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	<title>आचार्य श्री विमर्शसागर जी &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>आत्म तत्त्व ही परिष्कृत होकर परमात्मा बनता है : आचार्य श्री विमर्शसागर जी के सानिध्य में श्री 1008 समवसरण महामण्डल विधान हुआ </title>
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		<pubDate>Sat, 04 Apr 2026 12:24:07 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[1008 समवसरण महामण्डल विधान में हजारों की संख्या में श्रद्धालु इन्द्र-इन्द्राणी बनकर श्री जिनेन्द्र भगवान की महा-आराधना कर रहे हैं। मेरठ से सोनल जैन की यह रिपोर्ट पढ़िए&#8230; मेरठ। मेरा महानगर के मध्य लगा भव्यातिभव्य आकर्षक श्री समवसरण है। सम्पूर्ण मेरठ एवं अनेकों नगर शहरों से बृहद संख्या में श्रद्धालु भक्त गण पहुंच रहे हैं। [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>1008 समवसरण महामण्डल विधान में हजारों की संख्या में श्रद्धालु इन्द्र-इन्द्राणी बनकर श्री जिनेन्द्र भगवान की महा-आराधना कर रहे हैं। <span style="color: #ff0000">मेरठ से सोनल जैन की यह रिपोर्ट पढ़िए&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मेरठ।</strong> मेरा महानगर के मध्य लगा भव्यातिभव्य आकर्षक श्री समवसरण है। सम्पूर्ण मेरठ एवं अनेकों नगर शहरों से बृहद संख्या में श्रद्धालु भक्त गण पहुंच रहे हैं। श्री 1008 समवसरण महामण्डल विधान में हजारों की संख्या में श्रद्धालु इन्द्र-इन्द्राणी बनकर श्री जिनेन्द्र भगवान की महा-आराधना कर रहे हैं। मेरठ धर्मनगरी का महासौभाग्य जागा है आचार्य श्री विमर्शसागर जी महामुनिराज के विशाल चतुर्विध संघ (35 पिच्छी) के सानिध्य के रूप में। आचार्य प्रवर ने श्री महावीर जयन्ती भवन में लगे भव्य समवसरण के बीच में उपस्थित धर्मसभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि इस धरा पर तीर्थकर परमात्मा ही एकमात्र ऐसे महापुरुष हैं। जिनकी धर्मसभा &#8220;समवसरण सभा &#8220;कहलाती है। तीर्थकर परमात्मा ही एकमात्र पुण्यात्मा होते हैं। जिनके पुण्य के आगे तीनों लोक के जीवों का भी पुष्य एकत्रित कर लिया जाए तब भी तीर्थकर प्रभु के समक्ष सब जीवों का पुष्य नगव्य है। सर्वोत्कृष्ट पुष्प महापुयुष की संगति-सानिध्य से हम भी पुष्य से भरने लगते हैं।</p>
<p>पूज्य आचार्यश्री ने जीवन जीने की समीचीन दृष्टि देते हुए कहा &#8211; आप बाजार जार से आम खरीद कर लाह और मान लीजिए उनमें एक आम सड़ा हुआ है, आप उस सड़े हुए आम का क्या करोगे? फेंक दोगे। आप उस सड़े आम को फेंक सकते हो लेकिन, कोई ज्ञानी पुरुष होगा वह सड़े आम को फेंक नहीं सकता क्योंकि, वह जनता है कि भले ही आम का गूदा सड़ा है लेकिन उस सड़े आम के अंदर भी वह शक्ति मौजूद है जिससे नया आम का वृक्ष पैदा किया जा सकता है। एक ठीक इसी प्रकार, बंधुओ। आप सब भी सड़े आम हो, &#8216;आपका क्या होगा ? आपके अन्दर भी मिथ्यात्व, असंयम, कषाय, प्रमाद आदि विकारों की सड़न लगी हुई है। तीर्थकर परमात्मा ने दो प्रकार की दृष्टि प्रदान की है हमें. द्रव्य दृष्टि और दूसरी पर्याय दृष्टि।</p>
<p>आपकी एकांत दृष्टि है इसलिए आपको आम हो या आपका जीवन दोनों में आपको सड़न ही दिखाई देती है। अपने हित के लिए आपको अपने जीवन से इस सड़न को दूर करना होगा और अपने मूल तत्त्व को जानकर अर्थात आत्मतत्त्व को जानकर, श्रद्वान कर और उसी का भाश्रय कर आत्मा को परमात्मा बनाना होगा।</p>
