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	<title>अहिंसा &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<title>अहिंसा &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>नेमि गिरनार धर्मयात्रा का अंबाह में भव्य मंगल प्रवेश : 5300 किमी की यात्रा के साथ पहुंचा धर्मरथ, गिरनार पहुंचने का दिया संदेश </title>
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		<pubDate>Thu, 02 Jul 2026 17:01:51 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[विश्व जैन संगठन के नेतृत्व में दिल्ली से निकली नेमि गिरनार धर्मयात्रा का अंबाह में भव्य स्वागत हुआ। 5300 किलोमीटर की यात्रा के साथ पहुंचे धर्मरथ ने भगवान नेमिनाथ के मोक्ष कल्याणक, अहिंसा, संयम, शाकाहार और राष्ट्रीय एकता का संदेश दिया। पढ़िए श्रीफल साथी अजय जैन की यह रिपोर्ट। अंबाह। विश्व जैन संगठन के राष्ट्रीय [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>विश्व जैन संगठन के नेतृत्व में दिल्ली से निकली नेमि गिरनार धर्मयात्रा का अंबाह में भव्य स्वागत हुआ। 5300 किलोमीटर की यात्रा के साथ पहुंचे धर्मरथ ने भगवान नेमिनाथ के मोक्ष कल्याणक, अहिंसा, संयम, शाकाहार और राष्ट्रीय एकता का संदेश दिया। <span style="color: #ff0000">पढ़िए श्रीफल साथी अजय जैन की यह रिपोर्ट।</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>अंबाह।</strong> विश्व जैन संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष संजय जैन के नेतृत्व में दिल्ली से प्रारंभ हुई नेमि गिरनार धर्मयात्रा का गुरुवार को अंबाह में श्रद्धा और उल्लास के साथ भव्य मंगल प्रवेश हुआ। नगर के विभिन्न स्थानों पर जैन समाज के श्रद्धालुओं ने पुष्पवर्षा कर यात्रा का स्वागत किया। लगभग 5300 किलोमीटर की यात्रा पूरी कर अंबाह पहुंचे धर्मरथ के स्वागत में बड़ी संख्या में समाजजन उपस्थित रहे।</p>
<p><strong>धर्मरथ और झांकी बने आकर्षण का केंद्र</strong></p>
<p>मंगल प्रवेश के दौरान भगवान नेमिनाथ की प्रतिमा सुसज्जित धर्मरथ में विराजमान रही। श्रद्धालुओं ने विधि-विधान से जलाभिषेक एवं पूजन कर दर्शन लाभ प्राप्त किया। रथ के साथ गिरनार तीर्थ की आकर्षक झांकी भी शामिल रही। यात्रा में लगभग एक किलोमीटर लंबा राष्ट्रीय तिरंगा एवं जैन पंचरंगा ध्वज विशेष आकर्षण का केंद्र रहे।</p>
<p><strong>नगर भ्रमण के बाद धर्मसभा</strong></p>
<p>यात्रा पोरसा चौराहा से प्रारंभ होकर नगर पालिका चौराहा, तहसील मार्ग एवं मुरैना रोड होते हुए श्री महावीर जिनालय पहुंची। यहां आयोजित विशाल धर्मसभा में विश्व जैन संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष संजय जैन सहित अन्य अतिथियों का पगड़ी, पटका एवं स्मृति चिन्ह भेंट कर स्वागत किया गया।</p>
<p><strong>गिरनार पहुंचने का किया आह्वान</strong></p>
<p>धर्मसभा को संबोधित करते हुए संजय जैन ने कहा कि धर्मयात्रा का उद्देश्य आगामी 20 जुलाई को भगवान नेमिनाथ के मोक्ष कल्याणक महोत्सव पर गुजरात के पावन गिरनार पर्वत में आयोजित ऐतिहासिक कार्यक्रम में देशभर के श्रद्धालुओं की सहभागिता सुनिश्चित करना है। उन्होंने बताया कि श्रद्धालु लगभग 22 हजार सीढ़ियां चढ़कर भगवान नेमिनाथ को निर्वाण लाडू अर्पित करेंगे।</p>
<p><strong>अहिंसा, संयम और राष्ट्रीय एकता का संदेश</strong></p>
<p>समाज के संजीव जैन बिल्लू ने बताया कि धर्मयात्रा 25 जून को दिल्ली से प्रारंभ होकर विभिन्न राज्यों से होते हुए 19 जुलाई को गिरनार पहुंचेगी। संतोष जैन एवं विमल जैन राजू ने बताया कि यात्रा का उद्देश्य भगवान नेमिनाथ के अहिंसा, त्याग, संयम, करुणा एवं शाकाहार के संदेश का प्रचार-प्रसार करना, व्यसनमुक्ति, राष्ट्रीय एकता, सामाजिक समरसता तथा सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के प्रति जनजागरण करना है।</p>
<p><strong>श्रद्धालुओं की रही उत्साहपूर्ण सहभागिता</strong></p>
<p>पूरे कार्यक्रम में बड़ी संख्या में महिला-पुरुष, युवा एवं बच्चों ने भाग लिया। भगवान नेमिनाथ के जयघोष, भक्ति गीतों और धार्मिक वातावरण के बीच यात्रा का स्वागत किया गया। अंत में समाज के पदाधिकारियों ने सभी श्रद्धालुओं, कार्यकर्ताओं एवं नगरवासियों का आभार व्यक्त किया।</p>
<p><strong>पूरी खबर 5 प्रमुख बिंदुओं में</strong></p>
<p><img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/1f4cd.png" alt="📍" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /> लोकेशन: अंबाह</p>
<p><img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/1f58b.png" alt="🖋" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /> श्रीफल साथी: अजय जैन</p>
<p>1. दिल्ली से निकली नेमि गिरनार धर्मयात्रा का अंबाह में भव्य मंगल प्रवेश हुआ।</p>
<p>2. लगभग 5300 किमी की यात्रा के साथ धर्मरथ और गिरनार की झांकी श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र रही।</p>
<p>3. धर्मसभा में 20 जुलाई को भगवान नेमिनाथ के मोक्ष कल्याणक पर गिरनार पहुंचने का आह्वान किया गया।</p>
<p>4. यात्रा के माध्यम से अहिंसा, संयम, शाकाहार, व्यसनमुक्ति और राष्ट्रीय एकता का संदेश दिया गया।</p>
<p>5. बड़ी संख्या में समाजजन, युवा और महिलाओं ने यात्रा का स्वागत कर धर्मसभा में सहभागिता की।</p>
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		<title>महात्मा गांधी को जिनसे अहिंसा के मार्ग पर दृढ़तापूर्वक चलने की प्रेरणा मिली : श्रीमद् राजचंद्र का अद्वितीय आध्यात्मिक व्यक्तित्व </title>
