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	<title>आचार्य श्री विनिश्चय सागर &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
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	<title>आचार्य श्री विनिश्चय सागर &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>सुखी जीवन के लिए आत्मचिंतन आवश्यक : आचार्य श्री विनिश्चय सागर के सानिध्य में हुआ एक दिवसीय सिद्धचक्र विधान </title>
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		<pubDate>Sun, 31 May 2026 12:22:04 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[कई लोग मानते हैं कि विशेष स्थानों पर जाने, तीर्थ यात्रा करने या भौतिक साधनों को प्राप्त करने से जीवन में शांति मिल जाएगी। यह विचार आचार्यश्री विनिश्चय सागरजी महाराज ने दिगम्बर जैन धर्मशाला शामली में धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230; मुरैना/शामली। आज के [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>कई लोग मानते हैं कि विशेष स्थानों पर जाने, तीर्थ यात्रा करने या भौतिक साधनों को प्राप्त करने से जीवन में शांति मिल जाएगी। यह विचार आचार्यश्री विनिश्चय सागरजी महाराज ने दिगम्बर जैन धर्मशाला शामली में धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। <span style="color: #ff0000">मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना/शामली।</strong> आज के समय में अधिकांश लोग सुख, शांति और सुकून की खोज में लगे हुए हैं। कई लोग मानते हैं कि विशेष स्थानों पर जाने, तीर्थ यात्रा करने या भौतिक साधनों को प्राप्त करने से जीवन में शांति मिल जाएगी। यह विचार आचार्यश्री विनिश्चय सागरजी महाराज ने दिगम्बर जैन धर्मशाला शामली में धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए । उन्होंने कहा कि निस्संदेह धार्मिक गतिविधियाँ और भक्ति मन को प्रसन्नता प्रदान करती हैं लेकिन, वास्तविक और स्थायी सुकून आत्मचिंतन, आत्मज्ञान और सही समझ से प्राप्त होता है। जब मनुष्य स्वयं को पहचानने का प्रयास करता है और अपने भीतर झाँकता है, तभी उसे जीवन का वास्तविक आनंद प्राप्त होता है। परिवार भी मनुष्य के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण आधार है। परिवार की खुशहाली केवल धन-संपत्ति से नहीं, बल्कि प्रेम, विश्वास, सम्मान और सहयोग से बनी रहती है। यदि धन बढ़ता जाए लेकिन आपसी प्रेम और संस्कार कम हो जाएँ, तो परिवार बिखरने लगता है। इसलिए जीवन में केवल पाने की इच्छा नहीं, बल्कि त्याग, समझदारी और अच्छे संस्कारों को भी स्थान देना आवश्यक है।</p>
<p><strong>अक्सर लोग दूसरों की कमियाँ देखते हैं</strong></p>
<p>मनुष्य को समय-समय पर अपने व्यवहार और संबंधों का मूल्यांकन करना चाहिए। उसकी वाणी कैसी है, उसका स्वभाव कैसा है और वह अपने परिवार तथा समाज के लोगों के साथ किस प्रकार का व्यवहार करता है, यह उसके जीवन की दिशा तय करता है। मधुर वाणी और विनम्र व्यवहार लोगों के हृदय जीत लेते हैं, जबकि कटु शब्द संबंधों में दूरियाँ पैदा कर देते हैं। परिवार में प्रेम और सम्मान बनाए रखने का एक सरल उपाय है—एक-दूसरे की अच्छाइयों की प्रशंसा करना। अक्सर लोग दूसरों की कमियाँ देखने में अधिक समय लगाते हैं, जबकि उनके गुणों को स्वीकार नहीं करते। यदि परिवार के सदस्य एक-दूसरे के प्रयासों, सेवाओं और अच्छे कार्यों की सराहना करें, तो रिश्तों में और अधिक मजबूती आती है। एक छोटा-सा धन्यवाद, एक मधुर शब्द और सच्ची प्रशंसा परिवार में नई ऊर्जा का संचार कर सकती है।</p>
<p><strong>सच्चे सुख, शांति और सफल जीवन का मार्ग</strong></p>
<p>जैसे भोजन में उचित मात्रा में नमक उसका स्वाद बढ़ाता है, उसी प्रकार प्रेम, सहनशीलता और विनम्रता परिवार के जीवन को मधुर बनाते हैं। जब घर के सदस्य एक-दूसरे के प्रति स्नेह, सम्मान और सहयोग का भाव रखते हैं, तब वही घर स्वर्ग के समान बन जाता है।आज आवश्यकता इस बात की है कि प्रत्येक व्यक्ति आत्मचिंतन करे, अपने व्यवहार को सुधारे, प्रेम और भाईचारे को बढ़ाए तथा परिवार और समाज में सकारात्मक वातावरण का निर्माण करे। यही सच्चे सुख, शांति और सफल जीवन का मार्ग है। गुरुदेव के पावन सान्निध्य में सकल जैन समाज के सहयोग से आज एक दिवसीय सिद्धचक्र विधान का आयोजन किया गया । विधान के दौरान उपस्थित सभी लोगों ने भक्ति भाव से सिद्ध परमेष्ठियों को आराधना करते हुए अर्घ्य समर्पित किए । जिसमें श्रावक श्रेष्ठियों, माता बहनों ने बढ़चढ़कर हिस्सा लिया। उपस्थित साधर्मी बंधुओं ने भक्तिपूर्ण नृत्य करते हुए अपनी भक्ति का परिचय दिया।</p>
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		<title>शिक्षा केवल ज्ञान प्राप्त करने का नहीं बल्कि चरित्र संस्कार का माध्यम : आचार्य श्री विनिश्चय सागर जी का हुआ केशलोचन  </title>
