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	<title>आचार्य श्री वर्द्धमान सागर जी महाराज &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<title>आचार्य श्री वर्द्धमान सागर जी महाराज &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>जयपुर के सुरेश शाह 20 अप्रैल को मंदसौर में दीक्षा लेंगे: परिजनों ने विभिन्न नगरों में किया अभिनंदन  </title>
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		<pubDate>Sun, 13 Apr 2025 13:49:35 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जयपुर के सुरेश शाह 20 अप्रैल को आचार्य श्री वर्द्धमान सागर जी महाराज के कर कमलों से मंदसौर में दीक्षा लेंगे। परिजनों द्वारा अभिनंदन कर श्रीफल, सूखे मेवे फल आदि से गोद छोल भरकर शॉल श्रीफल माला से अभिनंदन कर वैराग्य भावों की अनुमोदना की गई। जयपुर से पढ़िए राजेश पंचोलिया से यह खबर&#8230; जयपुर। [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जयपुर के सुरेश शाह 20 अप्रैल को आचार्य श्री वर्द्धमान सागर जी महाराज के कर कमलों से मंदसौर में दीक्षा लेंगे। परिजनों द्वारा अभिनंदन कर श्रीफल, सूखे मेवे फल आदि से गोद छोल भरकर शॉल श्रीफल माला से अभिनंदन कर वैराग्य भावों की अनुमोदना की गई। <span style="color: #ff0000">जयपुर से पढ़िए राजेश पंचोलिया से यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>जयपुर।</strong> नगर के गौरव 75 वर्षीय भरे-पूरे परिवार के सन 1950 में जन्मे सुरेश शाह 20 अप्रैल को आचार्य श्री वर्द्धमान सागर जी महाराज के कर कमलों से मंदसौर में दीक्षा लेंगे। कपूरी देवी रतनलाल के पुत्र दीक्षार्थी सुरेशचंद शाह, मालवीय नगर, जयपुर (मुनि श्री हितेंद्र सागरजी महाराज के गृहस्थ अवस्था के पिताजी) की 13 अप्रैल को मालवीय नगर, शास्त्री नगर, श्याम नगर, सूर्य नगर, मानसरोवर, सांगानेर जैन मंदिर सहित अनेक मंदिरों, निवाई में बोली नगर आदि में परिजनों द्वारा अभिनंदन कर श्रीफल, सूखे मेवे फल आदि से गोद छोल भरकर शॉल श्रीफल माला से अभिनंदन कर वैराग्य भावों की अनुमोदना की गई।</p>
<p>रत्नत्रय के प्रतीक तीसरे पुत्र श्री महेंद्र ने बाल ब्रह्मचारी होकर आचार्य श्री वर्धमान सागर जी से वर्ष 2006 में पहले क्षुल्लक फिर वर्ष 2009 में मुनि दीक्षा ग्रहण कर मुनि श्री हितेंद्र सागर जी के रूप में धर्म प्रभावना कर रहे हैं। संसार में रचे-बसे गृहस्थ द्वारा दीक्षा लेना प्रशंसनीय है।</p>
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		<title>आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने पारसोला में दी आर्यिका दीक्षाः आर्यिका दीक्षा उपरांत नूतन नाम हुआ श्री जिनेश मति  </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 05 Dec 2024 13:14:43 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[पारसोला में गुरुवार को हुए दीक्षा समारोह में विमला देवी आर्यिका श्री जिनेश मति हुईं। आचार्य श्री वद्धमान सागर जी महाराज ने दीक्षा संपन्न करवाई। इस अवसर पर विविध कार्यक्रमों में समाजजन और दीक्षार्थी परिवार मौजूद थे। पढ़िए पारसोला से यह खबर&#8230; पारसोला। प्रथमाचार्य चारित्र चक्रवती आचार्य श्री शांतिसागरजी की अक्षुण्ण मूल बाल ब्रह्मचारी पट्ट [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>पारसोला में गुरुवार को हुए दीक्षा समारोह में विमला देवी आर्यिका श्री जिनेश मति हुईं। आचार्य श्री वद्धमान सागर जी महाराज ने दीक्षा संपन्न करवाई। इस अवसर पर विविध कार्यक्रमों में समाजजन और दीक्षार्थी परिवार मौजूद थे। <span style="color: #ff0000">पढ़िए पारसोला से यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>पारसोला</strong>। प्रथमाचार्य चारित्र चक्रवती आचार्य श्री शांतिसागरजी की अक्षुण्ण मूल बाल ब्रह्मचारी पट्ट परंपरा के पंचम पट्टाधीश वात्सल्य वारिधि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी वर्ष 2024 का वर्षायोग पूर्णकर पारसोला में विराजित है। 5 दिसंबर को विमला  देवी गुवाहाटी असम आर्यिका श्री जिनेश मति बनी। श्रीमद् जैन धर्म की यही विशेषता है कि इस धर्म में सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान, सम्यक चारित्र को धारण कर सिद्ध अवस्था को प्राप्त किया जा सकता है। सम्यक दर्शन और सम्यक ज्ञान के बाद चारित्र अर्थात साधु जीवन अपनाना जरूरी है।</p>
