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	<title>ग्रन्थमाला &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
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	<title>ग्रन्थमाला &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>जीवन की आवश्यकताएं बनती हैं दुःखों का कारण</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 23 Feb 2023 00:30:01 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[ग्रन्थमाला]]></category>
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					<description><![CDATA[जीवन की आवश्यकताएं कर्म का कारण हैं। इन आवश्यकताओं के कारण ही अच्छे और बुरे कर्मों का बंधन होता है। रोटी, कपड़ा और मकान की चिंता ही हमें अच्छे और बुरे कर्मों की ओर प्रवृत करती हैं। इन्हीं के कारण राग-द्वेष, क्रोध, लालच आदि अवगुणों का जन्म होता है। इन आवश्यकताओं की पूर्ति में ही [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>जीवन की आवश्यकताएं कर्म का कारण हैं। इन आवश्यकताओं के कारण ही अच्छे और बुरे कर्मों का बंधन होता है। रोटी, कपड़ा और मकान की चिंता ही हमें अच्छे और बुरे कर्मों की ओर प्रवृत करती हैं। इन्हीं के कारण राग-द्वेष, क्रोध, लालच आदि अवगुणों का जन्म होता है। इन आवश्यकताओं की पूर्ति में ही कोई हमारा मित्र बन जाता है तो कोई हमारा शत्रु बन जाता है।</p>
<p>हमारी इच्छाओं और कर्म बंधनों के कारण ही हमारा इस दुनिया में आवागमन लगा रहता है। संसारी वस्तुओं से मोह बढ़ने के कारण हमारे दुःखों की मात्रा भी बढ़ती जाती है। यह स्थिति चिंताओं में वृद्धि करती है और अशुभ कर्मों की ओर ले जाती है। इसके चलते संसार का परिभ्रमण चक्र चलता ही रहता है और कभी भी दुखों का अंत नहीं होता। इच्छाओं की समाप्ति से ही सम्यक दर्षन होता है और सम्यक दर्शन से मोक्ष का मार्ग प्रशस्त हो पाता है</p>
<p><strong>आचार्य समन्तभद्र स्वामी ने रत्नकरण्ड श्रावकाचार में कहा है की</strong></p>
<p>क्षुत्पिपासाजरातङ्कजन्मान्तकभयस्मयाः ।</p>
<p>न रागद्वेषमोहाश्च यस्याप्तः स प्रकीर्त्यते ॥6।।</p>
<p><strong>अर्थात</strong> – जिसके भूख, प्यास, जरा, रोग, जन्म, मरण, भय, मद, राग, द्वेष, मोह, चिंता, अरति, निद्रा, विस्मय, विषाद, प्रस्वेद और खेद नहीं है, वह पुरुष वीतरागी आप्त कहा जाता है ।</p>
<p>उक्त सभी सांसारिक दुखों से जो मनुष्य रहित है, वास्तविकता में वहीं आनंद को प्राप्त करता है। वही सुखी और वीतराग आप्त है। वह दुनिया के सारे विकल्पों से दूर हो जाता है। वही परमाप्त (भगवान) कहलाता है, वही पूजनीय होता है। शेष सभी संसार को बढ़ाने वाले हैं। संसार में रहते हुए सभी विकल्पों और मोह से दूर हो जाना ही हमारा उद्देश्य होना चाहिए, ताकि हम जीवन को सार्थक बना सकें और मोक्ष मार्ग की महायात्रा की ओर अपने कदम बढ़ा सकें।</p>
<p><strong>(अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर महाराज की कलम से)</strong></p>
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		<title>जो प्रशंसा के साथ गलतियां भी बताए, वही सच्चा</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 16 Feb 2023 00:28:03 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[ग्रन्थमाला]]></category>
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		<category><![CDATA[सच्चा देव]]></category>