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		<title>35 पिच्छीधारी साधकों के सान्निध्य में मनाया गया भगवान महावीर का 2625वां जन्म कल्याणक महोत्सव : जैन संस्कृति की रक्षा में प्रत्येक भारतीय को आगे आना होगा &#8211; आचार्य श्री विमर्शसागर जी  </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shree Phal News]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 30 Mar 2026 14:27:37 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[वर्तमान शासन नायक, अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी का 2625वां जन्म कल्याणक महोत्सव देश-विदेश के साथ मेरठ महानगर में भी अत्यंत श्रद्धा, भक्ति और उल्लास के साथ मनाया गया। इस अवसर पर भगवान महावीर के आदर्शों को जीवन में अपनाने का आह्वान किया गया, ताकि प्रत्येक व्यक्ति विश्व शांति के लिए अपने स्तर पर योगदान [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>वर्तमान शासन नायक, अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी का 2625वां जन्म कल्याणक महोत्सव देश-विदेश के साथ मेरठ महानगर में भी अत्यंत श्रद्धा, भक्ति और उल्लास के साथ मनाया गया। इस अवसर पर भगवान महावीर के आदर्शों को जीवन में अपनाने का आह्वान किया गया, ताकि प्रत्येक व्यक्ति विश्व शांति के लिए अपने स्तर पर योगदान दे सके। <span style="color: #ff0000">पढ़िए सोनल जैन की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मेरठ।</strong> वर्तमान शासन नायक, अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी का 2625वां जन्म कल्याणक महोत्सव देश-विदेश के साथ मेरठ महानगर में भी अत्यंत श्रद्धा, भक्ति और उल्लास के साथ मनाया गया। इस अवसर पर भगवान महावीर के आदर्शों को जीवन में अपनाने का आह्वान किया गया, ताकि प्रत्येक व्यक्ति विश्व शांति के लिए अपने स्तर पर योगदान दे सके।</p>
<p>इस वर्ष मेरठ को विशेष रूप से विशाल आचार्य संघ के सान्निध्य का सौभाग्य प्राप्त हुआ। युग के महासंत, “जीवन है पानी की बूँद” महाकाव्य के रचनाकार भावलिंगी संत दिगंबराचार्य श्री 108 विमर्शसागर जी महामुनिराज ससंघ के साथ आचार्य प्रवर, 10 मुनिराज, 17 आर्यिका माताजी, 6 सुल्लिका माताजी, 1 क्षुल्लक जी एवं अनेक त्यागी-व्रती साधक-साधिकाओं का पावन सान्निध्य मेरठ को प्राप्त हुआ। यह अवसर मेरठ के इतिहास में स्वर्णिम और अभूतपूर्व माना जा रहा है।</p>
<p>मेरठ जैन समाज के अध्यक्ष सुरेश जैन ‘ऋतुराज’ ने कहा कि भगवान महावीर का जन्म कल्याणक तो अनेक बार मनाया गया, लेकिन 35 पीछीधारी साधक-साधिकाओं के चतुर्विध संघ का सान्निध्य पहली बार प्राप्त हुआ है। आचार्य श्री एवं संघ की सरलता और तपस्या को देखकर प्राचीन काल की साधुचर्या का अनुभव होता है।</p>
<p><strong>भव्य रथयात्रा से हुई जिनागम पंथ की प्रभावना</strong></p>
<p>धर्मनगरी मेरठ के तीरगरान दिगंबर जैन मंदिर से भगवान महावीर की भव्य रथयात्रा निकाली गई, जो नगर के प्रमुख मार्गों से होती हुई शारदा रोड स्थित महावीर जयंती भवन पहुंची। रथयात्रा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए और पूरे मार्ग में भक्ति का वातावरण बना रहा।</p>
<p>महावीर जयंती भवन में आयोजित विशाल धर्मसभा को संबोधित करते हुए दिगंबराचार्य श्री विमर्शसागर जी महामुनिराज ने कहा कि भगवान महावीर अंतिम तीर्थंकर हैं और उनसे पूर्व भी 23 तीर्थंकर इस धरा पर धर्म का प्रवर्तन कर चुके हैं। उन्होंने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि वर्तमान समय में जैन धर्म के प्राचीन इतिहास को दबाया जा रहा है और इसे केवल 2650 वर्ष पुराना बताकर सीमित किया जा रहा है, जो अनुचित है।</p>
<p>उन्होंने कहा कि सच्चा धर्म वही है जो सबको गले लगाए और सर्वहित एवं सर्वकल्याण की भावना सिखाए। जैन धर्म ने कभी किसी पर अपना अधिकार नहीं जताया, बल्कि हमेशा सहिष्णुता और अहिंसा का मार्ग दिखाया है। उन्होंने सभी भारतीय नागरिकों से आह्वान किया कि वे प्राचीन जैन संस्कृति की रक्षा के लिए आगे आएं और अपनी आवाज बुलंद करें। इस अवसर पर पूरे मेरठ महानगर में भक्ति, आस्था और उत्साह का अद्भुत संगम देखने को मिला।</p>
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		<title>धर्मसभा में दिए प्रवचन : शरीर की स्वच्छता से आत्मा पवित्र नहीं होती &#8211; आचार्य श्री विमर्शसागर जी  </title>