<p><strong>चर्या में परिवर्तन ही दीक्षा</strong></p>
<p>चर्या में परिवर्तन करना ही दीक्षा है, संसार की दौड़ से दूर होना दीक्षा है। संसारी प्राणी इच्छाओं से ग्रसित है, संसार रुलाता है। दीक्षा लेकर शिष्य को  गुरुसंगति में रहना चाहिए। जैन धर्म तीर्थंकर भगवान प्रतिपादित, अनुमोदित, धारित श्रमण धर्म है। प्रथमाचार्य श्री शांति सागर जी महाराज ने अपने संयम पुरुषार्थ से श्रमण परंपरा को पुनर्स्थापित किया। उत्तर भारत में चातुर्मास कर धर्म प्रभावना, धर्म जागृति और सुप्त हो रही समाज को जागृत किया।</p>
<p><strong>गुरु के प्रति कृतज्ञता से साधना में सफलता मिलती है</strong></p>
<p>शिष्य को दीक्षा लेकर गुरु के प्रति कृतज्ञता को दिल में समर्पण भाव के साथ धारण करने से साधना में सफलता मिलती है। यह धर्म देशना आचार्य वर्धमान सागर जी ने दीक्षा के अवसर पर प्रकट की। राजेश पंचोलिया अनुसार आचार्य श्री ने उपदेश में बताया कि यह संसार प्रतिकूल है संयम से संसार को अनुकूल बनाया जाता है और इंद्रियों की दासता दूर की जाती है।</p>
<p><strong>ख्याति, नाम, यश, पूजा से दूर रहना चाहिए</strong></p>
<p>शिष्य को गुरु को अपना जीवन समर्पित करना चाहिए। ख्याति, नाम, यश, पूजा से दूर रहना चाहिए। साधु अपने जीवन में मृत्यु से भयभीत नहीं होता है। साधु जीवन में साधना के बल पर मृत्यु पर विजय प्राप्त करता है।</p>
<p><strong><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-70722" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/12/IMG-20241205-WA0040-scaled.jpg" alt="" width="1160" height="2560" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/12/IMG-20241205-WA0040-scaled.jpg 1160w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/12/IMG-20241205-WA0040-136x300.jpg 136w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/12/IMG-20241205-WA0040-464x1024.jpg 464w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/12/IMG-20241205-WA0040-768x1696.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/12/IMG-20241205-WA0040-696x1536.jpg 696w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/12/IMG-20241205-WA0040-928x2048.jpg 928w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/12/IMG-20241205-WA0040-990x2186.jpg 990w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/12/IMG-20241205-WA0040-1320x2914.jpg 1320w" sizes="(max-width: 1160px) 100vw, 1160px" />दीक्षार्थी परिवार ने किया चित्र अनावरण</strong></p>
<p>दिगंबर जैन दशा हूमड़ समाज एवं वर्षायोग समिति के संयुक्त तत्वावधान में दीक्षा समारोह कार्यक्रम सन्मति भवन सभागार में  भगवान और पूर्वाचार्यों का चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन दीक्षार्थी परिवार ने किया। जयंतीलाल कोठारी अध्यक्ष एवं ऋषभ पचोरी अध्यक्ष चातुर्मास समिति ने बताया कि प्रथमाचार्य चारित्र चक्रवती आचार्य श्री शांतिसागर जी एवं पूर्वाचार्याें को अर्ध्य समर्पित  विभिन्न नगरों से आए समाजजनों ने किया। सौभाग्यशाली परिवार की 5 महिलाओं ने चोक पूरण की क्रिया की।</p>
<p><strong>पंचामृत से हुआ पाद प्रक्षालन</strong></p>
<p>दीक्षार्थियों ने आचार्य श्री ने दीक्षा की याचना की तथा आचार्य श्री एवं समस्त साधुओं दीदी भैया, श्रावक-श्राविकाओं तथा समाज से क्षमा याचना की। वात्सल्य वारिधि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के पंचामृत से चरण प्रक्षालन का सौभाग्य दीक्षार्थी परिवार को मिला। इस बेला में आचार्य श्री द्वारा दीक्षार्थी के पंच मुष्ठी केशलोच किए गए। दीक्षा संस्कार मस्तक तथा हाथों पर किए गए। इसके बाद आचार्य श्री ने नामकरण किया। विमला देवी का नाम दीक्षा के बाद आर्यिका 105 श्री जिनेश मति किया। पुण्यार्जक  परिवार द्वारा पिच्छी कमंडल शास्त्र एवं  कपड़े  भेंट किए गए।</p>
<p><strong>सजल हो रहे थे सभी के नेत्र</strong></p>
<p>दीक्षार्थी के केशलोच हो रहे थे, तब सभी वैराग्यमयी पलों से सभी द्रवित हो रहे थे। परिजनों के दोनों नेत्रों में एक नेत्र में खुशी के आंसू दूसरे नेत्र में दुःख के आंसू भी थे। भक्तों के भजनों से वातावरण वैराग्य मय हो रहा। आचार्य श्री अन्य साधुओं ने दीक्षार्थी के केशलोचन किये। परिजनों एवं अन्य भक्त जिन्हें केशलोच झेलने का अवसर मिला। वह अपने को पुण्यशाली मान रहे थे।</p>
