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	<title>आचार्य श्री निरंजन सागर &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<title>आचार्य श्री निरंजन सागर &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>साइंस ऑफ लिविंग सेशन में अध्यात्म की बातें: यह कैसा अध्यात्म? जिसमें है मात्र ख्याति पूजा और लाभ की चाह &#8211; मुनि श्री निरंजन सागर  </title>
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		<pubDate>Sun, 07 May 2023 10:04:58 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[अध्यात्म शब्द का शाब्दिक अर्थ है अधि + आत्मा = अध्यात्म अर्थात् आत्मा के विषय में अथवा आत्मा से सम्बन्ध रखने वाला। आचार्य कहते है अपने शुद्धात्मा में विशुद्धता का आधारभूत अनुष्ठान या आचरण अध्यात्म है। पढ़िए राजेश रागी बकस्वाहा की रिपोर्ट&#8230; दमोह। साइंस आफ लिविंग के इस सत्र में हम अध्यात्म का सही रहस्य [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>अध्यात्म शब्द का शाब्दिक अर्थ है अधि + आत्मा = अध्यात्म अर्थात् आत्मा के विषय में अथवा आत्मा से सम्बन्ध रखने वाला। आचार्य कहते है अपने शुद्धात्मा में विशुद्धता का आधारभूत अनुष्ठान या आचरण अध्यात्म है। <span style="color: #ff0000;">पढ़िए राजेश रागी बकस्वाहा की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>दमोह।</strong> साइंस आफ लिविंग के इस सत्र में हम अध्यात्म का सही रहस्य जानने का प्रयास करेंगे। अध्यात्म शब्द का शाब्दिक अर्थ है अधि + आत्मा = अध्यात्म अर्थात् आत्मा के विषय में अथवा आत्मा से सम्बन्ध रखने वाला। आचार्य कहते है अपने शुद्धात्मा में विशुद्धता का आधारभूत अनुष्ठान या आचरण अध्यात्म है। अध्यात्म में वर्तन करना बहुत सरल है पर इतना सरल होते हुये भी इसका अनुपालन कठिनतम लगता है। आचार्य कहते है कुछ नही करने का नाम अध्यात्म है । द्रव्यसंग्रह ग्रन्थराज में आचार्य नेमिचन्द सिद्धांती देव कहते हैं &#8221; मा चिट्ठह मा जंपह मा चिन्तह किंवि जेण होइ थिरो &#8221; अर्थात् कुछ भी चेष्टा मत करो, बोलो मत चिन्तन (विचार) मत करो जिससे स्थिर हो सको। यह करना बहुत कठिनतम प्रतित होता है? क्योंकि इसमें सब कुछ रूक जाता है और जहाँ सब कुछ रूक जाता है वहाँ इस जीव को आनन्द नही आता है। आज अध्यात्म पढना बहुत आसान हो गया है लेकिन अर्थ की ओर दृष्टि नहीं जाने से सब गड़बड़ हो रहा है। अर्थ निकालना इतना आसान नही है।</p>
<p><strong>अध्यात्ममय जीवन चर्या का विषय </strong></p>
<p>अध्यात्ममय जीवन मात्र चर्चा का नही बल्कि चर्या का विषय है। आज जगह-जगह आध्यात्मिकता परोसी जा रही है और अध्यात्म का विवेचनकर्ता शैली आदि का ऐसा आलम्बन लेते है जैसा कि सिद्ध अवस्था का पूरा अनुभवन हो रहा हो । मात्र ख्याति, पूजा और लाभ को लक्ष्य में रख कर जनता को भ्रमित किया जा रहा है। बस इतना ही अध्यात्म है उनके जीवन मे। मन के लड्डु को लड्डु नही माना जाता है, इतना तो ध्यान रखो। कहते भी हैं &#8220;अधजल गगरी छलकत जाय&#8221; अर्थात् ज्ञान कम प्रदर्शन ज्यादा। आचायों ने स्पष्ट विवेचन दिया है कि अध्यात्म की चर्चा अलग वस्तु है और चर्या अलग वस्तु है। बगैर वस्तु तत्त्व को जाने, उसका अनुपालन असम्भव है। जिसके जीवन में वैराग्य कि एक कणिका तक नहीं और वे अध्यात्म के प्रस्तोता बने बैठे है।</p>