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					<description><![CDATA[यह तुमने अच्छा किया। यह तुमने गलत किया। तुम्हें अपनी गलती को स्वीकार करना चाहिए। यह बात बताने वाला ही सच्चा मित्र होता है, क्योंकि वह तुम्हें जीवन की सच्चाई से अवगत करा रहा है। अच्छे कार्यों के लिए उत्साहवर्द्धन के साथ-साथ जो आपकी कमियों और अवगुणों की ओर भी आपका ध्यान आकर्षित करे, वह [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>यह तुमने अच्छा किया। यह तुमने गलत किया। तुम्हें अपनी गलती को स्वीकार करना चाहिए। यह बात बताने वाला ही सच्चा मित्र होता है, क्योंकि वह तुम्हें जीवन की सच्चाई से अवगत करा रहा है। अच्छे कार्यों के लिए उत्साहवर्द्धन के साथ-साथ जो आपकी कमियों और अवगुणों की ओर भी आपका ध्यान आकर्षित करे, वह ही आपका सच्चा हितैषी हो सकता है। स्वार्थवश हमेशा प्रशंसा करने वाला कभी भी आपके लिए हितकारी नहीं हो सकता। जो तुम्हारी गलती को तुम्हें नहीं बताए और सुख के समय तुम्हे अहंकारी बनने से नहीं रोकेे, तुम्हारी कमजोरियों और सच्चाई से तुम्हें अवगत नहीं कराए, वह कदापि सच्चा मित्र नहीं हो सकता। प्राचीन शास्त्रों में भगवान को ही सच्चा मित्र बताया है, क्योंकि वह बिना राग-द्वेष, बिना भेदभाव सबको एक जैसा उपदेश देते हैं। सभी को निर्मल और शुभ कर्मों की ओर अग्रसर होने का मार्ग दिखाते हैं।</p>
<p><strong><span style="color: #000000;">आचार्य समन्तभद्र स्वामी में रत्नकरण्ड श्रावकाचार में कहा है कि….</span></strong></p>
<p><strong>आप्तेनोत्सन्नदोषेण सर्वज्ञेनागमेशिना ।</strong><br />
<strong>भवितव्यं नियोगेन नान्यथा ह्याप्तता भवेत् ।।</strong></p>
<p><strong>अर्थात</strong> – जिसने राग-द्वेष आदि दोषों का निवारण कर दिया है, जो चराचर जगत को जानने वाला सर्वज्ञ है और वस्तु स्वरूप के प्रतिपादक आगम का स्वामी अर्थात् मोक्ष मार्ग का प्रणेता है, वही पुरुष नियम से सच्चा आप्त होने के योग्य है। अन्यथा आप्तपना हो नहीं सकता।<br />
मेरी भावना में विद्वान श्री जुगलकिशोर जी ने बहुत सुंदर पंक्तियां कही हैं कि भगवान नाम से नहीं गुणों से पहचाने जाते हैं-<br />
जिसने राग द्वेष कामादिक जीते सब जग जान लिया ।<br />
सब जीवों को मोक्ष मार्ग का निस्पृह हो उपदेश दिया।।<br />
बुद्ध, वीर, जिन, हरि, हर, ब्रम्हा, या उसको स्वाधीन कहो ।<br />
भक्ति-भाव से प्रेरित हो यह चित्त उसी में लीन रहो ।।</p>
<p>ईश्वर के जिन गुणों की व्याख्या इन पंक्तियों में की गई है, उनके अनुरूप ही अगर हम राग-द्वेष, काम, क्रोध से दूर होकर आध्यात्मिक एवं भक्ति मार्ग की ओर उन्मुख होंगे, तो हमारा कल्याण अवश्य होगा और हम सम्यकत्व की ओर बढ़ सकेंगे।</p>
<p>(अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर महाराज की कलम से)</p>
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		<title>सम्यक दर्शन के लिए धर्म के मूल रूप को पहचानना जरूरी</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 09 Feb 2023 00:30:30 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[काल का प्रभाव कहें या सृष्टि में पाप कर्मों की बढ़ती मात्रा। संसार में चारों ओर अधर्म एवं अनुशासनहीनता बढ़ रही है। धर्म के मूल रूप त्याग, साधना, तप के स्थान पर पाखण्ड और बनावटी धार्मिक क्रियाओं को महत्व मिल रहा है। संसार की चकाचौंध में फंसे हुए तत्व धर्म के वास्तिक स्वरूप से परिचित [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>काल का प्रभाव कहें या सृष्टि में पाप कर्मों की बढ़ती मात्रा। संसार में चारों ओर अधर्म एवं अनुशासनहीनता बढ़ रही है। धर्म के मूल रूप त्याग, साधना, तप के स्थान पर पाखण्ड और बनावटी धार्मिक क्रियाओं को महत्व मिल रहा है। संसार की चकाचौंध में फंसे हुए तत्व धर्म के वास्तिक स्वरूप से परिचित कराने के बजाय लोगों को और अधिक सांसारिक मोह-माया में धकेल रहे हैं। धर्म का जो रूप लोगों को दिखाया जा रहा है, वह सम्यकत्व से दूर है। जीव कल्याण इसमें निहित नहीं है। जीवन में सम्यक दर्शन तो अनुशासन और भगवान तीर्थंकर के बताए मार्ग के अनुसरण से ही संभव है।</p>