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		<pubDate>Tue, 30 Jun 2026 13:37:48 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[भारतीय अध्यात्म के महान संत एवं जैन दर्शन के प्रखर विचारक श्रीमद् राजचंद्र ने अपने आत्मज्ञान, साहित्य और जीवनदर्शन से करोड़ों लोगों को प्रेरित किया। महात्मा गांधी ने भी उन्हें अपना प्रमुख आध्यात्मिक मार्गदर्शक माना। पढ़िए श्रीफल साथी डॉ. यतीश जैन का यह विशेष आलेख। विशेष आलेख। भारतीय अध्यात्म के इतिहास में श्रीमद् राजचंद्र का [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>भारतीय अध्यात्म के महान संत एवं जैन दर्शन के प्रखर विचारक श्रीमद् राजचंद्र ने अपने आत्मज्ञान, साहित्य और जीवनदर्शन से करोड़ों लोगों को प्रेरित किया। महात्मा गांधी ने भी उन्हें अपना प्रमुख आध्यात्मिक मार्गदर्शक माना। <span style="color: #ff0000">पढ़िए श्रीफल साथी डॉ. यतीश जैन का यह विशेष आलेख।</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>विशेष आलेख।</strong> भारतीय अध्यात्म के इतिहास में श्रीमद् राजचंद्र का नाम अत्यंत सम्मान और श्रद्धा के साथ लिया जाता है। वे केवल जैन धर्म के महान दार्शनिक, आत्मज्ञानी संत और साहित्यकार ही नहीं थे, बल्कि आधुनिक भारत के आध्यात्मिक पुनर्जागरण के प्रमुख प्रेरणास्रोत भी थे। सत्य, अहिंसा, करुणा, क्षमा, अपरिग्रह और आत्मशुद्धि पर आधारित उनका दर्शन आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना उनके जीवनकाल में था। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने स्वयं स्वीकार किया था कि उनके जीवन पर सर्वाधिक प्रभाव डालने वाले व्यक्तियों में श्रीमद् राजचंद्र का स्थान सर्वोच्च था।</p>
<p><strong>विलक्षण प्रतिभा और आध्यात्मिक चेतना</strong></p>
<p>श्रीमद् राजचंद्र का जन्म 9 नवम्बर 1867 को गुजरात के मोरबी जिले के वावाणिया ग्राम में रायचंदभाई रवजीभाई मेहता के रूप में हुआ। बचपन से ही उनमें असाधारण स्मरणशक्ति, गहन आध्यात्मिक जिज्ञासा और विलक्षण प्रतिभा दिखाई देने लगी थी। शतावधान जैसी कठिन कला में उनकी दक्षता ने उन्हें कम आयु में ही पूरे देश में प्रसिद्ध बना दिया। कहा जाता है कि बाल्यकाल में ही उन्हें पूर्वजन्म का स्मरण होने से उनके भीतर वैराग्य और आत्मचिंतन की भावना अत्यंत प्रबल हो गई थी।</p>
<p><strong>गृहस्थ रहते हुए भी आत्मसाधना का आदर्श</strong></p>
<p>यद्यपि श्रीमद् राजचंद्र गृहस्थ जीवन में रहे और व्यापार भी करते थे, लेकिन उनका जीवन पूर्णतः आत्मकल्याण, सत्य की खोज और आध्यात्मिक साधना को समर्पित रहा। उन्होंने यह सिद्ध किया कि मोक्ष केवल संन्यासियों का अधिकार नहीं, बल्कि गृहस्थ भी सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चरित्र के माध्यम से आत्मोन्नति प्राप्त कर सकता है।</p>
<p><strong>&#8216;आत्मसिद्धि शास्त्र&#8217; सहित अमर साहित्य</strong></p>
<p>श्रीमद् राजचंद्र ने अनेक आध्यात्मिक ग्रंथों की रचना की, जिनमें &#8216;आत्मसिद्धि शास्त्र&#8217; सर्वाधिक प्रसिद्ध है। केवल 142 पदों में रचित यह कृति आत्मा, कर्म, पुनर्जन्म, मोक्ष और सद्गुरु के स्वरूप का अत्यंत सरल एवं तर्कपूर्ण विवेचन प्रस्तुत करती है। इसके अतिरिक्त मोक्षमाला, भावनाबोध, अपूर्व अवसर तथा उनके पत्र आज भी आध्यात्मिक साधकों के लिए अमूल्य मार्गदर्शक माने जाते हैं।</p>
<p><strong>महात्मा गांधी के आध्यात्मिक मार्गदर्शक</strong></p>
<p>दक्षिण अफ्रीका प्रवास के दौरान महात्मा गांधी ने धर्म, आत्मा, सत्य, ईश्वर और अहिंसा से जुड़े अनेक प्रश्न श्रीमद् राजचंद्र को पत्रों के माध्यम से भेजे। श्रीमद् राजचंद्र ने अपने अनुभव और तर्कपूर्ण उत्तरों से गांधीजी की शंकाओं का समाधान किया। गांधीजी ने स्वीकार किया कि सत्य और अहिंसा के मार्ग पर अडिग रहने की प्रेरणा उन्हें श्रीमद् राजचंद्र से मिली। इस दृष्टि से भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की नैतिक चेतना के निर्माण में भी उनका अप्रत्यक्ष योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।</p>
<p><strong>अहिंसा, करुणा और आत्मशुद्धि का संदेश</strong></p>
<p>श्रीमद् राजचंद्र का संपूर्ण जीवन आत्मानुभूति, करुणा, सत्य, अहिंसा और वैराग्य का जीवंत उदाहरण रहा। वे मानते थे कि वास्तविक धर्म बाहरी आडंबरों में नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि, सदाचार और समत्व में निहित है। अनेकांतवाद, सहिष्णुता और समस्त जीवों के प्रति करुणा का उनका संदेश आज के तनावपूर्ण और हिंसाग्रस्त विश्व में भी अत्यंत प्रासंगिक है।</p>
<p><strong>अमर आध्यात्मिक विरासत</strong></p>
<p>9 अप्रैल 1901 को मात्र 33 वर्ष की आयु में श्रीमद् राजचंद्र का देहावसान हो गया, किंतु उनकी वाणी, साहित्य और जीवनदर्शन आज भी मानवता का मार्गदर्शन कर रहे हैं। भारतीय संस्कृति के अमर महापुरुषों में उनका स्थान सदैव अविस्मरणीय रहेगा। उनका व्यक्तित्व भारतीय अध्यात्म के आकाश में ध्रुवतारे के समान है, जिसकी दिव्य ज्योति आने वाली पीढ़ियों को सत्य, अहिंसा और आत्मज्ञान के पथ पर निरंतर प्रेरित करती रहेगी।</p>
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		<title>मेनका गांधी के विवादित बयान पर जैन समाज का कानूनी एक्शन : सार्वजनिक माफी और बयान वापस लेने की मांग, 7 दिन का नोटिस </title>
