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	<title>आचार्यश्री विमर्शसागर जी &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<title>आचार्यश्री विमर्शसागर जी &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>आचार्यश्री विमर्शसागर जी को पुनः दिल्ली आने का आग्रह: उमड़ा श्रद्धा सागर, मंशापूर्ण महावीर जिनालय में गूंजे जयकारे </title>
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		<pubDate>Fri, 10 Apr 2026 15:15:15 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री विमर्शसागर जी ससंघ (35 पिच्छी) के संभावित दिल्ली आगमन को लेकर भक्तों में जबरदस्त उत्साह देखने को मिला। इस अवसर पर सैकड़ों श्रद्धालु श्री मंशापूर्ण महावीर जिनालय, मुरादनगर पहुंचकर शुक्रवार को गुरुचरणों में श्रीफल अर्पित करते हुए अपनी भावनाएं व्यक्त कीं। दिल्ली से पढ़िए, सोनल जैन की यह रिपोर्ट&#8230; दिल्ली। आचार्य श्री विमर्शसागर [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य श्री विमर्शसागर जी ससंघ (35 पिच्छी) के संभावित दिल्ली आगमन को लेकर भक्तों में जबरदस्त उत्साह देखने को मिला। इस अवसर पर सैकड़ों श्रद्धालु श्री मंशापूर्ण महावीर जिनालय, मुरादनगर पहुंचकर शुक्रवार को गुरुचरणों में श्रीफल अर्पित करते हुए अपनी भावनाएं व्यक्त कीं। <span style="color: #ff0000">दिल्ली से पढ़िए, सोनल जैन की यह रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>दिल्ली।</strong> आचार्य श्री विमर्शसागर जी ससंघ (35 पिच्छी) के संभावित दिल्ली आगमन को लेकर भक्तों में जबरदस्त उत्साह देखने को मिला। इस अवसर पर सैकड़ों श्रद्धालु श्री मंशापूर्ण महावीर जिनालय, मुरादनगर पहुंचकर शुक्रवार को गुरुचरणों में श्रीफल अर्पित करते हुए अपनी भावनाएं व्यक्त कीं। जिसमें राजधानी दिल्ली के कृष्णानगर ,यमुना विहार, ऋषभविहार, भोलानाथनगर, राधेपुरी, शंकर नगर आदि सहित सम्पूर्ण दिल्ली के भक्त समूह ने आचार्य गुरुवर के चरणों में विनम्र आग्रह किया कि है गुरुदेव अब दिल्ली दूर नहीं है।</p>
<p>आप अपने संघ के साथ पुनः दिल्ली पधारकर भक्तों की प्यास शांत करें, सम्पूर्ण राजधानी आपके आगमन की प्रतीक्षा में पलक-पाँवड़े बिछाये हुए हैं। भक्तों ने जोरदार भक्ति प्रदर्शन करते हुए जयकारों से वातावरण गुंजायमान कर दिया। हम भक्तों ने ठाना है, गुरुवर को दिल्ली लाना है के उद्घोष के साथ पूरा जिनालय श्रद्धा और उत्साह से भर उठा। विमर्श भक्तों के मुख से ष्जिनागम पंथ जयवंत हो के जयघोष निरंतर गूंजते रहे, जिससे पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया।</p>
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		<title>आचार्य श्री विरागसागर जी की चरणछत्री का शिलान्यास हुआ: आचार्यश्री विमर्शसागर जी के सान्निध्य में हुआ भव्यतम कार्यक्रम  </title>
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		<pubDate>Thu, 02 Oct 2025 16:16:25 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[युगों-युगों तक भव्यजीवों के दुख-संकटों को दूर करती रहेगी आचार्य श्री विराग सागर जी महामुनिराज की चरण छत्री यह उद्बोधन आचार्यश्री विमर्शसागर जी ने दिए। आचार्य श्री विरागसागर जी की चरणछत्री का शिलान्यास हुआ। सहारनपुर से पढ़िए, सोनल जैन की यह खबर&#8230; सहारनपुर। नगर में आचार्य श्री विरागसागर जी महामुनिराज का समाधिस्थल चरणछत्री बनने जा [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>युगों-युगों तक भव्यजीवों के दुख-संकटों को दूर करती रहेगी आचार्य श्री विराग सागर जी महामुनिराज की चरण छत्री यह उद्बोधन आचार्यश्री विमर्शसागर जी ने दिए। आचार्य श्री विरागसागर जी की चरणछत्री का शिलान्यास हुआ। <span style="color: #ff0000">सहारनपुर से पढ़िए, सोनल जैन की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>सहारनपुर।