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	<title>अंतरराष्ट्रीय वेबिनार &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
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	<title>अंतरराष्ट्रीय वेबिनार &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>जहां अनेकांत है वहीं जैन धर्म है : वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदी गुरुदेव ने वेबिनार में किया जिज्ञासाओं का समाधान </title>
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		<pubDate>Sat, 27 Jun 2026 15:50:40 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[सागवाड़ा से आयोजित अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदी गुरुदेव ने अनेकांतवाद, विनय, आत्मज्ञान और जैन दर्शन के गूढ़ सिद्धांतों पर विस्तार से प्रकाश डाला तथा श्रोताओं की जिज्ञासाओं का समाधान किया। पढ़िए श्रीफल साथी अजीत कोठिया की यह रिपोर्ट। सागवाड़ा। पुनर्वास कॉलोनी सागवाड़ा से आयोजित अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदी गुरुदेव [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>सागवाड़ा से आयोजित अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदी गुरुदेव ने अनेकांतवाद, विनय, आत्मज्ञान और जैन दर्शन के गूढ़ सिद्धांतों पर विस्तार से प्रकाश डाला तथा श्रोताओं की जिज्ञासाओं का समाधान किया। <span style="color: #ff0000">पढ़िए श्रीफल साथी अजीत कोठिया की यह रिपोर्ट।</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>सागवाड़ा।</strong> पुनर्वास कॉलोनी सागवाड़ा से आयोजित अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदी गुरुदेव ने जैन दर्शन के अनेकांत सिद्धांत, आत्मज्ञान, विनय तथा मोक्ष मार्ग पर विस्तृत प्रवचन दिए। कार्यक्रम में ब्यावर से पधारे जज कमलजी नाहर की जिज्ञासाओं का समाधान भी किया गया।</p>
<p><strong>अनेकांत ही जैन धर्म की आत्मा</strong></p>
<p>गुरुदेव ने कहा कि किसी भी वस्तु का केवल एक पक्ष स्वीकार करना धर्म के विरुद्ध है। जहां अनेकांत है, वहीं जैन धर्म है। उन्होंने बताया कि प्रत्येक द्रव्य अनेकांतात्मक है तथा उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य—तीनों का समन्वय ही सत्य है। केवल एक पक्ष को स्वीकार करना मिथ्यात्व है। उन्होंने कहा कि एकांतवाद अहंकार और हठ का प्रतीक है, जबकि अनेकांत आत्मस्वभाव की ओर ले जाकर मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।</p>
<p><strong>विनय से मिलता है आत्मज्ञान</strong></p>
<p>विनयसूत्र के संदर्भ में गुरुदेव ने बताया कि विनम्र शिष्य गुरु का प्रिय बनता है और गुरु प्रसन्न होकर उसे आगम ज्ञान प्रदान करते हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे गाय अपने बछड़े से प्रसन्न होकर अधिक दूध देती है, उसी प्रकार योग्य एवं विनयी शिष्य को गुरु भरपूर ज्ञान प्रदान करते हैं।</p>
<p><strong>स्वाध्याय और विनय का महत्व</strong></p>
<p>मूलाचार ग्रंथ के आधार पर गुरुदेव ने कहा कि विनयपूर्वक किया गया स्वाध्याय आत्महित का मार्ग प्रशस्त करता है। आत्मज्ञान से संवर होता है तथा अनंत कर्मों की निर्जरा होती है। उन्होंने कहा कि इच्छाओं पर नियंत्रण ही वास्तविक तप है तथा नवीन वैराग्य और आत्मजागरण का आधार विनय और स्वाध्याय हैं।</p>
<p><strong>ज्ञान और सूचना में अंतर समझाया</strong></p>
<p>गुरुदेव ने कहा कि केवल धार्मिक ग्रंथों को याद कर लेना ज्ञान नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सूचना (डेटा) और ज्ञान में अंतर है। हित-अहित का विवेक ही वास्तविक ज्ञान है। आत्मज्ञान के बिना समस्त जानकारी केवल संसार को बढ़ाने का माध्यम बनती है।</p>
<p><strong>कविता से हुआ मंगलाचरण</strong></p>
<p>वेबिनार का मंगलाचरण मुनि श्री सुविज्ञसागरजी ने आचार्य श्री द्वारा रचित कविता— &#8220;दुनिया के अंधेरे में ज्योति बनो प्यारे, सत्य बनो, साम्य बनो, शांत बनो प्यारे, स्व-पर विश्व को ज्योतिर्मय करो प्यारे&#8221; — के साथ किया। कार्यक्रम की जानकारी विजयलक्ष्मी गोदावत, सागवाड़ा ने दी।</p>
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		<title>जहां अनेकांत है वहीं जैन धर्म है : वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदी गुरुदेव ने वेबिनार में किया जिज्ञासाओं का समाधान </title>
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		<pubDate>Sat, 27 Jun 2026 15:49:19 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[सागवाड़ा से आयोजित अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदी गुरुदेव ने अनेकांतवाद, विनय, आत्मज्ञान और जैन दर्शन के गूढ़ सिद्धांतों पर विस्तार से प्रकाश डाला तथा श्रोताओं की जिज्ञासाओं का समाधान किया। पढ़िए श्रीफल साथी अजीत कोठिया की यह रिपोर्ट। सागवाड़ा। पुनर्वास कॉलोनी सागवाड़ा से आयोजित अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदी गुरुदेव [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>सागवाड़ा से आयोजित अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदी गुरुदेव ने अनेकांतवाद, विनय, आत्मज्ञान और जैन दर्शन के गूढ़ सिद्धांतों पर विस्तार से प्रकाश डाला तथा श्रोताओं की जिज्ञासाओं का समाधान किया। <span style="color: #ff0000">पढ़िए श्रीफल साथी अजीत कोठिया की यह रिपोर्ट।</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>सागवाड़ा।</strong> पुनर्वास कॉलोनी सागवाड़ा से आयोजित अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदी गुरुदेव ने जैन दर्शन के अनेकांत सिद्धांत, आत्मज्ञान, विनय तथा मोक्ष मार्ग पर विस्तृत प्रवचन दिए। कार्यक्रम में ब्यावर से पधारे जज कमलजी नाहर की जिज्ञासाओं का समाधान भी किया गया।</p>
<p><strong>अनेकांत ही जैन धर्म की आत्मा</strong></p>
<p>गुरुदेव ने कहा कि किसी भी वस्तु का केवल एक पक्ष स्वीकार करना धर्म के विरुद्ध है। जहां अनेकांत है, वहीं जैन धर्म है। उन्होंने बताया कि प्रत्येक द्रव्य अनेकांतात्मक है तथा उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य—तीनों का समन्वय ही सत्य है। केवल एक पक्ष को स्वीकार करना मिथ्यात्व है। उन्होंने कहा कि एकांतवाद अहंकार और हठ का प्रतीक है, जबकि अनेकांत आत्मस्वभाव की ओर ले जाकर मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।</p>