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		<pubDate>Sat, 28 Mar 2026 05:39:31 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[परम पूज्य संघ शिरोमणि भावलिंगी संत दिगम्बराचार्य श्री विमर्शसागर जी महामुनिराज अपने विशाल चतुर्विध संघ के साथ मेरठ महानगर के कमला नगर स्थित श्री 1008 दिगम्बर जैन मंदिर महावीर जिनालय में विराजमान हैं। उनके सान्निध्य में जैन समाज में धर्ममय वातावरण बना हुआ है और प्रत्येक घर में मंगलाचार हो रहे हैं। पढ़िए सोनल जैन [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>परम पूज्य संघ शिरोमणि भावलिंगी संत दिगम्बराचार्य श्री विमर्शसागर जी महामुनिराज अपने विशाल चतुर्विध संघ के साथ मेरठ महानगर के कमला नगर स्थित श्री 1008 दिगम्बर जैन मंदिर महावीर जिनालय में विराजमान हैं। उनके सान्निध्य में जैन समाज में धर्ममय वातावरण बना हुआ है और प्रत्येक घर में मंगलाचार हो रहे हैं। <span style="color: #ff0000">पढ़िए सोनल जैन की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मेरठ।</strong> परम पूज्य संघ शिरोमणि भावलिंगी संत दिगम्बराचार्य श्री विमर्शसागर जी महामुनिराज अपने विशाल चतुर्विध संघ के साथ मेरठ महानगर के कमला नगर स्थित श्री 1008 दिगम्बर जैन मंदिर महावीर जिनालय में विराजमान हैं। उनके सान्निध्य में जैन समाज में धर्ममय वातावरण बना हुआ है और प्रत्येक घर में मंगलाचार हो रहे हैं।</p>
<p><strong>धर्मसभा में दिए गहन आध्यात्मिक संदेश</strong></p>
<p>कमला नगर स्थित दिगम्बर जैन मंदिर में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए आचार्य श्री ने कहा कि मनुष्य को सर्वश्रेष्ठ जीवन प्राप्त हुआ है, इसलिए उसे स्वयं को श्रेष्ठ बनाने का प्रयास करना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि दूसरों के संस्कारों से नहीं, बल्कि अपने स्वयं के प्रयासों से ही जीवन को श्रेष्ठ बनाया जा सकता है।</p>
<p><strong>आत्मा की शुद्धि ही वास्तविक लक्ष्य</strong></p>
<p>आचार्य श्री ने कहा कि हम शरीर को स्वच्छ और स्वस्थ रखने में तो ध्यान देते हैं, लेकिन यह समझना आवश्यक है कि केवल शरीर की स्वच्छता से आत्मा पवित्र नहीं होती। आत्मा की शुद्धि के लिए उन महापुरुषों के सान्निध्य में रहना आवश्यक है, जिन्होंने अपने आत्मा को पवित्र बना लिया है। वर्तमान परिस्थिति पर प्रकाश डालते हुए आचार्य श्री ने कहा कि आज के समय में तन के रोगियों से अधिक मन के रोगी देखने को मिलते हैं। उन्होंने कहा कि मन का सबसे बड़ा रोग है—दूसरों के बारे में बुरा सोचना। उन्होंने समझाया कि यदि कोई व्यक्ति दूसरों के प्रति बुरा विचार करता है, तो उसका नुकसान पहले स्वयं का ही होता है। ऐसे विचार मनुष्य के आत्मिक पतन का कारण बनते हैं।</p>
<p><strong>वीतरागता की महिमा का वर्णन</strong></p>
<p>आचार्य श्री ने वीतरागता की महिमा बताते हुए कहा कि संसार के अधिकांश जीव राग और द्वेष में उलझे रहते हैं। व्यक्ति प्रशंसा से प्रसन्न और निंदा से दुखी हो जाता है, जबकि वीतरागी जिनेन्द्र देव इन भावनाओं से परे रहते हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे दर्पण पर पड़ने वाली सूर्य की किरणें बिना रुके वापस लौट जाती हैं, उसी प्रकार वीतरागी जिनेन्द्र देव भी किसी से कुछ ग्रहण नहीं करते। उनकी भक्ति और आराधना से स्वयं ही जीवन में उन्नति और सुख प्राप्त होता है। आचार्य श्री ने कहा कि जिनेन्द्र देव, अरिहंत देव ऐसे परम वीतरागी हैं, जिनकी आराधना स्वयं देवगति के देव भी करते हैं। वे देवों के भी देव, देवाधिदेव हैं।</p>
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		<title>सम्यक दर्शन से मिटत हैं अनंत दुःख : आचार्य श्री विमर्शसागर जी ने मेरठ में दी मंगल देशना  </title>
