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	<title>अनुष्ठान विशेषज्ञ मुनिश्री जयकीर्ति जी &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
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		<title>सत्पुरुष गुणों एवं दोषों में से गुणों को ही ग्रहण करते हैं : रामकथा के आठवें दिन मुनिश्री जयकीर्ति ने सुनाए कई प्रभावी प्रसंग  </title>
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		<pubDate>Fri, 28 Nov 2025 14:10:05 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मुनिश्री जय कीर्ति जी ससंघ रामपुरा स्थित श्री दिगंबर जैन मंदिर में विराजमान हैं। मुनिश्री यहां पद्म पुराण पर आधारित रामकथा का संगीतमय वाचन कर रहे हैं। कथा 30 नवंबर तक चलेगी। कोटा से पढ़िए, पारस जैन पार्श्वमणि की यह खबर&#8230; कोटा। मुनिश्री जय कीर्ति जी ससंघ रामपुरा स्थित श्री दिगंबर जैन मंदिर में विराजमान [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>मुनिश्री जय कीर्ति जी ससंघ रामपुरा स्थित श्री दिगंबर जैन मंदिर में विराजमान हैं। मुनिश्री यहां पद्म पुराण पर आधारित रामकथा का संगीतमय वाचन कर रहे हैं। कथा 30 नवंबर तक चलेगी। <span style="color: #ff0000">कोटा से पढ़िए, पारस जैन पार्श्वमणि की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>कोटा।</strong> मुनिश्री जय कीर्ति जी ससंघ रामपुरा स्थित श्री दिगंबर जैन मंदिर में विराजमान हैं। मुनिश्री यहां पद्म पुराण पर आधारित रामकथा का संगीतमय वाचन कर रहे हैं। कथा 30 नवंबर तक चलेगी। कई जन्मों का पुण्य उदय जब जीवन में आता है तब जाकर ऐसा स्वर्णिम सुअवसर मिल पाता है। अकलंक संस्थान के अध्यक्ष पीयूष बज और सचिव अनिमेष जैन ने बताया कि आज मां जिनवाणी को मंदिर से पालकी में विराजमान करके मुनिश्री के कर कमलों में भेंट करने का सौभाग्य मैना जैन प्रतीक, विनीता, अनाया, तनीषा, वेद परिवार जन को मिला। राजा श्रेणिक बनने का अवसर पीयूष बज, कविता बज, प्रशस्त रिम्पी बज, विजय पाड़ा को मिला। उन्होंने प्रथम प्रश्न पूछा। महेश गंगवाल गुलाबबाड़ी’ ने बताया कि सकल दिगंबर जैन समाज समिति के अध्यक्ष विमल गोधा, नांता, विनोद टोरड़ी, जेके जैन, नरेश वेद, श्री दिगंबर जैन महासमिति कोटा संभाग की अध्यक्ष मधु शाह, आशा श्रीमाल, आशा सेठी, कविता बज, साधना मुवासा, इंदौर से पधारे किशोरकुमार, राजकुमार, चिन्मय जैन, देहरादून के पोमिल जैन आदि समाज श्रेष्ठी उपस्थित हुए।</p>
<p><strong>प्रभु का वह जिनबिम्ब कलुषता को नष्ट करने वाला था</strong></p>
