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	<title>आचार्य श्री विद्यासागर महाराज &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
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	<title>आचार्य श्री विद्यासागर महाराज &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>मुनिराजों का चंद्रोदय तीर्थ चांदखेड़ी में हुआ मंगल प्रवेश : मुनि श्री ने कहा कि क्षेत्र ने मुनि श्री सुधासागर महाराज के आने से क्षेत्र ने दिन दूनी रात चौगुनी वृद्धि की  </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shree Phal News]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 11 Mar 2026 08:08:49 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री विद्यासागर महाराज से दीक्षित शिष्य एवं मुनि श्री समय सागर महाराज के आज्ञानुव्रती शिष्य पूज्य मुनि श्री निष्पक्ष सागर महाराज एवं मुनिश्री निष्प्रह सागर महाराज का मंगल आगमन हुआ। चांदखेड़ी से अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर&#8230; चांदखेड़ी। आचार्य श्री विद्यासागर महाराज से दीक्षित शिष्य एवं मुनि श्री समय सागर महाराज के आज्ञानुव्रती [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य श्री विद्यासागर महाराज से दीक्षित शिष्य एवं मुनि श्री समय सागर महाराज के आज्ञानुव्रती शिष्य पूज्य मुनि श्री निष्पक्ष सागर महाराज एवं मुनिश्री निष्प्रह सागर महाराज का मंगल आगमन हुआ। <span style="color: #ff0000">चांदखेड़ी से अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>चांदखेड़ी।</strong> आचार्य श्री विद्यासागर महाराज से दीक्षित शिष्य एवं मुनि श्री समय सागर महाराज के आज्ञानुव्रती शिष्य पूज्य मुनि श्री निष्पक्ष सागर महाराज एवं मुनिश्री निष्प्रह सागर महाराज का मंगल आगमन हुआ। गुरुदेव रामगंज मंडी नगर से मंगल विहार करते हुए झालावाड़ झालरापाटन होते हुए चंद्रोदय तीर्थ चांदखेड़ी मंगल प्रवेश किया। महाराज श्री का कस्बे की सीमा पर स्थित दहीखेड़ा चौराहे पर मंगल प्रवेश हुआ। जहां पर महिला महासमिति की अध्यक्षा निशा जैन व समिति की सदस्याओं सहित मंगल अगवानी की गई। महाराज श्री के चंद्रोदय तीर्थ क्षेत्र कमेटी की ओर से प्रशांत जैन ने बताया कि क्षेत्र कमेटी व समाज गुरुदेव के आगमन से अत्यंत उत्साहित थी और उमंग उल्लास से भरपूर थी। उन्होंने बताया कि क्षेत्र पर मंगल आगमन अटरू रोड से मंदिर के उत्तरी दरवाजे से हुआ जहां पर मुनि द्वय के सानिध्य में भगवान आदिनाथ जन्म कल्याणक महोत्सव संपन्न होगा। यह क्षेत्र के लिए बहुत बड़ा अवसर था जब क्षेत्र पर गुरुदेव का आगमन हुआ एवं मुनि श्री के सानिध्य में ही भगवान आदिनाथ का अभिषेक एवं शांति धारा संपन्न हुई। क्षेत्र कमेटी के अध्यक्ष हुकम जैन काका, उपाध्यक्ष महेंद्र कांसल,सह कोषाध्यक्ष कैलाश पापड़ीवाल, मैला संयोजक मुकेश मासुम, आहार विहार संयोजक महावीर कालू, अनिल जैन, नीतेश जैन, सुरेंद्र सोनी, ओम जैन लीमी ने क्षेत्र के प्रवेश द्वार पर महाराज श्री की मंगल अगवानी पद प्रक्षालन मंगल आरती की । इस अवसर पर मंच संचालन क्षेत्र कमेटी अध्यक्ष श्री हुकम जैन काका ने किया पूज्य मुनि श्री निष्पक्ष सागर महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा कि इस क्षेत्र ने मुनिश्री सुधासागर जी के आगमन के बाद उनकी प्रेरणा से दिन दूनी रात चौगुनी वृद्धि की है। उन्होंने कहा जैसे ही मैं परिसर में प्रवेश कर रहा था वैसे ही सामने सिंह द्वार देखा वैसे ही दिव्य अनुभूतियां होने लगी। उन्होंने क्षेत्र कमेटी के द्वारा चलाए जा रहे विद्यालय की भी तारीफ की और कहा कि जैसे ही मैं सिंह द्वार से थोड़ा आगे बढ़ा और देखा कि क्षेत्र कमेटी द्वारा विद्यालय भी चलाया जा रहा है जो बहुत ही प्रशंसनीय है। कुरुक्षेत्र पर आचार्य श्री की गौरव गाथा को बताता हुआ संयम कीर्ति स्तंभ की बहुत ही अलौकिक है।</p>
<p><strong> जब आदिनाथ भगवान के दर्शन हुए तो अलग ही अनुभूति हुई</strong></p>
<p>महाराज श्री ने कहा कि जैसे ही हम बढ़ते बढ़ते प्रभु आदिनाथ के समक्ष पहुंचे और जैसे ही प्रभु आदिनाथ के दर्शन किए एक अलग ही अनुभूति हुई। उन्होंने कहा क्षेत्र के निकट जब हम भवानी मंडी जो यहां से 85 किलोमीटर दूर है हम तभी से भावना भाते थे कि हम इतने नजदीक आए और बाबा के दर्शन जरूर करें। उन्होंने कहा जैसे ही क्षेत्र कमेटी ने आचार्य श्री विद्यासागर महाराज को आशीर्वाद लेते हुए क्षेत्र को उनके समर्पित किया उसके बाद जेसे ही समाज ने कमेटी ने अपने आप को गुरु चरणों में समर्पित किया यह क्षेत्र आज अपने आप फलीभूत होता दिख रहा है और यह क्षेत्र आने वाले दिनों में वृद्धिगत होगा और आने वाले दिनों में त्यागी वृद्धि साधु संत इस क्षेत्र पर आकर आत्मसाधना के मार्ग को और प्रशस्त करेंगे।</p>
<p><strong>यह तीर्थ हमारी आन बान शान हुआ करते हैं </strong></p>
<p>महाराज श्री ने कहा कि यह तीर्थ हमारे जैन धर्म की आन बान शान हुआ करते हैं, इस तीर्थ के माध्यम से ही धर्म कर पाते हैं और परमात्मा के समीप आ पाते है, उन्होंने कहा कि जिन जिन ने अपने आप को गुरु चरणों में समर्पित किया और जिन तीर्थ कमेटी ने गुरु चरणों में अपने आप को समर्पित किया वह तीर्थ आज तीर्थराज बनकर पल्लवित हो रहे हैं।आप भी निष्प्रह भावना से भगवान की सेवा पूजा करो।</p>
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		<title>आचार्य श्री विद्यासागर महाराज के समाधि दिवस पर विनयांजलि सभा की : आचार्य श्री संपूर्ण राष्ट्र को नैतिकता, संस्कार और आत्मसंयम की दिशा दिखाई </title>
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		<pubDate>Fri, 30 Jan 2026 07:57:12 +0000</pubDate>