<p><strong>विनय से मिलता है आत्मज्ञान</strong></p>
<p>विनयसूत्र के संदर्भ में गुरुदेव ने बताया कि विनम्र शिष्य गुरु का प्रिय बनता है और गुरु प्रसन्न होकर उसे आगम ज्ञान प्रदान करते हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे गाय अपने बछड़े से प्रसन्न होकर अधिक दूध देती है, उसी प्रकार योग्य एवं विनयी शिष्य को गुरु भरपूर ज्ञान प्रदान करते हैं।</p>
<p><strong>स्वाध्याय और विनय का महत्व</strong></p>
<p>मूलाचार ग्रंथ के आधार पर गुरुदेव ने कहा कि विनयपूर्वक किया गया स्वाध्याय आत्महित का मार्ग प्रशस्त करता है। आत्मज्ञान से संवर होता है तथा अनंत कर्मों की निर्जरा होती है। उन्होंने कहा कि इच्छाओं पर नियंत्रण ही वास्तविक तप है तथा नवीन वैराग्य और आत्मजागरण का आधार विनय और स्वाध्याय हैं।</p>
<p><strong>ज्ञान और सूचना में अंतर समझाया</strong></p>
<p>गुरुदेव ने कहा कि केवल धार्मिक ग्रंथों को याद कर लेना ज्ञान नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सूचना (डेटा) और ज्ञान में अंतर है। हित-अहित का विवेक ही वास्तविक ज्ञान है। आत्मज्ञान के बिना समस्त जानकारी केवल संसार को बढ़ाने का माध्यम बनती है।</p>
<p><strong>कविता से हुआ मंगलाचरण</strong></p>
<p>वेबिनार का मंगलाचरण मुनि श्री सुविज्ञसागरजी ने आचार्य श्री द्वारा रचित कविता— &#8220;दुनिया के अंधेरे में ज्योति बनो प्यारे, सत्य बनो, साम्य बनो, शांत बनो प्यारे, स्व-पर विश्व को ज्योतिर्मय करो प्यारे&#8221; — के साथ किया। कार्यक्रम की जानकारी विजयलक्ष्मी गोदावत, सागवाड़ा ने दी।</p>
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		<title>साधु में ही नव देवता समाहित हैं : धर्माचार्य कनक नंदी ने विनय को बताया भक्ति का भाग </title>
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		<pubDate>Sat, 13 Jun 2026 06:28:47 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदीजी गुरुदेव ने शिवगौरी सेवाश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में बताया कि पूजा आराधना विनय का छोटा रूप है। साधु में ही नव देवता समाहित है। पढ़िए, अजीत कोठिया डडूका की रिपोर्ट&#8230; बांसवाड़ा। वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदीजी गुरुदेव ने शिवगौरी सेवाश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में बताया कि पूजा आराधना विनय का छोटा रूप [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदीजी गुरुदेव ने शिवगौरी सेवाश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में बताया कि पूजा आराधना विनय का छोटा रूप है। साधु में ही नव देवता समाहित है। <span style="color: #ff0000">पढ़िए, अजीत कोठिया डडूका की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p>बांसवाड़ा। वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदीजी गुरुदेव ने शिवगौरी सेवाश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में बताया कि पूजा आराधना विनय का छोटा रूप है। साधु में ही नव देवता समाहित है। लाघव का अर्थ हल्कापन। जब लघुता आती है तो मस्तिष्क के अनेक न्यूरोन सक्रिय हो जाते हैं। विनय के अंतर्गत भक्ति है विनय का बहुत छोटा भाग भक्ति है। जिनकल्पी साधु 6 महीने के उपवास करके जंगल में रहते हैं। वह भगवान के दर्शन अभिषेक आदि नहीं देखते हैं उनके लिए दर्शन अभिषेक आवश्यक नहीं है। बाहुबली भगवान दीक्षा लेकर 12:महीने के ध्यान मैं बैठते हैं वह कहां दर्शन अभिषेक देखते हैं।</p>
<p><strong> गुरु के प्रति भक्ति होने से गुरु सेवा भी होती है</strong></p>
<p>धर्म करते हुए सुख शांति नहीं मिल रही है तो वह धर्म ही नहीं है। मार्दव, लाघव, आल्हाद यह गुण विनय करने वाले में प्रगट होते हैं। भगवती आराधना ग्रंथ से आचार्य ऋषि ने बताया कि विनय से किर्ती होती है। सभी के साथ मित्रता होती है। विनय से गर्व का मर्दन होता है। गुरुजनो से बहुमान, आदर प्राप्त होता है तीर्थंकर की आज्ञा का पालन होता है।</p>
<p><strong>दूसरों के दोषों को ढंककर गुणों को बढ़ाना चाहिए</strong></p>
<p>साधु को भगवान का अभिषेक दर्शन करना आवश्यक नहीं है। सज्जन व्यक्तियों के सुसंगठित समूह को समाज कहते हैं। धर्म आत्मा का स्वभाव है। वर्तमान में लोग नैतिक भी नहीं सामाजिक भी नहीं। हर धर्म का पहला नियम नैतिकता है। जो हमारे लिए अच्छा नहीं है वह अन्य के लिए कैसे अच्छा हो सकता है। दूसरों के दोषों को ढंककर गुणों को बढ़ाना चाहिए। आरंभ परिग्रह करने वाले ख्याति पूजा लाभ चाहने वाले पंच परमेष्ठी में नहीं आते।</p>
<p><strong>लोकातिंक देव तप कल्याणक में ही आते हैं</strong></p>
<p>श्रावक धर्म को छोड़कर साधु धर्म पालन के लिए साधु बनते हैं। आठवीं प्रतिमा आरंभत्याग वाला भी आरंभ के कार्य नहीं कर सकता है नवमी प्रतिमा परिग्रहत्याग वाला परिग्रह नहीं रख सकता तो मंदिर मूर्ति निर्माण कैसे करेगा दसवीं अनुमति त्याग प्रतिमा वाला किसी भी कार्य की अनुमति नहीं दे सकता है 11वीं प्रतिमा उद्दिष्ट त्याग प्रतिमा है। मुनि की तीर्थ है। नव देवता में केवल मूर्ति का ही अभिषेक होता है। स्वर्ग के देव जन्म के अंतर मुहूर्त में ही सतत पूजा करते रहते हैं। लोकातिंक देव तप कल्याणक में ही आते हैं। अन्य कल्याणक में नहीं। सर्वार्थ सिद्धि के देव तो किसी भी कल्याण में नहीं आते हैं। श्रेष्ठ साधु ही अहि इंद्र बनते हैं।</p>
<p><strong>श्रावक का परम धर्म साधु को आहार बनाकर देना है</strong></p>
<p>गृहस्थ के आवश्यक देव पूजा,आचार्य उपाध्याय साधु की सेवा,स्वाध्याय, संयम, तप, दान है। श्रावक का परम धर्म साधु को आहार बनाकर देना है परंतु साधु का धर्म आहार बनाना नहीं केवल आहार ले सकते हैं। श्रावक भी देव वंदना करके, सूर्योदय के बाद आहार बनाते हैं। श्रावक के भोजन बनाने का कार्य पूर्ण हो जाता है धुआ आदि नहीं आता है। रोगी तथा बच्चे भोजन करके खेलते हैं। उसके बाद साधु आहार चर्या के लिए उठते हैं यह मूलाचार में लिखा है।</p>
<p><strong>पहले मुनि धर्म का उपदेश दो मुनि धर्म पालन करो</strong></p>
