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	<title>अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
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	<title>अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>8 मार्च: अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष  </title>
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		<pubDate>Sat, 08 Mar 2025 10:37:26 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[इस अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर समाचार-पत्रों व वेब पोर्टलों पर आ रही कविताओं के अलावा कई मंचों पर महिलाओं के प्रति आदर व सम्मान को स्थायित्व प्रदान करने हेतु कई कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है। ऐसे में महिलाएं भी स्वयं को यह दिवस मनाने हेतु आतुर और उत्साहित नजर आती है। महिलाओं की [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>इस अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर समाचार-पत्रों व वेब पोर्टलों पर आ रही कविताओं के अलावा कई मंचों पर महिलाओं के प्रति आदर व सम्मान को स्थायित्व प्रदान करने हेतु कई कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है। ऐसे में महिलाएं भी स्वयं को यह दिवस मनाने हेतु आतुर और उत्साहित नजर आती है। महिलाओं की दिनचर्या और उनके कार्य करने और विभिन्न कलाओं को अपने में समाहित करने पर जोर देती है। <span style="color: #ff0000">श्रीफल हैं न्यूज की नीता राजेश जैन की प्रस्तुति ने </span></strong></p>
<hr />
<p>रसायन शास्त्र से शायद ना पड़ा हो पाला</p>
<p>पर सारा रसोईघर प्रयोगशाला</p>
<p>दूध में साइट्रीक एसिड डालकर पनीर बनाना या</p>
<p>सोडियम बाई कार्बाेनेट से केक को फूलाना</p>
<p>चम्मच से सोडियम क्लोराइड का सही अनुपात तोलती</p>
<p>रोज कितने ही प्रयोग कर डालती हैं</p>
<p>पर खुद को कोई वैज्ञानिक नही,</p>
<p>बस गृहिणी ही मानती हैं</p>
<p>रसोई गैस की बढ़े कीमतें या सब्जी के बढ़े भाव</p>
<p>पैट्रोल, डीजल महँगा हो या तेल मे आए उछाल</p>
<p>घर के बिगड़े हुए बजट को</p>
<p>अर्थशास्त्री न होकर भी</p>
<p>झट से सम्हालती है</p>
<p>पर खुद को बस गृहिणी ही मानती हैं</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>मसालों के नाम पर भर रखा</p>
<p>आयुर्वेद का खजाना</p>
<p>गमलो में उगा रखे हैं</p>
<p>तुलसी गिलोय, करीपत्ता</p>
<p>छोटी-मोटी बीमारियों को</p>
<p>काढ़े से भगाना जानती है</p>
<p>पर खुद को बस गृहिणी ही मानती हैं।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>सुंदर रंगोली और मेहँदी में</p>
<p>नजर आती इनकी चित्रकारी</p>
<p>सुव्यवस्थित घर में झलकती है</p>
<p>इनकी कलाकारी</p>
<p>ढोलक की थाप पर गीत गाती नाचती है</p>
<p>कितनी ही कलाएं जानती है</p>
<p>पर खुद को बस गृहिणी ही मानती हैं</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>समाजशास्त्र ना पढ़ा हो शायद</p>
<p>पर इतना पता है कि</p>
<p>परिवार समाज की इकाई है</p>
<p>परिवार को उन्नत कर</p>
<p>समाज की उन्नति में</p>
<p>पूरा योगदान डालती है</p>
<p>पर खुद को बस गृहिणी ही मानती हैं।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>मनो वैज्ञानिक भले ही ना हो</p>
<p>पर घर में सबका मन पढ लेती है</p>
<p>रिश्तों के उलझे धागों को</p>
<p>सुलझाना खूब जानती है</p>
<p>पर खुद को बस गृहिणी ही मानती हैं।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>योग ध्यान के लिए समय नहीं है</p>
<p>ऐसा अक्सर कहती हैं</p>
<p>और प्रार्थना मे ध्यान लगाकर</p>
<p>घर की कुशलता मांगती है</p>
<p>पर खुद को बस गृहिणी ही मानती हैं।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>ये गृहणियां सच में महान है</p>
<p>कितने ही गुणों की खान है</p>
<p>सर्वगुण सम्पन्न होकर भी</p>
<p>अहंकार नहीं पालती है</p>
<p>पर खुद को बस गृहिणी ही मानती हैं।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>नीता जैन</p>
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		<title>अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष : डॉ. इन्दु जैन राष्ट्र गौरव का व्यक्तित्व युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणास्रोत है </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 07 Mar 2024 14:24:10 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[समाचार]]></category>
		<category><![CDATA[Digambar Jain]]></category>
		<category><![CDATA[international womens day सकल जैन समाज भारत श्रीफल जैन न्यूज]]></category>
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					<description><![CDATA[धार्मिक, सामाजिक, मीडिया एवं अकादमिक की विशेष गतिविधियों से जुड़ीं ,राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय जैनधर्म प्रतिनिधि डॉ० इन्दु जैन राष्ट्र गौरव एक ऐसी शख्सियत हैं जिन्होंने भाषा, लिपि,कला,साहित्य,लेखन, पत्रकारिता,समाजसेवा,शाकाहार प्रचारक आदि के क्षेत्र में बहुत कम उम्र में ही वो मुक़ाम हासिल कर लिया है कि आपके कार्यों को देश-विदेश में अनेक सम्मानों से नवाज़ा गया है। मनीष [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>धार्मिक, सामाजिक, मीडिया एवं अकादमिक की विशेष गतिविधियों से जुड़ीं ,राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय जैनधर्म प्रतिनिधि डॉ० इन्दु जैन राष्ट्र गौरव एक ऐसी शख्सियत हैं जिन्होंने भाषा, लिपि,कला,साहित्य,लेखन, पत्रकारिता,समाजसेवा,शाकाहार प्रचारक आदि के क्षेत्र में बहुत कम उम्र में ही वो मुक़ाम हासिल कर लिया है कि आपके कार्यों को देश-विदेश में अनेक सम्मानों से नवाज़ा गया है। <span style="color: #ff0000">मनीष बैद की रिपोर्ट&#8230;..</span></strong></p>
<hr />
<p><strong><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-56868" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/03/IMG-20240307-WA0068.jpg" alt="" width="1023" height="1280" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/03/IMG-20240307-WA0068.jpg 1023w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/03/IMG-20240307-WA0068-240x300.jpg 240w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/03/IMG-20240307-WA0068-818x1024.jpg 818w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/03/IMG-20240307-WA0068-768x961.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/03/IMG-20240307-WA0068-990x1239.jpg 990w" sizes="(max-width: 1023px) 100vw, 1023px" />दिल्ली।</strong> धार्मिक, सामाजिक, मीडिया एवं अकादमिक की विशेष गतिविधियों से जुड़ीं ,राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय जैनधर्म प्रतिनिधि डॉ० इन्दु जैन राष्ट्र गौरव एक ऐसी शख्सियत हैं जिन्होंने भाषा, लिपि, कला, साहित्य, लेखन, पत्रकारिता, समाजसेवा, शाकाहार प्रचारक आदि के क्षेत्र में बहुत कम उम्र में ही वो मुक़ाम हासिल कर लिया है कि आपके कार्यों को देश-विदेश में अनेक सम्मानों से नवाज़ा गया है। राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित जैनदर्शन के प्रसिद्ध विद्वान प्रो. फूलचंद जैन प्रेमी (पिताजी)आदर्श महिला सम्मान से सम्मानित जैनदर्शन विदुषी एवं ब्राह्मी लिपि विशेषज्ञ डॉ. मुन्नीपुष्पा जैन (मां) एवं विविध विधाओं के अनेक गुरुओं के सान्निध्य में आपकी सम्पूर्ण शिक्षा एवं प्रतिभा का विकास जैनधर्म के चार तीर्थंकरों की जन्मस्थली, भगवान पार्श्वनाथ की नगरी बनारस में हुआ है। बनारस, माइक और मंच उनका बचपन से ही नाता रहा और आकाशवाणी, दूरदर्शन एवं अनेक प्रतिष्ठित मंचों पर उन्हें अपनी कला को निखारने का अवसर मिला। वे विवाह के पश्चात् बनारस से दिल्ली आईं और जीवनसाथी श्री राकेश जैन के समर्पित सहयोग एवं प्रेरणा से निरंतर अपनी प्रतिभा का चहुंमुखी विकास कर रहीं हैं।</p>