<p>मुनिश्री जयकीर्ति जी ने धर्मसभा में कहा कि जिस प्रकार हंस दूध एवं जल से दूध ही ग्रहण करता है। उसी प्रकार सत्पुरुष गुणों एवं दोषों में से गुणों को ही ग्रहण करते हैं,। जिस प्रकार कौआ हाथियों के गंड स्थल में से मोतियों को छोड़कर मांस को ही ग्रहण करता है, उसी प्रकार दुर्जन गुणों को छोड़कर दोषों को ही ग्रहण करता है। जिस प्रकार उल्लू सूर्य को काला-काला ही देखता है, उसी प्रकार दुर्जन सबको दोषयुक्त ही देखता है। सरोवर के उपर की जाली कूड़ा-करकट रोक लेती है। राम-लक्ष्मण-सीता सहित सभी ने विभीषण के भवन में प्रवेश किया। जिसमें पाप को नष्ट करने वाले जिनालय मे पद्मरागमणि से निर्मित तेजवंत पद्म प्रभु भगवान का जिन बिम्ब था। सभी उस अनुगम प्रतिमा के दर्शन एवं स्तुति करते हैं, प्रभु का वह जिनबिम्ब कलुषता को नष्ट करने वाला था। ,राम लंका का राज्य संचालन विभीषण को ही सौंप देते हैं। राम आदि को लंका में सुखपूर्वक रहते हुए छः वर्ष व्यतीत हो जाते हैं।</p>
<p><strong>पुण्य कर्म से प्राणियों के अचिंतित कार्य सुंदरता को प्राप्त होते हैं</strong></p>
<p>इधर कौशल्या के दुःख निवारण के उद्देश्य से नारद राम की खोज करते हुए लंका में आए एवं माता की व्यथा सुनाते हैं।राम कहते हैं कि मां की सेवा पुण्यात्मा ही कर सकते हैं। सोलह दिनों में विभीषण हजारों विद्याधर कारीगर कुमारों द्वारा अयोध्या में अनेक जिनालय, नए-नए भवन, सरोवर, वापिकाओं, उद्यानों का निर्माण करवा देता है। वहां रत्नों की वर्षा करा देते हैं, सभी घर धन धान्य से भर दिए जाते हैं, पूरी अयोध्या की अदभुत सजावट कर दी जाती है। उस अयोध्या की सुंदरता का वर्णन सौ वर्षों में भी नहीं किया जा सकता है। पूर्वभव में किए हुए पुण्य कर्म से प्राणियों के समस्त अचिन्तित कार्य सुन्दरता को प्राप्त होते हैं। इसलिए पुण्य कार्य करते रहो जिससे संताप न भोगना पड़े।</p>
<p><strong>वे भोग उपभोग छोडने का निश्चय करते</strong></p>
<p>राम लक्षमण-सीता सहित सभी विद्याधर अयोध्या में पहुंचे। वहां माताओं एवं पुत्रों का सुखद मिलन व संवाद होता है। समस्त सुख सुविधाओं एवं अनुकूलता में रहते हुए भी भरत वैराग्य से परिपूर्ण है। वे धर्मफल का विचार करते हैं कि मैं कब इस राज्य से मुक्त होऊंगा। धर्म ही परम शरण है मैं इसकी उपासना कब करूँगा। वे भोग उपभोग छोडने का निश्चय करते। इधर त्रिलोक मंडन हाथी अयोध्या में उत्पात मचा देता है। किसी के रोकने पर भी वह नहीं रुकता है किंतु भरत के समीप आते ही वह शांत हो जाता है। उसे पूर्वभवों का स्मरण हो जाता है तभी अयोध्या नगरी में देशभूषण कुभूषण केवली भगवान का आगमन होता है। चारों भाई अपने परिजन पुरजनसह केवली भगवान् के दर्शनार्थ जाते हैं। वहा सभी धर्माेपदेश सुनते हैं।</p>
<p><strong>अपने सारे कार्य आत्म- हितकारी विचार पूर्वक ही करना</strong></p>