<p><strong>हुआ पंचामृत अभिषेक</strong></p>
<p>सुबह आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज के दर्शन कर उनके चरणों का प्रक्षालन किया। इसके बाद विमला देवी के केशलोचन  साधुओं ने किया और मंगल स्नान किया। आचार्य संघ सानिध्य में दीक्षार्थी ने श्री जी का पंचामृत अभिषेक किया। आचार्य वर्धमान सागर जी एवं साधुओं को आहार दिया। साधुओं के आहार के बाद सन्मति भवन में आचार्य वर्धमान सागर द्वारा दीक्षा संस्कार प्रारंभ हुए।</p>
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		<title>निकाली गई भव्य शोभायात्रा : वात्सल्य वारिधि आचार्य श्री वर्द्धमान सागर जी ने दीं रत्नत्रय की प्रतीक 3 दीक्षाएं </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/acharya_shri_vardhman_sagar_gave_3_initiations_symbolizing_ratnatraya/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 07 Sep 2024 08:08:13 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[प्रथमाचार्य चारित्र चक्रवती आचार्य श्री शांतिसागरजी की अक्षुण्ण मूल बाल ब्रह्मचारी पट्ट परम्परा के पंचम पट्टाधीश वात्सल्य वारिधि आचार्य श्री वर्द्धमान सागर जी वर्ष 2024 का वर्षायोग पारसोला में कर रहे हैं। इस बेला में 6 सितंबर को ब्रह्मचारी प्रदीप जीमुनि श्री प्रणित सागर जी , ब्रह्मचारिणी शकुंतला किकावत आर्यिका श्री प्रेक्षा मति, दिलीप जी [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>प्रथमाचार्य चारित्र चक्रवती आचार्य श्री शांतिसागरजी की अक्षुण्ण मूल बाल ब्रह्मचारी पट्ट परम्परा के पंचम पट्टाधीश वात्सल्य वारिधि आचार्य श्री वर्द्धमान सागर जी वर्ष 2024 का वर्षायोग पारसोला में कर रहे हैं। इस बेला में 6 सितंबर को ब्रह्मचारी प्रदीप जीमुनि श्री प्रणित सागर जी , ब्रह्मचारिणी शकुंतला किकावत आर्यिका श्री प्रेक्षा मति, दिलीप जी अलासे क्षुल्लक श्री प्राप्त सागर जी बने। <span style="color: #ff0000">पढ़िए राजेश पंचोलिया की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>पारसोला।</strong> प्रथमाचार्य चारित्र चक्रवती आचार्य श्री शांतिसागरजी की अक्षुण्ण मूल बाल ब्रह्मचारी पट्ट परम्परा के पंचम पट्टाधीश वात्सल्य वारिधि आचार्य श्री वर्द्धमान सागर जी वर्ष 2024 का वर्षायोग पारसोला में कर रहे हैं। इस बेला में 6 सितंबर को ब्रह्मचारी प्रदीप जीमुनि श्री प्रणित सागर जी , ब्रह्मचारिणी शकुंतला किकावत आर्यिका श्री प्रेक्षा मति, दिलीप जी अलासे क्षुल्लक श्री प्राप्त सागर जी बने। श्रीमद् जैन धर्म की यही विशेषता है कि इस धर्म में सम्यक दर्शन सम्यक ज्ञान, सम्यक चारित्र को धारण कर कर सिद्ध अवस्था को प्राप्त किया जा सकता है। सम्यक दर्शन और सम्यक ज्ञान के बाद चारित्र अर्थात साधु जीवन अपनाना जरूरी है चर्या में परिवर्तन करना ही दीक्षा है, संसार की दौड़ से दूर होना दीक्षा है ।संसारी प्राणी इच्छाओं से ग्रसित है संसार रुलाता है दीक्षा लेकर शिष्य को गुरु संगति में रहना चाहिए ।</p>
<p>जैन धर्म तीर्थंकर भगवान द्वारा प्रतिपादित, अनुमोदित, धारित श्रमण धर्म है। प्रथमाचार्य श्री शांति सागर जी महाराज ने अपने संयम पुरुषार्थ से श्रमण परंपरा को पुनर्स्थापित किया ।उत्तर भारत में चातुर्मास कर धर्म प्रभावना ,धर्म जागृति ,और सुप्त हो रही समाज को जागृत किया। आज सभी दीक्षार्थी गुरु और परिवार परंपरा अनुसार दीक्षा ले रहे हैं ब्रह्मचारी प्रदीप जी के गृहस्थ अवस्था के पिता,माता,बहन क्षुल्लक समाधि सागर बने ,उनकी माता ने हमसे दीक्षा लेकर आर्यिका मूर्तिमति बनी और बहन भी दीक्षा लेकर आर्यिका सुवैभव मति बनी।</p>