<p>डॉ. इन्दु जैन ने विगत 25 वर्षों से कई राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय सेमिनारों में आलेख वाचन, मंत्रालय एवं प्रतिष्ठित संस्थाओं के कार्यक्रमों का संचालन तथा संयोजन किया है। आपने कई विद्यालयों- विश्वविद्यालयों, कॉलेजों, अल्पसंख्यक आयोग, मंत्रालय के कार्यक्रमों,महिला एवं युवा सम्मेलनों, संगोष्ठियों,कार्यशालाओं में अतिथि , मुख्य वक्ता एवं मुख्य अतिथि , अध्यक्ष आदि के रूप में प्रेरक वक्तव्य देकर अनेक लोगों को नई राह दिखाई है। आपने शाकाहार अभियान , स्वस्थ मन अभियान,राष्ट्र धर्म ध्वजा अभियान से अनेक लोगों को जोड़ा है। भारत के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री , मुख्यमंत्री , धर्म गुरुओं आदि कई विशिष्ट व्यक्तियों के सानिध्य में आपने सर्वधर्म प्रार्थना सभाओं एवं विशेष कार्यक्रमों में, जैनधर्म के प्रतिनिधि के रूप में प्रतिभागिता की है एवं अपनी वाणी के प्रभाव से प्राकृत, संस्कृत, पाली, अपभ्रंश आदि प्राचीन भाषाओं के छंदों का सस्वर पाठ करके एवं हिन्दी भाषा के माध्यम से भारतीय एवं जैन संस्कृति को जन -जन के मन में बसाने का पावन कार्य किया है।</p>
<p>पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित अपने आलेख, नाटक,गीत,कविताओं आदि के माध्यम से डॉ. इन्दु जैन पाठकों से निरंतर संवाद स्थापित करने में सफल रहती हैं। आप सर्वप्राचीन ब्राह्मी लिपि के प्रचार-प्रसार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। आपकी अनेक उपलब्धियाँ हैं, जिनमें से मुख्य उपलब्धि यह है कि सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी से प्रकाशित आपकी पुस्तक &#8216;शौरसेनी प्राकृत भाषा और साहित्य का इतिहास&#8217; पर साहित्य जगत में देश का प्रतिष्ठित &#8216;महावीर पुरस्कार&#8217; प्राप्त हो चुका है। आप Faith Leader Honour, राष्ट्रीय पत्रकारिता सम्मान, जैन युवा सम्मान तथा राष्ट्र गौरव, नेशनल गौरव अवार्ड, JLA Iconic Incredible Woman Award ,अथाई गौरव सम्मान ,आदर्श पत्रकार सम्मान,आदर्श महिला रत्न,नारी गौरव सम्मान ,काशी गौरव सम्मान,अहिंसा इंटरनेशनल पुरस्कार ,श्रमण संस्कृति गौरव,मातृशक्ति सम्मान,इंटरनेशनल संकल्प अवार्ड,क्षुल्लक गणेश प्रसाद वर्णी स्मृति विद्वत परिषद पुरस्कार, ग्लोबल जैन सशक्त महिला पुरस्कार आदि कई सम्मानों से भी सम्मानित हो चुकी हैं।</p>
<p>सिंगापुर तथा दुबई जैन समाज के लिए आप विशेष व्याख्यान दे चुकी हैं। आपके व्याख्यानों से प्रभावित होकर दुबई समाज की ओर से आपको &#8220;विदुषी रत्न&#8221; की उपाधि से सम्मानित किया गया है। माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी एवं देश के सभी विशिष्टजनों के सान्निध्य में &#8220;नवीन संसद भवन&#8221; के भूमि पूजन एवं उद्घाटन के ऐतिहासिक समारोह के अंतर्गत आयोजित&#8217; सर्वधर्म प्रार्थना सभा&#8217; में जैनधर्म का प्रतिनिधित्व करते हुए आपने सर्वप्राचीन प्राकृत भाषा में गाथाएं एवं संस्कृत भाषा में महावीराष्टक एवं मंगलाष्टक का वाचन किया था, जिससे पूरे विश्व की जैन समाज गौरवान्वित हुई। वर्तमान समाज में कम होते नैतिक और चारित्रिक मूल्यों की त्रासदी के मध्य डॉ० इन्दु अपनी ओजस्वी वाणी, प्रेरक वक्तव्य, मधुर कंठ और मनमोहक संचालन द्वारा समाज को मूल्यों के संरक्षण के लिए निरंतर प्रेरित कर रहीं हैं और प्राचीन भाषा प्राकृत, अपभ्रंश, संस्कृत की शास्त्रीय प्रस्तुति के माध्यम से प्राचीन भारतीय संस्कृति को पुनर्जीवित करने का भगीरथ यत्न कर रहीं हैं ।</p>
<p>विश्व शांति की स्थापना के उद्देश्य से अहिंसा, अनेकान्त, सद्भाव, करुणा, मैत्री, शाकाहार के प्रचार-प्रसार में, आप निरंतर समर्पित भाव से कार्य कर रहीं हैं। पूरे भारत वर्ष में आकाशवाणी में 22 भाषाओं में प्रसारित होने वाले , चुनाव आयोग के विशेष कार्यक्रम &#8216;मतदाता जंग्शन&#8217; के कुछ एपिसोड लिखने का भी विशेष कार्य आपने किया है और निरंतर आलेख,कविता,नाटक,कहानी, डाक्यूमेंट्री आदि ऐसे ही कई विशेष कार्य कर रही हैं। वर्तमान में आप &#8216;जिनधर्म रक्षक&#8217; की संस्थापिका, नेशनल मीडिया फाउण्डेशन&#8217; की राष्ट्रीय सचिव , भारतीय जैन विद्वत् परिषद् की सम्मानित सदस्या,&#8217;जिन फाउण्डेशन&#8217; की सचिव , देश-विदेश में करीब 2500 से अधिक स्कूल और 60 से अधिक कॉलेज के विद्यार्थियों में अहिंसा, करुणा, मैत्री, शाकाहार, पर्यावरण संरक्षण का प्रचार-प्रसार करने वाली अंतर्राष्ट्रीय संस्था &#8216;करुणा इंटरनेशनल&#8217; (चेन्नई ) की संयोजक (दिल्ली), अथाई-आशा इंटरनेशनल की महासचिव,अखिल श्री भारतवर्षीय दिगम्बर जैन महासभा की उपाध्यक्षा, &#8216;अहिंसा प्रभावना पत्रिका&#8217; की मुख्य सम्पादिक, &#8216;पागद भासा&#8217; की सलाहकार, &#8216;प्राकृत टाइम्स इंटरनेशनल न्यूज़लेटर की सह सम्पादिका एवं कई प्रतिष्ठित संस्थाओं में सम्मानित पदों में रहकर, निरंतर समाज सेवा और सकारात्मक सोच के साथ, समाज को आगे बढ़ने की प्रेरणा देने के कार्य में संलग्न हैं।</p>
<p>&#8216;जिनधर्म रक्षक&#8217; के माध्यम से डॉ. इन्दु एवं राकेश जी का उद्देश्य जैनधर्म के सभी परम्परा के बच्चों को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जैनधर्म के प्रतिनिधि के रूप में तैयार करना एवं बच्चों की प्रतिभा का चहुंमुखी विकास करना है। अभी तक जिनधर्म रक्षक की विभिन्न कार्यशालाओं में दो हज़ार से अधिक बच्चों ने जैनधर्म-दर्शन-संस्कृति की रक्षा का संकल्प लिया है। ज्ञातव्य है कि डॉ. इन्दु निरंतर अपने यूट्यूब चैनल,सोशल मीडिया,प्रिंट मीडिया एवं कार्यशालाओं के माध्यम से भी जैन समाज को जैन संस्कृति , प्राकृत भाषा, ब्राह्मी लिपि, शाकाहार आदि के क्षेत्र में समर्पित होकर कार्य करने के लिए प्रेरित करती रहती हैं । उनका सपना है कि सभी गुरुओं के आशीर्वाद से वे पूरे विश्व के जैन बच्चों को एक परिवार की तरह जोड़कर जैन समाज की भावी पीढ़ी को जिनधर्म रक्षक के रूप में बचपन से ही तैयार कर दें ताकि बच्चे अभी से जैनधर्म-समाज-देश के लिए अपने कर्त्तव्य के प्रति जागरूक और समर्पित रहें। आज की युवा पीढ़ी के लिए रोल मॉडल बन चुकीं डॉ. इन्दु समाज में मूल्यों की स्थापना के लिए अहर्निश समर्पित रहती हैं।</p>