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		<pubDate>Mon, 16 Mar 2026 15:18:56 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[नगर में विराजमान आचार्य श्री विमर्शसागर जी महामुनिराज ने कहा कि मनुष्य के जीवन में सम्यक दर्शन का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। जब व्यक्ति को सम्यक दृष्टि प्राप्त हो जाती है, तब उसके जीवन में व्याप्त अनेक प्रकार के भ्रम, मोह और दुःख धीरे-धीरे समाप्त होने लगते हैं। मेरठ से पढ़िए, यह खबर&#8230; मेरठ। नगर [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>नगर में विराजमान आचार्य श्री विमर्शसागर जी महामुनिराज ने कहा कि मनुष्य के जीवन में सम्यक दर्शन का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। जब व्यक्ति को सम्यक दृष्टि प्राप्त हो जाती है, तब उसके जीवन में व्याप्त अनेक प्रकार के भ्रम, मोह और दुःख धीरे-धीरे समाप्त होने लगते हैं। <span style="color: #ff0000">मेरठ से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मेरठ।</strong> नगर में विराजमान आचार्य श्री विमर्शसागर जी महामुनिराज ने कहा कि मनुष्य के जीवन में सम्यक दर्शन का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। जब व्यक्ति को सम्यक दृष्टि प्राप्त हो जाती है, तब उसके जीवन में व्याप्त अनेक प्रकार के भ्रम, मोह और दुःख धीरे-धीरे समाप्त होने लगते हैं। सम्यक दर्शन व्यक्ति को सत्य का बोध कराता है और उसे सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। आचार्य श्री विमर्शसागर जी ने कहा कि संसार में जो भी सुख-दुःख मनुष्य को प्राप्त होते हैं, वे किसी दूसरे व्यक्ति के कारण नहीं, बल्कि उसके अपने कर्मों का फल होते हैं।</p>
<p><strong>सम्यक दर्शन प्राप्त होने पर अज्ञान का होता है नाश</strong></p>
<p>उदाहरण स्वरूप राम और सीता के प्रसंग का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि सीता के जीवन में जो कष्ट आए, वे किसी के द्वारा दिए गए नहीं थे, बल्कि उनके स्वयं के कर्मों का परिणाम थे। राम केवल निमित्त बने थे। इस प्रकार प्रत्येक जीव अपने कर्मों के अनुसार ही फल प्राप्त करता है। उन्होंने आगे कहा कि सम्यक दर्शन प्राप्त होने पर अज्ञान और मोह का नाश होने लगता है। अज्ञान के कारण ही जीव अनेक प्रकार के दुखों में उलझा रहता है, लेकिन जब सम्यक दृष्टि जागृत होती है, तब अनंत दुःखों के कारण बनने वाले भ्रम स्वतः समाप्त हो जाते हैं और जीवन में शांति का मार्ग प्रशस्त होता है।</p>
<p><strong>शास्त्र मनुष्य को सत्य और असत्य का विवेक देते हैं</strong></p>
<p>आचार्य श्री ने धार्मिक शास्त्रों के महत्व पर भी प्रकाश डालते हुए कहा कि सच्चा शास्त्र वही है जिसमें केवल अच्छी-अच्छी बातें ही नहीं होती, बल्कि जीवन की अच्छाई-बुराई दोनों का यथार्थ चित्रण भी होता है। ऐसे शास्त्र मनुष्य को सत्य और असत्य का विवेक प्रदान करते हैं तथा उसे संतुलित और सदाचारी जीवन जीने की प्रेरणा देते हैं। उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि वे सम्यक दर्शन के सिद्धांतों को अपने जीवन में अपनाएं और धर्म मार्ग पर चलकर आत्मिक उन्नति का प्रयास करें। उन्होंने कहा कि सम्यक दृष्टि का अनुसरण करने से व्यक्ति का जीवन मंगलमय बनता है और समाज में शांति, सद्भाव तथा नैतिक मूल्यों की स्थापना होती है।</p>
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		<title>जिनागमपंथी श्रावक संघ का 20वां सामूहिक जिनाभिषेक : श्री दिगंबर जैन पंचायती मंदिर में आचार्य श्री नयनसागरजी के सानिध्य में हुआ कार्यक्रम  </title>
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		<pubDate>Mon, 02 Feb 2026 11:48:11 +0000</pubDate>
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<p><strong>आचार्य श्री विमर्शसागर जी महाराज के मंगल निर्देशन में रविवार को जिनागमपंथी श्रावक संघ सहारनपुर का 20 वां साप्ताहिक सामूहिक जिनाभिषेक श्री दिगंबर जैन पंचायती मंदिर वीर नगर जैन बाग में आचार्य श्री नयनसागरजी महाराज के मंगल सान्निध्य में हुआ। <span style="color: #ff0000">सहारनपुर से पढ़िए, सोनल जैन की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>सहारनपुर।