<p><strong>रत्नकरण्ड श्रावकाचार में आचार्य समन्तभद्र स्वामी ने कहा है …</strong></p>
<p>श्रद्धानं परमार्थानामाप्तागमतपोभृताम् ।</p>
<p>त्रिमूढापोढमष्टांगं सम्यग्दर्शनमदमयं ।। 4 ।।</p>
<p>अर्थात- सम्यक दर्शन का स्वरूप (सत्यार्थ) – यथार्थ आप्त, आगम और गुरु का तीन मूढ़ता से रहित, आठ स्मय (मद) से रहित और आठ अंग से सहित श्रद्धान करना सम्यक दर्शन है ।</p>
<p>सम्यक दर्शन का जन्म, उन्नति और विकास अरिहंत भगवान, शास्त्र और गुरु की आराधना से ही संभव है। अर्थात देव, शास्त्र एवं गुरू की आराधना से जीवन में सत्य के दर्शन की सामर्थ्यता जागृत हो जाती है। यह सामर्थ्य हमें धर्म के वास्तविक रूप को समझने में सहायक है। अरिहंत आदि की आराधना में भी अनुशासन का विषेष महत्व है।</p>
<p>लोक मान्यता में चली आ रही परम्पराओं से दूर होकर, राग-द्वेष-परिग्रह के साथ की जा रही साधु प्रवृति अंतः मन से संत की प्रकृति नहीं है। ऐसा करना केवल वेष से साधु होना है, मन से नहीं। ऐसी आराधना से जीवन मंे सम्यक दर्शन का जन्म नहीं हो सकता, बल्कि इससे धर्म के मिथ्यारूप में पड़कर पहले से जो अर्जित किया है, वह भी चला जाता है। यह सब तो संसार का दुःख बढ़ाने वाला है। हमें धन, वैभव और परिग्रह से रहित होकर बिना आकांक्षा एवं बिना शंका के धर्म की आराधना करनी चाहिए तथा कर्म के उदय के कारण धर्म से दूर जा रहे व्यक्ति को धर्म मार्ग में लगाने के भाव रखने चाहिए। ऐसे सम्यक भावों और अनुशासन के साथ धर्म के मूल रूप का पालन करके ही हम जीवन में सम्यक दर्शन की प्राप्ति में सफल हो सकते हैं।</p>
<p><strong>(अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर महाराज की डायरी से)</strong></p>
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		<title>सम्यक चर्या का पालन करने वाला ही मोक्ष मार्ग का सच्चा राही </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 18 Jan 2023 23:30:04 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आधुनिक सुख-सुविधाओं और विकास की अंधी दौड़ में आज व्यक्ति के दैनिक जीवन और वातावरण में बड़ा बदलाव आ गया है। मनुष्य आध्यात्मिक और धार्मिक क्रियाओं से दूर होता जा रहा है। वह धर्म से अधिक महत्व भौतिक वस्तुओं, परिवार, समाज, मित्रता, वैभव, विलासिता, खर्चीले आयोजनों और बनावटीपन आदि को दे रहा है। इन सबके [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>आधुनिक सुख-सुविधाओं और विकास की अंधी दौड़ में आज व्यक्ति के दैनिक जीवन और वातावरण में बड़ा बदलाव आ गया है। मनुष्य आध्यात्मिक और धार्मिक क्रियाओं से दूर होता जा रहा है। वह धर्म से अधिक महत्व भौतिक वस्तुओं, परिवार, समाज, मित्रता, वैभव, विलासिता, खर्चीले आयोजनों और बनावटीपन आदि को दे रहा है।</p>
<p>इन सबके कारण मनुष्य जीवन की सत्यता और सकारात्मकता से भटक गया है। वह बाहर से धर्म का पालन करते हुए नजर आता है, लेकिन अंतः मन से वह भौतिकता के चरम की ओर अग्रसर हो रहा है। यही कारण है कि वर्तमान में धर्म करते हुए भी धर्म का फल नहीं मिल रहा है।</p>