<p>वैरागी भरत एक हजार राजाओं के साथ जिनदीक्षा लेते हैं, कैकयी तीन सौं रानियों के साथ आर्यिका बन जाती है। हाथी अणुव्रत ग्रहण करता है। राजमहल में आने पर राम का राज्याभिषेक होता है, भामण्डल आदि के लिए राज्य विभाजन किया राजा है, शत्रुधन राज्य हेतु मथुरा का चयन करता है, मथुरा के राजा मधु एवं शत्रुध्न के मध्य भीषण युद्ध होता है, घायल मधु मन में विचारता है कि अब में विष्य-भोग- राज्य हेतु संसार में फंसने वाला कोई कार्य नहीं करूंगा। आज तक मैंने निराकुलता को नहीं पाया है। मैंने मोह में फंसकर धर्म में बुद्धि नहीं लगाई। समाधि मरणकर वे सानत स्वर्ग में देव बनते है, मित्र मधु की मृत्यु से क्षुभित चमरेन्द्र मथुरा में भयंकर महामारी फैलता है, सप्तऋषियों के तप के प्रभाव से महामारी दूर हो जाती है।कदाचित् मूर्ख की तो सेवा की जा सकती है किन्तु कृतघ्न को दूर से ही छोड देना चाहिए।</p>
<p><strong>ीता को सिंहनाद अटवी में छोडने का आदेश दे दिया</strong></p>
<p>जो मुनि को देखकर आसन नहीं छोड़ता,सम्मान नहीं करता है वह घोर मिथ्यादृष्टि, दीर्घ &#8211; संसारी होता है।जो सप्तऋषयों के आश्यर्यकारी प्रभाव को कहता व सुनता है वह शीघ्र ही चारों प्रकार मंगल को प्राप्त होता है, जो साधु समागम में तत्पर रहते हैं वे अपने सम्पूर्ण मनोरथ सिद्ध करते हैं।राम द्वारा पृथ्वी के समस्त जिनालयों को सझाने हेतु आज्ञा दी जाती है, महेन्दोदय उद्यान में प्रति दिन पुजनादि सम्पन्न ही ही रहे थे कि एक दिन उद्यान में स्थित राम के समीप प्रजा सीता के अपवाद की सूचना लेकर आयी। लक्ष्मण द्वारा राम को बार-बार सीता को नहीं त्यागने हेतु निवेदन करने पर भी राम नहीं माने एवं कृतान्त वक्त्र सेनापति को बुलाकर सीता को सिंहनाद अटवी में छोडने का आदेश दे दिया।</p>
<p><strong>सम्यग्दर्शन स्थिर सुख देना वाला है </strong></p>
<p>सेनापति सीता को दुःखी मन से वन में छोडकर राम द्वारा परित्याग करने की सुचना देता है,सीता सेना पति को राम के लिए संदेश देती है कि राम मेरे त्याग से विषाद मत करना, धैर्यपूर्वक न्याय &#8211; वत्सल हो प्रजा का पालन करना, जिस सम्यक्त्व के द्वारा भव्य जीव संसार से तिर जाते है उसकी भलीकार आरधना करना, साम्राज्य की अपेक्षा वह सम्यक्त्व ही श्रेष्ठ है क्योंकि साम्राज्य तो नष्ट हो जाता है परन्तु, सम्यग्दर्शन स्थिर सुख देना वाला है अभव्यों द्वारा की गई घृणा के कारण सम्यग्दर्शन मत छोड़ना वह दुर्लभ रत्न है वह अत्यन्त बड़ा अमृत फल है, संसार में बोलने से कौन किसको रोक सकता है अपने सारे कार्य आत्म- हितकारी विचार पूर्वक ही करना, मेरी उचित या अनुचित प्रवृत्ति को क्षमा कर देना&#8230;आदि प्रसंगों का अद्भुत विस्तृत वर्णन संगीतमय एवं कलापूर्ण शैली में गुरुदेव केमुखारविन्द से हुआ।</p>
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		<title>जीवन क्रियाशील बनाने के लिए रामचंद्र जी का चरित्र अवश्य ही सुनना चाहिए: मुनिश्री जयकीर्ति जी की रामकथा में उमड़े श्रावक-श्राविकाएं  </title>