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		<title>अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस और होली मिलन समारोह आयोजित : महिलाओं को याद दिलानी होगी उनकी शक्ति </title>
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		<pubDate>Fri, 10 Mar 2023 03:25:48 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[समाचार]]></category>
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					<description><![CDATA[अखिल भारतीय जैन महिला समिति द्वारा अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस एवं होली पर्व पर कार्यक्रम आयोजित किया। पढ़िये राजीव सिंघई की विशेष रिपोर्ट&#8230;  महरौनी (ललितपुर)। अखिल भारतीय जैन महिला समिति द्वारा अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस एवं होली पर्व पर कार्यक्रम आयोजित किया, जिसमें महिला समिति की महिलाओं ने भाग लिया। इस मौके पर अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>अखिल भारतीय जैन महिला समिति द्वारा अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस एवं होली पर्व पर कार्यक्रम आयोजित किया। <span style="color: #ff0000;">पढ़िये राजीव सिंघई की विशेष रिपोर्ट&#8230; </span></strong></p>
<hr />
<p><strong>महरौनी (ललितपुर)।</strong> अखिल भारतीय जैन महिला समिति द्वारा अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस एवं होली पर्व पर कार्यक्रम आयोजित किया, जिसमें महिला समिति की महिलाओं ने भाग लिया। इस मौके पर अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर गोष्ठी का आयोजन किया गया, जिसमें सभी ने अपने -अपने विचार व्यक्त किए। अखिल भारतीय महिला समिति की चेयरपर्सन रश्मि मलैया ने कहा कि नारी ने हमेशा से परिवार संचालन का उत्तरदायित्व सम्भालते हुए समाज निर्माण में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है ।</p>
<p>वहीं भारतीय संस्कृति में स्त्री का दर्जा पुरुष की अपेक्षा कहीं अधिक सम्माननीय माना गया है। हमारे आदि-ग्रंथों में भी नारियों की भूमिका को अहम माना गया है। लवली शास्त्री ने कहा कि हमें महिलाओं का सशक्तिकरण करने के लिए उन्हें एहसास दिलाना होगा कि उनमें अपार शक्ति है, उनको अपनी आंतरिक शक्ति को जगाना होगा । वहीं अखिल भारतीय महिला समिति की अध्यक्ष सपना सिंघई ने महिलाओं के संघर्षों एवं त्याग पर प्रकाश डालते हुए कहा कि महिला त्याग और ममता की मूरत है।</p>
<p>महिला गोष्ठी के बाद होली मिलन समारोह हुआ, जिसमें एक दूसरे को गुलाल लगा कर होली पर्व की शुभकामनाएं दीं। कार्यक्रम का संचालन ममता सराफ ने किया और आभार राशि सिंघई ने व्यक्त किया। इस मौके पर मीनल गुढा, श्वेता सिंघई, छाया सिंघई, प्रीति स्वामी , पूनम मोदी आदि महिला समिति की पदाधिकारी और सदस्या उपस्थित रहीं।</p>
]]></content:encoded>
					
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		<title>महिला दिवस विशेष : दिगम्बर जैन परम्परा में आर्यिका रत्नों की समृद्ध परम्परा  </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 08 Mar 2023 06:30:47 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[दिगम्बर जैन परम्परा के साधु की चर्चा आते ही मन-मस्तिष्क में कठोर तपस्वी, त्यागमूर्ति, संसार की समस्त क्रियाओं से उदासीन संत की छवि उभरती है। पुरूष संतो के साथ ही जैन समाज में महिला संत यानी आर्यिकाएं भी हैं, जो अपने ज्ञान और अपनी तपस्या से पूरे समाज का पथ प्रदर्शन कर रही हैं। महिला [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>दिगम्बर जैन परम्परा के साधु की चर्चा आते ही मन-मस्तिष्क में कठोर तपस्वी, त्यागमूर्ति, संसार की समस्त क्रियाओं से उदासीन संत की छवि उभरती है। पुरूष संतो के साथ ही जैन समाज में महिला संत यानी आर्यिकाएं भी हैं, जो अपने ज्ञान और अपनी तपस्या से पूरे समाज का पथ प्रदर्शन कर रही हैं। <span style="color: #ff0000;">महिला दिवस पर जानते हैं इनके बारे में&#8230; </span></strong></p>
<hr />
<p><img decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-39564" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/03/IMG-20230308-WA0005.jpg" alt="" width="991" height="558" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/03/IMG-20230308-WA0005.jpg 991w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/03/IMG-20230308-WA0005-300x168.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/03/IMG-20230308-WA0005-768x432.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/03/IMG-20230308-WA0005-990x556.jpg 990w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/03/IMG-20230308-WA0005-470x264.jpg 470w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/03/IMG-20230308-WA0005-640x360.jpg 640w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/03/IMG-20230308-WA0005-215x120.jpg 215w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/03/IMG-20230308-WA0005-414x232.jpg 414w" sizes="(max-width: 991px) 100vw, 991px" /></p>
<p><strong>गणिनीप्रमुख आर्यिका श्री ज्ञानमती माताजी</strong></p>
<p>‘अन्यथा शरणं नास्ति, त्वमेव शरणं मम’ अर्थात् मैं तो कुछ भी नहीं हूं,</p>
<p>जो कुछ हो सो तुम्ही हो। मैं तो तुम्हारी शरण में हूं।</p>
<p>जैसे रसों में इक्षुरस और नदियों में गंगा श्रेष्ठ है, वैसे ही कन्याओं में मैना श्रेष्ठ थी। जैसे पुष्पों में कमल और सुगंधित पदार्थों में चन्दन श्रेष्ठ है, वैसे ही क्षुल्लिकाओं में वीरमती श्रेष्ठ थीं। जैसे ताराओं में चन्द्रमा और वनों में नन्दनवन श्रेष्ठ है, वैसे ही ज्ञान और शील में आर्यिका ज्ञानमती श्रेष्ठ हैं। एक ही असाधारण व्यक्तित्व की मैना से वीरमती और वीरमती से ज्ञानमती तक की यह आध्यात्मिक यात्रा 20वीं-21वीं सदी के इतिहास की एक उल्लेख्य घटना है। उनकी चर्चा और चर्या को देख-सुनकर कौन मुग्ध नहीं होता है!</p>
<p>अवध प्रान्त के टिकैतनगर कस्बे में 22 अक्टूबर 1934 को सुश्रावक श्री छोटेलाल जी के घर में एक कन्यारत्न ने जन्म लिया। वह विक्रम संवत 1991 की शरदपूर्णिमा की रात्रि थी। इस दिन जन्मी इस बालिका को जब पूनों की चांदनी ने नहलाया, तो इसके पीछे यही संकेत छिपा था कि यह बालिका बड़ी होकर सर्वत्र ज्ञान का प्रकाश फैलायेगी और स्वयं महाव्रत अंगीकार कर सबको सुख-शीतलता प्रदान करेगी।</p>