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		<pubDate>Tue, 30 Jun 2026 13:34:22 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[पूर्व केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी के दिगंबर जैन संतों को लेकर दिए गए विवादित बयान के विरोध में जैन समाज ने अधिवक्ता के माध्यम से कानूनी नोटिस भेजा है। नोटिस में सात दिन के भीतर सार्वजनिक माफी एवं बयान वापस लेने की मांग की गई है। पढ़िए श्रीफल साथी राजेश जैन दद्दू की यह रिपोर्ट। [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>पूर्व केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी के दिगंबर जैन संतों को लेकर दिए गए विवादित बयान के विरोध में जैन समाज ने अधिवक्ता के माध्यम से कानूनी नोटिस भेजा है। नोटिस में सात दिन के भीतर सार्वजनिक माफी एवं बयान वापस लेने की मांग की गई है। <span style="color: #ff0000">पढ़िए श्रीफल साथी राजेश जैन दद्दू की यह रिपोर्ट।</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> पूर्व केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी द्वारा दिगंबर जैन संतों के संबंध में दिए गए विवादित बयान को लेकर जैन समाज ने कड़ा विरोध दर्ज कराया है। समाज के प्रतिनिधियों ने उनके बयान को असत्य, निराधार, भ्रामक तथा जैन समाज की धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाला बताते हुए अधिवक्ता के माध्यम से रजिस्टर्ड कानूनी नोटिस प्रेषित किया है।</p>
<p><strong>समाज पदाधिकारियों ने जताई कड़ी आपत्ति</strong></p>
<p>जैन समाज के वरिष्ठ समाजसेवी डॉ. जैनेन्द्र जैन, मयंक जैन, राजेश जैन दद्दू, टी.के. वेद, हंसमुख गांधी, आनंद नवीन गोधा तथा महिला परिषद की संभागीय अध्यक्ष श्रीमती मुक्ता जैन ने संयुक्त रूप से कहा कि दिगंबर जैन संतों के संबंध में लगाए गए आरोप तथ्यहीन हैं और इससे करोड़ों जैन श्रद्धालुओं की आस्था को ठेस पहुंची है।</p>
<p><strong>नोटिस में किए गए प्रमुख कानूनी उल्लेख</strong></p>
<p>कानूनी नोटिस में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 295A के अंतर्गत धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने, धारा 499 एवं 500 के अंतर्गत मानहानि तथा सोशल मीडिया पर कथित प्रसार की स्थिति में सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की संबंधित धाराओं का उल्लेख किया गया है। नोटिस में कहा गया है कि यदि निर्धारित अवधि में संतोषजनक जवाब नहीं दिया गया तो उपलब्ध कानूनी प्रावधानों के तहत आगे की कार्रवाई की जाएगी।</p>
<p><strong>जैन समाज ने रखा अपना पक्ष</strong></p>
<p>मयंक जैन ने बताया कि नोटिस में स्पष्ट किया गया है कि जैन धर्म का मूल सिद्धांत &#8220;अहिंसा परमो धर्मः&#8221; है। दिगंबर मुनियों द्वारा उपयोग की जाने वाली पिच्छी प्राकृतिक रूप से गिरे हुए मोरपंखों से बनाई जाती है तथा किसी भी जीव की हिंसा जैन धर्म में पूर्णतः निषिद्ध मानी गई है। समाज ने कहा कि मोरों की हत्या संबंधी आरोप पूरी तरह निराधार हैं और इससे जैन धर्म एवं संत परंपरा की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंची है।</p>
<p><strong>सात दिन में मांगा जवाब</strong></p>
<p>नोटिस में मेनका गांधी से सात दिवस के भीतर सार्वजनिक रूप से माफी मांगने तथा अपना बयान वापस लेने की मांग की गई है। साथ ही चेतावनी दी गई है कि यदि समयसीमा के भीतर संतोषजनक उत्तर प्राप्त नहीं हुआ तो आपराधिक एवं सिविल मानहानि संबंधी कानूनी कार्रवाई की जाएगी।</p>
<p><strong>समाज ने एकजुटता का दिया संदेश</strong></p>
<p>विश्व जैन संगठन, राष्ट्रीय जिन शासन एकता संघ तथा अन्य समाज प्रतिनिधियों ने कहा कि दिगंबर जैन संतों पर हिंसा का आरोप जैन समाज की धार्मिक आस्था पर सीधा प्रहार है। समाज ने तथ्यों के आधार पर संवाद बनाए रखने और धार्मिक विषयों पर सार्वजनिक टिप्पणी करते समय सावधानी बरतने की आवश्यकता पर भी बल दिया।</p>
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		<title>दीक्षा से दिशा तक : आचार्य विद्यासागर जी के 69वें दीक्षा दिवस पर विनम्र श्रद्धांजलि </title>
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		<pubDate>Tue, 30 Jun 2026 13:27:42 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य विद्यासागर जी महाराज के 69वें दीक्षा दिवस पर प्रस्तुत यह विशेष लेख उनके तप, त्याग, साहित्य, शिक्षा, स्वदेशी और मानवता के प्रति अमूल्य योगदान को स्मरण कर आत्मसंयम एवं आत्मोत्कर्ष का संदेश देता है। पढ़िए श्रीफल साथी डॉ. जयेन्द्र जैन &#8216;निप्पू चन्देरी&#8217; की यह रिपोर्ट। चन्देरी। भारतीय संस्कृति के विराट आकाश में कुछ व्यक्तित्व [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>आचार्य विद्यासागर जी महाराज के 69वें दीक्षा दिवस पर प्रस्तुत यह विशेष लेख उनके तप, त्याग, साहित्य, शिक्षा, स्वदेशी और मानवता के प्रति अमूल्य योगदान को स्मरण कर आत्मसंयम एवं आत्मोत्कर्ष का संदेश देता है। <span style="color: #ff0000">पढ़िए श्रीफल साथी डॉ. जयेन्द्र जैन &#8216;निप्पू चन्देरी&#8217; की यह रिपोर्ट।</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>चन्देरी।</strong> भारतीय संस्कृति के विराट आकाश में कुछ व्यक्तित्व ऐसे उदित होते हैं, जिनका प्रकाश केवल अपने युग तक सीमित नहीं रहता, बल्कि आने वाली पीढ़ियों का भी मार्ग आलोकित करता है। पूज्य आचार्य विद्यासागर जी महाराज ऐसे ही युगऋषि थे। उनका 69वाँ दीक्षा दिवस केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आत्मचिंतन, आत्मसंयम और आत्मोत्कर्ष का राष्ट्रीय प्रेरणा पर्व है।</p>
<p><strong>दीक्षा का वास्तविक अर्थ</strong></p>
