,</p>
<p>राजेश जैन दद्दू</p>
<p>शब्दांकन &#8211; अभिषेक अशोक पाटील</p>
<p>(कार्याध्यक्ष &#8211; अखिल भारतवर्षीय दिगंबर जैन युवा परिषद, कोल्हापूर)</p>
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		<title>वर्तमान में आचार्य श्री शांतिसागर जी का प्रतिरूप हैं 90 वर्षीय गणिनी ज्ञानमती माताजी : श्री शांतिसागर जी के हर आदेश और संदेश को अपने जीवन में अंगीकार किया </title>
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		<pubDate>Sun, 29 Sep 2024 08:49:23 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज के बारे में कहने के लिए शब्द कम पड़ जाते हैं। मेरा परम सौभाग्य है कि आज हम आचार्य पद के शताब्दी वर्ष का उत्सव मना रहे हैं। 1924 में समडोली, महाराष्ट्र में समाज ने उन्हें आचार्य के पद पर प्रतिष्ठापित किया था, और वे बीसवीं शताब्दी में पहले आचार्य [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज के बारे में कहने के लिए शब्द कम पड़ जाते हैं। मेरा परम सौभाग्य है कि आज हम आचार्य पद के शताब्दी वर्ष का उत्सव मना रहे हैं। 1924 में समडोली, महाराष्ट्र में समाज ने उन्हें आचार्य के पद पर प्रतिष्ठापित किया था, और वे बीसवीं शताब्दी में पहले आचार्य बने, जो हम सभी के लिए दिगदर्शक बने। <span style="color: #ff0000">पढ़िए अभिषेक अशोक पाटील की रिपोर्ट&#8230;.</span></strong></p>
<hr />
<p>आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज के बारे में कहने के लिए शब्द कम पड़ जाते हैं। मेरा परम सौभाग्य है कि आज हम आचार्य पद के शताब्दी वर्ष का उत्सव मना रहे हैं। 1924 में समडोली, महाराष्ट्र में समाज ने उन्हें आचार्य के पद पर प्रतिष्ठापित किया था, और वे बीसवीं शताब्दी में पहले आचार्य बने, जो हम सभी के लिए दिगदर्शक बने। पूज्य गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी के माध्यम से आज हमें आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज का दर्शन होता है।</p>
<p>माताजी ने अपने जीवन में अपने गुरु, प्रथमाचार्य चारित्र्य चक्रवर्ती श्री शांतिसागर जी के हर आदेश और संदेश को अपने जीवन में अंगीकार किया है। उन्होंने 1956 में माधोराजपुरा (राज.) में आचार्य श्री वीरसागर जी महाराज से दीक्षा प्राप्त की, और पिछले 72 वर्षों से जैन धर्म का प्रचार कर रही हैं। आज, पूज्य माताजी 90 वर्ष की हो रही हैं, जिन्होंने आचार्य शांतिसागर जी के साक्षात संदेशों को विश्व में फैलाया है। उनका कोई भी प्रवचन ऐसा नहीं होता जिसमें वे शांतिसागर जी महाराज की बात न करें या उनकी जयजयकार न करें। आज शिष्यों का मिलना भी एक अनूठा अनुभव है, जो अपने गुरु के गुरु को भी आदर्श मानते हैं।</p>
<p>आचार्य शांतिसागर जी महाराज हमारे जैन समाज के आदर्श हैं, और उनकी शिक्षाएं हमारे संत समुदाय और आर्यिका माताओं द्वारा आज भी पालन की जाती हैं। आचार्य शांतिसागर जी महाराज को हमारा शत-शत नमन है। उनके आचार्य पदारोहन शताब्दी वर्ष की यह मिसाल हमारे लिए प्रेरणादायक हो। हमारी मंगल प्रार्थना है कि आने वाले हजारों वर्षों तक उनका नाम और संदेश दिगदिगंत रहे, और अगली पीढ़ी भी उनके मार्ग पर चलकर जैन धर्म की पताका फहराती रहे।</p>
