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	<title>अवधपुरी भोपाल &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान का समापन एवं रथयात्रा रविवार को: सभी जिन प्रतिमाएं अभिषेक के बाद श्री पारसनाथ दिगंबर जैन मंदिर में होंगी विराजमान  </title>
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		<pubDate>Fri, 10 Oct 2025 11:24:06 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[श्री विद्याप्रमाण गुरु कुलम् अवधपुरी में संस्कृत भाषा में निबद्ध श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान का समापन रविवार को प्रातः कालीन बेला में होने जा रहा है। प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया विगत 4 अक्टूबर से यहां श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान प्रारंभ हुआ था। उसका समापन रविवार को होगा। अवधपुरी(भोपाल) से पढ़िए, यह खबर... अवधपुरी [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>श्री विद्याप्रमाण गुरु कुलम् अवधपुरी में संस्कृत भाषा में निबद्ध श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान का समापन रविवार को प्रातः कालीन बेला में होने जा रहा है। प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया विगत 4 अक्टूबर से यहां श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान प्रारंभ हुआ था। उसका समापन रविवार को होगा। <span style="color: #ff0000">अवधपुरी(भोपाल) से पढ़िए, यह खबर..</span>.</strong></p>
<hr />
<p><strong>अवधपुरी (भोपाल)।</strong> श्री विद्याप्रमाण गुरु कुलम् अवधपुरी में संस्कृत भाषा में निबद्ध श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान का समापन रविवार को प्रातः कालीन बेला में होने जा रहा है। प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया विगत 4 अक्टूबर से यहां श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान प्रारंभ हुआ था। उसका समापन रविवार को होगा। प्रात:6 बजे से अभिषेक एवं शांतिधारा नित्य नियम पूजन के पश्चात हवन एवं 9 बजे से रथयात्रा श्री विद्याप्रमाण गुरुकुलम् से मुनिसंघ के सानिध्य में प्रारंभ होगी, जो समन्वयनगर होती हुई वापस विद्याप्रमाण गुरुकुलम् में आएगी। सभी जिन प्रतिमाओं का अभिषेक उपरांत श्री पारसनाथ दिगंबर जैन मंदिर में विराजमान किया जाएगा। जैन ने बताया विधान के सातवें दिवस मुनि श्री प्रमाणसागरजी महाराज एवं मुनि श्री संधान सागरजी महाराज ने अपने मुखारबिंद से पंच परमेष्ठी श्री अरहंतजी, सिद्धजी, आचार्यजी, उपाध्याय जी तथा सर्व साधुओं की आराधना करते हुए दोपहर 12 बजे तक 512 अर्घ्य पूर्ण भक्ति भाव के साथ चढ़ाए गए तथा शनिवार को भगवान के सहस्त्र नामों के साथ 1024 अर्घ्य चढ़ाए जाएंगे। इस मौके पर मुनि श्री ने पंच परमेष्ठी के 143 मूलगुणों की चर्चा करते हुए कहा कि इन्ही मूलगुणों के आधार पर इन परमेष्ठियों की पहचान हुआ करती है। मूलगुणों से ही उनके आचार-व्यवहार तथा चर्या को देखा जाता है।</p>
<p><strong>साधु परमेष्ठी में 28 मूल गुण समाहित होते हैं</strong></p>