<p>जैन दर्शन में दीक्षा का अर्थ संसार से पलायन नहीं, बल्कि राग से विराग, संग्रह से अपरिग्रह, हिंसा से अहिंसा और अज्ञान से आत्मज्ञान की ओर यात्रा है। यही साधना एक सामान्य मनुष्य को महापुरुष के रूप में स्थापित करती है। भगवान महावीर के संयम मार्ग को आधुनिक भारत में जन-जन तक पहुँचाने वाले संतों में आचार्य विद्यासागर जी का स्थान अत्यंत विशिष्ट है।</p>
<p><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone size-medium wp-image-108749" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2026/06/IMG-20260630-WA0037-258x300.jpg" alt="" width="258" height="300" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2026/06/IMG-20260630-WA0037-258x300.jpg 258w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2026/06/IMG-20260630-WA0037.jpg 404w" sizes="(max-width: 258px) 100vw, 258px" /></p>
<p><strong>तप, त्याग और चरित्र की अनुपम मिसाल</strong></p>
<p>आचार्य विद्यासागर जी का जीवन इस सत्य का प्रमाण है कि महानता पद, प्रतिष्ठा और प्रसिद्धि से नहीं, बल्कि आत्मसंयम, तप और त्याग से प्राप्त होती है। उन्होंने कभी सत्ता या वैभव की इच्छा नहीं की, फिर भी देश के सर्वोच्च पदों पर आसीन व्यक्तित्व उनके चरणों में श्रद्धापूर्वक नतमस्तक हुए। उनके जीवन ने शिक्षा, सेवा, संस्कार और लोकमंगल की अमूल्य धरोहर समाज को प्रदान की।</p>
<p><strong>जैन दर्शन का सजीव स्वरूप</strong></p>
<p>उनका संपूर्ण जीवन जैन दर्शन के तीन मूल आधार—सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र—का जीवंत उदाहरण रहा। उन्होंने केवल शास्त्रों का अध्ययन नहीं किया, बल्कि उन्हें अपने आचरण में उतारकर जीवन का आदर्श प्रस्तुत किया। यही कारण है कि उनके प्रत्येक उपदेश में अनुभव, साधना और सत्य की अनुभूति स्पष्ट दिखाई देती है।</p>
<p><strong>साहित्य साधना का अमर योगदान</strong></p>
<p>आचार्य श्री जितने महान तपस्वी थे, उतने ही विलक्षण साहित्यकार भी थे। उन्होंने सिद्ध किया कि जब साधना शब्दों में अभिव्यक्त होती है, तब साहित्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि आत्मजागरण का माध्यम बन जाता है।</p>
<p>उनकी कालजयी कृति &#8216;मूक माटी&#8217; आधुनिक हिन्दी साहित्य की अमूल्य धरोहर है। इस महाकाव्य में जैन दर्शन, भारतीय संस्कृति, आत्मा, कर्म और जीवन के गहन रहस्यों को अत्यंत सहज एवं काव्यात्मक शैली में प्रस्तुत किया गया है। &#8220;मूक&#8221; और &#8220;माटी&#8221; के माध्यम से उन्होंने मौन, विनम्रता और आत्मचेतना का गहन संदेश दिया है।</p>
<p><strong>जीवन-दर्शन से परिपूर्ण रचनाएँ</strong></p>
<p>&#8216;नर्मदा में नरम कंकड़&#8217; केवल प्रकृति का चित्रण नहीं, बल्कि जीवन की निरंतर साधना और परिवर्तन का प्रेरक दर्शन है। वहीं &#8216;तोता क्यों रोता&#8217; जैसी रचना जीवदया, करुणा, स्वतंत्रता और अहिंसा का ऐसा संदेश देती है, जो बालमन के साथ-साथ प्रत्येक संवेदनशील व्यक्ति के हृदय को स्पर्श करती है।</p>
<p><strong>हाइकु में आत्मानुभूति</strong></p>
<p>आचार्य श्री के हाइकु उनकी साहित्यिक प्रतिभा के अद्भुत उदाहरण हैं। अत्यल्प शब्दों में गहन अनुभूति व्यक्त करते हुए उन्होंने प्रकृति, मौन, साधना, समय, करुणा और आत्मबोध को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त किया। उनके लिए साहित्य शब्दों का प्रदर्शन नहीं, बल्कि आत्मानुभूति की सहज अभिव्यक्ति था।</p>
<p><strong>समाज के लिए प्रेरणा</strong></p>
<p>आचार्य विद्यासागर जी का संपूर्ण जीवन आज भी समाज को संयम, स्वदेशी, शिक्षा, सेवा, संस्कृति, पर्यावरण संरक्षण और मानवीय मूल्यों की ओर प्रेरित करता है। उनका तपस्वी जीवन यह संदेश देता है कि वास्तविक उन्नति बाहरी साधनों से नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, चरित्र और करुणा से प्राप्त होती है।</p>
<p><strong>(क्रमशः…)</strong></p>
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		<title>जैन संतों की पिच्छिका पर टिप्पणी को लेकर मेनका गांधी के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की चेतावनी : जयपुर में जैन समाज ने जताया तीव्र विरोध, बयान वापस लेकर सार्वजनिक माफी की मांग </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shree Phal News]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 28 Jun 2026 15:47:24 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन संतों की पिच्छिका को लेकर पूर्व केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी की कथित टिप्पणी पर जयपुर के जैन समाज में तीव्र आक्रोश है। विभिन्न संगठनों ने बयान को भ्रामक बताते हुए कानूनी कार्रवाई और सार्वजनिक माफी की मांग की है। पढ़िए श्रीफल साथी की यह रिपोर्ट। जयपुर। सोशल मीडिया पर जैन संतों की पिच्छिका को [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जैन संतों की पिच्छिका को लेकर पूर्व केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी की कथित टिप्पणी पर जयपुर के जैन समाज में तीव्र आक्रोश है। विभिन्न संगठनों ने बयान को भ्रामक बताते हुए कानूनी कार्रवाई और सार्वजनिक माफी की मांग की है। <span style="color: #ff0000">पढ़िए श्रीफल साथी की यह रिपोर्ट।</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>जयपुर।</strong> सोशल मीडिया पर जैन संतों की पिच्छिका को लेकर पूर्व केंद्रीय मंत्री एवं भाजपा नेता मेनका गांधी की कथित टिप्पणी के बाद जयपुर के जैन समाज में भारी आक्रोश व्याप्त है। विभिन्न जैन संगठनों के पदाधिकारियों ने इसे तथ्यहीन, निराधार और जैन धर्म की मूल भावना के विपरीत बताते हुए कड़ी आपत्ति दर्ज कराई है।</p>