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<p><strong>दिगम्बर जैन सोशल ग्रुप अंबाह के तत्वावधान में परेड स्थित दिगम्बर जैन मंदिर परिसर में आचार्य श्री विद्यासागर महाराज के समाधि दिवस पर श्रद्धा, भक्ति और संयम भाव से परिपूर्ण विनयांजलि सभा का आयोजन किया गया। <span style="color: #ff0000">अंबाह से पढ़िए, अजय जैन की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>अंबाह।</strong> दिगम्बर जैन सोशल ग्रुप अंबाह के तत्वावधान में परेड स्थित दिगम्बर जैन मंदिर परिसर में आचार्य श्री विद्यासागर महाराज के समाधि दिवस पर श्रद्धा, भक्ति और संयम भाव से परिपूर्ण विनयांजलि सभा का आयोजन किया गया। इस अवसर पर समाजजनों ने आचार्य श्री के चरणों में भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनके महान त्याग, तप, ज्ञान और राष्ट्रधर्म के प्रति समर्पण को नमन किया। पूरा वातावरण भक्ति, साधना और आत्मचिंतन की भावना से ओतप्रोत दिखाई दिया। सभा की शुरुआत आचार्य श्री के चित्र के समक्ष दीप प्रज्वलन एवं मंगलाचरण से हुई। इसके बाद उपस्थित श्रद्धालुओं ने सामूहिक रूप से नवकार मंत्र का जाप किया। जिससे मंदिर परिसर आध्यात्मिक ऊर्जा से गूंज उठा। समाजसेवी महेश जैन विकल ने अपने विचार रखते हुए कहा कि आचार्य विद्यासागर महाराज केवल एक संत ही नहीं, बल्कि युगदृष्टा आचार्य थे। उन्होंने अपने कठोर तप, साधना और ओजस्वी विचारों से न केवल जैन समाज, बल्कि संपूर्ण राष्ट्र को नैतिकता, संस्कार और आत्मसंयम की दिशा दिखाई।</p>
<p><strong>राष्ट्रभाषा हिंदी और संस्कृत के संरक्षण पर जोर दिया</strong></p>
<p>विनयांजलि सभा में आचार्य श्री के जीवन दर्शन पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए संध्या अनिल जैन खरगोला ने कहा कि आचार्य श्री ने अपने संपूर्ण जीवन में अहिंसा, अपरिग्रह, ब्रह्मचर्य और आत्म संयम को व्यवहार में उतारकर समाज के सामने आदर्श प्रस्तुत किया। उनका सादगीपूर्ण जीवन, अल्पाहार, कठोर तपस्या और अनुशासन आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत है। उन्होंने राष्ट्रभाषा हिंदी और संस्कृत के संरक्षण व प्रचार पर विशेष बल दिया तथा शिक्षा, संस्कार और संस्कृति को समाज की रीढ़ बताया।</p>
<p><strong>अपरिग्रह के मार्ग पर चलने से मानव जीवन सार्थक</strong></p>
<p>वीरेंद्र जैन शिक्षक ने कहा कि आचार्य विद्यासागर महाराज का संदेश था कि &#8216;परिवर्तन बाहर से नहीं, भीतर से शुरू होता है।&#8217; उन्होंने सिखाया कि यदि व्यक्ति अपने विचार, आचरण और व्यवहार को शुद्ध कर ले तो समाज और राष्ट्र स्वतः सशक्त हो जाते हैं। उनका मानना था कि उपभोग नहीं, संयम ही सच्चा सुख देता है और अपरिग्रह के मार्ग पर चलकर ही मानव जीवन सार्थक बनता है। गौ-संरक्षण, पर्यावरण संरक्षण और स्वदेशी के विचारों को उन्होंने केवल उपदेश तक सीमित नहीं रखा, बल्कि स्वयं के जीवन में उतारकर समाज के सामने उदाहरण प्रस्तुत किया।</p>
<p><strong>प्रेरक वचनों और उपदेशों का वाचन किया</strong></p>
<p>कार्यक्रम के दौरान आचार्य श्री की स्मृति में मौन रखकर श्रद्धांजलि दी गई। इसके बाद उनके प्रेरक वचनों और उपदेशों का वाचन किया गया, जिन्हें सुनकर उपस्थित श्रद्धालु भावविभोर हो उठे। विमल जैन राजू ने कहा कि आचार्य श्री का समाधि दिवस केवल स्मरण का दिन नहीं, बल्कि आत्मचिंतन, आत्मशुद्धि और उनके आदर्शों को जीवन में उतारने का संकल्प लेने का अवसर है। उन्होंने कहा कि आचार्य श्री का जीवन हमें सिखाता है कि सच्ची विजय बाहरी उपलब्धियों में नहीं, बल्कि इंद्रियों पर विजय पाने में है।</p>
<p><strong>त्याग, तप और सेवा का जीवंत उदाहरण</strong></p>
<p>दिगम्बर जैन सोशल ग्रुप अंबाह के अध्यक्ष संतोष जैन ने अपने उद्बोधन में कहा कि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज का संपूर्ण जीवन त्याग, तप और सेवा का जीवंत उदाहरण है। उनके आदर्शों पर चलकर ही हम उन्हें सच्ची विनयांजलि अर्पित कर सकते हैं। उन्होंने समाज से आह्वान किया कि आचार्य श्री के संदेशों को केवल सुनने तक सीमित न रखें, बल्कि उन्हें अपने दैनिक जीवन में अपनाएं।</p>
<p>सभा के अंत में समाजजनों ने सामूहिक रूप से संकल्प लिया कि वे आचार्य विद्यासागर महाराज के बताए मार्ग—अहिंसा, संयम, सादगी और सेवा पर चलेंगे तथा उनके विचारों को जन-जन तक पहुंचाएंगे। इस अवसर पर दिगम्बर जैन सोशल ग्रुप के पदाधिकारी, जैन समाज के वरिष्ठजन, युवा वर्ग एवं मातृशक्ति बड़ी संख्या में उपस्थित रही। कार्यक्रम का समापन शांतिपाठ के साथ हुआ। विनयांजलि सभा श्रद्धा, साधना और समर्पण का सशक्त संदेश देकर सभी के मन में आचार्य श्री की स्मृतियों को और अधिक सजीव कर गई।</p>
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		<title>आचार्य श्री का जीवंत संदेश था कि मांस निर्यात बंद हो: सर्किल इंस्पेक्टर को योगसागर महाराज ने गाय बचाने का दिया संदेश  </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shree Phal News]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 26 Jan 2026 13:01:59 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मुनिश्री योगसागर महाराज नगर में विराजमान हैं। उनका आशीर्वाद लेने सर्किल इंस्पेक्टर संदीप शर्मा प्रशिक्षु आरपीएस अंकित पहुंचे। काफी समय तक दोनों अधिकारियों ने गुरुदेव से धर्म चर्चा की और वे गुरुदेव से आशीष एवं चर्चा के बाद काफी गदगद दिखाई दिए। रामगंजमंडी से पढ़िए, यह खबर&#8230; रामगंजमंडी। मुनिश्री योगसागर महाराज नगर में विराजमान हैं। [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>मुनिश्री योगसागर महाराज नगर में विराजमान हैं। उनका आशीर्वाद लेने सर्किल इंस्पेक्टर संदीप शर्मा प्रशिक्षु आरपीएस अंकित पहुंचे। काफी समय तक दोनों अधिकारियों ने गुरुदेव से धर्म चर्चा की और वे गुरुदेव से आशीष एवं चर्चा के बाद काफी गदगद दिखाई दिए। <span style="color: #ff0000">रामगंजमंडी से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>रामगंजमंडी।</strong> मुनिश्री योगसागर महाराज नगर में विराजमान हैं। उनका आशीर्वाद लेने सर्किल इंस्पेक्टर संदीप शर्मा प्रशिक्षु आरपीएस अंकित पहुंचे। काफी समय तक दोनों अधिकारियों ने गुरुदेव से धर्म चर्चा की और वे गुरुदेव से आशीष एवं चर्चा के बाद काफी गदगद दिखाई दिए। महाराज श्री ने आचार्य श्री विद्यासागर महाराज का जिक्र करते हुए कहा कि आचार्य श्री का जीवंत संदेश था कि मांस निर्यात बंद होना चाहिए। इसके लिए आपको भी कार्य करना चाहिए और गाय बचाने के लिए भी कार्य करते रहना चाहिए।</p>