<p>कई बार अज्ञानवष हम यह कह देते हैं कि संसार में धर्म नहीं बचा है, लेकिन वास्तविकता कुछ और है। धर्म शाष्वत है, उसको धारण करने वाले मनुष्यों का अभाव हो गया है।</p>
<p><strong>आचार्य समन्तभद्र स्वामी ने रत्नकरण्ड श्रावकाचार में कहा है कि –</strong></p>
<p>&nbsp;</p>
<p><strong>सद्दृष्टिज्ञानवृत्तानि धर्मं धर्मेश्वरा विदुः ।</strong></p>
<p><strong>यदीयप्रत्यनीकानि भवन्ति भवपद्धति ।।</strong></p>
<p><strong>अर्थात</strong> – धर्म के ईष्वर तीर्थंकर भगवान ने सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चारित्र को धर्म कहा है। इसके विपरीत मिथ्यादर्शन, मिथ्याज्ञान और मिथ्याचारित्र संसार एवं दुखों के कारण हैं।</p>
<p>तीर्थंकर भगवान की दिव्य ध्वनि के माध्यम से उद्घृत धर्म की परिभाषा को शाब्दिक रूप में प्राचीन ग्रन्थों में अनेक प्रकार से संजोया गया है।</p>
<p>इन सबका गहराई से स्वाध्याय एवं चिंतन करें तो उन सब रचनाओं का भावार्थ एक ही निकलेगा कि सकारात्मक श्रद्धा (सोच), सकारात्मक अध्ययन और सकारात्मक निर्मल आचरण ही धर्म है। इस प्रकार स्पष्ट है कि सम्यक चर्या का पालन करने वाला व्यक्ति ही मोक्ष मार्ग का सच्चा राही है।</p>
<p>सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चारित्र इन तीन गुणों का संयोग जिस मनुष्य के अंदर होता है, उस मनुष्य के अंदर धर्म का बीजारोपण अपने आप होने लगता है।</p>
<p>उसकी दिनचर्या अन्य लोगों का भी सकारात्मक मार्गदशन करती है, जबकि इससे विपरीत नकारात्मक सोच, नकारात्मक अध्ययन और मलिन आचरण अधर्म की ओर धकेलता है, जो वर्तमान और भावी जीवन को अनेक कष्टों की ओर ले जाता है। यह तीनों नकारात्मक संयोग मनुष्य के अंदर अधर्म का बीजारोपण करते हैं।</p>
<p>उसकी दिनचर्या दूसरों के लिए नकारात्मक मार्गदर्शन करती है। अतः तीर्थंकर भगवान की दिव्य ध्वनि के अनुरूप सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चारित्र का पालन करना श्रावक का मूलगुण है। इसी में उसके जीवन की सार्थकता है।</p>
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		<title>धर्म दिखाता है दुःख में भी सुख की राह</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 11 Jan 2023 23:30:40 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[ग्रन्थमाला]]></category>
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					<description><![CDATA[&#160; http://www.Shreephaljainnews.comपर आप पढ़िए प्रत्येक गुरुवार सुख और दुःख जीवन का हिस्सा हैं। न तो सुख स्थाई है और ना दुःख स्थाई है, लेकिन प्रतिकूल स्थितियों में भी आनंद खोजना, दुःख को सुख में परिवर्तित करना या दुःख में सुख का अनुभव करना, दुःख के कारणों से बचना और जीवन में प्रविष्ट हुए अशुभ कर्मों [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>&nbsp;</p>
<p><a href="http://www.Shreephaljainnews.com">http://www.Shreephaljainnews.com</a>पर आप पढ़िए प्रत्येक गुरुवार</p>
<p>सुख और दुःख जीवन का हिस्सा हैं। न तो सुख स्थाई है और ना दुःख स्थाई है, लेकिन प्रतिकूल स्थितियों में भी आनंद खोजना, दुःख को सुख में परिवर्तित करना या दुःख में सुख का अनुभव करना, दुःख के कारणों से बचना और जीवन में प्रविष्ट हुए अशुभ कर्मों को दूर करना, इन सबके लिए सभी धर्म ग्रंथों में एक ही स्वर में कहा गया है कि जीवन में धर्म को स्थान दिया जाए।</p>
<p>धर्म के अनुकूल आचरण का पालन किया जाए, ताकि विपरीत समय में भी जीवन सुगम और आनंद से भरपूर रहे।<br />
<strong>आचार्य समन्तभद्र स्वामी ने रत्नकरण्ड श्रावकाचार में कहा है-</strong></p>