<p>ब्रह्मचारिणी शकुंतला जी के ग्रहस्थ अवस्था के पति ने भी हमसे दीक्षा लेकर मुनी पदम कीर्ति सागर बने और दिलीप जी के बड़े भाई ने भी हमसे दीक्षा लेकर मुनि परमानंद सागर बने तथा पत्नी भी दीक्षा लेकर संघ में आर्यिका विनम्रवती के रूप में है। शिष्य को दीक्षा लेकर गुरु के प्रति कृतज्ञता को दिल में समर्पण भाव के साथ धारण करने से साधना में सफलता मिलती है । यह धर्म देशना आचार्य वर्धमान सागर जी ने दीक्षा के अवसर पर प्रकट की। राजेश पंचोलिया अनुसार आचार्य श्री ने उपदेश में बताया कि यह संसार प्रतिकूल है संयम से संसार को अनुकूल बनाया जाता है और इंद्रियों की दासता दूर की जाती है। शिष्य को गुरु को अपना जीवन समर्पित करना चाहिए ख्याति नाम यश पूजा से दूर रहना चाहिए ।इसी पारसोला नगर में सन 1990 में मूलचंदजी घाटलिया ने मुनि दीक्षा लेकर मुनि ओम सागर जी बने आर्यिका पूर्वी मति भी इसी नगर की है साधु अपने जीवन में मृत्यु से भयभीत नहीं होता है साधु जीवन में साधना के बल पर मृत्यु पर विजय प्राप्त करता है ।प्रथमाचार्य आचार्य शांति सागर जी महाराज ने अपने संयम साधना से श्रमण साघु मार्ग को खोला और 36 दिन की सल्लेखना लेकर समाधि का आदर्श प्रस्तुत किया। आचार्य श्री ने बिसतुनिया ग्राम का जिक्र कर बताया कि इस नगर ग्राम में एक भी जैन परिवार नहीं है राजपूत समाज है उन्होंने मुनी पदम कीर्ति महाराज की समाधि के समय एक बीघा जमीन दान देकर समाधि स्थल बनाया है नगर के नागरिक हर माह संघ के दर्शन हेतु आते हैं।</p>
<p>इसके पूर्व दीक्षार्थियों की शोभा यात्रा श्री वर्द्धमान सागर सभागार में पहुंची । दिगंबर जैन दशा हूमड़ समाज एवं वर्षायोग समिति के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित दीक्षा समारोह श्यामा वाटिका कार्यक्रम सभागार में भगवान और पूर्वाचार्यों का चित्र अनावरण दीप प्रज्वलन दीक्षार्थी परिवार द्वारा किया गया। जयंतीलाल कोठारी अध्यक्ष एवं ऋषभ पचोरी अध्यक्ष चातुर्मास समिति ने बताया कि प्रथमाचार्य चारित्र चक्रवती आचार्य श्री शांति सागर जी एवम पूर्वाचार्यो को अर्ध्य समर्पित विभिन्न नगरों से पधारी समाज द्वारा किया गया।सौभाग्यशाली परिवार की 5 महिलाओं द्वारा चोक पूरण की क्रिया की गई। दीक्षार्थ्यों ने आचार्य श्री ने दीक्षा की याचना की तथा आचार्य श्री एवम समस्त साधुओं, दीदी- भैया, श्रावक-श्राविकाओं तथा समाज से क्षमा याचना की।वात्सल्य वारिधि आचार्य श्री वर्द्धमान सागर जी के पंचामृत से चरण प्रक्षालन का सौभाग्य तीनों दीक्षार्थी परिवार को मिला। इस बेला में आचार्य श्री के द्वारा दीक्षार्थी के पंच मुष्ठी केशलोच किये गए तथा दीक्षा संस्कार मस्तक तथा हाथों पर किये गए। इसके बाद आचार्य श्री ने नामकरण किया।7 प्रतिमा घारी 71 वर्षीय ब्रह्मचारी प्रदीप भैया दाहोद का दीक्षा उपरांत नूतन नाम मुनि श्री प्रणित सागर किया गया। सात प्रतिमा धारी 69 वर्षीय शकुंतला देवी का नाम दीक्षा के बाद आर्यिका श्री प्रेक्षा मति किया गया। 68 वर्षीय दिलीप अलासे का नूतन नाम क्षुल्लक श्री प्राप्त सागर जीकिया गया। पुण्यार्जक परिवार द्वारा पिच्छी कमंडल शास्त्र एवं कपड़े भेंट किये गए। कार्यक्रम का संचालन श्री पंडित कीर्ति पारसोला ने किया। आज दीक्षार्थी के केशलोच हो रहे थे, तब सभी वैराग्यमयी पलों से सभी द्रवित हो रहे थे। परिजनों के दोनों नेत्रों में एक नेत्र में खुशी के आंसू दूसरे नेत्र में दुख के आंसू भी थे। भक्तों के भजनों से वातावरण वैराग्य मय हो रहा था।</p>
<p>आचार्य श्री मुनि श्री हितेंद्र सागर जी एवं अन्य साधुओं ने दीक्षार्थी के केशलोचन किये। परिजनों एवं अन्य भक्त जिन्हें केशलोच झेलने का अवसर मिला। वह अपने को पुण्यशाली मान रहे थे। आज प्रातःकाल दीक्षार्थियों ने श्री जी के दर्शन कर पंचामृत अभिषेक पूजन किया, इसके पश्चात आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज के दर्शन कर उनके चरणों का प्रक्षालन किया। शकुंतला देवी और श्री दिलीप जी दोनों के केशलोचन साधुओं ने किये। इसके पश्चात दीक्षार्थियों ने हल्दी लगाकर मंगल स्नान किया। आचार्य संघ सानिध्य में तीनों दीक्षार्थियों ने श्री जी का पंचामृत अभिषेक किया।आचार्य वर्धमान सागर जी एवं साधुओं को आहार दिया। साधुओं के आहार के बाद सन्मति भवन से आचार्य वर्धमान सागर जी के संघ सानिध्य में तीनों दीक्षार्थियों की शोभा यात्रा हजारों धर्मावलंबियों की उपस्थिति में नगर के प्रमुख मार्गों से होती हुई श्याम वाटिका में पहुंची।</p>
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		<title>भगवान महावीर से जुड़ेंगे तभी लाइफ स्मार्ट बनेगी- मुनि अपूर्व सागर: जैन धर्म के संस्थापक नहीं, जिन धर्म के प्रवर्तक है महावीर भगवान </title>