<p><strong>आत्मा के आधार के स्वरूप को जानें </strong></p>
<p>आत्मा की चर्चा के पहले हमे इसके आधार के स्वरूप को सही तरह से जानना होगा। बिना आधार के आधेय की कल्पना नही कि जा सकती है। आचार्य कहते है जीव दो प्रकार के है संसारी और मुक्त। हम संसारी है और संसारी सशरीर होता है। इसलिये बगैर शरीर अर्थात् काय के स्वभाव को जाने हम आत्म तत्त्व को नही जान पाएंगे। बिना आधार को जाने आप आधेय तक नही पहुच सकते। जिस प्रकार वृक्ष के लिये आधार भूमि है और वृक्ष आधेय है। उसी प्रकार शरीर आधार है आत्मा आधेय हैं। आचार्य उमास्वामी जी का कथन है जो तत्त्वार्थ सूत्र के रूप में प्रसिद्ध है। जगत् अर्थात् संसार के और काय अर्थात् शरीर के स्वभाव की भावना संवेग और वैराग्य के लिये कि जाती है। जगत् के स्वभाव का चिन्तन करने से संसार से संवेग होता है। संसार और पाप से भीति और धर्म में प्रीति ही संवेग है। काय का स्वभाव जैसे यह शरीर अनित्य हैं, दुखों का कारण है, निस्सार है अशुचि है इत्यादि। इस प्रकार काय के स्वभाव का चिन्तन करने से विषयों से आसक्ति हटकर वैराग्य उत्पन्न होता है। जो संसार, शरीर विषय भोगो से विरक्त है। वही जीव अपने वैराग्य को दृढ़ बनाते हुये अध्यात्म को प्राप्त कर अपना कल्याण कर सकता है। वरना वह वैराग्य और अध्यात्म किसी काम का नहीं।</p>
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		<title>साइंस ऑफ लिविंग सत्र: मूर्ति और मंत्र ही भारतीय सनातन संस्कृति है &#8211; मुनि श्री निरंजन सागर </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 06 May 2023 12:57:42 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[साइंस ऑफ लिविंग के इस सत्र में हम आपको मंत्र और मूर्ति की शक्ति विशेष से परिचय करवाने का प्रयास करेंगे। भारतीय सनातन संस्कृति अनादि काल से, मंत्र और मूर्ति की आराधक रही है। वेदों, पुराणों और ग्रंथों में इनका विशेष महत्व बताया गया है। पढ़िए राजेश रागी बकस्वाहा की रिपोर्ट&#8230; दमोह। साइंस ऑफ लिविंग [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>साइंस ऑफ लिविंग के इस सत्र में हम आपको मंत्र और मूर्ति की शक्ति विशेष से परिचय करवाने का प्रयास करेंगे। भारतीय सनातन संस्कृति अनादि काल से, मंत्र और मूर्ति की आराधक रही है। वेदों, पुराणों और ग्रंथों में इनका विशेष महत्व बताया गया है।<span style="color: #ff0000;"> पढ़िए राजेश रागी बकस्वाहा की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>दमोह।