<p>सरकार मांस निर्यात कर रही है केवल विदेशी धन के लिए यह नहीं होना चाहिए। इसके उपरांत दोनों आला अधिकारियों ने मौजूद भक्तों से गाय एवं गोमाता को बचाने के लिए कहा। इसके बाद इन्होंने शांतिनाथ भगवान के दर्शन भी किए। उन्होंने समाज के सभी वरिष्ठ पदाधिकारी एवं समाज के सदस्यों से चर्चा की। उन्हें 27 जनवरी दोपहर की बेला में होने जा रहे आचार्य श्री विद्यासागर महाराज के द्वितीय समाधि दिवस कार्यक्रम में आने के लिए भी निवेदन किया गया।</p>
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		<title>शरद पूर्णिमा की दिव्यता में जन्मे दो तपस्वी रत्न आचार्य श्री विद्यासागर महाराज और आर्यिका श्री ज्ञानमति माताजी: इनका जीवन आज भी करोड़ों लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत </title>
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		<pubDate>Tue, 07 Oct 2025 12:06:59 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[शरद पूर्णिमा पर जन्मे आचार्य श्री विद्यासागर महाराज और आर्यिका श्री ज्ञानमति माताजी जैन धर्म के दो ऐसे दीपस्तंभ हैं जिन्होंने अपने जीवन से करोड़ों को प्रकाश दिया। आज उनका जीवन केवल जैन अनुयायियों के लिए नहीं, बल्कि समस्त मानवता के लिए एक उदाहरण है। उनके तप, त्याग, ज्ञान और सेवा को स्मरण करना और [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>शरद पूर्णिमा पर जन्मे आचार्य श्री विद्यासागर महाराज और आर्यिका श्री ज्ञानमति माताजी जैन धर्म के दो ऐसे दीपस्तंभ हैं जिन्होंने अपने जीवन से करोड़ों को प्रकाश दिया। आज उनका जीवन केवल जैन अनुयायियों के लिए नहीं, बल्कि समस्त मानवता के लिए एक उदाहरण है। उनके तप, त्याग, ज्ञान और सेवा को स्मरण करना और उनके सिद्धांतों पर चलना — यही उनके प्रति सच्ची विनयांजलि होगी। <span style="color: #ff0000">पढ़िए यह विशेष आलेख&#8230;</span></strong></p>
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<p>भारत की अध्यात्म प्रधान परंपरा में समय-समय पर ऐसी दिव्य आत्माओं का अवतरण हुआ है, जिन्होंने न केवल अपने आचरण, तपस्या और ज्ञान से धर्म को पुनः प्रतिष्ठित किया, बल्कि जनमानस को भी मोक्षमार्ग पर प्रेरित किया। ऐसे ही दो अप्रतिम रत्न जैन धर्म को प्राप्त हुए हैं — आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज और आर्यिका श्री ज्ञानमति माताजी। इन दोनों महान संतों का जन्म भारतीय पंचांग के अनुसार एक अत्यंत शुभ और आध्यात्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण तिथि — शरद पूर्णिमा के दिन हुआ था।</p>
<p>शरद पूर्णिमा भारतीय संस्कृति में न केवल चंद्रमा की पूर्णता का प्रतीक है, बल्कि यह रात्रि आध्यात्मिक ऊर्जा, साधना और चेतना के उच्चतम बिंदु को भी प्रकट करती है। यह संयोग अत्यंत महत्वपूर्ण है कि जैन धर्म के दो महान संतों ने इसी तिथि पर जन्म लेकर धर्म के गगन को आलोकित किया।</p>
<p>आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज का जन्म 10 अक्टूबर 1946 को कर्नाटक राज्य के बेलगांव जिले के सदलगा नामक ग्राम में हुआ था। उनका जन्म शरद पूर्णिमा के दिन हुआ, जिसे उनकी तपोमयी जीवन यात्रा की पृष्ठभूमि कहा जा सकता है। बाल्यकाल में उनका नाम विद्याधर था। पिता श्री मल्लप्पा और माता श्रीमती मालूबाई ने उन्हें धार्मिक संस्कारों से ओतप्रोत वातावरण में पाला। प्रारंभिक शिक्षा के दौरान ही विद्याधर में वैराग्य की भावना जागृत हो गई थी।</p>
<p>कम उम्र में ही सांसारिक मोह से विरक्ति लेकर उन्होंने संयम जीवन की ओर कदम बढ़ाया और वर्ष 1968 में आचार्य श्री वीरसागर जी महाराज से मुनि दीक्षा प्राप्त की। मात्र चार वर्षों में ही उनकी साधना और संयम से प्रभावित होकर वर्ष 1972 में उन्हें आचार्य पद प्रदान किया गया। आचार्य विद्यासागर जी ने जैन मुनि परंपरा में लुप्त हो चुकी कठोर तपस्या की विधियों को पुनर्जीवित किया। वे नंगे पैर, बिना किसी वाहन या सुविधा के वर्ष भर भारत के विभिन्न प्रदेशों में विहार करते थे। उनका संपूर्ण जीवन संयम, तप, और आत्मशुद्धि का प्रतिरूप रहा।</p>
<p>उन्होंने अपने जीवन में हजारों उपवास किए, जिनमें अठाई, मासखमण, उन्मूल व्रत जैसे कठोर तप सम्मिलित हैं। उनकी मौन साधना, ध्यान की स्थिति और आत्मानुशासन ऐसा उदाहरण प्रस्तुत करते हैं, जिसे देखकर साधारण व्यक्ति भी आत्मचिंतन के लिए प्रेरित हो जाता है। उनका उद्देश्य केवल आत्मकल्याण नहीं, अपितु समाज और धर्म का पुनरुद्धार भी रहा है।</p>
<p>आचार्य श्री की प्रेरणा से सैकड़ों युवक संयम मार्ग पर प्रवृत्त होकर मुनि, ऐलक, क्षुल्लक और आर्यिका दीक्षा ले चुके हैं। उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। संस्कृत और प्राकृत भाषा में गहरी पैठ रखने वाले आचार्यश्री ने अनेक काव्य रचनाएं की हैं, जिनमें भावना मंजरी, मुक्ति मार्ग, निष्ठा पंचम सूत्र जैसी कृतियां विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। उनके लिखे हुए पद और श्लोक आज विद्यार्थियों, तपस्वियों और श्रद्धालुओं के लिए पथप्रदर्शक बन चुके हैं।</p>
