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	<title>आचार्य कनकनंदी &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
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	<title>आचार्य कनकनंदी &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>ज्ञानार्जन के लिए विनयवान आत्मज्ञान से युक्त होना चाहिए: आचार्य कनकनंदी ने अंतरराष्ट्रीय वेबिनार से दिया दिव्य प्रबोधन  </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shree Phal News]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 06 Jan 2026 11:50:24 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[समाचार]]></category>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री कनकनंदी जी ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में बताया कि ज्ञानार्जन के लिए विनयवान, विवेक सहित आत्मज्ञान से युक्त होना चाहिए। उन्होंने कहा आत्मज्ञान संयुक्त व्यक्ति हेय उपादेय का विचार करने वाला वस्तु स्वरूप का ज्ञान रखने वाला दूसरों को उपदेश दे सकता है। उन्होंने कहा कि संशय से [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य श्री कनकनंदी जी ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में बताया कि ज्ञानार्जन के लिए विनयवान, विवेक सहित आत्मज्ञान से युक्त होना चाहिए। उन्होंने कहा आत्मज्ञान संयुक्त व्यक्ति हेय उपादेय का विचार करने वाला वस्तु स्वरूप का ज्ञान रखने वाला दूसरों को उपदेश दे सकता है। उन्होंने कहा कि संशय से युक्त सत्य क्या असत्य क्या, नहीं जानने वाले की कोई भी प्रवृत्ति सफल नहीं होती। <span style="color: #ff0000">भिलुड़ा से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>भिलुड़ा ।</strong> आचार्य श्री कनकनंदी जी ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में बताया कि ज्ञानार्जन के लिए विनयवान, विवेक सहित आत्मज्ञान से युक्त होना चाहिए। उन्होंने कहा आत्मज्ञान संयुक्त व्यक्ति हेय उपादेय का विचार करने वाला वस्तु स्वरूप का ज्ञान रखने वाला दूसरों को उपदेश दे सकता है। उन्होंने कहा कि संशय से युक्त सत्य क्या असत्य क्या, नहीं जानने वाले की कोई भी प्रवृत्ति सफल नहीं होती। अविवेकपूर्ण ज्ञान से धर्म को समझ नहीं सकते। सम्यक ज्ञान आत्मज्ञान के बिना स्वदोष को भी स्वीकार नहीं कर सकते। शांति प्राप्त करने के लिए स्वदोष को स्वीकार करना आवश्यक है। धर्म धार्मिक पुरुष के बिना नहीं रह सकता है। धार्मिक जन का अपमान करने वाला धर्म का अपमान करता है। समता धारी साधु का अपमान करने पर वह तो समता में रहते हैं कोई श्राप नहीं देते परंतु वह पुण्य लेकर चले जाते हैं। शांत वीतरागी साधु का अपमान करना सबसे बड़ा पाप है। सत्य से विपरीत बुद्धि होने से नारकी से भी महा पापी है। वह धर्म द्रोही धर्म का हिंसक है। धर्म के नाश होने पर सिद्धांत के को नष्ट होते देखकर बिना पूछे भी बोलना चाहिए।</p>
<p><strong> देव पर्याय में स्वर्ग के इंद्र भी भगवान नहीं बन सकते</strong></p>
<p>महाराज श्री ने कहा जिन पुरुष से धर्म की उत्पत्ति होती है धर्म की वृद्धि होती है वह धर्म का प्रचार प्रसार करते हैं ऐसे साधु का अपमान करना धर्म की हिंसा है। महाराज श्री ने कहा जैन धर्म अहिंसक है कायर नहीं दबू नहीं। धार्मिक लोगों का अनादर करके प्रसन्न होने वाले पापी है। धर्म करके, दान देकर उसका पश्चाताप करने से पुण्य क्षीण हो जाता है। बिस लोड थ्योरी डॉ. एमएम बजाज की है। इसमें सिद्ध किया गया है कि जहां बूचड़खाने होते हैं वहां भूकंप, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, ज्वालामुखी, सुनामी आदि प्राकृतिक प्रकोप आते हैं। महाराज श्री ने कहा मानव ही आत्मा से परमात्मा बन सकते हैं। देव पर्याय में स्वर्ग के इंद्र भी भगवान नहीं बन सकते हैं। मानव ही महामानव बनकर पंचम गति को प्राप्त कर सकता है। देवपर्याय में उत्कृष्ट देव की 33 सागर की आयु होने पर भी साधु भी नहीं बन सकते ना ही सिद्ध पद प्राप्त कर सकते हैं भले वहां से सिद्ध शिला की दूरी बहुत कम है। विद्या प्राप्त करके वाद विवाद नहीं करना चाहिए। कुभाव के कारण सत्य तथ्य को नहीं जान सकते।</p>