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		<pubDate>Thu, 27 Nov 2025 14:44:58 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[विशिष्ट रामकथाकार अनुष्ठान विशेषज्ञ मुनिश्री जयकीर्ति जी रामपुरा स्थित श्री दिगंबर जैन मंदिर में विराजमान हैं। मुनिश्री के मुख से 30 नवंबर तक अकलंक स्कूल परिसर में भव्य रामकथा संगीत की सुमधुर धुनों के साथ चल रही है। कोटा से पढ़िए, पारस जैन पार्श्वमणि की यह खबर&#8230; कोटा। विशिष्ट रामकथाकार अनुष्ठान विशेषज्ञ मुनिश्री जयकीर्ति जी [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>विशिष्ट रामकथाकार अनुष्ठान विशेषज्ञ मुनिश्री जयकीर्ति जी रामपुरा स्थित श्री दिगंबर जैन मंदिर में विराजमान हैं। मुनिश्री के मुख से 30 नवंबर तक अकलंक स्कूल परिसर में भव्य रामकथा संगीत की सुमधुर धुनों के साथ चल रही है। <span style="color: #ff0000">कोटा से पढ़िए, पारस जैन पार्श्वमणि की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>कोटा।</strong> विशिष्ट रामकथाकार अनुष्ठान विशेषज्ञ मुनिश्री जयकीर्ति जी रामपुरा स्थित श्री दिगंबर जैन मंदिर में विराजमान हैं। मुनिश्री के मुख से 30 नवंबर तक अकलंक स्कूल परिसर में भव्य रामकथा संगीत की सुमधुर धुनों के साथ चल रही है। श्रद्धालु भाव विभोर हो झूम उठते हैं। गुरुवार को रामकथा का सातवां दिन था। अकलंक संस्थान के अध्यक्ष पीयूष बज, सचिव अनिमेष जैन बताया कि मां जिनवाणी को पालकी में विराजमान कर गुरुदेव के कर कमलों में देने का सौभाग्य राजेश शर्मीला, भावी विपुल दिनेश पाटनी परिवार को मिला। महेश जैन गंगवाल ने बताया कि राजा श्रेणिक बनने का अवसर दिनेश कुमार नीलू, चिराग स्वेता, पराग श्रुति, रक्ष, नेहा, ऐरा, स्वर्ण मड़ि़या, कनवास वाले को मिला। मुनिश्री जय कीर्ति जी ने धर्मसभा में कहा कि जो मनुष्य कल्याणकारी वचनों को कहता अथवा सुनता है। वास्तव में वहीं मनुष्य है अन्य तो शिल्पकार द्वारा बनाए हुए मनुष्याकार पुतलों के समान है अर्थात जीवन में जीवंतता लाने के लिए एवं जीवन को क्रियाशील बनाने के लिए यह रामचंद्र जी का चरित्र निश्चित ही अवश्य ही सुनना चाहिए। अमृत समान आरोग्य प्रदायी सुगंधित जल को लाने के लिए हनुमान भामंडल एवं अंगद को भेजा जाता है। वे भरतादि के साथ द्रोणमेघ राजा से लक्षमण के जीवन रक्षार्थ विशल्या की याचना करने पर राजा मना करता है किन्तु कैकयी द्वारा समझाने पर वह कन्या को भेजता है, युद्ध भूमि में विशल्या का बहुमान, कन्या के समीप आते ही लक्ष्मण सचेत हो जाते हैं, संपूर्ण सेना के पास अमृतसम जल भेजा जाता है। जिससे समी स्वस्थ हो जाते हैं।</p>
<p><strong>रावण की दृढ़ता देख मणिभद्र-पूर्णभद्र देव उपद्रव दूर करते हैं</strong></p>
<p>राम द्वारा लक्ष्मण को विशल्या का संपूर्ण वृत्तांत वर्णन, लक्ष्मण का विशल्या के साथ वैभवपूर्ण विवाहोत्सव, रावण को नीति शास्त्र अनुसार मृगांक आदि मंत्रियों द्वारा सीता को लौटाने के लिए संबोधन, अष्टाह्निक पर्व में युद्ध विराम करके रावण अपने हजार स्वर्णखंभांे युक्त श्री शांतिनाथ जिनालय में दिव्य द्रव्यों से पूजन आदि करता है एवं बहुरुपिणी विद्या सिद्धि हेतु अचलासन में जाप में स्थित हो जाता है। इधर, रावण की