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		<pubDate>Fri, 29 May 2026 09:36:24 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[दिगंबर जैन धर्मशाला में प्रवचन करते हुए शुक्रवार को आचार्य श्री विनिश्चय सागर जी महा मुनिराज ने कहा कि शिक्षा, संस्कार और आत्म संयम से ही जीवन का वास्तविक विकास है। महाराज श्री ने कहा कि आज के आधुनिक युग में शिक्षा को जीवन की सफलता का प्रमुख आधार माना जाता है। शामली से पढ़िए, [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>दिगंबर जैन धर्मशाला में प्रवचन करते हुए शुक्रवार को आचार्य श्री विनिश्चय सागर जी महा मुनिराज ने कहा कि शिक्षा, संस्कार और आत्म संयम से ही जीवन का वास्तविक विकास है। महाराज श्री ने कहा कि आज के आधुनिक युग में शिक्षा को जीवन की सफलता का प्रमुख आधार माना जाता है। <span style="color: #ff0000">शामली से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>शामली।</strong> दिगंबर जैन धर्मशाला में प्रवचन करते हुए शुक्रवार को आचार्य श्री विनिश्चय सागर जी महा मुनिराज ने कहा कि शिक्षा, संस्कार और आत्म संयम से ही जीवन का वास्तविक विकास है। महाराज श्री ने कहा कि आज के आधुनिक युग में शिक्षा को जीवन की सफलता का प्रमुख आधार माना जाता है। प्रत्येक माता-पिता की इच्छा होती है कि उनके बच्चे शिक्षित होकर उज्ज्वल भविष्य का निर्माण करें। शिक्षा केवल ज्ञान प्राप्त करने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति के चरित्र, संस्कार और व्यक्तित्व का भी निर्माण करती है। इसलिए बेटा और बेटी दोनों को समान अवसर देकर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करना समय की आवश्यकता है। प्राचीन काल में शिक्षा प्राप्त करना सरल नहीं था। विद्यार्थियों को घर-परिवार से दूर रहकर अध्ययन करना पड़ता था। उस समय शिक्षा के साथ अनुशासन, नैतिकता और जीवन मूल्यों पर विशेष बल दिया जाता था। यही कारण था कि शिक्षा व्यक्ति को केवल विद्वान ही नहीं, बल्कि संस्कारित और जिम्मेदार नागरिक भी बनाती थी। मनुष्य का जीवन उसकी संगति, विचारों और व्यवहार से प्रभावित होता है। अच्छी संगति व्यक्ति को उन्नति के मार्ग पर ले जाती है जबकि, गलत संगति उसे पतन की ओर धकेल सकती है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को विवेकपूर्ण जीवन जीते हुए अच्छे विचारों और श्रेष्ठ व्यक्तियों का साथ ग्रहण करना चाहिए। महाराज श्री ने कहा प्रेम, विश्वास और आपसी समझ से ही परिवार तथा समाज में सद्भाव बना रहता है। भारतीय संस्कृति का मूल आधार शुद्ध विचार, संयम और सदाचार है। संस्कृति केवल बाहरी परंपराओं का पालन करने का नाम नहीं, बल्कि जीवन में नैतिक मूल्यों को अपनाने का नाम है। जब मनुष्य अपने विचारों को पवित्र बनाता है, तब उसका जीवन भी श्रेष्ठ बनता है। संसार की भौतिक वस्तुएं क्षणिक हैं जबकि, आत्मिक उन्नति और चरित्र की संपदा स्थायी होती है।</p>
<p><strong>जीवन में सफलता और शांति का आधार मन पर नियंत्रण </strong></p>
<p>महाराज श्री ने जीवन की सफलता के विषय में बताया और कहा कि</p>
<p>जीवन में सफलता और शांति का सबसे महत्वपूर्ण आधार मन पर नियंत्रण है। मनुष्य के सुख-दुःख का कारण बाहरी परिस्थितियां नहीं, बल्कि उसका मन है। यदि मन संयमित और सकारात्मक हो तो कठिन परिस्थितियों में भी व्यक्ति संतुलित रह सकता है। धार्मिक स्थल, सत्संग और गुरुजनों का सान्निध्य मन को सही दिशा देने का कार्य करते हैं। आज आवश्यकता इस बात की है कि शिक्षा के साथ संस्कार, आत्मचिंतन, संयम और नैतिक मूल्यों को भी महत्व दिया जाए। जब शिक्षा, संस्कृति और आत्मसंयम का समन्वय होगा, तभी व्यक्ति, समाज और राष्ट्र का वास्तविक विकास संभव हो सकेगा।</p>
<p><strong>महाराज श्री ने किया केशलोच </strong></p>
<p>शुक्रवार प्रातः कालीन बेला में आचार्य श्री विनिश्चय सागर जी ने कर्मांे की निर्जरा के लिए अपना स्वयं केशलोच किया। गुरुवार शाम शामली के भक्तों को सरूरपुर में होने वाले पंच कल्याणक में भगवान के माता-पिता बने पात्रों की गोद भराई करने का अवसर प्राप्त हुआ।</p>
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		<title>आत्म साधना में गुरुओं का उपदेश, ध्यान, साधना आवश्यक : आचार्य श्री विनिश्चय सागर जी ने धर्मसभा में जीवन के सत्य और वास्तविक उद्देश्य से परिचित करवाया  </title>
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		<pubDate>Wed, 27 May 2026 13:20:48 +0000</pubDate>
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<p><strong>दिगंबर जैन धर्मशाला, शामली उप्र में गणाचार्य श्री विराग सागर जी के शिष्य आचार्य श्री विनिश्चय सागर जी ने कहा कि मनुष्य का वास्तविक स्वरूप उसकी आत्मा का शुद्ध स्वरूप माना गया है। यही आत्म स्वरूप व्यक्ति को जीवन के सत्य और वास्तविक उद्देश्य से जोड़ता है। <span style="color: #ff0000">मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना।</strong> दिगंबर जैन धर्मशाला, शामली उप्र में गणाचार्य श्री विराग सागर जी के शिष्य आचार्य श्री विनिश्चय सागर जी ने कहा कि मनुष्य का वास्तविक स्वरूप उसकी आत्मा का शुद्ध स्वरूप माना गया है। यही आत्म स्वरूप व्यक्ति को जीवन के सत्य और वास्तविक उद्देश्य से जोड़ता है। इसकी प्राप्ति सहज नहीं होती, इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने आत्मिक कल्याण और उन्नति के लिए निरंतर प्रयास करना चाहिए। गुरुजनों के उपदेश, साधना और ध्यान इस मार्ग में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। कोई भी व्यक्ति जन्म से पूर्ण ज्ञान लेकर नहीं आता, बल्कि निरंतर अभ्यास और प्रयास के माध्यम से अपने लक्ष्य को प्राप्त करता है। मनुष्य सदैव सुख चाहता है और दुःख से दूर रहना चाहता है। प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिए अनेक योजनाएं बनाता है तथा सुख-सुविधाओं को प्राप्त करने का प्रयास करता है लेकिन, कई बार मनुष्य यह चाहता है कि वह पाप कर्मों से जुड़ा रहे और उसे पुण्य का फल प्राप्त होता रहे, जबकि प्रकृति का नियम स्पष्ट है कि मनुष्य को उसके कर्मों के अनुसार ही फल मिलता है। श्रद्धा, विश्वास और भक्ति के साथ किए गए कार्य व्यक्ति के जीवन को सही दिशा प्रदान करते हैं।</p>