<p><strong>विभिन्न संगठनों ने जताया विरोध</strong></p>
<p>राजस्थान जैन सभा जयपुर के अध्यक्ष सुभाष चंद जैन, राजस्थान जैन युवा महासभा जयपुर के प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप जैन, श्री मुनि संघ सेवा समिति बापूनगर के अध्यक्ष राजीव जैन गाजियाबाद तथा श्री धर्म जागृति संस्थान के प्रदेश अध्यक्ष पदम चंद बिलाला ने कहा कि जैन संतों के संबंध में भ्रामक जानकारी प्रसारित करना समाज की धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाला है।</p>
<p><strong>पिच्छिका को लेकर रखा पक्ष</strong></p>
<p>राजस्थान जैन सभा के महामंत्री मनीष बैद ने कहा कि दिगंबर जैन संतों की पवित्र मयूर पंख की पिच्छिका किसी भी जीव की हत्या से नहीं बनाई जाती। उन्होंने स्पष्ट किया कि पिच्छिका के लिए प्राकृतिक रूप से मोर द्वारा छोड़े गए पंखों का ही उपयोग किया जाता है। जैन धर्म का मूल सिद्धांत अहिंसा है और किसी भी जीव की हिंसा की कल्पना तक नहीं की जा सकती।</p>
<p><strong>कानूनी कार्रवाई की चेतावनी</strong></p>
<p>राजस्थान जैन युवा महासभा जयपुर के प्रदेश महामंत्री विनोद जैन कोटखावदा ने कहा कि यदि कथित भ्रामक वीडियो सोशल मीडिया से नहीं हटाया गया और इस संबंध में स्पष्टीकरण नहीं दिया गया तो जैन समाज आईटी एक्ट तथा धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने से संबंधित कानूनी प्रावधानों के तहत कार्रवाई करेगा।</p>
<p><strong>संतों की चर्या पर टिप्पणी पर आपत्ति</strong></p>
<p>समाज के पदाधिकारियों ने कहा कि जैन संतों का संपूर्ण जीवन संयम, त्याग और जीवों की रक्षा के लिए समर्पित होता है। ऐसे संतों की चर्या पर बिना तथ्यों के टिप्पणी करना करोड़ों जैन अनुयायियों की भावनाओं को आहत करता है तथा सामाजिक सौहार्द के लिए भी उचित नहीं है।</p>
<p><strong>एक जुलाई को सौंपा जाएगा ज्ञापन</strong></p>
<p>समाज के प्रतिनिधियों ने बताया कि आगामी 1 जुलाई को विभिन्न जैन संस्थाओं द्वारा भाजपा नेतृत्व को ज्ञापन सौंपकर अपना विरोध दर्ज कराया जाएगा। साथ ही मेनका गांधी से बिना शर्त अपना बयान वापस लेने और जैन संत समाज से सार्वजनिक रूप से क्षमा याचना करने की मांग की गई है।</p>
<p><strong>समाज की अपील</strong></p>
<p>जैन समाज के प्रतिनिधियों ने कहा कि धार्मिक विषयों पर सार्वजनिक वक्तव्य देते समय तथ्यों का ध्यान रखा जाना चाहिए। समाज ने स्पष्ट किया कि संतों की मर्यादा और चर्या पर आधारहीन आरोप किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किए जाएंगे।</p>
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		<title>महात्मा गांधी को जिनसे अहिंसा के मार्ग पर दृढ़तापूर्वक चलने की प्रेरणा मिली : श्रीमद् राजचंद्र जी : भारतीय अध्यात्म, आत्मज्ञान और अहिंसा के अमर प्रेरणास्रोत </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shree Phal News]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 28 Jun 2026 14:14:48 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[भारतीय अध्यात्म के महान संत श्रीमद् राजचंद्र के जीवन, दर्शन और महात्मा गांधी पर उनके गहरे प्रभाव को रेखांकित करता यह लेख आत्मज्ञान, सत्य, अहिंसा और करुणा का प्रेरक संदेश देता है। पढ़िए डॉ यतीश जैन जबलपुर का आलेख. प्रस्तुति श्रीफल साथी राजेश जैन रागी बकस्वाहा की जबलपुर। भारतीय अध्यात्म के इतिहास में श्रीमद् राजचंद्र [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>भारतीय अध्यात्म के महान संत श्रीमद् राजचंद्र के जीवन, दर्शन और महात्मा गांधी पर उनके गहरे प्रभाव को रेखांकित करता यह लेख आत्मज्ञान, सत्य, अहिंसा और करुणा का प्रेरक संदेश देता है। <span style="color: #ff0000">पढ़िए डॉ यतीश जैन जबलपुर का आलेख. प्रस्तुति श्रीफल साथी राजेश जैन रागी बकस्वाहा की</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>जबलपुर।</strong> भारतीय अध्यात्म के इतिहास में श्रीमद् राजचंद्र का नाम अत्यंत श्रद्धा और सम्मान के साथ लिया जाता है। वे जैन धर्म के महान दार्शनिक, आत्मज्ञानी संत, साहित्यकार और आधुनिक भारत के आध्यात्मिक पुनर्जागरण के प्रमुख प्रेरणास्रोत माने जाते हैं। महात्मा गांधी ने भी उन्हें अपना आध्यात्मिक मार्गदर्शक स्वीकार किया था।</p>
<p><strong>जन्म और विलक्षण प्रतिभा</strong></p>
<p>श्रीमद् राजचंद्र का जन्म 9 नवम्बर 1867 को गुजरात के मोरबी जिले के वावाणिया ग्राम में हुआ। उनका मूल नाम रायचंदभाई रवजीभाई मेहता था। बचपन से ही उनमें अद्भुत स्मरणशक्ति, आध्यात्मिक जिज्ञासा और शतावधान जैसी विलक्षण क्षमता दिखाई देने लगी थी। अल्पायु में ही उन्होंने पूरे देश में अपनी विशिष्ट पहचान बना ली।</p>
<p><strong>गृहस्थ जीवन में भी आत्मसाधना</strong></p>
<p>व्यापार और गृहस्थ जीवन का निर्वहन करते हुए भी उनका मन आत्मकल्याण, सत्य की खोज और आध्यात्मिक साधना में लगा रहा। उन्होंने यह संदेश दिया कि मोक्ष केवल संन्यासियों के लिए नहीं, बल्कि गृहस्थ भी सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चरित्र के माध्यम से आत्मोन्नति प्राप्त कर सकते हैं।</p>
<p><strong>साहित्य बना आध्यात्मिक मार्गदर्शक</strong></p>
<p>श्रीमद् राजचंद्र द्वारा रचित आत्मसिद्धि शास्त्र उनकी सर्वाधिक प्रसिद्ध कृति है। इसके अतिरिक्त मोक्षमाला, भावनाबोध, अपूर्व अवसर तथा उनके पत्र आज भी आध्यात्मिक साधकों के लिए प्रेरणास्रोत माने जाते हैं। उनकी रचनाओं में अनुभव, तर्क और सरल भाषा का अद्भुत समन्वय मिलता है।</p>
<p><strong>महात्मा गांधी पर गहरा प्रभाव</strong></p>