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		<pubDate>Mon, 22 Apr 2024 05:50:50 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[वात्सल्य वारीधि आचार्य श्री वर्द्धमान सागर जी महाराज के शिष्य मुनि श्री अपूर्व सागर जी ने भगवान महावीर स्वामी जन्मकल्याणक के अवसर पर कहा कि इस संसार में हिंसा का तांडव हो रहा है। भगवान महावीर करुणा की मू्र्ति हैं, जिन्होंने धरती पर आकर हिंसा के तांडव को रोककर अहिंसा का प्रचार किया। आज भगवान [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>वात्सल्य वारीधि आचार्य श्री वर्द्धमान सागर जी महाराज के शिष्य मुनि श्री अपूर्व सागर जी ने भगवान महावीर स्वामी जन्मकल्याणक के अवसर पर कहा कि इस संसार में हिंसा का तांडव हो रहा है। भगवान महावीर करुणा की मू्र्ति हैं, जिन्होंने धरती पर आकर हिंसा के तांडव को रोककर अहिंसा का प्रचार किया। आज भगवान महावीर को जानने और जीने की जरूरत है। <span style="color: #ff0000">पढि़ए अशोक कुमार जेतावत धरियावद की पूरी रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>धरियावद।</strong> वात्सल्य वारीधि आचार्य श्री वर्द्धमान सागर जी महाराज के शिष्य मुनि श्री अपूर्व सागर जी ने भगवान महावीर स्वामी जन्मकल्याणक के अवसर पर कहा कि इस संसार में हिंसा का तांडव हो रहा है। भगवान महावीर करुणा की मू्र्ति हैं, जिन्होंने धरती पर आकर हिंसा के तांडव को रोककर अहिंसा का प्रचार किया। आज भगवान महावीर को जानने और जीने की जरूरत है, जन्म जयंती मनाने की जरूरत नहीं है। इस भौतिकता के युग में भगवान महावीर के आदर्शों और उपदेशों की सख्त आवश्यकता है। अगर भगवान महावीर के पंचशील को जीवन में उतार लें तो सारा विश्व शांति, चैन, अमन से रह सकता है। भगवान महावीर के सिद्धांत सूत्र रूप में थे, जो हैं- अनेकांत स्याद्वाद, जियो और जीने दो एवं परस्परोपग्रहो जीवानाम्।</p>
<p><img decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-59295" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/04/WhatsApp-Image-2024-04-22-at-6.48.06-AM-1-scaled.jpeg" alt="" width="2560" height="1920" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/04/WhatsApp-Image-2024-04-22-at-6.48.06-AM-1-scaled.jpeg 2560w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/04/WhatsApp-Image-2024-04-22-at-6.48.06-AM-1-300x225.jpeg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/04/WhatsApp-Image-2024-04-22-at-6.48.06-AM-1-1024x768.jpeg 1024w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/04/WhatsApp-Image-2024-04-22-at-6.48.06-AM-1-768x576.jpeg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/04/WhatsApp-Image-2024-04-22-at-6.48.06-AM-1-1536x1152.jpeg 1536w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/04/WhatsApp-Image-2024-04-22-at-6.48.06-AM-1-2048x1536.jpeg 2048w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/04/WhatsApp-Image-2024-04-22-at-6.48.06-AM-1-74x55.jpeg 74w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/04/WhatsApp-Image-2024-04-22-at-6.48.06-AM-1-111x83.jpeg 111w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/04/WhatsApp-Image-2024-04-22-at-6.48.06-AM-1-215x161.jpeg 215w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/04/WhatsApp-Image-2024-04-22-at-6.48.06-AM-1-990x743.jpeg 990w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/04/WhatsApp-Image-2024-04-22-at-6.48.06-AM-1-1320x990.jpeg 1320w" sizes="(max-width: 2560px) 100vw, 2560px" /><br />
<strong>संवेदनशील बनों</strong><br />
चंद्रप्रभु दिगंबर जैन मंदिर में रविवार को धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनिश्री ने कहा कि अगर इन सिद्धांतों को जीवन में अपनाएंगे तो परिवार में कलह क्लेश नहीं होगी। भगवान महावीर कहते थे कि वचन गरीबी मत करो, चिंता गरीबी और भाव गरीबी मत रखो। अच्छा बोलो, अच्छा सोचो और संवेदनशील बनो। जो व्यवहार मुझे अच्छा नहीं लगता, वह दूसरों के साथ नहीं करना चाहिए। हम भगवान महावीर से जुड़ेंगे तभी हमारी लाभ लाइफ स्मार्ट बनेगी। गुरु की संगति करें। भगवान महावीर कहते हैं कि कोई भी महावीर बन सकता है। बस अपने भीतर के महावीर को देखने की आवश्यकता है। महावीर के नक्शेकदम पर चलेंगे तो उन तक पहुंच जाएंगे।</p>