<p>जब आचार्य परमेष्ठी के गुणों की चर्चा आई तो मुनि श्री ने कहा कि आचार्य गुरुदेव में वह सभी मूल गुण परिलक्षित होते थे। उनकी चर्या में मूलाचार समाया हुआ था। उन्होंने कहा कि अरिहंत भगवान में छियालीस, सिद्ध भगवान में आठ, आचार्य परमेष्ठी में छत्तीस, उपाध्याय परमेष्ठी में पच्चीस तथा साधु परमेष्ठी में 28 मूल गुण समाहित होते हैं। उन सभी मूल गुणों की आज आप लोगों ने बड़े ही भक्ति भाव के साथ आराधना की। इस अवसर पर समस्त क्षुल्लक आदरसागर जी, श्री समादर सागर जी, श्री चिद्रूप सागर जी, श्री स्वरूपसागर जी तथा श्री सुभग सागर जी महाराज एवं सभी ब्रह्मचारी उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन बाल ब्र. अभय भैया आदित्य तथा अशोक भैया लिधोरा ने किया।</p>
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		<title>अहिंसा और सहअस्तित्व की भावना से ही हिंसा मिटाई जा सकती है : मुनि श्री प्रमाणसागर जी ने पद्मपुराण के अंशों का वाचन कर दी मंगल देशना  </title>
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		<pubDate>Thu, 02 Oct 2025 13:15:28 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[अधर्म पर धर्म की,असत्य पर सत्य की, बुराई पर अच्छाई की, पाप पर पुण्य की,अत्याचार पर सदाचार की, अज्ञान पर ज्ञान की विजय का प्रतीक है यह दशहरा। यह उदगार मुनि श्री प्रमाणसागरजी महाराज ने प्रातः प्रवचन सभा में व्यक्त किए। अवधपुरी भोपाल से पढ़िए, यह खबर&#8230; अवधपुरी (भोपाल)। अधर्म पर धर्म की,असत्य पर सत्य [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>अधर्म पर धर्म की,असत्य पर सत्य की, बुराई पर अच्छाई की, पाप पर पुण्य की,अत्याचार पर सदाचार की, अज्ञान पर ज्ञान की विजय का प्रतीक है यह दशहरा। यह उदगार मुनि श्री प्रमाणसागरजी महाराज ने प्रातः प्रवचन सभा में व्यक्त किए। <span style="color: #ff0000">अवधपुरी भोपाल से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>अवधपुरी (भोपाल)।</strong> अधर्म पर धर्म की,असत्य पर सत्य की, बुराई पर अच्छाई की, पाप पर पुण्य की,अत्याचार पर सदाचार की, अज्ञान पर ज्ञान की विजय का प्रतीक है यह दशहरा। यह उदगार मुनि श्री प्रमाणसागरजी महाराज ने प्रातः प्रवचन सभा में व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि जब-जब हमारी आत्मा किसी अन्य पर मुग्ध होती है तो वह विवेक (अंतरात्मा) की बात को सुना अनसुना कर अविवेक की ओर चल देती है। मुनि श्री ने जैन रामायण पद्ममपुराण के अंशों को सुनाते हुए सीता हरण के दृश्यों को प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि श्रीराम जानते थे कि मृग सोने का नहीं होता फिर भी जब बार-बार सीताजी ने कहा कि जाओ उस स्वर्ण मृग को लेकर आओ तो रामजी उस स्वर्ण मृग को लेने उसके पीछे जाना पड़ा और जंगल में जाते ही वह मायावी मृग गायब हो गया। वही माया के माध्यम से लक्ष्मण बचाओ की आवाज सुनकर सीता जी ने लक्ष्मण को भी उधर ही भेज दिया, आगे की कथा आप सभी जानते हैं।</p>
<p><strong>अपने अंदर के सोए हुए आत्मराम को जगाओ </strong></p>
<p>मुनि श्री ने कहा कि जब-जब मर्यादा की लक्ष्मण रेखा से सीता बाहर गई है। उनका अपहरण ही हुआ है। आज हर व्यक्ति अपनी सीमाओं को लांघ रहा है और अपने अंदर की सीता (शांति) का हरण कर रहा है। उन्होंने आध्यात्मिकता के पक्ष को जगाते हुए कहा कि अपने अंदर के आत्म राम को जगाने का उद्यम कर, तभी तेरे अंदर के रावण का अंत हो पाएगा तथा जीवन में परिवर्तन आएगा। मुनि श्री ने कहा अभी तो हर व्यक्ति के अंदर का राम सोया पड़ा है तथा वह उनकी सीता( शांति) का हरण हो रहा है। जाओ और अपने अंदर के सोए हुए आत्मराम को जगाओ तभी आपकी सीता(शांति) वापस मिलेगी। मुनि श्री