<p><strong>शुभ कर्म सुख और शांति देते हैं</strong></p>
<p>ध्यान का जीवन में विशेष महत्व है। व्यक्ति को अपने प्रत्येक कर्म के प्रति जागरूक रहना चाहिए, क्योंकि जो भी कर्म किए जाते हैं। उनका परिणाम अवश्य प्राप्त होता है। यदि हम हिंसा, झूठ, चोरी या अन्य अनुचित कार्य करते हैं तो उनके परिणाम भी हमें ही भोगने पड़ते हैं। शुभ कर्म सुख और शांति देते हैं, जबकि अशुभ कर्म दुःख और कष्ट का कारण बनते हैं। इसलिए व्यक्ति को अपने जीवन में अशुभ कर्मों को कम करने और शुभ कर्मों को बढ़ाने का प्रयास करना चाहिए। जीवन में किसी भी कार्य को करने से पहले सोच-विचार आवश्यक है। बिना विचार के किए गए कार्य कई बार समस्याओं और दुःख का कारण बन जाते हैं। अच्छे विचार, श्रेष्ठ आचरण और सत्कर्म ही जीवन को महान बनाते हैं। आज के समय में यह भी आवश्यक है कि व्यक्ति स्वयं विचार करे कि वह किस दिशा में आगे बढ़ रहा है। आधुनिक जीवन में लोग अपने मूल्यों और आत्मिक चेतना से दूर होकर मोबाइल तथा भौतिक आकर्षणों में अधिक उलझते जा रहे हैं। इसलिए जीवन में संतुलन, संयम और आत्मचिंतन को अपनाकर ही वास्तविक सुख और शांति प्राप्त की जा सकती है।</p>
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		<title>आचार्यश्री भारत भूषण जी ने नेमि गिरनार यात्रा के लिए दिया आशीर्वाद : आचार्य बोले- भगवान नेमिनाथ मोक्षस्थल पर उनकी भावनाओं को अपनी आत्मा तक पहुंचाना महान भाग्य उदय,  </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/acharya_shri_bharat_bhushan_ji_bestowed_his_blessings_upon_the_nemi_girnar_pilgrimage/</link>
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		<pubDate>Sun, 24 May 2026 10:34:02 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[भगवान नेमीनाथ जी के मोक्ष कल्याणक पर गिरनार जी धर्मयात्रा जुलाई में प्रस्तावित है। इसकी तैयारियां की जा रही हैं। प्रचार-प्रसार और जनजागरण के लिए भ्रमण कार्य किया जा रहा है। विश्व जैन संगठन के मीडिया प्रभारी ने बताया कि आचार्य श्री भारत भूषण और आचार्य श्री विनिश्चय सागर जी ने गिरनार धर्म यात्रा की [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>भगवान नेमीनाथ जी के मोक्ष कल्याणक पर गिरनार जी धर्मयात्रा जुलाई में प्रस्तावित है। इसकी तैयारियां की जा रही हैं। प्रचार-प्रसार और जनजागरण के लिए भ्रमण कार्य किया जा रहा है। विश्व जैन संगठन के मीडिया प्रभारी ने बताया कि आचार्य श्री भारत भूषण और आचार्य श्री विनिश्चय सागर जी ने गिरनार धर्म यात्रा की सफलता के लिए मंगल आशीर्वाद दिया है। <span style="color: #ff0000">जलालाबाद से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>जलालाबाद।</strong> भगवान नेमीनाथ जी के मोक्ष कल्याणक पर गिरनार जी धर्मयात्रा जुलाई में प्रस्तावित है। इसकी तैयारियां की जा रही हैं। प्रचार-प्रसार और जनजागरण के लिए भ्रमण कार्य किया जा रहा है। विश्व जैन संगठन के मीडिया प्रभारी ने बताया कि आचार्य श्री भारत भूषण और आचार्य श्री विनिश्चय सागर जी ने गिरनार धर्म यात्रा की सफलता के लिए मंगल आशीर्वाद दिया है। वहीं जलालाबाद और टिकरौल में अतिशयकारी पार्श्वनाथ भगवान और शांतिनाथ भगवान से भी गिरनार धर्म यात्रा के लिए आशीर्वाद लिया गया है। विश्व जैन संगठन की ओर से बताया गया कि दिल्ली से गिरनार जी तक 25 जून को आरंभ होकर विभिन्न राज्यों से होकर 19 जुलाई को गिरनार जी पहुंचने वाली 25 दिवसीय 5100 किमी लंबी श्री नेमि गिरनार धर्म यात्रा की सफलता के लिए 23 मई को अतिशय क्षेत्र के दर्शन कर पूज्य संतों का मंगल आशीर्वाद और मार्गदर्शन लिया गया। रामपुर मनीहारन में ससंघ विराजमान आचार्य श्री भारत भूषण जी ने गिरनार धर्म यात्रा की सफलता के लिए विश्व जैन संगठन के सदस्यों और सहयोगियों को मंगल आशीर्वाद देते हुए समस्त समाज को भगवान नेमिनाथ के मोक्ष दिवस पर मोक्षस्थल गिरनार जी के दर्शन और चरण वंदन कर नेमि प्रभु की भावनाओं को अपनी आत्मा तक पहुंचाने के लिए महान भाग्य का उदय होना बताया।</p>
<p><strong>गुजरात तीर्थ क्षेत्र कमेटी करेगी भोजन की व्यवस्था</strong></p>
<p>विश्व जैन संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष संजय जैन ने सभी समाजजनों को 25 जून को दिल्ली से आरंभ होकर 19 जून को गिरनार जी पहुंचने वाली श्री नेमी गिरनार धर्म यात्रा से जुड़ने, सहयोग करने और 20 जुलाई को गिरनार वंदना के लिए निवेदन किया है और गुजरात तीर्थ क्षेत्र कमेटी द्वारा गिरनार आने वाले सभी श्रद्धालुओं के रहने भोजन की व्यवस्था किए जाने की सूचना दी। भारतवर्षीय दिगंबर तीर्थ क्षेत्र कमेटी के दिल्ली अंचल के अध्यक्ष प्रद्युम्न जैन ने 20 जुलाई को गुजरात पुलिस प्रशासन से गिरनार वंदना में सुरक्षा व्यवस्था किए जाने की मांग करते हुए संगठन की धर्म यात्रा में सहयोग करने का आश्वासन दिया। सभा में संगठन के सम्मानित सदस्य अनुज जैन लक्ष्मी नगर, दिल्ली, सहारनपुर शाखा अध्यक्ष अरिहंत जैन, मंत्री आयुष जैन, सदस्य विनीत जैन, आयुष जैन, निपुण जैन और अन्य सदस्य उपस्थित रहे।</p>
<p><strong>पदाधिकारियों का कमेटी ने किया स्वागत </strong></p>
<p>संगठन के पदाधिकारियों और सदस्यों ने जलालाबाद से शामली की ओर ससंघ विहार कर रहे आचार्य श्री विनिश्चय सागर जी महाराज के दर्शन का गिरनार धर्म यात्रा के लिए मंगल आशीर्वाद प्राप्त किया। शामली से मोहित जैन उपस्थित रहे। जलालाबाद में विराजमान अतिश्यकारी भगवान पार्श्वनाथ और टिकरौल में विराजमान भगवान पार्श्वनाथ और भगवान शांतिनाथ की प्राचीन प्रतिमाओं के दर्शन कर आशीर्वाद लिया। जलालाबाद अतिशय क्षेत्र अध्यक्ष सुशील जैन और टिकरौल अध्यक्ष तुषार जैन ने कमेटी की ओर से सभी का स्वागत किया।</p>