</strong> आचार्य श्री विमर्शसागर जी महाराज के मंगल निर्देशन में रविवार को जिनागमपंथी श्रावक संघ सहारनपुर का 20 वां साप्ताहिक सामूहिक जिनाभिषेक श्री दिगंबर जैन पंचायती मंदिर वीर नगर जैन बाग में आचार्य श्री नयनसागरजी महाराज के मंगल सान्निध्य में हुआ। प्रथम क्रम में रविवार को पधारे सभी श्रावक भाइयों का आभार एवं धन्यवाद व्यक्त किया गया। इन बंधुओं ने आचार्य श्री के सान्निध्य में अभिषेक एवं शांतिधारा कर धर्म लाभ प्राप्त किया। आचार्य श्री के मंगल सान्निध्य एवं आशीर्वाद स्वरूप सभी उपस्थित श्रावकों ने आनंदमय रूप से अभिषेक एवं शांतिधारा की। आचार्य श्री के सम्मुख गुरु वंदना प्रस्तुतकी। अग्रिम क्रम में सभी जिनागम पंथी श्रावक संघ सहारनपुर परिवार की ओर से अजय जैन, दीपक जैन, नीरज जैन, अतुल जैन, नितिन जैन, पंकज जैन, सुशील जैन एवं सभी मंदिर समिति का आभार व्यक्त किया गया। इन्होंने सभी व्यवस्था का ध्यान रखते हुए कार्यक्रम को सफलतापूर्वक पूर्ण कराने में योगदान दिया।</p>
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		<title>18वां साप्ताहिक सामूहिक श्री जी जिनाभिषेक किया : जिनागम पंथी श्रावक संघ सहारनपुर की ओर से श्रावकों ने लिया भाग  </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shree Phal News]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 19 Jan 2026 13:42:16 +0000</pubDate>
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<p><strong>नगर में शनिवार को सुबह आचार्य श्री विमर्शसागर जी महामुनिराज के मंगल आशीर्वाद से जिनागमपंथी श्रावक संघ सहारनपुर का 18वां साप्ताहिक सामूहिक जिनाभिषेक श्री दिगंबर जैन चंद्रप्रभु जिनालय, छत्ता बारूमल में संपन्न हुआ। <span style="color: #ff0000">सहारनपुर से पढ़िए, सोनल जैन की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>सहारनपुर।</strong> नगर में शनिवार को सुबह आचार्य श्री विमर्शसागर जी महामुनिराज के मंगल आशीर्वाद से जिनागमपंथी श्रावक संघ सहारनपुर का 18वां साप्ताहिक सामूहिक जिनाभिषेक श्री दिगंबर जैन चंद्रप्रभु जिनालय, छत्ता बारूमल में संपन्न हुआ। इसमें सभी जिनागमपंथी श्रावक संघ सहारनपुर परिवार की ओर से उपस्थित आदीश जैन, संजय जैन बिट्टू (अध्यक्ष मंदिर समिति), अमित जैन (बिन्नी भैया) आदित्य जैन, विनय जैन, वैभव जैन (पूर्व प्रबंधक) एवं समस्त मंदिर समिति का हृदयपूर्वक विशेष आभार माना गया। सभी ने समस्त व्यवस्था का ध्यान रखते हुए आयोजन को सफलतापूर्वक पूर्ण कराने में योगदान दिया। विशेष आभार बिन्नी भैया का, जिन्होंने समस्त व्यवस्था का ध्यान रखते हुए अभिषेक को सानंद कराया।</p>
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		<title>संसार में जीवात्मा तब तक ही रहता है जब तक जीव के अंदर संसार : बड़ौत में 35 पिच्छीधारी संयमियों की शीतकालीन मंगल कलश स्थापना  </title>
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		<pubDate>Thu, 18 Dec 2025 13:43:41 +0000</pubDate>
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<p><strong>‘जीवन है पानी की बूंद’ महाकाव्य के मूल रचनाकार आचार्य श्री विमर्शसागर जी महामुनिराज, जिनके पादमूल में 35 पिच्छीधारी संयमी साधक संयम की साधना, रत्नत्रय की आराधना में संलग्न रहते हैं। ऐसे विशाल चतु‌र्विधसंघ के अधिनायक श्रेष्ठ दिगंबराचार्य का ससंघ शीतकालीन प्रवास धर्मनगरी बड़ौत में हो रहा है। <span style="color: #ff0000">बड़ौत से पढ़िए, सोनल जैन की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong> बड़ौत।</strong> जीवन है पानी की बूंद ष् महाकाव्य के मूल रचनाकार आचार्य श्री विमर्शसागर जी महामुनिराज, जिनके पादमूल में 35 पिच्छीधारी संयमी साधक संयम की साधना, रत्नत्रय की आराधना में संलग्न रहते हैं। ऐसे विशाल चतु‌र्विधसंघ के अधिनायक श्रेष्ठ दिगंबराचार्य का ससंघ शीतकालीन प्रवास धर्मनगरी बड़ौत में हो रहा है। दिसंबर माह की प्रचंड शीत-ठंड के साथ आचार्य के श्रीमुख से होगी शीतकालीन वाचना। प्रातः काल की धर्मसभा में श्री रयणसार महाग्रंथ पर आचार्य गुरुवर धर्माेपदेश प्रदान करेंगे। वहीं दोपहर काल में श्री षट्‌खंडागम जी महाग्रंथ की धवला पुस्तक-1पर आचार्य संघ के सानिध्य में वाचना होगी। जिसके वाचना प्रमुख डॉ. श्रेयांस कुमार जैन बड़ौत रहेंगे। 