</strong> साइंस ऑफ लिविंग के इस सत्र में हम आपको मंत्र और मूर्ति की शक्ति विशेष से परिचय करवाने का प्रयास करेंगे। भारतीय सनातन संस्कृति अनादि काल से, मंत्र और मूर्ति की आराधक रही है। वेदों, पुराणों और ग्रंथों में इनका विशेष महत्व बताया गया है। कुछ कतिपय अज्ञानी, दुराग्रही और विदेशी आक्रमणकारियों ने भारतीय सनातन संस्कृति के अस्तित्व पर बहुत बड़ा कुठाराघात किया है। इतिहास में स्पष्ट मिलता है कि किस तरह नालंदा विश्वविद्यालय जो कि भारतीय सनातन संस्कृति शिक्षा का केंद्र था। वहां छह माह लगातार वेदो-पुराणों और ग्रन्थों की होली जलाई गई। किस तरह मूर्ति विरोधियों द्वारा मूर्तियों को क्षति पहुचाई गई। आस्था और संस्कृति के केंद्र मंदिरों को तोड़ा गया। यहां तक धर्मान्तरण के लिए भी बाध्य किया गया।</p>
<p><strong>धर्म निरपेक्षता ही भारतीय संविधान का आधार</strong></p>
<p>एक ऐसा दौर हुआ जिसमें धर्म और धार्मिक क्रियाओं को खुलेआम करना भी अपराध माना जाता था। यह भारतीय सनातन संस्कृति बहुत कुछ झेल चुकी है। परन्तु अब इस स्वतन्त्र भारत में भी कुछ लोग इस संस्कृति पर और सांस्कृतिक परिवेश पर कुठाराघात करने मे लगे हुए हैं। धर्म निरपेक्षता ही भारतीय संविधान का आधार है जिसके माध्यम से प्रत्येक व्यक्ति अपनी धार्मिक क्रियाओं को करने के लिए स्वतन्त्र है। आज भी कई असामाजिक तत्व मन्त्र और मूर्ति का विरोध कर इस भारतीय सनातन संस्कृति पर आघात पहुँचने से पीछे नहीं हट रहे हैं। पाषाण-पाषाण कहकर परमात्मा(मूर्ति) का अपमान करना कहां तक ठीक है। पाषाण हृदय वाला व्यक्ति ही परमात्मा को पाषाण कह सकता है, मंत्र को मिथ्या कह सकता है। श्रद्धा के अभाव में ऐसा विचार उनके मन में आ सकता है। ऐसे वचन उनके मुख से निकल सकते हैं। आचार्यो की वाणी, जिनेन्द्र देव की वाणी पर जिसे श्रद्धा नहीं है, वह कभी त्रिकाल में भी न तो स्वयं का कल्याण कर सकता है और न ही दूसरों का। जो न तो भगवान को मान रहा है और न तो भगवान की मान रहा है। ऐसा व्यक्ति मान कषाय के तीव्र उदय में अपने आपको भगवान मनवाने में लगा हुआ है और अपना मान &#8211; सम्मान करवाता हुआ स्वयं को भगवान मान रहा है।</p>
<p><strong>प्रत्येक जीवात्मा के अंदर भगवान बनने की क्षमता</strong></p>
<p>आचार्य कहते हैं प्रत्येक जीव शुद्ध नय से शुद्ध है। प्रत्येक जीवात्मा के भीतर भगवान बनने की क्षमता(शक्ति) विद्यमान है। चाहे वह एक इन्द्रिय ही क्यों न हो परंतु अभिव्यक्ति की अपेक्षा प्रत्येक जीव भगवान नहीं बन सकता। अभव्य जीव ऐसा परिणामिक भाव वाला जीव है। जो तीन काल मैं भी अपना कल्याण नही कर सकता। योग्यता और पद दोनों अलग-अलग चीजें है, लेकिन योग्यता के बिना पद का कोई मूल्य नहीं है। यदि हमारे पास दया नहीं, श्रद्धा नहीं, गुणवत्ता नहीं, योग्यता नहीं तो हम किसी पद के लायक नहीं है। फिर इस प्रकार के अयोग्य व्यक्ति धर्म नायक कैसे मान सकते है? धर्म नायक हमारे भगवान है। उनकी परंपरा का अनुपालन करने वाले आचार्य, उपाध्याय और साधु हैं। जो व्यक्ति भगवान की तरफ पीठ करके खड़ा होता है, समझ लेता है उसकी शीघ्र ही दुर्गति होने वाली है। भगवान का दर्शन आपके लिए कभी भी अकल्याणकारी नही हो सकता है।</p>
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