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		<title>नवागढ़ गुरुकुलम् के गौरवशाली तीन छात्रों को शिक्षा के लिए भेजा : अकलंक शरणालय रेवाड़ी में अध्ययन करेंगे छात्र </title>
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		<pubDate>Sun, 26 Apr 2026 08:43:32 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[निकटवर्ती जैन तीर्थ प्रागैतिहासिक अतिशय क्षेत्र नवागढ़ में पंडित गुलाब चंद्र पुष्प की स्मृति में संचालित श्री नवागढ़ गुरुकुलम ने अपने 5 वर्ष पूर्ण कर लिए हैं। गुरुकुलम से शिक्षा प्राप्त करने वाले तीन छात्रों को श्री अकलंक शरणालय रेवाड़ी जो मुनि श्री प्रणम्य सागरजी महाराज के मंगल आशीर्वाद से संचालित है। बकस्वाहा से पढ़िए, [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>निकटवर्ती जैन तीर्थ प्रागैतिहासिक अतिशय क्षेत्र नवागढ़ में पंडित गुलाब चंद्र पुष्प की स्मृति में संचालित श्री नवागढ़ गुरुकुलम ने अपने 5 वर्ष पूर्ण कर लिए हैं। गुरुकुलम से शिक्षा प्राप्त करने वाले तीन छात्रों को श्री अकलंक शरणालय रेवाड़ी जो मुनि श्री प्रणम्य सागरजी महाराज के मंगल आशीर्वाद से संचालित है। <span style="color: #ff0000">बकस्वाहा से पढ़िए, रत्नेश जैन/राजेश रागी की रिपोर्ट&#8230; </span></strong></p>
<hr />
<p><strong>बकस्वाहा।</strong> निकटवर्ती जैन तीर्थ प्रागैतिहासिक अतिशय क्षेत्र नवागढ़ में पंडित गुलाब चंद्र पुष्प की स्मृति में संचालित श्री नवागढ़ गुरुकुलम ने अपने 5 वर्ष पूर्ण कर लिए हैं। गुरुकुलम से शिक्षा प्राप्त करने वाले तीन छात्रों को श्री अकलंक शरणालय रेवाड़ी जो मुनि श्री प्रणम्य सागरजी महाराज के मंगल आशीर्वाद से संचालित है। वहां अध्ययन करने के लिए भेजा गया। वहां इन छात्रों ने अनुशासन, सांस्कृतिक गतिविधि एवं शिक्षा में सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया। आयुष जैन भगवां, ऋतिक जैन गुलगंज एवं संभव जैन खरगापुर में प्रथम पांच छात्रों में प्रथम द्वितीय एवं चतुर्थ स्थान प्राप्त कर श्री नवागढ़ गुरुकुलम का गौरव एवं मान बढ़ाया है।</p>
<p><img decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-105634" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2026/04/IMG-20260426-WA0007.jpg" alt="" width="148" height="204" /></p>
<p><strong>बधाई एवं शुभकामना</strong></p>
<p>श्री नवागढ़ गुरुकुलम अतिशय क्षेत्र नवागढ़ एवं पंडित गुलाबचंद पुष्प स्मृति ट्रस्ट की ओर से इन छात्रों को बधाई दी गई। इन्होंने गुरुकुलम का ही नहीं जैन संस्कृति एवं जैन संस्कारों का बहुमान करते हुए समाज का गौरव बढ़ाया है। श्री नवागढ़ गुरुकुलम संस्थापक ब्रह्मचारी जयकुमार निशांत भैया के निर्देशानुसार प्रतिवर्ष योग्य छात्रों को विभिन्न स्थान पर शिक्षा हेतु भेजा जाता है। खुरई गुरुकुलम में अध्ययनरत छात्रों में से दो छात्रों ने विशेष स्थान प्राप्त किया है एवं बढ़िया जिला टीकमगढ़ में संचालित सर्वोदय जो आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज के आशीर्वाद से संचालित है में अध्ययनरत 12 छात्रों में से 8 छात्रों ने प्रवीण्य सूची में में स्थान प्राप्त कर श्री नवागढ़ गुरुकुलम का गौरव बढ़ाया है। छात्रों के परिजनों एवं शिक्षकों के लिए सभीकी ओर से बधाई एवं हार्दिक शुभकामनाएं आपके सहयोग से ही इन छात्रों को गौरव में स्थान प्राप्त हुआ है।</p>
<p><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone size-medium wp-image-105635" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2026/04/IMG-20260426-WA0008-195x300.jpg" alt="" width="195" height="300" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2026/04/IMG-20260426-WA0008-195x300.jpg 195w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2026/04/IMG-20260426-WA0008.jpg 320w" sizes="(max-width: 195px) 100vw, 195px" /></p>
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		<title>भीषण शीतलहर में आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी का विहार: राजगढ़ से तिजारा की ओर किया है आचार्यश्री ने विहार  </title>
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		<pubDate>Sun, 04 Jan 2026 12:51:11 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[शीत हो या ग्रीष्म सभी ऋतुओं में दिगंबर जैन संतो ने अपनी साधना के साथ जैनत्व का मान कायम रखे हुए हैं। ऐसा ही नजारा रविवार की बेला में देखने को मिला जब सूरज के दर्शन नहीं चारों तरफ कोहरा उस बीच दिगंबर संत आकाश ओडन धरती को बिछौना मानकर राजगढ़ से तिजारा की ओर [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>शीत हो या ग्रीष्म सभी ऋतुओं में दिगंबर जैन संतो ने अपनी साधना के साथ जैनत्व का मान कायम रखे हुए हैं। ऐसा ही नजारा रविवार की बेला में देखने को मिला जब सूरज के दर्शन नहीं चारों तरफ कोहरा उस बीच दिगंबर संत आकाश ओडन धरती को बिछौना मानकर राजगढ़ से तिजारा की ओर विहार किया। <span style="color: #ff0000">राजगढ़ से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong> राजगढ़</strong>। अत्यधिक सर्दी एक और शरीर में कंपन और धूजणी प्रारंभ कर देती है और रात्रि को दो-दो रजाइयों में नींद आ रही है। सम्पूर्ण तन को पूरी तरह से ढके रहते