<p>श्रावक स्वाध्याय नहीं के बराबर करते हैं परंतु साधु का प्रथम कर्तव्य स्वाध्याय करना है। साधु को सभी कार्य छोड़कर ज्ञानार्जन करना चाहिए। ध्यान अध्ययन साधु का प्रमुख कर्तव्य है।जहां भी हो पूजा पाठ अभिषेक संबंधी विषमताए कूट-कूट कर भरी हुई है। आचार्य श्री कहते हैं पहले मुनि धर्म का उपदेश दो मुनि धर्म पालन करो श्रावक यदि मुनि धर्म पालन नहीं कर सके तो फिर उसे श्रावक धर्म का उपदेश दो।</p>
<p><strong>आत्मा ही मेरा सब कुछ है</strong></p>
<p>गृहस्थ भगवान का अवलंबन लेकर पूजा पाठ अभिषेक आदि करता है क्योंकि वह सारा दिन पाप कार्य ही करता है। साधु को इसकी आवश्यकता नहीं वह स्वयं पंच परमेष्ठी है। गृहस्थ के लिए तीर्थ यात्रा दान पूजा आदि है। भरत चक्रवर्ती ने कैलाश पर्वत पर सोने के मंदिर बनाये परंतु साधु बनने के बाद मंदिरों का भी त्याग कर दिया उसकी भी देखरेख की जिम्मेदारी का त्याग कर दिया।</p>
<p>साधु परमहंस है उन्हें किसी यज्ञ विधान पूजा की आवश्यकता नहीं। चतुर्थ काल में भी साधु को सही नहीं समझा गया उन्हें मारा गया पीटा गया। आत्मा ही मेरा सब कुछ है तीर्थ यात्रा पूजा मैं ही हूं ऐसा साधु चिंतन करता है। सातवीं प्रतिमा धारी अपने पुत्र पुत्री की शादी भी नहीं करवा सकता है।</p>
<p><strong>भावों की पवित्रता का खेल है</strong></p>
<p>श्रावक गृहस्थ के कार्य में रात दिन लीन रहता है श्रावक के ध्यान को केंद्रित करने के लिए पूजा अभिषेक विधान आवश्यक है। गृहस्थ धर्म पालन करने के बाद उसे छोड़कर मुनि धर्म पालन करते हैं। आत्मा में लीन होने पर मोक्ष प्राप्त होता है। गृहस्थ धर्म तथा मुनि धर्म दोनों मोक्ष प्राप्ति में सहकारी है माध्यम है। परमात्मा प्रकाश से आचार्य श्री ने बताया कि श्रावक धर्म परंपरा से मोक्ष मार्ग है। ना दिगंबर ना सितंबर ना जटा धारण करने वाले, ना कैशलौच करने वाले, केवल आत्मा में लीन होने वाले को ही मोक्ष प्राप्त होता है। चामुंडराय राजा ने बाहुबली भगवान की विशाल मूर्ति बनाई। बड़ा घड़ा दूध लेकर अभिषेक किया परंतु उसका अभिषेक भगवान पर नहीं हुआ। एक गरीब बुढ़िया के छोटे से कलश भरकर दूध से भगवान का अभिषेक हो गया। भावों की पवित्रता का खेल है।</p>
<p><strong>सुलझे पशु, प्रभु उपदेश सुन,</strong></p>
<p>आचार्य श्री ने अपने ग्रंथ में लिखा है। सुलझे पशु, प्रभु उपदेश सुन, क्यों न सुलझे कुमार। स्वर्ग के सामान्य देव अपने विमान के देवों को कुल देवता मानकर दर्शन पूजा करते हैं परंतु मिथ्या दृष्टि ही रहते हैं। यह जानकारी विजयलक्ष्मी गोदावत सागवाड़ा ने दी।</p>
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		<title>शिष्य का प्रथम महत्वपूर्ण गुण जो श्रवण करे : वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदी जी ने बताए योग्य शिष्य के महत्वपूर्ण गुण </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/the_first_important_quality_of_a_disciple_is_listening/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Shree Phal News]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 08 Jun 2026 16:23:41 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदीजी ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार को संबोधित किया। इसमें उन्होंने में योग्य शिष्य के गुणों का बखान किया। पढ़िए, बांसवाड़ा से अजीत कोठिया की रिपोर्ट&#8230; बांसवाड़ा। वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदीजी ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार को संबोधित किया। इसमें उन्होंने में योग्य शिष्य [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदीजी ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार को संबोधित किया। इसमें उन्होंने में योग्य शिष्य के गुणों का बखान किया। <span style="color: #ff0000">पढ़िए, बांसवाड़ा से अजीत कोठिया की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>बांसवाड़ा।</strong> वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदीजी ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार को संबोधित किया। इसमें उन्होंने में योग्य शिष्य के गुणों का बखान किया। उन्होंने कहा कि एक योग्य शिष्य में क्या-क्या गुण होने चाहिए। उन्होंने कहा कि जो सदा से गुरुकुल में रहता है। गुरु आज्ञा का नित्य पालन करता है। समता में रहता है उपधान पूर्वक अर्थात नियम पूर्वक शास्त्र अध्ययन करता है, वह प्रिय भाषी होता है और शिक्षा को श्रवण करके ग्रहण करता है। शिष्य का पहला गुण सुश्रुषा अर्थात श्रवण करने वाला होना चाहिए। परम उपलब्धि की भावना से शिष्यत्व ग्रहण करने वाला सर्वश्रेष्ठ है। श्रोता सुख का अभिलाषी होना चाहिए क्योंकि, जो सुख चाहेगा वही शास्त्र श्रवण करेगा। श्रोता 8 गुणों से युक्त होता है। उसके पास सुव्यवस्थित ज्ञान होना चाहिए। अनेक भाषाओं के ज्ञान रखने वाले की स्मरण शक्ति अधिक होती है। उन्होंने कहा कि गुरुदेव जो बोलते हैंज़ उसे भावना पूर्वक एकाग्रचित होकर सुनना चाहिए। भगवान ने हमें पांच इंद्रियां दी हैं। स्पर्शन, रसना, घ्राण, चक्षु, कर्ण। इनमें कर्ण इंद्री सबसे श्रेष्ठ है। जो सुन नहीं पाते हैंज़ वह बोल भी नहीं पाते हैं। प्राचीन काल में अनेक अंधे भी श्रेष्ठ कवि हुए हैं। जो अधिक सुनता है वह श्रेष्ठ वक्ता होता है। जो हितोपदेश नहीं सुनता है वह श्रेष्ठ वक्ता नहीं बन सकता।</p>
<p><strong> एकाग्रता बिना विषय को नहीं समझ सकते</strong></p>
<p>आचार्य श्री ने कहा कि योग्य शिष्य का दूसरा गुण प्रति प्रच्छना अर्थात पूछना जिज्ञासा करना परम तप है। तत्व जिज्ञासा करनी चाहिए परंतु, तत्व जिज्ञासा करने में अहंकार बाधक होता है। एकाग्रचित होकर सुनना यह श्रोता का तीसरा गुण है। आचार्य श्री हमेशा स्वाध्याय कराते हुए कहते हैं कि मुझे ही देखो मुझे ही सुनो मेरे सामने ही देखो। एकाग्रता बिना विषय को नहीं समझ सकते। शिष्य का चौथा गुण ग्रहण करना है। एक कान से सुनना दूसरे कान से निकाल देना। यह श्रेष्ठ श्रोता का लक्षण नहीं है। अयोग्य शिष्य कहता है मैं घर्म जानूंगा पर धर्म नहीं करूंगा। मैं अधर्म जानता हूं परंतु, अधर्म नहीं छोडूंगा।</p>
<p><strong>शब्द ज्ञान बिना भाषा ज्ञान नहीं होगा</strong></p>