<p>ऐसी मंगल भावनाओं के साथ, हम आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज की पूजा करते हैं और उनके संदेशों को फैलाने का संकल्प लेते हैं।</p>
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		<title>उत्तम तप का प्रेरणास्पद उदाहरण : आचार्यश्री के जीवन में उत्तम तप के कई प्रेरक प्रसंग </title>
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		<pubDate>Sat, 14 Sep 2024 12:48:18 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन धर्म में बारह (12) तरह के तपाचरण का उल्लेख मिलता है। इनमें छः बाह्य तथा छः आभ्यांतर तप माने गए हैं। पिछली सदी के महान उपसर्ग विजेता समाधिस्थ आचार्य 108 श्री शांतिसागर जी महाराज के जीवन में घटित हुए अनेक प्रसंग ऐसे हैं जो उनकी कठिन तपश्चर्या के प्रेरणादायक उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। पढ़िए [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जैन धर्म में बारह (12) तरह के तपाचरण का उल्लेख मिलता है। इनमें छः बाह्य तथा छः आभ्यांतर तप माने गए हैं। पिछली सदी के महान उपसर्ग विजेता समाधिस्थ आचार्य 108 श्री शांतिसागर जी महाराज के जीवन में घटित हुए अनेक प्रसंग ऐसे हैं जो उनकी कठिन तपश्चर्या के प्रेरणादायक उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। <span style="color: #ff0000">पढ़िए प्रदीप जैन की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p>जैन धर्म में बारह (12) तरह के तपाचरण का उल्लेख मिलता है। इनमें छः बाह्य तथा छः आभ्यांतर तप माने गए हैं। पिछली सदी के महान उपसर्ग विजेता समाधिस्थ आचार्य 108 श्री शांतिसागर जी महाराज के जीवन में घटित हुए अनेक प्रसंग ऐसे हैं जो उनकी कठिन तपश्चर्या के प्रेरणादायक उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।</p>
<p>एक बार वे दक्षिण में किसी दिगम्बर मंदिर में तपस्या कर रहे थे। उनका यह तप निद्राविजय के लिए किया जा रहा था। आचार्यश्री तपस्यारत थे, शाम का समय हुआ तो किसी पुजारी ने दीपक में तेल भरकर दीपक जला दिया। थोड़ी ही देर में वहां चींटियों का प्रकोप शुरू हो गया। आचार्यश्री मूर्तिवत निश्चल मुद्रा धारक करके विराजमान थे। चींटियां आचार्यश्री के शरीर पर विचरण करने लगीं। आचार्यश्री ध्यानमग्न थे इसलिए उन्हें चीटिंयों के शरीर पर चलने का कोई भान ही नहीं हुआ। चींटियां पौरूषअंग और नितंब के हिस्से में काटने लगीं। चींटियों का हमला इतना विकट था कि शरीर के उस भाग से रक्त बहने लगा। आचार्यश्री ध्यानमग्न निश्चल बैठे रहे। रात को पुजारी को स्वप्न आया कि आचार्य महाराज को कोई शारीरिक कष्ट हो रहा है। मंदिर जंगल में था। आचार्यश्री जिस मंदिर में ध्यान मुद्रा धारण कर बैठे थे वह जंगल में था।</p>
<p>इस मंदिर के आसपास शेरों का आना जाना लगा रहता था। शेर का डर था इसलिए पुजारी ने एक और श्रावक को साथ ले जाने के लिए उठाया तो उसने साथ में जाने से मना कर दिया। इस तरह पुजारी और श्रावक दोनों ही नहीं गए और अपने घर में सोए रहे। सुबह होते ही पुजारी और अन्य श्रावक जब मंदिर में पहुंचे तो देखा की आचार्य श्री शांतिसागर महाराज के पूरे शरीर पर चींटियों का प्रकोप हो रहा है। उनका शरीर सूज गया और खून निकल रहा है। उन लोगों के आंखों में आचार्यश्री के शरीर पर हुए उपसर्ग को देखकर आंसू आ रहे थे। श्रावकों में आचार्यश्री के शरीर को चींटियों से मुक्त करने के लिए कुछ दूर पर गुड़ और शक्कर रख दिया। चींटियों से पूरी तरह मुक्त होने के बाद श्रावकों ने आचार्यश्री की यथायोग्य वैयावृत्ति की और उपसर्ग का निवारण किया। आचार्यश्री के जीवन में उत्तम तप ऐसे कई प्रेरक प्रसंग हैं।</p>