<p>देशभर में उनकी प्रेरणा से कई विद्यालय, तपस्थली, गुरुकुल, चिकित्सालय और गौशालाएं स्थापित हुई हैं। वे केवल धार्मिक ही नहीं, सामाजिक पुनरुत्थान के भी प्रवर्तक थे। उन्होंने लोगों को व्यसनमुक्त, नैतिक और संयमी जीवन जीने के लिए प्रेरित किया। वे कहते थे कि संयम, श्रम और स्वाध्याय ही आत्मकल्याण के मूल साधन हैं। छत्तीसगढ़ के डोंगरगढ़ स्थित चंद्रगिरी दिगंबर तीर्थ में आचार्य विद्यासागर जी महाराज का 18 फरवरी 2024 को देह त्याग हुआ ।</p>
<p>दूसरी ओर, आर्यिका श्री ज्ञानमति माताजी का जन्म 22 अक्टूबर 1934 को उत्तर प्रदेश के ग्राम टिकरी में हुआ था। यह तिथि भी शरद पूर्णिमा की ही थी, जो ज्ञान की पूर्णता और चंद्रमा की समग्रता की प्रतीक है। बाल्यकाल से ही वे विशेष प्रतिभा और आध्यात्मिक प्रवृत्ति की थीं। माता-पिता ने उन्हें संस्कारयुक्त वातावरण प्रदान किया। कम आयु में ही वे धार्मिक पुस्तकों की ओर आकर्षित हुईं और आत्मकल्याण की दिशा में चलने का निश्चय किया।</p>
<p>महज 14 वर्ष की आयु में उन्होंने ब्रह्मचर्य व्रत धारण किया और वर्ष 1952 में आर्यिका दीक्षा लेकर संयमित जीवन की ओर अग्रसर हुईं। ज्ञानमति माताजी का नाम उनके व्यक्तित्व के अनुरूप है — ज्ञान की साक्षात मूर्ति। उन्होंने जैन आगमों, तत्त्वज्ञान, जैन भूगोल, दर्शन, चरित्र ग्रंथों, तप और साधना पर आधारित 300 से अधिक ग्रंथों की रचना की। उनकी लेखनी ने न केवल लुप्तप्राय जैन ग्रंथों को पुनर्जीवित किया, बल्कि उन्होंने आगम की गूढ़ता को जनमानस के लिए सरल भाषा में प्रस्तुत किया।</p>
<p>ज्ञानमति माताजी का सबसे प्रसिद्ध योगदान जम्बूद्वीप की रचना है। हस्तिनापुर स्थित इस दिव्य और भव्य रचना में उन्होंने जैन भूगोल को भौतिक स्वरूप प्रदान किया। यह रचना केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि वैज्ञानिक और स्थापत्य दृष्टिकोण से भी अद्वितीय है। जम्बूद्वीप मॉडल के माध्यम से उन्होंने लोगों को यह समझाने का प्रयास किया कि धर्म केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं, बल्कि उसका आधार ब्रह्मांड के संचालन से जुड़ा हुआ है।</p>
<p>इसके अतिरिक्त उन्होंने हस्तिनापुर में जैन सिद्ध क्षेत्र, महिला तपस्विनी प्रशिक्षण केंद्र, विद्या धर्म तीर्थ, और ज्ञानमती प्रकाशन जैसे अनेक संस्थानों की स्थापना की। उनके निर्देशन में सैकड़ों बालिकाएँ और महिलाएँ संयम जीवन की ओर प्रवृत्त हुईं। उन्होंने नारी शक्ति को धर्म के प्रचार में नई दिशा दी।</p>
<p>ज्ञानमति माताजी ने जीवन भर केवल लेखन ही नहीं, बल्कि तप, ध्यान और साधना की भी गहरी निष्ठा से साधना की। उन्होंने जीवन के अंतिम वर्षों तक भी प्रवचन, ग्रंथ लेखन और तीर्थ विकास का कार्य पूरी लगन से किया। उनका जीवन एक जीवंत उदाहरण है कि ज्ञान और साधना का संगम कैसे समाज में धर्म का दीपक जलाता है।</p>
<p>जब हम इन दोनों संतों की तुलना करते हैं, तो पाते हैं कि उनके जीवन में कई समानताएँ हैं। दोनों का जन्म शरद पूर्णिमा के दिन हुआ — एक चंद्रमा की पूर्णता का दिन, जो भारतीय संस्कृति में सौंदर्य, शांति और ज्ञान का प्रतीक है। दोनों ने बचपन से ही वैराग्य और धर्म की ओर झुकाव दिखाया। दोनों ने संयम मार्ग अपनाया और असाधारण रूप से कठोर जीवन जिया। दोनों ने अपने-अपने क्षेत्रों में — आचार्यश्री ने तप और चरित्र में, और माताजी ने ज्ञान और सेवा में — अप्रतिम योगदान दिया।</p>
<p>इन दोनों महापुरुषों का जीवन आज के भौतिकवादी युग में एक प्रेरणास्त्रोत है। जहाँ एक ओर आचार्यश्री का जीवन संयम, तप और आत्मशुद्धि की ओर प्रेरित करता है, वहीं ज्ञानमति माताजी का जीवन ज्ञान, साधना और धर्म प्रचार की प्रेरणा देता है। ये दोनों उदाहरण सिद्ध करते हैं कि मोक्षमार्ग केवल सैद्धांतिक विषय नहीं, अपितु उसे व्यावहारिक रूप से जीया जा सकता है।</p>
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		<title>विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी का सम्मान कर मांग पत्र सौंपा: विशेष आलोचना सभा में समाजजनों ने नांदणी मठ की हथिनी को वापस सौंपने की मांग की  </title>
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		<pubDate>Wed, 06 Aug 2025 11:02:24 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[राजस्थान विधानसभा पर एक विशेष आलोचना सभा का आयोजन किया गया। इसमें विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी एवं समग्र जैन समाज भारत के राष्ट्रीय अध्यक्ष साहिल जैन, राजस्थान से जैन समाज प्रतिनिधि धर्मेंद्र जैन, पवन जैन, प्रतीक जैन की गरिमामय उपस्थिति रही। जयपुर से पढ़िए, यह खबर&#8230; जयपुर। राजस्थान विधानसभा पर एक विशेष आलोचना सभा का [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>राजस्थान विधानसभा पर एक विशेष आलोचना सभा का आयोजन किया गया। इसमें विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी एवं समग्र जैन समाज भारत के राष्ट्रीय अध्यक्ष साहिल जैन, राजस्थान से जैन समाज प्रतिनिधि धर्मेंद्र जैन, पवन जैन, प्रतीक जैन की गरिमामय उपस्थिति रही। <span style="color: #ff0000">जयपुर से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>जयपुर।</strong> राजस्थान विधानसभा पर एक विशेष आलोचना सभा का आयोजन किया गया। इसमें विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी एवं समग्र जैन समाज भारत के राष्ट्रीय अध्यक्ष साहिल जैन, राजस्थान से जैन समाज प्रतिनिधि धर्मेंद्र जैन, पवन जैन, प्रतीक जैन की गरिमामय उपस्थिति रही। सभा का शुभारंभ विधानसभा अध्यक्ष देवनानी का सम्मान पगड़ी, पटका माला पहनाकर किया गया। आचार्य श्री विद्यासागर महाराज की महायात्रा पुस्तक, आचार्य श्री प्रमुख सागर जी महाराज की आशीर्वाद स्वरूप जीवन परिचय पुस्तक एवं मुनि श्री आदित्य सागर जी महाराज द्वारा लिखित आध्यात्मिक प्रबंध पुस्तक देवनानी को भेंट की गई।</p>
<p>समाजजनों ने उन्हें सम्मानित किया गया। सभा में विधानसभा अध्यक्ष को राजस्थान में चतुर्मास के लिए मंगल प्रवास में मुनिश्री आदित्य सागर महाराज जी को राज्य तिथि का दर्जा दिए जाने और महाराष्ट्र के नांदणी मठ में रहने वाली हथिनी की वापसी एवं जैन साधु-संतोंकी सुरक्षा के लिए राष्ट्रपति के नाम मांग पत्र भी दिया।</p>