<p>जो सुनता है, वह आचरण में लाने वाला श्रेष्ठ श्रोता है। बुरा ना सोचना यह सबसे श्रेष्ठ है। गांधी जी के तीन बंदर बुरा ना देखो, बुरा ना सुनो, बुरा ना बोलो इतना ही पूर्ण नहीं है उसके साथ-साथ बुरा ना सोचो जोड़ना चाहिए यह श्रेष्ठ विचार है। अच्छा भोजन करें परंतु पचे नहीं तो जहर बन जाता है। तत्व जिज्ञासु बने बिना सही विद्यार्थी नहीं बन सकते। उपाहोऊ अर्थात सोचना चाहिए विज्ञान में परिकल्पना को अधिक महत्व दिया गया है। परिकल्पना से बुद्धिमता अधिक बढ़ती है। लोक में प्रचलित मान्यता को सही मानना रूढ़िवादिता है, अंधविश्वास है। धारण करना स्मरण ज्ञान बिना जोड़ रूप ज्ञान नहीं होगा। शब्द ज्ञान बिना भाषा ज्ञान नहीं होगा। गुरु से प्राप्त ज्ञान को जीवन में उतारना चाहिए प्रयोग में लाना चाहिए। सुख-सुविधाओं से विद्यार्थी अधिक निकम्मे बन जाते हैं।</p>
<p>जो स्वर्ग मोक्ष ले जाए वह मोक्ष विनय है। विनय मोक्ष का द्वार है।</p>
<p><strong>जो विनयवंत है वही शिष्य हैं</strong></p>
<p>विनय से ही अनुशासन होता है। विनय ही अनुशासन है। अतः शिष्य को विनय से युक्त होना चाहिए। शिक्षा का फल विनय है। विनय का फल सर्व जीवो का कल्याण है। विनयवंत को ही गुरु अनुशासित करते हैं। स्वयं अनुशासित रहने वाला ही अपने शिष्यों को भक्तों को अनुशासित कर सकता है। विनय से संयम,विनय से तप, विनय से दान आदि होता है। विनयवंत पर ही अनुग्रह किया जाता है। विनयवान शिष्य पर ही गुरु अनुग्रह निग्रह करते हैं सभी पर नहीं। साधु पत्नी के पति नहीं त्रिलोक्य पति होते हैं। अविनीत शिष्य बनना संभव नहीं है, जिसको अनुशासित करके पढ़ा करके आगे बढ़ाया जा सके वह शिष्य है जो विनयवंत है वही शिष्य हैं।</p>
<p>मुनि श्री सुविज्ञ सागर जी गुरुदेव ने आचार्य श्री द्वारा रचित कविता &#8216;छोटी तुच्छ घास हूं सबसे मैं नीचे हूं पैर के नीचे सबसे तुच्छ हूं। सर्दी गर्मी वर्षा सब सहन करु हूं।&#8217;</p>
<p>द्वारा मंगलाचरण किया। इस अवसर पर मुनि श्री अध्यात्मनंदी सौम्यनदी, सुवत्सलमति माताजी, क्षु भक्ति श्री, ब्रह्मचारी वर्ण भैया, शैलेंद्र भट्ट, सारिका भट्ट, विदुषी उर्वशी, प्रतिभा, प्रेमलता,ममता, राजकुमारी, चंद्रलेखा, चंद्रकांत, श्रीपाल, धनपाल आदि भीलुड़ा कोटा पुनर्वास कॉलोनी खोड्न आदि से अनेक श्रावक उपस्थित थे। यह जानकारी विजयलक्ष्मी गोदावत सागवाड़ा ने दी।</p>
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		<title>आचार्य श्री बोले बिना योग्य शिष्य बने योग्य गुरु नहीं बन सकते: धर्माचार्य कनकनंदी जी ने शिष्य के कर्तव्य बताए </title>
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		<pubDate>Wed, 03 Jun 2026 04:58:24 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में आचार्य श्री कनक नंदीजी ने समाज को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि विवेकवान व शांतचित्त होकर प्रत्येक धार्मिक क्रियाएं करनी चाहिए। बांसवाड़ा से पढ़िए, अजीत कोठिया की रिपोर्ट&#8230;  बांसवाड़ा। भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में आचार्य श्री कनक नंदीजी ने समाज को संबोधित [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में आचार्य श्री कनक नंदीजी ने समाज को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि विवेकवान व शांतचित्त होकर प्रत्येक धार्मिक क्रियाएं करनी चाहिए। <span style="color: #ff0000">बांसवाड़ा से पढ़िए, अजीत कोठिया की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong> बांसवाड़ा।</strong> भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में आचार्य श्री कनक नंदीजी ने समाज को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि विवेकवान व शांतचित्त होकर प्रत्येक धार्मिक क्रियाएं करनी चाहिए। बिना विद्यार्थी बने गुरु नहीं बन सकते। पहले योग्य शिष्य बनना पड़ेगा। उसके बाद योग्य गुरु बन सकते हैं। एक ही जमीन में विभिन्न बीज बोने पर बीज के अनुसार वृक्ष बनेंगे। वैसे ही स्वयं के गुण के अनुसार ही व्यक्तित्व का निर्माण होगा। आत्मा ही स्वयं को जन्म से लेकर निर्वाण तक ले जाता है। शिष्यत्व गुण प्रगट नहीं होगा तब तक सम्यक दृष्टि नहीं बन सकते हैं। हमारे अंदर भी शिष्यत्व गुण प्रकट नहीं हुआ था। अतः हम आत्म ज्ञान प्राप्त करने की जिज्ञासा नहीं कर पाए। शिष्यत्व स्वयं में ही आता है। स्वयं बीज ही पौधा बनता है। मिट्टी नहीं वैसे ही स्वयं ही भाव के अनुसार ही शिष्य बन सकता है। आध्यात्मिक दृष्टि से आत्मा को जानो। आत्मा की आराधना करो। आध्यात्मिक दृष्टि से स्वयं की आत्मा को महत्व दिया गया है।</p>
<p><strong>एक अक्षर मैं का ज्ञान ही संपूर्ण ज्ञान है</strong></p>
<p>साधु चक्रवर्ती का भी शासन नहीं पालते। धर्म स्व केंद्रित है। स्वयं का गुरु स्वयं है। प्रेम सौहाद्र आदि गुण स्वयं की आत्मा में ही है। गुरुत्व शिष्यत्व गुण तुम्हारे अंदर ही है, तुम स्वयं हो। एक अक्षर मैं का ज्ञान ही संपूर्ण ज्ञान है। अभव्य में आत्म गुण, शिष्यत्व गुण प्रकट नहीं हुआ है। अनादिकालीन अग्रहित मिथ्यात्व के कारण मैं शब्द का ज्ञान आत्मा का ज्ञान यह जीव नहीं कर सकता। स्वयं शिष्य नहीं बने तब तक जीव स्वयं को नहीं जान सकता। सब्जी का टेस्ट चम्मच को नहीं आता। वैसे ही मिथ्या दृष्टि को आत्मा का सुख अनुभव में नहीं आता। जो स्वार्थी होता है वह आध्यात्मिक नहीं हो सकता। मुनि श्री सुविज्ञ सागरजी ने आचार्य श्री द्वारा रचित कविता &#8216;आत्मा ही स्वयं को ले जाता है जन्म से लेकर निर्वाण तक&#8217; द्वारा मंगलाचरण किया। यह जानकारी विजयलक्ष्मी गोदावत सागवाड़ा ने दी।</p>
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		<title>जैन शासन और साधु चर्या, जिनकल्पी बनाम स्थविरकल्पी : भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से आयोजित अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में धर्माचार्य कनक नंदीजी ने दिया संबोधन </title>