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		<title>किया गया शिक्षकों का सम्मान : आचार्य श्री शान्तिसागर जी महाराज के समाधि दिवस पर हुई आदरांजलि सभा </title>
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		<pubDate>Fri, 06 Sep 2024 07:41:32 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[भादवा सुदी दूज परम पूज्य आचार्य श्री शांति सागर जी महाराज के समाधि दिवस पर नेमी नगर (जैन कालोनी) में विनयांजलि सभा में पूज्य मुनि श्री मुनिसागरजी जी महाराज ने मंगल प्रवचन में कहा चारित्र चक्रवर्ती आचार्य शांति सागर जी महाराज अदम्य शक्ति,दृढ़ आत्म बल के धरि थे। उन्होंने जैन धर्म की रक्षा की और [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>भादवा सुदी दूज परम पूज्य आचार्य श्री शांति सागर जी महाराज के समाधि दिवस पर नेमी नगर (जैन कालोनी) में विनयांजलि सभा में पूज्य मुनि श्री मुनिसागरजी जी महाराज ने मंगल प्रवचन में कहा चारित्र चक्रवर्ती आचार्य शांति सागर जी महाराज अदम्य शक्ति,दृढ़ आत्म बल के धरि थे। उन्होंने जैन धर्म की रक्षा की और आज मुनि परंपरा उन्हीं के कारण जीवित है। <span style="color: #ff0000">पढ़िए यह रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> भादवा सुदी दूज परम पूज्य आचार्य श्री शांति सागर जी महाराज के समाधि दिवस पर नेमी नगर (जैन कालोनी) में विनयांजलि सभा में पूज्य मुनि श्री मुनिसागरजी जी महाराज ने मंगल प्रवचन में कहा चारित्र चक्रवर्ती आचार्य शांति सागर जी महाराज अदम्य शक्ति,दृढ़ आत्म बल के धरि थे। उन्होंने जैन धर्म की रक्षा की और आज मुनि परंपरा उन्हीं के कारण जीवित है। उन्होंने यह भी कहा कि जीवन में सबसे पहले गुरु हमारे माता-पिता होते हैं और शिक्षक दिवस पर सभी शिक्षकों को आशीर्वाद देते हुए कहा कि कि वह सभी बच्चों को धर्म नीति संबंधित शिक्षा अवश्य दें जिससे शुभ संस्कृति देश एवं अच्छे समाज की स्थापना हो सके।</p>
<p>इस अवसर पर आदरांजलि देते हुए किरण बड़जात्या, प्रतिभा अजमेरा, उर्मिला दोषी, मंजु पाटनी, गिरीश काला, गिरीश पाटोदी, कल्पना जैन तथा ब्र. मंजुला दीदी ने महाराज जी के कई रोचक प्रसंग, अनेकों घटनाएं तथा पूरे जीवन के ख़ास पहलू पर प्रकाश डाला और कहा कि आज हम जो मुनियों के दर्शन कर रहे हैं, वो सब शांतिसागर जी महाराज की ही देन है। आप प्रथम आचार्य थे।</p>