<p>दक्षिण अफ्रीका प्रवास के दौरान महात्मा गांधी ने धर्म, आत्मा, सत्य और अहिंसा से जुड़े अनेक प्रश्न श्रीमद् राजचंद्र को भेजे। उनके स्पष्ट और तर्कपूर्ण उत्तरों ने गांधीजी के विचारों को नई दिशा दी। गांधीजी ने स्वीकार किया था कि सत्य और अहिंसा के मार्ग पर दृढ़ता से चलने की प्रेरणा उन्हें श्रीमद् राजचंद्र से मिली।</p>
<p><strong>आत्मज्ञान और अहिंसा का संदेश</strong></p>
<p>श्रीमद् राजचंद्र ने सदैव आत्मशुद्धि, करुणा, अनेकांतवाद, सहिष्णुता और सभी जीवों के प्रति दया का संदेश दिया। उनका मानना था कि वास्तविक धर्म बाहरी आडंबरों में नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि, सदाचार और समत्व में निहित है।</p>
<p><strong>अमर आध्यात्मिक विरासत</strong></p>
<p>केवल 33 वर्ष की आयु में 9 अप्रैल 1901 को उनका देहावसान हो गया, किंतु उनका जीवन, साहित्य और दर्शन आज भी करोड़ों लोगों का मार्गदर्शन कर रहा है। भारतीय अध्यात्म के ध्रुवतारे के रूप में श्रीमद् राजचंद्र का व्यक्तित्व आने वाली पीढ़ियों को भी सत्य, अहिंसा और आत्मकल्याण के पथ पर प्रेरित करता रहेगा।</p>
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		<title>जैन संतों पर अभद्र टिप्पणी का मामला : मेनका गांधी को एक करोड़ रुपये का मानहानि नोटिस </title>
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		<pubDate>Thu, 25 Jun 2026 16:54:51 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन संतों द्वारा उपयोग की जाने वाली पिच्छी को लेकर दिए गए कथित बयान के विरोध में जैन समाज ने पूर्व केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी को एक करोड़ रुपये का मानहानि नोटिस भेजा है। समाज ने बयान को असत्य, भ्रामक और धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाला बताया है। पढ़िए श्रीफल साथी राजेश जैन दद्दू [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>जैन संतों द्वारा उपयोग की जाने वाली पिच्छी को लेकर दिए गए कथित बयान के विरोध में जैन समाज ने पूर्व केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी को एक करोड़ रुपये का मानहानि नोटिस भेजा है। समाज ने बयान को असत्य, भ्रामक और धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाला बताया है। <span style="color: #ff0000">पढ़िए श्रीफल साथी राजेश जैन दद्दू की यह रिपोर्ट।</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> पूर्व केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी द्वारा जैन संतों के धार्मिक उपकरण पिच्छी को लेकर दिए गए कथित बयान के विरोध में देशभर के जैन समाज ने कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी है। विश्व जैन संगठन एवं राष्ट्रीय जिन शासन एकता संघ के प्रचारक राजेश जैन दद्दू ने बताया कि समाज की विभिन्न संस्थाओं ने मेनका गांधी को एक करोड़ रुपये का मानहानि नोटिस भेजा है।</p>
<p><strong>क्या है पूरा मामला</strong></p>
<p>राजेश जैन दद्दू के अनुसार, हाल ही में दिगंबर जैन संत आचार्य श्री सौरभ सागर महाराज के दिल्ली प्रवास के दौरान मेनका गांधी ने जैन मुनियों द्वारा उपयोग की जाने वाली मयूर पिच्छी के संबंध में कथित रूप से टिप्पणी की थी। समाज का आरोप है कि इस टिप्पणी में मोरों की हत्या कर पंख प्राप्त करने जैसी बात कही गई, जिसे जैन समाज ने तथ्यहीन और भ्रामक बताया है।</p>
<p><strong>23 जून को भेजा गया कानूनी नोटिस</strong></p>
<p>जानकारी के अनुसार, 23 जून को मुजफ्फरनगर के अधिवक्ता निपुण जैन के माध्यम से भारतवर्षीय सकल दिगंबर जैन समाज, जैन युवा संगठन, विश्व जैन संगठन, राष्ट्रीय जिन शासन एकता संघ तथा श्री णमोकार महामंत्र समिति सहित विभिन्न संस्थाओं ने 10 पृष्ठों का विस्तृत कानूनी नोटिस प्रेषित किया है।</p>
<p><strong>जैन समाज ने रखे अपने पक्ष</strong></p>
<p>वरिष्ठ समाजसेवी डॉ. जैनेन्द्र जैन ने कहा कि जैन धर्म की मूल आधारशिला अहिंसा है। जैन साधु-संत सूक्ष्म से सूक्ष्म जीव की रक्षा का संकल्प लेकर जीवन व्यतीत करते हैं। उन्होंने कहा कि पिच्छी में उपयोग होने वाले मोरपंख प्राकृतिक रूप से झड़े हुए पंख होते हैं और जैन परंपरा में किसी भी जीव को कष्ट पहुंचाना पूर्णतः निषिद्ध माना गया है।</p>
<p><strong>नोटिस में रखी गई प्रमुख मांगें</strong></p>
<p>कानूनी नोटिस में मेनका गांधी से 15 दिनों के भीतर कथित बयान वापस लेने, राष्ट्रीय स्तर पर सार्वजनिक रूप से क्षमा याचना करने तथा जैन धर्म, जैन संतों और समाज के संबंध में लगाए गए आरोपों को असत्य और आधारहीन स्वीकार करते हुए स्पष्टीकरण जारी करने की मांग की गई है।</p>
<p><strong>एक करोड़ रुपये की क्षतिपूर्ति की मांग</strong></p>
<p>नोटिस में समाज की धार्मिक प्रतिष्ठा एवं छवि को क्षति पहुंचाने के आरोप में एक करोड़ रुपये की मानहानि क्षतिपूर्ति का दावा भी किया गया है। समाज ने कहा है कि यदि यह राशि प्राप्त होती है तो इसका उपयोग जीव-दया, मानव सेवा, पर्यावरण संरक्षण, पक्षी संरक्षण, गौ-सेवा, अहिंसा प्रचार और धार्मिक-सांस्कृतिक गतिविधियों जैसे लोकहितकारी कार्यों में किया जाएगा।</p>
<p><strong>कानूनी कार्रवाई की चेतावनी</strong></p>
<p>जैन समाज ने स्पष्ट किया है कि यदि निर्धारित अवधि में मांगों का पालन नहीं किया गया तो सक्षम न्यायालय में दीवानी एवं आपराधिक कार्रवाई की जाएगी। नोटिस में धार्मिक भावनाओं को आहत करने, मानहानि और सामाजिक वैमनस्य फैलाने से संबंधित कानूनी प्रावधानों के तहत कार्रवाई का उल्लेख किया गया है।</p>
<p><strong>समाज में व्यापक प्रतिक्रिया</strong></p>