<p><strong>जिन धर्म प्रवर्तक हैं महावीर भगवान</strong></p>
<p>धर्मसभा में मुनि श्री अर्पित सागर जी ने भी उपदेश दिया। उन्होंने कहा कि वर्तमान शासन नायक भगवान महावीर स्वामी जैन धर्म के संस्थापक नहीं, बल्कि जिन धर्म के प्रवर्तक हैं। आदिनाथ से लेकर भगवान महावीर स्वामी तक सभी तीर्थंकरों ने धर्म तीर्थ का प्रवर्तन किया। भील से भगवान बनने की यात्रा भगवान महावीर स्वामी ने की। पुरुरवा नामक भील ने अहिंसा धर्म का पालन किया और आगे चलकर महावीर बन गया। जैन धर्म अहिंसा प्रधान धर्म है। भगवान महावीर ने अहिंसा की जितनी सूक्ष्म व्याख्या की है, वैसी और कहीं दुर्लभ है। उन्होंने मानव को सिर्फ मानव के प्रति प्रेम और मित्रता से रहने का संदेश नहीं दिया, बल्कि मिट्टी, पानी, अग्नि, वायु और वनस्पति से लेकर कीड़े-मकोड़े, जीव-जन्तु के प्रति भी मित्रता और अहिंसक विचार के साथ रहने का उपदेश दिया है।</p>
<p><strong>&#8230;तभी जयंती मनाना होगा सार्थक</strong><br />
मुनिश्री ने आगे कहा कि भगवान महावीर अहिंसा के पुजारी थे। उन्होंने कहा था कि इस लोक में जितने भी एक, दो, तीन चार और पंचेन्द्रिय जीव हैं, उनकी हिंसा नहीं करनी चाहिए। उन्हें रास्ते में न रोकें। उनके प्रति अपने मन में दया का भाव रखें और उनकी रक्षा करें। भगवान महावीर ने अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य एवं अपरिग्रह का सिद्धांत जन-जन को दिया। हम इन सिद्धांतों को जीवन में अपनाएंगे तभी महापुरुषों की जन्म जयंती मनाना सार्थक होगा।</p>
<p>महावीर जयंती के मौके पर धरियावद नगर में सकल जैन समाज की ओर से सुबह प्रभात फेरी निकाली गई। इसके बाद श्री महावीर दिगंबर जैन मंदिर में मुनि संघ के निर्देशन में अभिषेक एवं शांतिधारा हुई। सुबह 9 बजे चंद्रप्रभ मंदिर से रथ यात्रा प्रारंभ हुई, जो नगर के विभिन्न चौक-चौराहों से होते हुए वापस मंदिर प्रांगण में पहुंची। इस मौके पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे। रथयात्रा के दौरान पूरा नगर भगवान महावीर के जयकारों से गूंज उठा।</p>
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		<title>धर्म को आत्मा में धारण करें, मोक्ष का सुख ही शाश्वत होता है- मुनि अपूर्व सागर जी महाराज     &#8216;धर्म वह फैक्ट्री है जिसमें सच्चे सुख का उत्पादन होता&#8217;    </title>
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		<pubDate>Sun, 14 Apr 2024 13:59:41 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[वात्सल्य वारीधि आचार्य श्री वर्द्धमान सागर जी महाराज के शिष्य मुनिश्री अपूर्व सागर जी महाराज ने कहा कि वीतराग धर्म, आत्मधर्म, केवली भगवान द्वारा कहा गया धर्म ही हितकारी है अन्य कोई सुखकारी नहीं है। धर्म वह कर्तव्य है, जिसमें मुझे शांति खुशी होती है। धर्म संसार के दुख से निकालकर उत्तम सुख में ले [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>वात्सल्य वारीधि आचार्य श्री वर्द्धमान सागर जी महाराज के शिष्य मुनिश्री अपूर्व सागर जी महाराज ने कहा कि वीतराग धर्म, आत्मधर्म, केवली भगवान द्वारा कहा गया धर्म ही हितकारी है अन्य कोई सुखकारी नहीं है। धर्म वह कर्तव्य है, जिसमें मुझे शांति खुशी होती है। धर्म संसार के दुख से निकालकर उत्तम सुख में ले जाता है। धर्म वह है जिसमें राग-द्वेष-मोह के परिणाम ना हो। <span style="color: #ff0000">पढि़ए अशोक कुमार जेतावत की रिपोर्ट&#8230;  </span></strong></p>
<hr />
<p><strong> धरियावद।</strong> वात्सल्य वारीधि आचार्य श्री वर्द्धमान सागर जी महाराज के शिष्य मुनिश्री अपूर्व सागर जी महाराज ने कहा कि वीतराग धर्म, आत्मधर्म, केवली भगवान द्वारा कहा गया धर्म ही हितकारी है अन्य कोई सुखकारी नहीं है। धर्म वह कर्तव्य है, जिसमें मुझे शांति खुशी होती है। धर्म संसार के दुख से निकालकर उत्तम सुख में ले जाता है। धर्म वह है जिसमें राग-द्वेष-मोह के परिणाम ना हो। जिसमें पृथ्वी के समान समता, फूल के समान कोमलता, सरलता हो, संतोष हो वह धर्म है। धर्म मिश्री की डल्ली होती है, उसे कहीं से भी चखो वह मीठी ही लगेगी। जिसमें मैं कौन हूं और मेरा कौन है, इसकी पहचान कराई जाती है, वह धर्म है। श्री चंद्रप्रभु दिगंबर जैन मंदिर में धर्मसभा को संबोधित करते हुए रविवार को मुनिश्री ने कहा कि धर्म को आत्मा में धारण करना चाहिए। क्रियाकांड करना धर्म नहीं है। धर्म के संबंध में पूजा पाठ स्वामी ने कहा है कि धर्म सुखों की खान है और विद्वानजन इसे अपने हृदय में धारण करते हैं।</p>