ने कहा कि आजकल लोग नाम तो राम का लेते हैं और काम रावण के करते हैं तो बताओ काम कैसे बनें? उन्होंने कहा कि अपने अंदर की चेतना को जगाए बिना जीवन का कल्याण नहीं हो सकता। जैसे प्रकृति में दो पक्ष होते है शुक्ल पक्ष और कृष्णपक्ष। श्रीराम धर्म नीति और मर्यादा के प्रतीक होकर शुक्ल पक्ष के रूप में हो जो क्रमशः हमारी आत्मा का गुणात्मक विकास कर पूर्णिमा की पूर्ण कलाओं से युक्त होकर चेतना को परिपूर्णता प्रदान करते हैं। वहीं रावण अधर्म, अनीति, और अमर्यादा तथा अन्याय का घोतक है, जो कृष्ण पक्ष का प्रतीक होकर हमारी चेतना को कलुषित कर अंत में हमारे जीवन को कलंकित कर देता है।</p>
<p><strong> हिंसा रावण का ही रौद्र रूप है </strong></p>
<p>मुनि श्री ने कहा कि आज 2 अक्टूबर का दिन है और विश्व में अहिंसा दिवस के रूप में मनाते हुए महात्मा गांधी को याद किया जाता है। उन्होंने कहा कि हिंसा रावण का ही रौद्र रूप है। आज के दिन हम सभी को हिंसा मिटाने के लिए अहिंसा और सहअस्तित्व की भावना को जगाने का प्रयास करना होगा तभी हम संसार को हिंसा मुक्त कर सकते है। प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया 4 अक्टूबर शनिवार से बहुप्रतीक्षित श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान प्रारंभ होने जा रहा है जिसमें 1024 अर्घ्य समर्पित करते हुए सिद्ध प्रभु की आराधना की जाएगी।</p>
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		<title>जो अकड़ता है वह उखड़ता है, जो झुकता है वह टिकता है: मुनि श्री प्रमाणसागरजी ने दशलक्षण पर्व पर उत्तम मार्दव धर्म के बारे में विस्तार से बताया  </title>
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		<pubDate>Fri, 29 Aug 2025 13:20:14 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[अवधपुरी भोपाल में विराजित मुनि श्री प्रमाणसागरजी ने दशलक्षण पर्व पर उत्तम मार्दव धर्म के बारे श्रावकों और गुरु भक्तों को मंगल वचनों से उपकृत किया। यहां पर्वाधिराज पर्युषण के अवसर पर दसलक्षण पर्व पर उत्तम मार्दव धर्म की उन्होंने सविस्तार व्याख्या की। अवधपुरी भोपाल से पढ़िए, अविनाश जैन की यह खबर&#8230;  अवधपुरी भोपाल। अवधपुरी [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>अवधपुरी भोपाल में विराजित मुनि श्री प्रमाणसागरजी ने दशलक्षण पर्व पर उत्तम मार्दव धर्म के बारे श्रावकों और गुरु भक्तों को मंगल वचनों से उपकृत किया। यहां पर्वाधिराज पर्युषण के अवसर पर दसलक्षण पर्व पर उत्तम मार्दव धर्म की उन्होंने सविस्तार व्याख्या की। <span style="color: #ff0000">अवधपुरी भोपाल से पढ़िए, अविनाश जैन की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong> अवधपुरी भोपाल</strong>। अवधपुरी भोपाल में विराजित मुनि श्री प्रमाणसागरजी ने दशलक्षण पर्व पर उत्तम मार्दव धर्म के बारे श्रावकों और गुरु भक्तों को मंगल वचनों से उपकृत किया। यहां पर्वाधिराज पर्युषण के अवसर पर दसलक्षण पर्व पर उत्तम मार्दव धर्म की उन्होंने सविस्तार व्याख्या की। मुनिश्री ने कहा कि नदी में पूर आया और जब पानी उतरा तो तट पर खड़े लोगों ने देखा इस पूर में तट पर लगे बड़े-बड़े पेड़ तो उखड़ गये लेकिन, छोटी छोटी लतायें सुरक्षित थी तो एक बच्चे ने जिज्ञासा से पूछा दादाजी- बड़े-बड़े पेड़ तो उखड़ गये लेकिन, यह छोटी छोटी लतायें कैसे सुरक्षित रह गई? तो दादाजी ने जो जवाब में कहा कि जो बड़े थे। वह अकड़ में खड़े थे। वह उखड़ गये और जो छोटे थे वह पानी के बहाव के साथ झुक गये और वह सुरक्षित नजर आ रहे है। मुनि श्री ने आज के संदर्भ में चार बातें बताते हुए कहा कि झुको, मिलो,सुनो, सहो ‘जो झुकता है वह टिकता है’ झुकना सीखो नम्रता को अपने जीवन का आदर्श बनाओ।</p>