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		<pubDate>Tue, 02 Jun 2026 08:40:18 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से आयोजित अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदीजी गुरुदेव ने जैन दर्शन के गूढ़ रहस्यों को उजागर करते हुए बताया कि जिनकल्पी साधु चतुर्थ काल में होते थे, जो गुफाओं में रहते थे। बांसवाड़ा से पढ़िए, अजित कोठिया की यह रिपोर्ट&#8230; बांसवाड़ा। भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से आयोजित [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से आयोजित अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदीजी गुरुदेव ने जैन दर्शन के गूढ़ रहस्यों को उजागर करते हुए बताया कि जिनकल्पी साधु चतुर्थ काल में होते थे, जो गुफाओं में रहते थे। <span style="color: #ff0000">बांसवाड़ा से पढ़िए, अजित कोठिया की यह रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>बांसवाड़ा।</strong> भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से आयोजित अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदीजी गुरुदेव ने जैन दर्शन के गूढ़ रहस्यों को उजागर करते हुए बताया कि जिनकल्पी साधु चतुर्थ काल में होते थे, जो गुफाओं में रहते थे। वे अंतरंग और बहिरंग समस्त परिग्रहों से रहित परम वीतरागी होते थे। ये साधु समस्त इच्छाओं से रहित होकर मैत्री, प्रमोद, कारुण्य और माध्यस्थ जैसी चार पवित्र भावनाओं से युक्त होते थे। गुरुदेव ने स्पष्ट किया कि इच्छाओं का निरोध करना ही वास्तविक तप है, जबकि सांसारिक वस्तुओं की कामना करना इच्छा या तृष्णा है। उन्होंने प्रेरणा दी कि इंसान की भावना हमेशा पावन होनी चाहिए और मन में केवल धार्मिक व अच्छे कार्यों को करने की भावना होनी चाहिए, न कि भौतिक तृष्णा या कामना। वर्तमान स्थितियों पर चिंता व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि आज के समय में साधु की समाधि होने पर भी धन की इच्छा के कारण श्रावकों का कई-कई घंटों तक इंतजार किया जाता है, जो कि उचित नहीं है।</p>
<p><strong>सूर्य घड़ी के अनुसार साधु आहारचर्या के लिए उठते हैं</strong></p>
<p>आगे अंतर स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि वर्तमान पंचम काल के स्थविरकल्पी साधु बाह्य तप और त्याग जिनकल्पी साधु की तरह नहीं करते हैं, परंतु उनका अंतरंग तप ठीक उन्हीं की तरह होता है और वे पांच महाव्रतों को पूर्ण रूप से धारण करते हैं। पंचम काल की सीमाओं के कारण अब अधिक उपवास, अधिक विहार, जंगल या गुफा में रहना, आतापन योग करना तथा पर्वत के शिखर पर एक पैर पर खड़े होकर सूर्य के सम्मुख तपस्या करना आदि क्रियाओं के लिए निषेध किया गया है। साधु की दैनिक चर्या के बारे में उन्होंने बताया कि जब बच्चे खाकर खेल लेते हैं और रोगी व वृद्ध भी भोजन कर लेते हैं तथा रसोई से धुआं निकलना पूरी तरह समाप्त हो जाता है, उसके बाद सूर्य घड़ी के अनुसार साधु आहारचर्या के लिए उठते हैं। साधु अपने छह आवश्यक कर्तव्यों का प्रतिदिन कड़ाई से पालन करते हैं और भूमि पर ही शयन करते हैं। समाधिस्थ साधु की देखरेख के बारे में उन्होंने कहा कि आचार्य स्वयं ऐसे साधु के लिए अनुकूल व्यवस्था करते हैं, जिसके तहत गर्मी की ऋतु में शीत व्यवस्था तथा शीत ऋतु में उष्ण व्यवस्था की जाती है।</p>
<p><strong>आत्मरक्षा से ही वास्तव में पर-जीवों की रक्षा संभव</strong></p>
<p>गुरुदेव ने जोर देकर कहा कि जैन शासन वास्तव में आत्मानुशासन है और जो स्वयं को अनुशासित करने के योग्य होता है, वही सच्चा शिष्य कहलाता है। अहिंसा के सिद्धांत को समझाते हुए उन्होंने कहा कि साधु का नियम है कि पहले स्वरक्षा करो और फिर दूसरों की रक्षा करो। श्रावक की प्रत्येक व्यावहारिक क्रिया में अनिवार्य रूप से जीव मरते हैं, इसलिए संसार के सभी जीवों की रक्षा कोई भी अकेला व्यक्ति नहीं कर सकता। आत्मरक्षा से ही वास्तव में पर-जीवों की रक्षा संभव होती है, क्योंकि जहां आत्मा के परिणामों की हिंसा (भाव हिंसा) होती है, वहां सभी प्रकार की हिंसा स्वतः हो जाती है। अंत में, उन्होंने व्यावसायिक स्तर पर होने वाली क्रूरता पर प्रहार करते हुए कहा कि आज मुर्गी पालन और मत्स्य पालन के नाम पर जीवों की सबसे अधिक हिंसा की जा रही है, जहां जीवों का मांस खाने के लिए पहले उन्हें अच्छा खिलाया-पिलाया जाता है और बाद में बेरहमी से उनकी हिंसा कर दी जाती है। मुनिश्री सुविज्ञ सागर जी ने आचार्य श्री द्वारा रचित &#8216;धन्य हो गुरुवार धन्य हो तुम कितनी समता रखते हो।&#8217; कविता द्वारा मंगलाचरण किया। यह जानकारी विजयलक्ष्मी गोदावत सागवाड़ा ने दी।</p>
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		<title>अपने बच्चों को आत्म ज्ञान नहीं देने वाले माता-पिता उनके बैरी : धर्माचार्य कनक नंदी जी ने अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में माता-पिता को दी सीख </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/parents_who_do_not_give_selfknowledge_to_their_children_are_their_enemies/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Shree Phal News]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 30 May 2026 16:04:14 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री कनक नंदीजी ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में बताया कि सामान्य लोगों से साधुओं की विपरीत वृत्ति होती है। अपने बच्चों को आत्म ज्ञान नहीं देने वाले मात-पिता उनके बैरी हैं।बांसवाड़ा/डडूका से पढ़िए, अजीत कोठिया की यह रिपोर्ट..  बांसवाड़ा/डडूका। आचार्य श्री कनक नंदीजी ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य श्री कनक नंदीजी ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में बताया कि सामान्य लोगों से साधुओं की विपरीत वृत्ति होती है। अपने बच्चों को आत्म ज्ञान नहीं देने वाले मात-पिता उनके बैरी हैं।<span style="color: #ff0000">बांसवाड़ा/डडूका से पढ़िए, अजीत कोठिया की यह रिपोर्ट..</span></strong></p>
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<p><strong> बांसवाड़ा/डडूका।</strong> आचार्य श्री कनक नंदीजी ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में बताया कि सामान्य लोगों से साधुओं की विपरीत वृत्ति होती है। अपने बच्चों को आत्म ज्ञान नहीं देने वाले मात-पिता उनके बैरी हैं। दादा-दादी माता-पिता चाचा-चाची आदि परिवार के लोग ही दुश्मन हैं, जिन्होंने इस जीव को आत्मज्ञान नहीं दिया। हम आत्मा को नहीं जानते थे, अतः आत्मद्रोही थे।चंद्रगुप्त मौर्य अंतिम श्रुत केवली को अपने 14 सपनों का फल पूछते हैं।</p>
<p>शेर से भी केंचुआ अनंत गुना अधिक पापी है क्योंकि, शेर मन सहित पंचेेंद्रीय जीव है। गुरु के उपदेश से वह सम्यक दर्शन ग्रहण कर सकता है परंतु, केंचुआ नहीं।</p>