<p>उन्होंने कहा कि धर्म वह फैक्ट्री है जिसमें सच्चे सुख का उत्पादन होता है। धर्म वह खेती है जिसमें मोक्षसुख का दाना पैदा होता है। धर्म वह व्यापार है जिसमें शिवसुख का धन अर्जन होता है। धर्म वह प्लेन है, जो मोक्षालय में ले जाने वाला है। धर्म वह वृक्ष है जिसमें आत्मिक शांति, छाया मिलती है। संसार का सुख सच्चा सुख नहीं है। सच्चा सुख शिवालय में है, मेरी आत्मा में है। शिवाय में सुख स्वाधीन सुख है और सहज स्वाभाविक सुख है। मोक्ष में किसी अन्य वस्तु की आवश्यकता नहीं पड़ती है। मोक्ष में ताला चाबी लगाने का इंतजाम नहीं है, वहां मृत्यु का भय नहीं है। मोक्ष में सदाकाल एक सा सहज सुख रहता है। मोक्ष में स्वयं का राष्ट्र और स्वयं का राष्ट्रपति होता है।</p>
<p><img decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-58825" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/04/IMG-20240414-WA0018-scaled.jpg" alt="" width="2560" height="1920" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/04/IMG-20240414-WA0018-scaled.jpg 2560w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/04/IMG-20240414-WA0018-300x225.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/04/IMG-20240414-WA0018-1024x768.jpg 1024w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/04/IMG-20240414-WA0018-768x576.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/04/IMG-20240414-WA0018-1536x1152.jpg 1536w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/04/IMG-20240414-WA0018-2048x1536.jpg 2048w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/04/IMG-20240414-WA0018-74x55.jpg 74w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/04/IMG-20240414-WA0018-111x83.jpg 111w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/04/IMG-20240414-WA0018-215x161.jpg 215w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/04/IMG-20240414-WA0018-990x743.jpg 990w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/04/IMG-20240414-WA0018-1320x990.jpg 1320w" sizes="(max-width: 2560px) 100vw, 2560px" />मुनिश्री ने बताया कि मां जिनवाणी कहती हैं, इन्हें मानव तू स्वयं सुख का सरोकार है। संसार के सुख में आकुलता है, मोक्ष के सुख में आकुलता नहीं है। इंद्रीय सुख क्षणिक है, मोक्ष का सुख शाश्वत होता है। मोक्ष का सुख क्वनातीत होता है, जिसकी उपमा नहीं दी जा सकती है। मोक्ष सुख अनुपम है। सारे संसारी प्राणी को जितना सुख होता है, उससे असंख्यात गुणा सुख चक्रवर्ती को होता है। जितना सुख चक्रवर्ती को होता है, उससे असंख्य अयात गुणा सुख धरणेंद्र को होता है। जितना सुख धरणेंद्र का होता है उससे असंख्यात गुणा सुख इंद्र का होता है। जितना सुख एक इंद्र का होता है उससे अंत गुणा सुख सिद्ध भगवान का एक समय का सुख होता है।</p>
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		<title>भगवान जिनेंद्र की आज्ञा का पालन करने वाला होता है जैन: सम्यक दर्शन,सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र की एकता ही है मोक्षमार्ग </title>
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		<pubDate>Mon, 08 Apr 2024 16:38:16 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[वात्सल्य वारिधी आचार्य श्री वर्द्धमान सागर जी महाराज के शिष्य मुनि अर्पित सागर ने कहा कि जो सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चारित्र से सहित होता है, वह श्रावक होता है। विवेकपूर्ण किया गया कार्य ही कार्यकारी होता है। अपने जीवन में विवेक जरूर होना चाहिए। सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चारित्र, तीनों [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>वात्सल्य वारिधी आचार्य श्री वर्द्धमान सागर जी महाराज के शिष्य मुनि अर्पित सागर ने कहा कि जो सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चारित्र से सहित होता है, वह श्रावक होता है। विवेकपूर्ण किया गया कार्य ही कार्यकारी होता है। अपने जीवन में विवेक जरूर होना चाहिए। सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चारित्र, तीनों की एकता ही मोक्षमार्ग है। अकेला सम्यक दर्शन हो, अकेला सम्यक ज्ञान हो या सम्यक चारित्र हो तो भी मोक्ष नहीं मिलता है। <span style="color: #ff0000">पढ़िए विशेष रिपोर्ट …… </span></strong></p>