<p>भारत में अधिकांश लोग बेटे के जन्म पर खुशियां और बेटी के जन्म पर मातम मनाते हैं। यह खोटी परिपाटी कब से और क्यों चल पड़ी, यह तो भगवान जाने, परन्तु इस बेटी ने अपनी बालसुलभ किलकारियों और सस्मित मुख-छवि से अपने घर- आंगन में खुशियों की जो चांदनी बिखेरी, तो बेटों पर गर्व करने वाले भी ठगे से रह गये। इस परिवार में बेटे-बेटियों के साथ कभी भेदभाव नहीं किया गया। इस बच्ची का नाम रखा गया-मैना। मैना बचपन से ही पूर्व जन्म के संस्कारों के प्रभाव अपने साथ लेकर आई थी। मैना के मन में हितकर वार्ता को सीखने और समझने की उत्कट ललक थी। जिस चर्चा को कई-कई बार पढ़-सुनकर भी अन्य समवयस्क आत्मसात नहीं कर पाते थे, उसे वह एक-दो बार पढ़कर ही हृदयंगम कर लेती थी। प्रारंभिक शिक्षा यद्यपि उन्होंने किसी धार्मिक पाठशाला में प्राप्त की थी, किन्तु वह युग स्त्री-शिक्षा की उपेक्षा का युग था। कस्बे की अन्य कन्याओं की तरह मैना को भी आगे पढ़ाई जारी रखने से रोक लिया गया। उन्होंने घर पर ही पढ़ना जारी रखा। आठ वर्ष की उम्र से ही मैना अपनी माँ के साथ नियमित रूप से मंदिर जाने लगी थी। जब मैना ने दीक्षा ग्रहण कर ली, तो उन्हें पूज्य आचार्य श्री देशभूषण महाराज, आचार्यश्री शान्तिसागर महाराज एवं आचार्यश्री वीरसागर महाराज के उपदेश श्रवण और तत्त्वचर्चा का सौभाग्य मिलने लगा। वहां यथावसर वह स्वयं भी पढ़ती और गुरु-आज्ञा से संघस्थ सभी साधुओं और आर्यिकाओं को भी पढ़ाती। धीरे-धीरे चारों ही अनुयोगों के सभी उच्च कोटि के सिद्धान्त एवं आगम ग्रंथों का तलस्पर्शी पाण्डित्य माताजी ने प्राप्त कर लिया और आज पूरा विश्व उन्हेंगणिनी प्रमुख ज्ञानमती माताजी के नाम से जानता है। आज आयु के 80वें पायदान पर खड़ी मैना (सम्प्रति गणिनी आर्यिका ज्ञानमती) ने अपने बचपन के नाम की सार्थकता सिद्ध कर दी है। बचपन से आज तक माताजी का यही चिन्तन चलता रहा है-‘अन्यथा शरणं नास्ति, त्वमेव शरणं मम’ अर्थात् मैं तो कुछ भी नहीं हूँ, जो कुछ हो सो तुम्ही हो। मैं तो तुम्हारी शरण में हूं।</p>
<p><img decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-39565" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/03/IMG-20230308-WA0006.jpg" alt="" width="991" height="558" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/03/IMG-20230308-WA0006.jpg 991w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/03/IMG-20230308-WA0006-300x168.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/03/IMG-20230308-WA0006-768x432.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/03/IMG-20230308-WA0006-990x556.jpg 990w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/03/IMG-20230308-WA0006-470x264.jpg 470w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/03/IMG-20230308-WA0006-640x360.jpg 640w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/03/IMG-20230308-WA0006-215x120.jpg 215w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/03/IMG-20230308-WA0006-414x232.jpg 414w" sizes="(max-width: 991px) 100vw, 991px" /></p>
<p><strong>परमपूज्य आर्यिका सुपार्श्वमती माताजी</strong></p>
<p>णमोकार मन्त्र के जाप्य, स्मरण में आपको प्रगाढ़ आस्था थी और आप हमेशा</p>
<p>यही कहती थीं, कि इसके प्रभाव से असम्भव कार्य भी सम्भव हो जाता है।</p>
<p>आपकी बहुजता, विद्या-व्यासंग, सूक्ष्म-तलस्र्पिशनी बुद्धि, अकाट्य तर्कणा शक्ति एवं हृदयग्राह्य प्रतिपादन शैली अद्भुत है और विद्वत्-संसार को भी विमुग्ध करने वाली है। राजस्थान के मरुस्थल नागौर जिले के अंतर्गत डेह से उत्तर की ओर सोलह मील पर मैनसर नाम के गांव में सहगृस्थ श्री हरक चंदजी चूड़ीवाल के घर विक्रम संवत 1985 मिती फाल्गुन शुक्ला नवमी के शुभ दिवस पर एक कन्यारत्न का जन्म हुआ-नाम रखा गया ‘भंवरी’। भूरे-पूरे घर में भाई-बहिनों के साथ बालिका भी लालित-पालित हुई पर तब शायद ही कोई जानता होगा कि यह बालिका भविष्य में परम विदुषी आर्यिका के रूप में प्रगट होगी। अपनी 7-8 वर्ष की आयु में आपको महान् योगी तपस्वी साधुराज 108 आचार्यकल्प श्री चन्द्रसागर महारजा के दर्शनों का सौभाग्य प्राप्त हुआ था जब वे डेह से लालगढ़, मैनसर पधारे थे। आचार्य श्री वीरसागरजी ने भंवरीबाई के वैराग्यभाव, अच्छी स्मरण शक्ति एवं स्वाध्याय की रुचि देखकर संघस्थ ब्रह्मचारी श्री राजमलजी (वर्तमान में आचार्य 108 श्री अजितसागरजी) को आज्ञा दी कि ब्रह्मचारिणी भंवरीबाई को संस्कृत, प्राकृत का अध्ययन कराये तथा अध्यात्म-ग्रंथों का स्वाध्याय कराये। विद्यागुरु का ही महान प्रताप है कि आप चारों ही अनुयोगों के साथ-साथ संस्कृत भाषा में भी परम निष्णात हो गईं। ज्यों-ज्यों आपका ज्ञान बढ़ने लगा उसका फल वैराग्यभाव भी प्रकट हुआ। विक्रम संवत 2014 भाद्रपद शुक्ला 6 भगवान सुपार्श्वनाथ के गर्भकल्याणक के दिन विशाल जनसमूह के मध्य द्वय आचार्य संघों की उपस्थिति में (आचार्य 108 श्री महावीरकीर्ति जी महाराज भी तब ससंघ वहीं विराज रहे थे) ब्र. भंवरीबाई ने आचार्य 108 श्री वीरसागर जी महाराज के कर-कमलों से स्त्री-पर्याय को धन्य करने वाली आर्यिका दीक्षा ग्रहण की। भगवान सुपार्श्वनाथ का कल्याणक दिवस होने से आपका नाम सुपार्श्वमती रखा गया। आचार्यश्री के हाथों से यह अन्तिम दीक्षा थी। आर्यिकारत्न की प्रवचन शैली ऐसी है कि श्रोता अभिभूत हुए बिना नहीं रह पाते थे। विशाल जनसमुदाय के समक्ष जिस निर्भीकता से आप आगम का क्रमबद्ध, धारा प्रवाह प्रतिपादन करती हैं तो लगता था साक्षात् सरस्वती के मुख से अमृत झर रहा है। आपके प्रवचन आगमानुकूल अकाट्य तर्कों के साथ प्रवाहित होते थे। आप घंटों एक ही आसन से धर्मचर्चा में निरत रहती थी। उच्च कोटि के विद्वान् भी अपनी शंकाओं को आपसे समीचीन समाधान पाकर सन्तुष्ट होते थे। सबसे बड़ी विशेषता तो आप में यह है कि आपसे कोई कितने ही प्रश्न कितनी ही बार करें आप उसका बराबर सही प्रामाणिक उत्तर देती थीं। स्वास्थ्य अधिकतर प्रतिकूल ही रहता था, लेकिन आप कभी अपनी चर्या में शिथिलता नहीं आने देतीं थीं। णमोकार मन्त्र के जाप्य, स्मरण में आपको प्रगाढ़ आस्था थी और आप हमेशा यही कहती थीं, कि इसके प्रभाव से असम्भव कार्य भी सम्भव हो जाता है। आसाम, बंगाल, बिहार, नागालैंड आदि प्रान्तों में अपूर्व धर्मप्रभावना कर जैनधर्म का उद्योत करने का श्रेय आपको ही है। महान् विद्यानुरागी, श्रेष्ठवक्ताय अनेक भाषाओं की ज्ञाता चतुरनुयोगमय जैन ग्रंथों की प्रकाण्ड विदुषी, न्याय, व्याकरण, सिद्धान्त साहित्य की कर्मज्ञा, ज्योतिष, यन्त्र, तन्त्र, मन्त्र, औषधि आदि की विशेष जानकार होने से आपने अनेकों जीवों का कल्याण किया है।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-39566" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/03/IMG-20230308-WA0009.jpg" alt="" width="991" height="557" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/03/IMG-20230308-WA0009.jpg 991w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/03/IMG-20230308-WA0009-300x168.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/03/IMG-20230308-WA0009-768x432.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/03/IMG-20230308-WA0009-470x264.jpg 470w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/03/IMG-20230308-WA0009-640x360.jpg 640w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/03/IMG-20230308-WA0009-215x120.jpg 215w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/03/IMG-20230308-WA0009-414x232.jpg 414w" sizes="auto, (max-width: 991px) 100vw, 991px" /></p>
<p><strong>परमपूज्य चन्दनामती माताजी</strong></p>
<p>धर्म से कोसों दूर रहने वाला युवा जो धर्म को पाखण्ड एवं ढकोसला कहता है, जब आपके सम्पर्क में आता है तो वह जान पाता है कि धर्म एक जीवन शैली है।</p>