</strong> नगर में आचार्य श्री विरागसागर जी महामुनिराज का समाधिस्थल चरणछत्री बनने जा रही है। यहां के जैन बाग वीरनगर में श्री 1008 महावीर जिनालय प्रांगण में आचार्य श्री के समाधि स्थल के रूप में चरण छत्री की स्थापना की जाएगी। विजयादशमी के शुभ दिवस प्रातः काल में आचार्य श्री विमर्शसागर जी महामुनिराज (ससंघ 30 पिच्छी) के सान्निध्य में आचार्य श्री की चरणछत्री का भव्य शिलान्यास समारोह किया गया। शिलान्यास करने का सौभाग्य पंचान समिति के उपाध्यक्ष एवं स्वागताध्यक्ष विपिन जैन (चाँदी वाले) सपरिवार को प्राप्त हुआ। जैन समाज के अध्यक्ष राजेश जैन ने बताया कि गुरुवर की तीनों चरण छत्रियों का निर्माणकार्य शीघ्रातिशीघ्र प्रारंभ होकर पूर्णता को प्राप्त होगा। प्रातःकालीन शिलान्यास समारोह में उपस्थित श्रद्धालु भक्तों ने भी शिलायें रखकर अपने सौभाग्य को वर्धित किया। उपस्थित धर्मसभा को संबोधित करते हुए आचार्य श्री विमर्शसागर जी मुनिराज जिस पवित्र स्थान से भव्य जीव सिद्धत्व को प्राप्त करते हैं। वह सिद्धभूमि &#8211; सिद्धक्षेत्र कहलाता है और जहाँ रत्नत्रय धारी निर्ग्रन्य मुनिराजों की समाधि संस्कार होता है। वह स्थान निषद्या स्थल कहलाता है। इस निषद्या-स्थल की शास्त्रों में आचार्य भगवंतों ने बड़ी महिमा बतायी है। आपके जीवन में आने वाले विघ्नों को नाश करने वाले यह निषद्यास्थल हुआ करते हैं। यह स्थान अत्यंत पूजनीय और पवित्र होते हैं। आचार्य श्री विरागसागर जी महामुनिराज की जीवन भर की सर्वाेत्कृष्ट साधना का फल सर्वाेत्कृष्ट समाधि के रूप में हम सबके सामने आया।</p>
<p>पुण्य तो सब जीव लेकर आते हैं कोई पुष्य का भोग करता है तो कोई पुण्य का साधना में उपयोग करता है, साधक के जीवन के अंत की समाधि यह बता देती है कि साधक ने पुण्य का भोग किया है या साधना में उपयोग किया है। आचार्य गुरुवर सर्वश्रेष्ठ साधक थे और गुरुवर ने सर्वाेत्तम समाधि साधकर आगामी श्रमण संस्कृति के लिए आदर्श प्रस्तुत कर दिया है जो युगों-युगों तक साधकों के लिए प्रेरणास्रोत बना रहेगा। ऐसे युग के सर्वश्रेष्ठ आचार्य श्री विरागसागर जी महामुनिराज का यह समाधिस्थल चरणछत्री भव्य जीवों के आत्मकल्याण और दुःख -संकटों को दूर करने साधन बनती रहेगी।</p>
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		<title>जो ज्ञान अभिमान पैदा करे वह ज्ञान नहीं: आचार्य श्री विमर्शसागर जी ने ज्ञान और भक्ति का महत्व समझाया  </title>
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		<pubDate>Fri, 08 Aug 2025 12:07:00 +0000</pubDate>