हैं। गर्म कपड़ों के लबादे से स्वयं को लदे रहते हैं। वहीं इस कड़ाके की ठंड में दिगंबर संतांे की साधना अद्भुत ,अतुलनीय और पूरे विश्व को अचंभित करने वाली है। जीरो डिग्री टेम्परेचर में दिगंबर रहकर साधना रत रहते हैं। यदि विश्व में सात अजूबे हैं तो आठवां अजूबा दिगंबर संत हैं। जिनकी साधना, संयम और तप देखते ही बनता है। पूरे विश्व में जितने भी धर्म है उन सब में तप और तपस्या के हिसाब से देखा जाए तो जैन धर्म सर्वाेच्च स्तर पर है। दिगम्बर मुनिराजों की क्रिया देखकर हर जनमानस दांतो तले उंगली दबाने लगता है और मन ही मन कह उठता है धन्य हो दिगम्बर मुनिराज जो इतना कठिन तप करते हैं। शीत हो या ग्रीष्म सभी ऋतुओं में दिगंबर जैन संतो ने अपनी साधना के साथ जैनत्व का मान कायम रखे हुए हैं। ऐसा ही नजारा रविवार की बेला में देखने को मिला जब सूरज के दर्शन नहीं चारों तरफ कोहरा उस बीच दिगंबर संत आकाश ओडन धरती को बिछौना मानकर राजगढ़ से तिजारा की ओर विहार किया।</p>
<p>मंगल विहार के क्षणों के पलो को बताते हुए रामगंजमंडी के श्री मनीष सिंघल, श्रीमती पूजा सिंघल, राघव सिंघल एवम नीरज जैन बताते हैं कि हमने आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर महाराज के साथ राजगढ़ से तिजारा की ओर गुरुवर के साथ पैदल बिहार में सम्मिलित हुए घना कोहरा धुंध दूर-दूर तक आदमी दिखाई नहीं दे रहा लेकिन गुरुवर भीषण जीत लहर की परवाह न करते हुए बस चले जा रहे थे हम लोग जर्सी स्वेटर आदि पहने हुए चल रहे थे लेकिन गुरुवर तो निष्प्रहता निर्माेहिता रखते हुए मंगल विहार कर रहे थे स हम भी गुरुवर के साथ मंगल विहार में सम्मिलित हो गए गुरुदेव ने ऐसी सर्दी के बीच भी हमें मंगल आशीर्वाद प्रदान किया और रामगंज मंडी नगर को भी मंगल आशीर्वाद दिया हमने गुरुदेव के साथ पैदल चलना शुरू किया थोड़ी देर हमें सर्दी का एहसास हुआ लेकिन बाद में गुरुदेव की साधना संयम का प्रतिफल हुआ कि गुरुदेव ने हमारा हाथ थामा और हम पैदल चलने लगे पैदल चलते हुए हमें भी सर्दी का एहसास नहीं होने लगा।</p>
<p>सचमुच ऐसा अदम्य साहस निर्भीक साधना पंचम काल में दिगंबर संत में ही देखी जा सकती है।</p>
<p>क्या पंक्तियां है जो सच में सार्थकता सिद्ध करती हैं</p>
<p>जग के उन सब मुनिराजों को मेरा नम्र प्रणाम है ।।</p>
<p>मोक्षमार्ग पर अंतिम क्षण तक, चलना जिनको इष्ट है।</p>
<p>जिन्हें न च्युत कर सकता पथ से, कोई विघ्न अनिष्ट है।।</p>
<p>दृढ़ता जिनकी है अगाध, और जिनका शौर्य अदम्य है।</p>
<p>साहस जिनका है अबाध, और जिनका धैर्य अगम्य है।।</p>
<p>जिनकी है निस्वार्थ साधना, जिनका तप निष्काम है। मेरा नम्र प्रणाम है जबकि उन सब मुनिराजो कोमेरा नम्र प्रणाम है</p>
<p>हर उपसर्ग सहन जो करते, कहकर कर्म विचित्रता।तन तज देते किंतु न तजते, अपनी ध्यान पवित्रता।।</p>
<p>एक दृष्टि से देखा करते, गर्मी वर्षा ठंड जो तप्त उष्ण लौ रिमझिम वर्षा, शीत तरंग प्रचंड जो।।</p>
<p>जिनको ज्यों है शीतल छाया, त्यों ही भीषण घाम है</p>
<p>जग के उन सब मुनिराजो को मेरा नम्र प्रणाम है।</p>
<p>जिन्हें कंकड़ों जैसा ही है, मणि मुक्ता का ढेर भी।</p>
<p>जिनका समता धन खरीदने, को असमर्थ कुबेर भी।।</p>
<p>दूर परिग्रह से रह माना, करते हैं संतोष जो।</p>
<p>रत्नत्रय से भरते रहते, अपना चेतन कोष जो।।</p>
<p>और उसी की रक्षा में, रत रहते आठों याम हैं ।</p>
<p>जग के उन सब मुनिराजों को, मेरा नम्र प्रणाम है सिद्धों की श्रेणी में आने वाला जिनका नाम है।</p>
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		<title>आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज एवं जय कीर्ति जी महाराज का हुआ मंगल मिलन : एडिशनल एसपी इंटेलिजेंस प्रवीण जैन ने लिया आशीर्वाद  </title>
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		<pubDate>Wed, 19 Nov 2025 15:01:00 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री प्रज्ञा सागरजी महाराज एवं आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी महाराज का महामिलन कोटा के हाईवे पर देखने को मिला जिसकी साक्षी हाडोती की स्वर्णिम धरा बनी। वहीं बुधवार की प्रातः बेला एक और महा मिलन की साक्षी बनी जब आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज एवं जय कीर्ति महाराज का महामिलन हुआ। कोटा से पढ़िए, [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>आचार्य श्री प्रज्ञा सागरजी महाराज एवं आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी महाराज का महामिलन कोटा के हाईवे पर देखने को मिला जिसकी साक्षी हाडोती की स्वर्णिम धरा बनी। वहीं बुधवार की प्रातः बेला एक और महा मिलन की साक्षी बनी जब आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज एवं जय कीर्ति महाराज का महामिलन हुआ। <span style="color: #ff0000">कोटा से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>कोटा।</strong> हाडोती की स्वर्णिम धरा पर विगत 4 पांच माह से धर्म की अद्भुत गंगा में जनता डुबकी लगा रही थी। विगत दिनों पूर्व आचार्य श्री प्रज्ञा सागरजी महाराज एवं आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी महाराज का महामिलन कोटा के हाईवे पर देखने को मिला जिसकी साक्षी हाडोती की स्वर्णिम धरा बनी। वहीं बुधवार की प्रातः बेला एक और महा मिलन की साक्षी बनी जब आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज एवं जय कीर्ति महाराज का महामिलन हुआ। कोटा नगर की तलवंडी इसकी साक्षी बनी। यह महामिलन वात्सल्य का और धर्म की ज्योति का एक पर्याय बना जिसका साक्षी कोटा नगर बना। आचार्य श्री विनिश्चय सागर जी महाराज ससंघ एवं धर्म दिवाकर जय कीर्ति गुरुदेव का भव्य ऐतिहासिक मिलन तलवंडी स्थित कपिल मेडिकल स्टोर के पास हुआ। जिसको देखकर कोटा नगर अपने आप को धन्य मान रहा था जन-जन का मन खुशी से प्रफुल्लित था। आनंद के इन क्षणों में सभी भक्त भाव विह्वल थे।</p>