<p><strong>बर्फ को एडजेस्ट करने के लिये कूटना पड़ता है</strong></p>
<p>उन्होंने अहंकारी की विशेषता बताते हुये कहा कि वह टूटने को, दुःखी होने को राजी होता है लेकिन, झुकने को तैयार नहीं होता। संत कहते है कि जीवन मिला है, जीवन में सब कुछ हमारे अनुसार नहीं चलेगा। कुछ बातें हमारे मन की होती है तो कुछ बातें अपने मन की बनाना पड़ती है। जो अड़े रहते है और खड़े रहते वह उखड़ जाते है जो एडजेस्ट करके चलते हैं। वही जीवन की ऊंचाइयों को प्राप्त करते हैं। मुनि श्री ने पानी और बर्फ का उदाहरण देते हुये कहा कि पानी जिस बर्तन में डालो एडजेस्ट हो जाता है जबकि, बर्फ को एडजेस्ट करने के लिये कूटना पड़ता है। संत कहते है कि पानी बन जाओ सभी जगह स्थान बना लोगे। बर्फ जैसा जीवन बनाओगे तो कूटना पड़ेगा।</p>
<p><strong>जो स्वयं झुकेगा वह दूसरों को भी झुका पाएगा </strong></p>
<p>मुनि श्री ने कहा कि जो झुकेगा वह दूसरों को भी झुका पाएगा। अहंकार में डूबा मनूष्य न तो खुद का भला कर पाता है न दूसरे का। जैसे पेड़ जितना फलदार होता है उसकी शाखाएँ उतनी झुकी होती है। मुनि श्री ने कहा कि अकड़ मुर्दे की पहचान हुआ करती है। झुकता वही है जिसमें जान है। अपने जीवन को जीवंत बनाना चाहते हो तो मार्दव धर्म को अपनाओ और झुकना सीखो। मुनि श्री ने कहा कि अपना अपना इगो छोड़ो। उन्होंने कहा कि पति-पत्नी में अनबन हो गई। गुस्से में पत्नी ने कह दिया मैं अपने मायके जा रही हूं। पति अपने काम पर निकल गया और पत्नी को समझ आई और मायके न जाकर अपने घर वापस आ गई। सांयकाल पति भी घर आ गया दोनों आमने-सामने है लेकिन, दोनों बोलने को तैयार नहीं। उनका तीन साल का बच्चा था। उसने मंदिर में गुरु के मुख से एक गीत सुना था वह उसे याद था उसके बोल थे ‘रुक मत प्राणी झुकजा, जीवन सुखी बन जाएगा’ वह बार-बार कभी मां की तरफ तो पिता की तरफ मुख करके सुनाता रहा। दोनों को हंसी आई और दोनों एक साथ बोल पड़े गलती हमारी थी और क्षमा मांगी। पति ने कहा मैं तुम्हें लेने तुम्हारे घर गया था तो मालूम पड़ा कि तुम तो वहां गई ही नहीं तो पत्नी ने कहा कि आपके जाने के बाद मुझे अपनी गलती का अहसास हुआ और मैं कहीं नहीं गई। पतिदेव आप मुझे क्षमा करें। मुनि श्री ने कहा कि दोनों एक-दूसरे के सामने झुक गये तो परिवार टिक गया। यदि एक-दूसरे के सामने झुकने को तैयार नहीं होते मामला गड़बड़ा जाता। मुनि श्री ने कहा कि हर व्यक्ति में कुछ न कुछ गुण अवश्य होते हैं। उनकी अच्छाइयों को देखो। बड़प्पन तभी है जब दूसरों को मान देना शुरु करो तथा कथित ऐसे बड़े आदमी मत बनो कि तुम्हारे घर कोई गरीब आदमी न आए। उन्होंने कहा कि बड़ा आदमी वह नहीं कि उसके बड़े ठाट हों। बड़ा आदमी तो वह है जिसके पास आने वाला कोई अपने आपको छोटा महसूस न करे।</p>
<p><strong>अभिनय से नही, अभिव्यक्ति से जिओ’</strong></p>