<p>पूज्य गणिनी ज्ञानमती माताजी ने कुमारी अवस्था में आर्यिका दीक्षा ग्रहण कर एक अभिनव परम्परा का सूत्रपात किया। जिसके फलस्वरूप देश में आज शताधिक ऐसी आर्यिकायें हैं जिन्होंने गृहस्थाश्रम में प्रवेश के पूर्व ही संसार की असारता का ज्ञान प्राप्त कर आर्यिका के महाव्रतों को अंगीकार किया किन्तु इस परम्परा का सूत्रपात करने वाली गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी की प्रथम आर्यिका शिष्या होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ कु. माधुरी जैन को, जो आज प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका श्री चन्दनामती माताजी के रूप में अपनी ज्ञान रश्मियों से दिग्दिगन्त को आलोकित कर रही हैं।</p>
<p>आप आधुनिक जीवन शैली, उसकी मजबूरियों, आवश्यकताओं एवं युवा मानसिकता को करीब से जानने एवं समझने वाली एक साध्वी है। आप अपने सहज, सरल, सौम्य एवं मधुर व्यक्तित्व से सबके लिए पूजनीय हो गई हैं। गृहस्थाश्रम की बड़ी बहिन एवं जैन समाज की वरिष्ठतम साध्वी, आर्यिका श्री ज्ञानमती माताजी को आपने 1969 में गुरु के रूप में स्वीकार कर त्यागध्अध्ययन की ओर कदम बढ़ाया। 1969 से आप सतत छाया के समान पूज्य माताजी के संघ में रहकर आगमों का गुरुमुख से अध्ययन तो कर ही रही हैं, साथ ही विगत 44 वर्षों से सर्मिपत होकर पूज्य गणिनीप्रमुख ज्ञानमती माताजी के संघ की ििर्नवकल्प सेवा आपकी अनन्य गुरु भक्ति का उत्कृष्ट उदाहरण है। आगम ग्रन्थों तथा सम-सामयिक साहित्य के गहन अध्ययन से प्राप्त निष्कर्षों एवं स्वरचित भजनों, मुक्तकों से युक्त आपके प्रवचन व उद्बोधन युवा पीढ़ी को बरबस अपनी ओर आकर्षित करते हैं। आपके प्रवचन इतने सटीक, सुसंगत एवं क्रमबद्ध होते हैं कि प्रवचनोपरान्त प्रत्येक श्रोता के पास सोचने, विचारने एवं आचरण करने के लिए कुछ न कुछ सामग्री होती हैं। आपने कुछ अत्यन्त गम्भीर प्रकृति के कार्य किये हैं जिनमें सर्वोपरि है सिद्धान्त ग्रंथ षट्खण्डागम की गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी कृत सिद्धान्त चिन्तामणि शीर्षक संस्कृत टीका की हिन्दी टीका। धर्म से कोसों दूर रहने वाला युवा जो धर्म को पाखण्ड एवं ढकोसला कहता है, जब आपके सम्पर्क में आता है तो वह जान पाता है कि धर्म एक जीवन शैली है जिसे अपनाकर तनाव मुक्त जीवन जिया जा सकता है। संक्षेप में हम कह सकते हैं कि पूज्य प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका श्री ने हमें जीवन जीने की कला सिखाई है जीवन को सार्थकता दी है।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-39567" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/03/IMG-20230308-WA0008.jpg" alt="" width="991" height="558" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/03/IMG-20230308-WA0008.jpg 991w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/03/IMG-20230308-WA0008-300x168.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/03/IMG-20230308-WA0008-768x432.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/03/IMG-20230308-WA0008-990x556.jpg 990w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/03/IMG-20230308-WA0008-470x264.jpg 470w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/03/IMG-20230308-WA0008-640x360.jpg 640w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/03/IMG-20230308-WA0008-215x120.jpg 215w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/03/IMG-20230308-WA0008-414x232.jpg 414w" sizes="auto, (max-width: 991px) 100vw, 991px" /></p>
<p><strong>परमपूज्य आर्यिका श्री जिनमती माताजी</strong></p>
<p>वास्तव में गुरु का सानिध्य एवं वात्सल्य जीवन को मात्र सुवासित ही</p>
<p>नहीं करता अपितु उसे परमपूज्य भी बना देता है।</p>
<p>यदि कल्याण की इच्छा है तो विषयों को विष के समान त्याग देना चाहिए। क्षमा, सरलता, दया, पवित्रता और सत्य को अमृत के समान ग्रहण करना चाहिए। इस तथ्य का बोध महाराष्ट्र प्रान्त की एक बाला को हुआ और वह आर्यिकारत्न श्री ज्ञानमती माताजी के उपवन का एक सुरभित पुष्प बन गईं। कुमारी प्रभावती का जन्म विक्रम संवत. 1990 (सन् 1933) फाल्गुन शुक्ल. 15 के दिन म्हसवड़ (महाराष्ट्र) में हुआ था, इनके पिता का नाम श्री फूलचंद जैन एवं माता का नाम श्रीमती कस्तूरी देवी था। जैैनधर्म के कर्मसिद्धान्तानुसार बालिका प्रभावती के दुर्भाग्य से पितृ एवं मातृ वियोग उन्हें बचपन में ही हो गया अतः उनका लालन-पालन मामाजी के घर पर हुआ था। सन् 1955 की बात है, उस समय पूज्य गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी, क्षु.वीरमती माताजी के रूप में थीं और चारित्र चक्रवर्ती आचार्यवर्य श्री शांतिसागर जी महाराज के सल्लेखना के समय आचार्य श्री के दर्शनार्थ क्षु. विशालमती माताजी के साथ दक्षिण भारत में विहार कर रही थीं, उन्होंने म्हसवड़ में चातुर्मास किया। उस चातुर्मास के मध्य अनेक बालिकाएँ पूज्य माताजी से कातंत्र व्याकरण, द्रव्य संग्रह, तत्त्वार्थसूत्र आदि ग्रंथों का अध्ययन कर रही थीं और उन्हीं बालिकाओं में वह 22 वर्षीया बालिका प्रभावती भी थी। माताजी ने उसके मनोभावों को जानकर अपने वात्सल्य के प्रभाव से प्रभावती को त्यागमार्ग के प्रति आकर्षित किया और सन् 1955 की दीपावली की पावन तिथि में वीरप्रभु के निर्वाणदिवस पर उन्हें आजीवन ब्रह्मचर्य एवं 10वीं प्रतिमा का व्रत दे दिया। वास्तव में गुरु का सानिध्य एवं वात्सल्य जीवन को मात्र सुवासित ही नहीं करता अपितु उसे परमपूज्य भी बना देता है।</p>
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		<title>महिला दिवस पर विशेष : बागीदौरा की पांच युवतियां आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत लेकर बनीं मिसाल </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/five_girls_of_bagidaura_set_an_example_by_taking_vow_of_lifelong_celibacy/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 08 Mar 2023 00:30:45 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[समाचार]]></category>
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					<description><![CDATA[आयु के ऐसे पड़ाव पर जहां युवा मन किसी भी दिशा में भटक सकता है और सांसारिक मोह माया अंदर तक जकड़े रहती है, उस समय आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत लेकर बागीदौरा राजस्थान की पांच युवतियों ने एक अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया है। जयपुर। उम्र के जिस पड़ाव पर सामान्य युवतियां या तो कॅरियर की [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>आयु के ऐसे पड़ाव पर जहां युवा मन किसी भी दिशा में भटक सकता है और सांसारिक मोह माया अंदर तक जकड़े रहती है, उस समय आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत लेकर बागीदौरा राजस्थान की पांच युवतियों ने एक अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया है।</strong></p>
<hr />