<p><strong>ग्रंथ की पूर्णता अर्थ की पूर्णता के साथ स्वाध्याय करना चाहिए</strong></p>
<p>आचार्यश्री ने कहा कि विद्यार्थी का प्राचीन नाम विनय है। जो विनय पूर्वक आकर आचार्य के पास अध्ययन करते हैं वह उपाध्याय है। पहले श्रद्धा होनी चाहिए श्रद्धा के बिना सम्यक ज्ञान नहीं होगा। स्वाध्याय का विवेचन,समीक्षा, समन्वय, मंथन होना चाहिए। किसी भी विषय को व्यवस्थित क्रमबद्ध संपादन करना विधान है। अनुष्ठान का अर्थ सम्यक आचरण करना। शिष्य को स्नान आदि से पवित्र होकर विनय से युक्त होकर शरीर की चंचलता से रहित होकर ग्रंथ की पूर्णता अर्थ की पूर्णता के साथ स्वाध्याय करना चाहिए। जिससे श्रेय सुख प्राप्त होगा। बच्चों की चंचलता को गलत नहीं मानना चाहिए यह उनके विकास के लिए बहुत अच्छा है। मुनि श्री सुविज्ञ सागर जी ने आचार्य श्री द्वारा रचित कविता ‘क्या मैं हूं मानव, क्या मैं हूं तिर्यच, क्या मैं हूं नारकी, क्या मैं हूं देव इससे परे मैं हूं सच्चिदानंद’ से मंगलाचरण किया। यह जानकारी विजयलक्ष्मी जैन ने दी।</p>
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		<title>हर जीव में जिनेंद्र के दर्शन करता है परोपकारीः वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदी महाराज</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 13 Aug 2022 02:47:07 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[समाचार]]></category>
		<category><![CDATA[आचार्य कनकनंदी]]></category>
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					<description><![CDATA[भीलूड़ा । वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदी महाराज ने गुरुवार को अंतर्राष्ट्रीय वेबीनार मैं कहा कि रक्षाबंधन पर्व का प्राचीन नाम वात्सल्य पर्व है। सम्यक दर्शन, स्वाध्याय तथा सोलह कारण भावना के अंतिम में वात्सल्य तथा प्रभावना आती है। उन्होंने कहा कि धर्म का उपदेश तथा प्रभावना वात्सल्य के बिना नहीं हो सकती। गुरुवाणी भावों को [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>भीलूड़ा ।</strong> वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदी महाराज ने गुरुवार को अंतर्राष्ट्रीय वेबीनार मैं कहा कि रक्षाबंधन पर्व का प्राचीन नाम वात्सल्य पर्व है। सम्यक दर्शन, स्वाध्याय तथा सोलह कारण भावना के अंतिम में वात्सल्य तथा प्रभावना आती है। उन्होंने कहा कि धर्म का उपदेश तथा प्रभावना वात्सल्य के बिना नहीं हो सकती। गुरुवाणी भावों को शुद्ध करने के लिए होती है। प्रकोष्ठ भावना का अर्थ प्रभावना है जिसकी भावना पवित्र है, वह घृणा, द्वेष से रहित होकर प्रभावना कर सकता है। पहले आत्मा का उद्धार करो फिर परोपकार करो क्योंकि जो स्वयं प्रकाशवान नहीं है, वह अन्य को प्रकाशित कैसे कर सकता है।<br />
आचार्य जी ने कहा कि जो संकीर्ण स्वार्थी होता है, वह केवल परिवार के लिए ही सोचता है परंतु जो परोपकारी होता है वह किसी को कष्ट नहीं देता। हर जीव में जिनेंद्र के दर्शन करता है। वह आतंकवादी, दुष्ट, दुर्जन, पापी नहीं हो सकता। ऐसे लोग दान, पूजा दूसरों को नीचा दिखाने के लिए करते हैं तो वह प्रभावना नहीं है। धार्मिक लोगों से वात्सल्य होगा तब ही धार्मिक बन सकते हैं। वात्सल्य भाव से आत्मा का स्वभाव प्रकट होता है। विश्व कल्याण की भावना ही प्रायोगिक अहिंसा है।</p>