<p><strong>देशयामि समीचीनम् धर्मं कर्म निबर्हणम्।</strong><br />
<strong>संसार दुःखतः सत्यवान् यो धरत्युत्तमे सुखे।।2।।</strong></p>
<p>अर्थात-कर्मों का नाश करने वाले उस धर्म का उपदेश करता हूं जो जीवन को संसार के दुखों से मुक्त कर उत्तम सुखों में परिवर्तित करता है।</p>
<p>संसार में जन्म लेने वाला प्राणी किसी ना किसी दुःख से दुखी है ही। यह दुःख चाहे किसी भी माध्यम सेे उनके जीवन में प्रवेश करे, दुःख के प्रवेश के बाद उसका फल मनुष्य या अन्य प्राणी को शारीरिक, मानसिक या आर्थिक रूप से मिलने वाली पीड़ा के रूप् में भोगना ही होता है। यह दुःख अल्पकालीन भी हो सकता है या दीर्घकालीन भी।</p>
<p>दुःख में प्राणी का मन एवं मस्तिष्क नकारात्मक विचारों से भर जाता है और उसकी मनः स्थिति सकारात्मक सोच से दूर हो जाती है। इसके चलते उसके जीवन में अशुभ कर्मों का प्रवेश प्रारम्भ हो जाता है और इन्हीं अशुभ कर्मों का फल वह जीवन के आगामी समय या अगले जन्म में भी भोगता है।</p>
<p>अशुभ कर्मों का प्रवेश चाहे संत या श्रावक के जीवन में हुआ हो या अमीर, गरीब, सुंदर या कुरूप व्यक्ति के जीवन में सभी को इनका फल भोगना होता है, इसलिए आवश्यक है कि हम धर्म के अनुरूप अपने जीवन में आगे बढें़ और अशुभ कर्मों से बचते हुए विपरीत समय को भी आनंददायी बनाएं।</p>
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		<item>
		<title>मंगलाचरण रत्नकरण्ड श्रावकाचार,यह जानना जरूरी है&#8230; क्यों है मंगलाचरण करने की परम्परा?</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 04 Jan 2023 23:30:37 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[ग्रन्थमाला]]></category>
		<category><![CDATA[indore jain samaj]]></category>
		<category><![CDATA[jain bhajan]]></category>
		<category><![CDATA[jain news]]></category>
		<category><![CDATA[Lalitpur jain samaj news]]></category>
		<category><![CDATA[muni Tarun Sagar]]></category>
		<category><![CDATA[pm modi on jain samaj]]></category>
		<category><![CDATA[satyendar jain news]]></category>
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					<description><![CDATA[श्रीफल जैन न्यूज की प्रस्तुति प्रत्येक गुरुवार Shreephaljainnews पर आप पढ़िए &#160; किसी भी शुभकार्य को करने के पहले मंगलाचरण करने की धार्मिक परम्परा रही है। इसके पीछे कई कारण हैं-जैसे कार्य की समाप्ति निर्विघ्न हो, नास्तिकता का परिहार हो, शिष्टाचार का पालन हो, उपकार के स्मरण के लिए, पुण्य की प्राप्ति और शिष्यों के [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="padding-left: 40px;"><strong>श्रीफल जैन न्यूज की प्रस्तुति</strong></p>
<p><strong>प्रत्येक गुरुवार Shreephaljainnews पर आप पढ़िए</strong></p>
<p>&nbsp;</p>
<p>किसी भी शुभकार्य को करने के पहले मंगलाचरण करने की धार्मिक परम्परा रही है। इसके पीछे कई कारण हैं-जैसे कार्य की समाप्ति निर्विघ्न हो, नास्तिकता का परिहार हो, शिष्टाचार का पालन हो, उपकार के स्मरण के लिए, पुण्य की प्राप्ति और शिष्यों के अनुग्रह के लिए।</p>
<p>मंगलाचरण करने से शिष्य विद्या में पारंगत होता है, कार्य निर्विघ्न पूर्ण होता है और विद्या और विद्या के फल की प्राप्ति होती है।</p>
<p>रत्नकरण्ड का अर्थ होता है जानने के लिए इसका संधि विच्छेद करते हैं। रत्न अर्थात रत्न और करण्ड का अर्थ पिटारा अर्थात रत्नों का पिटारा।</p>