18 दिसंबर की प्रातः बेला की धर्मसभा में आचार्य श्री के चतुर्विध संघ सानिध्य में शीतकालीन वाचना का मंगल कलश स्थापित किया गया। वाचना के कलश स्थापना का सौभाग्य श्रावक श्रेष्ठी जिनागम पंथी ब्रिजेन्द्र जैन, तरुण जैन (भगवती स्टील) परिवार ने लिया। शीतकालीन वाचना कलश स्थापना में उपस्थित श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए आचार्य श्री ने कहा कि संसार में जीवात्मा तब तक ही रहता है। जब तक जीव के अंदर संसार रहता है।</p>
<p>बाहर का संसार चतुर्गति रूप है तो आपके अंदर रहने वाला संसार आपके ही राग-देष-मोह रूप विभाव परिणाम हैं। यह जीव अपने ही अंदर के रागादि विभावों से प्रेरित होकर अपने संसार को बढ़ाता रहता है। परम हितकारी निर्ग्रंथ मुनिराज भव्य जीवों को राग-द्वेष-मोह आदि विभावों से बचने का उपाय बतलाते हैं। आत्म हित चाहने वाले भव्य जीवात्मा रागादि विभावों से स्वयं की रक्षा करते हुए पर पदार्थ एवं पर भावों से रुचि हटाकर आत्म स्वभाव में ही रुचि बढ़ाते हुए निज आत्म तत्त्व में लीन होता है।</p>
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		<title>तन की शुद्धि जल से, चेतन की शुद्धि भावों से होती है: आचार्य श्री विमर्शसागर जी ने जैन मिलन विहार में किया धर्मसभा को संबोधित  </title>
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		<pubDate>Tue, 02 Dec 2025 09:38:36 +0000</pubDate>
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<p><strong>मुज़फ़्फ़रनगर की पावन धर्मधरा पर 35 पिच्छीधारी संयमियों के साथ आचार्य श्री विमर्शसागर जी अपूर्व धर्म की प्रभावना कर रहे हैं। जैन मिलन विहार में उपस्थित विशाल धर्मसभा में आचार्यश्री ने कहा कि जिनेंद्र देव कहते हैं कि एक गृहस्थ श्रावक को प्रतिदिन स्नान करना चाहिए। <span style="color: #ff0000">मुजफ्फरनगर से पढ़िए, सोनल जैन की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुज़फ़्फ़रनगर (उप्र)।</strong> जीवन है पानी की बूंद महाकाव्य के मूल रचनाकार आचार्य श्री विमर्शसागर जी दिगंबर जैन परंपरा में सर्वश्रेष्ठ साधक एवं विशाल चतुर्विध संघ के अधिनायक संघ शिरोमणि अद्वितीय संत हैं। मुज़फ़्फ़रनगर की पावन धर्मधरा पर 35 पिच्छीधारी संयमियों के साथ आचार्य श्री विमर्शसागर जी अपूर्व धर्म की प्रभावना कर रहे हैं। जैन मिलन विहार में उपस्थित विशाल धर्मसभा में आचार्यश्री ने कहा कि जिनेंद्र देव कहते हैं कि एक गृहस्थ श्रावक को प्रतिदिन स्नान करना चाहिए। बंधुओ! आप जन्म से लेकर आज तक तन अर्थात् शरीर को स्नान कराते आए हैं। ध्यान रखो, जल से शरीर की शुद्धि हो सकती है किंतु यदि आपको अपने चेतन को शुद्ध करना है तो वह बाहरी जल से शुद्ध नहीं होगा, चेतन शुद्धि के लिए आपको शुभ-शुद्ध भावजल की आवश्यकता है। भाव शुद्धि के बिना तीन काल में भी आपके चेतन-आत्मा की शुद्धि नहीं हो सकती। बंधुओ शरीर तन को स्नान कराते हुए तो अनादि काल बिता दिया। अब एक बार अपने भावों को संभालकर भावशुद्धि द्वारा अपने चेतन आत्मा को स्नान करा लो, आपकी आत्मा भी परमात्मा हो जाएगी।</p>
<p><strong>जल को छानकर ही उपयोग करना चाहिए</strong></p>
<p>जल की महत्ता बताते हुए आचार्य श्री ने कहा जिनेंद्र भगवान ने पानी की एक बूंद में असंख्यात जीव बतलाए हैं, वर्तमान में वैज्ञानिक भी एक बूंद पानी में 36,450 जीव बताते हैं। बंधुओं! आप प्रतिदिन स्नान करते हैं, छने हुए जल से या बिना छने जल से। विचार करना, आपने अनछने जल से स्नान कर लिया। आपने अपने शरीर की शुद्धि की है या शरीर को अशुद्ध कर लिया। आपकी जेब में रूमाल हो या न हो लेकिन, पानी छानने का छन्ना अवश्य होना चाहिए। पानी छानने का छन्ना आपके अहिंसक होने का प्रतीक है। अहिंसा धर्म का पालक अवश्य ही पानी छानकर ही प्रयोग करेगा। आपके पास छन्ना है तो समझ लेना आपके पर चारों अनुयोगों के शास्त्र है, क्योंकि आपके पास अहिंसा धर्म का आचरण है।</p>