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<p><strong>नगर में आचार्यश्री विमर्शसागर जी महाराज का चातुर्मास जारी है। मंदिर में रोजाना भगवान की भक्ति और आचार्यश्री के प्रवचनों का लाभ समाजजन ले रहे हैं। अपने नित प्रवचन में शुक्रवार को आचार्यश्री ने कहा कि जिंद‌गी में दुःख तो हर कदम पर मिलते हैं किन्तु, सुख प्राप्त करने के लिए, जो स्वयं परमसुखी हो गये हैं, ऐसे जिनेन्द्र भगवान के चरणों में आना होगा। <span style="color: #ff0000">सहारनपुर से पढ़िए, सोनल जैन की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>सहारनपुर</strong>। नगर में आचार्यश्री विमर्शसागर जी महाराज का चातुर्मास जारी है। मंदिर में रोजाना भगवान की भक्ति और आचार्यश्री के प्रवचनों का लाभ समाजजन ले रहे हैं। अपने नित प्रवचन में शुक्रवार को आचार्यश्री ने कहा कि जिंद‌गी में दुःख तो हर कदम पर मिलते हैं किन्तु, सुख प्राप्त करने के लिए, जो स्वयं परमसुखी हो गये हैं, ऐसे जिनेन्द्र भगवान के चरणों में आना होगा। जिस प्रकार, तीक्ष्ण धूप से संतप्त मनुष्य सघन विशाल वटवृक्ष का आश्रय करता है उसी प्रकार, संसारी जीव को सुख प्राप्ति के लिए जिनेन्द्र भगवान का झाश्रय करना ही होगा। उन्होंने कहा कि हे जिनेन्द्र भगवान् ! आप में अनंत गुण विद्यमान हैं। जिस प्रकार, विशाल समुद्र की एक-एक बूंद को गिनने के लिए इस धरती पर कोई भी समर्थ नहीं है उसी प्रकार, भगवान के अनंत गुणों को गिनना संभव नहीं है और न ही भगवान के एक-एक गुण का बखान किया जा सकता है।</p>
<p>जिनेंद्र भगवान के संपूर्ण गुणों को कहने में स्वयं बृहस्पति (सुरगुरु) भी समर्थ नहीं है तब हे जिनेन्द्र भगवान ! मैं शक्तिहीन आपके सम्पूर्ण गुणों का गुणगान कैसे कर सकता हूँ अर्थात नहीं कर सकता। आचार्यश्री ने कहा कि एक सच्चा भक्त, विवेकी भक्त भगवान के समक्ष स्वयं को अकिंचन मानता है और भगवान के केवलज्ञान के समक्ष स्वयं के क्षायो पशमिक ज्ञान को हीन ही मानता है। जिनेन्द्र भगवान की भक्ति आराधना में आचार्य प्रवर स्वयं को अल्पज्ञानी एवं विद्वानों की हंसी का पात्र बताते हुए सोदाहरण अपने द्वारा भक्ति का कारण बताते हुए कहते हैं- जिस प्रकार सिंह के पंजों के बीच पड़ा हुआ हिरणी का बच्चा, हिरणी अपनी शक्ति का विचार न करती हुमी अपने शिशु की रक्षा के लिए सिंह के सामने उपस्थित होकर उसका सामना करती है उसी प्रकार हे जिनेन्द्र देव ! मैं भी अपनी शक्ति का विचार न करते हुए मात्र प्रीतिवश &#8211; भक्तिवशात् आपकी भक्ति आराधना करने को तत्पर हो रहा हूँ।</p>
<p>अभिमानी जीव कभी भगवान् की भक्ति नहीं कर सकता। भक्त बनने के लिए भक्ति करने के लिए अभिमान का विसर्जन आवश्यक है। भगवान के समवशरण में विराजमान बड़े-बड़े ऋषि, गणधर आदि ज्ञानी मुनिराज भी स्वयं को अल्पश्रुत अर्थात अल्पज्ञानी कह देते हैं। आखिर क्यों? बन्धुओ ! जिसने अभिमान को छोड़ दिया वही भगवान के केवलज्ञान के समक्ष स्वयं को अल्पज्ञानी घोषित करते हैं। इस लोक में कोई दो-चार शास्त्र क्या पढ़ लेते हैं वे अपने आप को महाज्ञानी समझने लगते हैं, उनकी ऐसी प्रवृत्ति ही यह निर्णय करा देती है कि इस व्यक्ति में अभिमान है ज्ञान नहीं है क्योंकि, समीचीन ज्ञान कभी अभिमान को पैदा नहीं करता, समीचीन ज्ञान तो अभिमान का नाश करने वाला होता है। ध्यान रखो, जहाँ अभिमान बढ़ रहा है वहाँ ज्ञान नहीं केवल अज्ञान ही बड़ रहा है।</p>
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		<title>पाप रूपी अंधकार को नाश करने वाले हैं प्रथम तीर्थेश आदिनाथ भगवान: आचार्य श्री विमर्शसागर जी ने भक्तामर प्रशिक्षण शिविर में दी देशना  </title>