<p><strong>मंगल अगवानी की एवं उनके पाद प्रक्षालन किया</strong></p>
<p>प्रातः बेला में आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज संघ ने कोटा स्थित महावीर नगर से तलवंडी की ओर विहार किया। इस दौरान आचार्यश्री स्काइलाइन मल्टी परिसर में पहुंचे। जहां एडिशनल एसपी इंटेलिजेंस प्रवीण जैन ने आचार्य श्री का परिवार सहित मंगल आशीर्वाद लिया। जैन आचार्य श्री की अपने आवास पर पहुंचने पर मंगल अगवानी की एवं उनके पाद प्रक्षालन किया। मंगल आरती की एवं अपने आप को धन्य एवं गौरवान्वित माना। उन्होंने इन क्षणों को अपने पुण्य क्षण माना। इसी मल्टी परिसर में परम मुनि भक्त मिथुन मित्तल ने भी गुरुदेव की मंगल आगवानी की एवं उनके आवास पर गुरुदेव के चरण कमल एवं आशीष प्राप्त होने पर मित्तल परिवार की खुशी का ठिकाना नहीं रहा और यही कहते हुए प्रतीत हो रहे थे, जब से गुरु दर्शन मिला, मन है मेरा खिला-खिला मेरी तुमसे डोर बंध गई है। मेरी तो पतंग उड़ गई है।</p>
<p><strong>इन्होंने करवाया आहारदान</strong></p>
<p>इसी के साथ आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज का संघ सहित तलवंडी दिगंबर जैन मंदिर में मंगल प्रवेश हुआ जहां समाज बधुओं ने उनकी मंगल अगवानी की। प्रवचन के बाद आचार्य श्री विनिश्चय सागर जी महाराज को आहारदान देने का सौभाग्य त्रिलोक भूपेंद्र मयंक सांवला परिवार को मिला एवं मुनिश्री प्रांजल सागर जी महाराज को आहार दान देने का सौभाग्य विमल बाकलीवाल परिवार को मिला। मुनि श्री प्रवीर सागर जी महाराज को आहार दान देने का सौभाग्य एवं पूज्य मुनि श्री प्रत्यक्ष सागर जी महाराज जी को आहार दान देने का सौभाग्य देवेंद्र अर्पित सुरलाया परिवार को मिला एवं क्षुल्ल्क श्री प्रमेश सागर जी महाराज को आहार दान देने का सौभाग्य पंकेश सांवला परिवार को मिला।</p>
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			</item>
		<item>
		<title>ज्ञान का कार्य है जानना, श्रद्धान का काम विश्वास करना: आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी के सान्निध्य में मनाया ज्ञान कल्याणक  </title>
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		<pubDate>Tue, 11 Nov 2025 13:03:20 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी के सान्निध्य में हो रहे पंचकल्याण प्रतिष्ठा महोत्सव के चौथे दिन भगवान को केवल ज्ञान प्राप्त हुआ। केवल ज्ञान कल्याणक महोत्सव की बेला में प्रतिदिन की भांति श्री जी का अभिषेक कर शांतिधारा हुई। रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर&#8230; रामगंजमंडी। आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी महाराज के सान्निध्य [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी के सान्निध्य में हो रहे पंचकल्याण प्रतिष्ठा महोत्सव के चौथे दिन भगवान को केवल ज्ञान प्राप्त हुआ। केवल ज्ञान कल्याणक महोत्सव की बेला में प्रतिदिन की भांति श्री जी का अभिषेक कर शांतिधारा हुई। <span style="color: #ff0000">रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>रामगंजमंडी।</strong> आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी महाराज के सान्निध्य में हो रहे पंचकल्याण प्रतिष्ठा महोत्सव के चौथे दिन भगवान को केवल ज्ञान प्राप्त हुआ। केवल ज्ञान कल्याणक महोत्सव की बेला में प्रतिदिन की भांति श्री जी का अभिषेक कर शांतिधारा हुई। इस बेला में आचार्य श्री ने ज्ञान के विषय में प्रकाश डाला। आचार्य श्री ने कहा कि ज्ञान का कार्य जानना और विश्वास करना श्रद्धा का काम है। जानी हुई वस्तु पर श्रद्धा कैसी है, विश्वास कैसा है। इसे ही लाभ प्राप्त होता है। सोने का उदाहरण देते हुए कहा कि सोने को जानना और उस पर श्रद्धा करना होता है। सुनार भी उसे कसौटी पर कसता है, पीतल कीमती वस्तु है, उस पर श्रद्धान नहीं करता। कोई भी निर्णय श्रद्धा के बाद होता है। उन्होंने कहा कि श्रद्धान ज्ञान में बड़ी भूमिका निभाता है। सही जगह श्रद्धान होना चाहिए। मेहनत परिश्रम तप साधना करते हैं। तब जाकर पुण्य प्राप्त होता है। इसका मतलब तब जाकर केवल ज्ञान की प्राप्ति होती है। झोली फैलाओ और शुभ भावनाओं भाओ कि केवलज्ञान की प्राप्ति हो। यदि यह हो जाएगा तो कल्याण निश्चित है।</p>
<p><strong>राजा सोम राजा श्रेयांश परिवार के यहां हुए आदिनाथ प्रभु के आहार </strong></p>
<p>इसी क्रम में एक वर्ष तक आदिनाथ प्रभु को विधि नहीं मिली और किसी को नवधा भक्ति विधि आहार की विधि भी नहीं पता थी और आहार चर्या का सौभाग्य राजा सोम राजा श्रेयांश परिवार को मिला, जो संजय ममता बाक़लीवाल एवं राजीव मनीषा बाकलीवाल परिवार को प्राप्त हुआ। इसी के साथ प्रभु की दिव्य ध्वनि खिरी प्रभु को केवल ज्ञान की प्राप्ति हुई और प्रभु का पारणा गन्ने ईक्षु रस गन्ने से हुआ। दोपहर की बेला में समवशरण की रचना हुई। समवशरण के प्रथम दर्शन कराने एवं विमोचन करने का सौभाग्य कमल कुमार उमा देवी शामगढ़ निवासी को प्राप्त हुआ एवं इन्हीं के परिवार को ही समवशरण की प्रथम आरती का सौभाग्य मिला। समवशरण में दिव्य उपदेश हुआ। आचार्य श्री ने द्रव्यों के वर्णन को बताया। उन्होंने कहा कि संसार में 6 द्रव्य हैं, जिसमें जीव चेतन है, उसे अनुभूति है उसे सुख-दुख का अनुभव है।</p>