<p>इसके अतिरिक्त कई महत्वपूर्ण विषय पर भी अध्यक्ष वासुदेव देवनानी चर्चा हुई और उन्होंने भी सभी बातों को बड़ी ही गंभीरता से सुना और सहयोग का आश्वासन भी दिया। सभा के समापन पर विधानसभा अध्यक्ष देवनानी द्वारा आशीष वचन संदेश में समग्र जैन समाज भारत के राष्ट्रीय अध्यक्ष साहिल जैन को समग्र जैन समाज भारत संघ के किए जाने वाले कार्य समाज सेवा, धार्मिक आयोजन आदि कार्य के लिए साधुवाद दिया गया। यह बैठक सामाजिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण थी।</p>
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		<title>त्याग, तप और तपस्या की प्रेरणास्रोत हैं आर्यिका पूर्णमति माताजी : जिनवाणी के स्वर में बहती है आत्मा की पुकार </title>
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		<pubDate>Wed, 30 Jul 2025 08:43:15 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आर्यिका श्री पूर्णमति माताजी का जीवन जैन समाज ही नहीं, सम्पूर्ण भारतीय सांस्कृतिक परंपरा के लिए आदर्श है। वे बताती हैं कि धर्म केवल व्रत और विधान का नाम नहीं, बल्कि आत्मा की परख और अंतरतम से जुड़ने की साधना है। उनके जीवन की सबसे बड़ी सीख यह है कि त्याग में ही सच्चा उत्थान [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आर्यिका श्री पूर्णमति माताजी का जीवन जैन समाज ही नहीं, सम्पूर्ण भारतीय सांस्कृतिक परंपरा के लिए आदर्श है। वे बताती हैं कि धर्म केवल व्रत और विधान का नाम नहीं, बल्कि आत्मा की परख और अंतरतम से जुड़ने की साधना है। उनके जीवन की सबसे बड़ी सीख यह है कि त्याग में ही सच्चा उत्थान है, और सेवा में ही आत्मकल्याण। <span style="color: #ff0000">पढ़िए उनके दीक्षा दिवस पर यह विशेष रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p>जब कोई बालिका छह वर्ष की उम्र में सांसारिक मोह से विरक्त होकर ब्रह्मचर्य की राह पकड़ लेती है, तो यह सामान्य घटना नहीं होती। और जब वही बालिका वर्षों की साधना और आत्मिक अनुशासन से तपस्वी संत के रूप में समाज को नई दिशा देने लगे, तो वह बन जाती है श्रद्धा, शक्ति और समर्पण की प्रतीक। ऐसी ही प्रेरणास्रोत हैं—आर्यिका श्री पूर्णमति माताजी, जिनका जीवन तप, सेवा, शिक्षा, साहित्य और धर्म-प्रभावना का एक अद्वितीय समुच्चय है।</p>
<p><strong>डूंगरपुर से दीक्षा तक: एक साधना यात्रा</strong></p>
<p>आर्यिका पूर्णमति माताजी का जन्म 14 मई 1964 को राजस्थान के डूंगरपुर जिले में हुआ। उनके गृहस्थ जीवन के माता-पिता का नाम अमृतलाल जैन और रुक्मिणी देवी था। बचपन से ही धार्मिक प्रवृत्ति और आत्मिक झुकाव उनके स्वभाव में स्पष्ट दिखाई देता था। मात्र छह वर्ष की उम्र में उन्होंने ब्रह्मचर्य व्रत धारण कर लिया, और 7 अगस्त 1989 में मध्यप्रदेश के कुंडलपुर में आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज से दीक्षा प्राप्त कर ‘पूर्णमति’ नाम धारण किया। दीक्षा तिथि हिंदी माह के हिसाब से श्रावण मास की शुक्ल पक्ष की षष्ठी थी। पूर्णमति नाम उनके जीवन की दिशा और साधना के शिखर को दर्शाता है।</p>
<p><strong>तप, त्याग और साधना का प्रतिमान</strong></p>
<p>आर्यिका माताजी का संपूर्ण जीवन जैन मुनि परंपरा की मर्यादाओं का कठोर पालन करते हुए बीता है। उनके दैनिक जीवन में संयम, स्वावलंबन और मौन की साधना प्रमुख रही है। वे न केवल एक साधिका हैं, बल्कि प्रवचन की ओजस्विनी वक्ता भी हैं, जिनकी वाणी श्रोताओं के मन में धर्म के प्रति गहन आस्था और आत्मपरिवर्तन की प्रेरणा जगाती है।</p>
<p><strong>साहित्य की साधिका: सरलता में छिपा दर्शन</strong></p>
<p>पूर्णमति माताजी का साहित्यिक योगदान उल्लेखनीय है। उन्होंने कई स्तुतिपाठ, विधान और ग्रंथों की रचना की है जिनमें प्रमुख हैं:</p>
<p><strong>-कुंडलपुर बड़े बाबा विधान</strong></p>
<p>-श्री शांतिनाथ विधान</p>
<p>-श्री पंचपरमेष्ठी विधान</p>
<p>-भक्तामर स्तोत्र, सहस्त्रनाम, एकीभाव, आत्मबोध शतक, मूक माटी शृंखला इत्यादि।</p>
<p>इन रचनाओं की भाषा अत्यंत सरल, भावप्रधान और धर्म-तत्वों से युक्त है, जो जटिल जैन दर्शन को भी सामान्य जनमानस तक पहुँचा देती हैं।</p>
<p><strong>तीर्थ, धर्म और संस्कृति की वास्तुकार</strong></p>
<p>प्रवचन और प्रेरणा का स्रोत</p>
<p>माताजी की प्रवचन शैली संयमित, सहज और विचारोत्तेजक है। वे मानव जीवन में संयम, क्षमा, अहिंसा और सादगी को सर्वोच्च मूल्य के रूप में प्रस्तुत करती हैं। उनका एक प्रमुख संदेश है—&#8221;धर्म केवल मंदिर की चौखट तक सीमित न रहे, बल्कि जीवन की हर साँस में समाया हो।&#8221;</p>
<p>उनके प्रवचनों में आत्मा का स्वर है, और भजनों में भक्ति की लय। YouTube व सोशल मीडिया पर उनके कई प्रवचन और भजन आज भी लाखों लोगों की साधना का आधार हैं।</p>
<p><strong>संघ निर्माण और चातुर्मास परंपरा</strong></p>
<p>माताजी का ससंघ देशभर के अनेक क्षेत्रों में चातुर्मास करता रहा है। उन्होंने धार्मिक आयोजनों, ज्ञानगोष्ठियों और तप-प्रवृत्तियों के माध्यम से हजारों जिज्ञासुओं को मार्गदर्शन दिया है। उनके संघ में कई आर्यिकाएँ व आर्यिकाओं के शिष्य-शिष्याएं सक्रिय साधना में लगे हैं, जो समाज में संयम, सेवा और स्वावलंबन का संदेश फैला रहे हैं।</p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में उनकी आवश्यकता</strong></p>
<p>आज जब समाज भौतिकता की दौड़ में आत्म-संवाद खो चुका है, ऐसे समय में आर्यिका पूर्णमति माताजी जैसे तपस्वियों की आवश्यकता और प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है। वे केवल धार्मिक चेहरा नहीं, बल्कि उस आत्मिक चेतना की प्रतिनिधि हैं जो जीवन को भीतर से उजासित करती है।</p>