<p><img decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-65446" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/09/IMG-20240906-WA0017.jpg" alt="" width="1280" height="960" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/09/IMG-20240906-WA0017.jpg 1280w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/09/IMG-20240906-WA0017-300x225.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/09/IMG-20240906-WA0017-1024x768.jpg 1024w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/09/IMG-20240906-WA0017-768x576.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/09/IMG-20240906-WA0017-74x55.jpg 74w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/09/IMG-20240906-WA0017-111x83.jpg 111w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/09/IMG-20240906-WA0017-215x161.jpg 215w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/09/IMG-20240906-WA0017-990x743.jpg 990w" sizes="(max-width: 1280px) 100vw, 1280px" /> दिगंबर जैन समाज नेमि नगर अध्यक्ष कैलाश लुहाड़िया ने बताया कि शिक्षक दिवस के अवसर पर पूज्य मुनि श्री मोन सागर जी, मुनि सागर जी, मुक्ति सागर जी महाराज के पावन सानिध्य में नेमिनगर समाज के वरिष्ठ शिक्षकों महेन्द्र गंगवाल, प्रेमचंद वेद, मंजू पाटनी, शशि उत्तम चंद, पुष्पा लेखा, रेखा पापड़ीवाल, सुशीला चांदीवाल, डॉ नेमीचंद जैन का शाल श्रीफल, माला दुपट्टा पहना कर पवन गुना वाले, अनिल अजमेरा, माणक कासलीवाल, निर्मला पाटोदी, कुसुम गंगवाल, प्रमिला जैन उर्मिला दोषी कल्पना बाकलीवाल मधु जैन प्रतिभा अजमेरा किरण बड़जात्या, लवी जैन, संगीता सेठी, मंजु पापड़ीवाल आदि ने सम्मान किया। तत्पश्चात् गुरुदेव के प्रवचन हुए। संचालन कैलाश लुहाड़िया ने किया। आभार गिरीश पाटोदी ने माना।</p>
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		<title> आर्यिका सरस्वती माता जी का रहा सानिध्य :  चारित्र चक्रवर्ती आचार्य शांति सागर जी महाराज का समाधि दिवस  मनाया गया </title>
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		<pubDate>Fri, 06 Sep 2024 07:31:49 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[प्रथम आचार्य चारित्र चक्रवर्ती आचार्य श्री शांति सागर जी महाराज का समाधि दिवस नगर में विराजमान आर्यिका सरस्वती माता जी के सानिध्य में मनाया गया। सन्मति जैन काका ने बताया कि इस अवसर  पर आर्यिका माताजी के सानिध्य में प्रातः श्री पार्श्वनाथ बड़ा मंदिरजी में श्री जी का भव्य पंचामृत अभिषेक एवं आचार्य शांति सागर [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>प्रथम आचार्य चारित्र चक्रवर्ती आचार्य श्री शांति सागर जी महाराज का समाधि दिवस नगर में विराजमान आर्यिका सरस्वती माता जी के सानिध्य में मनाया गया। सन्मति जैन काका ने बताया कि इस अवसर  पर आर्यिका माताजी के सानिध्य में प्रातः श्री पार्श्वनाथ बड़ा मंदिरजी में श्री जी का भव्य पंचामृत अभिषेक एवं आचार्य शांति सागर विधान की रचनाकर 36 अर्घ्य समर्पित कर पूजन किया गया। <span style="color: #ff0000">पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>सनावद।</strong> 20 वीं सदी के प्रथम आचार्य चारित्र चक्रवर्ती आचार्य श्री शांति सागर जी महाराज का समाधि दिवस नगर में विराजमान आर्यिका सरस्वती माता जी के सानिध्य में मनाया गया। सन्मति जैन काका ने बताया कि इस अवसर  पर आर्यिका माताजी के सानिध्य में प्रातः श्री पार्श्वनाथ बड़ा मंदिरजी में श्री जी का भव्य पंचामृत अभिषेक एवं आचार्य शांति सागर विधान की रचनाकर 36 अर्घ्य समर्पित कर पूजन किया गया।</p>