<p><strong>आचार्य के 36 मूलगुण उपाध्याय के 25 मूलगुणों का मार्ग बताया</strong></p>
<p>आचार्यश्री ने बताया कि भगवान ने दो धर्म का प्रतिपादन किया श्रावक धर्म और मुनि धर्म भगवान ने हमें महाव्रत धारण करके तप साधना का मार्ग बताया श्रावक के छह आवश्यक आठ मुलगुणों का पालन करने के साथ व्यसन त्याग का विस्तृत वर्णन किया।</p>
<p>भगवान ने आचार्य के 36 मूलगुण उपाध्याय के 25 मूलगुणों का मार्ग बताया। जन्म जरा मृत्यु पर्याय तक हमारी है। कर्म बंधन के कारण जीव कभी मनुष्य कभी देव कभी नरक पर्याय में जन्म लेता है।</p>
<p><strong>भगवान की दिव्यध्वनि सर्वांग से खिरती है </strong></p>
<p>आचार्य श्री ने भगवान की दिव्य ध्वनि के विषय में सभी को बताया। उन्होंने कहा कि जब दिव्या ध्वनि खिर रही थी। संपूर्ण संसार में मेघ गर्जन प्रचारित हो रही थी। उन्होंने कहा कि दिव्य ध्वनि जिनेंद्र वाणी है। जो सर्वांग से खिरती है। भगवान ने दिव्य ध्वनि के माध्यम से आगम को समझाया। केवल ज्ञान की महिमा अनंत है। केवलज्ञानी अनंत पर्याय को देखता है। यह केवल ज्ञान की महिमा है। संपूर्ण कार्यक्रम में छायाचित्र में सक्रिय सहयोग आशु जैन कटनी, सन्नी जैन कटनी एवं उनकी टीम ने किया। बुधवार को पिच्छिका परिवर्तन एवं मोक्ष कल्याणक महोत्सव मनाया जाएगा।</p>
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		<title>आचार्यश्री ने कहा-कोई भी कार्य करने से पहले अभ्यास जरूरी : पंच कल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव में मना तप कल्याणक </title>
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		<pubDate>Mon, 10 Nov 2025 11:12:15 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज के सानिध्य में पंच कल्याणक महोत्सव के तृतीय दिवस तप कल्याणक महोत्सव मनाया गया। इसमें सर्वप्रथम श्रीजी का अभिषेक शांतिधारा की गई। इसके बाद पूजन किया गया। रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन की यह खबर&#8230; रामगंजमंडी। आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज के सानिध्य में पंच कल्याणक महोत्सव के तृतीय दिवस [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज के सानिध्य में पंच कल्याणक महोत्सव के तृतीय दिवस तप कल्याणक महोत्सव मनाया गया। इसमें सर्वप्रथम श्रीजी का अभिषेक शांतिधारा की गई। इसके बाद पूजन किया गया। <span style="color: #ff0000">रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>रामगंजमंडी।</strong> आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज के सानिध्य में पंच कल्याणक महोत्सव के तृतीय दिवस तप कल्याणक महोत्सव मनाया गया। इसमें सर्वप्रथम श्रीजी का अभिषेक शांतिधारा की गई। इसके बाद पूजन किया गया। जन्म कल्याणक का हवन आदि किया गया। आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी का प्रवचन हुआ। आचार्य श्री ने कहा कि कोई भी कार्य करने से पहले अभ्यास करना होता है। अभ्यास बहुत जरूरी है, व्यक्ति चतुर तो बनता है लेकिन अभ्यास नहीं करता है तो वह फेल हो जाता है। फेल हो जाने के बाद वह परेशान और पछताता है। आचार्य श्री ने कहा कि कोई कार्य में कार्य से ज्यादा अभ्यास में परिश्रम होता है। यदि अभ्यास होता है तो कार्य में परेशानी नहीं आती। उन्होंने कहा कि दिगंबर मुद्रा का अभ्यास केशलोच से शुरू होता है। शरीर टेंपरेरी व्यवस्था है। आज है वह कल नहीं रहेगा। दिगंबर मुद्रा में सबसे पहले अभ्यास कराया जाता है और सबसे पहले केशलोच कराया जाता है।</p>
<p><strong>हमें आध्यात्मिकता की ओर भी अभ्यास शुरू करना चाहिए</strong></p>
<p>उन्होंने मनुष्य के विषय में कहा कि मनुष्य में विशेषता होती है कि वह जैसा चाहे वैसा परिवर्तन कर सकता है। अच्छे को बुरा कर सकता है और बुरे को अच्छा कर सकता है। अभ्यास से कुछ भी संभव हो सकता है। उन्होंने कहा की लौकिक कार्यों का तो भरपूर अभ्यास करते हैं लेकिन, हमें आध्यात्मिकता की ओर भी अभ्यास शुरू करना चाहिए। पूजा पाठ अनुष्ठान से धर्म और अध्यात्म का विकास है। अध्यात्म में हमें वस्तु स्वरूप को जानना होगा और उसमें आनंद उठाना होगा अध्यात्म को समझते हुए यदि हम वस्तु स्वरूप को नहीं समझेंगे तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा।</p>
<p><strong>संस्कार और संस्कृति अच्छी तो पड़ाव भी अच्छा </strong></p>
<p>धर्म में जिसकी जितनी आस्था और ताकत है, वह उसे उतना ही लूट सकता है। धार्मिक अनुष्ठानों में लूटोगे तो पुण्य होगा। संस्कार और संस्कृति के विषय में बोलते हुए गुरुदेव ने कहा कि संस्कार और संस्कृति अच्छी होती है तो पड़ाव भी अच्छा होता है। यदि यह अच्छा नहीं है तो पड़ाव भी अच्छा नहीं होगा, थोड़ा सा बदलना है अध्यात्म से जुड़े महामंत्र से जोड़े मंत्र वाक्य से जोड़ेंगे तो मैं लिख कर देता हूं कि अपन स्वर्ग में मिलेंगे।</p>
<p><strong>ब्रह्मचारी नमन भैया के निर्देशन हुआ पूजन </strong></p>
<p>ब्रह्मचारी नमन भैया के निर्देशन में विनायक यंत्र पूजन किया गया। राजकुमार आदिकुमार का विवाह हुआ। जिसमें आदिकुमार की बारात निकाली गई। जिसमें उत्साह भरपूर दिखा। बग्गी में भगवान के माता-पिता बने सुधा जयकुमार डूंगरवाल, सौधर्म इंद्र-इंद्राणी मयंक विजया सांवला, कुबेर इंद्र मनीष सिंघल बैठे हुए थे। 32 हजार मुकुटबद्ध राजाओं द्वारा भेंट समर्पण, राज्याभिषेक आदि हुआ। साथ ही भरत बाहुबली संवाद हुआ। राज्यसभा में भगवान आदिनाथ ने सभी को आसि मसी कृषि का संदेश दिया अपनी दोनों पुत्री ब्राह्मी सुंदरी को शिक्षा प्रदान की।</p>