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		<title>मुनिश्री विलोकसागर बोले- जहां एकता, भक्ति और समर्पण वहीं चातुर्मास: धर्मसभा में भक्ति और समर्पण को बताया श्रेष्ठ  </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/munishree_viloksagar_said_where_there_is_unity_devotion_and_dedication_there_is_chaturmas/</link>
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		<pubDate>Sun, 29 Jun 2025 13:53:36 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री विद्यासागर महाराज का दीक्षा दिवस श्री महावीर दिगंबर जैन नसियाजी मंदिर में 30 जून को प्रातः 7.30 बजे से मनाया जाएगा। सभी भक्तगण अष्टदृव्य से आचार्य श्री का पूजन करेंगे। गुणानुवाद सभा भी होगी। मुनिराजश्री विलोकसागर एवं मुनिश्री विबोध सागर महाराज रविवार को नसियाजी जैन मंदिर पहुंचे। मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य श्री विद्यासागर महाराज का दीक्षा दिवस श्री महावीर दिगंबर जैन नसियाजी मंदिर में 30 जून को प्रातः 7.30 बजे से मनाया जाएगा। सभी भक्तगण अष्टदृव्य से आचार्य श्री का पूजन करेंगे। गुणानुवाद सभा भी होगी। मुनिराजश्री विलोकसागर एवं मुनिश्री विबोध सागर महाराज रविवार को नसियाजी जैन मंदिर पहुंचे। <span style="color: #ff0000">मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना।</strong> साधु संत किसी समाज की या व्यक्ति विशेष की संपत्ति नहीं होते। वे तो अविरल जल धारा की तरह होते हैं। साधु संतों के खासकर, दिगंबर साधुओं के कोई मठ या कोई निश्चित निवास नहीं होते। वे तो निरंतर पद विहार करते हुए धर्म प्रभावना करते हैं। दिगम्बर संत जहां भी भक्तों की भक्ति, समर्पण और समाज की एकता देखते हैं, वहीं अल्प प्रवास पर स्व कल्याण और प्राणी मात्र के कल्याण के लिए धर्म प्रभावना करते हैं। यह उद्गार मुनिश्री विलोकसागर महाराज ने नसिया जी जैन मंदिर में धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि केवल श्रीफल भेंट करने से चातुर्मास नहीं हुआ करते। चातुर्मास कराने के लिए भक्ति, समर्पण के साथ-साथ सामाजिक एकता का होना अति आवश्यक होता है। सामाजिक एकता के अभाव में कराया गया चातुर्मास सार्थक परिणाम नहीं देगा। हमारा भी चातुर्मास वहीं होगा, जहां की समाज में एकता होगी, भक्ति होगी और समर्पण होगा। मुनिश्री ने चातुर्मास के संबंध में कहा कि चातुर्मास के चार माह मन को पावन और पवित्र बनाने का समय होता है। बिखरे हुए समाज में ये सब होना संभव दिखाई नहीं पड़ता। अभी भी समय है, जाग जाओ, अन्यथा कहीं ऐसा न हो कि बाद में आपको पछताना पड़े।</p>
<p><strong>चित्र अनावरण और पाद प्रक्षालन किया </strong></p>
<p>धर्मसभा के प्रारंभ में आचार्यश्री विद्यासागर के चित्र का अनावरण जैन मित्र मंडल द्वारा एवं दीप प्रज्वलन फाटक बाहर जैन समाज के श्रावक श्रेष्ठियों द्वारा किया गया। मुनिराजों के पाद प्रक्षालन का सौभाग्य वीरेंद्रकुमार जितेंद्रकुमार जैन एवं शास्त्र भेंट का सौभाग्य रमाशंकर जैन, पदमचंद जैन तथा जैन मित्र मंडल को प्राप्त हुआ। मुनिराजों की आहारचर्या पवनकुमार ऋषभ जैन एवं पदमचंद गौरव जैन के यहां हुई।</p>
<p><strong>नसियाजी में होगा आचार्यश्री का दीक्षा दिवस समारोह</strong></p>
<p>श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान के मुख्य संयोजक अनूप जैन भंडारी ने बताया कि आचार्य श्री विद्यासागर महाराज का दीक्षा दिवस श्री महावीर दिगंबर जैन नसियांजी मंदिर में 30 जून को प्रातः 7.30 बजे से मनाया जाएगा। सभी भक्तगण अष्टदृव्य से आचार्य श्री का पूजन करेंगे। इस पावन अवसर पर गुणानुवाद सभा भी होगी। समारोह को सानिध्य प्रदान करने के लिए मुनिराजश्री विलोकसागर एवं मुनिश्री विबोध सागर महाराज रविवार को नसियाजी जैन मंदिर पहुंचे। नसिया जी में महिलाओं ने सिर पर मंगल कलश रखकर, मंगलगीत गाते हुए मुनियों की अगवानी की। नसिया जी में रविवार को प्रातः प्रवचन एवं आहारचर्या हुई। आज प्रातः आचार्य विद्यासागर दीक्षा दिवस महोत्सव के उपलक्ष्य में गुणानुवाद सभा भी होगी।</p>
<p><strong>विहार के दौरान यह रहे मौजूद </strong></p>
<p>बड़े जैन मंदिर से नसियां जी जैन मंदिर लाने एवं ले जाने के समय जैन मित्र मंडल के सदस्यों का सहयोग सराहनीय रहा। विहार के समय जैन मित्र मंडल के मुख्य संयोजक सतेंद्र जैन खनेता, एडवोकेट धर्मेंद्र जैन, रविकांत जैन रिंकू, विमल जैन राजाखेड़ा, अशोक जैन मेडिकल, नितिन जैन बघपुरा, नरेश जैन टिल्लू, सुनील जैन, पंकज जैन, महेश जैन, विकास जैन, वीरेंद्र जैन, राजकुमार जैन, सुनीत जैन, प्रशांत जैन, शैलेन्द्र जैन, डॉक्टर मनोज जैन, डॉक्टर सतेंद्र जैन, प्रकाश जैन, पारस जैन सहित सैकड़ों की संख्या में साधर्मी बंधु उपस्थित थे।</p>
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		<title>अतिशय तीर्थ पार्ट 39 प्राकृतिक सौंदर्य और आध्यात्मिक शांति का अद्वितीय संगम यह तीर्थ क्षेत्र आचार्य विद्यासागर जी महाराज के मार्गदर्शन में हुआ था इस मंदिर का निर्माण </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Rekha Jain]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 14 Jun 2025 23:30:04 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन अतिशय क्षेत्र जैन धर्म के अत्यंत महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल हैं। इन क्षेत्रों में जैन धर्म के भगवान महावीर और उनके पूर्वकल्याणकारक जिनेन्द्र देव के आध्यात्मिक लीलाओं के अतिशय (अद्भुत) घटनाएं मान्यता प्राप्त हैं। इन स्थलों पर जैन समुदाय के श्रद्धालु भक्तिभाव से पूजा-अर्चना करते हैं और ध्यान धरते हैं। भारत के कुछ अतिशय क्षेत्रों [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>जैन अतिशय क्षेत्र जैन धर्म के अत्यंत महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल हैं। इन क्षेत्रों में जैन धर्म के भगवान महावीर और उनके पूर्वकल्याणकारक जिनेन्द्र देव के आध्यात्मिक लीलाओं के अतिशय (अद्भुत) घटनाएं मान्यता प्राप्त हैं। इन स्थलों पर जैन समुदाय के श्रद्धालु भक्तिभाव से पूजा-अर्चना करते हैं और ध्यान धरते हैं। भारत के कुछ अतिशय क्षेत्रों की जानकारी दे रही हैं <strong><span style="color: #ff0000">श्रीफल जैन न्यूज की संपादक रेखा जैन। इसकी 39वीं कड़ी में आज पढ़िए मध्यप्रदेश के श्री दिगंबर जैन सर्वोदय तीर्थ, अमरकंटक के बारे में &#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone size-large wp-image-83035" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/06/IMG-20250614-WA0190-812x1024.jpg" alt="" width="812" height="1024" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/06/IMG-20250614-WA0190-812x1024.jpg 812w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/06/IMG-20250614-WA0190-238x300.jpg 238w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/06/IMG-20250614-WA0190-768x968.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/06/IMG-20250614-WA0190.jpg 990w" sizes="(max-width: 812px) 100vw, 812px" /><img decoding="async" class="alignnone size-large wp-image-83036" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/06/IMG-20250614-WA0187-883x1024.jpg" alt="" width="883" height="1024" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/06/IMG-20250614-WA0187-883x1024.jpg 883w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/06/IMG-20250614-WA0187-259x300.jpg 259w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/06/IMG-20250614-WA0187-768x891.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/06/IMG-20250614-WA0187.jpg 990w" sizes="(max-width: 883px) 100vw, 883px" /><img decoding="async" class="alignnone size-large wp-image-83037" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/06/IMG-20250614-WA0193-664x1024.jpg" alt="" width="664" height="1024" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/06/IMG-20250614-WA0193-664x1024.jpg 664w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/06/IMG-20250614-WA0193-195x300.jpg 195w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/06/IMG-20250614-WA0193-768x1184.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/06/IMG-20250614-WA0193.jpg 990w" sizes="(max-width: 664px) 100vw, 664px" /><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-large wp-image-83038" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/06/IMG-20250614-WA0192-745x1024.jpg" alt="" width="745" height="1024" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/06/IMG-20250614-WA0192-745x1024.jpg 745w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/06/IMG-20250614-WA0192-218x300.jpg 218w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/06/IMG-20250614-WA0192-768x1056.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/06/IMG-20250614-WA0192.jpg 990w" sizes="auto, (max-width: 745px) 100vw, 745px" /><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-large wp-image-83040" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/06/IMG-20250614-WA0191-497x1024.jpg" alt="" width="497" height="1024" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/06/IMG-20250614-WA0191-497x1024.jpg 497w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/06/IMG-20250614-WA0191-146x300.jpg 146w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/06/IMG-20250614-WA0191-768x1581.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/06/IMG-20250614-WA0191-746x1536.jpg 746w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/06/IMG-20250614-WA0191.jpg 777w" sizes="auto, (max-width: 497px) 100vw, 497px" /><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-large wp-image-83041" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/06/IMG-20250614-WA0189-476x1024.jpg" alt="" width="476" height="1024" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/06/IMG-20250614-WA0189-476x1024.jpg 476w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/06/IMG-20250614-WA0189-140x300.jpg 140w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/06/IMG-20250614-WA0189-714x1536.jpg 714w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/06/IMG-20250614-WA0189.jpg 744w" sizes="auto, (max-width: 476px) 100vw, 476px" /><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-large wp-image-83039" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/06/IMG-20250614-WA0186-678x1024.jpg" alt="" width="678" height="1024" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/06/IMG-20250614-WA0186-678x1024.jpg 678w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/06/IMG-20250614-WA0186-199x300.jpg 199w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/06/IMG-20250614-WA0186-768x1160.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/06/IMG-20250614-WA0186.jpg 990w" sizes="auto, (max-width: 678px) 100vw, 678px" /></p>
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		<title>मूक माटी अर्थज्ञान एवं शिक्षण शिविर के प्रति उत्साह:  बच्चों को धार्मिक अध्ययन के साथ क्रॉफ्ट आर्ट का भी प्रशिक्षण </title>