<p>इस अवसर पर आर्यिका अनंत मति माता जी ने अपनी वाणी से रसपान करवाते हुए कहा कि श्रमण परम्परा के आदर्श संत आचार्य शान्ति सागरजी महाराज का जन्म विक्रम संवत 1926 (सन् 1872) के आषाढ़ मास कृष्ण पक्ष 6 तिथि, बुधवार को दक्षिण भारत के बेलगांव जिले के अंतर्गत येलगुल ग्राम में हुआ था। आपका विवाह 9 वर्ष की अल्प आयु में कर दिया गया था। विवाह के 6 माह उपरांत ही उस बालिका का स्वर्गवास हो गया। पुन: विवाह का प्रसंग उठने पर आपने अपने घर वालों को स्पष्ट मना कर दिया और आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत लेने का प्रस्ताव रख दिया और अन्त में उन्होंने गृह त्याग कर दिया और दीक्षा ले ली।</p>
<p>आपने अपने 35 वर्ष की साधनाकाल के अन्तर्गत नौ हजार छ: सो अड़तीस उपवास किए। आपका सारा जीवन घोर तपस्या और संघर्ष में बीता। आपके आचरण में अहिंसा थी, वाणी में स्याद्वाद और चिन्तन में अनेकान्त था। आपने अपने जीवन का अन्त समय निकट जानकर श्री दिगम्बर जैन सिद्ध क्षेत्र कुंथलगिरिजी (महाराष्ट्र) में 1अगस्त, रविवार को समाधि मरण (सल्लेखना) का निश्चय किया और 18 सितम्बर 1955 को प्रातः 6.50 पर ॐ सिद्धोऽहं का ध्यान करते हुए युगप्रवर्तक आचार्यं श्री शान्तिसागर जी ने नश्वर देह का त्याग कर दिया। संयम-पथ पर कदम रखते ही आपके जीवन में अनके उपसर्ग आये जिन्हें समता पूर्वक सहन करते हुए आपने शान्तिसागर नाम को सार्थक किया।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-65433" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/09/WhatsApp-Image-2024-09-06-at-12.56.48-PM-1.jpeg" alt="" width="1280" height="576" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/09/WhatsApp-Image-2024-09-06-at-12.56.48-PM-1.jpeg 1280w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/09/WhatsApp-Image-2024-09-06-at-12.56.48-PM-1-300x135.jpeg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/09/WhatsApp-Image-2024-09-06-at-12.56.48-PM-1-1024x461.jpeg 1024w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/09/WhatsApp-Image-2024-09-06-at-12.56.48-PM-1-768x346.jpeg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/09/WhatsApp-Image-2024-09-06-at-12.56.48-PM-1-990x446.jpeg 990w" sizes="auto, (max-width: 1280px) 100vw, 1280px" />इस अवसर पर सभी समाज जनों बड़ी भक्ति भाव से 20 वीं सदी के प्रथम आचार्य आचार्य श्री शांति सागर जी महाराज को अपनी विनयांजलि समर्पित की।इस अवसर पर प्रियांशी जैन, निधि झांझरी, अंशुमा जैन, प्रीति जटाले, संध्या जैन,अंजू पाटनी, संगीता बाकलीवाल,अप्सरा जटाले, हीरामणी भूच, मंदा भुंच, लविश पाटनी, हेमंत काका,अ चिंत्य जैन, सुरेश मुंशी, सुनील पांवणा, सुरेश मुंशी, कमल केके, अशोक पंचोलिया, अरविंद जैन, संयम जटाले,अजय पंचोलिया उपस्थित थे।</p>
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		<title>महान दिगंबर जैनाचार्य विपुल सागर महाराज का हुआ समाधि मरण: आज शाम साढ़े चार बजे होगा अंत्येष्टि कार्यक्रम  </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 01 Jun 2023 09:26:48 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[समाचार]]></category>