<p><strong>जयपुर।</strong> उम्र के जिस पड़ाव पर सामान्य युवतियां या तो कॅरियर की चिंता में डूबी होती हैं या शादी करके गृहस्थी बनाने के सपने देखती हैं, उस उम्र में राजस्थान के बागीदौरा की पांच युवतियों ने अपनी सांसरिक इच्छाओं पर नियंत्रण की अनूठी मिसाल कायम की है। दिव्यांशी, मुदिता, अवधि, तिथि और विदुषी नाम की इन युवतियों की आयु अभी सिर्फ 19 से 23 वर्ष के बीच है और इस छोटी सी उम्र में इन्होंने आचार्य भगवंत श्री विद्यासागर जी महाराज की प्रेरणा से आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत ले लिया है। पांचों ने पिछले वर्ष ही यह व्रत लिया है।</p>
<p>पांचों युवतियां अभी जबलपुर में आचार्य श्री की प्रेरणा से चल रहे पूर्णायु आयुर्वेद चिकित्सालय व अनुसंधान विद्यापीठ से बीएएमएस यानी आयुर्वेद की पढाई कर रही है। इनका अंतिम लक्ष्य तो दीक्षा प्राप्त कर भव सागर से मुक्ति पथ पर आगे बढना है, लेकिन फिलहाल आचार्य श्री के निर्देश पर आयुर्वेद की पढाई कर रही हैं ताकि विश्व भर मंें भारत की अपनी चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद का प्रचार-प्रसार कर सकें।</p>
<p><strong>बचपन के संस्कारों ने दिखाया कमाल</strong></p>
<p>इतनी सी उम्र में संयम के पथ पर कदम बढाना आसान काम नहीं है। इसके पीछे बचपन के संस्कार, परिवार की पृष्ठभूमि और स्वयं का संकल्प काम करत है। ये पांचों युवतियां इस मामले में सौभाग्यशाली रही हैं। दिव्यांशी और मुदिता आपस में बहन हैं, वहीं अवधि, तिथि और विदुषी भी आपसी रिश्तेदारी में बहनें हैं। दिव्यांशी ने बताया कि हम पांचों का परिवार धार्मिक संस्कारों से परिपूर्ण है और हमें बचपन से ही यह संस्कार मिले हैं कि सांसारिक मोह-माया से दूर रहते हुए संयम के पथ पर चलते हुए वास्तविक और स्थाई आनंद प्राप्त करना है।</p>
<p>दिव्यांशी के पिता सरकारी स्कूल में शिक्षक है, वहीं मुदिता, अवधि, तिथि और विदुषी के पिता स्वयं का व्यवसाय करते हैं। परिवार में उनके अलावा उनके भाई-बहन भी हैं, हालांकि विदुषी इकलौती संतान हैं। दिव्यांशी स्वयं जबलपुर में आचार्य श्री की प्रेरणा से चल रहे प्रतिभास्थली में पढी हैं, इसलिए उनमें तो यह संस्कार ना सिर्फ परिवार से आए, बल्कि पढाई से भी आए, क्योंकि प्रतिभास्थली में तो पढाने वाले भी आजीवन व्रती ही हैं, लेकिन बाकी चारों तो बागीदौरा में सामान्य स्कूलों में ही पढी है और इनमें से मुदिता ने तो बीएस सी तक पढाई की है, यानी काॅलेज भी गई हैं, लेकिन यह परिवारों के संस्कारों का ही असर है कि इनमें संयम के पथ को छोड कर कोई दूसरा पथ अपनाने की इच्छा तक नहीं है।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-39548" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/03/IMG-20230307-WA0030.jpg" alt="" width="831" height="1600" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/03/IMG-20230307-WA0030.jpg 831w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/03/IMG-20230307-WA0030-156x300.jpg 156w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/03/IMG-20230307-WA0030-532x1024.jpg 532w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/03/IMG-20230307-WA0030-768x1479.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/03/IMG-20230307-WA0030-798x1536.jpg 798w" sizes="auto, (max-width: 831px) 100vw, 831px" /></p>
<p><strong>कभी विकल्प आता ही नहीं</strong></p>
<p>दिव्यांशी और मुदिता ने बताया कि यह सही है कि आज समय ऐसा है कि भटकाव बहुत आसानी से हो सकता है और हम भी मनुष्य ही है, इसलिए सांसारिक चीजें देखनी भी पडती है, लेकिन लेकिन संस्कार ऐसे हैं कि विकल्प आते ही नहीं है। आमतौर पर परिवार स्वयं बच्चों को ऐसे पथ पर आगे बढने से रोकते हैं, लेकिन हमारे परिवारों ने हमें कभी रोका नहीं बल्कि हमेशा प्रेरित किया। यही कारण है कि हम देखते सब कुछ है, लेकिन यह समझ भी है कि क्या सही है और क्या गलत है, इसलिए कभी कोई विकल्प दिमाग में आता ही नहीं है।</p>
<p><strong>संतों का मिला सान्निध्य</strong></p>
<p>परिवार के संस्कार ऐसे रहे हैं कि इन्हें हमेशा का संताों का सान्निध्य भी मिला। मुदिता ने बताया कि आचार्य श्री समय सागरजी महाराज, विज्ञानमति माताजी और आगम सागर जी महाराज के चातुर्मास बागीदौरा में हुए और इनके अलावा भी जो महाराज जी वहां आते रहे, उन सबके पास हम जाते थे, इसलिए प्रेरणा मिलती गई और संतों की चर्या को देखते हुए भाव प्रबल होते गए। आचार्य श्री विद्यसागर जी महाराज का सान्निध्य भी लगातार मिलता रहा तो भावना दृढ हो गई कि अब तो इसी पथ पर आगे बढना है।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p><strong>नीट की परीक्षा पास की</strong></p>
<p>दिव्यांशी ने बताया कि आचार्य श्री के निर्देश पर ही हमने नीट की परीक्षा दी और इसे पास करने के बाद आयुर्वेद की पढाई के लिए बीएएएमएस में प्रवेश लिया। आचार्य श्री का कहना है कि एलोपैथी नहीं बल्कि हमें भारत की अपनी चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद को आगे बढाना है। अब अभी तो पढाई कर रहे हैं और फिर जैसा आचार्य श्री निर्देश देंगे, उसी अनुरूप काम करेंगे।</p>
<p><strong>अंतिम लक्ष्य दीक्षा है</strong></p>
<p>इन सभी का अंतिम लक्ष्य दीक्षा है। इनका कहना है कि संयम का पथ पकडा है तो अंतिम लक्ष्य तक तो पहुंचना ही है। हमारे भाव तो दीक्षा के ही है ताकि आत्मकल्याण के पथ पर चलते हुए भवसागर से मुक्ति मिले, लेकिन देखेगे कि आचार्य श्री क्या निर्देश देते हैं। वे जैसा कहेंगे उसी के हिसाब से आगे चलेंगे। लेकिन यह तय है कि संयम का यह पथ कभी छोड़ना नहीं है।</p>
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		<title>महिला दिवस पर विशेष : जैन धर्म की पताका फहराती प्रमुख जैन नारियां </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 07 Mar 2023 06:30:39 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आदिपुराण में कहा गया है कि ‘कन्या रत्नात् परं नान्दय’ अर्थात् कन्यारत्न से बढ़कर कोई रत्न नहीं है। नारी की महत्ता उसके नारीत्व गुणों से है। श्रेष्ठ महापुरुषों को जन्म देने वाली माता लोक में पूजनीय हैं। पढ़िये डाॅ. ज्योति जैन, खतौली का विशेष आलेख&#8230;  विश्व जननी ‘नारी’ सृष्टि के विकास का मूल आधार है। [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>आदिपुराण में कहा गया है कि ‘कन्या रत्नात् परं नान्दय’ अर्थात् कन्यारत्न से बढ़कर कोई रत्न नहीं है। नारी की महत्ता उसके नारीत्व गुणों से है। श्रेष्ठ महापुरुषों को जन्म देने वाली माता लोक में पूजनीय हैं। <span style="color: #ff0000;">पढ़िये डाॅ. ज्योति जैन, खतौली का विशेष आलेख&#8230; </span></strong></p>
<hr />
<p style="text-align: left;">विश्व जननी ‘नारी’ सृष्टि के विकास का मूल आधार है। नारी परिवार समाज एवं राष्ट्र की धुरी है। नारी अपनी प्रकृति प्रदत्त विषेषताओं के कारण समाज को गतिशील बनाने में सक्षम है। जैन धर्म एवं संस्कृति में नारी का उच्च स्थान रहा है। वह तीर्थंकरों की जननी है। वह माता, पत्नी, बहिन, पुत्री के रूप में समाज में अपना सम्माननीय स्थान पाती है। जैन धर्म में धार्मिक आधार पर पुत्र-पुत्री में कोई भेदभाव नहीं है।</p>