<p>प्रश्न उठता है कि कौन से रत्न? ये रत्न हैं-सम्यगदर्शन, सम्यगज्ञान और सम्यगचारित्र। इन तीन का पिटारा। यह ग्रंथ चरणानुयोग का है। यह ग्रंथ संस्कृत भाषा में लिखा हुआ है और ग्रंथ में 150 श्लोक संस्कृत में हैं।</p>
<p><strong>आओ मंगलाचरण से स्वाध्याय प्रारम्भ करते हैं&#8230;</strong></p>
<p><strong>नमः श्री वर्धमानाय निर्धूत कलिलात्मने ।</strong></p>
<p><strong>सालोकानां त्रिलोकानां यद्विद्या दर्पणायते ॥1॥</strong></p>
<p>&nbsp;</p>
<p>अर्थात जिनका कैवल्यज्ञान अलोक सहित तीनों लोकों में दर्पण के समान आचरण करता है, जिन्होंने पाप रूपी मैल को आत्मा से नष्ट कर दिया है, ऐसे श्री महावीर भगवान को नमस्कार हो।</p>
<p>यहां कहा जा रहा है कि भगवान महावीर को नमस्कार करने में, मैं अर्थात आचार्य समंतभ्रद स्वामी इस ग्रंथ को कहना प्रारम्भ कर कर रहा हूं।</p>
<p>यह आचार्य की विनम्रता है कि वह तीर्थंकर का स्मरण कर अपनी बात शुरू कर रहे हैं। जो ज्ञान तीन लोक की बात को एक क्षण में बिना किसी सहायक के जान जाए, उसे कैवल्य ज्ञानी कहते हैं।</p>
<p>तीन लोक के बाहर सर्व आकाश को अलोक कहते हैं। आकाश के जितने क्षेत्र में जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल रहते हैं, उसे लोक कहते हैं। आकाश के बीचोंबीच मध्य में लोक स्थित है।</p>
<p>कलित अर्थात घातिया कर्म। ज्ञानवरण, दर्शनावरण, मोहनीय और वेदनीय, यह घातिया कर्म हैं। जो जीव के भाव रुप अनुजीवी गुणों का घात करते हैं उन कर्मों को घातिया कर्म कहते हैं।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>(<strong>अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर महाराज की डायरी से)</strong></p>
<p>&nbsp;</p>
<p><a href="https://www.shreephaljainnews.com/latest-news-jain-samaj/">ग्रंथमाला- 1 :आओ जानें रत्नकरण्ड श्रावकाचार और आचार्य श्री समन्तभद्र स्वामी के बारे में</a></p>
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		<title>आओ जानें रत्नकरण्ड श्रावकाचार और आचार्य श्री समन्तभद्र स्वामी के बारे में</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 28 Dec 2022 23:30:03 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[ग्रन्थमाला]]></category>
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					<description><![CDATA[&#160; ग्रंथ माला प्रत्येक गुरुवार shreephaljainnews पर आप पढ़िए रत्नकरण्ड श्रावकाचार एक प्रमुख जैन ग्रन्थ हैं । जिसके रचयिता आचार्य श्री समन्तभद्र हैं । इस ग्रंथ में जैन श्रावक की चर्या का विस्तार से वर्णन है। आचार्य श्री समन्तभद्र ने जैन श्रावक कैसा होना चाहिए, इसके बारे में विस्तार से बताया है । इस ग्रंथ [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>ग्रंथ माला प्रत्येक गुरुवार shreephaljainnews पर आप पढ़िए</strong></p>
<p><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-33264" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2022/12/pankaj-ram-panchal-18.jpg" alt="" width="1640" height="924" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2022/12/pankaj-ram-panchal-18.jpg 1640w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2022/12/pankaj-ram-panchal-18-300x168.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2022/12/pankaj-ram-panchal-18-1024x577.jpg 1024w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2022/12/pankaj-ram-panchal-18-768x433.