<p>नोटिस भेजे जाने के बाद देशभर के जैन समाज में इस विषय को लेकर व्यापक चर्चा हो रही है। विभिन्न सामाजिक एवं धार्मिक संगठनों ने जैन धर्म और संत परंपरा के सम्मान की रक्षा के लिए एकजुटता व्यक्त करते हुए मामले में उचित कार्रवाई की मांग की है।</p>
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		<title>मोर पंख से निर्मित पिच्छी संयम उपकरण : दिगंबर साधु-साध्वियों के इस उपकरण से नहीं होती हिंसा </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/pichhi_restraint_device_made_from_peacock_feathers/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Shree Phal News]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 24 Jun 2026 14:50:41 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[पिच्छी बनाने के लिए उन्हीं मोर के पंखों का उपयोग किया जाता है, जिन्हें मोर स्वतः (प्राकृतिक रूप से) छोड़ देते हैं। दिगंबर परंपरा में पिच्छी मुनि के 28 मूल गुणों और संयम का आवश्यक अंग है। इसके बिना कोई भी मुनिराज विचरण नहीं कर सकते। कोल्हापुर से अभिषेक अशोक पाटिल का यह आलेख पढ़िए, [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>पिच्छी बनाने के लिए उन्हीं मोर के पंखों का उपयोग किया जाता है, जिन्हें मोर स्वतः (प्राकृतिक रूप से) छोड़ देते हैं। दिगंबर परंपरा में पिच्छी मुनि के 28 मूल गुणों और संयम का आवश्यक अंग है। इसके बिना कोई भी मुनिराज विचरण नहीं कर सकते। <span style="color: #ff0000">कोल्हापुर से अभिषेक अशोक पाटिल का यह आलेख पढ़िए,</span></strong></p>
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<p><strong>कोल्हापुर</strong>। पिच्छी बनाने के लिए उन्हीं मोर के पंखों का उपयोग किया जाता है, जिन्हें मोर स्वतः (प्राकृतिक रूप से) छोड़ देते हैं। दिगंबर परंपरा में पिच्छी मुनि के 28 मूल गुणों और संयम का आवश्यक अंग है। इसके बिना कोई भी मुनिराज विचरण नहीं कर सकते। पिच्छी मुख्य रूप से दिगंबर जैन साधु और साध्वियों द्वारा रखा जाने वाला एक धार्मिक और संयम का उपकरण है। पिच्छी अहिंसा और करुणा का प्रतीक है। जब मुनिराज या माताजी कहीं बैठते या चलते हैं तो वे इसके द्वारा उस स्थान को धीरे से साफ करते हैं, ताकि अनजाने में कोई छोटे जीव उनके नीचे आकर दब न जाए। पिच्छी बनाने के लिए उन्हीं मोर के पंखों का उपयोग किया जाता है, जिन्हें मोर स्वतः (प्राकृतिक रूप से) छोड़ देते हैं, इसलिए इसमें किसी भी जीव की हिंसा नहीं होती। मोर पंखों की यह विशेषता होती है कि इन पर धूल और पसीना नहीं चिपकता। ये अत्यंत कोमल और हल्के होते हैं, जिससे किसी जीव को कोई चोट नहीं पहुंचती। चातुर्मास के पश्चात या जब पिच्छी के पंखों की कोमलता कम होने लगती है तो गुरु परंपरा के अनुसार विधि-विधान से &#8216;पिच्छी परिवर्तन&#8217; किया जाता है।</p>
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		<title>अहिंसा कटघरे में है, या हमारी समझ? : संवाद, संवेदना और सत्य की आवश्यकता </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shree Phal News]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 24 Jun 2026 08:25:36 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मोरपंख विवाद के संदर्भ में जैन समाज की अहिंसक परंपरा, पिच्छिका के महत्व और धार्मिक भावनाओं पर उठे प्रश्नों को लेकर यह विचार लेख संवाद, प्रमाण और संवेदनशीलता की आवश्यकता पर बल देता है। पढ़िए डॉ. जयेन्द्र जैन &#8216;निप्पू चन्देरी&#8217; का आलेख । चन्देरी। भारत की मिट्टी केवल खेतों की उपज से नहीं, बल्कि संतों [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>मोरपंख विवाद के संदर्भ में जैन समाज की अहिंसक परंपरा, पिच्छिका के महत्व और धार्मिक भावनाओं पर उठे प्रश्नों को लेकर यह विचार लेख संवाद, प्रमाण और संवेदनशीलता की आवश्यकता पर बल देता है। <span style="color: #ff0000">पढ़िए डॉ. जयेन्द्र जैन &#8216;निप्पू चन्देरी&#8217; का आलेख ।</span></strong></p>
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<p><strong>चन्देरी।</strong> भारत की मिट्टी केवल खेतों की उपज से नहीं, बल्कि संतों के तप, ऋषियों की वाणी और करुणा की संस्कृति से सुवासित रही है। यही वह भूमि है जहाँ भगवान महावीर ने प्रत्येक जीव के जीवन के अधिकार का संदेश दिया और जहाँ प्रकृति के प्रति सम्मान भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग बना।</p>
<p><strong>अहिंसा पर उठते प्रश्न</strong></p>
<p>हाल के दिनों में मोरपंख को लेकर दिए गए एक वक्तव्य ने जैन समाज सहित अनेक लोगों के मन में प्रश्न और पीड़ा उत्पन्न की है। समाज का मानना है कि किसी भी परंपरा पर प्रश्न उठाना ज्ञान की प्रक्रिया का हिस्सा है, किंतु बिना अध्ययन, संवाद और प्रमाण के किसी धर्म की मूल मान्यताओं पर संदेह व्यक्त करना उचित नहीं माना जा सकता।</p>
<p><strong>पिच्छिका का वास्तविक उद्देश्य</strong></p>
<p>दिगंबर जैन परंपरा में पिच्छिका केवल एक धार्मिक उपकरण नहीं, बल्कि अहिंसा और जीवदया का प्रतीक है। इसका उपयोग सूक्ष्म जीवों की रक्षा के उद्देश्य से किया जाता है। जैन मुनि अपने आचरण में अत्यंत सावधानी रखते हैं ताकि किसी भी जीव को अनावश्यक कष्ट न पहुँचे।</p>
<p><strong>तथ्यों पर आधारित विमर्श जरूरी</strong></p>
<p>लेख में कहा गया है कि किसी भी आरोप या आशंका पर चर्चा करते समय तथ्य और प्रमाण सर्वोपरि होने चाहिए। समाज का मत है कि मोरपंख के संबंध में अनेक पारंपरिक और व्यवहारिक पहलुओं को समझे बिना निष्कर्ष निकालना भ्रम की स्थिति उत्पन्न कर सकता है।</p>