		<category><![CDATA[Acharya Shree Vipul Sagar Maharaj]]></category>
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					<description><![CDATA[चरित्र चक्रवर्ती आचार्य श्री शांतिसागर महाराज की पट्टपरंपरा के तृतीय पट्टाचार्य आचार्य श्री धर्मसागर महाराज से दीक्षित वयोवृद्ध श्रेष्ठ और महान आचार्य श्री विपुल सागर महाराज का अतिशय क्षेत्र अयोध्या में आज एक जून को दोपहर 11 बजकर पांच मिनट पर निर्यापकाचार्य श्री भद्रबाहु सागरजी महाराज के कुशल नेतृत्व में और गणिनी आर्यिका105 ज्ञानमती माताजी [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>चरित्र चक्रवर्ती आचार्य श्री शांतिसागर महाराज की पट्टपरंपरा के तृतीय पट्टाचार्य आचार्य श्री धर्मसागर महाराज से दीक्षित वयोवृद्ध श्रेष्ठ और महान आचार्य श्री विपुल सागर महाराज का अतिशय क्षेत्र अयोध्या में आज एक जून को दोपहर 11 बजकर पांच मिनट पर निर्यापकाचार्य श्री भद्रबाहु सागरजी महाराज के कुशल नेतृत्व में और गणिनी आर्यिका105 ज्ञानमती माताजी के सानिध्य में सल्लेखनापूर्वक समाधि मरण हुआ। <span style="color: #ff0000;">पढ़िए राजेश जैन दद्दू की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर। </strong>चरित्र चक्रवर्ती आचार्य श्री शांतिसागर महाराज की पट्टपरंपरा के तृतीय पट्टाचार्य आचार्य श्री धर्मसागर महाराज से दीक्षित वयोवृद्ध श्रेष्ठ और महान आचार्य श्री विपुल सागर महाराज का अतिशय क्षेत्र अयोध्या में आज एक जून को दोपहर 11 बजकर पांच मिनट पर निर्यापकाचार्य श्री भद्रबाहु सागरजी महाराज के कुशल नेतृत्व में और गणिनी आर्यिका105 ज्ञानमती माताजी के सानिध्य में सल्लेखनापूर्वक समाधि मरण हुआ। आचार्य श्री का 48 वां मुनि दीक्षा दिवस चल रहा था। आचार्य श्री विपुल सागर महाराज ने अपना आचार्य पद आचार्य श्री भद्रबाहु सागर को प्रदान कर दिया था। आचार्य श्री निर्भय सागर महाराज को आचार्य पद प्रदान कर दिया था।आचार्य श्री 89 साल के थे। आज शाम 4:30 बजे अंत्येष्टि का कार्यक्रम होगा।</p>
<p><strong>आचार्य श्री का जन्म परिचय </strong></p>
<p>उनका जन्म नाम श्री वीर चंद्र पाटनी था। टोंक(राजस्थान) के पलाई ग्राम में 16 अप्रैल 1934 को शुक्ल 13 संवत 1992 महावीर जयंती पर उनका जन्म हुआ। उनकी माता का नाम कस्तूरी बाई पाटनी और पिता का नाम बजरंग लाल पाटनी था। भाई मोहनलाल पाटनी मुनि महेन्द्र सागर हैं। बहिन का नाम लाड बाई पाटनी है। उन्होंने ब्रह्मचर्य व्रत अप्रेल 1960 में लिया। उनकी मुनि दीक्षा 1976 में मुजफ्फरनगर (उत्तरप्रदेश) में हुई। आचार्य पद एक मई 1996 को वैशाख शुक्ल त्रयोदशी को जावद (उदयपुर) में मिला।</p>
<p>चरित्र चक्रवर्ती आचार्य श्री शांतिसागर महाराज की परम्परा के तृतीय पट्टाचार्य आचार्य श्री धर्मसागर महाराज द्वारा दीक्षित आचार्य श्री विपुलसागर महाराज का समाधि मरण आज अयोध्या में मध्यान्ह 11 बजे सावधानी पूर्वक महामंत्र श्रवण करते हुए हो गया है।</p>
<p>&#8211; श्री दिगम्बर जैन अयोध्या तीर्थ क्षेत्र कमेटी, अयोध्या</p>
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