<p>जैनधर्म एवं संस्कृति की यह परम्परा सतत रूप से चली आ रही है। महिला रत्न मगनबाई, कुकुंलाई, मां श्री चंदाबाई, पद्मश्री सुमतिबाई, कमला बाई, चिरौंजाबाई, बानुबाई, रमा रानी आदि अनेक नारियां जैन धर्म ध्वजा की पथगामिनी बनीं।</p>
<p>जैन पौराणिक ग्रंथों में नारियों की अनन्त महिमा का वर्णन किया गया है। आदिपुराण में कहा गया है कि ‘कन्या रत्नात् परं नान्दय’ कन्यारत्न से बढ़कर कोई रत्न नहीं है। नारी की महत्ता उसके नारीत्व गुणों से है। श्रेष्ठ महापुरुषों को जन्म देने वाली माता लोक में पूजनीय है। शीलवती स्त्रियों को देवों के द्वारा सम्मान प्राप्त है। प्राचीन शिलालेखों में नारियों की गौरवगाथा उत्कीर्ण है। जैन पुराणों और चरित्रों में जैन नारियों के अद्भुत पराक्रम, असीम सेवा, धर्म परायणता और त्याग संयम के कथानक चकित कर देते हैं।</p>
<p>आइये! देखें जैन धर्म ध्वजा को फहराती उन महान नारियों को जिन्होंने गृहस्थ जीवन का निर्वहन करते हुए धर्म एवं संस्कृति की रक्षा की।</p>
<p>&#8211; ‘शीलवती सीता’ का संपूर्ण जीवन सुख-दुख, साता असाता कर्मों के खेल में बीता। इस महान नारी ने दीक्षा ग्रहण की और धर्म की शरण लेकर नारी पर्याय को सफल बनाया।</p>
<p>-‘सती अंजना’ ने अपने कर्मोदय में आये फलों को भोगा और पश्चाताप किया।</p>
<p>-‘राजुल’ के चरित्र ने तो नारी जाति के त्याग की कथा रच दी, एक पल नहीं लगा और राग से वैराग्य पथ की ओर चल पड़ी।</p>
<p>-आर्यिका व्रत को धारण करने वाली ‘द्रौपदी’ क्षमा की प्रतिमूर्ति कहलायी।</p>
<p>&#8211; अपने पति को जिनधर्म में लगाने वाली ‘रानी चेलना’ आज नारी जाति में पति को सन्मार्ग पर लाने वाली अपना उदाहरण आप बन गयी।</p>
<p>-पति के दीक्षा लेने पर ‘सुलोचना’ ने भी आर्यिका पद धारण कर लिया।</p>
<p>&#8211; नगर के बंद दरवाजे को ‘षीलवती मनोरमा’ ने खोल जैन धर्म की जय जयकार करवाई।</p>
<p>-कर्मों से खेलने वाली संकल्प की धनी ‘अनंतमति’ ने दीक्षा लेकर नारी पर्याय को सफल बनाया।</p>
<p>&#8211; पति की सेवा एवं धर्म परायणता के माध्यम से अषुभ कर्म को शांत करती हुई ‘मैना संुदरी’ आज भी नारियों की पथगामिनी बनी है।</p>
<p>&#8211; ‘ब्राह्मी सुंदरी’ ने बता दिया कि कैसे त्याग और संयम की साधना से जीवन सफल बनाया जा सकता है।</p>
<p>-समाज की विडम्बनाओं और परिस्थितियों से टकराने वाली ‘चंदना’ युगनायक भगवान महावीर की मुख्य अर्यिका बनी।</p>
<p>-‘सति सोया’ ने ससुराल की प्रतिकूलता में भी देव शास्त्र गुरू के प्रति श्रद्धा रखकर अपने सभी संकटों को दूर किया।</p>
<p>&#8211; विपरीत परिस्थितियों में भी गजमोती चढ़ाने का नियम पालन करने वाली ‘मनोवती’ की धर्म प्रभावना अनुकरणीय है।</p>
<p>&#8211; अहिंसा की देवी ‘अनंगशरा’ ने जीव दया शांत भाव से मरण प्राप्त कर सद्गति पायी।</p>
<p>&#8211; ‘रानी विशल्या’ को मिली औषधीय शक्ति ने अनेक लोगों की पीड़ा दूर की।</p>
<p>-देव-शास्त्र गुरू के प्रति अटूट श्रद्धा रखने वाली ‘रेवती रानी’ अमूढ़ दृष्टि अंग में प्रसिद्ध हो गयी।</p>
<p>-‘सेठानी विजया’ का ब्रह्मचर्य व्रत पालन गृहस्थों के लिए अनुपम उदाहरण बन गया।</p>
<p>&#8211; इनके अलावा शिवा देवी, मृगावती, वनमाला, दमयन्ती, गुणसुन्दरी, रानी उर्विला, कैकयी, मंदेादर, मदन रेखा, नीली बाई, प्रभावती, जम्बू कुमार की नवविवाहिता पत्नियां आदि अनेकानेक नारियां जैन धर्म संस्कृति की रक्षा में सदैव तत्वर रहीं।</p>
<p><strong>यह भी पढ़े</strong></p>
<blockquote class="wp-embedded-content" data-secret="sF9sQOUe5u"><p><a href="https://www.shreephaljainnews.com/jainism_has_the_message_of_save_the_girl_child_educate_the_girl_child/">जैन धर्म में है ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ का संदेश</a></p></blockquote>
<p><iframe loading="lazy" class="wp-embedded-content" sandbox="allow-scripts" security="restricted"  title="&#8220;जैन धर्म में है ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ का संदेश&#8221; &#8212; श्रीफल जैन न्यूज़" src="https://www.shreephaljainnews.com/jainism_has_the_message_of_save_the_girl_child_educate_the_girl_child/embed/#?secret=iXKdevOCyK#?secret=sF9sQOUe5u" data-secret="sF9sQOUe5u" width="600" height="338" frameborder="0" marginwidth="0" marginheight="0" scrolling="no"></iframe></p>
<p><strong> </strong></p>
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		<title>महिला दिवस पर विशेष : जैन धर्म में है ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ का संदेश </title>
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		<pubDate>Tue, 07 Mar 2023 00:30:19 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[धर्म के सिद्धांतों, सद् गुणों, स्वभावों तथा स्वकर्तव्यों का पालन करने से जीवन सदा विकसित होगा। जैन धर्म में महिलाओं को शिक्षित, संस्कारित करने पर सबसे ज्यादा बल दिया गया है। पढ़िये अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज का विशेष आलेख&#8230;  जैन धर्म के सिद्धांतों को अंगीकार करने वाली महिलाएं आज के युग में दुराचार से [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>धर्म के सिद्धांतों, सद् गुणों, स्वभावों तथा स्वकर्तव्यों का पालन करने से जीवन सदा विकसित होगा। जैन धर्म में महिलाओं को शिक्षित, संस्कारित करने पर सबसे ज्यादा बल दिया गया है। <span style="color: #ff0000;">पढ़िये अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज का विशेष आलेख&#8230; </span></strong></p>
<hr />
<p>जैन धर्म के सिद्धांतों को अंगीकार करने वाली महिलाएं आज के युग में दुराचार से दूर रहकर चहुंमुखी प्रगति कर सकती हैं। धर्म के सिद्धांतों, सद्गुणों, स्वभावों तथा स्वकर्तव्यों का पालन करने से जीवन सदा विकसित होगा। जैन धर्म में महिलाओं को शिक्षित, संस्कारित करने पर सबसे ज्यादा बल दिया गया है।</p>
<p><strong>महिलाएं बनें शिक्षित</strong></p>
<p>आधुनिक युग प्रतिस्पर्धा का युग है। प्रत्येक नर-नारी अपने समुचित जीवन विकास के लिए भरसक प्रयत्न करते हैं। नारी भी कंधे-से-कंधे मिलाकर अपने जीवन-साथी की कामयाबी के लिए स्वयं नौकरी करती हैं। कई बार उन्हें अपना सफर अकेले भी तय करना होता है। इसलिए ऑफिस, बस अथवा सुनसान स्थानों पर महिलाओं के साथ हो रहे दुष्कर्मों से बचने के लिए उन्हें सचेत सावधान रहना चाहिए। उन्हें जैन धर्म की पगडंडी पर कदम रखते हुए मानवीय कुविचारों से सर्वदा दूर रहना चाहिए। प्रलोभन (लालच) के बहकावे में न आकर किसी पर पुरुष के प्रति आकृष्ट होने के कुविचारों पर संयमित होना चाहिए। जैन नारी को मानवीय मूल्यों को अपनाना चाहिए। महिलाओं को ज्यादा से ज्यादा शिक्षित होने का प्रयास करना चाहिए।</p>
<p><strong>मानवता, सहानुभूति और आंतरिक सौंदर्य </strong></p>