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		<pubDate>Fri, 01 Aug 2025 13:25:35 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्यश्री विमर्शसागर जी महाराज ने शुक्रवार को भक्तामर प्रशिक्षण शिविर में प्रथम काव्य का शुद्ध उच्चारण बताया। उन्होंने उच्चारण की शुद्धता पर जोर दिया। आचार्यश्री ने कहा कि आपका उच्चारण जितना शुद्ध होगा उतनी ही आनंद की अनुभूति होगी। सहारनपुर से पढ़िए, सोनल जैन की यह खबर&#8230; सहारनपुर (उत्तरप्रदेश)। जिसके हृदय में भक्ति का उदय [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>आचार्यश्री विमर्शसागर जी महाराज ने शुक्रवार को भक्तामर प्रशिक्षण शिविर में प्रथम काव्य का शुद्ध उच्चारण बताया। उन्होंने उच्चारण की शुद्धता पर जोर दिया। आचार्यश्री ने कहा कि आपका उच्चारण जितना शुद्ध होगा उतनी ही आनंद की अनुभूति होगी। <span style="color: #ff0000">सहारनपुर से पढ़िए, सोनल जैन की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>सहारनपुर (उत्तरप्रदेश)।</strong> जिसके हृदय में भक्ति का उदय होता है उसी के हृदय में सौभाग्य का उदय होता है। भक्ति भावों का दर्पण है। यदि आप जानना चाहते हैं कि आप स्वयं गुणवान है या नहीं ? यदि आप अपने भविष्य के बारे में जानना चाहते हैं? तो आपको कहीं और जाने की आवश्यकता नहीं है आप स्वयं ही अपने अंदर झांककर देख लीजिए कि आपके अंतरंग में जिनेन्द्र भगवान की भक्ति है या नहीं। जिस हृदय में प्रभु की निश्चल भक्ति विद्यमान है, वास्तव में नहीं हृदय, वही पुरुष गुणवान है, उसी का भविष्य सुंदर है। यह उद्बोधन आचार्यश्री विमर्शसागर जी महाराज ने शुक्रवार को भक्तामर प्रशिक्षण शिविर में दिए। उन्होंने श्री भक्तामर स्तोत्र के प्रथम काव्य का शुद्ध उच्चारण एवं भावार्थ को प्रातःकाल 8 बजे की कक्षा में बतलाते हुए ने कहा कि आज हम श्री भक्तामर स्तोत्र के प्रथम काव्य का शुद्ध उच्चारण सीख रहे हैं। बंधुओं! आपका उच्चारण जितना शुद्ध होगा। आपको उतनी ही आनंदानुभूति होगी। श्री भक्तामर स्तोत्र के प्रथम काव्य में आचार्य श्री मानतुंग स्वामी ने प्रथम तीर्थकर भगवान आदिनाथ स्वामी का गुणगान-भक्ति करते हुए कहा है कि प्रथम तीर्थेश भगवान आदिनाथ स्वामी के पादमूल में स्वर्गपुरी के समस्त देवतागण आ-आकर अपना मस्तक झुकाते हैं। जिससे उनके मस्तक पर लगे हुए मुकुट भगवान के चरणों का स्पर्श पाते ही अपनी प्रभा को प्रकाशित करने लगते हैं।</p>
<p>भगवान ऋषभदेव स्वामी की, जो भी प्राणी भाव पूर्वक आराधना करता है। उसके जीवन से स्वमेव ही पाप रूपी अंधकार पलायन कर जाता है अर्थात् भगवान आदिनाथ स्वामी ही हमारे पाप रूपी अंधकार को नाश करने वाले हैं। इस धरा पर जब भोग भूमि के युग का अंत एवं कर्मभूमि युग प्रारंभ हो रहा था तब किसी को भी कर्म का ज्ञान नहीं था। तब राज्यावस्था में उन्होंने षट्कर्मी का उपदेश प्रदान किया एवं स्वयं अरहंत अवस्था प्राप्त कर अपनी दिव्यध्वनि द्वारा संसार समुद्र में गिरते हुए-डूबते हुए प्राणी समूह को आलंबन बनकर उन्हें संसार दुःखों से बचाकर सच्चे सुख का समीचीन मार्ग का दिग्दर्शन किया। ऐसे हैं प्रथम तीर्थेश भगवान आदिनाथ स्वामी ! मैं मन-वचन-काया से दूप चरणों में नमस्कार कर आपकी स्तुति प्रारंभ करता हूं।</p>
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		<title>भगवान की भक्ति दीपक की भाँति आत्मा के बुझे दीप जला दे:  आचार्य श्री विमर्श सागर जी ने धर्मसभा में दी देशना </title>