<p>भगवती आराधना ग्रंथ से आचार्य श्री ने बताया कि कारण वश साधु एक स्थान पर कम या अधिक दिन रह सकते हैं। चातुर्मास के बाद भी 30 दिन अधिक ठहर सकते हैं। वर्षा की अधिकता, शीत की अधिकता, गर्मी की अधिकता, महामारी आने पर, रोग होने पर प्राकृतिक आपदा आने पर युद्ध होने पर आतंकवाद आदि अनेक कारण होने पर साधु सुरक्षित एक स्थान पर रह सकते हैं। स्वाध्याय करने के लिए ज्ञानार्जन करने के लिए विहार भी कर सकते हैं तथा एक स्थान पर अधिक निवास भी कर सकते हैं। शास्त्र अध्ययन, शास्त्र पठन-पाठन, लेखन उनके निवास विहार में मुख्य कारण है। शिक्षा दीक्षा अध्ययन शास्त्र लिखने के लिए दक्षिण भारत से दो मुनिराजों को गुजरात बुलाया उसके बाद उनको पढ़ाया सिखाया। परीक्षा के बाद शास्त्र लेखन का आदेश आचार्य श्री धरसेनाचार्य ने दिया। उसमें उन्हें कई वर्ष लगे।</p>
<p><strong>वैयावृत्ति करना शिखर बंदी मंदिर बनाने से भी अधिक पुण्यबंध का कारण</strong></p>
<p>शक्ति के अभाव में भी एक स्थान पर साधु रह सकते हैं। उत्कृष्ट समाधि के लिए भी एक स्थान पर रह भी सकते हैं और विहार भी कर सकते हैं। साधु को उत्कृष्ट समाधि में कई महीने, 12 वर्ष भी लगते हैं। समाधिस्थ रोगी साधु की सेवा, वैयावृत्ति करने के लिए अधिक समय रह सकते हैं। वैयावृत्ति करना शिखर बंदी मंदिर बनाने से भी अधिक पुण्यबंध का कारण है। महामारी होने, दुर्भिक्ष होने पर अतिवृष्टि, अनावृष्टि होने पर साधु एक स्थान पर रह भी सकते हैं और विहार भी कर सकते हैं। उत्तर भारत में दुर्भिक्ष पड़ने पर 12000 साधुओं को लेकर आचार्य भद्रबाहु स्वामी साधुओं की सुरक्षा के लिए दक्षिण भारत गए।कोई कारण होने पर चातुर्मास के बीच में भी विहार कर सकते हैं। संघ में किसी प्रकार का किसी साधु को साध्वी को कष्ट होने पर चातुर्मास के बीच में विहार कर सकते हैं। आत्मविराधना, रत्नत्रय विराधना ना हो ऐसे स्थान पर रहते हैं। एक स्थान पर महीनों रह सकते हैं तथा समस्या होने पर चातुर्मास के बीच में भी जा सकते हैं। रत्नत्रय की विराधना ना हो अतः शरीर रूपी नौका को सुरक्षित रखते हैं।</p>
<p><strong>साधु ही बीज रूप में भगवान है</strong></p>
<p>धन कमाकर स्वर्ग मोक्ष नहीं मिलेगा धर्म से ही स्वर्ग मोक्ष मिलेगा। अभी के साधु भ्रूण अवस्था में है उनकी सुरक्षा सेवा व्यवस्था आहार विहार आदि में सुरक्षा हम श्रावकों का कर्तव्य है। जिस प्रकार भ्रूण,भ्रूण अवस्था में ही टूट जाएगा सुख जाएगा तो वृक्ष नहीं बन पाएगा वैसे ही मोक्ष रूपी वृक्ष के साधु भ्रूण है। बच्चों को शिशु अवस्था में खाना पानी पौष्टिक आहार की आवश्यकता होती है वह जवान मनुष्य की तरह कार्य नहीं कर सकता। जिस प्रकार मां अपने बच्चों की देखभाल करती है बचपन में नीचे गिर जाते हैं लग जाती है बीमार हो जाते हैं। भोजन बनाते समय तथा घर के कार्य करते समय भी मां अपने बच्चों का ख्याल रखती है, वैसे ही साधुओं की सेवा सुरक्षा हर पल करनी चाहिए। यह श्रावकों का मुख्य कर्तव्य है। साधु ही बीज रूप में भगवान है। जिस प्रकार मां अपने बेटे को भोजन कराती है तो ध्यान रखती है कि बेटे के लिए क्या पथ्य है, क्या अपथ्य है। साधु रुग्ण ना हो, वह स्वस्थ रहे, ध्यान,अध्ययन अच्छा कर सके। इस प्रकार वात्सल्य से श्रावकों को साधु को आहार देना चाहिए।</p>
<p><strong>मुनि श्री ने मंगलाचरण किया</strong></p>
<p>मुनि श्री सुविज्ञ सागर जी ने आचार्य श्री द्वारा रचित कविता &#8216;पंच परमेष्ठी तेरे भक्त हम तेरी भक्ति से बने भगवान तेरा ध्यान करें,तेरा ज्ञान करें, करे तेरा ही चिंतन मनन,पंच परमेष्ठी तेरे भक्त हम।द्वारा मंगलाचरण किया। यह जानकारी विजयलक्ष्मी गोदावत सागवाड़ा ने दी।</p>
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		<title>सुख दुःख, जन्म मरण का मूल कारण है कर्म: धर्माचार्य कनकनंदी ने कर्मों की प्रभावकता के बारे में बताया </title>
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		<pubDate>Fri, 22 May 2026 14:22:58 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[ भिलुडा के पास शिवगौरी सेवाश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में आचार्य श्री कनकनंदीजी ने बताया कि जो भी सुख-दुख जन्म मरण है, इसका मूल कारण कर्म है। राग, द्वेष, मोह आदि से कर्म बंध होता ही है। भूत-प्रेत आदि पाप के कारण है। बांसवाड़ा से अजीत कोठिया की यह रिपोर्ट&#8230; बांसवाड़ा। भिलुडा के पास शिवगौरी सेवाश्रम [&#8230;]]]></description>
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<p><strong> भिलुडा के पास शिवगौरी सेवाश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में आचार्य श्री कनकनंदीजी ने बताया कि जो भी सुख-दुख जन्म मरण है, इसका मूल कारण कर्म है। राग, द्वेष, मोह आदि से कर्म बंध होता ही है। भूत-प्रेत आदि पाप के कारण है। <span style="color: #ff0000">बांसवाड़ा से अजीत कोठिया की यह रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>बांसवाड़ा</strong>। भिलुडा के पास शिवगौरी सेवाश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में आचार्य श्री कनकनंदीजी ने बताया कि जो भी सुख-दुख जन्म मरण है, इसका मूल कारण कर्म है। राग, द्वेष, मोह आदि से कर्म बंध होता ही है। भूत-प्रेत आदि पाप के कारण है। हम बाजार से नहीं बल्कि गुठली से अंकुर, अंकुर से वृक्ष, वृक्ष से आम ऋतु के अनुसार ही प्राप्त होता है। वैसे ही हर कार्य का कारण सुख-दुख का कारण कर्म है। ग्रह दोष दूर करने के लिए मुख्य रूप से दान दिया जाता है, पूजा की जाती है। हिक्टोरिया रोग अविवाहित महिलाओं को होता है संतान उत्पन्न होने के बाद यह रोग नहीं होता। कर्म उदय से अनेक रोग होते हैं, अतः मन पवित्र करो दान करो पूजा करो। भाव पाप राग द्वेष, मोह, क्रोध मान, मायाचारी समस्त सांसारिक दुखों का कारण है। यहां पर आचार्य श्री कहते हैं कि हे धीर, वीर तू ज्ञान रूपी सूर्य आत्मा का आश्रय ले क्योंकि, उसको प्राप्त करके राग रूपी नदी सूख जाती है। सभी धार्मिक क्रियाओं का मूल कारण भाव शुद्ध करना है। भाव अच्छे किए बिना धर्म करना अर्थात बिना बीज बोए फल की चाह रखना है। पापी जीव भूत होते हैं। अतः आचार्य श्री ने राग, द्वेष करने वालों को मोह करने वाले को आत्मा को नहीं जानने वाली को महा पिशाच कहां है। एआई भी बता रहा है कि वैज्ञानिक दृष्टि संपन्न व्यक्ति ही धर्म को सही समझते हैं। जहां राग है, वहां द्वेष अवश्य होगा। वहां पर मोह तथा आसक्ति भी होगी ही। भोजन के प्रति राग है वहां निश्चित रूप से द्वेष होगा ही।</p>