<p>बालिकाओं को अपने शीलव्रत का दृष्टव्य देने के लिए सती अंजना, सती सोमा, सती सीता जैसी महान नारियों की मूर्ति को अपने मन मंदिर में बनाए रखना चाहिए। अपना दृष्टिकोण हमेशा सुंदर, मधुर तथा उपादेय रखकर जीवन को सत्यं, शिवं और सुंदरम् की ओर ले जाना चाहिए। नारी में मानवता, सहानुभूति और आंतरिक सौंदर्य होना चाहिए जिसके बल पर अनैतिक आचरण को होने से रोक सकती है। जैन धर्म श्रद्धा, विवेक की पतवार से जीवन संवारकर निरंतर प्रगति के पथ पर अग्रसर होकर मानव जीवन कल्यापणमय बनती है। यर्थाथ यह है कि नदी जैसे दोनों तटों के मध्य में संतुलित होकर प्रवाहमान रहने से ही अनेक प्राणियों के लिए, जीवनदायी बन सकता है। वैसे ही मनुष्य की जीवन सरिता तादात्मय और ताटस्थ इन दोनों तटों के मध्य रहकर जीवन वीणा की शब्द लहरियों से झंकृत हो जाती है।</p>
<p><strong>जैन परिवारों में कन्या जन्म हर्ष का विषय </strong></p>
<p>कन्या जन्म पर दुख मनाने वाले परिवार अब जैनों में नहीं है। जैन परिवारों में तो कन्या जन्म पर हर्ष का विषय होता है। प्रत्येक नारी को अपना जीवन धर्म संस्कारों के साए में बिताना चाहिए जिससे स्वयं आत्मकल्याण के मार्ग पर चलकर दूसरों को भी राह दिखा सके। आज की बालिका, कल का भावी परिवार है अतः वे स्वयं धार्मिक सुरक्षित होकर अपने परिवार को दिशावान तथा संस्कारवान बनाकर संपूर्ण समाज, देश का नाम उन्नत करने में पूर्ण सफल होगी। भारत को नई ऊँचाइयों पर ले जाकर इसके गौरव को अक्षुण्णं रखेगी। इसके लिए उनका शिक्षित होना बहुत जरूरी है। वास्तव में जो महिलाएं सुशिक्षित हैं वे अपनी संतान को सुयोग्य साँचे में ढाल सकती हैं क्योंकि माताओं की गोद ही बच्चों के लिए प्रारंभिक पाठशाला है।</p>
<p>माताएं बच्चों को प्रारंभ से ही लाड़ प्यार के साथ धर्म की घूंटी पिला-पिलाकर सुसंस्कारों से हृष्ट-पुष्ट बना सकती हैं। जब बच्चे कुछ समझने और बोलने लग जायें तब उन्हें महामंत्र सिखाना, अच्छे-अच्छे धार्मिक भजनों की पंक्तियाँ रटाना, जैसे-तैसे वे 3-4 वर्ष के होते जायें उन्हें छोटी-छोटी शिक्षास्पद कथाएं सुनाना, धार्मिक पाठशालाओं में कुछ न कुछ धर्म शिक्षा दिलाते रहना ही बच्चों को सुसंस्कारित करना है। किशोरावस्था में उन्हें कुसंगति से बचाना, मंदिरों में जाने की प्रेरणा देते रहना, गुरुओं के पास ले जाना, तीर्थयात्राओं की वंदना कराते रहना उनके जीवन में सद्विचारों के बीजारोपण करना है। खासकर ग्रीष्मावकाश में बालक-बालिकाओं को गुरुओं के पास धर्म शिक्षा दिलाना, धार्मिक पढ़ाई में शिक्षण शिविरों में भाग दिलाना, छुट्टी के दिनों का बहुत बड़ा सदुपयोग है। युवकों को धर्मकथाओं के माध्यम से चारित्रवान बनाना चाहिए।</p>
<p><strong>आज भी है परंपरा कायम</strong></p>
<p>आज भी चन्दनबाला अनंतमती जैसी कन्याएं हैं। सीता, मैना, मनोरमा जैसी पतिव्रता हैं, चेलना जैसी कर्तव्यपरायण हैं और ब्राह्मी-सुन्दरी के पदचिन्हों पर चलने वाली आर्यिकाएं हैं। हमारी बहनों को उनसे शिक्षा लेनी चाहिए। प्रतिवर्ष एक माह नहीं तो कम से कम एक सप्ताह उनके सानिध्य में जाकर उनसे कुछ सीखना चाहिए और स्त्री समाज में बढ़ती हुई दहेज प्रथा, सहशिक्षा आदि कुरीतियों को दूर करने में अपने समय को, शक्ति को और धन को लगाना चाहिए, यही महिलाओं का कर्तव्य है।</p>
<p><strong>बेटी को संस्कारों को पोटली देना जरूरी</strong></p>
<p>यदि कन्या शिक्षित है तो वह जिस घर में ब्याह कर जाती है उस घर को स्वर्ग बना देती है और अपने व्यवहार से दोनों कुलों की अर्थात् पीहर तथा ससुराल दोनों का नाम रोशन करती हैं। जब तक वह पिता के घर में है अपनी मां अथवा दादी के द्वारा दी गई संस्कारों की छुट्टी से बड़ो को आदर देने वाली एवं छोटों को प्यार देने वाली होती है। शिक्षित कन्या ही ससुराल में जाकर अपने सास-ससुर का आदर कर सकती है अपने पति की सहचरी बनकर उसके हर कदम पर उसका साथ देती है। अपने ससुराल वालों को साथ और पति को हिम्मत बांधने वाली होती है। आवश्यकता पढ़ने पर साहस का परिचय देकर परिवार का गौरव बढ़ाती है और इस तरह वह दोनों कुल की लाज निभाती है। बदलती हुई परिस्थितियों में, भौतिकतावादी संस्कृति के प्रति आकर्षण बढा है जिससे धर्म के स्थान पर धन का महत्व बढ़ा है इतना ही नहीं स्वतंत्रता के मायने बदले हैं तथा उच्छृंखलता के दृश्य समाज को शर्मिदा कर रहे हैं।</p>
<p>पाश्चात्य सभ्यता के बढ़ते प्रभाव ने नारी सुलभ शालीनता को कठघरे में खड़ा कर दिया है। अनैतिकता के परिदृष्यों से समाज का विकृत स्वरूप सामने आ रहा है कहने का तात्पर्य यह कि जिस मर्यादित, सुसंस्कृत समाज की हमारे पूर्वजों ने कल्पना करके रीति नीति निर्धारण कर सामाजिक मानदण्ड स्थापित किये थे आज उन मानदण्डों की उपेक्षा ही नहीं बल्कि उन्हें रूढ़िवादिता कहकर नकारा जाने लगा है। परिवारों में बहू-बेटियों के बढ़ते अहंकार के चलते पारिवारिक प्रतिमान टूटते जा रहे हैं, स्वार्थ परता की भावना युवा पीढ़ी के हृदय में स्थान बनाने लगी है इस कारण उनकी नजरों में परिवार का महत्व घटने लगा है। बुजुर्गों की स्थिति दयनीय हो रही है। हमारा दायित्व है कि हम इस युवा पीढ़ी को उच्च शिक्षा के साथ मर्यादा और संस्कार का पाठ पढ़ायें परिवार, धर्म तथा जाति का महत्व समझायें, आज की बेटी कल का भविष्य है और यदि हमें अपना भविष्य सुरक्षित करना है तो अपनी बेटियों को दहेज के रूप में संस्कारों की पोटली थमाना होगी। तभी निम्न पंक्तियां सार्थक हो सकेगी।</p>
<p><strong>जैन धर्म में लड़का और लड़की में कोई भेद नहीं</strong></p>
<p>जैन धर्म में लड़का और लड़की में कोई भेद नहीं है। संसार की सृष्टि में स्त्री और पुरुष दो अंग हैं, जैसे-कुम्भकार के बिना चाक से बर्तन नहीं बन सकते अथवा कृषक के बिना पृथ्वी से धान्य की फसल नहीं हो सकती उसी प्रकार स्त्री पुरुष दोनों के संयोग के बिना सृष्टि की परंपरा नहीं चल सकती। आज जब घर में कन्या का जन्म होता है तब घर वाले ही क्या अड़ोस-पड़ोस के लोग भी यही सोचने लगते हैं कि यह क्या बला आ गई ? उसका मूल कारण है दहेज, इस दहेज प्रथा ने कितने अनर्थों को जन्म दिया है, सब प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर हो रहा है। एक समय था जब कन्या को सबसे श्रेष्ठरत्न और उनके माता-पिता को सबसे श्रेष्ठ रत्नाकर माना जाता था। वास्तव में जहां एक कन्या के स्वयंवर के समय करोड़ों राजा महाराजा आकर उपस्थित होते थे और सबके मन में यही आशा रहती थी कि यह कन्या मेरे गले में वरमाला डाले। इस विषय में सुलोचना, सीता, द्रौपदी आदि के प्रत्यक्ष उदाहरण आबाल-गोपाल प्रसिद्ध ही हैं लेकिन आज सर्वथा उसके विपरीत स्थिति देखने को मिलती है। कन्याओं के जन्म को हीन दृष्टि से देखने का मूल कारण जो दहेज है, उसका कैसे निर्मूलन किया जाए ? इस पर महिलाओं को सक्रिय कदम उठाना चाहिए। महिलाएँ ही महापुरुषों की जननी हैं, तीर्थंकर जैसे नर रत्नों को भी जन्म देने का सौभाग्य महिलाओं ने ही प्राप्त किया है। यही कारण है कि महामुनियों ने भी उनकी प्रशंसा में बहुत कुछ कहा है।</p>
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<blockquote class="wp-embedded-content" data-secret="oKktQFgps6"><p><a href="https://www.shreephaljainnews.com/woman-became-the-first-target-of-upculture/">अपसंस्कृति का पहला निशाना बनी महिला</a></p></blockquote>
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