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		<pubDate>Sat, 05 Jul 2025 11:55:58 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[सराहनपुर में आचार्यश्री विमर्शसागर जी का चातुर्मास होने जा रहा है। यहां उन्होंने धर्मसभा को संबोधित कर समाजजनों को धर्म के बारे में दिशा-दर्शन दिया। सराहनरपुर से पढ़िए, सोनल जैन की यह खबर&#8230; सराहनपुर। संसार में जितने भी जीव हैं। वे सभी धर्मात्मा जीव हैं क्योंकि, प्रत्येक जीव में अनंत धर्म विद्यमान हैं। प्रत्येक आत्म [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>सराहनपुर में आचार्यश्री विमर्शसागर जी का चातुर्मास होने जा रहा है। यहां उन्होंने धर्मसभा को संबोधित कर समाजजनों को धर्म के बारे में दिशा-दर्शन दिया। <span style="color: #ff0000">सराहनरपुर से पढ़िए, सोनल जैन की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>सराहनपुर।</strong> संसार में जितने भी जीव हैं। वे सभी धर्मात्मा जीव हैं क्योंकि, प्रत्येक जीव में अनंत धर्म विद्यमान हैं। प्रत्येक आत्म प्रव्य अनंत धर्मात्मक गुणों का चित्पिंड है किन्तु वे सभी गुणधर्म वर्तमान में विभाव रूप से परिणमन कर रहे हैं और जीव अपने ही स्वभाव गुणों से परिचय न करके विभाव गुणों से ही प्रभावित होकर निरंतर दुःख ही दुःखों को भोग रहा है। जब तक आत्मा के शुद्ध स्वभाव एवं वर्तमान विभाव परिणमन की यथार्थता से परिचय कर जीव जिनेन्द्र भगवान द्वारा उपदिष्ट समीचीन मार्ग पर अग्रसर नहीं होता तब तक दुःखों की परंपरा निरंतर बढ़ती ही रहती है। ऐसा सम्यक धर्माेपदेश धर्मनगरी सहारनपुर के जैनबाग स्थित श्री महावीर जिनालय में चल रहे ‘श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान के मध्य ‘जीवन है पानी की बूंद’ महाकाव्य के मूल रचनाकार आचार्य श्री विमर्शसागर जी ने उपस्थित धर्मसभा को संबोधित करते हुए दिया।</p>
<p>आचार्य श्री ने बतलाया कि सिद्धों की आराधना करते-करते एक दिन स्वयं हमारी आत्मा भी सिद्ध स्वरूप हो जाती है। सिद्ध भगवानों की आराधना हमें बताती है कि जो गुण सिद्ध परमात्मा में प्रगट हैं वे ही अनंत गुण हम सबकी आत्मा में अप्रगट रूप से विधमान हैं। सिद्ध भगवंतों की आराधना प्रज्वलित दीप की भाँति हमारे आत्मा रूपी बुझे दीप को भी प्रज्वलित कर सिद्ध स्वरूप प्रगट करा देती है। 10 जुलाई से 21 अक्टूबर तक जैन धर्म के अनुसार यह च्यातुमसि का काल कहलाता है, जिसमें दिगम्बर जैन मुनि एक ही स्थान पर ठहरकर अपनी तप-साधना किया करते हैं। वर्ष 2025 में आचार्य श्री विमर्श सागर जी के विशाल चतुर्विध संघ का मंगलमय चातुर्मास कराने का महासौभाग्य सहारनपुर धर्मनगरी को प्राप्त हुआ। 4 माह के दीर्घ कालीन प्रवास में आचार्य संघ की सनिधि में बैठकर समाज एवं नगर के आबाल-वृद्ध अपने जीवन में दिव्य सूत्रों को उपलब्ध कर जीवन को एक नयी दशा एवं दिशा प्रदान कर सकेंगे। पूर्वजों का कहना है कि हम लोगों की याद में भी इतना विशाल चतुर्विध संघ प्रथम बार ही सहारनपुर में आया है। हम सब आचार्य संघ की सेवा-वैयावृत्ति करके अपने जीवन में सौभाग्यों का अवतरण करेंगे।</p>
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		<title>जैन मिलन विहार में आर्यिका उपसंघ का चातुर्मास: आचार्यश्री विमर्शसागर जी ने श्रावकों की भक्ति भावना सराही  </title>