<p><strong>विश्वास और आस्था का प्रश्न</strong></p>
<p>यह विषय केवल मोरपंख तक सीमित नहीं है, बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था और विश्वास से जुड़ा हुआ है। जैन समाज का मानना है कि अहिंसा की परंपरा को समझने के लिए उसके दर्शन, इतिहास और व्यवहारिक स्वरूप का अध्ययन आवश्यक है।</p>
<p><strong>संवाद ही समाधान का मार्ग</strong></p>
<p>लेखक ने आग्रह किया है कि इस विषय पर विद्वानों, आचार्यों, वन्यजीव विशेषज्ञों और समाज प्रतिनिधियों के बीच खुला एवं तथ्यात्मक संवाद होना चाहिए। सत्य की स्थापना संवाद और प्रमाणों के आधार पर ही संभव है।</p>
<p><strong>सत्य, सम्मान और संवेदना की आवश्यकता</strong></p>
<p>लेख में कहा गया है कि समाज का उद्देश्य किसी से संघर्ष करना नहीं, बल्कि सत्य को सामने लाना है। क्षमा, करुणा और सम्मान जैन दर्शन के मूल तत्व हैं, किंतु इनके साथ सत्य और तथ्य भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।</p>
<p><strong>निष्कर्ष</strong></p>
<p>आज आवश्यकता इस बात की है कि हम स्वयं से प्रश्न करें कि वास्तव में अहिंसा कटघरे में है या हमारी समझ। समाज का भविष्य आरोपों से नहीं, बल्कि सत्य, संवाद, संवेदना और परस्पर सम्मान से निर्मित होता है। विश्वास तभी जीवित रहता है जब उसके साथ सत्य और सम्मान खड़े हों।</p>
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		<title>मोरपंख विवाद : लाखों अहिंसक जैन श्रावकों की भावनाएँ आहत : तथ्य आधारित संवाद की उठी मांग </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shree Phal News]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 23 Jun 2026 15:28:32 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[समाचार]]></category>
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					<description><![CDATA[मोरपंख को लेकर दिए गए बयान के बाद जैन समाज में व्यापक प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। समाजजनों ने इसे अहिंसा की परंपरा पर प्रश्नचिह्न बताया और तथ्य आधारित संवाद की आवश्यकता पर बल दिया। पढ़िए डॉ. जयेन्द्र जैन &#8216;निप्पू चन्देरी&#8217; का आलेख । चन्देरी। मोरपंख को लेकर दिए गए एक बयान के बाद [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>मोरपंख को लेकर दिए गए बयान के बाद जैन समाज में व्यापक प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। समाजजनों ने इसे अहिंसा की परंपरा पर प्रश्नचिह्न बताया और तथ्य आधारित संवाद की आवश्यकता पर बल दिया। <span style="color: #ff0000">पढ़िए डॉ. जयेन्द्र जैन &#8216;निप्पू चन्देरी&#8217; का आलेख ।</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>चन्देरी।</strong> मोरपंख को लेकर दिए गए एक बयान के बाद देशभर के लाखों जैन श्रावकों में गहरी पीड़ा और असंतोष व्याप्त है। जैन समाज का कहना है कि अहिंसा और जीवदया उसके मूल सिद्धांत हैं, इसलिए किसी भी जीव को कष्ट पहुँचाकर धार्मिक कार्यों में उपयोग की कल्पना भी जैन दर्शन के विपरीत है।</p>
<p><strong>भारतीय संस्कृति में मोरपंख का महत्व</strong></p>
<p>जैन समाज के अनुसार भारतीय संस्कृति में मोरपंख का विशेष महत्व रहा है। भगवान श्रीकृष्ण के मुकुट में मोरपंख का उल्लेख पवित्रता, सौंदर्य और प्रकृति के प्रति सम्मान के प्रतीक के रूप में किया जाता है। जैन साधु-संतों की परंपरा में भी मोरपंख से निर्मित पिच्छिका का उपयोग जीवों की रक्षा और अहिंसा की भावना के साथ किया जाता है।</p>
<p><strong>पिच्छिका का उद्देश्य</strong></p>
<p>समाजजनों का कहना है कि दिगंबर जैन साधु पिच्छिका का उपयोग सूक्ष्म जीवों की रक्षा के लिए करते हैं। यह उपकरण जैन साधना और संयम का महत्वपूर्ण अंग माना जाता है तथा इसका उद्देश्य किसी जीव को हानि पहुँचाना नहीं, बल्कि अहिंसा का पालन करना है।</p>
<p><strong>तथ्यों के आधार पर समाज का पक्ष</strong></p>
<p>जैन समाज के अनुसार देश में लगभग 1500 श्रमण मुनि हैं और प्रत्येक मुनि वर्ष भर में लगभग 500 से 1000 मोरपंखों से निर्मित पिच्छिका का उपयोग करते हैं। समाज का कहना है कि इस आधार पर लाखों मोरों की हत्या या प्रताड़ना का आरोप तथ्यात्मक रूप से प्रमाणित नहीं माना जा सकता, क्योंकि मोर अपने प्राकृतिक जीवनचक्र में स्वयं पंख छोड़ते हैं, जिन्हें परंपरागत रूप से संग्रहित किया जाता रहा है।</p>
<p><strong>संवेदनशीलता और अध्ययन की आवश्यकता</strong></p>
<p>समाज के प्रतिनिधियों ने कहा कि किसी भी धार्मिक परंपरा पर सार्वजनिक टिप्पणी करने से पूर्व उसके ऐतिहासिक, धार्मिक और व्यावहारिक पक्षों का समुचित अध्ययन किया जाना चाहिए। करोड़ों लोगों की आस्था से जुड़े विषयों पर तथ्यात्मक एवं संतुलित दृष्टिकोण आवश्यक है।</p>
<p><strong>अहिंसा और जीवदया का प्रतीक</strong></p>
<p>जैन समाज का मानना है कि मोरपंख किसी हिंसा का नहीं, बल्कि अहिंसा, करुणा और जीवदया का प्रतीक है। समाज ने कहा कि बिना पूर्ण तथ्यों के की गई टिप्पणियाँ लाखों अहिंसक श्रावकों की धार्मिक भावनाओं को आहत करती हैं।</p>
<p><strong>संवाद को मिले प्राथमिकता</strong></p>
<p>समाजजनों ने आग्रह किया कि ऐसे विषयों पर आरोप-प्रत्यारोप के बजाय संवाद, अध्ययन और तथ्य आधारित विमर्श को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। उनका मानना है कि यही मार्ग सामाजिक सौहार्द, धार्मिक सम्मान और पारस्परिक समझ को सुदृढ़ करेगा।</p>
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