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2022/12/pankaj-ram-panchal-18-1536x865.jpg 1536w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2022/12/pankaj-ram-panchal-18-470x264.jpg 470w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2022/12/pankaj-ram-panchal-18-640x360.jpg 640w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2022/12/pankaj-ram-panchal-18-215x120.jpg 215w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2022/12/pankaj-ram-panchal-18-414x232.jpg 414w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2022/12/pankaj-ram-panchal-18-990x558.jpg 990w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2022/12/pankaj-ram-panchal-18-1320x744.jpg 1320w" sizes="(max-width: 1640px) 100vw, 1640px" /></p>
<p><strong>रत्नकरण्ड श्रावकाचार</strong> एक प्रमुख जैन ग्रन्थ हैं । जिसके रचयिता आचार्य श्री समन्तभद्र हैं । इस ग्रंथ में जैन श्रावक की चर्या का विस्तार से वर्णन है। आचार्य श्री समन्तभद्र ने जैन श्रावक कैसा होना चाहिए, इसके बारे में विस्तार से बताया है ।</p>
<p>इस ग्रंथ में 150 श्लोक संस्कृत भाषा में हैं जिसमें मुख्य रूप से सम्यगदर्शन, सम्यज्ञान, सम्यग्चारित्र, पांच अणुव्रत, तीन गुण व्रत, चार शिक्षा व्रत, संल्लेखना और श्रावक की ग्यारह प्रतिमाओं का वर्णन सात अधिकार में किया गया है । इस ग्रंथ पर आचार्य प्रभाचंद्र ने संस्कृत में टीका भी लिखी है । इसके अलावा कई स्थानों पर हिन्दी टीका और प्रश्नोत्तरी भी लिखी हुई मिलती है ।</p>
<p><strong>महान योगी थे आचार्य श्री समन्तभद्र स्वामी</strong></p>
<p>आचार्य श्री समन्तभद्रस्वामी <strong>रत्नकरण्डकश्रावकाचार ग्रन्थ</strong> के रचियता हैं । आप बहुत प्रतिभाशाली, योगी, त्यागी, तपस्वी एवं तत्त्वज्ञानी थे । आपको ‘स्वामी’ पद से विशेष तौर पर विभूषित किया गया है ।</p>
<p><strong>आचार्य श्री समन्तभद्रस्वामी का जीवनकाल </strong><br />
आचार्य जी का जन्म कब हुआ, इसका कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता है । हालांकि इतिहासकार स्वर्गीय पंडित जुगलकिशोर जी मुख्तार ने अपने विस्तृत लेखों में अनेक प्रमाण देकर यह स्पष्ट किया है कि <strong>स्वामी समन्तभद्र तत्त्वार्थ सूत्र</strong> के दाता आ<strong>चार्य उमास्वामी</strong> के पश्चात् एवं <strong>पूज्यपाद स्वामी</strong> के पूर्व हुए हैं।</p>
<p>अतः यह माना जाता है कि स्वामी समन्तभद्र विक्रम संवत की दूसरी-तीसरी शताब्दी के महान विद्वान थे । इस बात का भी कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं हैं कि आपका जन्म कहां हुआ था, लेकिन माना जाता है कि स्वामी समन्तभद्र का जन्म दक्षिण भारत के <strong>फणिमण्डल देश के उरगपुर नगर</strong> में हुआ था। यह कावेरी नदी के तट पर एक प्रसिद्ध नगर था और इसे <strong>पुरानी त्रिचनापोली</strong> के नाम से जानते हैं ।</p>
<p><strong>श्रवणबेलगोल के शिलालेखों में उल्लेख</strong></p>
<p>आपकी दीक्षा का स्थान कांची या उसके आस-पास कोई गांव होना चाहिए । आप कांची के दिगम्बर साधु थे लेकिन आपके दीक्षा गुरु का नाम पता नहीं है । आप मूल्संघ के प्रधान आचार्य थे । श्रवणबेलगोल के कुछ शिलालेखों से इतना ही पता चलता है कि आप श्री भद्रबाहु श्रुतकेवली, उनके शिष्य चन्द्रगुप्तमुनि के वंशज पद्मनन्दि अपर नाम कोन्डकुन्द मुनिराज और उनके वंशज उमास्वाति की वंश परम्परा में हुए थे।</p>
<p><strong>स्वामी समन्तभद्र एवं भस्मक रोग</strong></p>