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		<pubDate>Tue, 24 Jun 2025 08:30:16 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री विमर्शसागर जी (ससंघ 33 पिच्छी) के प्रथम बार मुजफ्फर नगर आगमन हुआ। 19 जून को आचार्य संघ ने मुजफ्फर नगर में मंगल पदार्पण किया। प्रेमपुरी, अबु पुरा, सुरेंद्रनगर कॉलोनी, मुनीम कॉलोनी, पटेलनगर के समाज को सौभाग्य प्रदान करते 23 जून को आचार्यश्री ससंघ जैन मिलन विहार एवं संध्या बेला में नयी मंडी जैन [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य श्री विमर्शसागर जी (ससंघ 33 पिच्छी) के प्रथम बार मुजफ्फर नगर आगमन हुआ। 19 जून को आचार्य संघ ने मुजफ्फर नगर में मंगल पदार्पण किया। प्रेमपुरी, अबु पुरा, सुरेंद्रनगर कॉलोनी, मुनीम कॉलोनी, पटेलनगर के समाज को सौभाग्य प्रदान करते 23 जून को आचार्यश्री ससंघ जैन मिलन विहार एवं संध्या बेला में नयी मंडी जैन मंदिर में पधारे। जैन मिलन विहार में उपस्थित धर्मसभा को संबोधित किया। <span style="color: #ff0000">मुजफ्फर नगर से पढ़िए, सोनल जैन की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुजफ्फर नगर</strong>। जैन समाज के मुख पर बस एक ही बात है। इतना विशाल संघ हमने अपने नगर में प्रथम बार देखा है। आचार्य प्रवर का वात्सल्य अनुपम है। सरलता की तो आचार्य साक्षात् मूर्ति हैं, आचार्य श्री के दर्शन करके तो लगता है। हमने साक्षात् महावीर भगवान के ही दर्शन कर लिए। आचार्य श्री विमर्शसागर जी (ससंघ 33 पिच्छी) के प्रथम बार मुजफ्फर नगर आगमन से भक्त समूह के मुखों से ऐसे ही उद्गार सामने आ रहे हैं। 19 जून को आचार्य संघ ने मुजफ्फर नगर में मंगल पदार्पण किया। प्रेमपुरी, अबु पुरा, सुरेंद्रनगर कॉलोनी, मुनीम कॉलोनी, पटेलनगर के समाज को सौभाग्य प्रदान करते 23 जून को आचार्यश्री ससंघ जैन मिलन विहार एवं संध्या बेला में नयी मंडी जैन मंदिर में पधारे। जैन मिलन विहार में उपस्थित धर्मसभा को संबोधित करते हुए आचार्य श्री ने कहा कि मोह घटता जाए, राग-द्वेष घटता जाए। आत्म शुद्धि के हेतु मन, प्रभु नाम रटता जाए। शुद्धि बिन बुद्धि, हो-ही-2 कोई काम न आये रे &#8230;.जीवन है पानी की बूंद, कब मिट जाये रे..।</p>
<p><strong>सुखी रहना है उदासीन हो जाओ </strong></p>
<p>किसी ने पूछा- भगवन् ! गृहस्थ जीवन में सुखपूर्वक कैसे जिया जा सकता है? मैंने कहा-गृहस्थ जीवन में यदि सुखपूर्वक रहना है तो आप उदासीन होकर जीवन जिएं। गृहस्थी में रहते हुए भी गृहस्थिक कार्य करते हुए भी उनसे विरक्त-उदासीन रहो। जिस प्रकार जल पर आपकी परछाई पड़ रही हो किन्तु परछाई जल में भींगती नहीं है। उसी प्रकार जो गृहस्थ घर, परिवार, व्यापार आदि कार्यों में उदासीन रहे तो वह घर, व्यापार आदि के पाप से लिप्त नहीं होता।</p>
<p><strong>आपको अपनी रुचि पहचानना चाहिए</strong></p>
<p>बंधुओं! आप किसी इष्ट व्यक्ति या पदार्थ के वियोग में दुःखी होते हैं तो आपको ज्ञात हो, आप उसके वियोग में दुःखी नहीं होते, आप वास्तव में अपने ही मोह-राग के कारण दुःखी होते हैं। आप जितने उदासीन भाव से पर पदार्थों में राग-मोह को घटाएंगे, आप उतने ही निराकुल और सुखी होते जाएंगे। इसीलिए वास्तव में दुःख का कारण पर पदार्थ नहीं है, अपितु पर पदार्थ के प्रति होने वाला आपका ही राग-द्वेष-मोह ही आपके दुःख का कारण है। आपको अपनी रुचि पहचानना चाहिए।</p>
<p><strong>आचार्यश्री ने दिया आशीर्वाद </strong></p>
<p>किसी की रुचि मीठे में होती है, किसी की रुचि नमकीन में होती है तो किसी खट्टे-चरपरे आदि में होती है पर सच कहूं &#8211; मुज़फ़्फ़र नगर वालों की रुचि दिगंबर रूप को ही देखने में है और उनकी सेवा-वैयावृत्ति करने में है। आपकी इस रुचि को मेरा आशीर्वाद है। यह ऐसे ही निरंतर बढ़ती जाए। मुजफ्फर नगर की जैन मिलन विहार जैन समाज को मंगलमय आशीर्वाद प्राप्त हुआ। आचार्य संघ से एक आर्यिका उपसंघ का मुजफ्फरनगर नगर में चातुर्मास होगा।</p>