<p><strong>इस तरह रहेगा विहार का मार्ग</strong></p>
<p>3 दिसंबर की मध्याह्न बेला में आचार्य श्री विमर्श सागर जी ससंघ जैन मिलन विहार कॉलोनी से पद विहार करते हुए नंदगांव में पदार्पण करेंगे। 4 दिसंबर की प्रातः बेला में आचार्य संघ की आहार चर्या नंदगांव में ही होगी। 4 दिसंबर को मध्याह्न बेला में आचार्य श्री विमर्शसागर जी अतिशय क्षेत्र वहलना में पदार्पण करेंगे, जहां उन्हीं के सानिध्य में आचार्य विमर्श सागर प्रवचन सभागार का लोकार्पण किया जाएगा। शाम को आचार्य संघ पद‌विहार करते हुए ग्राम तावली पहुं‌चेंगे।</p>
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		<title>चेहरे नहीं चरित्र बदलने से बन जाता है आत्मा-परमात्मा: मुजफ्फरनगर की नई मंडी अद्‌भुत तीर्थ क्षेत्र बना  </title>
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		<pubDate>Thu, 27 Nov 2025 14:47:44 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[यान रखो भगवान जैसा रूप एवं स्वरूप पाने के लिए हमें भगवान की जरूरत है, आवश्यकता है। स्वयं के आत्मा को परमात्मा बनाने के लिए हम धर्म अनुयान करते हैं। ऐसा मांगलिक उद्‌बोधन आचार्यश्री विमर्शसागर जी महाराज ने दिया। मुजफ्फरनगर से पढ़िए, सोनल जैन की यह खबर&#8230;  मुजफ्फरनगर। जीवन में भगवान की जरूरत, आवश्यकता और [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>यान रखो भगवान जैसा रूप एवं स्वरूप पाने के लिए हमें भगवान की जरूरत है, आवश्यकता है। स्वयं के आत्मा को परमात्मा बनाने के लिए हम धर्म अनुयान करते हैं। ऐसा मांगलिक उद्‌बोधन आचार्यश्री विमर्शसागर जी महाराज ने दिया। <span style="color: #ff0000">मुजफ्फरनगर से पढ़िए, सोनल जैन की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong> मुजफ्फरनगर।</strong> जीवन में भगवान की जरूरत, आवश्यकता और महता क्या है? हम जानते हैं हमारे जीवन में सांसारिक प्रदायों की महत्ता क्या है। हम जानते हैं कि हमारे जीवन में धन की भोजन की, पिता, माता, भाई आदि रिश्तों की महत्ता क्या है। हमें जीवन में धन की महत्ता आती है। इसीलिए आप धन कमाने के लिए जो कुछ बन पड़ता है, वह आप सब कुछ करते हैं। आप अपने जीवन में जो कुछ भी कर रहे हो वह सब किसी न किसी प्रयोजन से ही कर रहे हो। जरा विचार करना आप सब धर्म कार्य करते हो, पूजा पाठ विधान करने हो, क्या आपको ज्ञात है कि हम सब यह धर्म कार्य क्यों करते हैं? यदि आपको धर्म कार्य का प्रयोजन स्थल में नहीं है तो आपको अपने परिश्रम का संपूर्ण फल प्राप्त नहीं होगा। ध्यान रखो भगवान जैसा रूप एवं स्वरूप पाने के लिए हमें भगवान की जरूरत है, आवश्यकता है। स्वयं के आत्मा को परमात्मा बनाने के लिए हम धर्म अनुयान करते हैं। ऐसा मांगलिक उद्‌बोधन मुजफ्फरनगर के कल्पतीर्थ मंडपम् में 35 पिच्छीधारी संयमियों के साथ अपना सानिध्य प्रदान कर रहे आचार्य श्री विमर्शसागर जी ने दिया। आचार्य जी ने अपने सुप्रसिद्ध महाकाव्य ‘जीवन है पानी की बूंद में नवीन</p>
<p><strong>पंक्तियां जोड़ते हुए कहा कि मंदिर में भगवान मिलें, अंदर में भगवान मिलें।</strong></p>
<p>भगवत्ता की सत्ता से सहज ज्ञान की कली खिले। आतम ज्ञानी ही, हो-हो-2, ज्ञानी कहलाये रे। जीवन है पानी की बूंदे, कब मिट जाये रे।</p>
<p><strong>आद‌मी जीवन भर अपने चेहरे बदलता है</strong></p>
<p>आचार्य श्री ने वर्तमान मानव जीवन को सद्‌बोध देते हुए कहा कि आज व्यक्ति जिस परिवार में रहकर अपनों से राग करता है उसी परिवार में यदि किसी सदमा से अपने स्वार्थ की पूर्ति नहीं होती दिखती है तो केले के छिलके की तरह उसे अपने रास्ते से अलग कर देता है। आचार्य श्री ने कहा ‘आद‌मी जीवन भर अपने चेहरे बदलता रहता है, काश। आदमी एक बार अपना चरित्र बदल दे तो वह जीवन प्राप्त होगा जो शाश्वत और अविनाशी होगा। मुजफ्फरनगर के इतिहास में 24 समवशरणों की भव्य आकर्षक रचना पहली बार हुई है। इतिहास में प्रथम बार मुजफ्फरनगर में 35 पिच्छीधारी संयमियों के साथ आचार्य श्री विमर्शसागर जी के चतुर्विध संघ का पदार्पण हुआ है। मुजफ्फरनगर की नई मंडी अद्‌भुत तीर्थ क्षेत्र अभी बना हुआ है।</p>