<p><strong>तीर्थंकर आदिनाथ का राज्याभिषेक हुआ </strong></p>
<p>तीर्थंकर आदिनाथ का राज्याभिषेक हुआ। राज्य सभा में जैसे ही नीलांजना नृत्य हुआ। राजकुमार आदिनाथ को वैराग्य हो गया और वह दीक्षा लेने चले गए। उस समय का क्षण काफी भावुक था। इसी क्रम में आचार्य श्री के सानिध्य में दीक्षाभिषेक दीक्षा विधि हुई और प्रतिमाओं पर दीक्षा विधि के संस्कार किए गए। आचार्य श्री ने भी तप कल्याणक का महत्व समझाया। एक दिन पूर्व जन्म कल्याणक की रात्रि में बेला में तीर्थंकर बालक का जन्म कल्याणक मनाते हुए पालना झुलाया गया एवं बाल क्रीड़ा की गई।</p>
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		<title>पंचकल्याणक महोत्सव में मनाया जन्म कल्याणक निकली शोभायात्रा : श्रद्धालु खुशी से झूमे जयकारे लगाकर भक्ति नृत्य में रहे लीन  </title>
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		<pubDate>Sun, 09 Nov 2025 13:11:08 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी महाराज सानिध्य में हो रहे पंचकल्याण महोत्सव के दूसरे दिन भगवान का जन्म कल्याणक महोत्सव मनाया गया। जन्म कल्याणक की पूर्व रात्रि में गर्भ कल्याणक की क्रिया हुई। इंद्र दरबार लगाया गया एवं माता के 16 सपनों का मंचन किया गया। रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर&#8230; रामगंजमंडी। [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी महाराज सानिध्य में हो रहे पंचकल्याण महोत्सव के दूसरे दिन भगवान का जन्म कल्याणक महोत्सव मनाया गया। जन्म कल्याणक की पूर्व रात्रि में गर्भ कल्याणक की क्रिया हुई। इंद्र दरबार लगाया गया एवं माता के 16 सपनों का मंचन किया गया। <span style="color: #ff0000">रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>रामगंजमंडी।</strong> आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी महाराज सानिध्य में हो रहे पंचकल्याण महोत्सव के दूसरे दिन भगवान का जन्म कल्याणक महोत्सव मनाया गया। जन्म कल्याणक की पूर्व रात्रि में गर्भ कल्याणक की क्रिया हुई। इंद्र दरबार लगाया गया एवं माता के 16 सपनों का मंचन किया गया। रविवार सुबह श्री जी का अभिषेक और शांतिधारा की गई। इसके बाद जन्म कल्याणक महोत्सव का पूजन हुआ एवं जन्म कल्याणक महोत्सव मनाया गया। जन्म कल्याणक महोत्सव की बेला में जैसे ही तीर्थंकर बालक का जन्म हुआ। वैसे ही इंद्र का सिंहासन कंपायमान होने लगा और उसके बाद खुशियां मनाई गइर्। साथ ही कुबेर इंद्र द्वारा रत्न वृष्टि की गई, नृत्य किए गए। इस बेला में सौधर्म इंद्र-इंद्राणी संवाद के साथ कुबेर इंद्र-इंद्राणी का संवाद भी दर्शाया गया। जैसे ही यह घोषणा हुई कि भगवान का जन्म हो गया है, सारा मंच खुशियों से झूम उठा और जय जयकार कर भक्ति नृत्य करने लगा। संपूर्ण महोत्सव विधि-विधान के साथ ब्रह्मचारी नमन भैया करवा रहे हैं। इस अवसर पर पूरा वातावरण भक्ति से ओतप्रोत था।</p>
<p><strong>शोभायात्रा में नगरवासियों का उत्साह रहा चरम पर </strong></p>
<p>सभी इंद्र-इंद्राणी को बग्गी में बिठाकर भव्य शोभायात्रा निकाली गई, जो बहुत ही भव्य एवं अलौकिक थी। इस शोभायात्रा में सभी भक्त जय-जयकार भक्ति नृत्य करते चल रहे थे एवं नगर के प्रमुख मार्गाें से होते हुए यह शोभायात्रा कृषि उपज मंडी पहुंची। जहां पांडुक शिला पर सौधर्म इंद्र द्वारा तीर्थंकर बालक का जन्माभिषेक किया गया। शोभायात्रा का जगह-जगह स्वागत किया गया। वहीं आदिनाथ जैन श्वेतांबर श्री संघ की ओर से अध्यक्ष राजकुमार पारख के नेतृत्व में स्वागत किया गया। वर्ष 2007 के बाद हुए नगर में हुए पंच कल्याणक महोत्सव में निकली शोभायात्रा में उत्साह भरपूर था। 2007 में जो पंचकल्याणक हुआ था वह 2 से 7 मई तक मनाया गया था और 4 मई को जन्म कल्याणक महोत्सव मनाया गया था। उस समय अतिथि के रूप में उस समय राज्य के गृहमंत्री रहे गुलाबचंद कटारिया थे।</p>
<p><strong>पुरुषार्थ बड़ा होना चाहिए-आचार्य श्री </strong></p>
<p>जन्म कल्याणक महोत्सव की बेला में आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा कि पुण्य आता कैसे है। इसके विषय में बताया कि झोली तो इतनी बड़ी है लेकिन, पुरुषार्थ सुई की नोक के बराबर है। पुरुषार्थ भी बड़ा होना चाहिए तथा आस्था बड़ी होनी चाहिए। आस्था जितनी विशाल होगी, पुण्य उतना अधिक आपके पास आएगा। आचार्य श्री ने कहा कि पुण्य भी रंग बदलता है। अक्सर आप देखना पुण्य जब मुख मोड़ता है, जब आपको उसकी जरूरत है। पुरुषार्थ इतना करो कि उसे मुंह मोड़ने का समय ही ना मिले। भगवान का जन्म कल्याणक होता है तो सौधर्म इंद्र का सिंहासन भी कंपायमान होने लगता है। वह सोचने पर मजबूर हो जाता है कि मेरा सिंहासन क्यों डोल रहा है? पुण्य के संदर्भ में गुरुदेव ने कहा कि जहां शांत परिणाम होते ह।ैं वहां पुण्य को आना ही होता है। पुण्य का उदय होता है तो तीर्थंकर के माता-पिता एवं इंद्र आदि हो सकते हैं। शांत परिणाम से ही पुण्य कमाया जाता है। शांत परिणाम होंगे तो परिवार में पुण्य आएगा और पाप नहीं आएगा।</p>
<p><strong>जन्म दिन पर केक काटना जैन कल्चर नहीं </strong></p>
<p>आचार्यश्री ने कहा कि आपका जिस दिन जन्मदिन होता है। उसे दिन आप केक काटते हैं, यह दिगंबर और जैनों का कल्चर नहीं है। जिस दिन आपका जन्मदिन हो, उस दिन अभिषेक करो और जिससे आपका बैर हो, उससे क्षमा मांगो। सही मायने में यह जन्मदिन है। इस अवसर पर चातुर्मास हुए कार्यक्रमों की एक स्मारिका का भी विमोचन किया गया।</p>
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