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		<title>आचार्यश्री विमर्शसागर जी का मंगल प्रवेश सुरेंद्रनगर में: उल्लास और भक्ति से अगवानी में डूबे भक्तजन  </title>
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		<pubDate>Sun, 22 Jun 2025 16:47:15 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री विमर्शसागर जी इस वर्ष के मंगल चातुर्मास के लिए धर्मनगरी सहारनपुर की ओर निरंतर पद विहार कर रहे हैं। मुजफ्फर नगर में जब से आचार्य संघ के आने की खबर मिली, तभी से संपूर्ण नगर में अभूतपूर्व उत्साह, भक्ति देखी जा रही है। शनिवार को आचार्य चतुर्विध संघ पदविहार करते हुए सुरेंद्र नगर [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य श्री विमर्शसागर जी इस वर्ष के मंगल चातुर्मास के लिए धर्मनगरी सहारनपुर की ओर निरंतर पद विहार कर रहे हैं। मुजफ्फर नगर में जब से आचार्य संघ के आने की खबर मिली, तभी से संपूर्ण नगर में अभूतपूर्व उत्साह, भक्ति देखी जा रही है। शनिवार को आचार्य चतुर्विध संघ पदविहार करते हुए सुरेंद्र नगर कालोनी में पधारे। <span style="color: #ff0000">सुरेंद्रनगर से पढ़िए, सोनल जैन की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>सुरेंद्रनगर।</strong> मुजफ्फरनगर में 50 वर्षों के अंतराल बाद विशाल चतुर्विध संघ आचार्य पधारे। श्री भक्त समूह में जब-जब भक्ति की उत्तुंग लहरें उठती हैं तब-तब निर्ग्रन्य दिगंबर संतों के चरण रूपी सरिताएं उन भक्तसमूह की ओर बढ़ ही जाती हैं। आचार्य श्री विमर्शसागर जी इस वर्ष के मंगल चातुर्मास के लिए धर्मनगरी सहारनपुर की ओर निरंतर पद विहार कर रहे हैं। मुजफ्फर नगर में जब से आचार्य संघ के आने की खबर मिली, तभी से संपूर्ण नगर में अभूतपूर्व उत्साह, भक्ति देखी जा रही है। 17-18 जून को आचार्य ससंघ अतिशय क्षेत्र वहलना तथा 19-20 जून को प्रेमपुरी मुजफ्फर नगर में रहे। शनिवार को आचार्य चतुर्विध संघ सहित प्रातः काल की मंगल बेला में पदविहार करते हुए सुरेंद्र नगर कालोनी में पधारे। भक्तों ने आचार्य संघ की पलक-पांवड़े बिछाकर भव्यातिभव्य मंगल अगवानी की।</p>
<p><strong>तेरा लक्ष्य भगवान बनने का है</strong></p>
<p>सुरेंद्रनगर कॉलोनी में धर्मसभा में आचार्य श्री विमर्शसागर जी ने कहा कि जो गुरु दर्शन पाता है, मन उसका हर्षाता है। गुरु दर्शन गुण दर्शन है, वो गुणमय हो जाता है। गुरु गुण अभागी हो-हो-२, प्रभु गुणों को पाए रे&#8230; जीवन है पानी की बूंद, कब मिट जाये रे। उन्होंने कहा कि मनुष्य जीवन की हमारी यह यात्रा भगवान बनने की है। इस यात्रा में हमारा सबसे पहला परिचय होता है गुरु से। गुरु ही हमें बताते हैं कि बेटा ! तेरा लक्ष्य भगवान बनने का है, बेटा। भगवान बनने के लिए ही तू इस मानव पर्याय में आया है। गुरु ही बताते हैं, भगवान का स्वरूप क्या है और तेरे अंदर भी भगवान बीज की तरह विद्यमान हैं। यह भी सद्गुरु ही हमें बताते हैं। हम सबके परम उपकारी, कल्याणकारी होते हैं। परम दिगम्बर वीतरागी संत गुरुवर। बंधुओ! आप जीवन भर अपने परिवार की चिंता में गंवा देते हैं और विचार करते हैं कि पूरे परिवार को भी मेरी चिंता रहती है। किन्तु ध्यान रखना, आपके परिवारी जन आपके नश्वर शरीर की चिंता कर सकते हैं किन्तु आपके अविनाशी शाश्वत आत्मा की चिता यदि किसी को है तो वे एकमात्र सद्गुरु ही हो सकते हैं।</p>
<p><strong>सुख स्वरूप मोक्ष स्थान में स्थापित कर दूं</strong></p>