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		<title>युवती के पर्सनालिटी गढ़ने के गुरु ब्रम्हा का स्वरुप है व को ज्ञान रूपी अमृत नारायण विष्णु भी &#8211; मंत्री धर्माचार्य कनक नंदी गुरुदेव</title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/yuvatee-ke-parsanaalitee-gadhane-ke-guru-bramha-ka-svarup-hai-va-ko-gyaan-roopee-amrt-naaraayan-vishnu-bhee-mantree-dharmaachaary-kanak-nandee-gurudev/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 14 Jul 2022 14:00:16 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[समाचार]]></category>
		<category><![CDATA[आचार्य कनकनंदी]]></category>
		<category><![CDATA[जैन न्यूज]]></category>
		<category><![CDATA[भीलूड़ा]]></category>
		<category><![CDATA[श्रीफल न्यूज]]></category>
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					<description><![CDATA[न्यूज सौजन्य- धर्मेंद्र जैन  भीलूड़ा। गुरु किंग मेकर है वे पंचेंद्रिय को वश में करते हैं व मन को दास बनाकर रखते हैं। वे मन विजयी विश्व विजयी होते हैं। तो वहीं गुरु शिष्य का निर्माण करने वाले ब्रह्मा तो है ही, शिष्य का ज्ञान रूपी अमृत पान से पोषण करने वाले विष्णु भी हैं। [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color: #ff0000">न्यूज सौजन्य- धर्मेंद्र जैन </span></p>
<p><strong>भीलूड़ा।</strong> गुरु किंग मेकर है वे पंचेंद्रिय को वश में करते हैं व मन को दास बनाकर रखते हैं। वे मन विजयी विश्व विजयी होते हैं। तो वहीं गुरु शिष्य का निर्माण करने वाले ब्रह्मा तो है ही, शिष्य का ज्ञान रूपी अमृत पान से पोषण करने वाले विष्णु भी हैं। रूद्र की तरह दोषों का संहार करते हैं। संसार रूपी महाअटवी में गुरु ही मोक्षमार्ग दिखाते हैं यह बात वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदी गुरुदेव ने भीलूड़ा शांतिनाथ जैन मंदिर सभागार में हुए अंतरराष्ट्रीय वेबीनार को संबोधित करते हुए कही।<br />
नगुरुदेव ने गुरु की महिमा का वर्णन करते हुए बताया कि शिष्य का अज्ञान रूपी अंधकार गुरु ही दूर करते हैं। गुरु की पूजा, आराधना, गुणगान,भक्ति अवश्य करना चाहिए। जिस प्रकार पत्थर पर उत्तम बीज भी विकसित नहीं हो सकता वैसे ही आध्यात्मिक गुरु के बिना शिष्य का विकास नहीं होता। देवों के आध्यात्मिक गुरु नहीं होते इसलिए वे मनुष्य बनने के लिए, पृथ्वी पर जन्म लेने के लिए तरसते हैं। गुरु बिना सभी जन पशु समान हैं। गुरु ही पशु से पशुपति, नर से नारायण बनाते हैं। गुरु भक्ति के कारण राजस्थान के लोग किसी भी राज्य में जाते हैं या विदेश में भी होते हैं तो प्रसिद्ध तथा धनवान हो जाते हैं। तीर्थंकर भी गुरु कृपा से ही प्राथमिक धार्मिक बने हैं, गुरूपदेश से ही सम्यक दृष्टि बनते हैं।</p>
<p>प्रवक्ता जैन समाज धर्मेन्द्र जैन बताया कि वेबिनार के दौरान गुरुदेव ने आगे कहा कि नरक, निगोद में जाने से बचाने वाले गुरु ही हैं। पंचम काल में तीर्थकाल नहीं है तो गुरु ही आत्मा से परमात्मा बनने के लिए मोक्ष मार्ग बताने वाले होते हैं। अतः तीर्थंकर के लघु नंदन साधु संसार के दुखों में जलते हुए जीवों का उद्धार करते हैं। गुरु के निर्देश बिना ध्यान भी सम्यक नहीं हो सकता। गुरु ही आत्मज्ञान देते हैं। आत्मज्ञान बिना जीव का विकास नहीं होता, इंद्रियों का दमन भी नहीं हो सकता। गुरु आज्ञा बिना प्राथमिक सम्यकदृष्टि भी नहीं बन सकते। जो भव का नाश करें, संसार का नाश करें वह गुरु है। ऐसे गुरु का शासन, आज्ञा, भक्ति को स्वीकार करना चाहिए। गुरु बिना सभी लौकिक सुख, धन संपत्ति, ज्ञान विज्ञान व्यर्थ है। गुरु स्वपद स्वगुण देते हैं। गुरु से ही अनंत, अक्षय सुख प्राप्त करने का मार्ग मिलता हैं।</p>
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