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		<pubDate>Wed, 21 May 2025 05:02:22 +0000</pubDate>
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<p><strong>नगर में मूक माटी अर्थज्ञान एवं शिक्षण शिविर लगाया गया है। यह 17 मई से चल रहा है। जिसका समापन 26 मई को होगा। शिविर में अध्ययन करने के लिए बच्चों के साथ हर वर्ग उत्साह से भाग ले रहा है। इस शिविर का पूरा नगर के प्रशांत जैन आचार्य एवं आकाश जैन आचार्य कर रहे हैं। <span style="color: #ff0000">रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>रामगंजमंडी।</strong> नगर में मूक माटी अर्थज्ञान एवं शिक्षण शिविर लगाया गया है। यह 17 मई से चल रहा है। जिसका समापन 26 मई को होगा। शिविर में अध्ययन करने के लिए बच्चों के साथ हर वर्ग उत्साह से भाग ले रहा है। इस शिविर का पूरा नगर के प्रशांत जैन आचार्य एवं आकाश जैन आचार्य कर रहे हैं। शिविर संयोजक श्री आकाश जैन आचार्य ने बताया कि 17 मई से शुरू हुए शिविर में उमंग उत्साह देखने को मिल रहा है। शिविर में 300 से अधिक शिविरार्थी भाग ले रहे हैं। इस शिविर में श्रमण संस्कृति संस्थान सांगानेर से आए विनोद जैन, हेमंत जैन, मनोज जैन आदि सभी को धार्मिक अध्ययन करा रहे हैं। साथ ही विनोद जैन आचार्य द्वारा प्रतिदिन आचार्य श्री विद्यासागर महाराज की अनुपम जीवंत कृति मूक माटी महाकाव्य का अध्ययन कराया जा रहा है। प्रशांत जैन आचार्य ने बताया कि बच्चों को भी धार्मिक अध्ययन कराया जा रहा है। जिसमें बच्चे बढ़-चढ़कर भाग ले रहे हैं। छोटे-छोटे बच्चों को आर्ट एवं क्रॉफ्ट सिखाया जा रहा है। जिसका प्रशिक्षण रक्षिता जैन लुहाड़िया एवं स्वाति जैन बागड़िया दे रही हैं। प्रशांत जैन ने बताया कि बच्चों को धर्म अध्ययन के साथ खेलकूद भी कराया जा रहा है। सोमवार को म्यूजिकल चेयर रेस का आयोजन किया गया।</p>
<p><strong>दया और करुणा की राह जीवन जिलाती है</strong><br />
सोमवार रात में विनोद जैन आचार्य ने मूक माटी महाकाव्य का अध्ययन कराते हुए कहा कि वासना की राह जीवन को भटकाने वाली होती है और जीवन को जलाती है। वहीं दया और करुणा की राह जीवन जिलाती है और मोक्ष की ओर ले जानी वाली होती है। जीवन में दया करुणा आनी चाहिए। दया जब आती हैं, जब मोह कम होता है। वासना सीमित होती है। करुणा असीमित होती है। मोह में अंधा व्यक्ति करुणा और वासना को एक मानता है। उन्होंने कहा माटी के भीतर अनुकंपा होती है। वह परस्परो ग्रहों जीवानाम के साथ कार्य करने की सीख देती है।</p>
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		<title>आचार्य श्री के प्रथम समाधि दिवस पर विशेष : गुरुवर की अप्रतिम मुस्कान से मुरझाए चेहरे भी खिल-खिल जाते </title>
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		<pubDate>Sat, 08 Feb 2025 10:38:30 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज, एक महान जैन आचार्य और दिव्य तत्वज्ञानी थे, जिन्होंने भारतीय समाज में अहिंसा, सत्य, और आत्मकल्याण के मार्ग को फैलाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। वे विशेष रूप से अपनी अद्वितीय साधना, गहन ज्ञान और साध्वी-वचनबद्धता के लिए प्रसिद्ध हैं। उनका जीवन और कार्य एक प्रेरणा है जो लाखों अनुयायियों को [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज, एक महान जैन आचार्य और दिव्य तत्वज्ञानी थे, जिन्होंने भारतीय समाज में अहिंसा, सत्य, और आत्मकल्याण के मार्ग को फैलाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। वे विशेष रूप से अपनी अद्वितीय साधना, गहन ज्ञान और साध्वी-वचनबद्धता के लिए प्रसिद्ध हैं। उनका जीवन और कार्य एक प्रेरणा है जो लाखों अनुयायियों को धर्म और आत्मा की सही राह दिखाता है। <span style="color: #ff0000">पढ़िए स्वप्निल जैन का विशेष आलेख</span></strong></p>
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<p><strong>इंदौर</strong>।एक आत्मदर्शन, आत्मचिंतन, और आत्मकल्याण का भाव धारण किए हुए साधक, जिनकी अप्रतिम मुस्कान ने न जाने कितने जीवों का कल्याण किया। और जिन्होंने समाधि धारण करके मृत्यु को भी पराजित कर दिया। हम धन्य हैं कि हमने आचार्य श्री विद्यासागर के युग में जन्म लिया।</p>
<p>आचार्य श्री जाते-जाते नश्वर देह का उपदेश देकर समस्त संसार को आत्मदर्शन करवा गए। जाना सभी को एक दिन है, परंतु एक वीतरागी होकर समाधि मरण द्वारा मृत्यु को महोत्सव बनाने का दर्शन ही असली भारतीय दर्शन है, जो आत्मा को मोक्ष मार्ग पर ले जाने का मार्ग भी दर्शाता है।</p>
<p><strong>&#8220;जिंदगी समझ नहीं आई तो मेले में अकेला, समझ आ गई तो अकेले में मेला।&#8221;</strong></p>
<p>आचार्य श्री के समाधि मरण के पश्चात यह बात समस्त संसार को समझ में आ गई। आपने एकांत रूपी आत्मदर्शन और मोक्ष मार्ग की यात्रा को सिद्धों के मेले के रूप में चुना। मोक्ष प्राप्ति हेतु सिद्ध शिला को चुना। भारत के दर्शन को जो उन्होंने समझाया, वह हमारे लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।</p>
<p>आचार्य श्री विद्यासागर के युग में उनके द्वारा आध्यात्मिक चेतना के माध्यम से जो अलख जगी है, उससे अध्यात्म की राह पर चलने वाले लोग अछूते नहीं रह सकते। आचार्य श्री का आभामंडल इतना विशाल था कि उसके चुंबकीय प्रभाव में हर कोई खींचा चला जाता था। एक बार जो उन्हें देख लेता, वह देखता ही रह जाता था, जैसे अब मन के सारे सवालों के उत्तर मिल गए हों। यह आध्यात्मिक अनुभूति लाखों अनुयायियों ने महसूस की है। आचार्य श्री के समाधि के पश्चात वह आभामंडल अब उनके आशीर्वाद स्वरूप मौजूद है, और उनके अनुयायियों को धर्म की राह पर चलने के लिए सतत मार्गदर्शन प्रदान कर रहा है।</p>
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