<p>निर्ग्रन्थ वीतरागी दिगम्बर गुरु सदाकाल यह भावना-चितवन करते हैं कि ष्इस संसार में यह जीव दुःखों को भोग रहा है, मैं कब इसे इन दुःखों से निकालकर सुख स्वरूप मोक्ष स्थान में स्थापित कर दूं। बंधुओ ! आज आप सद्गुरु के न्यरगों में बैठकर जिनेंद्र भगवान की वाणी सुन रहे हैं तो विश्वास करिये कि अब आप भी निकट भविष्य में स्वयं ही भगवान बनने वाले हैं। आपका पुष्प था हमारा योग बना, बस यह संयोग आज बन गया है। गुरु जनों का संयोग भव्य जीवों के भाग्य से ही प्राप्त होता है।</p>
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		<title>अपने मन को धार्मिक आजादी दें स्वच्छंद न बनाएं : आचार्य श्री विमर्शसागर जी ने प्रवचन में दी धर्म देशना  </title>
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		<pubDate>Sun, 15 Jun 2025 13:33:24 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्यश्री विमर्शसागर जी महाराज यहां अपने प्रवचनों से सभी जैन समाज के श्रावक-श्राविकाओं को जीवनोपयोगी संदेशों का रसपान करवा रहे हैं। उनके प्रवचन से सभी धर्मलाभ अर्जित कर रहे हैं। आचार्यश्री विमर्शसागर जी ने कहा कि अपने जीवन को सुंदर बनाने के लिए अपने मन को आज़ाद करना होगा। खतौली से पढ़िए, सोनम जैन की [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्यश्री विमर्शसागर जी महाराज यहां अपने प्रवचनों से सभी जैन समाज के श्रावक-श्राविकाओं को जीवनोपयोगी संदेशों का रसपान करवा रहे हैं। उनके प्रवचन से सभी धर्मलाभ अर्जित कर रहे हैं। आचार्यश्री विमर्शसागर जी ने कहा कि अपने जीवन को सुंदर बनाने के लिए अपने मन को आज़ाद करना होगा। <span style="color: #ff0000">खतौली से पढ़िए, सोनम जैन की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>खतौली।</strong> आचार्यश्री विमर्शसागर जी महाराज यहां अपने प्रवचनों से सभी जैन समाज के श्रावक-श्राविकाओं को जीवनोपयोगी संदेशों का रसपान करवा रहे हैं। उनके प्रवचन से सभी धर्मलाभ अर्जित कर रहे हैं। आचार्यश्री विमर्शसागर जी ने कहा कि अपने जीवन को सुंदर बनाने के लिए अपने मन को आज़ाद करना होगा। आप कहोगे कि गुरुदेव मन तो हमारा वैसे ही आजाद है, उसे क्या आजादी देनी? ध्यान रहे, आपका मन आज़ाद नहीं है, आपका मन स्वच्छंद है। आपका मन स्वच्छंद है पंचेन्द्रियों के पापवर्द्धक विषयों में। आपका मन स्वच्छंद है मन-वचन- काय की उद्दंडताओं में। आपका मन स्वच्छंद है पापों में एवं व्यसनों में। यह स्वच्छंदता आपकी असली आजादी नहीं है।उन्होंने आगे कहा कि वास्तविक आजादी वह है जहां आप धर्म कार्य करने के लिए स्वतंत्र हो।</p>
<p>अभी तो आप धर्म-अनुष्ठान भी परतंत्रता में करते हैं। यदि आपका मन अधिक समय मंदिर आदि धर्म स्थानों में लगने लग जाए तो परिवार के द्वारा आपके ऊपर प्रतिबंध लगा दिए जाते हैं। बन्धुओ ! जागना होगा, कब तक आप स्वच्छंदता को ही आज़ादी मानते रहोगे। आज़ादी का यह भ्रम आपको पतन मार्ग की ओर बढ़ा रहा है।</p>
<p>कर्तव्य पथ पर चलना मन की आज़ादी है। अहिंसा, सत्य, अन्चौर्य, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह आदि व्रत भावना रूप चिन्तन के लिए मन को स्वतंत्र कर देना मन की आज़ादी है। धार्मिक चिन्तन में मन स्वतंत्रता प्राप्त करे वही मन की सन्च्ची आज़ादी है। अपने मन को धार्मिक आजादी प्रदान करें। जीवन को खुशहाल बनाने के लिए मन को तीर्थ बनाना होगा । आपका मन तब ही तीर्थ बनेगा जब आप अपने मन को धार्मिक आज़ादी प्रदान करेंगे।</p>
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