<p><strong>जहां लोभ होगा वहां पर सभी पाप होंगे </strong></p>
<p>घड़ियाल एनाकोंडा क्रोकोडाइल आदि शिकार करते समय चुपचाप रहते हैं हिलते-ढूंढते तक नहीं है परंतु, उनमें द्वेष अवश्य रहता है शिकार को पकड़ने के लिए वह टकटकी लगाए बैठे रहते हैं। पेड़ भी क्रोध करता है तथा सभी कषाएं उसमें तीव्र उदय में रहती है यह गुरुदेव के पास पढ़ने से पहले हम सभी नहीं जानते थे। क्रोध से भी लोभ करने वाला महा पापी है। जहां लोभ होगा वहां पर सभी पाप होंगे ही लोभ के कारण ही जीव हिंसा करता है झूठ बोलता है चोरी करता है अन्याय,अत्याचार करता है परिग्रह इकट्ठा करता है। लोभ के कारण धन कमाने वालों को परिवार के लोग श्रेष्ठ मानते हैं क्योंकि सब धन ही चाहते हैं। लोभी को क्रोधी से सामान्य लोग कम पापी मानते हैं। वर्तमान में तथा प्राचीन काल में सभी युद्ध लोभ के कारण हुए हैं।</p>
<p><strong>संकल्प विकल्प से रहित होकर मन स्थिर होता है</strong></p>
<p>साधु जितने अंश में निर्लाेभी, वितरागी होंगे उतने अंश में उनका मन स्थिर होगा ध्यान कर सकेंगे आत्मा का आनंद प्राप्त कर सकेंगे। संपूर्ण ज्ञान साम्राज्य प्राप्त करने के लिए मोह को क्षय करना राग द्वेष क्रोध मान माया काम सबको नष्ट करना पड़ेगा। आत्मा विजयी ही विश्व विजई बनता है। जो समता रूपी शस्त्र से, ध्यान रूपी अस्त्रों से कर्म रूपी शत्रुओं का हनन करते हैं वह अरिहंत होते हैं। अरिहंतों ने राग द्वेष मोह लोभ आदि अंतरंग शत्रु को जीत लिया है। यहां पर आचार्य ने उदाहरण से समझाया है कि मन रूपी पक्षी राग द्वेष रूपी पंखों के कट जाने से उड़ नहीं सकता, वैसे ही राग द्वेष नष्ट हो जाने से संकल्प विकल्प से रहित होकर मन स्थिर होता है। मन को हीरे या सोने की जंजीर से नहीं बाध सकते जब राग द्वेष क्षीण करोगे तब मन को संयमित कर सकोगे। धन जड़ है अपरिग्रह धारी साधु के सामने स्वर्ग के इंद्र चक्रवर्ती राजा आदि भी झुकते हैं।</p>
<p><strong> मुनि श्री सुविज्ञसागर जी का केशलोच</strong></p>
<p>मुनि श्री सुविज्ञसागर जी का कल केशलोच सादगी पूर्ण तरीके से आचार्य श्री की उपस्थिति तथा श्री संघ की उपस्थिति मे एकांत में हुआ। मुनि श्री ने आचार्य श्री की कविता- ‘कहां भी नहीं यहां ही सही है सुख दुख वह जन्म मरण। स्वर्ग भी तू ही नर्क भी तू ही बंध भी तू ही मोक्ष भी तू ही।’ से मंगलाचरण किया। यह जानकारी विजयलक्ष्मी गोदावत पुनर्वास कॉलोनी सागवाड़ा ने दी।</p>
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		<title>मैं आनंद स्वरूप हूं, ऐसा अनुभव करना होगा : वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदी ने दिए वेबिनार में स्वयं को पहचाने के सूत्र  </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/one_must_experience_oneself_as_the_embodiment_of_bliss/</link>
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		<pubDate>Tue, 19 May 2026 11:38:39 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य कनक नंदीजी ने शिवगौरी आश्रम भिलुड़ा राजस्थान से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में बताया कहा कि स्वयं को जानना विश्व की सबसे बड़ी उपलब्धि है। मैं समस्त दुखों से संसार की प्रत्येक वस्तु से भिन्न हूं। मैं आनंद स्वरूप हूं। डडूका से पढ़िए, अजीत कोठिया की रिपोर्ट&#8230; डडूका। आचार्य कनक नंदीजी ने शिवगौरी आश्रम भिलुड़ा राजस्थान [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य कनक नंदीजी ने शिवगौरी आश्रम भिलुड़ा राजस्थान से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में बताया कहा कि स्वयं को जानना विश्व की सबसे बड़ी उपलब्धि है। मैं समस्त दुखों से संसार की प्रत्येक वस्तु से भिन्न हूं। मैं आनंद स्वरूप हूं। <span style="color: #ff0000">डडूका से पढ़िए, अजीत कोठिया की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>डडूका।</strong> आचार्य कनक नंदीजी ने शिवगौरी आश्रम भिलुड़ा राजस्थान से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में बताया कहा कि स्वयं को जानना विश्व की सबसे बड़ी उपलब्धि है। मैं समस्त दुखों से संसार की प्रत्येक वस्तु से भिन्न हूं। मैं आनंद स्वरूप हूं, ऐसा अनुभव करना पड़ेगा। चेतना ही परम आध्यात्मिक मैं हूं। उन्होंने कहा कि संकल्प विकल्प से आत्म शक्ति कुंठित हो जाती है। जिसका मन शांत हो गया है, उसके विकार शांत हो गए हैं। ऐसा योगी आत्म सुख प्राप्त करता है। ज्ञानानंद सच्चिदानंद आत्मा से जुड़ने वाले योगी प्राप्त करते हैं। आर्त ध्यान रौद्र ध्यान करते हुए प्रसन्नता आनंद शांति कभी प्राप्त नहीं हो सकती। कभी दुर्गुणों से युक्त होने पर प्रसन्नता खुशी नहीं प्राप्त कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि शारीरिक मलमूत्र के वेग को नहीं रोकना चाहिए परंतु, मानसिक रोग ईर्षा, द्वैष, घृणा, अहंकार आदि को रोकना चाहिए। जिस प्रकार बल्ब के ऊपर धूल मिट्टी लगी हुई है तो प्रकाश फैलता नहीं है। इसी प्रकार इन मानसिक रोगों से आत्मा का प्रकाश जागृत नहीं होता है। बॉडी माइंड सॉल का अंतर संबंध है, तीनों एक दूसरे को प्रभावित करते हैं। ध्यान मन की पवित्रता योग मोक्ष लक्ष्मी को वश करने के लिए श्रेष्ठ उपाय है। मन से अधिक शक्तिशाली आत्मा है। जब तक मन शांत नहीं है तब तक बाह्य तप करना शरीर को दंडित करना है।</p>
<p><strong>मन शुद्धि से अविद्यमान गुण भी विद्यमान हो जाते हैं</strong></p>
<p>अधिकतर संसारी लोग शारीरिक सुख के लिए धर्म करते हैं। जिस प्रकार तुष अर्थात छिलके कूटने से केवल श्रम होता है परंतु चावल नहीं निकलते हैं वैसे ही आत्मज्ञान बिना अनंत भव में साधु बनने पर भी मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकते। मन की शुद्धि ही एक मोक्ष मार्ग रुपी मार्ग में मार्ग प्रकाशक दीपिका है। इसको नहीं पाने से अनेक मोक्ष मार्गाे मोक्ष मार्ग से च्युत हो जाते हैं। मन शुद्धि से अविद्यमान गुण भी विद्यमान हो जाते हैं। जिनके पास गुण नहीं होते हैं परंतु मन शांत होने पर गुण प्रकट हो जाते हैं। मन शुद्ध से स्वयं ज्ञान प्रकट होता है। आनंद उत्पन्न होता है। मन की अशुद्धि से जो गुण होते हैं वह भी दुर्गुण बन जाते हैं। कब ये पापी मन पावन होगा। कब राग,द्वैष, मोह त्यागेगा। इस कविता द्वारा मुनि श्री सुविज्ञ सागर जी ने मंगलाचरण किया। ये जानकारी विजयलक्ष्मी गोदावत सागवाड़ा ने दी।</p>