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<p><strong>धरियावाद।</strong> वात्सल्य वारिधी आचार्य श्री वर्द्धमान सागर जी महाराज के शिष्य मुनि अर्पित सागर ने कहा कि जो सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र से सहित होता है, वह श्रावक होता है। विवेकपूर्ण किया गया कार्य ही कार्यकारी होता है। अपने जीवन में विवेक जरूर होना चाहिए। सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र, तीनों की एकता ही मोक्षमार्ग है। अकेला सम्यक दर्शन हो, अकेला सम्यक ज्ञान हो या सम्यक चरित्र हो तो भी मोक्ष नहीं मिलता है। सिर्फ जैन कुल में जन्म लेने से जैन नहीं कहलाते हैं। भगवान जिनेंद्र की आज्ञा का पालन करने वाला जैन होता है। मुनिश्री ने चंद्रप्रभु दिंगबर जैन मंदिर में सोमवार को धर्मसभा को संबोधित करते हुए ये विचार व्यक्त किए।</p>
<p><strong><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-58507" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/04/IMG-20240408-WA0044-scaled.jpg" alt="" width="2560" height="1920" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/04/IMG-20240408-WA0044-scaled.jpg 2560w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/04/IMG-20240408-WA0044-300x225.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/04/IMG-20240408-WA0044-1024x768.jpg 1024w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/04/IMG-20240408-WA0044-768x576.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/04/IMG-20240408-WA0044-1536x1152.jpg 1536w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/04/IMG-20240408-WA0044-2048x1536.jpg 2048w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/04/IMG-20240408-WA0044-74x55.jpg 74w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/04/IMG-20240408-WA0044-111x83.jpg 111w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/04/IMG-20240408-WA0044-215x161.jpg 215w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/04/IMG-20240408-WA0044-990x743.jpg 990w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/04/IMG-20240408-WA0044-1320x990.jpg 1320w" sizes="auto, (max-width: 2560px) 100vw, 2560px" />जीवन में करे छोटे-छोटे नियमों का पालन </strong></p>
<p>उन्होंने कहा कि अहिंसा ही परम धर्म है। जिन कार्यों को करने से हिंसा होती है, ऐसे कार्यों का त्याग करना ही अहिंसा कहलाता है। मद्य, मांस, मधु और पंच उदंबर फल का त्याग नहीं करने से जीव महापापी होता है। मदिरा पान करने वाला व्यक्ति मूर्छित होता है। उसे अहित एवं हित का भान नहीं रहता और वह अपना विवेक खो देता है। जो व्यक्ति इनको नहीं त्यागता है, उसका परिणाम मृदु नहीं होता है। उसके मन में दयाभाव नहीं रहता है। मांस तामसिक होता है और तीव्र काम वासना को उत्पन्न करता है। श्रावक के अष्टमूलगुण का पालन करने से धर्म नष्ट हो जाता है। इसलिए हमें जीवन में छोटे-छोटे नियमों का पालन करना चाहिए।मुनि श्री अपूर्व सागर जी महाराज ने अपने प्रवचन में भाव की व्याख्या की। उन्होंने बताया कि भाव वस्तु सदैव परिणमनशील होती है, चाहे चेतन हो या अचेतन। चैतन्य आत्मा भी भाव करती है और उस भाव (परिणाम, उपयोग) को तीन भाग में बांटा जा सकता है- शुभोपयोग, शुद्धोपयोग और अशुद्धोपयोग। हमें अपने भाव को सुधारना है। चेतन की परिणति को उपयोग कहते हैं। हमारा उपयोग एक टॉर्च की तरह है। जिस प्रकार टॉर्च का प्रकाश जिस दिशा में करते हैं उस दिशा की वस्तु दिखाई देती है। वैसे ही हम उपयोग को जिस ओर लगाएंगे, हमें उसी प्रकार उसका फल प्राप्त होता है।</p>
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