विद्या सिद्धि की सूचना सुनकर धर्मयुक्त श्री राम के मना करने पर विद्याधर कुमार लंका में जाकर अनेक तोड फोड एवं उपद्रव करते हैं। रावण की दृढ़ता देख मणिभद्र-पूर्णभद्र देव उपद्रव दूर करते हैं, लक्ष्मण द्वारा निवेदन करने पर दोनों देव धर्म एवं नीति की रक्षार्थ मात्र रावण को विचलित करने का अनुमति देते हैं। कुमारों द्वारा अनेकानेक प्रकार से विचलित करने पर भी अटल रावण ने बहुरुपिणी विद्या सिद्ध कर ही ली। रावण द्वारा भय एवं स्नेह से सीता को आकर्षित करने के अनेक प्रयास किए गए। किंतु रामनिष्ठ सीता अटल रही।</p>
<p><strong> विद्वानों का बैर केवल मरण पर्यंत ही होता है</strong></p>
<p>राम के प्रति सीता का अदूट प्रेम देखकर रावण को अपनी गलती का एहसास हुआ फिर भी मोही रावण ने सीता की पाने अपनी विनाशकारी हठ नहीं छोडी एवं अनेक अपशकुनों को अनदेखा करके युद्ध भूमि में पहुंचा। रावण एवं लक्ष्मण का दस दिन तक बिना हार-जीत के युद्ध चलता है, अंत में क्रोधित हो रावण लक्ष्मण पर चक्ररत्न चला देता लेकिन, चक्र तीन परिक्रमा कर लक्ष्मण के हाथ में आ जाता है। लक्ष्मण कहता है &#8211; हे! रावण अब भी सीता को लौटाकर अपने राज्य का उपभोग करो किन्तु रावण अपने दुराग्रह को नहीं छोड़ता है। लक्ष्मण का चक्ररत्न रावण के वक्षस्थल को भेद देता है,</p>
<p>त्रिखंडाधिपति रावण जैसे पर्वत दूटकर गिरता है वैसे भूमि पर गिर जाता है। रावण की मृत्यु से विभिषण एवं मंदोदरी आदि समस्त रानियां का करुण विलाप सुनकर राम सबको सांत्वना देते हुए कहते है कि विद्वानों का बैर केवल मरण पर्यंत ही होता है। अतः हमारा कोई बैर नहीं है। राम लक्ष्मण सहित सभी पद्म सरोवर जाकर रावण का दाह संस्कार करते हैं, इंद्रजीत, मेघवाहन, कुंभकर्ण को भी दाह संस्कार में लाया जाता है वे तीनों विचार करते हैं। महामोह महादुःख देनेवाला है। राज्य एवं भोगों की आशा में कैसे जीवन का अंत हो जाता है।</p>
<p><strong>देवों द्वारा केवल ज्ञान का महोत्सव मनाया जाता है </strong></p>
<p>संसार में धर्म ही सार है अतः सुखदायी निर्ग्रंथ पद ही हमारे लिये श्रेय है। इधर, दिन के अंतिम प्रहर में 56 हजार मुनियों के साथ अनंतवीर्य मुनिराज आकाश मार्ग सें लंका में प्रवेश करते है, रात्रि के अंतिम प्रहर में अनंत वीर्य मुनिराज को केवल ज्ञान की प्राप्ति होती है, देवों द्वारा केवल ज्ञान का महोत्सव मनाया जाता है। इंद्रजीत मेघवाहन कुंभकरण जिन दीक्षा धारण करते हैं एवं मंदोदरी चंद्रनखा सहित 48 रानियां आर्यिका दीक्षा ग्रहण करती है। इधर राम, लक्ष्मण, विभीषण आदि लंका में प्रवेश करते हैं, उन्नत प्रीति युक्त राम सीता का मिलन एवं संवाद, राम सीता का देवताओं द्वारा प्रशंसा एवं बहुमान..आदि कथानकों का अत्यन्त नवरसयुक्त मनमोहक शैली से श्रीरामभक्तों को गुरुदेव ने मंत्रमुग्ध कर दिया। संपूर्ण सभा आनंद में सराबोर हो गई।</p>
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