<p>प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया कि प्रातःकाल 5. 25 से भगवान का अभिषेक एवं शांतिधारा संपन्न हुई। मुनि श्री ने भावनायोग के माध्यम से सहजता और सरल बनने का मार्ग समझाया। आगामी दिवस उत्तम आर्जव धर्म का है। जिसमें बाहरी चमक दमक छल कपट को छोड़कर सीधी सरल और निष्कपट वृति का मार्ग बताया जाएगा। ‘अभिनय से नही, अभिव्यक्ति से जिओ’। स्वार्थ पूर्ण व्यवहार से आत्म विश्वास घटता है। अविश्वास बढ़ता है संबंध खोखले होते हैं। तनाव और मानसिक विकार बढ़ते हैं इस बारे में मुनि श्री मार्गदर्शन देंगे। संस्कार शिविर में गुरुकुलम् के सभी 180 बच्चे भी अपना अध्यन के साथ संस्कार भी ग्रहण कर रहे हैं सभी बच्चों का मोबाइल का त्याग है एवं हजारों की संख्या में पधारे शिवारार्थिओं का भी प्रातः 5 से 11 बजे पूजा समाप्ति तक मोबाइल का त्याग रहता है। मुनि श्री के उदबोधन से कई लोगों ने आजीवन तो कुछ लोगों ने समय सीमा के साथ गुटका तम्बाकू एवं बाजार की वस्तुओं तथा रात्रि में चारों प्रकार के आहार का त्याग के साथ एकासन एवं निर्जला उपवास तक कर रहे हैं।</p>
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		<title>मैं न किसी से द्वेष रखूंगा, न अपने भीतर क्रोध पालूंगा: उत्तम क्षमा से कटुता और बदले की भावना का है समाधान -मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज </title>
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		<pubDate>Wed, 27 Aug 2025 10:17:36 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[दशलक्षण पर्व आत्मा की शुद्धि और जागृति का दस दिवसीय महोत्सव है। यह केवल धार्मिक क्रियाओं का क्रम नहीं, बल्कि जीवन के गहन अंतर्द्वंद्वों का समाधान है। यह उद्गार मुनिश्री प्रमाण सागरजी महाराज ने व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि दस धर्मों में प्रथम उत्तम क्षमा सबसे मौलिक, सबसे मानवीय और सबसे प्रासंगिक धर्म है। अवधपुरी [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>दशलक्षण पर्व आत्मा की शुद्धि और जागृति का दस दिवसीय महोत्सव है। यह केवल धार्मिक क्रियाओं का क्रम नहीं, बल्कि जीवन के गहन अंतर्द्वंद्वों का समाधान है। यह उद्गार मुनिश्री प्रमाण सागरजी महाराज ने व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि दस धर्मों में प्रथम उत्तम क्षमा सबसे मौलिक, सबसे मानवीय और सबसे प्रासंगिक धर्म है। <span style="color: #ff0000">अवधपुरी भोपाल से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>अवधपुरी भोपाल।</strong> दशलक्षण पर्व आत्मा की शुद्धि और जागृति का दस दिवसीय महोत्सव है। यह केवल धार्मिक क्रियाओं का क्रम नहीं, बल्कि जीवन के गहन अंतर्द्वंद्वों का समाधान है। यह उद्गार मुनिश्री प्रमाण सागरजी महाराज ने व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि दस धर्मों में प्रथम उत्तम क्षमा सबसे मौलिक, सबसे मानवीय और सबसे प्रासंगिक धर्म है। यह धर्म उस आग को शांत करता है जो हमारे भीतर क्रोध, अपमान, बदले की भावना और कटु संबंधों के रूप में जलती रहती है। आज का यथार्थ क्षमा क्यों कठिन होती जा रही है क्योंकि, आज के समाज में व्यक्ति की भावनाएं शीघ्र आहत हो जाती हैं। उसने मुझे कुछ कहा था, उसने मेरी उपेक्षा की थी, मैं उसे कभी नहीं माफ करूंगा। ऐसी भावनाएं रिश्तों को विषैला बनाती जा रही हैं। सोशल मीडिया के इस युग में, जहां एक टिप्पणी, एक पोस्ट या एक मैसेज से मन आहत हो जाता है, वहां क्षमा केवल एक धार्मिक शब्द नहीं, बल्कि मानसिक शांति की औषधि बन जाता है। क्षमा धर्म-आत्मा की गरिमा की रक्षा करता है। क्षमा का अर्थ केवल सामने वाले को माफ कर देना नहीं है, बल्कि यह स्वयं