<p>जब ‘मणुवकहल्ली’ ग्राम में मुनि जीवन व्यतीत कर रहे थे, उस समय आपको ‘भस्मक’ नाम का रोग हो गया था । मुनिचर्या में इस रोग का शमन होना असंभव जानकर आप अपने गुरु के पास पहुंचे । तब गुरु ने कहा कि &#8211; &#8221;जिस वेष में रहकर रोगशमन के योग्य भोजन प्राप्त हो, वहां जाकर उसी वेष को धारण कर लो ।&#8221;</p>
<p>गुरु की आज्ञा लेकर आपने दिगम्बर वेष का त्याग किया । आप वहां से कांची पहुंचे और वहां के राजा के पास जाकर शिवभोग की विशाल अन्न राशि को शिवपिण्ड को खिला सकने की बात कही ।</p>
<p>मन्दिर के किवाड़ बन्द करके वे स्वयं विशाल अन्नराशि को खाने लगे और लोगों को बता देते थे कि शिवजी ने भोग को ग्रहण कर लिया है। शिव भोग से उनकी व्याधि धीरे-धीरे ठीक होने लगी और भोजन बचने लगा । अन्त में, गुप्तचरों से पता लगा कि ये शिवभक्त नहीं हैं । इससे राजा बहुत क्रोधित हुआ । तब उन्होंने अपना परिचय दिया ।</p>
<p>राजा ने शिवमूर्ति को नमस्कार करने का आग्रह किया । समन्तभद्र कवि थे। उन्होंने चौबीस तीर्थंकरों का स्तवन शुरू किया । जब वे आठवें तीर्थंकर चन्द्रप्रभु का स्तवन कर रहे थे, तब चन्द्रप्रभु भगवान की मूर्ति प्रकट हो गई ,स्तवन पूर्ण हुआ । यह <strong>स्तवन स्वयंभूस्तोत्र</strong> के नाम से प्रसिद्ध है ।</p>
<p><strong>उत्तम गुणों के स्वामी स्वामी समन्तभद्र</strong></p>
<p>शुभचन्द्राचार्य ने स्वामी समन्तभद्र को ‘भारत भूषण’ लिखा है । स्वामी समन्तभद्र बहुत ही उत्तमोत्तम गुणों के स्वामी थे ।</p>
<p><strong>यशोधर चरित के दर्ता महाकवि वादिराज सूरि</strong> ने स्वामी समन्तभद्र को उत्कृष्ट काव्य माणिक्यों का रोहण (पर्वत) बताया है । <strong>अलंकार चिन्तामणि में अजितसेनाचार्य</strong> ने आपको ‘कविकुंजर’ ‘मुनिवंद्य’ और ‘निजानन्द’ लिखा है ।</p>
<p><strong>वरांगचरित्र</strong> में <strong>श्री वर्धमान सूरि</strong> ने आपको<strong> महाकवीश्वर और सुतर्कशास्त्रामृत</strong> का सागर बताया है । ब्रह्मअजित ने हनुम्च्चरित्र में आपको भव्यरूप कुमुदों को प्रफुल्लित करने वाला चन्द्रमा लिखा है तथा साथ में यह भी प्रकट किया है कि वे कुवादियों की वादरूपी खाज (खुजली) को मिटाने के लिए अद्वितीय महौषधि थे । इसके अलावा भी श्रवणबेलगोल के शिलालेखों में आपको <strong>‘वादीभवज्रांकुशसूक्तिजाल स्फुटरत्नदीप’ वादिसिंह, अनेकान्त जयपताका</strong> आदि अनेक विशेषणों से स्मरण किया गया है ।</p>
<p><strong>‘हिस्ट्री ऑफ कन्नडीज लिट्रेचर’</strong> के लेखक मिस्टर एडवर्ड पी.राईस ने समन्तभद्र को तेजपूर्ण प्रभावशाली लेखक लिखा है और बताया है कि वे सारे भारतवर्ष में जैनधर्म का प्रचार करनेवाले महान् प्रचारक थे ।</p>
<p><strong>स्वामी समन्तभद्र जी ने रचे हैं कई ग्रंथ</strong><br />
स्वामी समन्तभद्र द्वारा विरचित निम्नलिखित ग्रंथ उपलब्ध हैं &#8211;<br />
1. स्तुतिविद्या (जिनशतक), 2. युक्त्यनुशासन, 3. स्वयम्भूस्तोत्र, 4. देवागम (आप्तमीमांसा) स्तोत्र 5. रत्नकरण्डकश्रावकाचार 6. स्वयंभूस्तोत्र, देवागम और युक्त्यनुशासन आपके प्रमुख स्तुति ग्रन्थ हैं ।<br />
इन स्तुतियों में उन्होंने जैनागम का सार एवं तत्त्वज्ञान को कूट-कूट कर भर दिया है । देवागम स्तोत्र में सिर्फ आपने 114 श्लोक लिखे हैं । इस स्तोत्र पर <strong>अकलंकदेव</strong> ने <strong>अष्टशती नामक 800 श्लोक </strong>प्रमाण वृत्ति लिखी जो बहुत ही गूढ़ सूत्रों में है । आपके द्वारा रचित निम्न ग्रन्थों के भी उल्लेख मिलते हैं जो उपलब्ध नहीं हो पाये हैं<br />
1. जीवसिद्धि 2. तत्त्वानुशासन 3. प्राकृत व्याकरण 4. प्रमाणपदार्थ 5. कर्मप्राभृत टीका 6. गन्धहस्तिमहाभाष्य ।</p>
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