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		<title>तीर्थ चक्रवर्ती बनकर तीर्थों के संरक्षण में लगाएं पुण्य : आचार्य श्री विमर्शसागर जी के सान्निध्य में चल रही है कल्पद्रुम महामंडल विधान की आराधना </title>
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		<pubDate>Mon, 24 Nov 2025 14:14:10 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[नगर में 24 समवशरणों की अनुपम रचना की गई है। कल्पतीर्थ मण्डपम् में श्री 1008 कल्पद्रुम महामण्डल विधान की आराधना चल रही है।आचार्य श्री विमर्श सागर जी के विशाल चतुर्विध संघ (35 पिच्छी) का मंगलमय सान्निध्य प्राप्त हो रहा है। मुजफ्फरनगर से पढ़िए, सोनल जैन की यह खबर&#8230;  मुजफ्फरनगर। नगर में 24 समवशरणों की अनुपम [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>नगर में 24 समवशरणों की अनुपम रचना की गई है। कल्पतीर्थ मण्डपम् में श्री 1008 कल्पद्रुम महामण्डल विधान की आराधना चल रही है।आचार्य श्री विमर्श सागर जी के विशाल चतुर्विध संघ (35 पिच्छी) का मंगलमय सान्निध्य प्राप्त हो रहा है। <span style="color: #ff0000">मुजफ्फरनगर से पढ़िए, सोनल जैन की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong> मुजफ्फरनगर।</strong> नगर में 24 समवशरणों की अनुपम रचना की गई है। कल्पतीर्थ मण्डपम् में श्री 1008 कल्पद्रुम महामण्डल विधान की आराधना चल रही है।</p>
<p>आचार्य श्री विमर्श सागर जी के विशाल चतुर्विध संघ (35 पिच्छी) का मंगलमय सान्निध्य प्राप्त हो रहा है। मुजफ्फरनगर के पुण्यात्मा श्रदालुओं को। सोमवार को आराधना के द्वितीय दिवस में विशाल कल्पतीर्थ मण्डपम् में रचित 24 समवशरणों के मध्य उपस्थित धर्मसभा को संबोधित करते हुए आचार्य श्री विमर्शसागर जी ने कहा कि पूर्वकाल में यह दृश्यमान सम्पूर्ण पृथ्वी ही&#8221; अजनाभ खण्ड&#8221; भारत देश आज के नाम से जानी जाती थी। इसी अजनाभ खण्ड का नाम प्रथम तीर्थकर ऋषभदेव के पुत्र &#8220;चक्रवर्ती भरत&#8221; के नाम पर भारत देश रखा गया है। आचार्य श्री ने &#8220;कल्पद्रुम विधान का प्रारंभ कब से हुआ यह बताते हुए कहा कि प्रथम तीर्थेश आदिनाथ भगवान के समवशरण में प्रथम चक्रवर्ती भरत महाराज ने 14 दिनों तक समवशरण की एवं उसमें विराजित जिनेन्द्र तीर्थकर की आराधना की थी। बंधुओं, आज मुजफ्फरनगर के धर्मात्मा श्रावकों ने स्वयं चक्रवर्ती बनकर के यह कल्पद्रुम महामण्डल विधान&#8221; की आराधना रचायी है।</p>
<p><strong>तीर्थ हमारी रक्षा करते हैं</strong></p>
<p>सान्ध्य महालक्ष्मी के डायरेक्टर शरद जैन दिल्ली ने धर्मसभा के मध्य जैन धर्म के चल-अचल तीर्थों की रक्षा का आह्वान किया। आचार्य श्री ने तीर्थरक्षा हेतु समाज को जागरूक करते हुए कहा बंधुओं ! तीर्थ वह होता है जहाँ से जीव अपना उद्वार करते हैं। तीर्थ हमारी रक्षा करते हैं, हम और आप तो मात्र अपने कर्त्तव्य का निर्वाह मात्र कर सकते हैं। आप लोग तीर्थयात्रा के लिए जाते हैं, अपने घर-दुकान की प्रतिदिन सफाई करते हो, तीर्थयात्रा पर आयें तो यथायोग्य वहाँ की शुद्धि का ध्यान अवश्य रखें। ऐसे कितने श्रावक-श्राविकाये हैं जिनको तीर्थों से जीवन के नए आयाम प्राप्त हुये हैं, महावीर जी तीर्थ क्षेत्र अनेकों माताओं की सूनी गोद भरी हैं।</p>
<p><strong>तीर्थरक्षा के लिए मंगल आशीर्वाद</strong></p>
<p>आचार्य श्री ने कहा कि आप अपने परिवार के बच्चों को भी एक गुल्लक दीजिए, भले ही वे एक रुपया मात्र उसमें डालें, इससे उनमें तीर्थ रक्षा का भाव एवं संस्कार जागृत होता है। आज मैं तीर्थरक्षा के लिए मंगल आशीर्वाद प्रदान करता हूँ &#8220;आप अपना कर्तव्य पालन करते हुए &#8221; तीर्थ चक्रवर्ती&#8221; बनकर अपने पुण्य का सदुपयोग तीर्थों के संरक्षण में अवश्य करें।</p>
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