को क्रोध, द्वेष और पीड़ा से मुक्त करना है। जब हम क्षमा करते हैं, तो हम अपने भीतर की भारी गांठों को खोलते हैं। क्षमा में ही महानता प्रकट होती है, क्योंकि, दुर्बल व्यक्ति बदला लेता है और महान व्यक्ति क्षमा करता है। उत्तम क्षमा धर्म सिखाता है। स्वयं की भूलों को स्वीकारना, दूसरों की दुर्बलताओं को समझना, बदले की भावना को छोड़कर समभाव में स्थित होना, पारिवारिक और सामाजिक कटुता का इलाज। आज घर-घर में रिश्तों की दीवारें खड़ी हैं-पति-पत्नी, माता-पिता और बच्चों, भाई-बहन, मित्रों-सभी में अहं और अपेक्षाओं की आग लगी है। मैं क्यों झुकूं ? मैं सही हूं-यह भावना रिश्तों को तोड़ रही है। उत्तम क्षमा धर्म हमें सिखाता है कि जो सबसे पहले क्षमा माँगता है, वह कमज़ोर नहीं, सबसे बड़ा होता है। क्षमा मांगना अहंकार की हार नहीं, आत्मा की विजय है। जो क्षमा करता है, वही अपने और समाज दोनों का कल्याण करता है।</p>
<p><strong> मनोवैज्ञानिक दृष्टि-क्षमा से मानसिक स्वास्थ्य</strong></p>
<p>वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि जो लोग क्षमा नहीं करते, उनके भीतर तनाव, अनिद्रा, रक्तचाप और अवसाद की प्रवृत्ति अधिक होती है।</p>
<p>वहीं क्षमाशील व्यक्ति-अधिक शांत, केंद्रित और प्रसन्नचित्त रहते हैं। उनका आत्मविश्वास और जीवन-शक्ति अधिक होती है। वे दूसरों को भी सकारात्मक दृष्टि से देखते हैं। इसलिए उत्तम क्षमा धर्म केवल आध्यात्मिक सिद्धांत नहीं, मनोवैज्ञानिक उपचार भी है। क्षमा और भावना योगरू क्षमा को अभ्यास कैसे बनाएं? भावना योग हमें सिखाता है कि भावनाओं का दमन नहीं, दिशा देना चाहिए। जब हम प्रतिदिन कुछ क्षण ध्यानपूर्वक बैठते हैं और अपने भीतर के क्रोध और पीड़ा को देखते हैं, तो हम क्षमा के बीज बोते हैं।</p>
<p><strong>भावना योग क्षमा चिंतन पंक्तियां-</strong></p>
<p>मैं आत्मा हूं, शुद्ध और शांत। किसी के भी व्यवहार से मेरी आत्मा आहत नहीं हो सकती। मैं सबके प्रति क्षमाशील हूं। क्षमा-एक संकल्प, एक साधना। हम यह क्यों भूल जाते हैं कि हम स्वयं भी गलतियां करते हैं? यदि हम चाहते हैं कि हमें कोई माफ करे तो पहले हमें दूसरों को माफ करना आना चाहिए। तू सदा मेरा रहे, मैं तेरा हो जाऊं। तुझे माफ कर सकूं, इतना बड़ा हो जाऊं। उत्तम क्षमा धर्म केवल एक दिन की परंपरा नहीं, हर दिन की जीवन शैली बननी चाहिए। आज जब समाज में द्वेष, कटुता, बदले की भावना और संवादहीनता बढ़ रही है, तब उत्तम क्षमा धर्म शांति, संबंध और आत्मबल का नव-स्रोत बन सकता है। इस दशलक्षण पर्व पर हम संकल्प लें कि मैं न किसी से द्वेष रखूंगा, न अपने भीतर क्रोध पालूंगा। मैं क्षमा करूंगा क्योंकि, मैं आत्मा हूं, शांत और विशाल।</p>
<p><strong>प्रतिदिन के यह हैं सभी कार्यक्रम, रहेंगे लाइव </strong></p>
<p>प्रवक्ता अविनाश जैन ने बताया कि प्रतिदिन प्रातः5.25 बजे से भगवान का अभिषेक एवं शांतिधारा जिनालय में हो रही है। 5.45 से भावनायोग मंडप उद्घाटन एवं ध्वजारोहण के बाद नित्य नियम पूजन एवं दशलक्षण विधान का शुभारंभ एवं मध्य में 8.30 से 9.30 तक मुनि श्री के प्रवचन तथा मध्यकाल में दोपहर 2.30 बजे से प्रतिदिन तत्वार्थ सूत्र की वाचना एवं सांयकाल 6.20 से शंका समाधान का कार्यक्रम हो रहे हैं। सभी कार्यक्रम प्रमाणिक एप के माध्यम से लाइव रहेंगे। आप सभी इन दस दिनों में घर बैठकर भी लाभ उठा सकते हैं।</p>
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