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		<title>दुनिया में सबसे मुख्य प्रदूषण भाव प्रदूषण है: वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदी जी ने मनोविज्ञान, प्राणी विज्ञान और कर्म सिद्धान्त के बारे में बताया </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shree Phal News]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 01 May 2026 12:40:24 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदीजी ने भीलूड़ा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में बताया कि हमारे प्राचीन आचार्यो ने मनोविज्ञान, प्राणी विज्ञान, कर्म सिद्धांत का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए कहा है कि मुनि यह चित्त रूपी हाथी इतना प्रबल है कि उसका पराक्रम अनिवार्य है नहीं तो वह संयम रूपी घर को नष्ट कर [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदीजी ने भीलूड़ा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में बताया कि हमारे प्राचीन आचार्यो ने मनोविज्ञान, प्राणी विज्ञान, कर्म सिद्धांत का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए कहा है कि मुनि यह चित्त रूपी हाथी इतना प्रबल है कि उसका पराक्रम अनिवार्य है नहीं तो वह संयम रूपी घर को नष्ट कर देगा। <span style="color: #ff0000">भीलूड़ा से पढ़िए, अजित कोठिया की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>भीलूड़ा।</strong> वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदीजी ने भीलूड़ा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में बताया कि हमारे प्राचीन आचार्यो ने मनोविज्ञान, प्राणी विज्ञान, कर्म सिद्धांत का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए कहा है कि मुनि यह चित्त रूपी हाथी इतना प्रबल है कि उसका पराक्रम अनिवार्य है नहीं तो वह संयम रूपी घर को नष्ट कर देगा। चित्त को हाथी की उपमा दी है। हाथी सामान्यतः बुद्धिमान शाकाहारी भद्र सामाजिक प्राणी है तथापि काम वेदना से वह उत्तेजित होकर क्रूर बन जाता है. अन्य क्रूर प्राणियों से भी साठ गुना अधिक क्रूर हो जाता है। हाथी के संभोग के समय हारमोंस स्राव होता है. जिससे मदमस्त हो जाता है उसके मद झरता है।</p>
<p>जिसका भाव उदार नहीं, शुभ नहीं वह समस्त पाप करता है। युद्ध, लड़ाई झगड़ा सब पहले भाव से होते हैं वास्तव में वह बाद में होते हैं। धर्म के नाम पर भी क्रुरता असंयम आदि से अधर्म हो रहा है। यह चंचल चित्त रूपी बंदर दौड़ता रहता है.। गलत चिंतन करता है दूसरों की निंदा चुगली करके पाप बंध करता है। मन की चंचलता से अधिक पाप बंध होता है। आचार्य श्री यहां पर डांट लगाते हुए कहते हैं जो मन को कंट्रोल नहीं करता वह मूर्ख है। वह धर्म की चर्चा करता हुआ लज्जित करता है। वह चित्त को तो जीत नहीं सका तथा ध्यान की चर्चा करता है धर्म की चर्चा करता है, पुण्य,त्याग तपस्या की चर्चा करता है तो वह मूर्ख, निर्लज्ज, ढीठ, पापी है। बाह्य त्याग अंतरंग त्याग के लिए है। सबसे मुख्य प्रदूषण भाव प्रदूषण है। जब मन शुद्ध होता है भाव प्रदूषण नहीं होता तो कषाय प्रदूषण लड़ाई झगड़ा युद्ध ग्लोबल वार्मिंग आदि कुछ भी संभव नहीं है। चित्त शुद्धि बिना हीलिंग भी संभव नहीं है। भाव शुद्धि बिना चित्त स्थिर नहीं होगा। जिसके भाव में ख्याति पूजा लाभ की चाह है चित्त शुद्ध नहीं है वह मूर्ख है। चित्त को जीत नहीं सकता तथा ध्यान की चर्चा करता है वह साधु घनाघन पाप करता है।</p>
<p><strong> सुरा, सुंदरी शिकार आदि के कारण संग्राम होते हैं।</strong></p>
<p>शिकारी प्राणी शेर चीता एनाकोंडा शिकार करने से पहले घंटो तक स्थिर रहते हैं शिकार आने पर पकड़ कर क्रुरता से मारते हैं वह ध्यान नहीं है। मांसाहारी जीव रोज खाते नहीं कुछ सप्ताह के बाद कुछ महीनो के बाद कुछ वर्षों के बाद खाते हैं तो वह उपवास नहीं। कर्म सिद्धांत का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए कहा कि यह चित्त रूपी हाथी इतना प्रबल है कि उसका पराक्रम अनिवार्य है नहीं तो वह संयम रूपी घर को नष्ट कर देगा। चित्त को हाथी की उपमा दी है। हाथी सामान्यतः बुद्धिमान शाकाहारी भद्र सामाजिक प्राणी है तथापि काम वेदना से वह उत्तेजित होकर क्रूर बन जाता है. अन्य क्रूर प्राणियों से भी साठ गुना अधिक क्रूर हो जाता है। हाथी के संभोग के समय हारमोंस स्राव होता है. जिससे मदमस्त हो जाता है उसके मद झरता है। जिसका भाव उदार नहीं, शुभ नहीं वह समस्त पाप करता है। युद्ध, लड़ाई झगड़ा सब पहले भाव से होते हैं वास्तव में वह बाद में होते हैं। धर्म के नाम पर भी क्रुरता असंयम आदि से अधर्म हो रहा है। यह चंचल चित्त रूपी बंदर दौड़ता रहता है। गलत चिंतन करता है दूसरों की निंदा चुगली करके पाप बंध करता है। मन की चंचलता से अधिक पाप बंध होता है। आचार्य श्री यहां पर डाट लगाते हुए कहते हैं जो मन को कंट्रोल नहीं करता वह मूर्ख है वह धर्म की चर्चा करता हुआ लज्जित करता है। वह चित्त को तो जीत नहीं सका तथा ध्यान की चर्चा करता है धर्म की चर्चा करता है, पुण्य,त्याग तपस्या की चर्चा करता है तो वह मूर्ख, निर्लज्ज, ढीठ, पापी है।</p>
<p>बाह्य त्याग अंतरंग त्याग के लिए है। सबसे मुख्य प्रदूषण भाव प्रदूषण है। जब मन शुद्ध होता है भाव प्रदूषण नहीं होता तो कषाय प्रदूषण लड़ाई झगड़ा युद्ध ग्लोबल वार्मिंग आदि कुछ भी संभव नहीं है। चित्त शुद्धि बिना हीलिंग भी संभव नहीं है। भाव शुद्धि बिना चित्त स्थिर नहीं होगा। जिसके भाव में ख्याति पूजा लाभ की चाह है चित्त शुद्ध नहीं है वह मूर्ख है। चित्त को जीत नहीं सकता तथा ध्यान की चर्चा करता है वह साधु घनाघन पाप करता है। सुरा, सुंदरी शिकार आदि के कारण संग्राम होते हैं। शिकारी प्राणी शेर चीता एनाकोंडा शिकार करने से पहले घंटो तक स्थिर रहते हैं शिकार आने पर पकड़ कर क्रुरता से मारते हैं वह ध्यान नहीं है। मांसाहारी जीव रोज खाते नहीं कुछ सप्ताह के बाद कुछ महीनो के बाद कुछ वर्षों के बाद खाते हैं तो वह उपवास नहीं। यह जानकारी</p>
<p>विजय लक्ष्मी गोदावत सागवाड़ा ने दी।</p>
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